छात्रों के शांतिपूर्ण आंदोलन का कुछ राजनेताओं ने कर दिया राजनीतिकरण!

NEET Protest Jantar Mantar
ANI
ललित गर्ग । Jul 24 2026 3:36PM

नीट परीक्षा लीक कांड के बाद से ही सरकारी परीक्षाओं में पेपर लीक रोकते हुए देश में छात्रों के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए रणनीति बनाने की मांग व केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे लेकर के शुरू हुई छात्रों की मांग पर अब पूरी तरह से राजनीति का शिकार होती जा रही है।

नीट-यूजी की 3 मई 2026 को आयोजित मूल परीक्षा के पेपर लीक होने की खबरों के बाद 12 मई 2026 को सरकार ने नीट की परीक्षा को रद्द कर दिया था। तब से ही छात्रों में आक्रोश व्याप्त है और वह देश के विभिन्न हिस्सों में शांति पूर्ण तरीके से धरना प्रदर्शन करके अपना जबरदस्त विरोध प्रकट कर रहे थे। लेकिन अचानक ही 16 मई 2026 को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) नामक एक पार्टी बन जाती है और वह पार्टी छात्रों के आंदोलन में कूद पड़ती है, उस पार्टी के द्वारा दिल्ली में जून के प्रथम सप्ताह से धरना प्रदर्शन शुरू किया जाता है, इस धरना प्रदर्शन में सबकुछ ठीक ठाक ही चल रहा था, लेकिन जब से कुछ राजनेताओं की एंट्री हुई है तब से ही छात्रों की मूल मांगो से खिलवाड़ होना शुरू हो गया है। हालांकि केंद्र सरकार ने नीट परीक्षा के पेपर लीक के इस मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को इस मामले की जांच सौंपी दी थी। वही सरकार के द्वारा नए सिरे से नीट की पुनर्परीक्षा 21 जून 2026 को आयोजित की जा चुकी है, 16 जुलाई 2026 की रात को पुनर्परीक्षा के नतीजे भी एनटीए के द्वारा घोषित कर दिए गए हैं। लेकिन आजकल जबरदस्त प्रतियोगिता के इस दौर में सरकारी नौकरी व महत्वपूर्ण परीक्षाओं के पेपर बार-बार रद्द होने के कारण देशभर के छात्रों में भारी मानसिक तनाव के चलते विरोध की स्थिति जबरदस्त ढंग से देखने को मिल रही है। छात्रों के द्वारा लगातार देश व प्रदेशों के नीति-निर्माताओं से  परीक्षाओं की निष्पक्षता और छात्रों के बीच विश्वसनीयता को बरकरार रखने के लिए धरातल पर ठोस आवश्यक कदम उठाने की मांग भी लगातार की जा रही है। वहीं केंद्र सरकार निरंतर छात्रों को आश्वस्त कर रही थी कि वह भविष्य में आयोजित परीक्षाओं में पेपर लीक रोकने के लिए ठोस कदम उठा रही है, फिर भी आंदोलन जारी है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि छात्र आंदोलन में जब सोशल एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक की एंट्री होती है, वह भूख हड़ताल पर बैठ जाते हैं और जब भूख हड़ताल एक-एक दिन करके लंबी चलने लगती है, तो छात्रों का शांतिपूर्ण ढंग से चल रहा यह आंदोलन देश के कुछ राजनेताओं के लिए अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए एक शानदार पर्यटन स्थल बन जाता है, जिसके चलते धरनास्थल पर बहुत तेज़ी से छोटे व बड़े राजनेताओं का तांता लगने लग जाता है। अब पिछले कुछ दिनों से जिस तरह की स्थिति कुछ लोगों व राजनेताओं के द्वारा देश राजधानी दिल्ली में बनायी जा रही है, उससे अब यह स्पष्ट होता जा रहा कि लंबे अरसे से आंदोलनरत छात्रों की मूल मांगें राजनीतिकरण के चलते अब पीछे छूट गई हैं। छात्रों के शांतिपूर्ण आंदोलन को आज कुछ लोगों के गैंग ने छात्र हित के जगह पर्दे के पीछे छिपी सत्ता हथियाने की सीढ़ी से केंद्र व प्रदेशों में सत्ता परिवर्तन करने का हथियार बना लिया है। छात्रों के शांतिपूर्ण आंदोलन को कुछ लोगों व राजनेताओं ने पूर्व की भांति ही सत्ता परिवर्तन करने की महत्वाकांक्षा का हथियार बनाते हुए आंदोलन को राजनेताओं की स्वार्थ पूर्ति अखाड़ा बनाकर रख दिया है। हर बार की ही तरह इस बार भी छात्रों के बेहद शांतिपूर्ण ढंग से चल रहे आंदोलन को कुछ चतुर, चालाक व बेहद ही स्वार्थी राजनेता ने घुसकर के छात्रों व देश युवाओं के केंद्र सरकार के खिलाफ आक्रोश को अपने क्षणिक हितों को साधने की ताकतवर ऊर्जा के रूप में इस्तेमाल करते हुए अपने व्यक्तिगत एजेंडे व हितों की पूर्ति करने व पार्टी के हितों को साधने वाली राजनीतिक जमीन को मजबूत करने वाला आंदोलन बनाकर रख दिया है। छात्रों के नाम पर शुरू हुए आंदोलन में अब छात्रों  के हित की बातें बहुत पीछे छूटते जा रही हैं, राजनेताओं के छिपे हुए एजेंडे छात्र व नौजवानों के हितों पर हावी होते जा रहे हैं, कुछ लोगों के द्वारा आंदोलन को हिंसक बनाते हुए राजनीतिकरण किया जा रहा है।

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नीट परीक्षा लीक कांड के बाद से ही सरकारी परीक्षाओं में पेपर लीक रोकते हुए देश में छात्रों के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए रणनीति बनाने की मांग व केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे लेकर के शुरू हुई छात्रों की मांग पर अब पूरी तरह से राजनीति का शिकार होती जा रही है। छात्रों के शांति प्रिय आंदोलन में कुछ राजनेताओं की कृपा से अब तो आलम यह हो गया है कि कुछ राजनेता को छात्रों के विरोध का यह अवसर पर देश व प्रदेशों की सत्ता को परिवर्तित कर सत्ता पर काबिज होने का एक बड़ा अवसर तक लग रहा है। छात्रों के विभिन्न ज्वलंत मुद्दों पर देश के पक्ष-विपक्ष के राजनेताओं के द्वारा जमकर के राजनीति की जा रही है, सड़क से लेकर संसद तक हर तरफ़ संग्राम छिड़ा हुआ है, सड़क पर कुछ लोगों के द्वारा जबरदस्त टकराव की स्थिति उपस्थिति उत्पन्न करते हुए, लोगों के जान-माल व देश की बहुमूल्य संपत्तियों व सुरक्षा कर्मियों तक को निशाना बनाया जा रहा है। वहीं 20 जुलाई 2026 से ही जब से संसद में मानसून सत्र शुरु हुआ है तब से ही छात्रों व अन्य मुद्दों पर सकारात्मक चर्चा व समस्या के स्थाई निदान पर चर्चा करने की जगह जमकर के हंगामा बरपाया जा रहा है। हालांकि देश की सुरक्षा एजेंसियां छात्र आंदोलन की आड़ में देशविरोधी गतिविधियों होने की लगातार संभावना व्यक्त कर रही हैं, लेकिन फिर भी किसी भी पक्ष को राष्ट्र व छात्रों के हितों की कोई चिंता वास्तव में नज़र नहीं आती है, केवल और केवल किसी भी तरह से सत्ता हथियाने व केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफा करवाने की चिंता ज्यादा है। हालांकि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार को दुविधा में डालने से पहले और हंगामा खड़ा होने से पहले ही स्वयं ही नैतिकता के आधार पर बिना किसी भी जोर दवाब के केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा स्वेच्छा से पहले ही दे देना चाहिए था और सरकार का विवेक था कि वह धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को स्वीकार करती या अस्वीकार करती। लेकिन छात्रों, अभिभावकों व हमें भी निष्पक्ष रूप से यह विचार अवश्य करना चाहिए कि क्या केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पूर्ण हो जाने से भविष्य में देश में पेपर लीक की यह घटनाएं रुक जायेंगी, क्या इस्तीफे से छात्रों व युवाओं का भविष्य सुरक्षित हो जायेगा। वैसे भी आज की परिस्थितियों में आंदोलनरत छात्रों को भी यह आत्ममंथन अवश्य करना चाहिए कि आज उनका शांतिपूर्ण आंदोलन कहां आकर के खड़ा हो गया है, क्या आंदोलन पर कब्जा जमाकर के बैठे नेताओं के द्वारा छात्र हित की बातें आज किसी समाधान करने वाले वास्तविक पटल पर उठायी जा रही हैं या इन नेताओं के द्वारा चतुराई से छात्रों की आड़ में अपने-अपने छिपे हुए एजेंडे को पूरा करा जा रहा है। सभी आंदोलनरत छात्रों को ध्यान रखना चाहिए कि हमारे प्यारे देश में ओछी राजनीति कब क्या करा दें, उसका कोई भरोसा नहीं है, इसलिए वह पूरी तरह से सज़ग रहें और शांतिपूर्ण आंदोलन को छात्र व नौजवानों के हितों तक ही सीमित करते हुए किसी भी कीमत पर हिंसक ना होने दें, तब ही देर सबेर छात्रों के हितों की बात को लेकर के कुछ ठोस निर्णय अवश्य होगा।

- दीपक कुमार त्यागी / हस्तक्षेप 

अधिवक्ता, स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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