बढ़ते अरबपति गतिशील इकोनोमी के परिचायक

Indian economy
Prabhasakshi

सवाल एक और उभरता है कि अमीर-गरीब की खाईं अधिक गहरी नहीं होनी चाहिए। सकारात्मक पक्ष यह है कि रोजगार और रोजगार के अवसर बढ़े हैं। नागरिकों की आय बढने लगी है और इसका समाज के समग्र विकास पर असर पड़ता है। आय बढ़ेगी या रोजगार उपलब्ध होगा तो रहन-सहन, जीवन यापन के स्तर में सुधार होगा।

एक बात तो साफ हो जानी चाहिए कि देश की इकोनोमी में तेजी से बदलाव देखा जा रहा है। केन्द्र सरकार द्वारा पिछले दिनों में संसद में प्रस्तुत आंकड़ों का ही विश्लेषण करें तो दो बातें साफ हो जाती है कि देश में अरबपतियों की संख्या में बेतहासा बढ़ोतरी हो रही है तो दूसरी और इंकमटैक्स रिटर्न भरने वालों की भी संख्या में इजाफा हो रहा है। संसद में पेश आंकड़ों के विश्लेषण से यह साफ हो रहा है कि आयकर रिटर्न में 100 करोड़ से अधिक की आय बताने वालों की संख्या 2021-22 की 142 से बढ़कर 576 हो गई है। आयकर रिटर्न के अनुसार पिछले सालों एक अरब से अधिक आय वालों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। इसे गतिशील अर्थ व्यवस्था का परिचायक माना जा सकता है। पिछले पांच साल के आंकड़ों का ही विश्लेषण किया जाएं तो देश में बेरोजगारी की दर में भी कमी आई है। हांलाकि सरकार इसके लिए अपनी लोककल्याणकारी नीतियों को श्रेय देती है। आयकर प्रक्रिया में सुधार, सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से सीधा लाभ, खाद्य, स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास, परिवहन , पानी बिजली आदि आदि की जनहितकारी योजनाओं और निवेशोन्मुखी माहौल से देष में तेजी से सुधार का माहौल बना है। हांलाकि देश के कुल परिसंपत्तियों में 50 फीसदी से अधिक लोग केवल 2 प्रतिशत की ही हिस्सेदारी रखते हैं। अच्छी बात यह है कि आज की युवा पीढ़ी सकारात्मकता के साथ आगे बढ़ रही है और युवकों के साथ ही महिलाओं की भागीदारी भी तेजी से बढ़ रही है। 

भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर एक सकारात्मक प़क्ष यह है कि समन्वित प्रयासों से अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में नए क्षेत्रों को तेजी से व योजनाबद्ध तरीके से बढ़ावा दिया गया है। परंपरागत क्षेत्रों के साथ ही नए क्षेत्रों मेंं अवसर खुले हैं और इसका सबसे अधिक लाभ युवा पीढ़ी उठा रही है। एक आंकड़ें के अनुसार 425 करोड़ से अधिक की संपत्ति वाले 3040 में से 1696 ऐसे उद्यमी है जो नई पीढ़ी और पहली पीढ़ी के हैं। नई पीढ़ी से मतलब यह है कि यह वे नए लोग है जो पंरपरागत या धनकुबेरों के परिवारों से नहीं आते अपितु अपने स्तर पर इस मुकाम पर पहुंचने वाले हैं। यही अर्थव्यवस्था का सकारात्मक पक्ष हो जाता है। सरकारी नीतियों और युवाओं में नया करने की ईच्छा शक्ति का परिणाम है कि नए क्षेत्रों में स्टार्टअप या एमएसएमई के मध्यम से युवाओं ने पहल की और अर्थ व्यवस्था को गति देने के साथ ही निवेश, रोजगार के अवसर विकसित किये। सरकार ने भी उत्पादन आधारित प्रोत्साहन यानि की पीएलआई से युवाओं को जोड़कर कुछ नया करने के लिए प्रोत्साहित किया। इसके परिणाम भी अच्छे प्राप्त हुए हैं। साल दर साल आयकर रिटर्न भरने वाले और आयकर देने वालों की संख्या में बढ़ोतरी इसका उदाहरण है। यह सब सरकार की सकारात्मक नीतियों से ही संभव हो सकता है। 

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एक बात साफ हो जानी चाहिए कि सरकार की नीतियों का अर्थ व्यवस्था को गति देने में खास भूमिका होती है। आज दुनिया के देशों में ईज ऑफ डूइंग पर जोर दिया जा रहा है। देशों में प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष और देशी विदेशी निवेश बहुत कुछ सरकार की नीतियों पर निर्भर करता है। बुनियादी ढांचा विकास, उद्योगों को प्रोत्साहन, सेवा क्षेत्र में विस्तार, स्टार्टअप्स को बढ़ावा, जीएसटी एक देश एक कर की नीति, डिजिटल भुगतान और विनिर्माण क्षेत्र में विस्तार से औद्योगिक माहौल बनता है। एक बात और की एमएसएमई आर्थिक विकास की रीढ होती है। इसे ग्रोथ इंजन भी कहा जा सकता है क्योंकि इससे अर्थ व्यवस्था को गति मिलती है तो स्थानीय स्तर पर बड़ी मात्रा में रोजगार के अवसर भी एमएसएमई सेक्टर में ही विकसित होते हैं। यही कारण है प्रोडक्सन लिंक इंसेटिंव जैसी योजनाओं और स्टार्टअप्स को बढ़ावा देने से युवा रोजगार मांगने की जगह रोजगार प्रदाता बनने का सपना देखता है और इसमें कोई दे राय नहीं कि एमएसएमई सेक्टर में अधिक रोजगार के अवसर विकसित होते हैं। अर्थ व्यवस्था को गति मिलती है। हांलाकि बड़े उद्योगों का अपना महत्व हे और उससे इंकार नहीं किया जा सकता। एक और बात यह है कि देश में निवेशोन्मुखी माहौल बन रहा है। राज्यों द्वारा अब निवेशकों को आकर्षित और आमंत्रित करने के लिए अन्य राज्यों के साथ ही प्रोस्पेक्टिव विदेशों में रोड शो सहित विभिन्न आयोजन कर निवेश का माहौल बनाया जाता है। राज्यों द्वारा निवेश सम्मेलन और निवेशकों को आमंत्रित करने के लिए आयोजन आम होते जा रहे हैं। इसके परिणाम भी आने लगे हैं। यह भी साफ है कि उद्योग लगाने के लिए निवेश आयेगा तो रोजगार, कारोबार के साथ ही नई तकनीक और इसके साथ ही अन्य कई चीजें आयेगी और उसका लाभ देश और देश की अर्थ व्यवस्था को ही मिलेगा।

सवाल एक और उभरता है कि अमीर-गरीब की खाईं अधिक गहरी नहीं होनी चाहिए। सकारात्मक पक्ष यह है कि रोजगार और रोजगार के अवसर बढ़े हैं। नागरिकों की आय बढने लगी है और इसका समाज के समग्र विकास पर असर पड़ता है। आय बढ़ेगी या रोजगार उपलब्ध होगा तो रहन-सहन, जीवन यापन के स्तर में सुधार होगा। लोगों की आय बढ़ेगी और आय से बाजार में मांग आपूर्ति में बदलाव आयेगा और इससे इकोनोमी को गति मिलेगी। अरबपतियों की संख्या में बढ़ोतरी अच्छी बात है पर अमीर गरीब के बीच खाईं पाटने के प्रयास अभी नाखाफी ही लग रहे हैं।

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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