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    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
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      <title><![CDATA[उज्ज्वल है भारत का खेल भविष्य]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/india-sporting-future-is-bright]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल में भारत का प्रदर्शन उम्मीद से कहीं बेहतर रहा। भारत ने 13 स्वर्ण, 17 रजत और 9 कांस्य सहित कुल 39 पदक जीते। वह पदक तालिका में चौथे नंबर पर रहा। पहली नजर में यह प्रदर्शन बर्मिंघम 2022 के 61 पदक से कमजोर दिख सकता है, लेकिन आंकड़े अलग कहानी बताते हैं। इस बार ग्लासगो में सिर्फ 10 खेल शामिल थे, जबकि बर्मिंघम में 19 खेल खेले गए थे। बैडमिंटन, कुश्ती, शूटिंग, हॉकी, टेबल टेनिस और क्रिकेट जैसे खेल ग्लासगो गेम्स का हिस्सा नहीं थे, जिनसे 2022 में भारत को 30 पदक मिले थे। इसके अलावा भारत ने 210 खिलाड़ियों की जगह सिर्फ 123 खिलाड़ियों का दल भेजा। इनमें से 38 खिलाड़ी पदक जीतकर लौटे, यानी सफलता की दर 31 प्रतिशत रही। बर्मिंघम में यह आंकड़ा 29 प्रतिशत था।</div><div><br></div><div>ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल शुरू होने से पहले भारतीय ओलंपिक संघ और विभिन्न खेल महासंघों की आंतरिक रिपोर्ट में भारत को 6 स्वर्ण समेत 31 पदक मिलने का अनुमान लगाया गया था। भारतीय खिलाड़ियों ने अनुमान से दोगुना से भी ज्यादा स्वर्ण जीते। कुल पदक में भी आगे निकल गए। ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल में भारत का सबसे सफल खेल बॉक्सिंग रहा। 14 मुक्केबाजों के दल में से 10 खिलाड़ी पदक जीतकर लौटे। इसमें 7 स्वर्ण और 3 रजत शामिल रहे। यानी 71 प्रतिशत मेडल कन्वर्जन रेट। बर्मिंघम 2022 में यह आंकड़ा 58 प्रतिशत था। पदक वितरण समारोह के दौरान सात बार भारत का राष्ट्रगान बजना न सिर्फ ग्लासगो में मौजूद भारतीय दर्शकों के लिए गर्व का पल था, बल्कि इस बात का सबूत भी था कि इस गैर-पारंपरिक खेल को गांवों और छोटे कस्बों तक ले जाने की पहल काफी हद तक सफल रही है। भारतीय बॉक्सरों के प्रदर्शन की जितनी भी प्रशंसा की जाए वो कम है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/commonwealth-games-2026-india-shines-amidst-challenges" target="_blank">राष्ट्रमंडल खेल 2026: चुनौतियों के बीच चमका भारत</a></h3><div>जूडो में भारत ने पहली बार राष्ट्रमंडल खेल इतिहास में स्वर्ण जीता। अस्मिता डे और हर्ष सिंह ने स्वर्ण जीता। यामिनी मौर्य ने रजत और उन्नति शर्मा ने कांस्य जीतकर कुल चार पदक भारत की झोली में डाले। हालांकि 14 सदस्यीय भारतीय टीम के दो खिलाड़ी अरुण कुमार और तुलिका मान डोपिंग के कारण बाहर हो गए। इसी तरह, एथलीटों और पैरा-एथलीटों ने 16 पदक जीते। इनमें से कुछ ने तो नए राष्ट्रीय रिकॉर्ड भी बनाए।</div><div><br></div><div>वेटलिफ्टर्स ने आठ और पदक जीते। इन पदकों में ओलंपियन मीराबाई चानू का जीता हुआ एक स्वर्ण पदक भी शामिल था, जिससे उन्होंने स्वर्ण पदकों की हैट्रिक पूरी की; मणिपुर की इस एथलीट ने इससे पहले 2018 गोल्ड कोस्ट और 2022 बर्मिंघम राष्ट्रमंडल खेल में भी स्वर्ण पदक जीता था। असल में, मीराबाई चानू की शानदार कामयाबी के बावजूद, भारतीय वेटलिफ्टरों का प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा। इस निराशा की एक वजह यह है कि डोपिंग के आरोपों के कारण कम से कम दो भारतीय वेटलिफ्टरों की एंट्री वापस लेनी पड़ी। छह अन्य खिलाड़ी—कड़ी टक्कर न होने के बावजूद—लड़ने के जज़्बे की कमी या तकनीकी गलतियों की वजह से स्वर्ण पदक&nbsp; जीतने का मौका चूक गए।</div><div><br></div><div>एथलेटिक्स ने भारत को 10 पदक दिलाए, लेकिन एक भी स्वर्ण नहीं आया। नीरज चोपड़ा रजत जीत सके। उनके साथ डेब्यू कर रहे यशवीर सिंह ने कांस्य जीता। गुलवीर सिंह ने 10 हजार मीटर में सिल्वर और 5 हजार मीटर रेस में कांस्य जीतकर इतिहास रचा। गुलवीर एक ही कॉमनवेल्थ गेम्स में एथलेटिक्स में दो पदक जीतने वाले वह भारत के पहले खिलाड़ी भी बनें। तेजस्विन शंकर ने डेकाथलन में भारत का पहला राष्ट्रमंडल पदक दिलाया। सरवेश कुशारे, श्रीशंकर, प्रवीण चित्रावेल और सीमा कालीरामना भी पदक जीतने में सफल रहे। हालांकि स्प्रिंट और रिले टीम से बड़ी उम्मीदें थीं, वह खाली हाथ रही।</div><div><br></div><div>इसमें कोई दो राय नहीं है कि मोदी सरकार के 12 वर्षों के शासन में देश में खेलों का संस्थागत विकास तेजी से हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई बार यह दोहराया है कि खेल देश में एकता बढ़ाने, युवाओं को प्रेरित करने और भारत को एक आत्मविश्वासी और उभरती हुई वैश्विक ताकत के रूप में स्थापित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। उनकी यह सोच कार्यों में भी दिखाई देती है, जैसे कि ‘खेलो इंडिया’और ‘टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम यानी टॉप्स’ जैसे प्रमुख कार्यक्रमों के माध्यम से। इन पहलों ने देश में खेलों की पूरी व्यवस्था को नया रूप दिया है और भारत को खेलकूद के प्रति समर्पित एक राष्ट्र बना दिया है। इन योजनाओं के कारण भारतीय खिलाड़ियों को बेहतर वित्तीय सहायता, आधुनिक प्रशिक्षण और अंतरराष्ट्रीय स्तर का एक्सपोजर मिला है, जिसके परिणामस्वरूप ओलंपिक, पैरालंपिक, कॉमनवेल्थ और एशियाई खेलों में भारत का प्रदर्शन लगातार सुधरा है।</div><div><br></div><div>नई प्रतिभाओं को पदक जीतने वाले खिलाड़ी में बदलने में 'खेलो इंडिया' कार्यक्रम की अहम भूमिका रही है। इस कार्यक्रम के तहत अब तक 2781 से अधिक खिलाड़ियों को प्रशिक्षण, उपकरण, चिकित्सा देखभाल और वित्तीय सहायता दी गई है। सरकार ने खेलो इंडिया योजना पर 36,441 करोड़ रुपये का भारी निवेश मंजूर किया है। वर्ष 2026-31 के लिए संशोधित खेलो इंडिया योजना को मंजूरी दी है। राष्ट्रीय खेल महासंघों को मजबूत बनाने के लिए बड़े पैमाने पर वित्तीय सहायता दी जा रही है।</div><div><br></div><div>देश के दूर-दराज और ग्रामीण इलाकों से भी उभरती प्रतिभाओं को खोजा जा रहा है। स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षण और मार्गदर्शन की सुविधाएं देने के लिए देशभर में 1041 खेलो इंडिया केंद्र स्थापित किए गए हैं। इसके साथ ही, 32 खेलो इंडिया सेंटर ऑफ एक्सीलेंस और 301 खेल अकादमियों को मान्यता दी गई है, जिससे खेलों का पूरा इकोसिस्टम और मजबूत हुआ है। खेलो इंडिया सीओई में खिलाड़ियों को विशेषज्ञ कोचिंग, पोषण और उच्चस्तरीय प्रशिक्षण की सुविधा दी जा रही है।</div><div><br></div><div>मोदी सरकार की इन पहलों का जमीन पर जबरदस्त असर भी दिख रहा है। 2022 एशियाई खेलों में भारत के 42 पदकों में से 124 पदक विजेता 'खेलो इंडिया' से प्रशिक्षित खिलाड़ी थे। वहीं पेरिस 2024 ओलंपिक में खेलो इंडिया के 28 खिलाड़ियों ने देश का प्रतिनिधित्व किया था। 'खेलो इंडिया' के खिलाड़ियों ने अब तक करीब 6000 राष्ट्रीय रिकॉर्ड और 1400 अंतरराष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाए हैं, जो भारत के जमीनी स्तर के खेलकूद के कार्यक्रमों की प्रगति को दर्शाता है।</div><div>&nbsp;</div><div>कोच और खेल विशेषज्ञ मानते हैं कि कॉन्टिनेंटल या ग्लोबल इवेंट्स में प्रतियोगिता का स्तर कहीं ज्यादा होता है। ऐसे में किसी एथलीट या खिलाड़ी की काबिलियत और कड़ी मेहनत की असली परीक्षा एशियन गेम्स या ओलंपिक्स में होती है। हालांकि कॉमनवेल्थ गेम्स में जीते गए मेडल का महत्व कम नहीं आंका जाना चाहिए। इस बार युवा खिलाड़ियों ने दिखाया है कि भारत का खेल भविष्य पहले से कहीं ज्यादा उज्ज्वल दिख रहा है, कई खेलों में नई पीढ़ी के टैलेंटेड एथलीट सुर्खियां बटोर रहे हैं। राष्ट्रमंडल खेल जैसी प्रतियोगिता में किए गए प्रदर्शन को आम तौर पर भविष्य में सुधार के पैमाने और अपनी खूबियों व कमियों के आकलन के तौर पर देखा जाता है।</div><div>&nbsp;</div><div>राष्ट्रमंडल खेल के बाद अब भारतीय खिलाड़ियों की नजर एशियन गेम्स में दमदार प्रदर्शन करने पर है। 20 वें एशियाई खेल का आगाज 19 सितंबर से जापान के नागोया में होग। भारत इस बार हांग्जो 2022 के अपने ऐतिहासिक 107 पदकों के रिकॉर्ड को तोड़ने के इरादे से मैदान में उतरेगा। इसीलिए भारतीय खिलाड़ियों को राष्ट्रमंडल खेल में अपने प्रदर्शन पर गर्व करते हुए एशियन गेम्स में पेश आने वाली चुनौतियों के हिसाब से बिना एक भी पल गवाएं तैयारियां शुरू कर देनी चाहिए। क्योंकि जब विदेशी धरती पर तिरंगा लहराता है और जन-गण-मन गूंजता है, तो वह पल केवल एक खिलाड़ी की जीत नहीं, बल्कि पूरे देश का गौरव बन जाता है।</div><div><br></div><div>- डॉ. आशीष वशिष्ठ</div><div>(स्वतंत्र पत्रकार)</div><div>लखनऊ, उत्तर प्रदेश (भारत)</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 06 Aug 2026 18:50:31 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/india-sporting-future-is-bright</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[परमाणु हथियारों के प्रतिबंध की वकालत करती है हिरोशिमा त्रासदी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-hiroshima-tragedy-advocates-for-a-ban-on-nuclear-weapons]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>मानव इतिहास में ‘6 अगस्त 1945’ की मनहूस तारीख को शायद ही कोई भूल पाए। 'हिरोशिमा दिवस' के रूप में मनाई जाती है ये तारीख। इस तारीख में सिर्फ तबाही लिखी थी। तारीख में ऐसा मुकर्रर वक्त था जिसने मात्र 16 मिनट के भीतर 1,30,000 लोगों की सांसें एक साथ रोकी थी। हताहतों का आकंड़ा फिलहाल सरकारी है, पर वास्तिवक संख्या इससे कहीं अधिक बताई जाती है। हिरोशिमा पर किए परमाणु हमले में मरने वालों में बूढ़े, बच्चे, नौजवान, औरतें भी थीं। सुबह करीब 8ः15 बजे अमेरिका ने हिरोशिमा पर अपने ‘बी-29 ‘एनाला गे’ विमान द्वारा आसमान से परिमाणु बमों की बारिश करके पूरा शहर जिंदा जला दिया था। घटना के वक्त ज्यादातर लोग सोए हुए थे, परमाणु बम ने उन्हें सोता ही मार दिया। हिरोशिमा में जब परमाणु बम फोड़ा गया, तो जापानियों को लगा कि सूरज फटा है। जबकि, वह सूरज नहीं, बल्कि तथाकथित विकसित, सभ्य और मुट्ठी भर लोगों का निर्णय तथा एक महाशक्ति द्वारा निर्मित कृत्रिम सूरज था जिसकी आग में लाखों निर्दोष लोग भाप बनकर चंद मिनटों में उड़ गए। घटना का सामूहिक हत्यारा अमेरिका था।</div><div><br></div><div>अगस्त माह की जब 6 तारीख आती है या फिर परमाणु हथियारों की बढ़ती तादात पर वैश्विक मंचों पर विमर्श होता है, तो जापान की दिल दहला देने वाली यह घटना आंखों के सामने अनायास उमड़ पड़ती हैं। घटना को श्रृधालजि के तौर पर ही सालाना 6 अगस्त को ‘हिरोशिमा दिवस’ के रूप में विश्व मनाता है। यह दिन उन मुल्कों को संकल्पित होने को आहवान भी करवाता है, जो परमाणु बम फोड़ने की अनाअवश्यक धमकी दिया करते हैं। साथ ही अहिंसा, त्रासदी, को छोड़कर भाईचारा अपनाने और शांति के पथ पर चलने को जागरूश्क भी करता है। 1945 में अमेरिका द्वारा जापान के दो शहरों पर गिराए गए अलग-अलग तारीखों पर परमाणु बम की यह कहानी काले अध्याय के रूप में तबतक दर्ज रहेगी, जबतक दुनिया इस धरती पर वास करेगी। 6 अगस्त को गिराए पहले बम का नाम ‘एनाला गे’ था। वहीं, 9 अगस्त वाले बम का नाम ‘लिटिल बॉय’ यानी यूरेनियम-आधारित परमाणु बम था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/trending/single-atomic-bomb-claimed-hundreds-of-thousands-of-lives-us-attack-changed-world-history" target="_blank">Hiroshima Day 2026: एक परमाणु बम ने ली लाखों जानें, US Attack की उस काली सुबह ने बदल दिया World History</a></h3><div>जापान का जब तक अस्तित्व रहेगा, उनके लोग अमेरिका को माफ नहीं करेंगे। जापान के अलावा पूरे विश्व में इस मानव त्रासदी की निंदा प्रत्येक 6 अगस्त को की जाती है। नागासाकी पर गिराए बम से भी लाखों की संख्या में बेकसूर नागरिक मरे थे। हिरोशिमा दिवस वैश्विक स्तरीय पर परमाणु हथियारों के विरुद्ध एकजुट होने एवं समूचे संसार में अमन-शांति की वकालत के लिए भी याद किया जाता है। साथ ही भविष्य में ऐसे विनाशकारी युद्धों को रोकने के लिए परमाणु हथियारों को नष्ट करने की पुरजोर अपील भी करता है। हिरोशिमा पर गिराए गए परमाणु बम को अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति फ्रैंकलिन ‘डेलानो रूजवेल्ट’ के सन्दर्भ में ‘लिटिल ब्वाय’ और नागासाकी के बम को विन्सटन चर्चिल के सन्दर्भ में ‘फैट मैन’ भी कहा जाता है। फ्रैंकलिन डेलानो रूजवेल्ट अमेरिका के 32वें राष्ट्रपति हुआ करते थे। वह द्वितीय विश्वयुद्ध और वैश्विक आर्थिक मंदी के दौरान बीसवीं सदी के सबसे क्रूर व्यक्तियों में गिने जाते रहे। यह त्रासदी उनकी ही देन थी।</div><div>&nbsp;&nbsp;</div><div>पाकिस्तान, अमरिका जैसे मुल्क आज भी परमाणु बमों को फोड़ने की धमकी देते हैं। इसलिए हिरोशिमा दिवस उनके लिए चेतावनी के अलावा सीख जैसा भी है। हिरोशिमा की घटना को आज 81 वर्ष हो गए, लेकिन दुर्भाग्य संसार आज भी युद्ध-हिंसा में संलग्न है। यूं कहें कि परमाणु हथियारों के ढेर पर बैठा है। हाल में, अमेरिका द्वारा ईराक पर परमाणु हमले की धमकी देना, दुनिया भर में बढ़ती हिंसा की घटनाएं और हथियारों को इकट्ठा करने की होड़ के बीच हमारे सामने यह प्रश्न खड़ा होता है कि हम हिरोशिमा और नागासाकी की घटनाओं से क्या कुछ सबक सीख पाए या नहीं? 81 साल पहले 2,50,000 हजार लोगों को मारकर भी अमेरिका को शांति नहीं मिली? अमेरिका की दादागिरी को जवाब देने का वक्त आ चुका है इसके लिए वैश्विक स्तर पर सभी मुल्कों को एकजुट होना होगा। साथ ही परमाणु हथियारों के निर्माणों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाए जाने की दिशा में सभी देशों को सामूहिक पहल करने की जरूरत है।</div><div><br></div><div>- डॉ. रमेश ठाकुर</div><div>सदस्य, राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान (NIPCCD), भारत सरकार!</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 06 Aug 2026 13:39:42 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-hiroshima-tragedy-advocates-for-a-ban-on-nuclear-weapons</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[जन्म-मृत्यु रिकॉर्ड डिजिटल करने से क्या बदलेगा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/what-will-change-with-the-digitization-of-birth-and-death-records]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>Registration of Births and Deaths (Amendment) Bill 2026: मानसून सत्र में जन्म और मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक 2026 पेश हुआ, गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने विपक्ष के हंगामे के बीच यह बिल सदन में रखा। इस विधेयक का उद्देश्य देशभर में जन्म और मृत्यु के रिकॉर्ड को डिजिटल करना और फर्जी दस्तावेजों पर रोक लगाना है। आइए समझते हैं कि ये बिल क्या है, इससे क्या क्या नियम बदलेंगे और आम लोगों के लिए क्या लाभ होंगे।</div><div><br></div><div>इस कानून के तहत अब पूरे देश में भारत सरकार नागरिक पंजीकरण प्रणाली (Civil Registration System) को अधिक पारदर्शी, सुरक्षित और डिजिटल बनाने के लिए नए संशोधन लागू कर&nbsp; रही है।</div><div>&nbsp;</div><h2>विलंबित पंजीकरण के लिए सख्त प्रावधान&nbsp;&nbsp;</h2><div>नए प्रावधान के अनुसार, अगर जन्म या मृत्यु का पंजीकरण 2 साल से अधिक देर से कराया जाता है, तो अब DM या SDM इसकी मंजूरी नहीं दे सकेंगे. ऐसे मामलों में रजिस्ट्रेशन सिर्फ प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट (First-Class Judicial Magistrate) के आदेश के बाद ही हो सकेगा। इससे फर्जी पंजीकरण पर रोक लगाने और प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने की कोशिश की गई है।</div><div><br></div><h2>जन्म और मृत्यु पंजीकरण के नए नियम&nbsp;</h2><div><br></div><h2>1. नाम दर्ज कराने और सुधार के नियम</h2><div><b>- 12 महीने की सीमा:</b> यदि जन्म के समय बच्चे का नाम दर्ज नहीं कराया गया है, तो माता-पिता या अभिभावक को 12 महीने के भीतर स्थानीय रजिस्ट्रार के पास नाम दर्ज कराना अनिवार्य होगा।</div><div><b>- मानक प्रारूप (Standard Format):</b> जन्म प्रमाण पत्र में नाम केवल फर्स्ट नेम, मिडिल नेम और लास्ट नेम के प्रारूप में ही स्वीकार किया जाएगा। किसी भी प्रकार का शॉर्ट फॉर्म मान्य नहीं होगा।</div><div><b>- विलंब शुल्क (Late Fee):</b> 1 वर्ष के बाद से लेकर 15 वर्ष की आयु तक नाम दर्ज कराने पर विलंब शुल्क देय होगा।</div><div><b>- त्रुटि सुधार (Correction):</b> स्पेलिंग या अन्य मामूली गलती होने पर जिला रजिस्ट्रार को आवेदन देकर सुधार करवाया जा सकता है।</div><div><b>- आवश्यक दस्तावेज:</b> इस पूरी प्रक्रिया के लिए माता-पिता के पहचान पत्र (स्व-प्रमाणित दस्तावेज) और पते का सही सत्यापन जमा करना अनिवार्य होगा।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/political-implications-of-prashant-kishor-victory-in-the-bankipur-by-election-are-startling" target="_blank">बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में जन सुराज पार्टी के सुप्रीमो प्रशांत किशोर की जीत के सियासी मायने चौंकाने वाले</a></h3><h2>2. देरी से पंजीकरण के लिए प्रस्तावित नए नियम&nbsp;</h2><div>- वर्तमान व्यवस्था में 1 वर्ष से अधिक की देरी पर जिला मजिस्ट्रेट (DM), SDM या कार्यकारी मजिस्ट्रेट से मंजूरी लेनी होती है।&nbsp;</div><div>- नए विधेयक के तहत इस प्रक्रिया को दो श्रेणियों में बांटा गया है:</div><div>- देरी की अवधि&nbsp;</div><div>- स्वीकृत करने वाली अथॉरिटी&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><h2>प्रक्रिया व शर्तें</h2><div>- 1 से 2 वर्ष की देरी&nbsp;</div><div>जिला मजिस्ट्रेट (DM), SDM या कार्यकारी मजिस्ट्रेट, मौजूदा प्रक्रिया के तहत ही क्षेत्रीय मजिस्ट्रेट से मंजूरी और निर्धारित शुल्क।&nbsp;</div><div>- 2 वर्ष से अधिक की देरी&nbsp;</div><div><br></div><h2>प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट&nbsp;</h2><div><b>- कड़े नियम:</b> मामला कार्यपालिका से न्यायपालिका के पास जाएगा। गहन जांच के बाद ही अनुमति मिलेगी। |</div><div><b>- ध्यान दें:&nbsp;</b>अनुमति देने से पहले नामित अधिकारी के लिए जन्म या मृत्यु की सत्यता का सत्यापन (Verification) करना अनिवार्य होगा।</div><div><br></div><h2>3. विधेयक लाने का उद्देश्य और जरूरत&nbsp;</h2><div><b>a. फर्जी रिकॉर्ड पर रोक:</b> असत्यापित या फर्जी दावों के आधार पर बनने वाले जन्म/मृत्यु प्रमाण पत्रों पर पूरी तरह से अंकुश लगाना।</div><div><b>b. सटीक राष्ट्रीय डेटा: </b>स्कूल दाखिले, मतदाता सूची, राशन कार्ड, पेंशन और अन्य सरकारी योजनाओं के डेटाबेस को अधिक विश्वसनीय बनाना।</div><div><b>c. समय पर सूचना को बढ़ावा:&nbsp;</b> लोगों को निर्धारित समय सीमा के भीतर जन्म व मृत्यु की जानकारी दर्ज कराने के लिए प्रोत्साहित करना।</div><div><b>d. अस्पताल के बाहर हुई मृत्यु: </b>इसके पंजीकरण के लिए मान्यता प्राप्त डॉक्टर का मेडिकल सर्टिफिकेट अनिवार्य करना।</div><div><br></div><h2>4. पंजीकरण का कानूनी महत्व&nbsp;</h2><div>- जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969 के तहत पंजीकरण कराना कानूनी रूप से अनिवार्य है।</div><div>- जन्म प्रमाण पत्र की उपयोगिता: स्कूल/कॉलेज में प्रवेश, पासपोर्ट बनवाने, आधार नामांकन, मतदाता सूची में नाम जुड़वाने, सरकारी नौकरियों और विवाह पंजीकरण आदि के लिए प्राथमिक दस्तावेज।</div><div>- मृत्यु प्रमाण पत्र की उपयोगिता: संपत्ति के हस्तांतरण, विरासत के दावों, बीमा क्लेम, पेंशन लाभ और बैंक खाते बंद कराने के लिए आवश्यक।</div><div><br></div><h2>5. कानून के संभावित प्रभाव&nbsp;</h2><div><b>- पारदर्शिता और विश्वसनीयता:</b> न्यायिक निगरानी (Judicial Oversight) लागू होने से प्रशासनिक दुरुपयोग और फर्जीवाड़ा रुकेगा।</div><div><br></div><div><b>- सत्यनिष्ठ आवेदकों के लिए रास्ता खुला: </b>जिनके पास पंजीकरण में देरी के वैध और ठोस कारण हैं, वे न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से प्रमाण पत्र प्राप्त कर सकेंगे।</div><div>&nbsp;</div><div><b>- संतुलन: </b>यह संशोधन प्रत्येक नागरिक का रिकॉर्ड सुरक्षित करने और प्रणाली की अखंडता बनाए रखने के बीच एक प्रभावी संतुलन स्थापित करता है।</div><div><br></div><h2>केंद्रीय डिजिटल डेटाबेस से जुड़ेगा रिकॉर्ड&nbsp;</h2><div>इस कानून के तहत अब पूरे देश के जन्म और मृत्यु के रिकॉर्ड को एक केंद्रीय डिजिटल डेटाबेस से जोड़ा जाएगा। इससे देश के किसी भी हिस्से में होने वाले जन्म या मृत्यु की जानकारी एक ही जगह ऑनलाइन उपलब्ध होगी। इस डेटाबेस को मतदाता सूची, राशन कार्ड, पासपोर्ट और अन्य राष्ट्रीय पहचान पत्रों से भी जोड़ा जाएगा। कोई नागरिक 18 वर्ष का होगा, उसका नाम स्वतः मतदाता सूची में जुड़ जाएगा। वहीं, किसी व्यक्ति की मृत्यु होने पर सरकारी रिकॉर्ड से उसका नाम आसानी से हटाया जा सकेगा। इससे सरकारी योजनाओं में होने वाली गड़बड़ियों और फर्जी लाभ उठाने की घटनाओं पर रोक लगेगी।</div><div><br></div><div>नए कानून के लागू होने के बाद जन्म प्रमाण पत्र सबसे मुख्य दस्तावेज बन जाएगा। अब तक स्कूल में प्रवेश, ड्राइविंग लाइसेंस या सरकारी नौकरियों में आवेदन के लिए अलग-अलग दस्तावेजों का इस्तेमाल किया जाता था। लेकिन इस बिल के पास होने के बाद जन्म प्रमाण पत्र ही उम्र और पहचान का एकमात्र आधिकारिक दस्तावेज माना जाएगा।</div><div><br></div><div>जन्म और मृत्यु रिकॉर्ड डिजिटल कर देने से जो सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन होगा वह देश की सुरक्षा में सेंध लगाने वाले घुसपैठियों की पहचान करने हेतु एक व्यवस्थित एवं मजबूत सिस्टम डेवलप होगा। यह बात किसी से नहीं छुपी हुई है कि घुसपैठ करने वाले लगातार देश की सुरक्षा में सेंध लगा रहे हैं उनके मंसूबों को काफी हद तक रोकने में यह कानून मददगार सिद्ध होगा।</div><div><br></div><div>फ़र्जी जन्म एवं मृत्यु प्रमाण पत्र तथा उसके द्वारा आधार कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, राशन कार्ड, बैंक अकाउंट और मतदाता सूची में जुड़ जाने तक का कार्य हो जाता है। यह न सिर्फ अनधिकृत रूप से सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने के लिए बल्कि भारत देश में रहकर इसकी एकता और अखंडता को तोड़ने का काम करने वालों को रोकने के लिए एक ठोस और सशक्त उपाय सिद्ध होगा।</div><div><br></div><div>- डॉ ऋतु दुबे तिवारी&nbsp;</div><div>साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ</div><div>वर्तमान में गाजियाबाद में NISCORT कॉलेज में प्रिंसिपल के पद पर कार्यरत</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 06 Aug 2026 13:16:59 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/what-will-change-with-the-digitization-of-birth-and-death-records</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[राष्ट्रमंडल खेल 2026: चुनौतियों के बीच चमका भारत]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/commonwealth-games-2026-india-shines-amidst-challenges]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>राष्ट्रमंडल खेल केवल पदकों की प्रतियोगिता नहीं बल्कि किसी देश की खेल संस्कृति, प्रतिभा विकास, खेल विज्ञान, प्रशिक्षण व्यवस्था और दीर्घकालिक खेल नीति का दर्पण भी होते हैं। ग्लासगो (स्कॉटलैंड) में 23 जुलाई से 2 अगस्त तक आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों का समापन भारत के लिए अनेक उपलब्धियों, कुछ अधूरी अपेक्षाओं और भविष्य की नई संभावनाओं के साथ हुआ। भारतीय दल ने 13 स्वर्ण, 17 रजत और 9 कांस्य सहित कुल 39 पदक जीतकर पदक तालिका में चौथा स्थान प्राप्त किया। यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इस बार प्रतियोगिता के कार्यक्रम में निशानेबाजी, कुश्ती, बैडमिंटन, हॉकी, टेबल टेनिस इत्यादि भारत के कई पारंपरिक मजबूत खेल शामिल ही नहीं थे। इन खेलों में भारत सामान्यतः बड़ी संख्या में पदक जीतता रहा है। ऐसे में सीमित अवसरों के बावजूद चौथा स्थान बनाए रखना भारतीय खिलाड़ियों की क्षमता और जुझारूपन का प्रमाण है। पदक तालिका में ऑस्ट्रेलिया ने 70 स्वर्ण सहित कुल 171 पदक जीतकर एक बार फिर अपना दबदबा कायम रखा। इंग्लैंड 110 पदकों के साथ दूसरे तथा कनाडा 62 पदकों के साथ तीसरे स्थान पर रहा। मेजबान स्कॉटलैंड भी 39 पदकों के साथ प्रभावशाली प्रदर्शन करते हुए पांचवें स्थान पर रहा। भारत और स्कॉटलैंड के कुल पदक समान रहे लेकिन स्वर्ण पदकों की संख्या के आधार पर भारत चौथे स्थान पर रहा।</div><div><br></div><div>यदि पिछले राष्ट्रमंडल खेलों के प्रदर्शन की तुलना करें तो एक दिलचस्प तस्वीर सामने आती है। वर्ष 2018 में ऑस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट में आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों में भारत ने 26 स्वर्ण, 20 रजत और 20 कांस्य सहित कुल 66 पदक जीतकर तीसरा स्थान हासिल किया था। उस प्रतियोगिता में निशानेबाजी ने अकेले 16 पदक दिलाकर भारत की सफलता में सबसे बड़ी भूमिका निभाई थी। इसके अलावा मुक्केबाजी, भारोत्तोलन और कुश्ती में भी भारतीय खिलाड़ियों ने शानदार प्रदर्शन किया था। 2022 में इंग्लैंड के बर्मिंघम राष्ट्रमंडल खेलों में भारत ने 22 स्वर्ण, 16 रजत और 23 कांस्य सहित कुल 61 पदक जीतकर चौथा स्थान प्राप्त किया था। तब कुश्ती में भारत के सभी 12 पहलवानों ने पदक जीतकर इतिहास रचा था जबकि भारोत्तोलन और टेबल टेनिस में भी भारतीय खिलाड़ियों ने उल्लेखनीय सफलता अर्जित की थी। इन दोनों आयोजनों की तुलना में 2026 के ग्लासगो खेलों में भारत के कुल पदकों की संख्या घटकर 39 रह गई। पहली दृष्टि में यह गिरावट चिंताजनक लग सकती है किंतु यदि प्रतियोगिता के कार्यक्रम का विश्लेषण किया जाए तो स्पष्ट होता है कि भारत के अनेक पदक संभावित खेल इस बार आयोजित ही नहीं किए गए। इसलिए केवल पदकों की संख्या के आधार पर प्रदर्शन का मूल्यांकन करना उचित नहीं होगा। वास्तव में भारत ने उपलब्ध अवसरों का काफी प्रभावी उपयोग किया और जिन खेलों में उसने भाग लिया, उनमें उल्लेखनीय सफलता अर्जित की।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/sports/gujarat-cm-bhupendra-patel-receives-commonwealth-games-flag" target="_blank">Gujarat CM भूपेंद्र पटेल को सौंपा गया Commonwealth Games ध्वज, 2030 की तैयारियां शुरू</a></h3><div>इस बार भारतीय मुक्केबाजों ने राष्ट्रमंडल खेलों के इतिहास का सर्वश्रेष्ठ अभियान चलाया। भारत ने मुक्केबाजी में सात स्वर्ण और तीन रजत सहित कुल दस पदक जीतकर नया इतिहास रच दिया। महिला मुक्केबाजों ने विशेष रूप से प्रभावित किया। जैस्मीन लम्बोरिया, प्रिया घनघस, साक्षी चौधरी और प्रीति पवार जैसी युवा खिलाड़ियों ने यह संकेत दिया कि भारतीय महिला मुक्केबाजी का भविष्य अत्यंत उज्ज्वल है। ओलंपिक पदक विजेता लवलीना बोरगोहेन स्वर्ण से भले चूक गई लेकिन उनका अनुभव और प्रदर्शन भारतीय मुक्केबाजी की मजबूती का प्रमाण बना रहा। पुरुष वर्ग में भी सचिन सिवाच और अंकुश सहित अन्य मुक्केबाजों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए भारत की पदक संख्या बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। यह सफलता दर्शाती है कि भारतीय मुक्केबाजी अब केवल कुछ खिलाड़ियों पर निर्भर नहीं रही बल्कि उसके पास प्रतिभाओं की व्यापक श्रृंखला तैयार हो चुकी है।</div><div><br></div><div>भारोत्तोलन ने भी भारत की प्रतिष्ठा बनाए रखी। पिछले एक दशक में इस खेल में भारतीय खिलाड़ियों ने निरंतर प्रगति की है। ग्लासगो में भी उन्होंने अपने प्रदर्शन से यह साबित किया कि विश्व स्तर पर भारत अब एक मजबूत शक्ति बन चुका है। जूडो में भारतीय खिलाड़ियों ने अपेक्षा से बेहतर प्रदर्शन किया और कई महत्वपूर्ण पदक जीतकर यह संदेश दिया कि यह खेल भी भारत में तेजी से विकसित हो रहा है। हालांकि जूडो खिलाड़ी तूलिका मान का डोपिंग रोधी नियमों के अंतर्गत तीन बार ‘वेयरअबाउट्स’ संबंधी जानकारी देने में विफल रहने के कारण अस्थायी निलंबन और प्रतियोगिता से बाहर होना भारतीय दल के लिए एक बड़ा झटका था। यह घटना बताती है कि विश्वस्तरीय प्रतिस्पर्धा में केवल खेल कौशल ही नहीं, डोपिंग रोधी नियमों के प्रति पूर्ण जागरूकता और अनुशासन भी उतना ही आवश्यक है।</div><div><br></div><div>एथलेटिक्स में भारत का प्रदर्शन इस बार विशेष चर्चा का विषय रहा। गुलवीर सिंह ने राष्ट्रमंडल खेलों के इतिहास में नया अध्याय जोड़ते हुए 10,000 मीटर दौड़ में रजत और 5,000 मीटर दौड़ में कांस्य पदक जीतकर इतिहास रच दिया। वे एक ही राष्ट्रमंडल खेल में ट्रैक एवं फील्ड स्पर्धाओं में दो पदक जीतने वाले पहले भारतीय खिलाड़ी बने। इससे पहले भारत को इन लंबी दूरी की स्पर्धाओं में कभी पदक नहीं मिला था। यह उपलब्धि भारतीय एथलेटिक्स के बदलते स्वरूप और वैज्ञानिक प्रशिक्षण प्रणाली की सफलता का संकेत देती है। पैरा खेलों में भी भारत ने 3 स्वर्ण, 2 रजत और 2 कांस्य सहित कुल सात पदक जीतकर नया इतिहास बनाया। यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह राष्ट्रमंडल खेलों के पैरा वर्ग में भारत के अब तक के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के बराबर है।</div><br><div>यदि भारतीय दल के प्रदर्शन का गहन विश्लेषण किया जाए तो स्पष्ट होता है कि इस बार महिलाओं ने शानदार योगदान दिया। महिला खिलाड़ियों ने 8 स्वर्ण सहित कुल 16 पदक जीतकर भारतीय खेलों में बढ़ती महिला भागीदारी और उत्कृष्टता का परिचय दिया। दूसरी ओर पुरुष खिलाड़ियों ने कुल 23 पदक जीतकर संतुलित प्रदर्शन किया। फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि 2026 का प्रदर्शन भारत के लिए संतोषजनक अवश्य है लेकिन ऐतिहासिक नहीं। वर्ष 2010 के नई दिल्ली राष्ट्रमंडल खेल आज भी भारत के स्वर्णिम अध्याय बने हुए हैं, जब भारत ने 38 स्वर्ण सहित कुल 101 पदक जीतकर ऑस्ट्रेलिया के बाद दूसरा स्थान प्राप्त किया था। घरेलू मैदान का लाभ अपनी जगह है लेकिन वह प्रदर्शन यह भी दर्शाता है कि यदि मजबूत खेल अवसंरचना, व्यापक खिलाड़ी आधार और सुव्यवस्थित तैयारी हो तो भारत शीर्ष देशों को कड़ी चुनौती देने की क्षमता रखता है।</div><div><br></div><div>भारत की खेल यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष अब यह है कि देश अब कुछ चुनिंदा खेलों तक सीमित नहीं रह गया है। पहले भारत की अधिकांश सफलता निशानेबाजी, कुश्ती, बैडमिंटन और भारोत्तोलन तक सीमित रहती थी जबकि अब मुक्केबाजी, जूडो, एथलेटिक्स और पैरा खेलों में भी लगातार नए खिलाड़ी उभर रहे हैं। यह परिवर्तन भारत की खेल नीति, खेलो इंडिया जैसी योजनाओं, बेहतर प्रशिक्षण सुविधाओं, खेल विज्ञान, पोषण और खिलाड़ियों को मिलने वाले आर्थिक सहयोग का सकारात्मक परिणाम है। हालांकि अभी भी प्रतिभा पहचान, जमीनी स्तर पर कोचिंग, खेल चिकित्सा, मानसिक प्रशिक्षण और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के प्रतिस्पर्धी अनुभव को और मजबूत करने की आवश्यकता बनी हुई है। अब भारतीय खेल जगत की निगाहें वर्ष 2030 पर टिक गई हैं, जब राष्ट्रमंडल खेलों की मेजबानी अहमदाबाद करेगा। यह केवल एक खेल आयोजन नहीं बल्कि भारत के लिए विश्व के सामने अपनी खेल क्षमता, आधुनिक अवसंरचना और संगठनात्मक दक्षता प्रदर्शित करने का सुनहरा अवसर होगा।</div><div><br></div><div>ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों ने भारत को यह विश्वास अवश्य दिलाया है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी चुनौतीपूर्ण क्यों न हों, भारतीय खिलाड़ी हर मंच पर देश का गौरव बढ़ाने का सामर्थ्य रखते हैं। अब आवश्यकता इस बात की है कि इन उपलब्धियों को अंतिम लक्ष्य न मानकर उन्हें ओलंपिक और वैश्विक खेल महाशक्ति बनने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में देखा जाए। जिन खेलों में भारत विश्वस्तरीय शक्ति बन चुका है, उन्हें और सशक्त किया जाए तथा एथलेटिक्स, तैराकी, जिम्नास्टिक और अन्य ओलंपिक खेलों में भी दीर्घकालिक निवेश बढ़ाया जाए। यदि भारत अपनी खेल नीतियों में निरंतरता बनाए रखता है, खिलाड़ियों को वैज्ञानिक प्रशिक्षण, विश्वस्तरीय सुविधाएं और दीर्घकालिक समर्थन उपलब्ध कराता है तो वह दिन दूर नहीं, जब राष्ट्रमंडल ही नहीं, ओलंपिक और अन्य वैश्विक प्रतियोगिताओं में भी भारत पदक तालिका के शीर्ष देशों में नियमित रूप से दिखाई देगा।</div><div><br></div><div>- योगेश कुमार गोयल</div><div>(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं)</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 05 Aug 2026 17:58:14 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/commonwealth-games-2026-india-shines-amidst-challenges</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Shaurya Path: इधर से China, उधर से Pakistan, Border की रक्षा कैसे करेगा Hindustan? सामने आया पूरा प्लान]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/india-response-to-china-j20-pakistan-sh15-border-deployment-s400-brahmos-pinaka-analysis]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>चीन और पाकिस्तान एक बार फिर भारत की सीमाओं पर सैन्य दबाव बढ़ाने की कोशिश में जुटे हैं लेकिन भारत ने दोनों को साफ और सरल भाषा में स्पष्ट कर दिया है कि हर नापाक हरकत का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए हम पूरी तरह तैयार हैं। हम आपको बता दें कि एक ओर चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के निकट अपने अत्याधुनिक J-20 स्टील्थ फाइटर जेट्स की सक्रियता बढ़ाई है, तो दूसरी ओर पाकिस्तान ने चीन निर्मित लगभग 250 SH-15 ट्रक-माउंटेड सेल्फ-प्रोपेल्ड हॉवित्जर तोपों को भारत से लगी पूरी पूर्वी सीमा पर तैनात कर अपनी आर्टिलरी क्षमता को मजबूत करने का प्रयास किया है। दोनों घटनाक्रम इस बात का संकेत हैं कि बीजिंग और इस्लामाबाद अब पहले से कहीं अधिक समन्वित सैन्य रणनीति पर काम कर रहे हैं। हालांकि भारत ने भी दोनों मोर्चों पर ऐसी बहुस्तरीय तैयारी कर रखी है, जो किसी भी दुस्साहस का तत्काल और करारा जवाब देने में सक्षम है।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि पाकिस्तान द्वारा तैनात SH-15 हॉवित्जर चीन की सरकारी रक्षा कंपनी NORINCO द्वारा विकसित 155 मिमी की आधुनिक स्वचालित तोप है। यह 6x6 ट्रक प्लेटफॉर्म पर आधारित प्रणाली है, जो 30 से 40 किलोमीटर तक सामान्य गोला-बारूद और विशेष रॉकेट-असिस्टेड प्रोजेक्टाइल के साथ लगभग 50 किलोमीटर तक हमला कर सकती है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता "शूट एंड स्कूट" क्षमता है, जिसके तहत यह कुछ ही सेकंड में छह राउंड दागकर अपनी स्थिति बदल सकती है ताकि जवाबी हमले से बचा जा सके। पाकिस्तान का दावा है कि यह प्रणाली उसकी मारक क्षमता में बड़ा इजाफा करेगी, लेकिन भारत पहले से ही ऐसी तैनाती का जवाब देने की तैयारी कर चुका है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/india-strategic-railway-line-doklam-tri-junction-border-connectivity" target="_blank">India Bhutan China Tri-Junction पर भारत की नई रणनीति ने किया हैरान, Doklam तक पहुँचेगी रेल, चीन के छूटे पसीने</a></h3><div>हम आपको बता दें कि पश्चिमी सीमा पर भारतीय सेना की सबसे बड़ी ताकत उसकी काउंटर-बैटरी फायर क्षमता है। भारतीय सेना के पास स्वदेशी पिनाका मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर, K9-वज्र सेल्फ-प्रोपेल्ड हॉवित्जर, धनुष और ATAGS जैसी आधुनिक 155 मिमी तोपें मौजूद हैं। पिनाका कुछ ही सेकंड में दर्जनों रॉकेट दागकर दुश्मन के लॉन्चिंग क्षेत्र, गोला-बारूद डिपो और सैन्य जमावड़े को तबाह करने की क्षमता रखता है। वहीं K9-वज्र लंबी दूरी तक अत्यंत सटीक और तीव्र गोलाबारी करने में सक्षम है। यदि SH-15 जैसी प्रणालियां भारतीय चौकियों को निशाना बनाने की कोशिश करती हैं, तो भारतीय सेना की काउंटर-बैटरी प्रणाली उन्हें उनकी तैनाती वाले क्षेत्रों में ही जवाब देने की क्षमता रखती है।</div><div><br></div><div>दूसरी ओर, उत्तरी मोर्चे पर चीन का J-20 स्टील्थ फाइटर एक अलग चुनौती पेश करता है। यह चीन का पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान है, जिसे कम रडार पहचान के साथ लंबी दूरी के अभियानों के लिए विकसित किया गया है। लेकिन स्टील्थ तकनीक का अर्थ यह नहीं कि विमान पूरी तरह अदृश्य हो जाता है। भारतीय वायुसेना ने लद्दाख और पूर्वोत्तर सेक्टर में बहुस्तरीय वायु रक्षा व्यवस्था स्थापित कर रखी है, जिसमें S-400 ट्रायम्फ, MR-SAM (बराक-8), आकाश और आकाश-एनजी जैसी प्रणालियां शामिल हैं। ये नेटवर्क विभिन्न ऊंचाइयों और दूरी पर आने वाले हवाई खतरों की पहचान और उन्हें निष्क्रिय करने के लिए एकीकृत तरीके से कार्य करते हैं।</div><div><br></div><div>साथ ही भारतीय वायुसेना के अग्रिम एयरबेस भी पूरी तरह सक्रिय हैं। अंबाला और हासीमारा में तैनात राफेल लड़ाकू विमान Meteor बियॉन्ड विजुअल रेंज मिसाइल और SCALP क्रूज़ मिसाइल से लैस हैं। Su-30MKI बेड़ा ब्रह्मोस एयर-लॉन्च क्रूज़ मिसाइल और अस्त्र एयर-टू-एयर मिसाइलों के साथ भारतीय वायु शक्ति की रीढ़ बना हुआ है। इसके अलावा मिग-29UPG, मिराज-2000 और तेजस जैसे लड़ाकू विमान भी उत्तरी और पश्चिमी दोनों मोर्चों पर त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता बनाए हुए हैं।</div><div><br></div><div>यही नहीं, जमीन से जमीन पर मार करने वाली मिसाइलों के मामले में भी भारत की स्थिति मजबूत है। लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश में ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल की तैनाती किसी भी उच्च पर्वतीय सैन्य ठिकाने या कमांड सेंटर पर बेहद कम समय में सटीक हमला करने की क्षमता देती है। वहीं हाल में शामिल की गई प्रलय क्वाज़ी-बैलिस्टिक मिसाइल विशेष रूप से चीन के रॉकेट बलों और सामरिक सैन्य ठिकानों को ध्यान में रखकर विकसित की गई है। इसके अतिरिक्त अग्नि-पी और अग्नि-5 जैसी सामरिक मिसाइलें भारत की दीर्घ दूरी की प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करती हैं।</div><div><br></div><div>हम आपको यह भी बता दें कि हाल के वर्षों में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सड़क, पुल, सुरंग, एडवांस लैंडिंग ग्राउंड और रसद नेटवर्क के विस्तार ने भारतीय सेना की त्वरित तैनाती क्षमता को भी काफी बढ़ाया है। चिनूक और अपाचे हेलीकॉप्टरों के साथ M777 अल्ट्रा-लाइट हॉवित्जर को दुर्गम पहाड़ी इलाकों में तेजी से पहुंचाया जा सकता है। इससे चीन के सामने ऊंचाई वाले क्षेत्रों में भारत की परिचालन क्षमता पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत हो चुकी है।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो चीन और पाकिस्तान का बढ़ता रक्षा सहयोग निश्चित रूप से क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए चिंता का विषय है। पाकिस्तान का रक्षा बजट बढ़ाना, चीन से लगातार आधुनिक हथियार खरीदना और दोनों देशों के सैन्य नेतृत्व के बीच बढ़ता समन्वय यह संकेत देता है कि वे भारत पर दबाव बनाने की रणनीति पर आगे बढ़ रहे हैं। लेकिन भारत ने भी पिछले कुछ वर्षों में अपनी सैन्य संरचना को केवल रक्षात्मक नहीं बल्कि त्वरित और निर्णायक जवाब देने वाली शक्ति के रूप में विकसित किया है।</div><div><br></div><div>साथ ही सीमा पर हथियारों की संख्या जितनी भी बढ़ा ली जाए, युद्धक्षेत्र में निर्णायक बढ़त केवल उसी पक्ष को मिलती है जिसके पास बेहतर निगरानी, मजबूत लॉजिस्टिक्स, एकीकृत कमान, सटीक हथियार और तेज प्रतिक्रिया क्षमता हो। वर्तमान स्थिति में भारत ने दोनों मोर्चों पर यही बढ़त हासिल करने की दिशा में व्यापक तैयारी कर रखी है। यदि चीन LAC पर J-20 की मौजूदगी के सहारे मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की कोशिश करता है या पाकिस्तान SH-15 की तैनाती के दम पर किसी सैन्य दुस्साहस का विचार करता है, तो उसे यह समझ लेना चाहिए कि भारतीय सेनाएं अब केवल जवाब नहीं देतीं, बल्कि हर चुनौती का समय, स्थान और परिस्थितियों के अनुरूप निर्णायक प्रतिकार करने की क्षमता भी रखती हैं। यही बात भारत ने एक बार फिर स्पष्ट कर दी है। इस संबंध में पूछे गये प्रश्न के उत्तर में भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए "जो भी आवश्यक होगा, भारत वह करेगा"। उन्होंने कहा, "ऑपरेशन सिंदूर के दौरान हमने देखा कि किस तरह पाकिस्तान को करारा जवाब दिया गया। उन्होंने कहा कि अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए हम जो भी आवश्यक होगा, वह करेंगे। इसके लिए हमारी सेनाएं हमेशा पूरी सतर्कता के साथ तैनात रहती हैं।"</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 05 Aug 2026 14:13:44 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/india-response-to-china-j20-pakistan-sh15-border-deployment-s400-brahmos-pinaka-analysis</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[India Bhutan China Tri-Junction पर भारत की नई रणनीति ने किया हैरान, Doklam तक पहुँचेगी रेल, चीन के छूटे पसीने]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/india-strategic-railway-line-doklam-tri-junction-border-connectivity]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत ने चीन से सटी अपनी सबसे संवेदनशील सीमाओं में से एक पर सामरिक बढ़त हासिल करने की दिशा में एक और बड़ा कदम बढ़ाया है। केंद्र सरकार ने उत्तर बंगाल में खुनिया मोड़ (चालसा) से जलढाका तक 17 किलोमीटर लंबी नई रेलवे लाइन को मंजूरी दी है, जिस पर करीब 272 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। पहली नजर में यह परियोजना उत्तर बंगाल के डुआर्स क्षेत्र में पर्यटन और स्थानीय संपर्क बढ़ाने की पहल लग सकती है, लेकिन इसके पीछे कहीं अधिक गहरे सामरिक और रणनीतिक निहितार्थ छिपे हैं। यह रेलवे लाइन भारत-चीन-भूटान त्रि-जंक्शन के करीब स्थित उस इलाके तक पहुंच मजबूत करेगी, जो डोकलाम विवाद के कारण वर्षों से राष्ट्रीय सुरक्षा का केंद्र बना हुआ है।</div><div><br></div><div>रेल मंत्रालय से स्वीकृत इस परियोजना के तहत प्रस्तावित रेलवे लाइन चालसा के निकट खुनिया मोड़ से शुरू होकर जलपाईगुड़ी और कालिम्पोंग के वन क्षेत्रों से गुजरते हुए जलढाका तक पहुंचेगी। रेलवे और पश्चिम बंगाल वन विभाग मानसून के बाद इस परियोजना का संयुक्त सर्वेक्षण शुरू करेंगे। अधिकारियों के अनुसार, इसका उद्देश्य सीमावर्ती और दुर्गम इलाकों तक बेहतर पहुंच, पर्यटन को बढ़ावा देना तथा सामरिक बुनियादी ढांचे को मजबूत करना है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/indians-in-china-raise-concerns-over-anti-india-content-ahead-of-brics-summit" target="_blank">India-China Relation क्या वाकई सुधर रहे हैं? चीन में रह रहे भारतीयों ने चौंकाने वाला सच उजागर किया है!</a></h3><div>दरअसल, जलढाका नदी का महत्व केवल भौगोलिक नहीं बल्कि रणनीतिक भी है। यह नदी सिक्किम के कुपुप (बितांग) झील से निकलती है, जो जेलेप ला दर्रे के निकट और डोकलाम त्रि-जंक्शन के बेहद करीब स्थित है। यही कारण है कि नदी के समानांतर रेलवे लाइन विकसित करने की योजना को मात्र एक परिवहन परियोजना नहीं, बल्कि सीमा क्षेत्रों में भारत की दीर्घकालिक रणनीतिक तैयारी के रूप में देखा जा रहा है।</div><div><br></div><div>इस परियोजना का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि भारतीय रेलवे पहले से ही चालसा से सीमावर्ती क्षेत्रों की ओर लगभग 200 किलोमीटर लंबी एक रणनीतिक रेलवे लाइन की संभावनाओं पर काम कर रहा है। नई 17 किलोमीटर की लाइन उसी व्यापक रणनीतिक दृष्टि का पहला महत्वपूर्ण चरण मानी जा रही है। यदि भविष्य में यह नेटवर्क आगे बढ़ता है तो भारत की सैन्य और नागरिक दोनों प्रकार की आवाजाही सीमा के बेहद करीब तक पहले की तुलना में कहीं अधिक तेज, सुरक्षित और प्रभावी हो सकेगी।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो डोकलाम का सामरिक महत्व किसी परिचय का मोहताज नहीं है। वर्ष 2017 में यहीं 73 दिनों तक भारत और चीन की सेनाएं आमने-सामने खड़ी रहीं थीं। चीन भूटान के दावे वाले क्षेत्र में सड़क निर्माण कर रहा था, जिसे रोकने के लिए भारतीय सेना ने हस्तक्षेप किया था। भारत और भूटान के बीच सुरक्षा सहयोग के तहत नई दिल्ली ने स्पष्ट किया था कि डोकलाम में यथास्थिति बदलने की किसी भी कोशिश का असर भारत की सुरक्षा, विशेषकर सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर पड़ेगा। अंततः चीन को पीछे हटना पड़ा, लेकिन उसके बाद से उपग्रह तस्वीरों और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में यह सामने आता रहा है कि चीन ने डोकलाम और उसके आसपास के क्षेत्रों में सड़कें, सैन्य ढांचे, गांव और अन्य आधारभूत संरचनाएं लगातार विकसित की हैं।</div><div><br></div><div>ऐसे समय में भारत द्वारा सीमा के समीप रेलवे अवसंरचना का विस्तार स्पष्ट संकेत देता है कि नई दिल्ली अब केवल सैन्य तैनाती के भरोसे नहीं, बल्कि मजबूत लॉजिस्टिक नेटवर्क के जरिए भी सामरिक संतुलन स्थापित करना चाहती है। किसी भी संभावित संकट की स्थिति में सैनिकों, हथियारों, रसद और राहत सामग्री को तेजी से सीमा तक पहुंचाने में रेलवे की भूमिका सड़क मार्ग की तुलना में कहीं अधिक प्रभावी होती है। यही कारण है कि आधुनिक युद्ध और सीमा सुरक्षा में रेलवे को रणनीतिक शक्ति का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है।</div><div><br></div><div>साथ ही इस परियोजना को सिक्किम में निर्माणाधीन शिवोक-रंगपो रेलवे लाइन के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। केंद्र सरकार की योजना भविष्य में इस लाइन को नाथू ला दर्रे तक विस्तारित करने की है। यदि ऐसा होता है तो उत्तर-पूर्व और पूर्वी हिमालयी सीमाओं पर चीन के सामने भारत का यह दूसरा बड़ा रणनीतिक रेल कॉरिडोर होगा। इससे भारत की पूर्वी सीमा पर सैन्य तैयारियों और आपूर्ति श्रृंखला को नई मजबूती मिलेगी।</div><div><br></div><div>बहरहाल, यह स्पष्ट है कि जलढाका रेलवे परियोजना सिर्फ 17 किलोमीटर की रेल लाइन नहीं है। यह उत्तर बंगाल में विकास, पर्यटन और सीमावर्ती क्षेत्रों के आर्थिक सशक्तिकरण का माध्यम तो बनेगी ही, साथ ही चीन की लगातार बढ़ती सीमा अवसंरचना के जवाब में भारत की बदलती रणनीतिक सोच का भी सशक्त प्रतीक साबित होगी। संदेश स्पष्ट है कि भारत अब सीमा पर केवल निगरानी नहीं, बल्कि मजबूत बुनियादी ढांचे के जरिए दीर्घकालिक सामरिक बढ़त सुनिश्चित करने की दिशा में निर्णायक कदम बढ़ा चुका है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 04 Aug 2026 13:36:15 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/india-strategic-railway-line-doklam-tri-junction-border-connectivity</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[China के J-20 Stealth Fighter Jets और Pakistan की SH-15 Howitzer Guns भारत की ओर तैनात, अब क्या करेंगे PM Modi?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/china-j-20-stealth-fighter-jets-and-pakistan-sh15-howitzer-guns-deployed-facing-india]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत के खिलाफ चीन और पाकिस्तान की सैन्य तैयारियां अब किसी अनुमान का विषय नहीं रह गई हैं, बल्कि जमीन और आसमान दोनों मोर्चों पर उनकी रणनीतिक तैनाती खुलकर दिखाई देने लगी है। एक ओर पाकिस्तान ने चीन से प्राप्त अत्याधुनिक SH-15 155 मिमी सेल्फ-प्रोपेल्ड हॉवित्जर तोपों को जम्मू-कश्मीर और पंजाब सेक्टर में भारत के सामने बड़ी संख्या में तैनात कर दिया है, वहीं दूसरी ओर चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के सामने अपने सबसे आधुनिक J-20 स्टील्थ लड़ाकू विमानों की बड़ी तैनाती कर दी है। यह घटनाक्रम भारत पर निरंतर दबाव बनाए रखने की चीन-पाकिस्तान की साझा रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। हालांकि भारत भी अपनी सैन्य क्षमताओं का तेजी से आधुनिकीकरण कर रहा है और स्पष्ट संकेत दे चुका है कि उसकी सुरक्षा और संप्रभुता को चुनौती देने की किसी भी कोशिश की कीमत बेहद भारी होगी।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि पाकिस्तान ने वर्ष 2019 में चीन की सरकारी रक्षा कंपनी नोरिन्को से 236 SH-15 पहिएदार सेल्फ-प्रोपेल्ड तोपों का सौदा किया था। इनकी आपूर्ति 2022 से शुरू हुई और 2023 में दूसरी खेप भी पाकिस्तान पहुंच गई। इतना ही नहीं, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण (ToT) समझौते के तहत पाकिस्तान ने टैक्सिला स्थित हेवी इंडस्ट्रीज प्लांट में इन तोपों के स्थानीय उत्पादन का लाइसेंस भी प्राप्त कर लिया है। यह कदम पाकिस्तानी सेना की तोपखाना क्षमता को आधुनिक और मानकीकृत बनाने की व्यापक योजना का हिस्सा है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/indian-embassy-beijing-open-house-visa-issues" target="_blank">बीजिंग Embassy के ओपन हाउस में भारतीय समुदाय ने उठाए वीजा और सोशल मीडिया से जुड़े मुद्दे</a></h3><div>इन SH-15 तोपों की तैनाती मुख्य रूप से भारत से सटे गुजरांवाला, सियालकोट और जलालपुर जट्टन क्षेत्रों में की गई है, जो रणनीतिक रूप से शकरगढ़ बल्ज के पीछे स्थित हैं। शकरगढ़ बल्ज जम्मू के दक्षिण और अमृतसर के उत्तर के बीच का वह संवेदनशील इलाका है, जिसके पूर्व में पठानकोट स्थित है। रक्षा सूत्रों के अनुसार इन्हीं आधुनिक तोपों का उपयोग पाकिस्तान ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी किया था। उत्तरी पंजाब और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में SH-15 तैनात हैं, जबकि राजस्थान और गुजरात के रेगिस्तानी मोर्चों पर अमेरिका से प्राप्त M-109 ट्रैक्ड सेल्फ-प्रोपेल्ड गनों को लगाया गया है। रेगिस्तानी इलाकों में M-109 अधिक उपयुक्त मानी जाती हैं, जबकि SH-15 मैदानी और पहाड़ी दोनों क्षेत्रों में तेज गति से संचालन के लिए डिजाइन की गई है।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि 52 कैलिबर वाली SH-15 पाकिस्तान की पहली ऐसी आधुनिक तोप प्रणाली है, जो 155 मिमी गोले दागने में सक्षम है। रॉकेट-सहायता प्राप्त प्रोजेक्टाइल के साथ इसकी मारक क्षमता 50 किलोमीटर से अधिक बताई जाती है। लंबी दूरी, बेहतर सटीकता और तेज गतिशीलता इसे पारंपरिक तोपों की तुलना में अधिक प्रभावी बनाती है। स्पष्ट है कि पाकिस्तान अपनी पारंपरिक तोपखाना क्षमता को चीन की तकनीक के सहारे अगले स्तर पर ले जाने की कोशिश कर रहा है।</div><div><br></div><div>उधर, चीन ने भी भारत के सामने अपने सैन्य दबाव को और बढ़ाने के संकेत दिए हैं। व्यावसायिक उपग्रह चित्रों से पता चला है कि पीपुल्स लिबरेशन आर्मी एयर फोर्स (PLAAF) ने कम से कम 12 J-20 "माइटी ड्रैगन" स्टील्थ लड़ाकू विमानों को भारत के निकट दो अग्रिम एयरबेस पर तैनात किया है। 9 जुलाई को लिए गए चित्रों में शिनजियांग के होतान एयरबेस पर आठ J-20 दिखाई दिए, जबकि 25 जून के उपग्रह चित्रों में तिब्बत के दामशुंग एयरबेस पर चार अन्य J-20 सुरक्षात्मक शेल्टरों के नीचे खड़े नजर आए।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि होटान एयरबेस भारत के दौलत बेग ओल्डी एयरबेस से लगभग 245 किलोमीटर तथा लेह से करीब 389 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। वहीं दामशुंग एयरबेस अरुणाचल प्रदेश के तवांग सेक्टर से लगभग 344 किलोमीटर दूर है। इतने कम समय में दो अलग-अलग अग्रिम एयरबेस पर J-20 की इतनी बड़ी संख्या में मौजूदगी हाल के वर्षों में भारत के सामने चीन की सबसे बड़ी ज्ञात स्टील्थ फाइटर तैनातियों में से एक मानी जा रही है।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि J-20 चीन का सबसे आधुनिक पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ लड़ाकू विमान है, जिसे कम रडार पहचान क्षमता, लंबी दूरी की मारक क्षमता और उन्नत सेंसर प्रणाली के साथ विकसित किया गया है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इन विमानों की लगातार बढ़ती अग्रिम तैनाती अब किसी अस्थायी अभ्यास का हिस्सा नहीं, बल्कि चीन की स्थायी सैन्य नीति का संकेत है। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है, जब भारत और चीन के बीच 3,488 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा पर 2020 की गलवान झड़प के बाद से सैन्य तनाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। दोनों देशों के बीच कई दौर की सैन्य और कूटनीतिक वार्ताओं के बावजूद अग्रिम मोर्चों पर सैनिकों, बख्तरबंद वाहनों और आधुनिक हवाई संसाधनों की भारी तैनाती बनी हुई है।</div><div><br></div><div>हालांकि इन चुनौतियों के समानांतर भारत भी अपनी सैन्य शक्ति को तेज़ी से आधुनिक बना रहा है। फील्ड आर्टिलरी रैशनलाइजेशन प्लान के तहत भारतीय सेना अपनी अधिकांश तोपों को 155 मिमी प्रणाली में परिवर्तित कर रही है। M777 अल्ट्रा-लाइट हॉवित्जर, K-9 वज्र और स्वदेशी धनुष तोप पहले ही सेना में शामिल हो चुकी हैं। इसके अलावा 307 स्वदेशी एडवांस्ड टोव्ड आर्टिलरी गन सिस्टम (ATAGS) का ऑर्डर दिया जा चुका है। SH-15 जैसी स्वदेशी पहिएदार माउंटेड गन सिस्टम (MGS) भी विकास के अंतिम चरण में है और इसके प्रारंभिक परीक्षण सफल रहे हैं। वायु शक्ति के क्षेत्र में भी भारत अपनी क्षमताओं के विस्तार पर काम कर रहा है, भले ही तेजस Mk1A कार्यक्रम में देरी और नए बहुउद्देश्यीय लड़ाकू विमानों की खरीद प्रक्रिया अभी जारी है।</div><div><br></div><div>सामरिक दृष्टि से यह पूरा घटनाक्रम बेहद महत्वपूर्ण है। पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान और उत्तरी सीमा पर चीन की समानांतर सैन्य सक्रियता इस बात का संकेत है कि दोनों देश भारत पर निरंतर रणनीतिक दबाव बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। आधुनिक तोपों, स्टील्थ लड़ाकू विमानों और सीमा क्षेत्रों में सैन्य ढांचे के विस्तार का उद्देश्य केवल रक्षा तैयारियां नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक और सामरिक बढ़त हासिल करना भी है। लेकिन भारत ने हालिया वर्षों में स्पष्ट कर दिया है कि वह आवश्यकता पड़ने पर निर्णायक जवाब देने की क्षमता और इच्छाशक्ति दोनों रखता है। ऐसे में यदि कोई भी शक्ति भारत की सुरक्षा, संप्रभुता या सीमाओं को हल्के में लेने की भूल करती है, तो उसे इसकी कीमत केवल सामरिक ही नहीं, बल्कि रणनीतिक स्तर पर भी चुकानी पड़ सकती है।</div><div><br></div><div>- नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 03 Aug 2026 14:47:38 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/china-j-20-stealth-fighter-jets-and-pakistan-sh15-howitzer-guns-deployed-facing-india</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[जर्सी का रंग बदलने से बदलेगी भारतीय हॉकी की तस्वीर?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/will-changing-the-jersey-color-transform-the-face-of-indian-hockey]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारतीय पुरुष और महिला हॉकी टीम की पारंपरिक नीली जर्सी को बदलकर 15 अगस्त से शुरू हो रहे एफआईएच हॉकी विश्व कप 2026 में केसरिया रंग की मुख्य जर्सी पहनाने के निर्णय ने देशभर में नई बहस छेड़ दी है। यह बहस केवल खेल तक सीमित नहीं रही है बल्कि राजनीति, संस्कृति, राष्ट्रीय पहचान और खेल परंपरा तक पहुंच गई है। एक पक्ष इसे खिलाड़ियों की सुविधा और तकनीकी आवश्यकता से जुड़ा निर्णय बता रहा है तो दूसरा पक्ष इसे भारतीय खेलों के कथित ‘भगवाकरण’ के रूप में देख रहा है। सवाल यह है कि क्या वास्तव में जर्सी का रंग बदलना इतना बड़ा मुद्दा है या यह विवाद मूल प्रश्नों से ध्यान भटका रहा है? सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि हॉकी इंडिया ने जर्सी का रंग बदलने का निर्णय किन आधारों पर लिया। हॉकी इंडिया के अध्यक्ष और भारतीय हॉकी के महान खिलाड़ी रहे दिलीप तिर्की के अनुसार, आज अधिकांश अंतर्राष्ट्रीय हॉकी मुकाबले नीले सिंथेटिक एस्ट्रो टर्फ पर खेले जाते हैं। ऐसे में नीली जर्सी कई बार मैदान की पृष्ठभूमि में घुल-मिल जाती है, जिससे तेज गति वाले खेल में खिलाड़ियों को अपने साथी खिलाड़ियों की पहचान करने में कठिनाई होती है। आधुनिक हॉकी में खेल की गति अत्यंत तेज हो चुकी है, जहां एक सैकेंड का निर्णय मैच का परिणाम बदल सकता है। पासिंग, पोजिशनिंग और त्वरित निर्णय के लिए खिलाड़ियों की स्पष्ट दृश्यता अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। इसी कारण खिलाड़ियों, कप्तानों, कोचों और सहयोगी स्टाफ से विचार-विमर्श के बाद अधिक स्पष्ट दिखाई देने वाले रंग के रूप में केसरिया को चुना गया।</div><div><br></div><div>यदि यही वास्तविक कारण है तो इसे केवल तकनीकी दृष्टि से देखने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। विश्व खेलों में जर्सी के रंग समय-समय पर बदले जाते रहे हैं। फुटबॉल, रग्बी, क्रिकेट, बास्केटबॉल और हॉकी जैसी लगभग सभी खेल प्रतियोगिताओं में टीमें प्रतियोगिता, दृश्यता, प्रायोजकों, प्रसारण गुणवत्ता और तकनीकी आवश्यकताओं के अनुसार अपनी जर्सियों में परिवर्तन करती रहती हैं। भारतीय हॉकी टीम इससे पहले 2014 विश्व कप में पीली तथा 2018 में हल्के नीले रंग की जर्सी पहन चुकी है। इसलिए रंग परिवर्तन स्वयं में कोई असाधारण घटना नहीं है। विवाद इसलिए बढ़ा है क्योंकि भारतीय हॉकी की पहचान पिछले कई दशकों से नीली जर्सी के साथ जुड़ चुकी है। जैसे ब्राजील की फुटबॉल टीम पीली जर्सी, अर्जेंटीना आसमानी-सफेद धारियों, न्यूजीलैंड ‘ऑल ब्लैक्स’ और ऑस्ट्रेलिया हरे-पीले रंग से पहचाने जाते हैं, उसी प्रकार भारतीय हॉकी की पहचान भी नीली जर्सी रही है। ओलंपिक स्वर्णिम इतिहास, विश्व कप की उपलब्धियां और अनेक ऐतिहासिक मुकाबलों की स्मृतियां इसी नीली जर्सी से जुड़ी रही हैं। यही कारण है कि पूर्व कप्तान धनराज पिल्लै, परगट सिंह और वीरेन रासकिन्हा जैसे खिलाड़ियों ने चिंता व्यक्त की कि कहीं यह परिवर्तन भारतीय हॉकी की स्थापित पहचान को कमजोर न कर दे।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/sports/pr-sreejesh-rejects-hockey-jersey-controversy-and-focuses-on-world-cup" target="_blank">PR Sreejesh ने हॉकी जर्सी विवाद को नकारा, टीम से 50 साल बाद पदक जीतने पर फोकस को कहा</a></h3><div>पूर्व दिग्गज हॉकी खिलाड़ियों की चिंता को भी खारिज नहीं किया जा सकता। खेल केवल तकनीक नहीं, भावनाओं और विरासत का भी विषय होता है। जर्सी केवल कपड़े का टुकड़ा नहीं बल्कि करोड़ों प्रशंसकों की स्मृतियों, खिलाड़ियों के गौरव और राष्ट्रीय खेल संस्कृति का प्रतीक होती है। इसलिए ऐसे किसी भी बड़े परिवर्तन से पहले व्यापक संवाद और पारदर्शिता अपेक्षित थी। यदि हॉकी इंडिया खिलाड़ियों और विशेषज्ञों के साथ-साथ पूर्व खिलाड़ियों तथा खेल समुदाय को भी इस निर्णय प्रक्रिया से जोड़ती तो शायद विवाद की तीव्रता कम होती। दूसरी ओर इस पूरे विवाद का राजनीतिक स्वरूप भी कम चिंताजनक नहीं है। विपक्षी दलों ने इसे ‘खेलों का भगवाकरण’ करार दिया है जबकि कई समर्थकों ने इसे राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक बताया। वस्तुतः दोनों अतिवादी दृष्टिकोण खेल भावना के अनुकूल नहीं हैं। किसी भी रंग का अपना कोई धर्म नहीं होता। रंग प्रतीकों का अर्थ समय, संस्कृति और संदर्भ के अनुसार बदलता रहता है। भारतीय राष्ट्रीय ध्वज में केसरिया रंग त्याग, साहस और समर्पण का प्रतीक है। भारतीय सेना, राष्ट्रीय ध्वज, अनेक विश्वविद्यालयों, सांस्कृतिक परंपराओं तथा आध्यात्मिक जीवन में भी केसरिया का सम्मानजनक स्थान है। वहीं इस्लामी परंपराओं, सूफी परंपरा और अनेक एशियाई संस्कृतियों में भी यह रंग विभिन्न रूपों में प्रयुक्त होता रहा है। इसलिए किसी रंग को किसी एक धर्म या विचारधारा का स्थायी प्रतीक मान लेना ऐतिहासिक दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता।</div><div>&nbsp;</div><div>हालांकि यह भी उतना ही सत्य है कि वर्तमान राजनीतिक वातावरण में रंगों के प्रतीकात्मक अर्थ अत्यधिक संवेदनशील हो चुके हैं। इसलिए जब किसी राष्ट्रीय टीम की दशकों पुरानी पहचान बदली जाती है तो राजनीतिक प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठते हैं। ऐसी परिस्थितियों में खेल संस्थाओं का दायित्व और बढ़ जाता है कि वे अपने निर्णयों के पीछे के सभी तथ्य, वैज्ञानिक अध्ययन और खिलाड़ियों की राय सार्वजनिक करें ताकि अनावश्यक विवाद की गुंजाइश कम हो। इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि क्या वास्तव में नीली जर्सी खिलाड़ियों के प्रदर्शन में बाधा बन रही थी? कुछ पूर्व खिलाड़ियों ने इस तकनीकी तर्क पर प्रश्न उठाए हैं। उनका कहना है कि कई वर्षों से नीले एस्ट्रो टर्फ पर प्रतियोगिताएं हो रही हैं और कभी ऐसी गंभीर समस्या सामने नहीं आई। यदि वास्तव में दृश्यता का प्रश्न था तो क्या इस संबंध में अंतर्राष्ट्रीय हॉकी महासंघ का कोई वैज्ञानिक अध्ययन उपलब्ध है? यदि हॉकी इंडिया इस विषय में विस्तृत तकनीकी रिपोर्ट सार्वजनिक करे तो बहस अधिक तथ्यपरक हो सकती है।</div><div><br></div><div>हालांकि आधुनिक खेल विज्ञान यह स्वीकार करता है कि रंगों का खिलाड़ियों की दृश्य पहचान, प्रतिक्रिया समय और निर्णय क्षमता पर प्रभाव पड़ सकता है। कई खेलों में उच्च कंट्रास्ट वाले रंगों का चयन इसी कारण किया जाता है। प्रसारण तकनीक, कैमरा एंगल और दर्शकों की दृश्य सुविधा भी अब जर्सी डिजाइन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। इसलिए तकनीकी आधार को पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता। पूरे विवाद का सबसे दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष यह है कि चर्चा खिलाड़ियों की तैयारी, रणनीति और पदक की संभावनाओं से हटकर जर्सी के रंग तक सीमित हो गई है। भारत की पुरुष और महिला दोनों हॉकी टीमें पिछले कुछ वर्षों में उल्लेखनीय सुधार कर चुकी हैं। टोक्यो ओलंपिक में पुरुष टीम ने कांस्य पदक जीतकर चार दशक का सूखा समाप्त किया जबकि महिला टीम ने भी शानदार प्रदर्शन कर विश्व का ध्यान आकर्षित किया। अब जब विश्व कप जैसे महत्वपूर्ण टूर्नामेंट सामने हैं, तब खिलाड़ियों का ध्यान केवल अपने प्रदर्शन पर केंद्रित रहना चाहिए, किसी भी प्रकार का राजनीतिक या वैचारिक विवाद खिलाड़ियों पर अनावश्यक मानसिक दबाव डाल सकता है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि नीली हो या केसरिया बल्कि यह है कि क्या भारतीय हॉकी विश्व विजेता बनने की तैयारी कर रही है? क्या हमारे खिलाड़ियों को विश्वस्तरीय प्रशिक्षण, फिटनेस सुविधाएं, खेल विज्ञान, मनोवैज्ञानिक सहयोग, आधुनिक विश्लेषण तकनीक और मजबूत घरेलू प्रतियोगिताएं उपलब्ध हैं? क्या जमीनी स्तर पर प्रतिभाओं को पर्याप्त अवसर मिल रहे हैं? यदि इन प्रश्नों के उत्तर सकारात्मक नहीं हैं तो केवल जर्सी बदल देने से भारतीय हॉकी का भविष्य नहीं बदल सकता। इतिहास बताता है कि महान टीमें अपने रंग से नहीं, अपने खेल से अमर होती हैं। खेल में पहचान रंग से नहीं, उपलब्धियों से बनती है। यदि भारतीय टीम केसरिया जर्सी पहनकर विश्व कप जीतती है तो यही जर्सी नई गौरवगाथा का प्रतीक बन जाएगी। और यदि प्रदर्शन निराशाजनक रहा तो रंग चाहे कोई भी हो, आलोचना फिर भी होगी। खेल का सबसे बड़ा धर्म राष्ट्र का सम्मान है। मैदान पर खिलाड़ी न किसी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं और न किसी दल का; वे केवल भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसलिए जर्सी का रंग चाहे नीला हो, केसरिया हो या कोई और, देश की अपेक्षा केवल यही है कि भारतीय तिरंगा विश्व हॉकी के सर्वोच्च मंच पर सबसे ऊंचा लहराना चाहिए। वही किसी भी रंग की सबसे बड़ी सार्थकता होगी।</div><div><br></div><div>- योगेश कुमार गोयल</div><div>(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं)</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 03 Aug 2026 12:24:47 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/will-changing-the-jersey-color-transform-the-face-of-indian-hockey</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[एनडीए सांसदों के सत्रीय 'मंगल मिलन' के सियासी मायने]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-political-significance-of-the-nda-mps-mangal-milan-session]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>केंद्र में पिछले 12 वर्षों से सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) सरकार इन दिनों पुनः उस एकजुट विपक्ष के निशाने पर है, जिसे वह अबतक चुनावी सियासी पाट पर पछाड़ते आई है। लेकिन जिस तरह से बहुरूपिया विपक्ष कभी मुसलमानों के छद्म वेश में, कभी किसानों के रूप में और कभी छात्रों के छद्म वेश में जिस तरह से मोदी सरकार को घेरने पर तुला हुआ है, उसके पीछे विदेशी हाथ से इंकार नहीं किया जा सकता है। फिर भी सरकार सबसे जूझ रही है!</div><div><br></div><div>हाल ही में छात्र आंदोलन की कथित सफलता से घबराई सरकार ने जिस तरह से अपने ओबीसी रणनीतिकार शिक्षा मंत्री की राजनीतिक बलि चढ़ाई है, और इससे उत्साहित कॉकरोच जनता पार्टी के नेता अभिजीत दीपके ने जिस घमंड का प्रदर्शन किया, उससे विपक्ष उत्साहित है। यही वजह है कि अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को सीधे निशाने पर लिया जाने लगा है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/pawan-kalyan-message-to-the-youth-understand-pm-modi-sacrifice-do-not-disrespect-service-to-nation" target="_blank">युवाओं को Pawan Kalyan का संदेश: PM Modi का त्याग समझो, देश सेवा का अपमान मत करो</a></h3><div>नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने जिस तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भारत का अतीत और खुद देश का भविष्य करार दिया है, उसके मुताल्लिक इतना ही इशारा करना काफी होगा कि भाजपा के चाणक्य अमित शाह ने देश का भविष्य तय कर दिया है और बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को आगे करके एक तीर से कई शिकार करने की योजना बनाई है, क्योंकि भाजपा की ओबीसी राजनीति में श्री चौधरी अपने नैसर्गिक सियासी गुणों के चलते फिट बैठते हैं। ये अभी अंदरखाने की बात है, लेकिन राहुल गांधी को आगाह करने के लिए मैंने इस सच्चाई को डिस्क्लोज कर दिया है, जो हिंदी पट्टी के मिजाज पर फिट बैठता है।</div><div><br></div><div>शायद यही वजह है कि भाजपा नेतृत्व ने अपने सर्वाधिक संकटग्रस्त काल से गुजरते हुए अपने सांसदों और सहयोगी सांसदों को याद किया, जिसे राजनीतिक गलियारे में एनडीए सांसदों के "मंगल मिलन" की उपमा दी गई है। हालांकि यह अनौपचारिक बैठक, संवाद या सामूहिक कार्यक्रम संसद सत्र के दौरान हरेक मंगलवार को आहूत होती है। हालिया एनडीए संसदीय दल की "मंगल मिलन" बैठक गत 28 जुलाई 2026 (मंगलवार) को, संसद के मानसून सत्र के दौरान हुई।&nbsp;</div><div><br></div><div>यह "मंगल मिलन" नाम से आयोजित होने वाली नियमित मंगलवार की संसदीय दल की बैठक थी। जो नई दिल्ली में संसद पुस्तकालय भवन (Parliament Library Building) के जीएमसी बालयोगी ऑडिटोरियम (GMC Balayogi Auditorium) में संपन्न हुई। इस बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी, संसदीय कार्य मंत्री तथा एनडीए के अनेक सांसद और वरिष्ठ नेता उपस्थित रहे।&nbsp;</div><div><br></div><div>इसमें एनडीए के सभी प्रमुख घटक दलों के सांसद शामिल हुए, जिनमें प्रमुख रूप से भारतीय जनता पार्टी (BJP), जनता दल (यूनाइटेड) [JD(U)], तेलगु देशम पार्टी (TDP),लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) [LJP(RV)], हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM), अपना दल (सोनेलाल) अन्य एनडीए सहयोगी दलों के सांसद शामिल हुए। खास बात यह कि पहली बार नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) के सांसद भी बैठक में शामिल हुए, क्योंकि पार्टी को हाल में एनडीए का सहयोगी बनाया गया है। इस बैठक की सबसे चर्चित बात NCPI सांसदों की पहली भागीदारी रही, जिसे एनडीए के विस्तार और संसद में संख्या एवं राजनीतिक समन्वय को मजबूत करने के संकेत के रूप में देखा गया।&nbsp;</div><div><br></div><div>इस मंगल मिलन के कई राजनीतिक और संगठनात्मक संकेत/मायने निकलकर सामने आते हैं:</div><div><br></div><div>पहला, संगठनात्मक एकजुटता का प्रदर्शन: यह विपक्ष और सहयोगी दलों को संदेश कि एनडीए के सभी घटक दल एकजुट हैं और सरकार के साथ मजबूती से खड़े हैं।</div><div><br></div><div>दूसरा, संसद सत्र की रणनीति: संसद में सरकार के विधेयकों, विपक्ष की रणनीति और विभिन्न मुद्दों पर साझा रुख तय करने का अवसर समझा जाता है।</div><div><br></div><div>तीसरा, आगामी चुनावों की तैयारी: देश के अन्य राज्यों में होने वाले चुनावों से पहले सांसदों को बूथ स्तर तक सक्रिय रहने और जनता से संवाद बढ़ाने का संदेश दिया गया।</div><div><br></div><div>चौथा, सरकार की उपलब्धियों का प्रचार: सांसदों को निर्देश दिया जा सकता है कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों को अधिक प्रभावी ढंग से जनता तक पहुँचाएं।</div><div><br></div><div>पांचवां, सहयोगी दलों को महत्व: एनडीए में शामिल छोटे और क्षेत्रीय दलों को सम्मान और भागीदारी का संदेश देकर गठबंधन को मजबूत बनाए रखना है।</div><div><br></div><div>छठा, विपक्षी इंडिया गठबंधन को राजनीतिक संदेश: यह दिखाना कि एनडीए में नेतृत्व को लेकर कोई असमंजस नहीं है और गठबंधन स्थिर है।</div><div><br></div><div>सातवां, 2029 की दीर्घकालिक रणनीति: केवल वर्तमान राजनीतिक चुनौतियों पर नहीं, बल्कि अगले लोकसभा चुनाव तक संगठन और जनसंपर्क को मजबूत करने की दिशा में तैयारी।</div><div><br></div><div>उल्लेखनीय है किभारतीय राजनीति में ऐसे कार्यक्रम अक्सर केवल सामाजिक मेल-मिलाप नहीं होते, बल्कि इनके माध्यम से राजनीतिक संदेश दिए जाते हैं, सांसदों का मनोबल बढ़ाया जाता है, संगठनात्मक अनुशासन मजबूत किया जाता है, और भविष्य की रणनीति पर अनौपचारिक चर्चा होती है। इसलिए "मंगल मिलन" को केवल सांस्कृतिक या सामाजिक आयोजन के बजाय राजनीतिक समन्वय, गठबंधन प्रबंधन और चुनावी तैयारी के एक महत्वपूर्ण मंच के रूप में भी देखा जा सकता है।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 01 Aug 2026 18:01:50 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-political-significance-of-the-nda-mps-mangal-milan-session</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Vishwakhabram: चीन के बाद सीधे Bhutan पहुँचे विदेश सचिव Vikram Misri, India की Himalayan रणनीति में बड़ा बदलाव!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/india-bhutan-strategic-ties-vikram-misri-bhutan-visit-after-china-tour]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>विदेश सचिव विक्रम मिसरी की लगातार दो अहम यात्राओं ने भारत की बदलती कूटनीतिक रणनीति की साफ तस्वीर पेश की है। पहले उन्होंने चीन जाकर द्विपक्षीय संबंधों और सीमा से जुड़े मुद्दों पर व्यापक बातचीत की और इसके तुरंत बाद भूटान पहुंचकर भारत के सबसे करीबी पड़ोसी के साथ विकास और रणनीतिक साझेदारी को नई मजबूती दी। इन दोनों यात्राओं का क्रम यह संकेत देता है कि नई दिल्ली एक तरफ बीजिंग के साथ संवाद बनाए रखना चाहती है, तो दूसरी तरफ हिमालयी क्षेत्र में अपने सबसे भरोसेमंद साझेदार भूटान के साथ रिश्तों को और मजबूत कर अपनी सामरिक स्थिति को भी सुदृढ़ करने में जुटी है।</p><p>देखा जाये तो ऐसे समय में जब चीन लगातार हिमालयी क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है और भूटान-चीन सीमा वार्ताएं भी आगे बढ़ रही हैं, तब विदेश सचिव की यह यात्रा सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। संदेश साफ है कि भारत अपने पारंपरिक और सबसे करीबी साझेदार भूटान के साथ विकास, ऊर्जा, कनेक्टिविटी और सुरक्षा के हर आयाम पर सहयोग को नई गति देना चाहता है।</p><p>इसी क्रम में भारत और भूटान के बीच पांचवें भारत-भूटान विकास सहयोग वार्ता का आयोजन हुआ, जिसमें भूटान की 13वीं पंचवर्षीय योजना (2024-29) के तहत विकास सहयोग की प्रगति की व्यापक समीक्षा की गई। दोनों देशों ने 332 करोड़ रुपये की लागत वाली 12 नई प्रोजेक्ट टाइड असिस्टेंस (PTA) परियोजनाओं को मंजूरी दी। इसके साथ ही 13वीं पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत स्वीकृत PTA परियोजनाओं की संख्या बढ़कर 82 हो गई है, जिनकी कुल लागत 6,860 करोड़ रुपये पहुंच गई है।</p><p>हम आपको बता दें कि भारत पहले ही भूटान की 13वीं पंचवर्षीय योजना के लिए 10,000 करोड़ रुपये की सहायता देने की घोषणा कर चुका है। इस सहायता में प्रोजेक्ट टाइड असिस्टेंस, हाई इम्पैक्ट कम्युनिटी डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स, आर्थिक प्रोत्साहन कार्यक्रम और प्रोग्राम ग्रांट शामिल हैं। वार्ता के दौरान इन सभी मदों में धनराशि के उपयोग और परियोजनाओं की प्रगति की समीक्षा भी की गई।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/sports/china-outlines-new-sports-development-plan-for-2030" target="_blank" rel="noopener">China ने नई Sports Development Plan से 2030 तक विश्व-अग्रणी खेल शक्ति बनने का लक्ष्य रखा</a></h3><p>भारत ने आर्थिक प्रोत्साहन कार्यक्रम के लिए 1,250 करोड़ रुपये, हाई इम्पैक्ट कम्युनिटी डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स के लिए 735.20 करोड़ रुपये और प्रोग्राम ग्रांट के तहत 200 करोड़ रुपये पहले ही जारी कर दिए हैं। नई स्वीकृत परियोजनाएं आधारभूत ढांचे, स्वास्थ्य सेवाओं, कृषि, शहरी सुविधाओं और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों से जुड़ी हैं, जो भूटान के समग्र विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।</p><p>यात्रा के दौरान विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने भूटान के राजा जिग्मे खेसर नामग्याल वांगचुक से मुलाकात की। उन्होंने प्रधानमंत्री शेरिंग तोबगे और विदेश एवं विदेश व्यापार मंत्री डी.एन. धुंगयेल से भी अलग-अलग बैठकें कीं। इन बैठकों में विकास साझेदारी, ऊर्जा, व्यापार एवं निवेश, संपर्क (कनेक्टिविटी), लोगों के बीच संबंधों और क्षेत्रीय मुद्दों सहित द्विपक्षीय संबंधों के लगभग सभी महत्वपूर्ण पहलुओं पर चर्चा हुई।</p><p>भूटान के राजा के साथ मुलाकात में मिसरी ने विकास सहयोग की प्रगति की जानकारी साझा की। भारतीय दूतावास के अनुसार, राजा ने इन उपलब्धियों की सराहना करते हुए दोनों देशों के बीच संबंधों को और मजबूत करने के प्रति अपना समर्थन दोहराया।</p><p>यात्रा के दौरान दोनों देशों ने कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं का शुभारंभ भी किया। थिम्फू इकोलॉजिकल पार्क और ओलाखा पार्क का वर्चुअल उद्घाटन किया गया, जिन्हें "ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर एंड ओपन स्पेसेस इन थिम्फू" परियोजना के तहत विकसित किया गया है। इसके अलावा "एक्सेलेरेट ई-मोबिलिटी अपटेक इन भूटान" परियोजना के तहत खरीदे गए 45 इलेक्ट्रिक वाहन भी भूटानी सरकार को सौंपे गए।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/chinese-president-xi-jinping-to-visit-india-in-september" target="_blank" rel="noopener">Xi Jinping की India यात्रा: ग़लवान झड़प के बाद पहली बार दिल्ली आ सकते हैं चीनी राष्ट्रपति</a></h3><p>ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग को नई दिशा देते हुए भारत के एक्सिम बैंक और भूटान की सरकार के बीच 4,000 करोड़ रुपये की रियायती ऋण सुविधा (Line of Credit) को लागू करने के लिए अम्ब्रेला लाइन ऑफ क्रेडिट समझौते पर हस्ताक्षर हुए। यह राशि भूटान में ऊर्जा परियोजनाओं के विकास में खर्च की जाएगी। वहीं स्वास्थ्य क्षेत्र में नई दिल्ली स्थित एम्स और भूटान की खेसर ग्यालपो यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिकल साइंस के बीच अनुसंधान, चिकित्सा शिक्षा और प्रशिक्षण में सहयोग के लिए एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर भी हस्ताक्षर किए गए।</p><p>भारत ने दोहराया कि वह भूटान की विकास प्राथमिकताओं और वहां की जनता की आकांक्षाओं के अनुरूप सहयोग जारी रखेगा। वहीं भूटान ने भारत के सहयोग को अपनी 13वीं पंचवर्षीय योजना की सफलता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बताया। दोनों देशों ने अगली विकास सहयोग वार्ता नई दिल्ली में आयोजित करने पर भी सहमति जताई।</p><p>हालांकि इस पूरी यात्रा का महत्व केवल विकास सहयोग तक सीमित नहीं है। इसके पीछे गहरे सामरिक और भू-राजनीतिक संकेत भी छिपे हैं। विदेश सचिव विक्रम मिसरी भूटान पहुंचने से ठीक पहले चीन की दो दिवसीय यात्रा पूरी करके लौटे थे। बीजिंग में उन्होंने चीन की उप विदेश मंत्री हुआ चुनयिंग सहित कई वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात कर भारत-चीन संबंधों के पूरे दायरे पर चर्चा की। दोनों पक्षों ने सीमा क्षेत्रों में शांति एवं स्थिरता बनाए रखने की आवश्यकता दोहराई और व्यापार, आर्थिक सहयोग तथा राजनीतिक एवं जन-स्तरीय संपर्क बढ़ाने के उपायों पर विचार किया।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/bill-proposing-10-tariff-introduced-us-congress-xi-jinping-suddenly-divert-his-plane-towards-delhi" target="_blank" rel="noopener">अमेरिकी संसद में रूस के दोस्तों पर 100% टैरिफ वाला बिल आया, जिनपिंग ने अपना प्लेन अचानक दिल्ली की ओर घुमाया!</a></h3><p>मिसरी ने चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और विभिन्न संस्थानों के प्रतिनिधियों से भी मुलाकात की। यह यात्रा ऐसे समय हुई जब हाल के महीनों में भारत और चीन के बीच संवाद फिर से तेज हुआ है। इससे पहले मनीला में आसियान बैठकों के इतर विदेश मंत्री एस. जयशंकर और चीनी विदेश मंत्री वांग यी के बीच भी महत्वपूर्ण वार्ता हुई थी।</p><p>विशेषज्ञों के अनुसार, चीन यात्रा के तुरंत बाद भूटान जाना एक सुनियोजित कूटनीतिक क्रम का हिस्सा माना जा सकता है। भारत यह संकेत देना चाहता है कि वह चीन के साथ संवाद बनाए रखने का पक्षधर है, लेकिन अपनी सुरक्षा और रणनीतिक हितों से किसी प्रकार का समझौता नहीं करेगा। भूटान भारत की उत्तरी सुरक्षा व्यवस्था का अत्यंत महत्वपूर्ण स्तंभ है। डोकलाम जैसे संवेदनशील क्षेत्र और सिलिगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा के संदर्भ में भूटान का महत्व और बढ़ जाता है। ऐसे में विकास सहयोग, ऊर्जा निवेश, आधारभूत ढांचे और लोगों के बीच संबंधों को मजबूत करना केवल आर्थिक पहल नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रणनीतिक निवेश भी है।</p><p>दरअसल, भारत की मौजूदा पड़ोसी नीति में विकास और सुरक्षा अब एक-दूसरे के पूरक बन चुके हैं। चीन के साथ संवाद और भूटान के साथ गहरी साझेदारी, इन दोनों को समानांतर आगे बढ़ाकर नई दिल्ली यह संदेश दे रही है कि वह प्रतिस्पर्धा और सहयोग, दोनों के बीच संतुलन साधते हुए हिमालयी क्षेत्र में अपनी रणनीतिक बढ़त बनाए रखने के लिए बहुस्तरीय कूटनीति पर भरोसा कर रही है।</p><p>-नीरज कुमार दुबे</p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 31 Jul 2026 15:16:22 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/india-bhutan-strategic-ties-vikram-misri-bhutan-visit-after-china-tour</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[पेपर लीक बहस के दौरान विपक्षी दलों ने खोया सुनहरा अवसर ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/opposition-parties-missed-a-golden-opportunity-during-the-debate-on-the-paper-leak]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>केंद्र सरकार ने महत्वपूर्ण प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार होने वाली पेपर लीक व अन्य गड़बड़ियों की रोकथाम के लिए लोक परीक्षा (अनुचित साधन निवारण) संशोधन विधेयक विपक्ष के भारी हंगामे के बीच लोकसभा से ध्वनिमत से करा लिया। इस विधेयक पर बहस के दौरान यह बात स्पष्ट हो गई कि विरोधी दल छात्र हितैषी बनने का केवल दिखावा कर रहे थे। उनका वास्तविक उद्देश्य छात्रों के नाम पर संसदीय कामकाज को लटकाना, भटकाना व अटकाना ही था। कांग्रेस सहित विरोधी दलों के सांसदों ने पेपरलीक के मुद्दे पर केवल हंगामा और ओछी व गलत बयानबाजी ही करी। लोकसभा की बहस ने राहुल गांधी के नेतृत्व में संपूर्ण विपक्ष द्वारा छात्र आंदोलन की आड़ में देश को अराजकता की आग में झोंक कर उसमें अपनी राजनीतिक रोटिया सेंकने के सपने को चूर चूर कर दिया है। बहस के दौरान राजग गठबंधन के सांसदों ने स्पष्ट कर दिया कि पेपर लीक माफिया को मिट्टी में मिलाने का काम एनडीए सरकार में ही होगा जबकि विरोधी दल पूरी तरह से दिशाहीन और विभाजित दिखाई दिए। एनडीए सांसदों ने विपक्ष को तथ्यों, तर्कों व आंकड़ों से बेअसर व हताश कर दिया।&nbsp;</div><div><br></div><div>अपनी आदत से मजबूर कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने सदन के पटल पर गलत आंकडे़ रखे। पेपर लीक रोकने के लिए सरकार द्वारा बनाई गई टास्क फ़ोर्स में शामिल डॉ वी. कामकोटि को गौ-मूत्र विशेषज्ञ कहकर उनका उपहास उड़ाया। वी. कामकोटि के 150 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं। प्रियंका गाँधी को इस बात का न केवल संसद वरन सोशल मीडिया पर भी करारा जवाब मिला। कांग्रेस को इस बात का भी दर्द हो रहा होगा कि आधार के डिजाइनर नंदन नीलेकणि जो कभी कांग्रेस के साथ थे और 2014 में कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा चुनाव भी लड़े थे आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के साथ खड़े हैं।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/priyanka-mockery-of-cow-urine-reflects-the-congress-party-anti-hindu-mindset" target="_blank">प्रियंका द्वारा गौमूत्र का उपहास कांग्रेस की हिन्दू विरोधी मानसिकता</a></h3><div>कांग्रेस की बहस में रही सही धार राहुल गांधी ने संसद में इडियट और अंधभक्त भक्त जैसे अमर्यादित शब्दों का उपयोग करके कुंद कर दी और बता दिया कि अब यह मुद्दा उनके हाथ से जा चुका है। उन्होंने दिल्ली में छात्र आंदोलन के दौरान छात्रों पर गोली चलने का झूठा दावा किया और गृहमंत्री अमित शाह पर हमलावर हो गए। उन्होंने यह दावा भी कर दिया कि छात्र आंदोलन के दौरान गृह मंत्री विदेश चले गए थे। उन्होंने आरोप लगाया कि गृहमंत्री के काफिले में तीस गाड़ियाँ हैं। राहुल गांधी का पूरा बयान हताशा और निराशा से भरा हुआ और झूठ का पुलिंदा मात्र था। राहुल गाँधी हमेशा की तरह बहस के बजाए नौटंकी करते दिखे। खुले माइक पर माइक बंद होने का आरोप लगाया।&nbsp;</div><div><br></div><div>उधर सपा मुखिया अखिलेश यादव ने अपना मुद्दा ही बदल दिया ओैर चढ़ावा चोर, गद्दी छोड़ का नारा लगाने लगे। सपा मुखिया ने कहा कि जो लोग मंदिरों मे चढावा चोरी नहीं रोक सकते वह पेपर लीक क्या रोक पाएंगे। बहस के दौरान इंडी गठबंधन के सभी सांसद कुंठित नजर आ रहे थे।&nbsp;</div><div><br></div><div>एनडीए सांसदों ने पूरी तैयारी के साथ बहस में भाग लेकर विरोधियो व उनकी रणनीति को बेनकाब किया। विधेयक प्रस्तुत करते समय केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने 2014 के पूर्व पेपर लीक जैसी तमाम घटनाओं का विवरण सदन के पटल पर रखा और फिर बांसुरी स्वराज और तेजस्वी सूर्या से लेकर अनुराग ठाकुर तक ने अपने तथ्यों से विपक्ष की पोल खोल दी। सदन में सरकार की ओर से बताया गया कि परीक्षा को लेकर देश&nbsp; प्रदेशों में तरह-तरह की घटनाएं होती रही हैं जिनमें पेपर लीक भी है। यह एक प्रदेश या एक सरकार तक सीमित नहीं है। 2009 में रेलवे भर्ती बोर्ड की परीक्षा, बंगाल संयुक्त प्रवेश परीक्षा, 2010&nbsp; में उत्तर प्रदेश में बीएड प्रवेश परीक्षा, 2011 में आल इंडिया एंट्रेंस&nbsp; एग्जाम, 2012 में एम्स दिल्ली का पेपर लीक, तमिलनाडु पब्लिक सर्विस कमीशन पेपर लीक, 2023 में महाराष्ट्र सेकेंडरी सर्टिफिकेट परीक्षा पेपर लीक जैसी घटनाएं घटीं। भाजपा सांसद बांसुरी स्वराज अनुराग ठाकुर ने बताया कि 2014 के पूर्व यूपीए-2 के शासनकाल में 22 बार पेपर लीक की घटनाएं हुईं। राजस्थान में कांग्रेस सरकार, बंगाल में टीएमसी, यूपी में सपा के शासनकाल में तो नकल माफिया का महामंत्र ही विकसित हो गया था।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div>अब बिल लोकसभा से पास हो चुका है, इंडी गठबंधन के नेताओं को जो कहना है जो आरोप लगाना है लगाते रहें अन्ततः नया कानून ही सच्चाई होगी। छात्रों के नाम पर बनी&nbsp; सीजेपी भी बेनकाब हो चुकी है। दिल्ली पुलिस ने 2000 से अधिक अपराधियों की जंतर मंतर पर उपस्थिति चिह्नित की है । छात्रों को ध्यान रखना होगा कि 1973 से लेकर 1984 तक विभिन्न छात्र आंदोलनों&nbsp; के दौरान कम से कम 800 छात्रों की पुलिस की गोली व लाठी से मौत हुई थी तब देश में कांग्रेस की सरकारें ही थी। गांधी परिवार परिवार छात्र आंदोलन की आड़ में केवल अपनी वंशवादी राजनीति को धार देने और देश की जनता को भ्रमित व अराजकता की आग में झोकने का काम कर रहा है।</div><div><br></div><div>- मृत्युंजय दीक्षित&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 31 Jul 2026 11:41:49 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/opposition-parties-missed-a-golden-opportunity-during-the-debate-on-the-paper-leak</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[कांवड़ यात्रा: भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/kanwar-yatra-an-invaluable-heritage-of-indian-culture]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सावन मास की शुरुआत होते ही हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक, गंगा गंगोत्री से लेकर रामेश्वरम तक सम्पूर्ण भारत शिवमय हो उठता है। सावन मास में श‍िवभक्तों की विशाल पदयात्राएं जो कांवड़ यात्रा के नाम से जानी जाती है, भारतीय संस्कृति की जीवंतता का अनुपम दृश्य प्रस्तुत करती हैं। कंधों पर सुसज्जित कांवड़, मुख पर "बोल बम" का उद्घोष, हृदय में भगवान शिव के प्रति अनन्य भक्ति। यही है कांवड़ यात्रा का वास्तविक स्वरूप।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>कांवड़ यात्रा केवल एक सामान्य यात्रा नहीं है, बल्कि ये तपस्या, भक्ति और श्रद्धा की वह गाथा है जो शताब्दियों से चली आ रही है। धर्मशास्त्रों के अनुसार जब कांवड़ से जुड़े दोनों पात्र जिन्हें ब्रह्मघट और विष्णुघट कहा जाता है, पवित्र जल से भर लिए जाते है, तो उन्हें एक बांस की डण्डी के सहारे सजा-धजा कर और पूजित कर, स्थापित कर दिया जाता है। धर्मशास्त्रों के अनुसार रूद्र अर्थात् शिव बांस में समाहित हैं। कांवड़िया कांवड़ के माध्यम से साक्षात ब्रह्मा, विष्णु, शिव, तीनों की कृपा एक साथ प्राप्त करते हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/jyotish/kanwar-yatra-begin-on-july-30-learn-dates-of-sawan-shivratri-and-jalabhishek" target="_blank">Kanwar Yatra 2026: 30 जुलाई से शुरू हुई कांवड़ यात्रा, जानें Sawan Shivratri और जलाभिषेक की Date</a></h3><div>भारत में दो कांवड़ यात्राएं होती हैं, दिल्ली से उत्तराखंड-गंगोत्री, ऋषिकेश या हरिद्वार तक की कांवड़ यात्रा और बिहार और झारखंड में सुल्तानगंज से देवघर तक की कांवड़ यात्रा। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, पंजाब, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश से सैकड़ों-हजारों लोग, युवा से लेकर बुजुर्ग तक, जिनमें महिलाएं और कभी-कभी बच्चे भी कांवड़ यात्रा में भाग लेते हैं। कंधों पर लटका पवित्र जल भगवान शिव को समर्पित है, जिन्हें अक्सर भोला या भोले बाबा कहकर पुकारा जाता है। भोले का अर्थ भोलेनाथ, यानी भगवान शिव भी हो सकता है। इसलिए, तीर्थयात्री भोला और भोले हैं!</div><div><br></div><div>वर्तमान में, कांवड़ यात्रा विश्व की सबसे बड़ी धार्मिक पदयात्राओं में मानी जाती है। आधुनिक समय में इसकी भव्यता अत्यधिक बढ़ी है, किंतु इसकी आध्यात्मिक जड़ें वैदिक एवं पौराणिक परंपराओं में गहराई तक समाई हुई हैं। प्राचीन ग्रंथों में कांवड़ यात्रा का उल्लेख प्राय: किया जाता है। यह प्रश्न बार-बार पूछा जाता है कि "कांवड़ यात्रा" का उल्लेख किस ग्रंथ में मिलता है? इसका उत्तर थोड़ा सूक्ष्म है। "कांवड़" शब्द अपने वर्तमान अर्थ में पुराणों में प्रत्यक्ष रूप से नहीं मिलता। किंतु पवित्र नदी से जल लाकर भगवान शिव का अभिषेक करने की परंपरा का वर्णन अनेक पुराणों में स्पष्ट रूप से मिलता है। वर्तमान कांवड़ यात्रा उसी प्राचीन शिवाभिषेक परंपरा का आधुनिक स्वरूप मानी जाती है। अर्थात् कांवड़ यात्रा का भाव पुराण सम्मत है, जबकि "कांवड़" शब्द अपेक्षाकृत उत्तरकालीन लोक प्रचलित नाम है। "कंवार" शब्द की व्युत्पत्ति, जिसका अर्थ "कंधा" है।</div><div>&nbsp;</div><div>कांवड़ में दूर-दूर से पवित्र नदियों, खासकर गंगा का जल भरकर लाते हैं। इसे पैदल यात्रा करते हुए शिवलिंग पर चढ़ाते हैं। इस संकल्प यात्रा में सबसे महत्वपूर्ण होता है कांवड़ को अपने कंधे पर उठाकर ले जाना। यह कोई साधारण परंपरा नहीं है। इसके पीछे गहराई से जुड़ी हुई पौराणिक मान्यताएं छुपी हुई हैं।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>वाकई में कांवड़ यात्रा का जिक्र किसी पौराणिक ग्रंथ में सीधे तौर पर नहीं मिलता है। इसका भी स्पष्ट रूप से कोई जिक्र नहीं है कि किसने पहली बार कांवड़ यात्रा शुरू की थी, लेकिन लोक व्यवहार में महाबली रावण, महाविष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम, अगस्त्य ऋषि, महर्षि मार्कंडेय, महारथी कर्ण और 61 नयनार संतों में से एक संत कनप्पा जैसे कई नाम शामिल हैं, जिन्होंने महादेव शिव को बड़ी सरल-सहज और आसान विधि से पूजन कर प्रसन्न किया था। रावण और भगवान परशुराम द्वारा तो शिवजी के लिए कांवड़ लाकर भी उनका जलाभिषेक करने का प्रसंग लोक कथाओं में मिलता है, हालांकि पुराणों में हर जगह इनके द्वारा की गई विधिवत पूजा का ही वर्णन मिलता है, जिसमें पंचोपचार पूजन से लेकर, षोडशोपचार पूजन तक का वर्णन मिलता है, फिर भी कांवड़ द्वारा जल लाकर शिवजी के अभिषेक का वर्णन नहीं मिलता है।</div><div><br></div><div>हालांकि कांवड़ शब्द का जिक्र रामायण में मिलता है। जहां राजा दशरथ द्वारा गलती से श्रवण कुमार की हत्या हो जाती है। इस प्रसंग में जब श्रवण कुमार के चरित्र का वर्णन आता है तब कांवड़ का जिक्र होता है। जहां पता चलता है कि श्रवण कुमार अपने अंधे माता-पिता को कांवड़ में बैठाकर उन्हें तीर्थ यात्रा पर ले जाता है। कांवड़ असल में तराजू जैसी आकृति का एक नमूना होता है। श्रवण ने अपने माता-पिता को दोनों ओर बिठा लिया और कांवड़ कंधे पर रखकर चला।</div><div><br></div><div>पश्चिमी उत्तर प्रदेश के तीर्थ क्षेत्र में दशानन रावण से जुड़ी कई लोक कथाएं प्रचलित हैं। यहां नोएडा के पास बिसरख गांव को रावण की जन्मस्थली बताया जाता है। मेरठ को मयराष्ट्र बताते हुए उसे रावण की ससुराल बताया जाता है। यहीं बागपत स्थित पुरा महादेव मंदिर को लेकर मान्यता है कि यहां पर खुद रावण ने गढ़मुक्तेश्वर से गंगाजल लाकर शिवजी का जलाभिषेक किया था, जबकि रावण से भी सैकड़ों वर्ष पहले भगवान परशुराम ने इस मंदिर में शिवलिंग की स्थापना की थी और 108 कलश से उनका अभिषेक किया था।</div><div><br></div><div>स्कंद पुराण में शिव उपासना के लिए रामोपाख्यान सर्ग में एक जिक्र आता है, जहां शिवगण नंदी और रावण की बातचीत होती है. इस स्थान पर नंदी कहते हैं कि जो प्राणी जलाशय से शिवालय तक पैदल ही गमन करता है, और फिर जल ले जाकर शिवालय को धोकर साफ करता है, वह बिना किसी विधान की पूजा के शिवलोक को प्राप्त कर लेता है। यहां ध्यान देने वाली बात है कि स्कंद पुराण में कांवड़ यात्रा का जिक्र नहीं है, लेकिन ये जरूर लिखा है कि 'जलाशय से जल लेकर शिवालय तक की यात्रा'. संभवतः आगे चलकर यही व्याख्या कांवड़ यात्रा के संदर्भ में ली गई होगी।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>हालांकि कांवड़ यात्रा विशुद्ध ग्रामीण परंपरा है और इसकी शुरुआत इधर के आधुनिक काल में ही कभी हुई हो, इसकी अधिक संभावना हो सकती है। शिवजी की कावड़ यात्रा का जिक्र पुराणों में मिले न मिले, किसी रावण ने कांवड़ पहले चढ़ाई हो या नहीं, शिवभक्तों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। उनके लिए तो बस इतनी सी बात है, वे शिव के हैं और शिव उनके हैं। वहीं कांवड़ के व्युत्पत्तिपरक जो अर्थ किए गए हैं, उनमें एक के अनुसार ‘क’ अक्षर अग्नि को द्योतक है और ‘आवर’ का अर्थ ठीक से वरण करना। प्रार्थना यह है कि अग्नि अर्थात स्रष्टा, पालक एवं संहारकर्ता परमात्मा हमारा मार्गदर्शक बने और वही हमारे जीवन का लक्ष्य हो तथा हम अपने राष्ट्र और समाज को अपनी शक्ति से सक्षम बनाएं।</div><div><br></div><div>गंगाजल, पारद, पाषाण, धतूराफल आदि सबमें शिव सत्ता मानी गई है। अतः सब प्राणियों, जड़-जंगम पदार्थों में स्वयं भूतनाथ पशुपतिनाथ की सुगमता और सुलभता ही तो आपको देवाधिदेव महादेव सिद्ध करती है। कांवड़ शिव के उन सभी रूपों को नमन है। कंधे पर गंगा को धारण किए श्रद्धालु इसी आस्था और विश्वास को जीते हैं। यों भी कह सकते हैं कि कांवड़ यात्रा शिव के कल्याणकारी रूप और निष्ठा के नीर से उसके अभिषेक को तीव्र रूप में प्रतिध्वनित करती है।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>वास्तव में, कांवड़ यात्रा का यह धार्मिक उत्सव न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति की एक महत्वपूर्ण धरोहर भी है। कांवड़िये इस यात्रा के माध्यम से न केवल अपने धार्मिक कर्तव्यों का पालन करते हैं, बल्कि यह यात्रा उन्हें एकजुटता और भाईचारे का भी अनुभव कराती है। इस दौरान भक्तों की भक्ति और श्रद्धा का अद्भुत दृश्य देखने को मिलता है, जो भारतीय संस्कृति की गहराई और विविधता को दर्शाता है। सही मायनों में, कांवड़ यात्रा भारत की सांस्कृतिक परंपराओं में निहित सिद्धांतों की पुनर्स्थापना है। कांवड़ यात्रा सिर्फ एक यात्रा नहीं है, ये महादेव को शीतल जल अर्पित करने की परंपरा है, ये लोक-उत्सव है, समानता का सन्देश है क्योंकि चारों तरफ भगवा ही भगवा दिखता है जो सनातन संस्कृति का प्रतीक है।</div><div><br></div><div>- डॉ. आशीष वशिष्ठ,&nbsp;</div><div>स्वतंत्र पत्रकार</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 30 Jul 2026 15:09:22 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/kanwar-yatra-an-invaluable-heritage-of-indian-culture</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[गुरु पूर्णिमा: भगवा ध्वज, हिंदुत्व और राष्ट्र निर्माण की अखंड चेतना]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/guru-purnima-the-saffron-flag-hindutva-and-the-unbroken-consciousness-of-nation-building]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से प्रवाहित एक जीवंत सांस्कृतिक राष्ट्र है। इसकी आत्मा वेदों, उपनिषदों, ऋषियों, संतों, महापुरुषों और गुरु-शिष्य परंपरा में बसती है। गुरु पूर्णिमा इसी अमर परंपरा का महापर्व है, जो हमें ज्ञान, संस्कार, सेवा और राष्ट्रधर्म के प्रति पुनः समर्पित होने की प्रेरणा देता है।</div><div><br></div><div>भारतीय जीवन-दर्शन में गुरु का स्थान सर्वोपरि है। गुरु केवल शिक्षा देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि वह चेतना है जो मनुष्य के भीतर चरित्र, अनुशासन, आत्मविश्वास, कर्तव्यबोध और राष्ट्रभक्ति का प्रकाश प्रज्वलित करती है। गुरु ही व्यक्ति को स्वयं से ऊपर उठकर समाज और राष्ट्र के लिए जीने का मार्ग दिखाता है। यही कारण है कि हमारी संस्कृति में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समान पूज्य माना गया है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/rss-chief-mohan-bhagwat-significant-message-amidst-massive-student-protests" target="_blank">'आदेश नहीं, आपसी सहमति', छात्रों के भारी विरोध-प्रदर्शनों के बीच RSS प्रमुख Mohan Bhagwat का बड़ा संदेश</a></h3><div>राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इस महान गुरु परंपरा को एक अनूठी और कालजयी अभिव्यक्ति दी है। संघ में किसी व्यक्ति विशेष को गुरु नहीं माना जाता, बल्कि भगवा ध्वज को गुरु के रूप में वंदन किया जाता है। इसका संदेश अत्यंत स्पष्ट और प्रेरक है-व्यक्ति सीमित होता है, किंतु आदर्श अमर होते हैं। भगवा ध्वज त्याग, तप, बलिदान, सेवा, शौर्य, आत्मसंयम और सनातन भारतीय संस्कृति की अखंड चेतना का प्रतीक है। यह प्रत्येक स्वयंसेवक को निरंतर स्मरण कराता है कि राष्ट्र सर्वोपरि है और व्यक्तिगत जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य समाज एवं मातृभूमि की सेवा है।</div><div><br></div><div>लगभग एक शताब्दी से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सेवा, संगठन और राष्ट्रनिष्ठा की ऐसी परंपरा विकसित की है, जिसने भारत के सामाजिक जीवन पर गहरा प्रभाव छोड़ा है।&nbsp;</div><div><br></div><div>प्राकृतिक आपदाओं में राहत कार्य, शिक्षा, ग्राम विकास, सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण, स्वास्थ्य सेवा और जनजागरण जैसे अनेक क्षेत्रों में स्वयंसेवकों की निस्वार्थ भागीदारी इस विचार को साकार करती है कि राष्ट्र निर्माण केवल विचारों से नहीं, बल्कि सतत सेवा और समर्पण से होता है।</div><div><br></div><div>हिंदुत्व का वास्तविक स्वरूप भी इसी सांस्कृतिक चेतना में निहित है। हिंदुत्व किसी संकीर्ण आग्रह का नाम नहीं, बल्कि भारत की सनातन सभ्यता, सांस्कृतिक निरंतरता और जीवन मूल्यों का व्यापक दर्शन है। यह सत्य, करुणा, सहअस्तित्व, समरसता, कर्तव्य, आध्यात्मिकता और लोकमंगल का मार्ग प्रशस्त करता है। "वसुधैव कुटुम्बकम्", "सर्वे भवन्तु सुखिनः" तथा "एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति" जैसे सनातन सूत्र इसी उदात्त दृष्टिकोण को अभिव्यक्त करते हैं।</div><div><br></div><div>राष्ट्रवाद भी केवल राजनीतिक अवधारणा नहीं, बल्कि मातृभूमि के प्रति आत्मीय श्रद्धा, सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण, नागरिक कर्तव्यों के निर्वहन और राष्ट्रहित को सर्वोच्च मानने का जीवन मूल्य है। जब समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्य को राष्ट्रसेवा का माध्यम बना लेता है, तभी एक शक्तिशाली, आत्मनिर्भर और विकसित भारत का निर्माण संभव होता है।</div><div><br></div><div>आज भारत अपनी प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर और आधुनिक विकास यात्रा को समान गति से आगे बढ़ा रहा है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में विकसित भारत का जो संकल्प देश ने लिया है, उसकी सफलता केवल आर्थिक प्रगति से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मविश्वास, सामाजिक एकता, सेवा भाव और राष्ट्रीय चरित्र की मजबूती से सुनिश्चित होगी। गुरु पूर्णिमा हमें इसी राष्ट्रीय चेतना को अपने जीवन का आधार बनाने का संदेश देती है।</div><div><br></div><div>आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने गुरुओं के प्रति कृतज्ञ रहें, भगवा ध्वज के आदर्शों से प्रेरणा ग्रहण करें, सनातन संस्कृति के जीवन मूल्यों को आत्मसात करें और राष्ट्रहित को व्यक्तिगत हितों से ऊपर रखते हुए समाज के अंतिम व्यक्ति तक सेवा का भाव पहुँचाएँ। यही सच्चे अर्थों में गुरु परंपरा का सम्मान है और यही भारत को पुनः विश्व के नैतिक एवं सांस्कृतिक नेतृत्व के शिखर पर स्थापित करने का मार्ग भी है।</div><div><br></div><div>आइए, गुरु पूर्णिमा के इस पावन अवसर पर हम सभी यह संकल्प लें कि सेवा हमारा संस्कार बने, समरसता हमारी पहचान बने और "राष्ट्र प्रथम" हमारा जीवन मंत्र बने। यही गुरु के प्रति सच्चा आदर, सम्मान होगा और यही एक सशक्त, समृद्ध, सांस्कृतिक तथा विकसित भारत के निर्माण की आधारशिला भी बनेगी।</div><div><br></div><div>- नंदन जैन&nbsp;</div><div>भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष छत्तीसगढ़</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 10:57:58 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/guru-purnima-the-saffron-flag-hindutva-and-the-unbroken-consciousness-of-nation-building</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[बाघों की घटती आबादी पर विराम की चुनौती अभी भी बरक़रार?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/does-the-challenge-of-halting-the-decline-in-tiger-populations-still-persist]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>'अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस' को मनाने का मुख्य मकसद विश्व भर में तेजी से घटती बाघों की आबादी को रोकने एवं उनके संरक्षण के प्रति समूची दुनिया को जागरूक करना होता है। आज का दिन जंगल की शान कहे जाने वाले बाघों के लिए समर्पित है। सालाना ये दिन 29 जुलाई को पूरे संसार में मनाया जाता है। शुरुआत रूस स्थित ‘पीटरर्सबर्ग टाइगर संरक्षण शिखर सम्मेलन’ के दौरान वर्ष-2010 में की गई थी। विश्व में बाघों की संख्या करीब 78 फीसदी तक घट चुकी है। गनीमत है कि भारत बाघों के मामले में अभी भी टाॅप पर है। वैश्विक स्तर के आंकड़ों पर गौर करें, तो अनुमानित, बाघों की संख्या पूरे विश्व में लगभग 5,500 के बीच है। इनमें से 72 प्रतिशत आबादी अकेले हिंदुस्तान में ही है। 2022 बाघ जनगणना में भारतीय जंगलों और टाइगर रिजर्व में 3,682 जंगली बाघ थे, इनमें पिछले दो वर्षों में इजाफा ठीक ठाक हुआ। 'ग्लोबल टागईर दिवस-2025' की थीम थी, 'हमारे हाथों में हैं बाघों का संरक्षण'।</div><div>&nbsp;</div><div>बाघ आबादी में भारत के अलावा दूसरे पायदान पर रूस है। अखिल भारतीय बाघ जनगणना-2022 में बाघों की जितनी संख्या बताई गई थी, उनमें अब 12 फीसदी की वृद्धि हो चुकी है। हालांकि, संपूर्ण संख्या अगली गणना में ही सामने आएगी। बाघ संरक्षण की दिशा में बीते कुछ वर्षों से सराहनीय प्रयास हुए हैं। बाघों का सर्वेक्षण आधुनिक तकनीकों से किया जाने लगा है। प्रत्येक टाइगर रिजर्व क्षेत्रों में कैमरे लगवाए गए हैं, ताकि उनकी मुकम्मल आबादी का पता चल सके और उनकी चहलकदमी पर नजर रखी जा सके। पिछली बाघ जनगणना के दौरान मध्यप्रदेश के शिवपुरी में एकाध बाघ दिखे, तो केंद्र सरकार ने 9 मार्च 2025 को उस जगह को 58 वां टाइगर रिजर्व स्थापित कर दिया जिसका नाम ‘माधव राष्ट्रीय उधान’ रखा गया। यह प्रदेश का 9वां टाइगर रिजर्व है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/heed-the-earth-warning-nature-patience-is-running-out" target="_blank">धरती की चेतावनी को सुनिए, प्रकृति का धैर्य अब जवाब दे रहा है</a></h3><div>गौरतलब है कि भारत में बाघों की गणना प्रत्येक 5 साल बाद की जाती है पिछली गणना 2022 में हुई थी, अगली गणना मार्च-2027 में करवाने का प्रस्ताव पारित है। बाघों की आबादी जितनी होनी चाहिए, उतनी है नहीं? बाघ संरक्षण पर केंद्र सरकार सालाना करीब 250 से 290 करोड़ रूपए खर्च करती है। वन्यजीव रेस्क्यू सेंटर में रखे गए प्रत्येक बाघ पर साल में 20 लाख से ज्यादा खर्च होता है। आजादी से पूर्व 100 साल पहले यानी 1926 के आसपास में हिंदुस्तान बाघों की आबादी सर्वाधिक एक लाख से भी अधिक हुआ करती थी, जो घटती-घटती आज कुछ हजारों तक ही सिमट गई। उत्तराखंड स्थित सिर्फ जिम कॉर्बेट में ही हजारों बाघ पाए जाते थे। हालांकि, सर्वाधिक संख्या आज भी वहीं है। पिछली गणना में 231 बाघ बताए गए थे। इस समय मध्यप्रदेश में 785, कर्नाटक में 524, बाघ हैं।</div><div><br></div><div>बाघों के लुप्त होते कारणों में आवासों की कमी, वन-विखंडन, अवैध शिकार, मानव-वन्यजीव संघर्ष जैसे मुख्य वजहें हैं। अगर ये रूक जाएं, तो बाघों की संख्या एकाएक बढ़ जाएगी। एशिया के कुछ देश ऐसे हैं जहां बाघ पूरी तरह से विलुप्त हो गए हैं उनमें, कंबोडिया, लाओस और वियतनाम शामिल हैं। कुछ मुल्क विलुप्ति की कगार पर हैं। बाघों का अवैध शिकार समूचे संसार में तेजी से जारी है। होता क्यों है? ये भी जानना जरूरी है। दरअसल, अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बाघों के अंगों की सदैव से भारी डिमांड रही है जिनमें एशियाई बाघों की सबसे ज्यादा। बाघ संरक्षण क्षेत्रों में और सख्तियां बरतने की जरूरत है। कानूनों को कठोर और जुर्माने का भारी भरकम प्रावधान किए जाने की दरकार है। ताकि, कोई भी नुकसान पहुंचाने से पहले सौ बार सोचे। पिछले एक वर्ष में विभिन्न राज्यों में करीब 75 लोगों पर एफआईआर दर्ज हुई, कईयों को जेल भी हुई। नरसिंहपुर, बालाघाट और बांधवगढ़ में बाघों के अवैध शिकार व अंगों की तस्करी मामलों मार्च 2025 में एक साथ दर्जनों शिकारियों की अरेस्टिंग हुई थी। आरोपियों पर वन्यजीव संरक्षण अधिनियम-1972 के तहत कार्रवाही की जाती है जिसमें 3 से 7 साल की कैद का प्रावधान है। इसे रिफाॅर्म किए जाने की अब जरूरत है।</div><div>&nbsp;</div><div>मालूम हो, कि जंगली बाघ हमारे पारिस्थितिकी तंत्र के सामंजस्य को बनाए रखने में हमेशा से महत्वपूर्ण भूमिका निभाते आए हैं। भारत में टाइगरों के संरक्षण के लिए केंद्रीय और राज्य स्तरों पर विभिन्न अभियान बीते एकाध दशकों से जारी हैं। इन अभियानों के निरंतर चलते रहने से ही भारत में इस समय 58 टाइगर रिजर्व स्थापित हैं। ये बाघ रिजर्व 19 राज्यों में फैले हैं। सर्वाधिक टाइगर रिजर्व मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक में हैं। करीब 30 पहले भारत में बाघों की आबादी अचानक से घटनी शुरू हुई, तो सरकार ने ‘टाइगर टास्क फोर्स’ का गठन किया। जिसकी रिपोर्ट के आधार पर केंद्र सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 1 जुलाई 1973 को ‘प्रोजेक्टर टाइगर’ आरंभ करके घटती बाघों की आबादी को किसी तरह रोकना शुरू किया। इस प्रयोग से जबरदस्त फायदा भी हुआ।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>बाघ संरक्षण निर्भर प्रजाति है। बाघों के संरक्षण में उनके रहने के निवास यानी अभयारण्यी की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। पर, इन जगहों पर लगातार बढ़ती शिकारियों की आमदगी ने उनकी शांत जिंदगी में खलल पहुंचा दिया है। शिकारी ज्यादातर बाघ अभयारण्यों के ईद-गिर्द घात लगाए बैठे होते हैं। बाघ को देखते ही उसका शिकार कर देते हैं। कई बार खबरें ऐसी भी आई कि शिकारियों का साथ वन्य कर्मी भी देते है। ऐसे गंभीर आरोप में कर्नाटक के कई वन्य कर्मी पकड़े भी गऐ। इस सिंडिकेट को किसी भी तरह से रोके जाने की दरकार है। अगर नहीं रोका गया हुआ, तो भारत वैश्विक स्तर पर बाघ आबादी का पहला पायदान खो देगा।</div><div><br></div><div>- डॉ. रमेश ठाकुर</div><div>सदस्य, राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान (NIPCCD), भारत सरकार!</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 10:37:06 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/does-the-challenge-of-halting-the-decline-in-tiger-populations-still-persist</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[धरती की चेतावनी को सुनिए, प्रकृति का धैर्य अब जवाब दे रहा है]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/heed-the-earth-warning-nature-patience-is-running-out]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पूरी दुनिया में मौसम के तेजी से बिगड़ते मिजाज के कारण विभिन्न देशों में प्रकृति की मार अब स्पष्ट नजर आने लगी है। प्रकृति के साथ खिलवाड़ का ही परिणाम है कि अब हर साल देश के कई हिस्से भारी बारिश के कारण बाढ़ की वजह से त्राहि-त्राहि करते नजर आते हैं जबकि कई हिस्से मानसून के दौरान भी पर्याप्त बारिश के लिए तरसते रह जाते हैं। इस वर्ष भी कुछ ऐसे ही हालात हैं। दुनिया के कई ठंडे इलाके अब ग्लोबल वार्मिंग के कारण तपने लगे हैं तो कई सूखे इलाके बाढ़ से त्रस्त हैं, जंगल झुलस रहे हैं। बिगड़ते पर्यावरणीय संतुलन और मौसम चक्र में आते बदलाव के कारण पेड़-पौधों की अनेक प्रजातियों के अलावा जीव-जंतुओं की कई प्रजातियों के अस्तित्व पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं। पर्यावरण के तेजी से बदलते इस दौर में वैश्विक स्तर पर लोगों का ध्यान इन समस्याओं की ओर आकृष्ट करने के लिए ही प्रतिवर्ष 28 जुलाई को ‘विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस’ मनाया जाता है, जिसके माध्यम से वातावरण में हो रहे व्यापक बदलावों के चलते लगातार विलुप्ति के कगार पर पहुंच रही जीव जंतुओं और वनस्पतियों की अनेक प्रजातियों की रक्षा का संकल्प लिया जाता है। विश्वभर में आधुनिकीकरण और औद्योगिकीकरण के चलते प्रकृति के साथ बड़े पैमाने पर जो खिलवाड़ हो रहा है, उसके मद्देनजर आमजन को जागरूक करने के लिहाज से आज के समय में प्रकृति संरक्षण दिवस की महत्ता बढ़ गई है।</div><div><br></div><div>2020 में कोरोना महामारी के कारण लगे लॉकडाउन के दौर में पूरी दुनिया ने पहली बार प्रकृति को खुलकर मुस्कराते देखा था क्योंकि तब औद्योगिक इकाईयां, हवाई व रेल यात्राएं, बस यात्रा तथा निजी वाहनों का आवागमन बंद होने से हर तरह के प्रदूषण का स्तर पूर्ण रूप से नियंत्रित हो गया था। गंगा, यमुना जैसी जो पवित्र नदियां कई जगहों पर गंदे नालों की भांति बहती दिखाई देती थी, उनमें जल की निर्मल धारा बहने लगी थी। जिन नदियों को साफ करने के लिए पिछले कुछ दशकों में अनेक योजनाएं और समितियां बनी तथा नदियों की स्वच्छता के नाम पर अरबों-खरबों रुपये खर्च हो गए, लॉकडाउन के दौरान वे स्वतः ही स्वच्छ और निर्मल हो गई थी। पहली बार देखा गया था कि किस प्रकार लॉकडाउन के चलते लोगों के घरों में बंद रहने और सभी प्रकार के व्यावसायिक कार्य बंद हो जाने से हवा इतनी शुद्ध हो गई थी कि सैंकड़ों किलोमीटर दूर स्थित पर्वतों की चोटियां भी स्पष्ट दिखाई दी थी। जिन नन्हीं चिड़ियों की चहचहाहट को हमारे कान तरस गए थे, ब्रह्म मुहूर्त में उनकी मधुर आवाज फिर से सुनाई देनी लगी थी। प्रकृति के उस साफ-सुथरे स्वरूप को देखकर हर कोई खुश था। दरअसल प्रकृति को स्वयं अपनी मरम्मत करने और खुद को सजाने-संवारने का सुअवसर मिला था लेकिन इंसानी गतिविधियां पुनः शुरू होते ही प्रकृति के साथ निर्मम खिलवाड़ का वही दौर पुनः शुरू हो गया, जिसका परिणाम इस समय दुनिया के तमाम देश भुगत रहे हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/trending/celebrated-in-honor-of-dr-baruch-blumberg-know-what-special-theme" target="_blank">World Hepatitis Day 2026: Dr Baruch Blumberg के सम्मान में मनाया जाता है यह दिन, जानें क्या है Special Theme</a></h3><div>लॉकडाउन के दौर ने पूरी दुनिया को यह समझने का बेहतरीन अवसर दिया था कि इंसानी गतिविधियों के कारण ही प्रकृति का जिस बड़े पैमाने पर दोहन किया जाता रहा है, उसी के कारण स्वर्ग से भी सुंदर हमारी धरती कराहती रही है। प्रकृति मनुष्य को ऐसा न करने के लिए बार-बार किसी न किसी बड़ी आपदा के रूप में चेतावनियां भी देती रही है लेकिन उन चेतावनियों को सदा दरकिनार किया जाता रहा है। प्रकृति के साथ मानवीय छेड़छाड़ का ही नतीजा रहा है कि बीते कुछ वर्षों में मौसम चक्र में बदलाव स्पष्ट दिखाई दिया है। वर्ष दर वर्ष अब जिस प्रकार मौसम के बिगड़ते मिजाज के चलते समय-समय पर तबाही देखने को मिल रही है, ऐसे में हमें अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि मौसम चक्र के बदलाव के कारण प्रकृति संतुलन पर जो विपरीत प्रभाव पड़ रहा है, उसकी अनदेखी के कितने भयावह परिणाम होंगे। प्रकृति बार-बार मौसम चक्र में बदलाव के संकेत, चेतावनी तथा संभलने का अवसर देती रही है लेकिन हम आदतन किसी बड़े खतरे के सामने आने तक ऐसे संकेतों या चेतावनियों को नजरअंदाज करते रहे हैं, जिसका नतीजा अक्सर भारी तबाही के रूप में सामने आता रहा है।</div><div><br></div><div>पिछले तीन दशकों से पर्यावरण प्रदूषण के कारण जिस प्रकार मौसम चक्र तीव्र गति से बदल रहा है और प्राकृतिक आपदाओं का आकस्मिक सिलसिला तेज हुआ है, उसके बावजूद यदि हम नहीं संभलना चाहते तो इसमें भला प्रकृति का क्या दोष? प्रकृति के साथ हम बड़े पैमाने पर जो छेड़छाड़ कर रहे हैं, उसी का नतीजा है कि पिछले कुछ समय में भयानक तूफानों, बाढ़, सूखा, भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदाओं का सिलसिला तेजी से बढ़ा है। अपनी पुस्तक ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ में मैंने विस्तार से यह बताया है कि किस प्रकार पर्यावरण का संतुलन डगमगाने के चलते लोग अब तरह-तरह की भयानक बीमारियों के जाल में फंस रहे हैं। हमारे जो पर्वतीय स्थान कुछ सालों पहले तक शांत और स्वच्छ वातावरण के कारण हर किसी को अपनी ओर आकर्षित किया करते थे, आज वहां भी प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है और ठंडे इलाकों के रूप में विख्यात पहाड़ भी तपने लगने हैं, वहां भी जल संकट गहराने लगा है। दरअसल पर्वतीय क्षेत्रों में यातायात के साधनों से बढ़ते प्रदूषण, बड़े-बड़े उद्योग स्थापित करने और राजमार्ग बनाने के नाम पर बड़े पैमाने पर वनों के दोहन, सुरंगें बनाने के लिए बेदर्दी से पहाड़ों का सीना चीरे जाने का ही दुष्परिणाम है कि हमारे इन खूबसूरत पहाड़ों की ठंडक अब लगातार कम हो रही है। पहाड़ों में बढ़ती इसी गर्माहट के चलते हमें अक्सर घने वनों में भयानक आग लगने की खबरें भी सुनने को मिलती रहती हैं। पहाड़ों की इसी गर्माहट का सीधा असर निचले मैदानी इलाकों पर पड़ता है, जहां का पारा अब वर्ष दर वर्ष बढ़ रहा है।</div><div><br></div><div>हालांकि प्रकृति बार-बार अपना रौद्र रूप दिखाकर स्पष्ट चेतावनी देती रही है कि यदि उसके साथ अंधाधुंध खिलवाड़ बंद नहीं हुआ तो उसके घातक परिणाम होंगे लेकिन विड़म्बना है कि लगातार प्रकृति का प्रचण्ड रूप देखते रहने के बावजूद प्रकृति की चेतावनियों को नजरअंदाज कर दुनिया अपने विनाश को आमंत्रित कर रही है। दरअसल हम समझना ही नहीं चाहते कि पहाड़ों का सीना चीरकर हरे-भरे जंगलों को तबाह कर हम कंक्रीट के जो जंगल विकसित कर रहे हैं, वह वास्तव में विकास नहीं है बल्कि विकास के नाम पर हम अपने ही विनाश का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। प्रकृति कभी समुद्री तूफान तो कभी भूकम्प, कभी सूखा तो कभी अकाल के रूप में अपना विकराल रूप दिखाकर हमें बारम्बार चेतावनी देती रही है कि हम यदि इसी प्रकार प्राकृतिक संसाधनों का बुरे तरीके से दोहन करते रहे तो हमारे भविष्य की तस्वीर कैसी होने वाली है। यदि हम अभी भी नहीं संभले और हमने प्रकृति से साथ खिलवाड़ बंद नहीं किया तो हमें आने वाले समय में इसके खतरनाक परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना होगा।</div><div><br></div><div>- योगेश कुमार गोयल</div><div>(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, पर्यावरण विषयों के जानकार और ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ पुस्तक के लेखक हैं)</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 28 Jul 2026 14:41:47 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/heed-the-earth-warning-nature-patience-is-running-out</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[समन्दर से लेकर रेगिस्तान तक... खतरनाक हालात का सामना कर रहे हैं भारतीय श्रमिक और नाविक]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/indian-seafarers-migrant-workers-under-global-threat]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>यूक्रेन-रूस युद्ध और पश्चिम एशिया में गहराते भू-राजनीतिक तनाव ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि वैश्विक संघर्षों की सबसे बड़ी कीमत अक्सर वे लोग चुकाते हैं, जिनका युद्ध से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं होता। भारतीय नाविक, प्रवासी श्रमिक और कामगार आज इसी त्रासदी के सबसे बड़े शिकार बनकर उभरे हैं। यूक्रेन के ओडेसा बंदरगाह के निकट एक के बाद एक वाणिज्यिक जहाजों पर हुए हमलों, खाड़ी देशों में बढ़ती औद्योगिक दुर्घटनाओं और असुरक्षित कार्य परिस्थितियों ने भारतीय श्रमिकों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।</div><div><br></div><div>ताजा घटनाक्रम में भारत सरकार ने यूक्रेन के राजदूत डॉ. ओलेक्सांद्र पोलिशचुक को तलब कर ओडेसा के निकट व्यापारी जहाज MV OMORFI पर हुए हमले पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। इस हमले में एक भारतीय नाविक की मौत हो गई, जबकि जहाज पर सवार चार भारतीयों में दो सुरक्षित बताए गए हैं और दो अन्य के बारे में जानकारी का इंतजार है। विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाना न केवल समुद्री सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए खतरा है, बल्कि निर्दोष नागरिक नाविकों के जीवन के साथ खिलवाड़ भी है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/ministry-of-external-affairs-swings-into-action-following-the-death-of-an-indian-sailor" target="_blank">India Summons Ukrainian Ambassador: भारतीय नाविक की मौत के बाद एक्शन में आया विदेश मंत्रालय,  यूक्रेन के राजदूत को किया तलब</a></h3><div>यह कोई अकेली घटना नहीं है। इससे पहले MV Golden Leo पर हुए हमले में चार भारतीय नाविकों सहित कई लोगों की जान चली गई थी। जुलाई में ही लगातार दो हमलों के बाद यूक्रेन युद्ध में जान गंवाने वाले भारतीय नाविकों की संख्या बढ़कर पांच हो गई है। भारत सरकार ने इसके बाद भारतीय नाविकों के लिए विशेष एडवाइजरी जारी करते हुए संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में नौकरी स्वीकार करने से पहले सुरक्षा जोखिमों का गंभीर आकलन करने की सलाह दी है। जहाज के मार्ग, सुरक्षा इंतजाम, बीमा, आपातकालीन निकासी और मुआवजा व्यवस्था की पूरी जानकारी लेने पर भी जोर दिया गया है।</div><div><br></div><div>दरअसल, ब्लैक सी ही नहीं बल्कि पश्चिम एशिया के समुद्री मार्ग भी अब सुरक्षित नहीं रह गए हैं। होरमुज जलडमरूमध्य, अरब सागर, ओमान की खाड़ी और लाल सागर में बढ़ते सैन्य तनाव के कारण हजारों भारतीय नाविक लगातार जोखिम के बीच काम कर रहे हैं। हाल के संकट के दौरान 13 भारतीय ध्वज वाले जहाजों पर लगभग 550 भारतीय नाविक लंबे समय तक फंसे रहे, जबकि पूरे क्षेत्र में 18 हजार से अधिक भारतीय समुद्री कर्मियों पर अनिश्चितता का साया मंडराता रहा। हम आपको बता दें कि भारत दुनिया के तीन सबसे बड़े समुद्री मानव संसाधन प्रदाताओं में शामिल है। वर्ष 2024 में 3.07 लाख से अधिक भारतीय नाविक वैश्विक व्यापारी जहाजों पर सेवाएं दे रहे थे। ऐसे में समुद्री सुरक्षा का संकट सीधे लाखों भारतीय परिवारों की आजीविका से जुड़ा हुआ है।</div><div><br></div><div>केवल समुद्र ही नहीं, खाड़ी देशों में काम कर रहे भारतीय श्रमिकों की स्थिति भी बेहद चिंताजनक है। कतर में पिछले महीने हुए भीषण औद्योगिक विस्फोट में 12 भारतीयों की मौत ने प्रवासी मजदूरों की सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी। विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार 2023 से 2025 के बीच कार्यस्थल दुर्घटनाओं में 800 से अधिक भारतीयों की जान गई, जिनमें लगभग 55 प्रतिशत मौतें अरब देशों में हुईं। अकेले सऊदी अरब में 182 और संयुक्त अरब अमीरात में 128 भारतीय श्रमिकों की कार्यस्थल पर मौत दर्ज की गई।</div><div><br></div><div>विशेषज्ञों के अनुसार इन मौतों के पीछे कई कारण हैं, जैसे सुरक्षा उपकरणों का अभाव, औद्योगिक स्थलों पर तकनीकी खामियां, सुरक्षा मानकों का कमजोर पालन, पर्याप्त प्रशिक्षण की कमी और अत्यधिक गर्म मौसम में कठिन श्रम। निर्माण, वेयरहाउस, ऑटोमोबाइल, रिटेल और रासायनिक उद्योगों में काम करने वाले भारतीय मजदूर अक्सर बिना पर्याप्त सुरक्षा उपकरणों के जोखिम भरे वातावरण में काम करने को मजबूर होते हैं। कई बार श्रमिक स्वयं भी सुरक्षा नियमों के प्रति पर्याप्त जागरूक नहीं होते, क्योंकि विदेश भेजे जाने से पहले उन्हें आवश्यक प्रशिक्षण नहीं मिल पाता।</div><div><br></div><div>स्थिति केवल कार्यस्थल तक सीमित नहीं है। प्रवासी संगठनों का कहना है कि तंग आवास, खराब भोजन, 12-12 घंटे की ड्यूटी, कई-कई महीनों तक वेतन नहीं मिलना और वेतन में मनमानी कटौती जैसी समस्याएं भारतीय श्रमिकों के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल रही हैं। विदेश मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि विदेशों में भारतीयों की आत्महत्या के अधिकांश मामले भी खाड़ी देशों से सामने आए हैं। कई मामलों में कंपनियां कार्यस्थल पर हुई मौतों को "प्राकृतिक मृत्यु" बताकर अपनी जिम्मेदारी से बच निकलती हैं और पीड़ित परिवारों को उचित मुआवजा भी नहीं मिल पाता।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो खाड़ी क्षेत्र भारतीय प्रवासी श्रमिकों के लिए केवल रोजगार का केंद्र नहीं, बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था का भी महत्वपूर्ण आधार है। नौ मिलियन से अधिक भारतीय इस क्षेत्र में रहते और काम करते हैं। केरल, तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और पंजाब जैसे राज्यों की लाखों परिवारों की आय खाड़ी देशों से आने वाले धन पर निर्भर है। यही कारण है कि क्षेत्रीय अस्थिरता का प्रभाव केवल विदेशों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि भारत के सामाजिक और आर्थिक ढांचे पर भी पड़ता है।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो युद्ध और क्षेत्रीय तनाव का एक और गंभीर पहलू श्रमिक अधिकारों का कमजोर होना है। मानवाधिकार संगठनों ने चेतावनी दी है कि कई खाड़ी देशों में निगरानी बढ़ने, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर नियंत्रण और श्रमिक संगठनों की सीमित भूमिका के कारण प्रवासी मजदूर अपनी समस्याएं खुलकर नहीं रख पा रहे हैं। वीजा व्यवस्था, नियोक्ता पर निर्भरता और सीमित कानूनी सुरक्षा के कारण वे शोषण के खिलाफ आवाज उठाने से भी डरते हैं।</div><div><br></div><div>हालांकि भारत सरकार ने पिछले वर्षों में संकट प्रबंधन की दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। विदेश मंत्रालय और भारतीय दूतावास लगातार सुरक्षा सलाह जारी कर रहे हैं, हेल्पलाइन सक्रिय हैं और जरूरत पड़ने पर निकासी अभियानों की तैयारी भी की जा रही है। कुवैत, यमन, लीबिया, अफगानिस्तान, सूडान और यूक्रेन जैसे देशों से सफल निकासी अभियानों के अनुभव ने भारत की क्षमता को मजबूत किया है। इसके बावजूद बदलते वैश्विक हालात यह संकेत देते हैं कि केवल आपातकालीन प्रतिक्रिया पर्याप्त नहीं होगी।</div><div><br></div><div>अब आवश्यकता इस बात की है कि विदेश भेजे जाने से पहले भारतीय श्रमिकों और नाविकों को अनिवार्य सुरक्षा प्रशिक्षण दिया जाए, जोखिम वाले क्षेत्रों के लिए विशेष बीमा और मुआवजा व्यवस्था सुनिश्चित हो, भर्ती एजेंसियों की जवाबदेही तय की जाए और द्विपक्षीय समझौतों के माध्यम से मेजबान देशों में श्रमिक सुरक्षा मानकों का सख्ती से पालन कराया जाए। साथ ही, भारत को समुद्री सुरक्षा, प्रवासी संरक्षण और श्रमिक अधिकारों को अपनी विदेश नीति का और अधिक महत्वपूर्ण हिस्सा बनाना होगा।</div><div><br></div><div>बहरहाल, भले भारतीय श्रमिक और नाविक वैश्विक अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, लेकिन विडंबना यह है कि वही सबसे अधिक असुरक्षित भी हैं। युद्ध की गोलियां हों, समुद्री मिसाइलें, औद्योगिक विस्फोट या श्रम शोषण, हर मोर्चे पर भारतीय कामगारों की जान दांव पर लगी है। ऐसे में केवल संवेदना और कूटनीतिक विरोध पर्याप्त नहीं होंगे। जरूरत एक ऐसी व्यापक नीति की है, जो दुनिया के किसी भी कोने में काम कर रहे भारतीय श्रमिक और नाविक को यह भरोसा दिला सके कि उसकी सुरक्षा, गरिमा और जीवन भारत की सर्वोच्च प्राथमिकता है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 27 Jul 2026 17:04:55 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/indian-seafarers-migrant-workers-under-global-threat</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[“एग्रो-वोल्टिक्स: खाद्य, ऊर्जा और पर्यावरण सुरक्षा का एकीकृत वैज्ञानिक मॉडल”]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/agrivoltaics-an-integrated-scientific-model-for-food-energy-and-environmental-security]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>तेजी से बढ़ती वैश्विक जनसंख्या, जलवायु परिवर्तन, कृषि योग्य भूमि में निरंतर कमी और स्वच्छ ऊर्जा की बढ़ती मांग ने मानव सभ्यता के सामने एक जटिल चुनौती खड़ी कर दी है, क्या एक ही भूमि से भोजन भी उगाया जा सकता है और ऊर्जा भी उत्पन्न की जा सकती है? लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि कृषि और सौर ऊर्जा परियोजनाएँ एक-दूसरे की प्रतिस्पर्धी हैं, क्योंकि दोनों के लिए भूमि की आवश्यकता होती है। किंतु विज्ञान ने इस द्वंद्व का एक अभिनव समाधान प्रस्तुत किया है, जिसे एग्रो-वोल्टिक्स या एग्री-सोलर प्रणाली कहा जाता है। यह ऐसी वैज्ञानिक अवधारणा है, जिसमें एक ही खेत पर फसल उत्पादन और सौर ऊर्जा उत्पादन दोनों साथ-साथ किए जाते हैं। परिणामस्वरूप वही भूमि एक साथ अन्न, ऊर्जा और पर्यावरण संरक्षण, तीनों की आवश्यकताओं की पूर्ति करती है। यही कारण है कि आज एग्रो-वोल्टिक्स को भविष्य की सतत कृषि और हरित ऊर्जा का एकीकृत मॉडल माना जा रहा है।</div><div><br></div><div>एग्रो-वोल्टिक्स के पीछे कार्य करने वाला वैज्ञानिक दर्शन जीवविज्ञान और भौतिकी के अत्यंत सूक्ष्म एवं अंतर-संबंधी सिद्धांतों पर आधारित है। साधारणतया यह माना जाता है कि पौधों को जितनी अधिक सूर्य की रोशनी मिलेगी, वे उतनी ही तेजी से वृद्धि करेंगे, परंतु वनस्पति विज्ञान के गहरे अध्ययन इस भ्रांति का निवारण करते हैं। जब सूर्य का प्रकाश और तापमान एक निश्चित सीमा से अधिक हो जाता है, तो अधिकांश पौधों में 'फोटो-इनहिबिशन' यानी प्रकाश-संश्लेषण में बाधा की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। तीव्र ऊष्मा के कारण पौधों की पत्तियाँ अपनी रक्षा के लिए रंध्रों को बंद कर लेती हैं, जिससे कार्बन डाइऑक्साइड का अवशोषण रुक जाता है और पौधों का विकास अवरुद्ध हो जाता है। सोलर पैनलों को जब एक वैज्ञानिक कोण और पारभासी दूरी पर स्थापित किया जाता है, तो वे नीचे उगाई जाने वाली फसलों के लिए एक रक्षात्मक छत्र का कार्य करते हैं। यह आंशिक छाया पौधों को भीषण ताप-लहरों, चिलचिलाती धूप, अत्यधिक वाष्पोत्सर्जन और ओलावृष्टि जैसे मौसमी जोखिमों से बचाती है। परिणामस्वरूप, खेत के धरातल पर एक अनुकूल सूक्ष्म-जलवायु निर्मित होती है, जहाँ मिट्टी की नमी लंबे समय तक संरक्षित रहती है। वैज्ञानिक अध्ययनों से यह सिद्ध हो चुका है कि एग्रो-वोल्टिक्स प्रणालियों के अंतर्गत कृषि में सिंचाई जल की खपत में तीस से चालीस प्रतिशत तक की अभूतपूर्व कमी आती है, जो भूजल के गिरते स्तर से जूझ रहे क्षेत्रों के लिए एक जीवनदायिनी क्रांति से कम नहीं है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/imbalanced-management-of-the-water-crisis-a-threat-looming-over-existence" target="_blank">जल संकट का असंतुलित प्रबंधन: अस्तित्व पर मंडराता खतरा</a></h3><div>इस अंतर-विषयक प्रणाली की सबसे बड़ी विशेषता इसका सह-जैविक और परस्पर पूरक होना है, जहाँ कृषि और सौर पैनल एक-दूसरे की कार्यक्षमता को बढ़ाते हैं। जहाँ एक ओर सोलर पैनल फसलों को अत्यधिक ऊष्मा से बचाकर उनकी पैदावार और गुणवत्ता की रक्षा करते हैं, वहीं दूसरी ओर फसलों के श्वसन और मिट्टी से निकलने वाली स्वाभाविक नमी से निर्मित सूक्ष्म-वातावरण ऊपर स्थित सोलर पैनलों के तापमान को नियंत्रित रखता है। सिलिकॉन-आधारित सौर पैनलों की यह तकनीकी विडंबना है कि जैसे-जैसे उनका तापमान बढ़ता है, उनकी बिजली उत्पादन करने की दक्षता घटने लगती है। नीचे फसलों की हरियाली और वाष्पोत्सर्जन प्रक्रिया के कारण सोलर पैनलों का धरातलीय तापमान पाँच से दस डिग्री सेल्सियस तक कम बना रहता है, जिससे उनकी विद्युत उत्पादन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की जाती है। विज्ञान और प्रकृति का यह अनूठा तालमेल न केवल ऊर्जा उत्पादन की दर को बढ़ाता है, बल्कि पैनलों की परिचालन अवधि को भी लंबा करता है।</div><div><br></div><div>सामाजिक और आर्थिक धरातल पर, एग्रो-वोल्टिक्स भारतीय कृषि की सबसे बड़ी कमजोरी—आय की अनिश्चितता—पर सीधा प्रहार करता है। सदियों से भारतीय किसान मानसून की अनिश्चितता, चक्रवात, सूखा और बाजार के उतार-चढ़ाव के बीच अनिश्चितता का जीवन जीने को मजबूर रहा है। एग्रो-वोल्टिक्स प्रणाली किसान को केवल 'अन्नदाता' के दायरे से निकालकर एक सशक्त 'ऊर्जादाता' के रूप में स्थापित करती है। सोलर पैनलों से उत्पादित अधिशेष बिजली को राज्य के विद्युत ग्रिडों को बेचकर या नेट-मीटरिंग नीतियों के तहत जमा करके किसान एक सुनिश्चित, मासिक और वर्षभर चलने वाली वित्तीय आय प्राप्त कर सकता है। यह सुनिश्चित आय प्राकृतिक आपदाओं के कारण फसल बर्बाद होने की स्थिति में किसान के लिए एक मजबूत आर्थिक सुरक्षा कवच का कार्य करती है। इसके अतिरिक्त, खेत में ही उत्पादित इस हरित ऊर्जा का उपयोग सिंचाई पंपों को चलाने, सौर चालित शीतगृहों (कोल्ड स्टोरेज) के संचालन और स्थानीय स्तर पर कृषि उत्पादों के प्रसंस्करण एवं पैकेजिंग में किया जा सकता है। इससे महंगे डीजल और अनिश्चित ग्रिड बिजली पर किसान की निर्भरता पूरी तरह समाप्त हो जाती है, जिससे खेती की परिचालन लागत में भारी कमी आती है और किसान का शुद्ध लाभांश कई गुना बढ़ जाता है।</div><div><br></div><div>एग्रो-वोल्टिक्स की सफलता का मुख्य आधार उपयुक्त फसलों का चयन और सुदृढ़ इंजीनियरिंग संरचना है। इस तकनीक के तहत सोलर पैनलों को भूमि से कम से कम आठ से दस फीट की ऊँचाई पर इस प्रकार स्थापित किया जाता है कि उनके नीचे ट्रैक्टर, कल्टीवेटर और अन्य आधुनिक कृषि यंत्रों का संचालन बिना किसी बाधा के हो सके। प्रकाश-छाया के इस संयोजन में आंशिक छाया को पसंद करने वाली फसलें जैसे टमाटर, मिर्च, बैंगन, आलू, गाजर, पत्तेदार सब्जियाँ, हल्दी, अदरक, और विविध औषधीय पौधे अत्यंत उत्कृष्ट पैदावार देते हैं। शुष्क और अर्ध-शुष्क इलाकों में केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान जैसे अग्रणी संस्थानों द्वारा किए गए व्यापक अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि यह तकनीक न केवल बंजर और कम उपजाऊ भूमि को पुनः कृषि योग्य बनाने की अपार क्षमता रखती है, बल्कि मरुस्थलीकरण की प्रक्रिया को रोकने और क्षरित भू-भागों के पारिस्थितिक पुनरुद्धार में भी निर्णायक भूमिका निभा सकती है।</div><div><br></div><div>यद्यपि एग्रो-वोल्टिक्स के लाभ अपरिमित हैं, फिर भी इसके व्यापक प्रसार के मार्ग में कुछ व्यावहारिक और नीतिगत चुनौतियाँ विद्यमान हैं। इस प्रणाली को स्थापित करने के लिए आवश्यक उच्च प्रारंभिक पूंजीगत लागत, उन्नत तकनीकी विशेषज्ञता का अभाव और स्थानीय स्तर पर कुशल श्रम की कमी इसके तीव्र अपनाने में मुख्य बाधाएँ हैं। इन चुनौतियों से निपटने के लिए एक बहुआयामी और दीर्घकालिक राष्ट्रीय नीति की आवश्यकता है। सरकार को प्राथमिकता के आधार पर एग्रो-वोल्टिक्स के लिए विशेष सब्सिडी योजनाएँ, रियायती बैंक ऋण, और आसान वित्तीय संरचनाएँ उपलब्ध करानी चाहिए। साथ ही, कृषि विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों के माध्यम से किसानों को क्षेत्रीय जलवायु और मिट्टी के अनुसार सही फसल पैटर्न और सौर संरचना के चयन हेतु निरंतर प्रशिक्षित किया जाना चाहिए।</div><div><br></div><div>निष्कर्षतः, एग्रो-वोल्टिक्स केवल एक नवीन कृषि पद्धति या ऊर्जा उत्पादन का माध्यम भर नहीं है, बल्कि यह इक्कीसवीं सदी की एक अनिवार्य आवश्यकता और दूरदर्शी दृष्टिकोण है। यह एक साथ तीन बड़े वैश्विक संकटों यथा- खाद्य असुरक्षा, ऊर्जा की बढ़ती माँग और पर्यावरण क्षरण का अति-वैज्ञानिक और टिकाऊ समाधान प्रदान करती है। जब देश का कृषक वर्ग एक ही खेत से खाद्यान्न और स्वच्छ ऊर्जा का दोहरा उत्पादन करेगा, तब न केवल ग्रामीण भारत की आर्थिक रीढ़ मजबूत होगी, बल्कि भारत कार्बन उत्सर्जन को कम करने और हरित ऊर्जा के वैश्विक लक्ष्यों को प्राप्त करने में दुनिया का नेतृत्व करेगा। एग्रो-वोल्टिक्स का यह वैज्ञानिक मॉडल निसंदेह एक समृद्ध, आत्मनिर्भर और पर्यावरण-अनुकूल भविष्य की मजबूत नीव रखने में पूरी तरह सक्षम है।</div><div><br></div><div>- डॉ दीपक कोहली,&nbsp;</div><div>विशेष सचिव, उत्तर प्रदेश शासन,&nbsp;</div><div>5/104, विपुल खंड,&nbsp;</div><div>गोमती नगर, लखनऊ- 226010</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 27 Jul 2026 12:50:58 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/agrivoltaics-an-integrated-scientific-model-for-food-energy-and-environmental-security</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[कारगिल के दुर्गम पर्वतों पर अदम्य साहस की अमर कहानी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/an-immortal-tale-of-indomitable-courage-on-the-rugged-mountains-of-kargil]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>देश कारगिल विजय दिवस की 27वीं वर्षगांठ मना रहा है। भारतीय सेना ने 26 जुलाई 1999 को कारगिल युद्ध में पाकिस्तानी फौज को बुरी तरह धूल चटाई थी। भारत-पाकिस्तान के बीच जम्मू कश्मीर के कारगिल जिले में हुआ वह युद्ध 60 दिनों तक चला था और पाकिस्तान फौज की करारी शिकस्त के बाद 26 जुलाई 1999 को समाप्त हुआ था। पाकिस्तान पर भारत की इस जीत को याद करते हुए 26 जुलाई को ‘कारगिल विजय दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। पाकिस्तानी सैनिकों और भाड़े के आतंकवादियों को मारकर या खदेड़कर कारगिल की चोटियों पर कब्जा करने के लिए चलाए गए ‘ऑपरेशन विजय’ के तहत तमाम बाधाओं को पार करते हुए हमारे वीर जांबाजों ने उन्हें कारगिल से खदेड़कर दुर्गम चोटियों पर जीत का परचम लहराया था लेकिन देश को इसकी बहुत भारी कीमत भी चुकानी पड़ी थी। दरअसल उस युद्ध में भारत को विजय दिलाने में भारतीय सेना के सैंकड़ों जवान शहीद हुए थे। कारगिल युद्ध में न केवल भारतीय सेना के 527 सैनिक शहीद हुए थे बल्कि दो महीने तक चले उस युद्ध के दौरान 453 आम नागरिक भी मारे गए थे। इसीलिए भारतीय सेना की उस विजय के बाद सरकार द्वारा प्रतिवर्ष 26 जुलाई को भारतीय सेना के शौर्य दिवस के रूप में कारगिल विजय दिवस मनाए जाने का फैसला लिया गया। सही मायनों में कारगिल विजय दिवस भारतीय सैनिकों के साहस और बलिदान को स्मरण करने तथा उनके बलिदान को सम्मान देने का दिन है और 26 जुलाई का दिन विशेष रूप से देश के इन्हीं वीर सपूतों को समर्पित है। देश के जन-जन तक कारगिल युद्ध के इन्हीं नायकों के शौर्य और पराक्रम की गाथा पहुंचाने के लिए ही यह दिवस मनाया जाता है।</div><div><br></div><div>1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद पहली बार कारगिल युद्ध हुआ था, जब दोनों देश सीधे तौर पर सैन्य संघर्ष में शामिल हुए थे। कारगिल युद्ध भारतीय सीमा क्षेत्र में पाकिस्तानी सैनिकों और कश्मीरी आतंकवादियों की घुसपैठ का ही परिणाम था। उस भीषण युद्ध में वायु शक्ति, तोपखाने और पैदल सेना के संचालन का व्यापक उपयोग किया गया था। युद्ध की खास बात यह थी कि वह युद्ध काफी ऊंचाई पर लड़ा गया था, जिसमें कुछ सैन्य चौकियां तो 18 हजार फुट से भी ज्यादा ऊंचाई पर स्थित थी। ऐसे में भारतीय सैनिकों के लिए वह लड़ाई बेहद चुनौतीपूर्ण थी लेकिन हमारे जांबाजों ने देश की आन-बान और शान के लिए अपने प्राणों की आहूति देकर न केवल पाकिस्तान को उसकी असली औकात दिखाई बल्कि 700 से भी ज्यादा पाकिस्तानी सैनिकों को मौत के घाट भी उतारा। दुश्मन को रणनीतिक स्थानों से हटाने के लिए महत्वपूर्ण हवाई हमले करते हुए भारतीय वायुसेना ने उस युद्ध के दौरान बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। भारतीय सेना ने युद्ध के दौरान टोलोलिंग, टाइगर हिल, प्वाइंट 4875 सहित अन्य रणनीतिक चोटियों पर फिर से कब्जा कर लिया था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/rajnath-singh-operation-vijay-not-merely-a-military-victory-it-wassaga-of-courage-and-patriotism" target="_blank">Rajnath Singh का बयान Operation Vijay सिर्फ़ सैन्य जीत नहीं, साहस और देशभक्ति का अध्याय था</a></h3><div>कारगिल युद्ध की शुरूआत 26 मई 1999 को भारतीय सेना के हवाई हमले के साथ हुई थी। दरअसल भारतीय सेना को 3 मई 1999 को कारगिल में स्थानीय चरवाहों द्वारा पाकिस्तानी सैनिकों और आतंकवादियों के बारे में सतर्क किया गया था और उसके दो ही दिन बाद 5 मई 1999 को पाकिस्तानी सैनिकों ने भारतीय सेना के कम से कम 5 जवानों को मार डाला था। उसके बाद 10 मई 1999 को भारतीय सेना द्वारा ‘ऑपरेशन विजय’ की शुरूआत की गई। उस दौरान कारगिल में पाकिस्तानी सेना ने भारतीय सेना के गोला-बारूद भंडार को निशाना बनाया। 26 मई को भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सैनिकों पर हवाई हमला किया। 27 मई को भारतीय वायुसेना का एक मिग-27 गिर गया, जिसमें चार क्रू सदस्यों की मौत हो गई लेकिन विमान से बाहर निकलने वाले पायलट को पाकिस्तानी सैनिकों ने युद्धबंदी के रूप में पकड़ लिया। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 31 मई 1999 को घोषणा की कि कारगिल में युद्ध जैसी स्थिति है, जिसके बाद अमेरिका, फ्रांस सहित कुछ देशों ने अगले ही दिन भारत के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराया। भारतीय सेना ने 5 जून 1999 को कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज जारी किए, जिनसे पूरी दुनिया के समक्ष पाकिस्तान की करतूत का खुलासा हुआ।</div><div><br></div><div>भारतीय सेना ने 9 जून 1999 को कारगिल के बटालिक सेक्टर में दो महत्वपूर्ण ठिकानों पर कब्जा कर लिया। अगले ही दिन पाकिस्तान ने जाट रेजिमेंट के 6 सैनिकों के शव क्षत-विक्षत हालत में भारत को लौटाए। 13 जून 1999 को भारत ने युद्ध की दिशा बदलते हुए महत्वपूर्ण टोलोलिंग चोटी पर भी कब्जा कर लिया और प्रधानमंत्री वाजपेयी ने कारगिल का दौरा किया। अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने 15 जून 1999 को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से पाकिस्तानी सैनिकों को पीछे हटाने का आग्रह किया लेकिन पाकिस्तान ने उस अपील को अनसुना कर दिया। 11 घंटे के भीषण संघर्ष के बाद भारतीय सेना ने 20 जून 1999 को टाइगर हिल के पास प्वाइंट 5060 और प्वाइंट 5100 पर भी पुनः कब्जा कर लिया। अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने 5 जुलाई 1999 को नवाज शरीफ से मुलाकात की, जिसके बाद पाकिस्तान ने कारगिल से पाकिस्तानी सैनिकों को हटाने की घोषणा की। 11 जुलाई 1999 को पाकिस्तानी सैनिकों ने पीछे हटना शुरू किया और भारतीय सेना ने बटालिक की प्रमुख चोटियों पर कब्जा कर लिया। भारतीय सेना ने 14 जुलाई 1999 को ‘ऑपरेशन विजय’ की सफलता की घोषणा की और 26 जुलाई 1999 को वीर 527 सैनिकों की शहादत के बाद कारगिल युद्ध समाप्त हुआ।</div><div><br></div><div>बहुत ऊंचाई पर लड़े गए उस भीषण युद्ध के दौरान अपनी बहादुरी और साहसिक कार्यों के लिए कई सैन्य अधिकारी राष्ट्रीय नायक बन गए, जिनमें 13 जेएके राइफल्स के कैप्टन विक्रम बत्रा, 18 ग्रेनेडियर्स के ग्रेनेडियर योगेन्द्र सिंह यादव, 1/11 गोरखा राइफल्स के लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडे, 18 ग्रेनेडियर्स के लेफ्टिनेंट बलवान सिंह, एएससी, 2 राज आरआईएफ के कैप्टन एन केंगुरुसे प्रमुख रूप से शामिल हैं। युद्ध के दौरान भारत सेना के अनेक नायकों ने अपने प्राणों की आहुति इसीलिए दी ताकि पूरा देश चैन की नींद सो सके। कारगिल युद्ध में शौर्य और पराक्रम के लिए ग्रेनेडियर योगेन्द्र सिंह यादव तथा लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडे को परमवीर चक्र और लेफ्टिनेंट बलवान सिंह को महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। कैप्टन एन केंगुरुसे को मरणोपरांत महावीर चक्र और कैप्टन विक्रम बत्रा को मरणोपरांत परमवीर चक्र प्रदान कर उनकी शहादत का सम्मान किया। कारगिल युद्ध के दौरान कैप्टन विक्रम बत्रा के शब्द, ‘ये दिल मांगे मोर’ तो अब भी लोगों के कानों में गूंजते हैं। कारगिल युद्ध के ऐसे ही वीर नायकों की बहादुरी, साहस और जुनून की कहानियां आज भी देश के प्रत्येक नागरिक के दिलोदिमाग में जोश भर देती हैं।</div><div><br></div><div>- योगेश कुमार गोयल</div><div>(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं)</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 25 Jul 2026 18:42:21 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/an-immortal-tale-of-indomitable-courage-on-the-rugged-mountains-of-kargil</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[स्व-देखभालः स्वस्थ व्यक्ति से विश्वकल्याण की भारतीय दृष्टि]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/self-care-the-indian-vision-of-global-well-being-through-the-healthy-individual]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>मानव सभ्यता के विकास के इस दौर में जितनी तीव्र गति से विज्ञान, तकनीक और भौतिक संसाधनों का विस्तार हुआ है, उतनी ही तेजी से मनुष्य तनाव, अवसाद, असंतुलित जीवनशैली और अनेक नई बीमारियों के जाल में भी उलझता गया है। विडम्बना यह है कि आज मनुष्य के पास संसार की लगभग हर वस्तु के लिए समय है, लेकिन स्वयं के लिए समय नहीं है। वह परिवार, समाज, व्यवसाय और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन तो कर रहा है, परंतु अपने शरीर, मन और आत्मा के प्रति उत्तरदायित्व को लगातार उपेक्षित करता जा रहा है। ऐसे समय में प्रतिवर्ष 24 जुलाई को मनाया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय स्व-देखभाल दिवस केवल स्वास्थ्य जागरूकता का अभियान नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित, सार्थक और मानवीय बनाने का वैश्विक संदेश है। यह दिवस हमें याद दिलाता है कि स्वस्थ समाज, समृद्ध राष्ट्र और शांतिपूर्ण विश्व का निर्माण तभी संभव है, जब प्रत्येक व्यक्ति स्वयं की देखभाल को अपना प्रथम कर्तव्य माने। इस दिवस की शुरुआत वर्ष 2011 में इंटरनेशनल सेल्फ-केयर फाउंडेशन ने की। स्व-देखभाल केवल किसी विशेष दिन या अवसर का विषय नहीं, बल्कि चौबीस घंटे और सप्ताह के सातों दिन अपनाई जाने वाली जीवनशैली है।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>स्व-देखभाल का अर्थ केवल बीमारी से बचना या समय-समय पर स्वास्थ्य जांच कराना नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ है-अपने शरीर, मन, भावनाओं, विचारों और आत्मा की समग्र सुरक्षा एवं संवर्धन करना। आज विश्व स्वास्थ्य संगठन भी इस तथ्य को स्वीकार करता है कि यदि व्यक्ति अपनी जीवनशैली को संतुलित बनाए, पौष्टिक भोजन ग्रहण करे, नियमित व्यायाम करे, मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखे और रोगों की रोकथाम को प्राथमिकता दे, तो स्वास्थ्य प्रणालियों पर अनावश्यक दबाव कम होगा और समाज अधिक स्वस्थ बनेगा। किंतु केवल चिकित्सकीय उपाय पर्याप्त नहीं हैं। मनुष्य का स्वास्थ्य तब तक पूर्ण नहीं हो सकता, जब तक उसके भीतर मानसिक संतुलन, नैतिक चेतना और आध्यात्मिक शांति का विकास न हो। वर्तमान समय की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि मनुष्य बाहर से जितना आधुनिक हुआ है, भीतर से उतना ही अशांत होता गया है। प्रतिस्पर्धा, उपभोगवाद और अनियंत्रित महत्वाकांक्षाओं ने जीवन की सहजता को छीन लिया है। तनाव अब केवल कार्यालयों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि परिवारों, विद्यालयों और बच्चों तक पहुँच गया है। यही कारण है कि आज मानसिक रोग, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हृदय रोग और अवसाद जैसी समस्याएँ वैश्विक चिंता का विषय बन चुकी हैं। ऐसे समय में स्व-देखभाल केवल व्यक्तिगत आवश्यकता नहीं, बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय दायित्व भी है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-role-of-tv-broadcasting-in-nation-building-is-crucial" target="_blank">टीवी प्रसारण की भूमिका राष्ट्र निर्माण में अहम</a></h3><div>भारत की दृष्टि से देखें तो स्व-देखभाल का विचार कोई नया नहीं है। यह हमारी सनातन सांस्कृतिक चेतना का अभिन्न अंग रहा है। भारत ने हजारों वर्ष पहले ही यह उद्घोष किया था-‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्’ अर्थात् शरीर ही सभी श्रेष्ठ कार्यों का प्रथम साधन है। भारतीय चिंतन ने स्वास्थ्य को केवल शरीर की निरोगता तक सीमित नहीं रखा, बल्कि मन, बुद्धि और आत्मा के संतुलन को भी स्वास्थ्य का अनिवार्य आधार माना। आयुर्वेद, योग, ध्यान, प्राणायाम, उपवास, संयम, अहिंसा और सात्त्विक जीवनशैली इसी समग्र दृष्टि के अंग हैं। यही कारण है कि भारत में स्वास्थ्य और अध्यात्म कभी अलग-अलग विषय नहीं रहे, बल्कि एक-दूसरे के पूरक रहे हैं। आज जब संपूर्ण विश्व योग को अपनाकर शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब यह स्मरण करना आवश्यक है कि योग केवल व्यायाम नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है। योग शरीर को स्वस्थ करता है, प्राणायाम मन को संतुलित करता है, ध्यान चेतना को निर्मल बनाता है और अध्यात्म जीवन को दिशा देता है। इसी प्रकार जैन दर्शन का संयम, अहिंसा, प्रेक्षाध्यान और आत्मनिरीक्षण, बौद्ध दर्शन का विपश्यना मार्ग तथा गीता का समत्व योग मनुष्य को भीतर से स्वस्थ बनाते हैं। भारत की यही आध्यात्मिक परंपरा आज विश्व के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुकी है।</div><div><br></div><div>यदि हम वास्तव में स्व-देखभाल को जीवन का हिस्सा बनाना चाहते हैं तो हमें इसे केवल स्वास्थ्य संबंधी गतिविधि न मानकर जीवन-दर्शन के रूप में स्वीकार करना होगा। प्रातःकाल का भ्रमण, नियमित योगाभ्यास, ध्यान, स्वाध्याय, आध्यात्मिक प्रवचनों का श्रवण, संतुलित एवं सात्त्विक भोजन, पर्याप्त नींद, डिजिटल उपकरणों के अत्यधिक उपयोग से बचाव, प्रकृति के साथ समय बिताना, स्व-संवाद, आत्म-साक्षात्कार तथा प्रतिदिन आत्मचिंतन-ये सभी स्व-देखभाल के ऐसे सूत्र हैं जो व्यक्ति को भीतर और बाहर दोनों स्तरों पर स्वस्थ बनाते हैं। यह जीवनशैली न केवल रोगों से बचाती है, बल्कि मनुष्य को सकारात्मक, करुणामय और संतुलित भी बनाती है। आज विकसित भारत का जो स्वप्न देश देख रहा है, उसकी आधारशिला केवल आर्थिक प्रगति नहीं हो सकती। यदि राष्ट्र को वास्तव में विकसित बनाना है तो उसके नागरिकों का स्वस्थ, अनुशासित, संस्कारित और जागरूक होना अनिवार्य है। बीमार और तनावग्रस्त समाज कभी समृद्ध राष्ट्र का निर्माण नहीं कर सकता। स्वस्थ नागरिक ही उत्पादक होंगे, रचनात्मक होंगे और राष्ट्र निर्माण में प्रभावी भूमिका निभा सकेंगे। इसलिए स्व-देखभाल को राष्ट्रीय विकास की रणनीति का भी एक महत्त्वपूर्ण अंग बनाया जाना चाहिए। विद्यालयों, महाविद्यालयों, कार्यस्थलों और सामाजिक संस्थाओं में योग, ध्यान, मानसिक स्वास्थ्य और जीवनशैली शिक्षा को व्यापक रूप से प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।</div><div><br></div><div>भारत आज विश्वगुरु बनने की दिशा में अग्रसर है। विश्वगुरु बनने का अर्थ केवल आर्थिक या सामरिक शक्ति प्राप्त करना नहीं, बल्कि मानवता को जीवन जीने की श्रेष्ठ दिशा देना है। भारत ने सदैव दुनिया को अहिंसा, करुणा, सह-अस्तित्व, योग और अध्यात्म का संदेश दिया है। आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत ‘स्व-देखभाल से विश्वकल्याण’क का नया मंत्र भी विश्व को दे। यदि भारत यह संदेश दे कि प्रत्येक व्यक्ति प्रतिदिन अपने शरीर, मन और आत्मा के लिए कुछ समय अवश्य निकाले, तो यह केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य का अभियान नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक शांति का आधार बन सकता है। अहिंसा का वास्तविक अर्थ केवल किसी दूसरे को कष्ट न देना नहीं है। स्वयं के शरीर और मन के साथ हिंसा करना भी अहिंसा के विरुद्ध है। अनियमित दिनचर्या, नशा, तनाव, क्रोध, असंयमित भोजन और प्रकृति के नियमों की उपेक्षा भी आत्म-हिंसा के ही रूप हैं। इसलिए स्व-देखभाल वास्तव में अहिंसा का प्रथम सोपान है। जो व्यक्ति स्वयं के प्रति संवेदनशील होगा, वही दूसरों के प्रति भी करुणाशील बनेगा। इस प्रकार स्व-देखभाल से परिवार में सौहार्द, समाज में सद्भाव और विश्व में शांति का वातावरण निर्मित हो सकता है।</div><div><br></div><div>आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, महामारी, मानसिक असंतुलन और जीवनशैली संबंधी रोगों जैसी अनेक चुनौतियों से जूझ रही है। इन समस्याओं का समाधान केवल अस्पतालों, दवाइयों और तकनीक से संभव नहीं है। इसके लिए जीवनशैली में परिवर्तन, आत्म-अनुशासन और आध्यात्मिक जागरण आवश्यक है। भारत के पास इस परिवर्तन का हजारों वर्षों का अनुभव और ज्ञान है। योग, आयुर्वेद, ध्यान, प्राकृतिक चिकित्सा, सात्त्विक आहार और आध्यात्मिक जीवन-दृष्टि भारत की ऐसी अमूल्य धरोहर हैं, जिन्हें यदि आधुनिक विज्ञान के साथ समन्वित रूप में विश्व के सामने प्रस्तुत किया जाए तो वे मानवता के लिए वरदान सिद्ध हो सकती हैं। अंतर्राष्ट्रीय स्व-देखभाल दिवस का वास्तविक संदेश भी यही है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने स्वास्थ्य का प्रथम संरक्षक स्वयं बने। चिकित्सक, अस्पताल और दवाइयाँ आवश्यक हैं, लेकिन वे तभी प्रभावी हो सकते हैं जब व्यक्ति स्वयं अपने जीवन के प्रति उत्तरदायी बने। प्रतिदिन कुछ समय शरीर के लिए योग, मन के लिए ध्यान, बुद्धि के लिए स्वाध्याय और आत्मा के लिए आध्यात्मिक चिंतन को समर्पित किया जाए तो जीवन की दिशा और दशा दोनों बदल सकती हैं।</div><div>आज आवश्यकता केवल ‘फिट इंडिया’ की नहीं, बल्कि ‘स्पिरिचुअली फिट इंडिया’, ‘मेंटली हेल्दी इंडिया’ और ‘कम्पैशनेट इंडिया’ के निर्माण की है। यही नया भारत होगा, यही विकसित भारत होगा और यही वह भारत होगा जो अपनी आध्यात्मिक ज्योति, योग की शक्ति, अहिंसा की संस्कृति और समग्र स्वास्थ्य के दर्शन से पूरी दुनिया का मार्गदर्शन करेगा। जब भारत से यह संदेश उठेगा कि ‘स्वयं को स्वस्थ बनाना ही विश्व को स्वस्थ बनाने की पहली शर्त है,’ तब वास्तव में अंतर्राष्ट्रीय स्व-देखभाल दिवस अपने उद्देश्य को प्राप्त करेगा और भारत विश्वगुरु के रूप में मानवता को केवल विकास का नहीं, बल्कि संतुलित, स्वस्थ, शांत और आध्यात्मिक जीवन का भी मार्ग दिखा सकेगा।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 24 Jul 2026 15:31:42 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/self-care-the-indian-vision-of-global-well-being-through-the-healthy-individual</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[आखिर कैसे थमेगा अमेरिका-ईरान युद्ध? कबतक राहत पाएगी दुनिया? समझिए]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/how-exactly-will-the-us-iran-conflict-end-how-long-will-the-world-have-to-wait-for-relief]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अमेरिका–ईरान संघर्ष केवल राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता नहीं है। इसमें धार्मिक पहचान, वैचारिक टकराव, क्षेत्रीय वर्चस्व, सुरक्षा हित और वैश्विक शक्ति-संतुलन जैसे अनेक आयाम जुड़े हुए हैं। इसलिए कई लोगों की दृष्टि में यह केवल दो देशों का विवाद नहीं, बल्कि प्रभाव और विचारधाराओं के टकराव का भी संघर्ष है। इसलिए दुनियावी लोगों के जेहन में सिर्फ एक सवाल सुलग रहा है कि आखिर कैसे थमेगा अमेरिका-ईरान युद्ध? और इसकी विकरालता से कबतक राहत पाएगी दुनिया? अमेरिका–ईरान संघर्ष अत्यंत जटिल और बार-बार उभरने वाला संकट क्यों बन चुका है? आखिर इस युद्ध में तो नागरिक ढांचे भी सुरक्षित क्यों नहीं बचे?</div><div><br></div><div>क्या अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार ऐसे किसी भी युद्ध को स्वतः "जायज" नहीं माना जा सकता? आइए इन्हें समझते हैं।</div><div><br></div><div>प्रथमदृष्टया जहां कुछ अंतर्राष्ट्रीय विश्लेषक अमेरिका–ईरान संघर्ष को धार्मिक, वैचारिक और भू-राजनीतिक (geopolitical) तत्वों का मिश्रण मानते हैं। वहीं अन्य विश्लेषक इसे मुख्यतः राष्ट्रीय सुरक्षा, परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय प्रभाव और शक्ति-संतुलन का संघर्ष मानते हैं। इसलिए अमेरिका–ईरान संघर्ष को केवल धर्मयुद्ध समझना इसकी जटिलता को कम करके देखना होगा। वास्तव में यह धर्म, विचारधारा, क्षेत्रीय वर्चस्व, राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक शक्ति-संतुलन—इन सभी का मिला-जुला संघर्ष है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/formidable-fighters-rally-in-support-of-iran-bab-el-mandeb-shut-dow" target="_blank">Iran के सपोर्ट में उतरे ऐसे खतरनाक लड़ाके, Bab-Al-Mandeb बंद,  MBS को अमेरिका बचा पाएगा?</a></h3><div>यदि गौर किया जाए तो जहां अमेरिका की नीतियाँ मुख्यतः राष्ट्रीय सुरक्षा, क्षेत्रीय रणनीति और परमाणु प्रसार को रोकने के तर्कों पर आधारित बताई जाती हैं, तो वहीं ईरान की राजनीतिक व्यवस्था में धार्मिक नेतृत्व की केंद्रीय भूमिका है, इसलिए उसके कुछ निर्णयों में धार्मिक विचारधारा का प्रभाव दिखाई देता है। लेकिन दोनों पक्षों के निर्णयों में आर्थिक, सामरिक और राजनीतिक हित भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।</div><div><br></div><div>जानकारों का कहना है कि अमेरिका–ईरान युद्ध तभी थमेगा, जब दोनों पक्ष यह समझ लें कि सैन्य जीत की कीमत राजनीतिक जीत से कहीं अधिक है। मौजूदा परिस्थितियों में युद्ध का स्थायी समाधान केवल कूटनीति, सुरक्षा गारंटी और चरणबद्ध समझौते से ही संभव दिखता है। हाल के दिनों में कई मध्यस्थ देशों ने 10-दिवसीय युद्धविराम और वार्ता का प्रस्ताव रखा है, लेकिन अभी तक दोनों पक्षों ने उस पर अंतिम सहमति नहीं दी है।&nbsp;</div><div><br></div><div>हमारी राय में युद्ध रोकने के लिए सबसे महत्वपूर्ण कदम होंगे: तत्काल और सत्यापित युद्धविराम, ओमान, कतर, पाकिस्तान या अन्य स्वीकार्य मध्यस्थों की मौजूदगी में प्रत्यक्ष या परोक्ष वार्ता, ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर पारदर्शी निगरानी और बदले में चरणबद्ध प्रतिबंधों में राहत,&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">होरमुज़ जलडमरूमध्य में सुरक्षित समुद्री आवागमन की गारंटी, ताकि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति सामान्य हो सके और दोनों पक्षों द्वारा क्षेत्रीय सहयोगी समूहों के माध्यम से संघर्ष को और न बढ़ाने की प्रतिबद्धता।&nbsp;</span></div><div><br></div><div>यदि युद्ध थमता है, तो दुनिया को कई मोर्चों पर राहत मिल सकती है: कच्चे तेल और गैस की कीमतों में स्थिरता आएगी, महंगाई और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव कम होगा, मध्य पूर्व में व्यापक क्षेत्रीय युद्ध का खतरा घटेगा, भारत सहित ऊर्जा आयातक देशों को आर्थिक राहत मिलेगी, वैश्विक वित्तीय बाजारों में अनिश्चितता कम होगी।&nbsp;</div><div><br></div><div>हालांकि सबसे बड़ी चुनौती भरोसे की कमी है। दोनों पक्ष एक-दूसरे पर पूर्व समझौतों के उल्लंघन का आरोप लगाते रहे हैं, इसलिए केवल युद्धविराम पर्याप्त नहीं होगा; उसके साथ ऐसा तंत्र भी चाहिए जो समझौते के पालन की स्वतंत्र निगरानी कर सके। हाल की घटनाओं से भी संकेत मिलता है कि युद्धविराम की कोशिशें बार-बार हिंसा बढ़ने से पटरी से उतर जाती हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>वस्तुतः अमेरिका–ईरान युद्ध का समाधान रणभूमि में नहीं, बल्कि वार्ता की मेज पर है। यदि दोनों पक्ष अपने अधिकतम राजनीतिक लक्ष्य छोड़कर न्यूनतम साझा हित—क्षेत्रीय स्थिरता, सुरक्षित समुद्री मार्ग और परमाणु जोखिम में कमी—पर सहमत होते हैं, तभी दुनिया को स्थायी राहत मिल सकेगी।</div><div><br></div><h2># अमेरिका–ईरान संघर्ष अत्यंत जटिल और बार-बार उभरने वाला संकट&nbsp;</h2><div><br></div><div>अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, अमेरिका–ईरान संघर्ष अत्यंत जटिल और बार-बार उभरने वाला संकट है। इसके लंबे समय तक बने रहने के प्रमुख कारण हैं: दोनों देशों के बीच दशकों पुराना अविश्वास, ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर विवाद, मध्य पूर्व में क्षेत्रीय प्रभाव की प्रतिस्पर्धा, आर्थिक प्रतिबंध, प्रतिरोधी कार्रवाइयाँ और प्रतिनिधि (proxy) समूहों की भूमिका और घरेलू राजनीति, जो कई बार समझौते को कठिन बना देती है।</div><div><br></div><div>फिर भी इतिहास बताता है कि लंबे और कटु संघर्ष भी अंततः बातचीत से समाप्त हुए हैं। अमेरिका और वियतनाम, अमेरिका और चीन, तथा शीत युद्ध के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ के संबंध समय के साथ बदले। इसलिए यह कहना कि यह संघर्ष कभी समाप्त नहीं हो सकता, उचित नहीं होगा। यदि दोनों पक्ष प्रत्यक्ष या परोक्ष संवाद बहाल करें, परमाणु मुद्दे पर सत्यापन योग्य समझौता करें, क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था पर सहमत हों, और बाहरी मध्यस्थों की भूमिका स्वीकार करें, तो तनाव में उल्लेखनीय कमी आ सकती है।</div><div><br></div><div>वास्तव में, अमेरिका–ईरान संघर्ष को "पुरानी और बार-बार भड़कने वाली बीमारी" कहना उचित है—जिसका इलाज कठिन है, लेकिन असंभव नहीं। युद्ध अंततः स्थायी समाधान नहीं देता; टिकाऊ समाधान कूटनीति, विश्वास-निर्माण और अंतरराष्ट्रीय कानून के सम्मान से ही निकलता है।</div><div><br></div><h2># आखिर इस युद्ध में तो नागरिक ढांचे भी सुरक्षित क्यों नहीं बचे?</h2><div><br></div><div>इस युद्ध का सबसे गंभीर और चिंताजनक पहलू यह है कि नागरिक ढांचे भी सुरक्षित नहीं बचे। कमोबेश दोनों पक्षों की ओर से गलतियां हुई हैं। अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून (International Humanitarian Law) के अनुसार अस्पताल, स्कूल, आवासीय क्षेत्र, बिजली, पानी और अन्य नागरिक ढांचे सामान्यतः संरक्षित होते हैं। लिहाजा किसी भी पक्ष को केवल सैन्य लक्ष्यों पर हमला करना चाहिए और नागरिकों को होने वाली क्षति को न्यूनतम रखने का दायित्व होता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>यदि किसी संघर्ष में नागरिक ढांचे पर हमले होते हैं, तो तीन महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न उठते हैं: क्या वह वास्तव में सैन्य लक्ष्य था? क्या हमले में अनुपातिकता (proportionality) का पालन किया गया? क्या नागरिकों को बचाने के लिए सभी संभव सावधानियां बरती गईं? हालिया रिपोर्टों में यह दावा किया गया है कि इस संघर्ष में पुलों, ऊर्जा ढांचे तथा अन्य नागरिक सुविधाओं को भी नुकसान पहुँचा है, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई है। वहीं कुछ मानवाधिकार संगठनों और विधि विशेषज्ञों ने स्कूलों, स्वास्थ्य केंद्रों और आवासीय क्षेत्रों पर हमलों की स्वतंत्र जांच की मांग की है।&nbsp;</div><div><br></div><div>इसी तरह, यदि ईरान द्वारा भी नागरिक क्षेत्रों, ऊर्जा या जल संयंत्रों अथवा अन्य असैन्य ढांचों को निशाना बनाया गया हो, तो वह भी अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का उल्लंघन माना जा सकता है। युद्ध के नियम दोनों पक्षों पर समान रूप से लागू होते हैं। इसलिए, नागरिक ढांचे का सुरक्षित न रहना किसी भी पक्ष के लिए स्वतः उचित नहीं ठहराया जा सकता। प्रत्येक कथित हमले की स्वतंत्र जांच आवश्यक होती है ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि कहीं युद्ध अपराध या अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन तो नहीं हुआ।</div><div><br></div><h2># क्या अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार ऐसे किसी भी युद्ध को स्वतः "जायज" नहीं माना जा सकता?</h2><div><br></div><div>यदि अमेरिका यह दावा करे कि उसने अपने ऊपर हुए आसन्न (imminent) हमले को रोकने के लिए आत्मरक्षा में कार्रवाई की, या संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 51 के तहत वैध आत्मरक्षा का अधिकार प्रयोग किया, तो वह युद्ध को कानूनी और नैतिक रूप से उचित ठहराने का प्रयास कर सकता है। दूसरी ओर, अनेक अंतरराष्ट्रीय विधि विशेषज्ञों का मत है कि यदि किसी सैन्य कार्रवाई को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अनुमति न मिली हो, और तत्काल आत्मरक्षा की शर्तें स्पष्ट रूप से पूरी न होती हों, तो ऐसी कार्रवाई संयुक्त राष्ट्र चार्टर के विरुद्ध मानी जा सकती है। 2026 के संघर्ष के संदर्भ में 100 से अधिक अंतरराष्ट्रीय कानून विशेषज्ञों ने अमेरिकी हमलों की वैधता पर गंभीर प्रश्न उठाए हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>साथ ही, यह भी महत्वपूर्ण है कि यदि ईरान जानबूझकर नागरिकों, तटस्थ देशों या असैन्य ढांचों पर हमला करता है, तो वह भी अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का उल्लंघन हो सकता है। युद्ध में दोनों पक्षों पर नागरिकों की सुरक्षा और युद्ध संबंधी नियमों (Law of Armed Conflict) का पालन करना अनिवार्य होता है। अलबत्ता अमेरिका–ईरान युद्ध को बिना शर्त "जायज" या "नाजायज" कहना उचित नहीं होगा। इसकी वैधता इस बात पर निर्भर करती है कि क्या आत्मरक्षा की कानूनी शर्तें वास्तव में पूरी हुई थीं? क्या संयुक्त राष्ट्र चार्टर का पालन किया गया? क्या युद्ध के दौरान अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का सम्मान किया गया? इसी कारण इस संघर्ष की वैधता आज भी अंतरराष्ट्रीय कानून और कूटनीति के विशेषज्ञों के बीच गहन बहस का विषय बनी हुई है।&nbsp;</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 23 Jul 2026 18:42:37 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/how-exactly-will-the-us-iran-conflict-end-how-long-will-the-world-have-to-wait-for-relief</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[टीवी प्रसारण की भूमिका राष्ट्र निर्माण में अहम]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-role-of-tv-broadcasting-in-nation-building-is-crucial]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत में ‘राष्ट्रीय प्रसारण दिवस’ प्रत्येक 23 जुलाई को मनाया जाता है। सूचना विधाओं के लिहाज से आज का दिन रेडियो क्रांति और प्रसारण का प्रतीक भी है। दिवस की शुरुआत वर्ष-1927 में हुई थी जिसका आज का 99 वां संस्करण है। सर्वविदित है कि 23 जुलाई 1927 को ‘इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी’ नाम से एक प्राइवेट संस्था ने ‘बॉम्बे रेडियो क्लब’ स्टेशन से हिंदुस्तान में पहला प्रसारण किया गया था जो ब्रिटिश औपनिवेशिक हुकूमत द्वारा लाइसेंस प्राप्त थी। कुछ वर्षों बाद 'ऑल इंडिया रेडियो' और फिर आकाशवाणी के रूप में स्थापित हुई। वैसे, विधिवत रूप से प्रसारण मंच का शुभारंभ 8 जून 1936 से हुआ था। इसी दिन से विविध भाषाओं, संस्कृतियों और विचारों को एक सूत्र में पिरोने का चलन आरंभ हुआ। आकाशवाणी का नाम प्रसिद्व रचनाधर्मी ‘एमबी गोपालस्वामी’ द्वारा दिया गया था, जो संस्कृत शब्द से गढ़ा गया था। जिसका शाब्दिक मतलब होता है ‘आकाश से आवाज’। इस शब्द को आधिकारिक रूप से 1935 में मैसूर में भारत के पहले निजी रेडियो स्टेशन की स्थापना के वक्त इस्तेमाल हुआ, जिसे बाद में भारत सरकार ने सार्वजनिक और आधिकारिक रूप से सरकारी रेडियो के लिए प्रयोग किया।</div><div>&nbsp;&nbsp;</div><div>प्रसार भारती के नाम से प्रचलित भारतीय प्रसारण तंत्र आज विश्व का बससे बड़ा ब्राॅडकास्ट डिविजन है। 15 सिंतबर 1959 को, दिल्ली स्थित आॅल इंडिया रेडियो के स्टूडियों में, भारत का पहला टीवी चैनल शुरू किया गया था जो आज ‘दूरदर्शन’ यानी डीडी न्यूज के नाम से प्रसिद्व है। प्रसारण के विस्तार पर अगर नजर डालें, तो वर्तमान में आकाशवाणी के कुल 591 रेडियो के्रंद्र और प्रसारण के 230 स्टेशन संचालित हैं। वहीं, सूचना एंव प्रसारण मंत्रालय के नवीनतम आंकड़ो के अनुसार, भारत में इस समय 908 निजी सैटेलाइट टीवी न्यूज चैनल सार्वजनिक प्रसारण सेवा में हैं। इनमें 40 फीसदी यानी करीब 350-400 के बीच केवल समाचार श्रेणी के हैं, जो हिंदी, अंग्रेजी के अलावा विभिन्न राज्यस्तरीय भाषाओं में संचालित हैं। निजी प्रसारण में आगमन सबसे पहले 1992 में ‘जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज’ से हुआ, उसके बाद तो निजी क्षेत्र में प्रसारणों की बाढ़ आ गई। करीब 3 हजार से अधिक नए लाइसेंसों के लिए मंत्रालय में आवेदन आवेदित हैं।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/national-flag-an-immortal-symbol-of-the-nation-integrity" target="_blank">राष्ट्रीय ध्वज: राष्ट्र की अखंडता का अमर प्रतीक</a></h3><div>भारत में प्रसारण का कलर 25 अप्रैल 1982 में बदला गया। यहीं से रंगीन टीवी की शुरुआत हुई, वरना इससे पहले तक पर्दा सफेद ही था। ये वह वक्त था जब दिल्ली में एशियाई खेलों का महाकुंभ आरंभ होना था। तब तेजी से वैश्विक स्तर पर मांग उठ रही थी कि खेलों का प्रसारण रंगीन पर्दे पर किया जाए। इसके बाद ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ के दौर का अंत हुआ और टीवी का पर्दा रातों-रात कलरफुल हो गया। टीवी प्रसारण का मतलब होता है ऑडियो और वीडियो सामग्री को विधुत चुम्बकीय तरंगों जैसे केबल, सैटेलाइट या इंटरनेट के जरिए जन जन तक पहुंचाना। प्रसारण आज के समय में सभी के जीवन का हिस्सा बन गया है। प्रसारण ऐसी संचार प्रणाली है जो दर्शकों को घर बैठे न्यूज से लेकर मनोरंजन के सभी माध्यमों को परोसता है। हालांकि, तकनीकी विकास के साथ प्रसारण विधाओं में काफी बदलाव हुआ है। अब दर्शक केबल या सैटेलाइट यंत्रों पर ही निर्भर नहीं रहते। दर्शक डाटा खर्च करके मोबाइल से ही हर प्रकार के प्रसारण का लुफ्त उठा लेते हैं। फिर चाहे, मैच हो या समाचार।</div><div>&nbsp;&nbsp;</div><div>प्रसारण के क्षेत्र में अब इंटरनेट, डिजिटल और ओटीटी ने और विस्तार कर दिया है। सरकार सालाना प्रसारण से विज्ञापनों और फ्रीडिश से करीब 1200 से 1600 करोड़ रूपए कमाती है। वित्त वर्ष 2024-25 में प्रसार भारती का कुल राजस्व 1643 करोड़ था जिसमें से प्रमुख हिस्सा सरकारी डीटीएच प्लेटफार्म का था। साल 2025 के शीतकालीन सत्र में लोकसभा में सूचना एंव प्रसारण मंत्रालय द्वारा बताया गया था कि आॅल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन ने निजी विज्ञापनों से तीन साल यानी 2022 से 2025 के बीच कुल 587.78 करोड़ कमाए। वहीं, 2025-2026 के अतं तक 650 करोड़ कमाने का लक्ष्य प्रसार भारती ने रखा हुआ है। ये ऐसा लक्ष्य है जिसे भी आसानी से हासिल किया जा सकता है।</div><div><br></div><div>राष्ट्र निर्माण में प्रसारण की जो स्वर्णिम यात्रा सदियों पहले आरंभ हुई थी वह आज भी निरंतर जारी है। प्रसारण का क्षेत्र जनमानस के मन के तारों को छूता है। प्रसारण के जरिए ही बदलती तकनीकों के साथ संवाद भी निरंतर जारी हैं। केंद्र सरकार ने फ्री और निशुल्क चैनलों का वर्गीकरण भी बीते कुछ सालों से किया है, ताकि कोई भी दर्शक प्रसारण के रस से अछूता न रहे। ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’ ऐसा प्रसारण नारा है जिसमें किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाता। प्रसारण परिंदों की भांति है जिसकी कोई सीमा और बंदिशें नहीं? केंद्र सरकार प्रसारण में नए रस घोलने के लिए हमेशा कुछ न कुछ बदलाव करती है। मंनोरंजन के नए-नए कार्यक्रमों का शुभारंभ और समाचार की प्रस्तुतीकरण में समय-समय पर बदलाव किया जाता है, ताकी दर्शक बोर न हों। वर्ष-2012 से भारत सरकार ने मनोरंजन, समाचार, खेल, खेतीबाड़ी आदि क्षेत्रों में प्रसारण के विस्तार को बढ़ाया हैं। फ्री-डिश बिना किसी मासिक शुल्क के करीब 400 से अधिक चैनल शहरी-ग्रामीण दर्शकों को मुहैया करवाता है। यही कारण है भारतीय प्रसारण आज विश्व का बससे बड़ा प्रसारण क्षेत्र बनकर उभरा है।</div><div><br></div><div>- डॉ. रमेश ठाकुर</div><div>सदस्य, राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान (NIPCCD), भारत सरकार!</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 23 Jul 2026 12:43:11 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-role-of-tv-broadcasting-in-nation-building-is-crucial</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[राष्ट्रीय ध्वज: राष्ट्र की अखंडता का अमर प्रतीक]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/national-flag-an-immortal-symbol-of-the-nation-integrity]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>राष्ट्रीय ध्वज किसी भी राष्ट्र का सबसे गौरवपूर्ण प्रतीक होता है। वह केवल रंगों से सजा हुआ एक वस्त्र नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की सामूहिक चेतना, उनके संघर्ष, उनके बलिदान, उनकी संस्कृति और उनके भविष्य के सपनों का सजीव स्वरूप होता है। जब कोई राष्ट्र अपने ध्वज को सम्मानपूर्वक फहराता है, तब वह केवल एक झंडा नहीं लहराता, बल्कि अपने इतिहास, अपने स्वाभिमान और अपनी राष्ट्रीय अस्मिता को विश्व के समक्ष प्रतिष्ठित करता है। भारत में हर साल 22 जुलाई को राष्ट्रीय ध्वज दिवस मनाया जाता है। इस दिन को मनाने का मुख्य कारण यह है कि 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा द्वारा स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय ध्वज (तिरंगे) को आधिकारिक रूप से अपनाया गया था। यह दिवस हमें अपने राष्ट्रीय गौरव, स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान और ध्वज रूपी प्रतीक-जैसे साहस, शांति और समृद्धि की याद दिलाता है। भारत का तिरंगा भी इसी गौरव, त्याग, एकता और आत्मविश्वास का प्रतीक है। इसकी प्रत्येक लहराती हुई धारा स्वतंत्रता संग्राम के उन असंख्य ज्ञात-अज्ञात वीरों की स्मृति को जीवित करती है, जिन्होंने अपने प्राणों का उत्सर्ग कर इस ध्वज को सम्मान दिलाया। भारतीय राष्ट्रीय ध्वज हमारे संविधान की मूल भावना, लोकतांत्रिक मूल्यों और विविधता में एकता की महान परंपरा का प्रतिनिधि है। भारत अनेक भाषाओं, धर्मों, संस्कृतियों और परंपराओं वाला विशाल देश है, लेकिन जब तिरंगा आकाश में लहराता है तो सारी विविधताएं एक राष्ट्रीय पहचान में समाहित हो जाती हैं। यही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। वह हमें यह स्मरण कराता है कि हमारी व्यक्तिगत पहचान से ऊपर हमारी राष्ट्रीय पहचान है और राष्ट्र सर्वोपरि है।</div><div><br></div><div>राष्ट्रीय ध्वज का महत्व केवल राष्ट्रीय पर्वों तक सीमित नहीं है। यह प्रत्येक नागरिक के जीवन में राष्ट्रभक्ति, अनुशासन और कर्तव्यबोध का संस्कार जगाने वाला प्रेरणा-स्रोत है। विद्यालयों में ध्वजारोहण, सेना के शिविरों में तिरंगे को सलामी, खिलाड़ियों द्वारा अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में तिरंगे के साथ विजय-उत्सव तथा वैज्ञानिकों द्वारा अंतरिक्ष अभियानों में राष्ट्रीय ध्वज का प्रदर्शन-ये सभी दृश्य हमें यह अनुभव कराते हैं कि ध्वज केवल एक प्रतीक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय गौरव की जीवंत अभिव्यक्ति है। भारतीय तिरंगे का प्रत्येक रंग अपने भीतर एक गहन संदेश समेटे हुए है। केसरिया रंग हमें त्याग, साहस और निस्वार्थ नेतृत्व की प्रेरणा देता है। यह बताता है कि राष्ट्र के निर्माण में व्यक्तिगत स्वार्थों का नहीं, बल्कि समर्पण और बलिदान का महत्व है। सफेद रंग सत्य, शांति और पारदर्शिता का प्रतीक है। यह हमें जीवन और शासन दोनों में नैतिकता तथा सद्भाव बनाए रखने का संदेश देता है। हरा रंग समृद्धि, प्रकृति, कृषि और विकास का प्रतीक है, जो भारत की जीवनदायिनी धरती और उसके उज्ज्वल भविष्य की ओर संकेत करता है। इन तीनों रंगों के मध्य स्थित गहरे नीले रंग का अशोक चक्र गतिशीलता, न्याय, धर्म और सतत प्रगति का संदेश देता है। यह हमें याद दिलाता है कि ठहराव मृत्यु है और निरंतर आगे बढ़ना ही जीवन का नियम है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/trending/indian-mangoes-hit-in-global-market-find-out-why-july-22nd-special" target="_blank">National Mango Day 2026: Global Market में भारतीय आम का जलवा, जानिए क्यों खास है 22 July का यह दिन</a></h3><div>राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि वह केवल वर्तमान पीढ़ी का नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की राष्ट्रीय चेतना का आधार है। यदि किसी समाज में राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान कम होने लगे, तो धीरे-धीरे राष्ट्रीय एकता, सामाजिक विश्वास और सामूहिक उत्तरदायित्व भी कमजोर होने लगते हैं। राष्ट्र पहले भावनाओं से जुड़ता है, बाद में व्यवस्थाओं से। राष्ट्रीय ध्वज उन्हीं भावनाओं का सबसे शक्तिशाली माध्यम है। दुर्भाग्य की बात है कि समय-समय पर कुछ सामाजिक और राजनीतिक तत्व अपने तात्कालिक स्वार्थों, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा या वैचारिक कटुता के कारण राष्ट्रीय प्रतीकों को विवाद का विषय बना देते हैं। कभी राष्ट्रीय ध्वज को राजनीतिक मंचों पर अनावश्यक विवादों में घसीटा जाता है, कभी उसकी गरिमा को कम करने वाले वक्तव्य दिए जाते हैं और कभी उसे केवल दलगत दृष्टि से देखने का प्रयास किया जाता है। यह प्रवृत्ति अत्यंत चिंताजनक है, क्योंकि राष्ट्रीय प्रतीक किसी दल, सरकार या विचारधारा के नहीं होते, वे पूरे राष्ट्र की साझा धरोहर होते हैं। सरकारें बदलती रहती हैं, राजनीतिक दल आते-जाते रहते हैं, लेकिन राष्ट्रीय ध्वज सदैव राष्ट्र की स्थायी पहचान बना रहता है।</div><div><br></div><div>जब राष्ट्रीय प्रतीकों का उपयोग राजनीतिक लाभ या विरोध का माध्यम बन जाता है, तब सबसे अधिक क्षति राष्ट्र की सामूहिक चेतना को होती है। लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करना नागरिक का अधिकार है, नीतियों पर प्रश्न उठाना स्वस्थ परंपरा है, किंतु राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रगान, संविधान और अन्य राष्ट्रीय प्रतीकों को विवाद का विषय बनाना लोकतांत्रिक मर्यादाओं के विपरीत है। राजनीतिक मतभेद राष्ट्रभक्ति के स्थान पर नहीं आ सकते। राष्ट्र से ऊपर कोई दल, कोई नेता और कोई विचारधारा नहीं हो सकती। कुछ लोग यह भूल जाते हैं कि राष्ट्रीय ध्वज पर आक्षेप वास्तव में उन लाखों बलिदानों का अनादर है, जिनके कारण यह ध्वज आज स्वतंत्र आकाश में लहरा रहा है। भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, महात्मा गांधी, सरदार पटेल, रानी लक्ष्मीबाई और असंख्य स्वतंत्रता सेनानियों का संघर्ष किसी दल के लिए नहीं, बल्कि इसी तिरंगे के सम्मान के लिए था। इसलिए राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान करना केवल संवैधानिक दायित्व नहीं, बल्कि ऐतिहासिक उत्तरदायित्व भी है। आज आवश्यकता इस बात की है कि राष्ट्रीय ध्वज के प्रति सम्मान केवल औपचारिक अवसरों तक सीमित न रहे। यह हमारे व्यवहार, विचार और सार्वजनिक जीवन का स्थायी संस्कार बने। विद्यालयों में राष्ट्रीय ध्वज के इतिहास और उसके मूल्यों का समुचित अध्ययन कराया जाए। युवाओं को यह बताया जाए कि तिरंगा केवल स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस का प्रतीक नहीं, बल्कि प्रत्येक दिन राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व का स्मरण कराने वाला प्रेरक ध्वज है। सामाजिक संगठनों, सांस्कृतिक संस्थाओं और मीडिया को भी इस दिशा में सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए।</div><div><br></div><div>आज डिजिटल युग में भी राष्ट्रीय ध्वज का महत्व और बढ़ गया है। सोशल मीडिया पर उसकी गरिमा बनाए रखना, उसके उपयोग में संवैधानिक मर्यादाओं का पालन करना और राष्ट्रीय प्रतीकों को राजनीतिक प्रचार का साधन न बनने देना हम सभी का दायित्व है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की आत्मा है, लेकिन स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। राष्ट्रीय सम्मान की रक्षा उसी जिम्मेदारी का सर्वोच्च स्वरूप है। राष्ट्रीय ध्वज हमें यह भी सिखाता है कि सच्चा राष्ट्रप्रेम केवल नारों में नहीं, बल्कि आचरण में दिखाई देता है। ईमानदारी से अपना कार्य करना, कानून का पालन करना, सामाजिक सौहार्द बनाए रखना, पर्यावरण की रक्षा करना, करों का ईमानदारी से भुगतान करना, समाज के कमजोर वर्गों के प्रति संवेदनशील रहना और राष्ट्रहित को व्यक्तिगत हित से ऊपर रखना-ये सभी तिरंगे के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि हैं। केवल ध्वज फहराना पर्याप्त नहीं, उसके आदर्शों को जीवन में उतारना अधिक आवश्यक है।</div><div><br></div><div>भारत आज विश्व मंच पर नई ऊंचाइयों की ओर अग्रसर है। विज्ञान, प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, खेल, अर्थव्यवस्था और कूटनीति के क्षेत्र में भारत की उपलब्धियां तिरंगे की प्रतिष्ठा को और ऊंचा कर रही हैं। जब भारतीय वैज्ञानिक चंद्रमा पर सफलता का इतिहास रचते हैं, जब कोई खिलाड़ी ओलंपिक में तिरंगा लहराता है, जब सेना का जवान सीमा पर तिरंगे की रक्षा करते हुए अपना सर्वोच्च बलिदान देता है, तब यह स्पष्ट हो जाता है कि राष्ट्रीय ध्वज केवल कपड़े का एक टुकड़ा नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की आशाओं, आकांक्षाओं और आत्मगौरव का अमर प्रतीक है। अंततः राष्ट्रीय ध्वज हमारी राष्ट्रीय आत्मा का दृश्य रूप है। वह हमें जोड़ता है, प्रेरित करता है और यह विश्वास दिलाता है कि मतभेदों के बावजूद हम एक हैं। उसकी गरिमा की रक्षा करना केवल सरकार का नहीं, प्रत्येक नागरिक का नैतिक और राष्ट्रीय दायित्व है। जिस दिन प्रत्येक भारतीय यह समझ लेगा कि तिरंगे का सम्मान वास्तव में अपने राष्ट्र, अपने इतिहास और अपने भविष्य का सम्मान है, उस दिन राष्ट्रीय एकता और लोकतांत्रिक चेतना की जड़ें और अधिक सुदृढ़ होंगी। तिरंगा हमारी आन है, हमारी बान है, हमारी शान है और हमारे अमर राष्ट्रीय स्वाभिमान का सर्वोच्च प्रतीक है। इसकी प्रतिष्ठा में ही भारत की प्रतिष्ठा निहित है।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 22 Jul 2026 12:21:08 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/national-flag-an-immortal-symbol-of-the-nation-integrity</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[संवाद से ही सुलझेगा युवा असंतोष]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/dialogue-alone-will-resolve-youth-discontent]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>18 जुलाई को दिल्ली के जंतर-मंतर पर जो कुछ हुआ, उसने लोकतंत्र के चेहरे पर कई असहज सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर शांतिपूर्ण, संवैधानिक और नैतिक विरोध के प्रतीक के तौर पर वैज्ञानिक, नवाचारकर्ता और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक आमरण अनशन पर बैठे थे तो दूसरी ओर राज्य की शक्ति का वह रूप सामने आया, जिसने संवाद की जगह बल प्रयोग को प्राथमिकता दी। जिस तरह से उन्हें सफेद चादर में लपेटकर पुलिस द्वारा जबरन उठाकर अस्पताल ले जाया गया, वह दृश्य केवल एक व्यक्ति के साथ हुई कार्रवाई नहीं थी बल्कि उस पूरी सोच का प्रतीक था, जिसमें असहमति को समस्या मान लिया गया है। सरकार का यह अनुमान कि वांगचुक को हटाने के बाद आंदोलन स्वतः समाप्त हो जाएगा, एक गंभीर राजनीतिक भूल साबित हुआ। इसके विपरीत, इस कार्रवाई ने युवाओं के भीतर दबी हुई असंतोष की आग को हवा दे दी। यह केवल एक भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं थी बल्कि उस गहरे अविश्वास का परिणाम थी, जो पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न मुद्दों पर लगातार पनपता रहा है। जब एक शांतिपूर्ण आंदोलन को इस तरह कुचलने का प्रयास किया जाता है तो यह संदेश जाता है कि सरकार संवाद के बजाय दमन को अधिक प्रभावी मानती है।</div><div><br></div><div>लोकतंत्र का मूल तत्व यह है कि नागरिकों को अपनी बात कहने, विरोध करने और अपनी मांगों के लिए शांतिपूर्वक संघर्ष करने का अधिकार हो। यह अधिकार केवल संविधान की किताबों तक सीमित नहीं रहना चाहिए बल्कि उसका सम्मान व्यवहार में भी होना चाहिए। जब तक कोई आंदोलन हिंसक नहीं होता, तब तक उसे दबाने के बजाय समझने और समाधान निकालने की कोशिश होनी चाहिए। लेकिन जंतर-मंतर की घटना ने यह संकेत दिया कि सरकार इस बुनियादी सिद्धांत से दूर होती जा रही है। इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू युवाओं की प्रतिक्रिया है। आज का युवा केवल भावनाओं से नहीं बल्कि सूचनाओं और जागरूकता से संचालित होता है। वह हर घटना को देखता है, उसका विश्लेषण करता है और फिर अपनी प्रतिक्रिया देता है। सोनम वांगचुक के साथ हुई घटना ने युवाओं को महसूस कराया कि उनकी आवाज को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। यही कारण है कि ‘चलो संसद’ के आह्वान को अभूतपूर्व समर्थन मिला।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/the-truth-behind-the-masks-at-jantar-mantar" target="_blank">जंतर-मंतर के मुखौटों के पीछे का सच !</a></h3><div>यहां यह समझना भी जरूरी है कि यह आक्रोश केवल एक घटना का परिणाम नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में बार-बार पेपर लीक, परीक्षाओं में अनियमितताएं और परिणामों में कथित धांधली ने छात्रों के भविष्य को अस्थिर कर दिया है। नीट जैसी प्रतिष्ठित परीक्षा, जिस पर लाखों छात्रों का करियर निर्भर करता है, उसमें भी पारदर्शिता पर सवाल उठना बेहद गंभीर मामला है। जब बार-बार ऐसी घटनाएं सामने आती हैं और उनके समाधान में देरी या अस्पष्टता दिखाई देती है तो युवाओं का विश्वास डगमगाना स्वाभाविक है। यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों से छात्र आत्महत्या के मामले भी बढ़ रहे हैं। छात्र और युवा जब ऐसे में अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरते हैं तो उन्हें केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा मानकर नहीं देखा जाना चाहिए। यह एक सामाजिक और मनोवैज्ञानिक संकट का संकेत है। यदि सरकार इस संकेत को समझने में विफल रहती है तो यह असंतोष भविष्य में और अधिक व्यापक रूप ले सकता है। शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर हो रहे विरोध प्रदर्शनों पर सरकार का कठोर रुख भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।</div><div><br></div><div>किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में जवाबदेही एक अनिवार्य तत्व होती है। यदि किसी प्रणाली में बार-बार खामियां सामने आती हैं तो जिम्मेदारी तय करना और सुधार के ठोस कदम उठाना आवश्यक होता है लेकिन जब सरकार इन मांगों को नजरअंदाज करती है या उन्हें राजनीतिक रंग देकर खारिज कर देती है तो यह युवाओं के बीच निराशा और गुस्से को और बढ़ाता है। सोनम वांगचुक जैसे व्यक्ति, जिनकी छवि एक शांत, सकारात्मक और समाधान-उन्मुख कार्यकर्ता की रही है, उनके साथ इस तरह का व्यवहार और भी अधिक चिंताजनक है। यह केवल एक व्यक्ति का अपमान नहीं बल्कि उन मूल्यों का भी अपमान है, जिनका वे प्रतिनिधित्व करते हैं। यदि ऐसे व्यक्तियों के साथ भी संवाद के बजाय बल प्रयोग का रास्ता अपनाया जाएगा तो आम नागरिक को क्या संदेश जाएगा? यह भी ध्यान देने योग्य है कि अदालत ने यदि अनशन को समाप्त कराने के निर्देश दिए भी थे तो उसका पालन मानवीय और गरिमापूर्ण तरीके से भी किया जा सकता था। किसी भी व्यक्ति के साथ इस तरह का व्यवहार, जिसमें उसकी गरिमा को ठेस पहुंचे, लोकतांत्रिक मर्यादाओं के अनुरूप नहीं कहा जा सकता। कानून का पालन आवश्यक है लेकिन उसका क्रियान्वयन भी उतना ही संवेदनशील और मानवीय होना चाहिए।</div><div><br></div><div>20 जुलाई को ‘चलो संसद’ के दौरान जो कुछ हुआ, उसने इस पूरे संकट को और गहरा कर दिया। युवाओं पर बल प्रयोग, उन्हें रोकने के लिए कठोर उपाय और उनके आक्रोश को नियंत्रित करने की कोशिशें यह दर्शाती हैं कि सरकार समस्या के मूल कारणों को समझने के बजाय उसके लक्षणों से लड़ रही है। यह रणनीति अल्पकालिक रूप से भले ही व्यवस्था बनाए रखने में सहायक हो लेकिन दीर्घकालिक रूप से यह असंतोष को और बढ़ाती है। सवाल यह है कि इस स्थिति का समाधान क्या है? सबसे पहले, सरकार को यह स्वीकार करना होगा कि समस्या वास्तविक है और उसे केवल राजनीतिक विरोध के रूप में नहीं देखा जा सकता। संवाद की प्रक्रिया को तुरंत शुरू करना होगा, जिसमें आंदोलनकारियों, छात्रों और विशेषज्ञों को शामिल किया जाए। केवल औपचारिक बैठकों से काम नहीं चलेगा बल्कि ठोस और समयबद्ध समाधान प्रस्तुत करने होंगे। दूसरा, शिक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए ठोस सुधार आवश्यक हैं। परीक्षाओं की सुरक्षा, मूल्यांकन की निष्पक्षता और परिणामों की विश्वसनीयता को लेकर जो संदेह पैदा हुए हैं, उन्हें दूर करना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए। इसके लिए तकनीकी उपायों के साथ-साथ प्रशासनिक सुधार भी जरूरी हैं। तीसरा, कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर अनावश्यक बल प्रयोग से बचना होगा। लोकतंत्र में असहमति को स्थान देना ही उसकी ताकत होती है। यदि हर विरोध को दबाने की कोशिश की जाएगी तो यह लोकतंत्र को कमजोर ही करेगा। सरकार को यह समझना होगा कि असहमति दुश्मनी नहीं होती बल्कि सुधार का अवसर होती है। चौथा, युवाओं के साथ विश्वास का रिश्ता फिर से स्थापित करना होगा। इसके लिए केवल घोषणाएं या बयान पर्याप्त नहीं होंगे, ठोस कार्यवाही और परिणाम दिखाने होंगे। जब युवा यह महसूस करेंगे कि उनकी बात सुनी जा रही है और उस पर कार्रवाई हो रही है, तभी उनका विश्वास लौटेगा।</div><div><br></div><div>अंततः, यह समय सरकार और समाज दोनों के लिए आत्ममंथन का है। क्या हम एक ऐसे लोकतंत्र की ओर बढ़ रहे हैं, जहां असहमति को दबाया जाता है या एक ऐसे लोकतंत्र की ओर, जहां हर आवाज को सम्मान मिलता है? यह निर्णय केवल नीतियों से नहीं बल्कि व्यवहार से तय होगा। सोनम वांगचुक के साथ हुई घटना और उसके बाद का घटनाक्रम एक चेतावनी है कि यदि इसे समय रहते नहीं समझा गया तो यह केवल एक आंदोलन तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि एक व्यापक जन असंतोष में बदल सकता है। लोकतंत्र की असली ताकत सत्ता में नहीं बल्कि जनता के विश्वास में होती है। यदि यह विश्वास कमजोर पड़ता है तो सबसे बड़ी हार सत्ता की ही होती है। अब भी समय है कि सरकार संवाद, संवेदनशीलता और समाधान का रास्ता चुने क्योंकि लोकतंत्र में जीत उसी की होती है, जो अपने नागरिकों को साथ लेकर चलता है, न कि उन्हें चुप कराकर।</div><div><br></div><div>- योगेश कुमार गोयल</div><div>(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं)</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 21 Jul 2026 17:11:32 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/dialogue-alone-will-resolve-youth-discontent</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[सदियों पुरानी परंपरा का जीवंत उत्सव है जगन्नाथ रथ यात्रा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-jagannath-rath-yatra-is-a-vibrant-celebration-of-a-centuries-old-tradition]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएं अनादि काल से मानवता को आध्यात्मिकता, समरसता और भक्ति की राह पर चलने की प्रेरणा देती आई हैं। इन्हीं पवित्र परंपराओं में एक है उड़ीसा के पुरी में निकलने वाली जगन्नाथ रथ यात्रा, जो केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं बल्कि करोड़ों आस्थाओं, परंपराओं और लोक मान्यताओं का प्रतीक है। हिंदू पंचांग के अनुसार, आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि से शुरू हुई यह यात्रा नौ दिनों तक चलती है, जो 24 जुलाई को समाप्त होगी। इस दौरान भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ भव्य रथों पर सवार होकर पुरी के मुख्य मंदिर से निकलकर मौसी के घर गुंडिचा मंदिर तक की यात्रा करते हैं। यह आयोजन न केवल भारत के सबसे प्राचीन धार्मिक उत्सवों में से एक है बल्कि विश्व के सबसे बड़े वार्षिक सार्वजनिक आयोजनों में भी इसकी गिनती होती है, जिसमें लाखों श्रद्धालु देश-विदेश से भाग लेने आते हैं।</p><p>पुरी का जगन्नाथ मंदिर भारत के चार प्रमुख धामों (बद्रीनाथ, द्वारका, रामेश्वरम और पुरी) में से एक है। यह मंदिर न केवल वास्तुकला की दृष्टि से विशिष्ट है बल्कि इसकी महत्ता धार्मिक ही नहीं, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी अत्यंत विशिष्ट है। भगवान जगन्नाथ को विष्णु के अवतार के रूप में पूजा जाता है और यह मंदिर उनके भाई बलभद्र तथा बहन सुभद्रा के साथ विराजने वाले एकमात्र मंदिर के रूप में प्रसिद्ध है। रथ यात्रा के माध्यम से यह ‘त्रिदेव’ जब मंदिर की सीमाओं से बाहर निकलते हैं तो भक्तों के लिए यह अवसर होता है प्रभु को निकट से देखने, उनके रथ को खींचने और मोक्ष की दिशा में एक कदम बढ़ाने का। इस रथ यात्रा की परंपरा का उल्लेख स्कंद पुराण, ब्रह्म पुराण और अन्य पुरातन ग्रंथों में मिलता है। मान्यता है कि रथ यात्रा में भाग लेने और विशेषकर रथ खींचने से समस्त पापों का नाश होता है और व्यक्ति को जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिलती है। यह यात्रा मानवीय समर्पण और भक्ति की पराकाष्ठा का जीवंत प्रदर्शन है, जहां हर कोई, चाहे वह राजा हो या आमजन, एक ही पंक्ति में खड़ा होकर भगवान की सेवा करता है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/a-grand-celebration-of-faith-tradition-and-spiritual-consciousness" target="_blank" rel="noopener">आस्था, परम्परा, आध्यात्मिक चेतना का विराट उत्सव</a></p><p>रथ यात्रा की सबसे अनूठी परंपरा है ‘छेरा’ की रस्म। यह रस्म रथ यात्रा के पहले दिन पुरी के राजा द्वारा निभाई जाती है, जिसमें वे सोने की झाड़ू से तीनों रथों की सफाई करते हैं। इस परंपरा का आध्यात्मिक और सामाजिक संदेश अत्यंत गहन है। एक राजा, जो स्वयं राज्य का सर्वोच्च होता है, भगवान के समक्ष स्वयं को एक सेवक मानकर झाड़ू लगाता है। यह प्रतीक है भगवान के समक्ष सभी के समान होने का, जहां न कोई ऊंचा है, न कोई नीचा। यह सामाजिक समरसता का वह आदर्श उदाहरण है, जो आज के समाज में अत्यंत आवश्यक है। जब लाखों की भीड़ ‘जय जगन्नाथ’ के उद्घोष के साथ इन रथों को खींचती है, तब वह केवल रथ नहीं खींच रही होती, वह अपनी भक्ति, आस्था, सेवा और आत्मशुद्धि की भावना को आगे बढ़ा रही होती है।</p><p>भगवान जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा के रथों को नंदीघोष, तालध्वज और दर्पदलन कहा जाता है, जिन्हें हर वर्ष नए सिरे से विशेष प्रकार की नीम की लकड़ी से निर्मित किया जाता है। इन रथों का निर्माण विशेष रीति-रिवाज और शास्त्र सम्मत विधियों से होता है, जिसमें सैंकड़ों शिल्पकार और सेवक कई महीनों तक जुटे रहते हैं। हर रथ की अपनी आकृति, रंग, ध्वज और प्रतीक होते हैं, जो देवताओं के स्वरूप और गुणों का प्रतिनिधित्व करते हैं। रथों की ऊंचाई और आकृति निश्चित नियमों के अनुसार होती है। नंदीघोष रथ की ऊंचाई लगभग 45 फीट होती है और इसमें 16 चक्के होते हैं। तालध्वज रथ में 14 चक्के होते हैं और इसकी ऊंचाई लगभग 44 फीट होती है। दर्पदलन रथ सबसे छोटा होता है, जिसमें 12 चक्के होते हैं और यह लगभग 43 फीट ऊंचा होता है। यात्रा के दौरान तीनों रथों को श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर तक खींचा जाता है और वहां सात दिनों तक भगवान विश्राम करते हैं। यह यात्रा किसी साधारण जुलूस की तरह नहीं होती बल्कि यह हजारों वर्षों से चली आ रही ऐसी आध्यात्मिक परंपरा है, जिसे केवल आंखों से नहीं, आत्मा से अनुभव किया जाता है।</p><p>रथ यात्रा से जुड़े कई पौराणिक प्रसंग भी हैं, जिनमें से सबसे प्रसिद्ध स्कंद पुराण में वर्णित कथा है। इसके अनुसार, एक दिन भगवान श्रीकृष्ण की बहन सुभद्रा ने द्वारका शहर घूमने की इच्छा प्रकट की। तब श्रीकृष्ण और बलराम उन्हें रथ पर बैठाकर नगर दर्शन कराने ले गए। यही प्रसंग पुरी में जगन्नाथ रथ यात्रा के रूप में जीवंत होता है, जहां भगवान अपनी बहन को साथ लेकर नगर भ्रमण के लिए निकलते हैं। इस यात्रा के हर पड़ाव पर धार्मिक रस्में होती हैं, जैसे कि हेरा पंचमी, जब देवी लक्ष्मी क्रोधित होकर भगवान के देर से लौटने पर मंदिर के बाहर प्रतीक्षारत रहती हैं। इसके बाद बहुड़ा यात्रा होती है, जब भगवान जगन्नाथ गुंडिचा मंदिर से वापस अपने मुख्य मंदिर आते हैं। 24 जुलाई को वापसी के बाद उनका भव्य स्वागत किया जाएगा और सुनाबेसा रस्म के अंतर्गत उन्हें स्वर्णाभूषणों से सजाया जाएगा।</p><p>जगन्नाथ रथ यात्रा की लोकप्रियता केवल भारत तक सीमित नहीं है। अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, जर्मनी, जापान जैसे कई देशों में इस यात्रा का आयोजन किया जाता है, विशेष रूप से इस्कॉन संस्था द्वारा। इस यात्रा ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की आध्यात्मिक शक्ति और सांस्कृतिक प्रभाव को बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पुरी में हर साल लाखों की संख्या में विदेशी श्रद्धालु आते हैं, जो इस भव्य आयोजन में भाग लेकर भारतीय संस्कृति की गहराई को अनुभव करते हैं। यह भारत की सॉफ्ट पावर का एक जीवंत उदाहरण है, जहां धर्म, संस्कृति और पर्यटन एक साथ राष्ट्र के वैश्विक प्रभाव को मजबूत करते हैं।</p><p>आज के डिजिटल युग में रथ यात्रा की पहुंच और भी व्यापक हो गई है। विभिन्न टीवी चैनलों, यूट्यूब, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और सरकारी पोर्टल्स पर इस यात्रा का सीधा प्रसारण किया जाता है, जिससे देश और विदेश के करोड़ों लोग इसे अपने घर बैठे अनुभव कर सकते हैं। ओडिशा सरकार और भारत सरकार इस अवसर पर व्यापक व्यवस्थाएं करती हैं, जिसमें सुरक्षा, चिकित्सा, जल आपूर्ति, यातायात नियंत्रण और आपदा प्रबंधन तक की तैयारियां शामिल होती हैं। हजारों पुलिसकर्मी, डॉक्टर, वॉलंटियर्स और सेवक इस आयोजन को निर्बाध रूप से संपन्न कराने में दिन-रात लगे रहते हैं। यह आयोजन जहां एक ओर आस्था का प्रतीक है, वहीं यह प्रशासनिक समन्वय और जन-सहभागिता का भी उत्कृष्ट उदाहरण है।</p><p>रथ यात्रा का एक महत्वपूर्ण पक्ष है इसकी सामाजिक और आर्थिक भूमिका। इस यात्रा के दौरान लाखों श्रद्धालु पुरी पहुंचते हैं, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी जबरदस्त बल मिलता है। होटल, लॉज, रेस्तरां, हस्तशिल्प, पारंपरिक परिधान और लोक कला से जुड़े व्यवसाय इस अवसर पर खूब फलते-फूलते हैं। पुरी का ‘पटकमाल’ (महाप्रसाद), स्थानीय शिल्पकारों द्वारा बनाए गए रथ मॉडल्स, पारंपरिक भजन और कीर्तन की प्रस्तुतियां भी इस यात्रा को एक सांस्कृतिक महोत्सव में बदल देती हैं। यह केवल धर्म का उत्सव नहीं, लोकजीवन का उत्सव बन जाता है। कुल मिलाकर, कहा जा सकता है कि जगन्नाथ रथ यात्रा न केवल एक धार्मिक उत्सव है बल्कि भारतीय संस्कृति, समर्पण, समानता और सामाजिक एकता की ऐसी गाथा है, जो पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। यह हमें सिखाती है कि जब हम समर्पण के भाव से आगे बढ़ते हैं तो स्वयं ईश्वर हमारे रथ में सवार होकर हमें मार्ग दिखाने आते हैं।</p><p>जय जगन्नाथ!</p><p>- योगेश कुमार गोयल</p><p>(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं)</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 20 Jul 2026 12:40:41 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-jagannath-rath-yatra-is-a-vibrant-celebration-of-a-centuries-old-tradition</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[गौरवपूर्ण लोकतांत्रिक मूल्यों का साझा करने का अवसर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/an-opportunity-to-share-proud-democratic-values]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>राजस्थान विधानसभा के 75 साल पर अमृत महोत्सव का आयोजन इस मायने में महत्वपूर्ण हो जाता है कि दुनिया में हमारे देष की लोकतंत्र की जड़े सबसे गहरी होने के साथ ही आज भी लोकतांत्रिक मूल्यों की दृष्टि से भारत दुनिया के देषों के सामने एक मिसाल है। राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष वासुदेव देवनानी की पहल से जिस तरह से 15 जुलाई, 2026 को आयोजित अमृत महोत्सव के कार्यक्रम में विधानसभा के नए पुराने सदस्यों को एक साझा मंच उपलब्ध कराने और एक दूसरे के अनुभवों को साझा करने का बेहतरीन अवसर उपलब्ध कराया है वहीं उच्च सदन के सभापति उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को अमृत महोत्सव के इस कार्यक्रम में उद्घाटन सत्र और समापन सत्र में सहभागी बनाकर कार्यक्रम को और अधिक गरिमामय बनाया है। अमृत महोत्सव में राजस्थान विधानसभा के 410 नए पुराने सदस्यों ने हिस्सा लिया वहीं 6 बार या इससे अधिक समय तक सदस्य रहे सम्माननीयों का सम्मान कर लोकतांत्रिक मूल्यों का ही स्वागत सम्मान किया गया है।&nbsp;</div><div><br></div><div>आज जिस तरह से विधायिका की कम बैठकों, सत्रों के दौरान हंगामें के हालात और मतभेद और मनभेद के हालातों में राजस्थान विधानसभा का अमृत महोत्सव केवल एक आयोजन ना होकर नए विधायकों के लिए प्रेरणास्पद भी हो गया है। अमृत महोत्सव के दौरान राजस्थान में सामाजिक राजनीतिक परिवर्तनकारी 24 कानूनों पर चर्चा भी की गई तो नए पुराने सदस्यों के अनुभवों को साझा करने का भी बेहतरीन अवसर प्राप्त हो सका है। कार्यक्रम के दौरान उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन का रिमार्केवल प्रतिक्रिया दी कि चुनाव भले ही वोट के आधार पर जीते जाते हैं पर जनता का दिल तो लोकहितकारी कार्य करके ही जीता जा सकता है। संवैधानिक संस्थाओं की शक्ति गरिमा बनाये रखने में हैं वहीं बहस की गुणवत्ता, गंभीरता और सदन में आचरण की मर्यादा से ही संवैधानिक संस्थाएं मजबूत होती है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला राजस्थान विधानसभा के भी सदस्य रह चुके हैं और उनका मानना रहा कि विधानसभा उनके लिए संस्कारों की पाठशाला रही है। पूर्व मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे ने कहा कि दुश्मनी जमकर करों पर खिड़की भी खुली रखों। इंसानियत राजनीति की लक्ष्मण रेखा से बड़ी होनी चाहिए। उन्होंने स्व. भैरोसिंह शेखावत और स्व. मोहन लाल सुखाड़िया व स्व. भैरोसिंह शेखावत व स्व. हरिदेव जोशी के बीच सदन और सदन के बाहर के संबंधों की चर्चा करते हुए कहा कि संबंधों की लक्ष्मण रेखा को नहीं लांघा जाना चाहिए। मतभेद भले ही हो पर मनभेद नहीं होना चाहिए। विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी की पहल पर आयोजित अमृत महोत्सव में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा, प्रतिपक्ष नेता टीकाराम जूली सहित पक्ष विपक्ष के नेताओं ने खुलकर विचार रखते हुए विधायिका की कम बैठकों पर गंभीर चिंता व्यक्त की।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/lok-sabha-speaker-om-birla-inaugurated-the-amrit-mahotsav-of-rajasthan-legislative-assembly" target="_blank">लोकसभा स्पीकर Om Birla ने किया Rajasthan Vidhan Sabha के Amrit Mahotsav का आगाज, 75 साल का सफर बेमिसाल</a></h3><div>राजस्थान विधानसभा का अमृत महोत्सव इस मायने में महत्वपूर्ण हो जाता है कि सामान्यतः इस तरह के कार्यक्रम मात्र औपचारिकता बन कर रह जाते हैं पर जिस तरह से अमृत महोत्सव को लोकतंत्र के लिए उपादेय, लोकतांत्रिक मूल्यों की पुनर्स्थापना, सत्र के दौरान बहस के स्तर की गंभीरता, दलगत राजनीति से उठकर साझा मंच पर खुली चर्चा और अनुभवों का साझा करने से यह आयोजन विशिष्ठ आयोजन हो जाता है। जिस तरह से सत्रों के दौरान हंगामें के हालात बनते हैं और आपसी मतभेद और मनभेद की स्थितियां होने लगी है इस पर चिंता व्यक्त करने के साथ ही विधानसभा के पहले के सत्रों में गंभीरता, तथ्यात्मकता, गहन अध्ययन और स्तरीय बहसों के उदाहरण उदृत करते हुए गंभीर और स्तरीय बहस पर जोर दिया गया। यहां तक कहा गया कि हंगामें से नहीं तथ्य और तर्क व संवाद से बड़े नेता बनते हैं। लोकतंत्र की लक्ष्मण रेखा से इंसानियत की भावना पर जोर दिया गया।&nbsp;</div><div><br></div><div>अमृत महोत्सव के बहाने जिस तरह से सदनों में बहस के दौरान प़क्ष-विपक्ष के सदस्यों द्वारा गरिमापूर्ण, गंभीरता परक, गहन अध्ययन, आलोचना के लिए आलोचना ना होने, तथ्यपरक पक्ष रखने और गंभीर बहस से सदन की गरिमा ही बढ़ेगी और इसका लाभ लोकतांत्रिक मूल्यों को और अधिक सुदृढ़ करने में मिल सकेगा। अध्यक्ष वासुदेव देवनानी का यह कहना कि अनुभव और युवा उर्जा का समागम ही लोकतंत्र की असली पूंजी है। देखा जाए तो राजस्थान विधानसभा के अमृत उत्सव का यह आयोजन जहां लोकतंत्र की मजबूती, लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ ही लोकतंत्र में अटूट आस्था, गौरवशाली लोकतांत्रिक आस्था का माध्यम बन गया। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का यह निकश की यह आयोजन अतीत का उत्सव ही नहीं अपितु भविष्य का पथ-प्रदर्शक भी है। राजस्थान विधानसभा के इस अमृत महोत्सव पर जिस तरह से सत्रों के दौरान बहस को स्तरीय बनाने, हंगामें की भेंट नहीं चढ़ाने, गहन अध्ययन और तर्क आधारित बहस और पूरी तैयारी के साथ सदन में हिस्सा लेने पर जिस तरह का एक स्वर में संदेश दिया गया है और जिस तरह से विचारधारा और प्रतिवद्धता भिन्न होने के बावजूद मानवीय संबंधों को बनाये रखने यानी की मतभेद के बावजूद मनभेद नहीं रखने का गंभीर व संदेश दिया गया है। अमृत महोत्सव में अभी चार कार्यक्रम और होने है और कार्यक्रमों पर आमजन की निगाहें इस मायने में हैं कि सदन की गरिमा और लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ ही आमनागरिकों केन्द्र में होना चाहिए। आयोजन के लिए साधुवाद इस अर्थ में महत्वपूर्ण हो जाता है कि नए सदस्यों को गरिमापूर्ण इतिहास से रुबरु होने के साथ ही वरिष्ठों के अनुभवों को भी साझा और आत्मसात करने का अवसर मिल रहा है। सही मायने में विधायी परंपरा को समझने, संसदीय मर्यादाओं, लोकतांत्रिक मूल्यों पर अनुभवों को साझा करने का अवसर मिला है।&nbsp;</div><div><br></div><div>- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 18 Jul 2026 12:42:33 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/an-opportunity-to-share-proud-democratic-values</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Vishwakhabram: Eastern Europe में India मचायेगा धमाल, समझिये Moldova, North Macedonia और Romania की यात्रा पर क्यों जा रही हैं President Droupadi Murmu?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/president-murmu-moldova-north-macedonia-romania-visit]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत की विदेश नीति में पूर्वी यूरोप का महत्व लगातार बढ़ रहा है और इसी दिशा में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की 19 से 25 जुलाई 2026 तक मोल्दोवा, उत्तर मैसेडोनिया और रोमानिया की राजकीय यात्रा एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक पहल के रूप में सामने आई है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने आज राष्ट्रपति की तीन देशों की यात्रा की घोषणा की। यह यात्रा भारत की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत वह यूरोप में अपने राजनीतिक, आर्थिक और सामरिक प्रभाव का विस्तार करना चाहता है। तीनों देशों के राष्ट्राध्यक्षों के निमंत्रण पर होने वाली यह यात्रा भारत के लिए इसलिए भी ऐतिहासिक है क्योंकि मोल्दोवा और उत्तर मैसेडोनिया की यह किसी भारतीय राष्ट्रपति की पहली यात्रा होगी, जबकि रोमानिया में तीन दशक से अधिक समय बाद किसी भारतीय राष्ट्रपति का दौरा हो रहा है।</div><div><br></div><div>राष्ट्रपति मुर्मु मोल्दोवा में राष्ट्रपति माइया सांडू के साथ द्विपक्षीय वार्ता करेंगी, संसद अध्यक्ष इगोर ग्रोसू से मुलाकात करेंगी, मोल्दोवा-भारत संसदीय मैत्री समूह से संवाद करेंगी, भारत-मोल्दोवा बिजनेस फोरम को संबोधित करेंगी तथा भारतीय समुदाय से भी मिलेंगी। इसके बाद उत्तर मैसेडोनिया में राष्ट्रपति गोरदाना सिल्यानोव्स्का-दावकोवा, प्रधानमंत्री ह्रिस्टियान मिकोस्की और संसद नेतृत्व के साथ वार्ता होगी। राष्ट्रपति वहां संसद को भी संबोधित करेंगी और भारत-उत्तर मैसेडोनिया बिजनेस फोरम में भाग लेंगी। यात्रा के अंतिम चरण में रोमानिया में राष्ट्रपति निकुशोर दान, अंतरिम प्रधानमंत्री इलीए बोलोजान, सीनेट एवं प्रतिनिधि सभा के शीर्ष नेतृत्व तथा संसदीय मैत्री समूह के साथ बैठकें होंगी। राष्ट्रपति भारत-रोमानिया बिजनेस फोरम को भी संबोधित करेंगी और भारतीय समुदाय से संवाद करेंगी।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो यह यात्रा ऐसे समय हो रही है जब रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पूर्वी यूरोप वैश्विक भू-राजनीति का प्रमुख केंद्र बन गया है। भारत इस क्षेत्र में संतुलित और बहुआयामी उपस्थिति दर्ज कराना चाहता है। मोल्दोवा और रोमानिया यूक्रेन के पड़ोसी देश हैं, जबकि उत्तर मैसेडोनिया बाल्कन क्षेत्र में यूरो-अटलांटिक संरचना का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में इन देशों के साथ संबंधों का विस्तार भारत को यूरोप में अपनी रणनीतिक पहुंच मजबूत करने का अवसर देगा।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/jai-jagannath-pm-modi-and-president-murmu-extend-greetings-on-rath-yatra" target="_blank">जय जगन्नाथ! पीएम मोदी और राष्ट्रपति मुर्मू ने दी रथ यात्रा की शुभकामनाएं, कहा- भारत की आध्यात्मिक विरासत की 'शानदार अभिव्यक्ति' | Puri Jagannath Rath Yatra 2026</a></h3><div>रोमानिया यूरोपीय संघ का प्रभावशाली सदस्य है और भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की दिशा में हो रही प्रगति के बीच उसकी भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। दूसरी ओर, उत्तर मैसेडोनिया यूरोपीय संघ की सदस्यता का उम्मीदवार है और बाल्कन क्षेत्र में भारत के लिए प्रवेश द्वार की भूमिका निभा सकता है। मोल्दोवा कृषि, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा संपर्क और डिजिटल परिवर्तन जैसे क्षेत्रों में भारत के लिए नई संभावनाएं प्रस्तुत करता है।</div><div><br></div><div>इस यात्रा का एक बड़ा रणनीतिक संदेश यह भी है कि भारत केवल पश्चिमी यूरोप तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि पूर्वी यूरोप के उभरते साझेदारों के साथ भी दीर्घकालिक संबंध स्थापित करने की नीति पर काम कर रहा है। रक्षा, साइबर सुरक्षा, ऊर्जा, आपूर्ति श्रृंखला, फार्मास्यूटिकल्स, आईटी, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा मानव संसाधन विकास जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ने की संभावना है। इससे भारत की ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ आधारित विदेश नीति को भी नई मजबूती मिलेगी।</div><div><br></div><h2>भारत-मोल्दोवा संबंध</h2><div><br></div><div>भारत ने 1991 में मोल्दोवा को मान्यता दी और 1992 में राजनयिक संबंध स्थापित हुए। दोनों देशों के संबंध सदैव सौहार्दपूर्ण रहे हैं तथा बहुपक्षीय मंचों पर मोल्दोवा ने भारत का समर्थन किया है। वर्ष 1993 में छह महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर हुए, जिनमें व्यापार, आर्थिक एवं तकनीकी सहयोग, विज्ञान-प्रौद्योगिकी, शिक्षा और सांस्कृतिक सहयोग शामिल हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार लगातार बढ़ा है और भारतीय निर्यात में दवाइयां, रसायन, मशीनरी, मोबाइल उपकरण, वस्त्र और इंजीनियरिंग उत्पाद प्रमुख हैं। भारतीय कंपनियां ऊर्जा अवसंरचना परियोजनाओं में भी सक्रिय हैं। कोविड-19 महामारी, सूखा, बाढ़ तथा यूक्रेन संकट के दौरान भारत ने मानवीय सहायता प्रदान कर भरोसेमंद साझेदार होने का परिचय दिया। लगभग 900 भारतीय, जिनमें अधिकांश मेडिकल छात्र हैं, मोल्दोवा में रह रहे हैं। योग, हिंदी, भारतीय संस्कृति और शिक्षा के क्षेत्र में भी सहयोग लगातार मजबूत हुआ है। राष्ट्रपति की यह यात्रा दोनों देशों के संबंधों को व्यापक रणनीतिक साझेदारी में बदलने की दिशा में मील का पत्थर मानी जा रही है।</div><div><br></div><h2>भारत-उत्तर मैसेडोनिया संबंध</h2><div><br></div><div>भारत और उत्तर मैसेडोनिया के संबंध मैत्रीपूर्ण रहे हैं तथा दोनों देशों के बीच कोई द्विपक्षीय विवाद नहीं है। भारत ने मैसेडोनिया की अंतरराष्ट्रीय मान्यता के शुरुआती दौर में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय यात्राओं में तेजी आई है। 2023 में विदेश राज्य मंत्री मीनाक्षी लेखी और उत्तर मैसेडोनिया के विदेश मंत्री बुयार उस्मानी की यात्राओं ने संबंधों को नई गति दी। दोनों देशों के बीच व्यापार में रसायन, इस्पात, वस्त्र, मशीनरी, फार्मास्यूटिकल्स और ऑटो कंपोनेंट प्रमुख हैं। उत्तर मैसेडोनिया भारतीय निवेशकों के लिए कम कर व्यवस्था और यूरोपीय बाजार तक आसान पहुंच के कारण आकर्षक गंतव्य बनकर उभरा है। आईटीईसी, योग, पर्यटन और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के माध्यम से दोनों देशों के संबंध लगातार गहरे हो रहे हैं। राष्ट्रपति की यात्रा आर्थिक सहयोग को नई दिशा देने के साथ-साथ बाल्कन क्षेत्र में भारत की रणनीतिक उपस्थिति को भी मजबूत करेगी।</div><div><br></div><h2>भारत-रोमानिया संबंध</h2><div><br></div><div>भारत और रोमानिया के बीच 1948 से राजनयिक संबंध हैं और 2023 में दोनों देशों ने 75 वर्ष पूरे किए। दोनों देश संयुक्त राष्ट्र सहित अनेक अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एक-दूसरे का समर्थन करते रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में विदेश मंत्रियों की नियमित मुलाकातों और व्यापक साझेदारी संबंधी संयुक्त घोषणा ने द्विपक्षीय संबंधों को नई ऊंचाई दी है। व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और 2023-24 में द्विपक्षीय व्यापार लगभग 3 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया। भारत से पेट्रोलियम उत्पाद, इंजीनियरिंग सामान, दवाइयां, रसायन और वस्त्र निर्यात होते हैं, जबकि रोमानिया से मशीनरी, इस्पात, ईंधन, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और औद्योगिक उत्पाद आयात किए जाते हैं। विप्रो, इंफोसिस, एचसीएल, सन फार्मा, डॉ. रेड्डीज़ और जेनपैक जैसी भारतीय कंपनियां वहां सक्रिय हैं। लगभग नौ हजार भारतीय समुदाय, जिनमें बड़ी संख्या में श्रमिक शामिल हैं, रोमानिया में रह रहे हैं। सांस्कृतिक सहयोग, योग, आयुर्वेद, शिक्षा तथा अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन में रोमानिया की भागीदारी दोनों देशों की बढ़ती निकटता का प्रमाण है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, स्पष्ट है कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की यह तीन देशों की यात्रा केवल राजकीय शिष्टाचार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की बदलती वैश्विक रणनीति, यूरोप में बढ़ते प्रभाव और नए आर्थिक-सामरिक साझेदारों की तलाश का सशक्त संकेत है। यदि प्रस्तावित सहयोग योजनाएं ठोस परिणामों में बदलती हैं, तो यह यात्रा पूर्वी यूरोप में भारत की दीर्घकालिक उपस्थिति को नई दिशा देने वाली ऐतिहासिक पहल सिद्ध हो सकती है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 17 Jul 2026 17:01:54 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/president-murmu-moldova-north-macedonia-romania-visit</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[अंतर्राष्ट्रीय न्याय दिवस पर दीर्घसूत्री न्याय की विडंबना का यक्ष प्रश्न]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/international-justice-day-the-profound-question-regarding-the-irony-of-justice-delayed]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अंतर्राष्ट्रीय न्याय दिवस (17 जुलाई) केवल न्याय की महत्ता का स्मरण कराने का अवसर नहीं है, बल्कि यह स्वयं से एक कठिन प्रश्न पूछने का भी दिन है—क्या वर्षों बाद मिला न्याय वास्तव में न्याय कहलाता है? वाकई आज दुनिया के अनेक देशों की तरह भारत में भी करोड़ों मुकदमे लंबित हैं। अनेक वादियों की पूरी उम्र अदालतों के चक्कर लगाते-लगाते बीत जाती है। कई मामलों में निर्णय तब आता है जब पीड़ित या आरोपी इस दुनिया में ही नहीं रहते। ऐसे में न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है और इस खास दिवस पर प्रासंगिक भी।</div><div><br></div><div>आखिर हमें यह समझना ही होगा कि 21वीं सदी के भारत की न्यायिक व्यवस्था की सफलता इस बात से नहीं आंकी जाएगी कि उसने कितने ऐतिहासिक फैसले दिए, बल्कि इस बात से आंकी जाएगी कि उसने आम नागरिक को कितनी जल्दी, कितनी निष्पक्षता से और कितनी कम लागत में न्याय उपलब्ध कराया। इसलिए भारत का आदर्श लक्ष्य केवल 'फास्ट जस्टिस' नहीं, बल्कि 'फेयर, फास्ट एंड अफोर्डेबल जस्टिस' होना चाहिए। यही विकसित भारत की न्यायिक पहचान होगी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/trending/why-this-day-celebrated-on-july-15th-learn-about-un-resolution-and-its-significance" target="_blank">World Youth Skills Day 2026: 15 जुलाई को ही क्यों मनाया जाता है यह दिन? जानें UN Resolution और इसका महत्व</a></h3><div>कानूनी मामलों के जानकारों के मुताबिक, दीर्घसूत्री न्याय के पीछे न्यायाधीशों की कमी, बार-बार स्थगन, जटिल कानूनी प्रक्रियाएँ, अपर्याप्त न्यायिक ढांचा और बढ़ते मुकदमों जैसी कई वजहें हैं। लेकिन सबसे बड़ी विडंबना यह है कि विलंबित न्याय केवल एक प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक समस्या भी बन जाता है। इससे आम नागरिक का न्यायपालिका पर विश्वास कमजोर पड़ सकता है और कई बार लोग वैकल्पिक तथा गैर-कानूनी रास्तों की ओर भी आकर्षित हो सकते हैं।</div><div><br></div><div>इस अवसर पर सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यही है—क्या न्याय केवल सही निर्णय देने का नाम है, या सही समय पर सही निर्णय देना ही वास्तविक न्याय है? यदि न्याय समय पर नहीं मिलता, तो उसका नैतिक और व्यावहारिक महत्व दोनों कम हो जाते हैं। इसलिए न्यायिक सुधार, तकनीक का बेहतर उपयोग, न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि, वैकल्पिक विवाद निपटान (ADR) को बढ़ावा और अनावश्यक स्थगनों पर नियंत्रण जैसी पहलें अब विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता हैं।</div><div><br></div><div>लिहाजा, अंतर्राष्ट्रीय न्याय दिवस हमें यह संकल्प लेने का अवसर देता है कि न्याय केवल निष्पक्ष ही नहीं, त्वरित, सुलभ और प्रभावी भी होना चाहिए। क्योंकि लोकतंत्र की असली ताकत केवल कानून के शासन में नहीं, बल्कि समय पर मिलने वाले न्याय में निहित होती है।</div><div><br></div><div># सवाल है कि अपना भारत इस कसौटी पर कहां खड़ा है?</div><div>भारत की स्थिति मिश्रित है। एक ओर भारतीय न्यायपालिका विश्व की सबसे स्वतंत्र और सम्मानित न्याय प्रणालियों में गिनी जाती है, जिसने अनेक ऐतिहासिक फैसलों से संविधान और मौलिक अधिकारों की रक्षा की है। दूसरी ओर, त्वरित न्याय के पैमाने पर भारत अब भी गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है। सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता सुधांशु चौधरी के अनुसार, मुख्य तस्वीर इस प्रकार है:</div><div><br></div><div>एक, लंबित मुकदमे: देशभर की अदालतों में करोड़ों मामले लंबित हैं। इनमें बड़ी संख्या जिला न्यायालयों में है, जबकि उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में भी लंबित मामलों का बोझ बना हुआ है।</div><div><br></div><div>दो, न्याय मिलने में लंबा समय: भूमि विवाद, दीवानी मुकदमे, पारिवारिक विवाद और कई आपराधिक मामलों में अंतिम निर्णय आने में वर्षों, कभी-कभी दशकों तक लग जाते हैं।</div><div><br></div><div>तीन, अंडरट्रायल कैदी: भारतीय जेलों में बड़ी संख्या ऐसे कैदियों की है जिनका मुकदमा अभी पूरा नहीं हुआ है। यह "शीघ्र न्याय" की कसौटी पर एक गंभीर चुनौती है।</div><div><br></div><div>चार, सुधार के प्रयास: ई-कोर्ट परियोजना, वर्चुअल सुनवाई, राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG), फास्ट ट्रैक कोर्ट, लोक अदालतें और मध्यस्थता (Mediation) जैसे कदम उठाए गए हैं, जिनसे कुछ क्षेत्रों में सुधार भी हुआ है।</div><div><br></div><div>इसलिए सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यही है कि क्या भारत में न्यायालयों का उद्देश्य केवल न्याय देना है, या समय पर न्याय देना भी उतना ही आवश्यक है? जब एक पीढ़ी मुकदमा दायर करे और दूसरी पीढ़ी फैसला सुने, तो लोकतंत्र में न्याय की प्रभावशीलता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।&nbsp;</div><div><br></div><div># सुलगता सवाल: न्याय में गुणवत्ता और निष्पक्षता बनाए रखते हुए न्याय की गति कैसे बढ़ाई जाए?</div><div><br></div><div>आज अंतर्राष्ट्रीय न्याय दिवस पर भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि "न्याय में गुणवत्ता और निष्पक्षता बनाए रखते हुए न्याय की गति कैसे बढ़ाई जाए?" यही वह कसौटी है, जिस पर आने वाले वर्षों में भारतीय न्यायपालिका की सफलता का वास्तविक आकलन होगा।</div><div>चूंकि, यह भारतीय न्याय व्यवस्था के सामने सबसे बड़ा सुधारात्मक प्रश्न है। इसलिए इसका उत्तर केवल अधिक न्यायाधीश नियुक्त करने में नहीं, बल्कि व्यापक न्यायिक सुधारों में निहित है।</div><div><br></div><div>पहला, न्यायाधीशों और न्यायालयों की संख्या बढ़े: जनसंख्या और मुकदमों की संख्या के अनुपात में पर्याप्त न्यायाधीश तथा आधुनिक न्यायालय स्थापित किए जाएँ।</div><div><br></div><div>दूसरा, समयबद्ध सुनवाई की संस्कृति विकसित हो: अनावश्यक स्थगनों (Adjournments) पर अंकुश लगे और प्रत्येक मुकदमे के लिए यथासंभव समय-सीमा निर्धारित की जाए।</div><div><br></div><div>तीसरा, तकनीक का व्यापक उपयोग: ई-फाइलिंग, डिजिटल रिकॉर्ड, एआई आधारित केस मैनेजमेंट और वर्चुअल सुनवाई का विस्तार किया जाए ताकि प्रशासनिक देरी कम हो।</div><div><br></div><div>चौथा, वैकल्पिक विवाद समाधान को बढ़ावा: लोक अदालत, मध्यस्थता (Mediation) और पंचाट (Arbitration) के माध्यम से छोटे और दीवानी विवाद अदालतों के बाहर ही सुलझाए जाएँ।</div><div><br></div><div>पांचवां, रिक्त पदों की शीघ्र नियुक्ति: उच्च न्यायालयों और अधीनस्थ न्यायालयों में लंबे समय तक रिक्त रहने वाले न्यायिक पदों को प्राथमिकता के आधार पर भरा जाए।</div><div><br></div><div>छठा, न्याय की गुणवत्ता से समझौता नहीं: त्वरित न्याय का अर्थ जल्दबाजी में निर्णय नहीं होना चाहिए। प्रत्येक पक्ष को सुनने, साक्ष्यों की निष्पक्ष जांच और कारणयुक्त निर्णय की परंपरा बनी रहनी चाहिए।</div><div><br></div><div>सातवां, पुलिस और अभियोजन तंत्र में सुधार: यदि जांच समयबद्ध, वैज्ञानिक और निष्पक्ष होगी, तो अदालतों में मुकदमों का निपटारा भी अधिक प्रभावी होगा।</div><div><br></div><div>निष्कर्षतः यह कहा जाना चाहिए कि भारत के लिए आदर्श लक्ष्य केवल "फास्ट जस्टिस" नहीं, बल्कि "फेयर, फास्ट और अफोर्डेबल जस्टिस" होना चाहिए। इसी संदर्भ में एक विचारोत्तेजक प्रश्न उठता है— "क्या लोकतंत्र में न्यायालयों की सफलता का पैमाना केवल ऐतिहासिक फैसले हैं, या यह भी कि एक सामान्य नागरिक को उसके जीवनकाल में समय पर न्याय मिल जाए?" यदि इसका उत्तर "हाँ" है, तो न्यायिक सुधार अब भविष्य का एजेंडा नहीं, बल्कि वर्तमान की अनिवार्य आवश्यकता है।</div><div><br></div><div>चूंकि यह विचार एक नीति-वाक्य (Policy Statement) है,&nbsp; इसलिए इसे और अधिक प्रभावशाली ढंग से लागू करने की दरकार है। निःसन्देह "भारत का लक्ष्य केवल 'फास्ट जस्टिस' (शीघ्र न्याय) नहीं, बल्कि 'फेयर, फास्ट एंड अफोर्डेबल जस्टिस' (निष्पक्ष, त्वरित और सुलभ न्याय) होना चाहिए। क्योंकि न्याय तभी सार्थक है, जब वह समय पर मिले, सभी के लिए समान हो और उसकी लागत इतनी न हो कि एक सामान्य नागरिक न्याय मांगने से ही पीछे हट जाए।"</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 17 Jul 2026 16:16:38 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/international-justice-day-the-profound-question-regarding-the-irony-of-justice-delayed</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[आस्था, परम्परा, आध्यात्मिक चेतना का विराट उत्सव]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/a-grand-celebration-of-faith-tradition-and-spiritual-consciousness]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आषाढ़ शुक्ल द्वितीया से प्रारम्भ होकर दस दिनों तक चलने वाली भगवान श्री जगन्नाथ की रथयात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना, लोकआस्था, सामाजिक समरसता और आध्यात्मिक दर्शन का विराट उत्सव है। पुरी की यह महायात्रा हजारों वर्षों की परम्परा का जीवंत प्रतीक है, जिसमें भगवान स्वयं अपने भक्तों के बीच आते हैं। इसी कारण इसे ‘महायात्रा’ कहा जाता है। भारत के चार धामों में प्रतिष्ठित श्री जगन्नाथ धाम की यह यात्रा देश ही नहीं, सम्पूर्ण विश्व के करोड़ों श्रद्धालुओं के आकर्षण का केन्द्र बनती है। वर्ष 2026 की रथयात्रा भी अपार श्रद्धा एवं उत्साह के साथ मनाई जा रही है, किन्तु इस बार इसके साथ एक नया विवाद भी जुड़ गया है। देश एवं विदेश के अनेक स्थानों पर इस्कॉन द्वारा स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग तिथियों पर रथयात्राएं आयोजित किए जाने पर कुछ धार्मिक एवं परम्परावादी संगठनों ने आपत्ति व्यक्त की है। उनका मत है कि जगन्नाथ रथयात्रा की तिथि वही होनी चाहिए जो पुरी श्रीमंदिर द्वारा निर्धारित होती है। दूसरी ओर इस्कॉन का तर्क है कि विदेशों में स्थानीय प्रशासन की अनुमति, सार्वजनिक अवकाश, मौसम तथा अन्य व्यावहारिक कारणों से कभी-कभी तिथि में परिवर्तन आवश्यक हो जाता है। यह विवाद केवल तिथि का नहीं, बल्कि परम्परा और वैश्विक विस्तार के बीच संतुलन खोजने का विषय बन गया है।</div><div><br></div><div>वास्तव में यह समझना आवश्यक है कि पुरी की रथयात्रा और अन्य स्थानों पर आयोजित रथयात्राओं का स्वरूप अलग-अलग हो सकता है, किन्तु उनका मूल उद्देश्य भगवान जगन्नाथ की भक्ति, लोककल्याण और धर्मप्रचार ही है। यदि परम्परा का सम्मान बना रहे और श्रद्धा अक्षुण्ण रहे तो मतभेद संवाद के माध्यम से सुलझाए जा सकते हैं। धर्म का मूल स्वरूप जोड़ना है, विभाजन करना नहीं। पुरी का श्रीमंदिर भगवान जगन्नाथ का मुख्य धाम है। लगभग 800 वर्ष पुराने इस मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण जगन्नाथ स्वरूप में अपने बड़े भाई बलभद्र एवं बहन सुभद्रा के साथ विराजमान हैं। प्रतिवर्ष केवल एक बार तीनों देव विग्रह अपने गर्भगृह से बाहर निकलकर भक्तों को दर्शन देते हैं। यही इस यात्रा की सबसे बड़ी विशेषता है। सामान्य दिनों में जहां भगवान के दर्शन सीमित होते हैं, वहीं रथयात्रा में प्रत्येक व्यक्ति बिना किसी भेदभाव के भगवान के साक्षात दर्शन कर सकता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/amit-shah-performs-mangla-aarti-of-jagannath-rath-yatra-in-ahmedabad-gujarat-immersed-in-devotion" target="_blank">Amit Shah ने Ahmedabad में Jagannath Rath Yatra से पहले की Mangla Aarti, गुजरात भक्तिमय</a></h3><div>यात्रा की तैयारियां अक्षय तृतीया से प्रारम्भ हो जाती हैं। उसी दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के तीनों विशाल रथों का निर्माण आरम्भ होता है। प्रत्येक वर्ष नए रथ बनाए जाते हैं। यद्यपि उनका स्वरूप और आकार सदियों से समान रहता है, फिर भी प्रत्येक वर्ष नई लकड़ी, नई सज्जा और नवीन निर्माण किया जाता है। भगवान जगन्नाथ का रथ गरुड़ध्वज (कपिलध्वज), बलभद्र का तालध्वज तथा सुभद्रा का दर्पदलन अथवा पद्मध्वज कहलाता है। इन रथों के निर्माण की प्रक्रिया केवल शिल्पकला नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक साधना मानी जाती है। कारीगर विशेष धार्मिक नियमों का पालन करते हुए इन्हें बनाते हैं। यह परम्परा हमें यह संदेश देती है कि प्रत्येक वर्ष मनुष्य भी अपने भीतर की ईर्ष्या, द्वेष, अहंकार और लोभ को त्यागकर स्वयं का नव-निर्माण करे।</div><div><br></div><div>रथयात्रा के पीछे अनेक पौराणिक कथाएं भी जुड़ी हैं। कहा जाता है कि एक बार सुभद्रा ने द्वारका नगर देखने की इच्छा व्यक्त की। तब भगवान श्रीकृष्ण और बलराम ने उन्हें अलग रथ पर बैठाकर नगर भ्रमण कराया। उसी स्मृति में तीनों भाई-बहनों की संयुक्त रथयात्रा निकाली जाती है। एक अन्य कथा के अनुसार भगवान की अपूर्ण प्रतिमाओं का निर्माण स्वयं विश्वकर्मा ने किया था, जो आज भी जगन्नाथ संस्कृति की विशिष्ट पहचान है। इस महायात्रा का एक अत्यन्त मार्मिक पक्ष यह भी है कि स्नान पूर्णिमा के बाद भगवान अस्वस्थ माने जाते हैं और लगभग पन्द्रह दिनों तक सार्वजनिक दर्शन नहीं देते। इसके पश्चात वे रथों पर आरूढ़ होकर अपनी मौसी के घर गुण्डिचा मंदिर जाते हैं। वहां नौ दिनों तक विश्राम करते हैं और फिर बहुड़ा यात्रा के माध्यम से पुनः श्रीमंदिर लौटते हैं। लौटते समय भगवान का पोडा पीठा ग्रहण करना, पंचमी को देवी लक्ष्मी का रुष्ट होकर रथ का पहिया तोड़ना तथा बाद में भगवान द्वारा उन्हें मनाने की परम्परा भक्तिभाव एवं मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण है।</div><div><br></div><div>पुरी की रथयात्रा का एक अन्य अद्भुत दृश्य छेरा पहरा है। गजपति महाराज स्वयं स्वर्ण निर्मित झाड़ू से रथों के मार्ग की सफाई करते हैं। यह परम्परा संदेश देती है कि ईश्वर के समक्ष राजा और सामान्य व्यक्ति सभी समान हैं। सत्ता का सर्वोच्च पद भी सेवा से बड़ा नहीं हो सकता। रथयात्रा के समय जगन्नाथ मंदिर का महाप्रसाद भी विशेष आकर्षण का केन्द्र होता है। विश्व की सबसे बड़ी मंदिर रसोइयों में से एक इस रसोई में मिट्टी के पात्रों में प्रसाद बनाया जाता है। दाल, चावल, सब्जियाँ, मालपुआ, गजामूंग, लाई, नारियल तथा अनेक प्रकार के व्यंजन अत्यंत अल्प मूल्य पर श्रद्धालुओं को उपलब्ध कराए जाते हैं। यह प्रसाद केवल भोजन नहीं, बल्कि समानता और साझेदारी का प्रतीक है।</div><div><br></div><div>धार्मिक ग्रन्थों में रथयात्रा का अत्यन्त महत्व बताया गया है। स्कन्द पुराण, ब्रह्म पुराण, पद्म पुराण तथा उत्कल खण्ड में भगवान जगन्नाथ की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है। मान्यता है कि रथयात्रा के दर्शन एवं रथ को स्पर्श करने से अनेक जन्मों के पाप नष्ट होते हैं तथा रथ खींचने वाले को मोक्ष का अधिकारी माना गया है। यद्यपि इन मान्यताओं का आध्यात्मिक अर्थ यह है कि जो व्यक्ति अपने जीवन-रथ को धर्म, सेवा और सदाचार के मार्ग पर चलाता है, वही वास्तविक मुक्ति प्राप्त करता है। जगन्नाथ रथयात्रा की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सामाजिक समरसता है। इस अवसर पर जाति, वर्ग, भाषा, क्षेत्र अथवा सम्प्रदाय का कोई भेद नहीं रहता। लाखों श्रद्धालु एक साथ रथ की रस्सी खींचते हैं। यही वह क्षण होता है जब धर्म केवल पूजा-पद्धति न रहकर सामाजिक एकता का उत्सव बन जाता है।</div><div><br></div><div>आज यह यात्रा केवल पुरी तक सीमित नहीं रही। भारत के लगभग सभी प्रमुख नगरों सहित अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका और अनेक यूरोपीय देशों में भी जगन्नाथ रथयात्रा आयोजित होती है। विशेष रूप से इस्कॉन ने इस परम्परा को वैश्विक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। करोड़ों विदेशी भक्तों ने इसी माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण एवं जगन्नाथ संस्कृति को जाना है। इसलिए यदि कहीं तिथियों को लेकर व्यावहारिक परिवर्तन भी किए जाएँ तो उनके पीछे धार्मिक अवमानना नहीं, बल्कि स्थानीय व्यवस्थाओं की विवशता भी हो सकती है। फिर भी यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि जहाँ तक सम्भव हो, श्रीमंदिर की परम्परा और निर्धारित तिथि का सम्मान किया जाए, ताकि सम्पूर्ण विश्व में एकात्मता का संदेश और अधिक सुदृढ़ हो।</div><div><br></div><div>दार्शनिक दृष्टि से रथ मनुष्य के शरीर का, भगवान आत्मा का तथा रथ को खींचने वाली रस्सियाँ समाज और लोकशक्ति का प्रतीक हैं। आत्मा तभी सार्थक होती है जब समाज सहयोग करे और समाज तभी श्रेष्ठ बनता है जब उसके केन्द्र में ईश्वर, नैतिकता और आत्मशुद्धि का भाव हो। यही कारण है कि जगन्नाथ रथयात्रा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मविशुद्धि, लोकमंगल, समरसता, सेवा और आध्यात्मिक जागरण का अनुपम पर्व है। वर्तमान समय में जब समाज अनेक प्रकार के वैचारिक, सामाजिक और धार्मिक विभाजनों से गुजर रहा है, तब भगवान जगन्नाथ की यह महायात्रा हमें स्मरण कराती है कि धर्म का वास्तविक उद्देश्य विवाद नहीं, बल्कि संवाद है। वर्चस्व नहीं, बल्कि समन्वय है और बाहरी आडम्बर नहीं, बल्कि अंतःकरण की पवित्रता है। यही इस महायात्रा का सनातन संदेश है कि जीवन का रथ तभी सही दिशा में चलता है जब उसमें श्रद्धा, सेवा, समरसता, आत्मसंयम और लोककल्याण के पहिए समान गति से चलते रहें। यही जगन्नाथ महायात्रा की शाश्वत महिमा है और यही इसकी वैश्विक प्रासंगिकता।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार एवं स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 16 Jul 2026 13:00:58 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/a-grand-celebration-of-faith-tradition-and-spiritual-consciousness</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Sutlej Film Controversy पर Ravneet Singh Bittu की राय से क्यों इत्तेफाक नहीं रखते कई BJP Sikh Leaders?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/sutlej-film-controversy-punjab-history-bjp-sikh-leaders]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पंजाब पर आधारित फिल्म सतलुज को लेकर उठा विवाद केवल एक फिल्म का विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह इतिहास की व्याख्या, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, पीड़ितों के न्याय, राजनीतिक दृष्टिकोण और सामाजिक सद्भाव जैसे अनेक संवेदनशील प्रश्नों का केंद्र बन गया है। एक ओर केंद्रीय राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू का कहना है कि सरकार का विरोध जसवंत सिंह खालरा या उनके योगदान से नहीं, बल्कि फिल्म में प्रस्तुत कथित तथ्यगत त्रुटियों और भ्रामक चित्रण से है। दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी के अनेक सिख नेताओं का मानना है कि इतिहास के कठिन अध्यायों को दबाने की बजाय संतुलित दृष्टि से सामने लाना आवश्यक है।</div><div><br></div><div>रवनीत सिंह बिट्टू ने स्पष्ट किया है कि सरकार पंजाब के हिंदू और सिख समाज के बीच सदियों पुराने विश्वास और भाईचारे को किसी भी कीमत पर कमजोर नहीं होने देगी। उनका आरोप है कि देश के भीतर और बाहर सक्रिय कुछ शक्तियां झूठे आख्यानों के माध्यम से समाज में विभाजन पैदा करना चाहती हैं। उनके अनुसार फिल्म में पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह, पूर्व पुलिस महानिदेशक केपीएस गिल, सिख समाज तथा मृतकों की संख्या से संबंधित कई दावे वास्तविक अभिलेखों से मेल नहीं खाते। उन्होंने लोगों से राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग जैसे आधिकारिक अभिलेखों का अध्ययन करने की अपील की और यह भी कहा कि जसवंत सिंह खालरा की पत्नी द्वारा वास्तविक मृतकों की संख्या तय करने के लिए निष्पक्ष आयोग गठित करने की मांग उचित है, ताकि सत्य सामने आ सके।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/satluj-controversy-ravneet-singh-bittu-attacks-diljit-dosanjh" target="_blank">सतलुज विवाद पर रवनीत सिंह बिट्टू ने जो सवाल उठाये हैं क्या दिलजीत दोसांझ उनका जवाब देंगे?</a></h3><div>इसके समानांतर भारतीय जनता पार्टी के कई वरिष्ठ सिख नेताओं ने एक अलग लेकिन महत्वपूर्ण दृष्टिकोण रखा है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, पूर्व पुलिस अधिकारी इकबाल सिंह लालपुरा ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को मर्यादा में रहकर अपनी बात रखनी चाहिए, परंतु इतिहास के किसी हिस्से को केवल इसलिए दबाया नहीं जा सकता क्योंकि वह असहज करता है। उनका कहना था कि उग्रवाद की शुरुआत और उसके कारणों पर भी खुली चर्चा होनी चाहिए तथा केवल एक पक्ष को सामने रखकर पूरे दौर का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।</div><div><br></div><div>वरिष्ठ अधिवक्ता हरविंदर सिंह फूलका ने भी फिल्म के प्रदर्शन का समर्थन करते हुए कहा कि नई पीढ़ी को उग्रवाद के उस कठिन दौर की सच्चाइयों से परिचित कराना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि निर्दोष लोगों की हत्या चाहे उग्रवादियों ने की हो या किसी और ने, उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता और दोषियों को किसी भी आधार पर क्षमा नहीं मिलनी चाहिए। उनका यह भी कहना था कि ऐसी फिल्में आने वाली पीढ़ियों को यह समझाने का माध्यम बन सकती हैं कि पंजाब ने किन कठिन परिस्थितियों को पार किया।</div><div><br></div><div>राज्यसभा सदस्य विक्रमजीत सिंह साहनी ने भी अपेक्षाकृत संतुलित रुख अपनाते हुए कहा कि ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित फिल्मों को कलात्मक प्रस्तुति के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने यह भी माना कि ऐसी फिल्मों से पुराने घाव हरे नहीं होने चाहिए और न ही समाज में नए विभाजन पैदा होने चाहिए। उन्होंने कहा कि फिल्म किसी एक अध्याय पर केंद्रित हो सकती है, इसलिए उसे पूरे उग्रवाद काल का अंतिम इतिहास मानना उचित नहीं होगा। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि फिल्म आतंकवाद का समर्थन नहीं करती और न ही उससे हुई पीड़ा को कम करके दिखाने का प्रयास करती है।</div><div><br></div><div>भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष फतेह जंग बाजवा ने भी अपने परिवार के व्यक्तिगत अनुभवों का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके परिवार ने भी उग्रवाद का दर्द झेला है। इसलिए उस दौर को चित्रित करने के महत्व को समझना चाहिए। उनका मानना था कि पंजाब का सामाजिक सौहार्द आज भी मजबूत है और किसी फिल्म के कारण उसे कमजोर मान लेना उचित नहीं होगा।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि विवाद का सबसे तीखा पक्ष मृतकों और लापता लोगों की संख्या को लेकर सामने आया। बिट्टू ने फिल्म में बताए गए आंकड़ों पर सवाल उठाते हुए कहा कि आधिकारिक अभिलेखों की जांच की जानी चाहिए। वहीं दूसरी ओर कुछ नेताओं ने यह तर्क रखा कि यदि किसी आंकड़े को लेकर भ्रम है तो उसका समाधान निष्पक्ष जांच और प्रमाण आधारित समीक्षा से होना चाहिए, न कि बहस को रोक देने से।</div><div><br></div><div>वास्तव में यह पूरा विवाद इस बात की याद दिलाता है कि इतिहास को न तो राजनीतिक सुविधा के अनुसार गढ़ा जाना चाहिए और न ही भावनात्मक आग्रहों के आधार पर दबाया जाना चाहिए। लोकतंत्र में कला, इतिहास और सार्वजनिक विमर्श का उद्देश्य समाज को बांटना नहीं, बल्कि कठिन प्रश्नों का सामना करने का साहस देना होना चाहिए। साथ ही यह भी उतना ही आवश्यक है कि किसी भी फिल्म, पुस्तक या प्रस्तुति में तथ्य, प्रमाण और संवेदनशीलता का पूरा ध्यान रखा जाए, ताकि पीड़ितों की पीड़ा का सम्मान बना रहे और सामाजिक विश्वास भी कमजोर न हो।</div><div><br></div><div>बहरहाल, समाधान टकराव में नहीं, बल्कि सत्य, संवाद और संतुलन में है। यदि किसी फिल्म में तथ्यगत त्रुटियां हैं तो उनका परीक्षण प्रमाणों के आधार पर होना चाहिए। यदि इतिहास के किसी अध्याय को लंबे समय तक अनदेखा किया गया है तो उस पर भी निष्पक्ष चर्चा होनी चाहिए। पंजाब की सबसे बड़ी शक्ति उसका साझा सामाजिक ताना बाना है। इसलिए आवश्यक है कि इतिहास की पूरी तस्वीर सामने आए, निर्दोषों को न्याय मिले, तथ्यों की निष्पक्ष जांच हो और किसी भी प्रकार का राजनीतिक या वैचारिक आग्रह सामाजिक सद्भाव से ऊपर न रखा जाए। तभी अतीत से सीख लेकर भविष्य को अधिक सुरक्षित और मजबूत बनाया जा सकेगा।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 14 Jul 2026 16:49:47 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/sutlej-film-controversy-punjab-history-bjp-sikh-leaders</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[India First Hydrogen Powered Train धुएं की जगह पानी छोड़ेगी, बिना डीजल और बिना ओवरहेड तार के इस तरह दौड़ेगी ट्रेन]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/india-first-hydrogen-powered-train-explained]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत की रेल व्यवस्था एक नए दौर में प्रवेश करने जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत की पहली हाइड्रोजन चालित रेलगाड़ी को हरी झंडी दिखाएंगे। यह सिर्फ एक नई रेलगाड़ी की शुरुआत नहीं, बल्कि भारतीय रेल के हरित परिवर्तन की दिशा में ऐतिहासिक पहल भी होगी। हरियाणा के जींद से चलने वाली यह रेलगाड़ी देश को स्वच्छ और कम प्रदूषण वाली परिवहन व्यवस्था की ओर ले जाने का प्रयास है। हालांकि इस उपलब्धि के साथ कई तकनीकी और आधारभूत चुनौतियां भी जुड़ी हैं, जिनका समाधान भविष्य की सफलता तय करेगा।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 17 जुलाई को जींद दौरे को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने भी तैयारियां तेज कर दी हैं। राज्यसभा सांसद संजय भाटिया को पूरे कार्यक्रम का संयोजक बनाया गया है और वह स्वयं तैयारियों की लगातार निगरानी कर रहे हैं। केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल खट्टर के करीबी माने जाने वाले भाटिया मंच, पंडाल, बैठक व्यवस्था, वाहन पार्किंग, पेयजल, सुरक्षा और अन्य व्यवस्थाओं का नियमित निरीक्षण कर रहे हैं। प्रधानमंत्री अपने दौरे के दौरान देश की पहली हाइड्रोजन रेलगाड़ी को हरी झंडी दिखाने के साथ हरियाणा की कई विकास परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास भी करेंगे।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/hyderabad-to-become-country-high-speed-train-hub-three-bullet-train-corridors-transform-landscape" target="_blank">Hyderabad बनेगा देश का High-Speed Train Hub, 3 Bullet Train कॉरिडोर से बदलेगी तस्वीर</a></h3><div>उधर, रेलवे के अनुसार यह रेलगाड़ी दुनिया की सबसे लंबी हाइड्रोजन चालित रेलगाड़ियों में शामिल होगी। इसमें आठ यात्री डिब्बे और दो पावर कार होंगे। लगभग दो हजार चार सौ किलोवाट क्षमता वाली यह रेलगाड़ी एक बार में कम से कम छह सौ बयासी यात्रियों को लेकर चल सकेगी। यह जींद और सोनीपत के बीच लगभग नवासी किलोमीटर लंबे मार्ग पर अधिकतम पचहत्तर किलोमीटर प्रति घंटे की गति से चलेगी। प्रतिदिन दो फेरे लगाएगी और कुल तीन सौ छप्पन किलोमीटर की दूरी तय करेगी। इस दौरान लगभग तीन सौ किलोग्राम हाइड्रोजन की खपत होने का अनुमान है।</div><div><br></div><div>कैसे चलेगी हाइड्रोजन रेलगाड़ी यदि इसकी बात करें तो आपको बता दें कि सामान्य विद्युत रेलगाड़ियां ऊपर लगे तारों से मिलने वाली विद्युत धारा पर निर्भर रहती हैं, लेकिन हाइड्रोजन रेलगाड़ी की कार्यप्रणाली पूरी तरह अलग है। इसमें हाइड्रोजन और वायु से प्राप्त ऑक्सीजन को ईंधन कोश में मिलाकर विद्युत ऊर्जा तैयार की जाती है। यही ऊर्जा रेलगाड़ी को गति देती है। इस पूरी प्रक्रिया में कार्बन उत्सर्जन लगभग शून्य रहता है और मुख्य उपोत्पाद के रूप में केवल जल बनता है। यही कारण है कि इसे स्वच्छ परिवहन की दिशा में बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।</div><div><br></div><div>भारतीय रेल की इस परियोजना में प्रत्येक पावर कार में चार एकीकृत पावर पैक लगाए गए हैं। इनमें हाइड्रोजन ईंधन कोश और लिथियम फेरो फास्फेट बैटरी का संयोजन किया गया है। प्रत्येक पावर पैक तीन सौ किलोवाट ऊर्जा देगा, जिसमें एक सौ पंद्रह किलोवाट ईंधन कोश और एक सौ पचासी किलोवाट बैटरी से प्राप्त होगी। चारों पावर पैक मिलकर बारह सौ किलोवाट क्षमता उपलब्ध कराएंगे। चूंकि रेलगाड़ी में दो पावर कार हैं, इसलिए कुल क्षमता चौबीस सौ किलोवाट अर्थात लगभग तीन हजार दो सौ अश्वशक्ति होगी। यह क्षमता समान दूरी तय करने वाली सामान्य विद्युत या डीजल बहु इकाई रेलगाड़ियों के बराबर मानी जा रही है।</div><div><br></div><div>ईंधन कोश और बैटरी के संतुलित तालमेल के बारे में रेलवे अधिकारियों का कहना है कि ईंधन कोश लगातार एक समान ऊर्जा देता है। इसलिए जब रेलगाड़ी चलना शुरू करती है, तब शुरुआती अधिक ऊर्जा की आवश्यकता ईंधन कोश से पूरी होती है। जैसे ही रेलगाड़ी गति पकड़ती है और ऊर्जा की मांग बढ़ती है, बैटरी अतिरिक्त शक्ति उपलब्ध कराती है। दूसरी ओर, जब रेलगाड़ी की गति कम होती है या वह किसी स्टेशन के पास पहुंचती है, तब अतिरिक्त ऊर्जा से बैटरी दोबारा चार्ज हो जाती है। इस व्यवस्था से पूरी यात्रा के दौरान बैटरी लगभग अस्सी प्रतिशत तक भरी रहती है और ऊर्जा की उपलब्धता बनी रहती है।</div><div><br></div><div>हम आपको यह भी बता दें कि हाइड्रोजन रेल तकनीक अभी दुनिया के चुनिंदा देशों तक ही सीमित है। इस तकनीक का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन 2016 में बर्लिन में हुआ था। बाद में जर्मनी ने दो डिब्बों वाली हाइड्रोजन रेलगाड़ी शुरू की, जिसे दुनिया की पहली यात्री हाइड्रोजन रेलगाड़ी माना गया। इसके बाद जापान, चीन और अमेरिका ने भी इस दिशा में कदम बढ़ाए। हालांकि अभी तक इन रेलगाड़ियों का उपयोग मुख्य रूप से छोटी दूरी की सेवाओं तक सीमित है, क्योंकि तकनीक अभी विकास के दौर में है।</div><div><br></div><div>साथ ही हाइड्रोजन रेलगाड़ी की सबसे बड़ी ताकत ही उसकी सबसे बड़ी चुनौती भी है। सामान्य वायुमंडलीय दबाव को एक बार माना जाता है, जबकि हाइड्रोजन को दो सौ से पांच सौ बार के अत्यधिक दबाव पर संग्रहित करना पड़ता है। यह अत्यधिक ज्वलनशील गैस है, इसलिए इसके भंडारण और परिवहन के लिए अत्यंत सुरक्षित व्यवस्था आवश्यक होती है।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि रेलवे ने जींद में तीन हजार किलोग्राम क्षमता वाला ईंधन भरने का केंद्र बनाया है। यहां हाइड्रोजन की आपूर्ति के लिए विशेष शीतलन संयंत्र लगाया गया है, जो ईंधन भरने के दौरान हाइड्रोजन का तापमान शून्य से पंद्रह डिग्री नीचे तक बनाए रखता है। कम तापमान पर हाइड्रोजन द्रव अवस्था के निकट पहुंचती है, जिससे सुरक्षित और प्रभावी ईंधन आपूर्ति संभव होती है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, भारतीय रेल के लिए यह परियोजना केवल एक नई रेलगाड़ी का संचालन नहीं, बल्कि स्वच्छ ऊर्जा आधारित भविष्य की आधारशिला है। यदि हाइड्रोजन के उत्पादन, भंडारण, परिवहन और लागत से जुड़ी चुनौतियों का सफल समाधान निकलता है, तो आने वाले वर्षों में यह तकनीक डीजल आधारित रेल सेवाओं का प्रभावी विकल्प बन सकती है। फिलहाल यह प्रयोग भारत को उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में खड़ा करता है, जिन्होंने पर्यावरण अनुकूल रेल परिवहन की दिशा में ठोस कदम बढ़ाया है। अब सबसे बड़ी परीक्षा इस तकनीक को सुरक्षित, किफायती और व्यापक स्तर पर सफल बनाकर दिखाने की है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 13 Jul 2026 13:25:45 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/india-first-hydrogen-powered-train-explained</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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