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    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
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      <title><![CDATA[विदेश मंत्री रूबियों देश के नेताओं को दिखा गए आईना]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/foreign-minister-rubio-held-up-a-mirror-to-the-country-leaders]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत दौर पर आए अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि दुनिया के हर देश में बेवकूफ लोग होते हैं। हम इन्हें गंभीरता से लेंगे। उन्होंने कहा कि अमेरिका में भी बेवकूफ लोग मौजूद हैं। 'क्वाड्रीलेटरल सिक्योरिटी डायलॉग' (क्वाड) की बैठक में शिरकत करने राजधानी दिल्ली में आए अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने अमरीका में भारतीयों पर नस्लीय हमलों को लेकर यह जवाब दिया।&nbsp;</div><div><br></div><div>रुबियो ने कहा कि मैं नस्लभेदी कमेंट्स को बहुत गंभीरता से लूंगा। मुझे यकीन है कि ऐसे लोग हैं जिन्होंने ऑनलाइन और दूसरी जगहों पर कमेंट्स किए हैं, क्योंकि दुनिया के हर देश में बेवकूफ लोग मौजूद होते हैं। मुझे यकीन है कि यहां भी बेवकूफ लोग हैं, यूनाइटेड स्टेट्स में भी बेवकूफ लोग हैं जो हर समय बेवकूफी भरे कमेंट्स करते हैं। यूनाइटेड स्टेट्स एक बहुत ही वेलकमिंग देश है। दुनिया भर से हमारे देश में आने वाले लोगों से फायदा हुआ है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/trump-invitation-to-pm-modi-to-visit-washington-is-proof-of-growing-ties-between-two-countries" target="_blank">US-India Relations | भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी मजबूत! राष्ट्रपति ट्रंप का पीएम मोदी को वाशिंगटन आने का निमंत्रण दोनों देशों के बढ़ते रिश्तों का 'प्रमाण'</a></h3><div>अमरीकी विदेश मंत्री को शायद अंदाजा होगा कि नस्लवाद, जातिवाद, सांप्रदायिकता और क्षेत्रवाद भारत के अभिन्न अंग हैं। इन मुद्दों पर राजनीतिक करके देश को कमजोर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनाम करने में भारत के राजनीतिक दल ही सबसे आगे हैं। इसमें चाहे विपक्ष हो या सत्ता पक्ष, कोई भी अपने राजनीतिक स्वार्थों को भुनाने में पीछे नहीं रहता। सत्ता में जो भी राजनीतिक दल होता है, वह यंत्रणा और क्रूरता को कानूनी आड़ में जायज ठहराने का प्रयास करता है। इसका देश में सबसे बड़ा उदाहरण है पुलिस हिरासत में होने वाली मौतें।&nbsp;</div><div><br></div><div>अमरीका में एक अश्वेत युवक की पुलिसकर्मियों ने हत्या कर दी थी। इससे पूरे अमरीका में बवाल मच गया था। 25 मई 2020 को मिनियापोलिस शहर में 'डेरेक शॉविन' नामक एक श्वेत पुलिस अधिकारी ने जॉर्ज फ्लॉयड नाम के निहत्थे अश्वेत व्यक्ति की गर्दन पर लगभग 9 मिनट तक अपना घुटना दबाए रखा था, जिससे दम घुटने से उनकी मौत हो गई थी। इस घटना का वीडियो वायरल होने के बाद "ब्लैक लाइव्स मैटर" आंदोलन के तहत अमेरिका के सभी 50 राज्यों में ऐतिहासिक प्रदर्शन हुए। आरोपी पुलिस अधिकारी को हत्या का दोषी ठहराया गया और 2021 में उसे 22.5 साल की जेल की सजा सुनाई गई।&nbsp;</div><div><br></div><div>इसके विपरीत भारत में पुलिस हिरासत में मौतें साधारण घटनाओं में शुमार है। सरकारी तंत्र को ऐसी मौतों से खास फर्क नहीं पड़ता। सरकार ऐसी मौतों को कभी गंभीरता से नहीं लेती। कारण साफ है ऐसी मौतों में कहीं न कहीं प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर सत्तातंत्र जिम्मेदार होता है। यही वजह है कि हिरासत में मौतों जैसे बेहद अमानवीय और संवदेनशील मुद्दे पर भी सरकारें खामोश रहती हैं। विपक्ष जरूर कुछ शोर मचाता है, किन्तु विपक्ष जब सत्ता में रहा होता है, तब भी ऐसी मौतें होती रही हैं, इसलिए सत्ता पक्ष द्वारा गढ़े मुर्दे उखाड़े जाने के भय विपक्ष प्राय: चुप्पी ही साधे रहता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>अदालतों ने भारत में पुलिस हिरासत में मौतें रोकने के प्रयास किए हैं, किन्तु सफल नहीं हो पाई। सुप्रीम कोर्ट ने हिरासत में होने वाली हिंसा को व्यवस्था पर धब्बा बताया था। ऐसी मौतों के मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट का सख़्त सवाल पूछा था कि क्या केंद्र सरकार हमें हल्के में ले रही है? सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा, "अब यह देश इसे बर्दाश्त नहीं करेगा। यह सिस्टम पर धब्बा है। हिरासत में मौतें नहीं हो सकतीं। "शीर्ष अदालत पूरे भारत के पुलिस स्टेशनों में काम न कर रहे सीसीटीवी कैमरों के मुद्दे पर स्वतः संज्ञान लेकर सुनवाई करने के दौरान केंद्र सरकार के खिलाफ यह सख्त टिप्पणी की थी।</div><div><br></div><div>हिरासत में मौतों पर अपवादस्वरूप ही दोषी पुलिसकर्मियों को अदालतों से सजा मिल पाती है। अप्रैल 2026 में, एक ऐतिहासिक और दुर्लभतम फैसले में मदुरै की एक अदालत ने वर्ष 2020 में पुलिस हिरासत में एक पिता (पी. जयराज) और पुत्र (जे. बेनिक्स) की बेरहमी से हत्या करने के मामले में 9 पुलिसकर्मियों को फांसी (मृत्युदंड) की सजा सुनाई। जबकि अधिकतर मामलों में सबूतों के अभाव या गवाहों के मुकरने के कारण पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराना मुश्किल होता है, जिसके चलते कई मामलों में पुलिसकर्मियों को केवल विभागीय कार्रवाई का सामना करना पड़ता है या वे बरी हो जाते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अनुसार वर्ष 2024 में 2,739 लोगों की पुलिस हिरासत में मौत हो गई थी। हिरासत में यातना सत्ता तंत्र की शक्ति और संवैधानिक मूल्यों का घोर दुरुपयोग है। ऐसा इसलिए, क्योंकि हिरासत में रखे गए लोग कमजोर और&nbsp;</div><div>असुरक्षित स्थिति में होते हैं और वहाँ शक्ति का संतुलन भी उनके खिलाफ होता है। जवाबदेही तय करने की स्वतंत्र जांच नहीं हो पाती है, क्योंकि हिरासत में हुई मौतों की जांच अक्सर उसी पुलिस विभाग द्वारा की जाती है, जिनके संरक्षण में ऐसी घटना घटित होती है। यातना के उपयोग को पुलिस बल के भीतर हिंसा की संस्कृति को बढ़ावा देने से जोड़ा गया है।</div><div><br></div><div>भारत में यातना (टॉर्चर) को रोकने या उससे निपटने के लिए अब तक कोई विशेष, स्वतंत्र कानून नहीं बन पाया है। यद्यपि भारत ने 1997 में 'संयुक्त राष्ट्र यातना विरोधी सम्मेलन' पर हस्ताक्षर किए थे，लेकिन वर्तमान में यातना से निपटने के लिए भारतीय दंड संहिता और भारतीय संविधान के प्रावधानों का ही उपयोग किया जाता है। यातना निवारण विधेयक 2010 में लोकसभा द्वारा पारित किया गया था, जिसका उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र के सम्मेलन की पुष्टि करना और यातना को स्पष्ट रूप से दंडनीय अपराध बनाना था। हालाँकि, प्रवर समिति को भेजे जाने और संशोधनों की सिफारिशों के बाद, यह विधेयक लैप्स हो गया और कानून का रूप नहीं ले सका।</div><div><br></div><div>मानवाधिकार समूहों का कहना है कि भारत में हर साल सैकड़ों लोग हिरासत में मारे जाते हैं। उनका कहना है कि संदिग्धों से जबरन कबूलनामा निकलवाने के लिए यातना और दुर्व्यवहार करना पुलिसिंग का हिस्सा बन गया है। संयुक्त राष्ट्र के कई विशेषज्ञों ने भारत से अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के अनुरूप पुलिस व्यवस्था को आधुनिक बनाने के लिए बड़े सुधार करने का आह्वान किया था। लेकिन केंद्र सरकार ने इस पर ध्यान नहीं दिया। जब हिरासत में मौतों को लेकर देश की सरकारों को खास फर्क नहीं पड़ता, तब अमरीकी विदेश मंत्री को अमरीका में मौजूद मामूली से नस्लवाद को लेकर शर्मिंदा होना देश के नेताओं को आईना दिखाने जैसा है।</div><div><br></div><div>- योगेन्द्र योगी</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 06 Jun 2026 16:38:07 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/foreign-minister-rubio-held-up-a-mirror-to-the-country-leaders</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[विकास की अंधी दौड़ में दम तोड़ता पर्यावरण]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/environment-gasping-for-breath-in-the-blind-race-for-development]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पर्यावरण प्रदूषण वर्तमान समय में सबसे बड़ी वैश्विक समस्या है। पिछले तीन दशकों से महसूस किया जा रहा है कि वैश्विक स्तर पर सबसे बड़ी समस्या पर्यावरण से ही जुड़ी है। मानवीय क्रियाकलापों के कारण प्रकृति में लगातार बढ़ते दखल के कारण पृथ्वी पर बहुत से प्राकृतिक संसाधनों का विनाश हुआ है। आधुनिक जीवनशैली, पृथ्वी पर पेड़-पौधों की कमी, पर्यावरण प्रदूषण का विकराल रूप, मानव द्वारा प्रकृति का बेदर्दी से दोहन इत्यादि कारणों से मानव और प्रकृति के बीच असंतुलन की भयावह खाई उत्पन्न हो रही है। जलवायु परिवर्तन और प्रदूषित वातावरण के बढ़ते खतरे हम अब लगातार अनुभव कर रहे हैं। इसीलिए पर्यावरण की सुरक्षा तथा संरक्षण के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 5 जून को पूरी दुनिया में ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा तथा संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) द्वारा 16 जून 1972 को स्टॉकहोम में पर्यावरण के प्रति वैश्विक स्तर पर राजनीतिक और सामाजिक जागृति लाने के लिए यह दिवस मनाने की घोषणा की गई थी और पहला विश्व पर्यावरण दिवस 5 जून 1974 को मनाया गया था। विश्व पर्यावरण दिवस का वर्ष 2026 का विषय ‘प्रकृति से प्रेरित। जलवायु के लिए। हमारे भविष्य के लिए।’</div><div><br></div><div>पर्यावरण की रक्षा और प्रकृति के उचित दोहन को लेकर हालांकि यूरोप, अमेरिका तथा अफ्रीकी देशों में 1910 के दशक से ही समझौतों की शुरूआत हो गई थी किन्तु बीते कुछ दशकों में दुनिया के कई देशों ने इसे लेकर क्योटो प्रोटोकाल, मांट्रियल प्रोटोकाल, रियो सम्मलेन जैसे कई बहुराष्ट्रीय समझौते किए हैं। अधिकांश देशों की सरकारें पर्यावरण को लेकर चिंतित तो दिखती हैं लेकिन पर्यावरण की चिंता के बीच कुछ देश अपने हितों को देखते हुए पर्यावरण संरक्षण की नीतियों में बदलाव करते रहे हैं। प्रदूषित वातावरण का खामियाजा केवल मनुष्यों को ही नहीं बल्कि धरती पर विद्यमान प्रत्येक प्राणी को भुगतना पड़ता है। बड़े पैमाने पर प्रकृति से खिलवाड़ के ही कारण दुनिया के विशालकाय जंगल हर साल सुलगने लगे हैं, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था को खरबों रुपये का नुकसान होने के अलावा दुर्लभ जीव-जंतुओं और वनस्पतियों की अनेक प्रजातियां भी भीषण आग में जलकर राख हो जाती हैं। कोरोना काल में लॉकडाउन के दौरान दुनियाभर में पर्यावरण की स्थिति में सुधार देखा गया था, जिसने बता दिया था कि अगर हम चाहें तो पर्यावरण की स्थिति में काफी हद तक सुधार किया जा सकता है लेकिन दृढ़ इच्छाशक्ति के अभाव में पर्यावरण संरक्षण को लेकर अपेक्षित कदम नहीं उठाए जाते। न केवल भारत में बल्कि वैश्विक स्तर पर तापमान में निरन्तर हो रही बढ़ोतरी और मौसम का लगातार बिगड़ता मिजाज गहन चिंता का विषय बना है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/trending/the-environment-is-the-foundation-of-life" target="_blank">World Environment Day 2026: जीवन का आधार है पर्यावरण</a></h3><div>जलवायु परिवर्तन से निपटने को लेकर चर्चाएं और चिंताएं तो बहुत होती हैं, तरह-तरह के संकल्प भी दोहराये जाते हैं किन्तु सुख-संसाधनों की अंधी चाहत, सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि, अनियंत्रित औद्योगिक विकास और रोजगार के अधिकाधिक अवसर पैदा करने के दबाव के चलते इस तरह की चर्चाएं और चिंताएं अर्थहीन होकर रह जाती हैं। अपनी पुस्तक ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ में मैंने विस्तार से यह स्पष्ट किया है कि धरती में रह-रहकर जो उथल-पुथल की प्राकृतिक घटनाएं घट रही हैं, उनके पीछे छिपे संकेतों और प्रकृति की मूक भाषा को समझना कितना जरूरी है। आधुनिकरण और औद्योगिकीकरण की दौड़ में हमने हर पल प्रकृति की नैतिक सीमाओं का उल्लंघन किया है और ये सब प्रकृति के साथ इंसान की ज्यादतियों का ही नतीजा हैं, जिसके भयावह परिणाम हमारे सामने हैं।</div><div><br></div><div>मानवीय क्रियाकलापों के कारण ही वायुमंडल में कार्बन मोनोक्साइड, नाइट्रोजन, ओजोन और पार्टिक्यूलेट मैटर के प्रदूषण का मिश्रण इतने खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है कि हमें सांस के जरिये असाध्य बीमारियों की सौगात मिल रही है। सीवरेज की गंदगी स्वच्छ जल स्रोतों में छोड़ने की बात हो या औद्योगिक इकाईयों का अम्लीय कचरा नदियों में बहाने की अथवा सड़कों पर रेंगती वाहनों की लंबी-लंबी कतारों से वायुमंडल में घुलते जहर की या फिर सख्त अदालती निर्देशों के बावजूद खेतों में जलती पराली से हवा में घुलते हजारों-लाखों टन धुएं की, हमारी आंखें तब तक नहीं खुलती, जब तक प्रकृति का बड़ा कहर हम पर नहीं टूट पड़ता। पैट्रोल, डीजल से उत्पन्न होने वाले धुएं ने वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड तथा ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा को खतरनाक स्तर तक पहुंचा दिया है। पेड़-पौधे कार्बन डाईऑक्साइड को अवशोषित कर पर्यावरण संतुलन बनाने में अहम भूमिका निभाते रहे हैं लेकिन पिछले कुछ दशकों में वन-क्षेत्रों को बड़े पैमाने पर कंक्रीट के जंगलों में तब्दील कर दिया गया है। धरती का तापमान लगातार बढ़ रहा है, जिसके दुष्परिणाम स्वरूप ध्रुवीय क्षेत्रों में बर्फ पिघल रही है, जिससे समुद्रों का जलस्तर बढ़ने के कारण दुनिया के कई शहरों के जलमग्न होने की आशंका जताई जाने लगी है।</div><div><br></div><div>प्रकृति कभी समुद्री तूफान तो कभी भूकम्प, कभी सूखा तो कभी अकाल के रूप में अपना विकराल रूप दिखाकर हमें निरन्तर चेतावनियां देती रही है कि यदि हम इसी प्रकार प्रकृति के संसाधनों का दोहन करते रहे तो हमारे भविष्य की तस्वीर कैसी होने वाली है लेकिन हम हर बार प्रकृति का प्रचण्ड रूप देखने के बावजूद प्रकृति की इन चेतावनियों को नजरअंदाज कर खुद अपने विनाश को आमंत्रित कर रहे हैं। यदि दुनियाभर में पर्यावरण प्रदूषण की विकराल होती वैश्विक समस्या को देखें तो स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के नाम पर वैश्विक चिंता व्यक्त करने से आगे शायद हम कुछ करना ही नहीं चाहते। ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ पुस्तक’ में बताया गया है कि पर्यावरण का संतुलन डगमगाने के कारण दुनियाभर में लोग तरह-तरह की भयानक बीमारियों के जाल में फंस रहे हैं, उनकी प्रजनन क्षमता पर इसका दुष्प्रभाव पड़ रहा है, उनकी कार्यक्षमता भी इससे प्रभावित हो रही है। लोगों की कमाई का बड़ा हिस्सा बीमारियों के इलाज पर ही खर्च हो जाता है। प्रकृति हमारी मां के समान है, जो हमें अपने प्राकृतिक खजाने से ढ़ेरों बहुमूल्य चीजें प्रदान करती है लेकिन अपने स्वार्थों के चलते हम अगर खुद को ही प्रकृति का स्वामी समझने की भूल करने लगे हैं तो फिर भला प्राकृतिक तबाही के लिए प्रकृति को कैसे दोषी ठहरा सकते हैं?</div><div><br></div><div>- योगेश कुमार गोयल</div><div>(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और पर्यावरण मामलों के जानकार हैं तथा पर्यावरण पर चर्चित पुस्तक ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ लिख चुके हैं)</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 05 Jun 2026 10:46:58 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/environment-gasping-for-breath-in-the-blind-race-for-development</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[आखिर कैसे रूकेंगे मालवीय नगर होटल अग्निकांड जैसे हादसे, जिम्मेदार कौन?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/how-exactly-can-tragedies-like-the-malviya-nagar-hotel-fire-be-prevented-and-who-is-responsible]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>दिल्ली के मालवीय नगर स्थित होटल-अग्निकांड में 21 लोगों की मृत्यु और दर्जनों के घायल होने की घटना केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि सुरक्षा नियमों की संभावित विफलता और प्रशासनिक लापरवाही पर गंभीर प्रश्नचिह्न है। दुर्भाग्य की बात है कि दिल्ली या अन्य महानगरों में हुई ऐसी ही घटनाओं से सिविल/पुलिस प्रशासन ने कोई सीख नहीं ली, जिससे यह हादसा भी नियति का खेल बनकर रह गया। प्रशासन को इसे गम्भीरता से लेना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि भविष्य में ऐसी घटनाओं पर लगाम लगे, जिससे इतनी भारी क्षति नहीं हो पाए।</div><div><br></div><div>प्रारंभिक रिपोर्टों के अनुसार, भवन में केवल एक प्रवेश-निकास मार्ग था, बेसमेंट और ऊपरी मंजिलों में क्षमता से अधिक कमरे संचालित किए जा रहे थे, तथा अग्नि सुरक्षा मानकों के पालन पर भी सवाल उठ रहे हैं। लिहाजा यह प्रश्न मौजूं है कि आखिर इस लोमहर्षक और दर्दनाक घटना का जिम्मेदार कौन? यह ठीक है कि जांच पूरी होने से पहले अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा, लेकिन सामान्यतः ऐसी घटनाओं में जिम्मेदारी कई स्तरों पर तय होती है जो इस प्रकार से समझी जा सकती है:-</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/malviya-nagar-fire-cm-rekha-gupta-calls-for-report-promises-strict-action-visits-max-hospital" target="_blank">Malviya Nagar Fire: CM Rekha Gupta ने रिपोर्ट तलब की, कड़ी कार्रवाई का वादा, मैक्स अस्पताल का किया दौरा</a></h3><div>पहला, होटल मालिक और अदूरदर्शी प्रबंधन: यदि बिना वैध अग्नि सुरक्षा अनुमति (Fire NOC) के संचालन हुआ। यदि निर्धारित क्षमता से अधिक कमरे या अवैध निर्माण किए गए।&nbsp; यदि आपातकालीन निकास, अलार्म और अग्निशमन उपकरण पर्याप्त नहीं थे। तो इसका सीधा तातपर्य है कि होटल मालिक के अदूरदर्शी प्रबंधन ने लोगों को अप्रत्याशित मुसीबत की आग में झुलसने को मजबूर कर दिया और समय पर समुचित मदद उनतक नहीं पहुंच पाई। यह जांच का विषय है और शायद इसी वजह से होटल मालिक को दिल्ली पुलिस ने हिरासत में भी लिया है।</div><div><br></div><div>दूसरा, लाइसेंस और निरीक्षण देने वाली एजेंसियां: यदि नियमों के उल्लंघन के बावजूद संचालन जारी रहा। यदि नियमित निरीक्षण केवल कागजों तक सीमित रहे, तो&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">लाइसेंस जारी करने और निरीक्षण देने वाली एजेंसियों पर उँगली उठनी स्वाभाविक बात है, क्योंकि इनकी लापरवाही या मिलीभगत से न केवल जान-माल की भारी क्षति हुई, बल्कि केंद्र व राज्य सरकार के गुणवत्ता हीन विकास और कथित सुशासन के दावों की भी हवा निकल गई। चूंकि इस अग्निकांड के विदेशी नागरिक भी शिकार बताए जाते हैं, इसलिए विदेशों में भारत की बदनामी स्वाभाविक है और इससे दिल्ली समेत देश का पर्यटन कारोबार भी प्रभावित हो सकता है।</span></div><div><br></div><div>तीसरा, स्थानीय प्रशासन और नगर निकाय: अवैध निर्माण, क्षमता से अधिक उपयोग और सुरक्षा उल्लंघनों की समय रहते पहचान न कर पाना भी जांच का विषय है। चूंकि स्थानीय प्रशासन और नगर निकाय से जुड़े जिम्मेदार लोग भी यदि समय रहते ही खामियां पकड़ लिए होते और स्पष्ट कार्रवाई किये होते तो राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली की इतनी बदनामी नहीं होती।</div><div><br></div><div>इसलिए यक्ष प्रश्न समुपस्थित है कि आखिर कबतक ऐसे दर्दनाक हादसे रुकेंगे और कैसे रुकेंगे? इसका जवाब निम्नतम हो सकता है:-&nbsp;</div><div><br></div><div>पहला, शून्य-सहनशीलता नीति: बिना Fire NOC वाले होटल, गेस्ट हाउस और रेस्तरां तत्काल बंद किए जाएं। दूसरा, डिजिटल और सार्वजनिक निरीक्षण: सभी होटलों की अग्नि सुरक्षा स्थिति ऑनलाइन सार्वजनिक हो ताकि ग्राहक भी देख सकें कि होटल सुरक्षित है या नहीं। तीसरा, बहु-निकास अनिवार्य: एक ही प्रवेश-निकास वाले भवनों को होटल या व्यावसायिक उपयोग की अनुमति न दी जाए। चौथा, आपातकालीन अभ्यास: होटल कर्मचारियों और अतिथियों के लिए नियमित फायर ड्रिल अनिवार्य हो। पांचवां, व्यक्तिगत जवाबदेही: केवल जुर्माना नहीं, बल्कि गंभीर लापरवाही साबित होने पर होटल मालिकों और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई हो।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">छठा, नागरिक जागरूकता: होटल में ठहरते समय लोगों को भी आपातकालीन निकास, अग्निशमन यंत्र और सुरक्षा संकेतों पर ध्यान देना चाहिए।</span></div><div><br></div><div>इस घटना से हमें व्यापक सबक मिलती है, क्योंकि यह घटना हमें यह याद दिलाती है कि भारत में कई बार हादसों के बाद जांच और मुआवजे की घोषणा तो होती है, लेकिन सुरक्षा संस्कृति में अपेक्षित बदलाव नहीं आता। 2019 के दिल्ली होटल अग्निकांड सहित कई बड़ी आग की घटनाओं के बाद भी वही समस्याएं—एकमात्र निकास, अवैध निर्माण, और सुरक्षा मानकों की अनदेखी—दोहराई जाती रही हैं। ऐसे में फिर यदि जांच में सुरक्षा नियमों की अनदेखी सिद्ध होती है, तो जिम्मेदारी केवल होटल मालिक तक सीमित नहीं रहनी चाहिए; उन सभी संस्थाओं और अधिकारियों की भी जवाबदेही तय होनी चाहिए जिनकी निगरानी में यह व्यवस्था चल रही थी।&nbsp;</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 04 Jun 2026 14:50:25 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Shaurya Path: आकाश पर राज करेगी Indian Air Force, South Asia में ताकत के सारे समीकरण बदलकर रख देंगे 114 Rafale Jets]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/indian-air-force-will-rule-the-skies-114-rafale-jets-will-change-the-equations-of-south-asia]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत ने एक बार फिर चीन और पाकिस्तान को साफ चेतावनी दे दी है कि अब नया भारत सिर्फ जवाब नहीं देता, बल्कि दुश्मन की रणनीति को जड़ से तोड़ने की ताकत रखता है। हम आपको बता दें कि भारतीय वायुसेना के लिए 114 राफेल युद्धक विमानों की खरीद का फैसला दक्षिण एशिया में ताकत का पूरा समीकरण बदलने वाली चाल है। करीब तीन लाख पच्चीस हजार करोड़ रुपये के इस महा समझौते ने बीजिंग और इस्लामाबाद दोनों की नींद उड़ा दी है। खास बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फ्रांस यात्रा से ठीक पहले उठाया गया यह कदम दुनिया को साफ संदेश देता है कि भारत अपनी सैन्य ताकत को किसी भी कीमत पर कमजोर नहीं पड़ने देगा।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो भारतीय वायुसेना इस समय अपने इतिहास के सबसे कठिन दौर में खड़ी है। स्वीकृत 42.5 पांच स्क्वॉड्रन के मुकाबले उसके पास केवल 29 स्क्वॉड्रन बचे हैं। दूसरी ओर चीन तेजी से अपने पांचवीं और छठी पीढ़ी के युद्धक विमानों का जाल खड़ा कर रहा है। चीन के पास पहले से जे-20 और जे-35 जैसे स्टेल्थ विमान सक्रिय हैं, जबकि वह जे-36 और जे-50 जैसे अगली पीढ़ी के विमानों का परीक्षण भी कर रहा है। पाकिस्तान भी चीन के सहयोग से जे-35 ए जैसे स्टेल्थ विमान हासिल करने की तैयारी में है। ऐसे माहौल में भारत का राफेल पर दांव केवल जरूरत नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का निर्णायक प्रश्न बन चुका है।</div><div><br></div><div>भारतीय वायुसेना ने पिछले वर्षों में जिस अदम्य साहस और पराक्रम का प्रदर्शन किया है, उसने दुनिया को भारत की नई सैन्य सोच का परिचय दिया है। बालाकोट से लेकर वास्तविक नियंत्रण रेखा तक भारतीय वायुसेना ने यह साबित किया कि वह दुश्मन के घर में घुसकर जवाब देने की क्षमता रखती है। अब वही वायुसेना राफेल जैसे घातक और आधुनिक युद्धक विमानों से और अधिक प्रचंड होने जा रही है। देखा जाये तो राफेल केवल विमान नहीं, बल्कि हवा में भारत की दहाड़ है। इसकी मारक क्षमता, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली, लंबी दूरी तक सटीक हमला करने की ताकत और दुश्मन की वायु रक्षा को ध्वस्त करने की क्षमता इसे बेहद घातक बनाती है।</div><div><br></div><div>सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस समझौते के तहत अठारह विमान सीधे फ्रांस से आएंगे, जबकि 96 विमानों का निर्माण भारत में होगा। यह पहली बार होगा जब राफेल का निर्माण फ्रांस के बाहर किया जाएगा। लगभग पचास प्रतिशत स्वदेशीकरण के साथ यह कार्यक्रम भारत को केवल खरीदार नहीं, बल्कि रक्षा निर्माण शक्ति बनाने की दिशा में ऐतिहासिक कदम है। इससे भारत की रक्षा औद्योगिक क्षमता बढ़ेगी, हजारों रोजगार पैदा होंगे और भविष्य में स्वदेशी युद्धक विमान कार्यक्रमों को भी नई गति मिलेगी।</div><div><br></div><div>हालांकि यह भी सच है कि केवल राफेल से पूरी समस्या का समाधान नहीं होगा। मिग-29, मिराज-2000 और जगुआर जैसे पुराने विमान अगले दशक में सेवा से बाहर होने लगेंगे। दूसरी ओर तेजस मार्क-1 ए और तेजस मार्क-2 जैसी स्वदेशी परियोजनाएं देरी से जूझ रही हैं। ऐसे में भारतीय वायुसेना को संख्या और तकनीक दोनों स्तरों पर दबाव का सामना करना पड़ रहा है। लेकिन इस संकट के बीच भी भारत ने बहुस्तरीय रणनीति अपनाई है। एक ओर राफेल, दूसरी ओर उन्नत मध्यम युद्धक विमान कार्यक्रम और साथ ही मानव रहित युद्धक प्रणालियों पर निवेश, यह दिखाता है कि नई दिल्ली आने वाले बीस वर्षों की हवाई शक्ति संरचना तैयार कर रही है।</div><div><br></div><div>हम आपको यह भी बता दें कि दुनिया की दो बड़ी छठी पीढ़ी की परियोजनाएं भी इस समय संकट में हैं। ब्रिटेन, इटली और जापान का वैश्विक युद्धक विमान कार्यक्रम वित्तीय संकट और देरी का शिकार है, जबकि फ्रांस, जर्मनी और स्पेन की भविष्य वायु युद्ध प्रणाली आंतरिक टकराव में फंसी हुई है। भारत ने इन दोनों परियोजनाओं में रुचि दिखाई थी, लेकिन अब वहां अनिश्चितता बढ़ गई है। यही कारण है कि भारत ने तत्काल सामरिक मजबूती के लिए राफेल पर भरोसा बढ़ाया है।</div><div><br></div><div>इसके अलावा, रूस का सुखोई-57 भी चर्चा में है। रूस भारत को तकनीक हस्तांतरण, स्रोत कोड और भारत में निर्माण जैसे आकर्षक प्रस्ताव दे रहा है। कई पूर्व वायुसेना अधिकारियों का मानना है कि सीमित संख्या में सुखोई-57 विमानों की खरीद भारत के लिए अंतरिम समाधान हो सकती है। लेकिन भारत फिलहाल किसी एक देश पर पूरी तरह निर्भर होने की बजाय बहुध्रुवीय रक्षा रणनीति अपना रहा है। यही भारत की सबसे बड़ी ताकत है।</div><div><br></div><div>प्रधानमंत्री मोदी की आगामी फ्रांस यात्रा इस पूरे घटनाक्रम को और अधिक महत्वपूर्ण बना देती है। यह यात्रा भारत और फ्रांस के बीच उभरती सामरिक साझेदारी का निर्णायक चरण साबित हो सकती है। अमेरिका के साथ हाल के तनाव और पश्चिमी देशों की अनिश्चित नीतियों के बीच फ्रांस ऐसा साझेदार बनकर उभरा है जो भारत को तकनीक, उत्पादन और रणनीतिक सहयोग तीनों देने को तैयार दिख रहा है। चीन को घेरने की वैश्विक रणनीति में भारत और फ्रांस का यह गठजोड़ हिंद महासागर से लेकर प्रशांत क्षेत्र तक नई शक्ति संतुलन रचना कर सकता है।</div><div><br></div><div>दक्षिण एशिया में इसका सबसे गहरा असर पाकिस्तान पर पड़ेगा। पाकिस्तान पहले ही आर्थिक संकट और सैन्य निर्भरता से जूझ रहा है। ऐसे समय में भारत का 200 से अधिक राफेल विमानों की दिशा में बढ़ना पाकिस्तान की वायु शक्ति को पूरी तरह असंतुलित कर देगा। चीन भले ही पाकिस्तान को आधुनिक हथियार दे, लेकिन भारतीय वायुसेना का युद्ध अनुभव, प्रशिक्षण स्तर और तकनीकी समन्वय पाकिस्तान के लिए भय का कारण बना रहेगा। राफेल की मौजूदगी से भारत को दो मोर्चों पर युद्ध की स्थिति में भी निर्णायक बढ़त मिलने की संभावना मजबूत होगी।</div><div><br></div><div>बहरहाल, स्पष्ट है कि यह समझौता भारत की नई सैन्य सोच का उद्घोष है। संदेश बिल्कुल साफ है कि भारत अब इंतजार नहीं करेगा, भारत अब जवाब देगा। भारतीय वायुसेना की गर्जना आने वाले वर्षों में और प्रचंड होने वाली है। राफेल के पंखों पर सवार होकर भारत केवल अपनी सीमाएं सुरक्षित नहीं करेगा, बल्कि पूरे एशिया में शक्ति संतुलन की नई कहानी लिखेगा।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 03 Jun 2026 14:39:42 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/indian-air-force-will-rule-the-skies-114-rafale-jets-will-change-the-equations-of-south-asia</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Myanmar President Min Aung Hlaing India Visit Analysis: PM Modi की बड़ी रणनीतिक जीत! China को मिला करारा जवाब]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/modi-diplomacy-is-a-miracle-myanmar-warns-opponents-of-india]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत और म्यांमार के बीच संबंधों को नई रणनीतिक धार देने वाली उच्चस्तरीय वार्ता ने दक्षिण पूर्व एशिया की बदलती भू राजनीतिक तस्वीर में बड़ा संदेश दिया है। म्यांमार के राष्ट्रपति यू मिन आंग ह्लाइंग ने राष्ट्रपति बनने के बाद अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए भारत को चुनकर साफ संकेत दिया कि वह चीन की बढ़ती पकड़ से संतुलन बनाने के लिए नई दिल्ली के साथ संबंधों को प्राथमिकता देना चाहते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि ह्लाइंग ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को स्पष्ट आश्वासन दिया कि म्यांमार की धरती का उपयोग भारत विरोधी गतिविधियों के लिए नहीं होने दिया जाएगा। यह संदेश केवल चीन के लिए ही नहीं बल्कि म्यांमार में सक्रिय उन सशस्त्र गुटों के लिए भी था जो लंबे समय से भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में अशांति फैलाने की कोशिश करते रहे हैं। इस वार्ता के जरिए भारत ने म्यांमार में चीन के बढ़ते प्रभाव को चुनौती देते हुए यह दिखा दिया कि क्षेत्रीय सुरक्षा, सीमा प्रबंधन और सामरिक साझेदारी के मामले में नई दिल्ली अब अधिक आक्रामक और निर्णायक भूमिका निभा रही है।</div><div><br></div><div>विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने वार्ता के बाद बताया कि दोनों देशों के बीच महत्वपूर्ण खनिजों और दुर्लभ मृदा तत्वों को लेकर सहयोग पर गंभीर चर्चा हुई। यह क्षेत्र आज वैश्विक राजनीति और आर्थिक प्रतिस्पर्धा का अहम हिस्सा बन चुका है क्योंकि आधुनिक प्रौद्योगिकी, रक्षा उपकरण, ऊर्जा परिवर्तन और अर्धचालक उद्योग में इन खनिजों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत लंबे समय से इन संसाधनों के लिए चीन पर निर्भरता कम करने की दिशा में प्रयासरत है। ऐसे में म्यांमार के साथ सहयोग भारत के लिए रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। म्यांमार दुर्लभ मृदा संसाधनों से समृद्ध देश है और भारत इस क्षेत्र में साझेदारी के माध्यम से अपनी आपूर्ति श्रृंखला को अधिक सुरक्षित और विविध बनाना चाहता है।</div><div><br></div><div>दोनों नेताओं ने व्यापार, निवेश, संपर्क, सुरक्षा, क्षमता निर्माण और सीमा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति व्यक्त की। विदेश मंत्रालय ने बताया कि प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत म्यांमार का विश्वसनीय पड़ोसी, भरोसेमंद सहयोगी और संकट के समय सबसे पहले सहायता पहुंचाने वाला देश बना रहेगा। यह दृष्टिकोण भारत की ‘पड़ोसी प्रथम’, ‘एक्ट ईस्ट’ और ‘महासागर’ नीति के अनुरूप है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/india-backs-myanmar-sovereignty-vows-mutual-security" target="_blank">India-Myanmar Talks: साइबर घोटालों पर PM Modi का सख्त रुख, फंसे भारतीयों की वापसी पर बनी सहमति</a></h3><div>वार्ता में सुरक्षा सहयोग सबसे महत्वपूर्ण विषयों में शामिल रहा। म्यांमार के राष्ट्रपति ने भारत को आश्वासन दिया कि उनकी भूमि का उपयोग भारत विरोधी गतिविधियों के लिए नहीं होने दिया जाएगा। यह आश्वासन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत और म्यांमार के बीच लगभग सोलह सौ चालीस किलोमीटर लंबी सीमा है, जो अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर और मिजोरम जैसे संवेदनशील पूर्वोत्तर राज्यों से जुड़ी हुई है। हम आपको बता दें कि हाल के वर्षों में म्यांमार के भीतर अस्थिरता, सशस्त्र समूहों की गतिविधियां, अवैध तस्करी और सीमा पार घुसपैठ भारत की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ाती रही हैं। विशेष रूप से मणिपुर में जातीय तनाव और हिंसा के बाद सीमा प्रबंधन का महत्व और बढ़ गया है।</div><div><br></div><div>भारत और म्यांमार के बीच रक्षा सहयोग का केंद्र प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण और संस्थागत विकास रहा है। विदेश सचिव ने कहा कि म्यांमार के सैनिकों को संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों से जुड़े प्रशिक्षण भी दिए जाते हैं। साथ ही दोनों देशों ने संपर्क परियोजनाओं को तेजी से पूरा करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। विशेष रूप से कलादान बहु माध्यम पारगमन परिवहन परियोजना को रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस परियोजना के माध्यम से भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को म्यांमार के रास्ते दक्षिण पूर्व एशिया से जोड़ा जाएगा। इससे न केवल व्यापार और आर्थिक गतिविधियों को गति मिलेगी, बल्कि पूर्वोत्तर भारत का रणनीतिक महत्व भी बढ़ेगा। यह परियोजना भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति का प्रमुख आधार मानी जाती है।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो इस पूरी वार्ता का एक महत्वपूर्ण पहलू चीन के बढ़ते प्रभाव की पृष्ठभूमि भी है। दक्षिण पूर्व एशिया में चीन लगातार आर्थिक और सामरिक विस्तार कर रहा है। म्यांमार में भी चीन की बड़ी निवेश परियोजनाएं और बंदरगाह विकास योजनाएं चल रही हैं। ऐसे में भारत म्यांमार के साथ संबंधों को मजबूत कर क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखना चाहता है। भारत के लिए म्यांमार केवल पड़ोसी देश नहीं बल्कि पूर्वोत्तर भारत को दक्षिण पूर्व एशिया से जोड़ने वाला सामरिक द्वार है। इसलिए नई दिल्ली इस संबंध को आर्थिक, राजनीतिक और सुरक्षा तीनों स्तरों पर मजबूत करने की कोशिश कर रही है। प्रधानमंत्री मोदी ने म्यांमार में शांति, स्थिरता और समावेशी संवाद के समर्थन की भी बात कही। भारत ने संघीय शासन व्यवस्था और आर्थिक विकास के अपने अनुभव साझा करने की पेशकश की। यह संकेत देता है कि भारत म्यांमार में स्थिर राजनीतिक व्यवस्था और दीर्घकालिक शांति को क्षेत्रीय स्थिरता के लिए आवश्यक मानता है।</div><div><br></div><div>हम आपको यह भी बता दें कि म्यांमार के राष्ट्रपति यू मिन आंग ह्लाइंग ने अपनी भारत यात्रा के दौरान विदेश मंत्री एस जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल से भी महत्वपूर्ण मुलाकात की। इन बैठकों में सीमा सुरक्षा, पूर्वोत्तर क्षेत्र में सक्रिय उग्रवादी गुटों की गतिविधियां, अवैध हथियार और नशीले पदार्थों की तस्करी, समुद्री सुरक्षा तथा क्षेत्रीय स्थिरता जैसे मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई। भारत ने साफ किया कि म्यांमार की स्थिरता और वहां शांति बहाली भारत की सुरक्षा से सीधे जुड़ी हुई है। अजित डोभाल के साथ हुई बातचीत में सामरिक सहयोग, खुफिया समन्वय और सीमा पार आतंकी नेटवर्क पर निगरानी मजबूत करने पर विशेष जोर दिया गया। विदेश मंत्री एस जयशंकर के साथ बैठक में व्यापार, संपर्क परियोजनाओं, ऊर्जा सहयोग और पूर्वोत्तर भारत को दक्षिण पूर्व एशिया से जोड़ने वाली योजनाओं को तेजी से आगे बढ़ाने पर सहमति बनी।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो म्यांमार के राष्ट्रपति की यह यात्रा ऐसे समय में हुई है जब पूरा क्षेत्र भू राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, आपूर्ति श्रृंखला संकट और सुरक्षा चुनौतियों के दौर से गुजर रहा है। इस यात्रा ने स्पष्ट किया है कि भारत और म्यांमार अपने संबंधों को केवल पारंपरिक पड़ोसी संबंधों तक सीमित नहीं रखना चाहते, बल्कि उन्हें व्यापक रणनीतिक साझेदारी में बदलना चाहते हैं। दुर्लभ खनिजों से लेकर सीमा सुरक्षा और संपर्क परियोजनाओं तक, दोनों देशों की बढ़ती निकटता आने वाले समय में दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया की राजनीति पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकती है।</div><div><br></div><div>कुल मिलाकर म्यांमार के साथ यह पूरी कूटनीतिक पहल मोदी सरकार की सक्रिय और दूरदर्शी विदेश नीति का मजबूत उदाहरण बनकर सामने आई है। ऐसे समय में जब चीन दक्षिण पूर्व एशिया में अपना प्रभाव तेजी से बढ़ा रहा है, भारत ने म्यांमार के साथ सामरिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंधों को नई मजबूती देकर यह स्पष्ट कर दिया है कि वह क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने में माहिर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भारत ने एक ओर जहां अपने पूर्वोत्तर की सुरक्षा चिंताओं को मजबूती से उठाया, वहीं दूसरी ओर संपर्क परियोजनाओं, व्यापार और रणनीतिक साझेदारी के जरिए म्यांमार को भरोसेमंद सहयोग का संदेश भी दिया। यह कूटनीतिक सफलता केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति, क्षेत्रीय सुरक्षा रणनीति और एशिया में बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्धा के बीच उसकी मजबूत होती भूमिका भी साफ दिखाई देती है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 01 Jun 2026 19:30:38 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/modi-diplomacy-is-a-miracle-myanmar-warns-opponents-of-india</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Hindi Journalism Day: हिन्दी पत्रकारिता की दशा और दिशा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-state-and-direction-of-hindi-journalism]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत में प्रेस ने लगभग प्रत्येक महत्वपूर्ण अवसर पर अपनी महत्ता सिद्ध की है, फिर चाहे भारत-पाक युद्ध हो या भारत-चीन लड़ाई अथवा अन्य कोई चुनौतीपूर्ण अवसर। यह कहना भी असंगत नहीं होगा कि हिन्दी पत्रकारिता का स्थान इसमें सर्वोपरि रहा है। हिन्दी भाषी समाचारपत्र हों अथवा पत्रिकाएं, उनका देश की बहुसंख्यक आबादी के साथ सदैव विशेष जुड़ाव रहा है और इस दृष्टि से राष्ट्र की एकता, अखण्डता एवं विकास की दिशा में हिन्दी पत्रकारिता की भूमिका को कदापि नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हालांकि हिन्दी पत्रकारिता के 200 वर्षों के इतिहास में समय के साथ पत्रकारिता के मायने और उद्देश्य बदलते रहे हैं किन्तु उसके बावजूद सुखद स्थिति यह है कि हिन्दी पत्रकारिता के पाठकों या दर्शकों की रूचि में कोई कमी नहीं आई। यह अलग बात है कि अंग्रेजी मीडिया और उससे जुड़े कुछ पत्रकारों ने भले ही हिन्दी पत्रकारिता की उपेक्षा करते हुए सदैव उसकी प्रामाणिकता एवं विश्वसनीयता पर सवाल उठाने की कोशिशें की हैं किन्तु वास्तविकता यही है कि पिछले कुछ दशकों में हिन्दी पत्रकारिता ने अपनी ताकत का बखूबी अहसास कराया है और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी उसकी विश्वसनीयता बढ़ी है। यह हिन्दी पत्रकारिता की बढ़ती ताकत का ही नतीजा है कि कुछ हिन्दी अखबारों ने अनेक संस्करणों के साथ प्रसार संख्या के मामले में कुछ अंग्रेजी अखबारों को भी पीछे छोड़ दिया है।</div><div><br></div><div>हिन्दी पत्रकारिता की शुरूआत 30 मई 1826 को कानपुर निवासी पं. युगुल किशोर शुक्ल द्वारा प्रथम हिन्दी समाचार पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ के प्रकाशन के साथ हुई थी, जिसका अर्थ था ‘समाचार सूर्य’। उस समय अंग्रेजी, फारसी और बांग्ला में कई समाचारपत्र निकल रहे थे किन्तु हिन्दी का पहला समाचारपत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ 30 मई 1826 को कलकत्ता से पहली बार प्रकाशित हुआ था, जो साप्ताहिक के रूप में आरंभ किया गया था। पहली बार उसकी केवल 500 प्रतियां ही छापी गई थी लेकिन चूंकि कलकत्ता में हिन्दी भाषियों की संख्या काफी कम थी और इसके पाठक कलकत्ता से बहुत दूर के भी होते थे, इसीलिए संसाधनों की कमी के कारण यह लंबे समय तक प्रकाशित नहीं हो पाया। 4 दिसम्बर 1826 से ‘उदन्त मार्तण्ड’ का प्रकाशन बंद कर दिया गया लेकिन इस समाचारपत्र के प्रकाशन के साथ ही हिन्दी पत्रकारिता की ऐसी नींव रखी जा चुकी थी कि उसके बाद से हिन्दी पत्रकारिता ने अनेक आयाम स्थापित किए हैं। ‘उदन्त मार्तण्ड’ के बाद अंग्रेजी शासनकाल में अनेक हिन्दी समाचारपत्र व पत्रिकाएं एक मिशन के रूप में निकलते गए किन्तु ब्रिटिश शासनकाल की ज्यादतियों के चलते उन्हें लंबे समय तक चलाते रहना बड़ा मुश्किल था, फिर भी कुछ पत्र-पत्रिकाओं ने सराहनीय सफर तय किया। अब परिस्थितियां बिल्कुल बदल चुकी हैं और हिन्दी पत्रकारिता भी मिशन न रहकर एक बड़ा व्यवसाय बन गई है किन्तु अच्छी बात यह है कि आज भी हिन्दी पाठक व दर्शक अपनी-अपनी पसंद के अखबारों व चैनलों के साथ पूरी शिद्दत से जुड़े हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/trending/biodiversity-conservation-is-essential-for-the-ecosystem" target="_blank">International Day for Biological Diversity: इको सिस्टम के लिए जरूरी है जैव विविधता संरक्षण</a></h3><div>बहरहाल, घर बैठे-बैठे दुनिया की सैर कराने की बात हो या देश-विदेश की हर छोटी-बड़ी हलचल से लेकर तमाम ज्वलंत मुद्दों और हर प्रकार की नवीनतम जानकारियों को जुटाकर अपने पाठकों या दर्शकों के सामने प्रस्तुत करने की, व्यवसायीकरण के आरोपों या तमाम विरोधाभासों के बावजूद हिन्दी पत्रकारिता भी यह काम बखूबी कर रही है और आमजन के भरोसे पर खरा उतरते हुए हिन्दी पत्रकारिता आज आम जनजीवन का अभिन्न अंग बन चुकी है। अधिकांश हिन्दी समाचारपत्रों के अब ऑनलाइन संस्करण उपलब्ध हैं। विगत कुछ वर्षों में देश में बड़े-बड़े घोटालों का पर्दाफाश करके अनेक सफेदपोशों के चेहरों पर पड़े नकाब उतार फैंकने का श्रेय भी पत्रकारिता जगत को ही जाता है, जिसमें हिन्दी पत्रकारिता की भूमिका को भी किसी भी लिहाज से कमतर नहीं आंका जा सकता।</div><div><br></div><div>जहां तक राष्ट्रीय अखंडता में प्रेस की भूमिका और इसके दायित्वों का प्रश्न है तो प्रेस के कई प्रमुख दायित्व माने गए हैं, जिनमें कानून व्यवस्था की खामियों को प्रकाशित-प्रसारित करना, अपने प्रयासों से शासन को सुव्यवस्थित करना व लोक हितकारी बनाना, पथभ्रष्टों को सन्मार्ग पर लाना, भ्रष्ट तंत्र को चौकन्ना बनाना, असामाजिक तत्वों पर कड़ी नजर रखना, समाज के विभिन्न क्षेत्रों में पर्दे की ओट में होने वाले दुष्कृत्यों, अत्याचारों व अन्याय का जनहित में पर्दाफाश करना, समाज व मानवता के गुनाहगार चेहरों पर पड़े नकाब नोचकर जनता के सामने लाना, निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए धार्मिकता एवं राजनीति की आड़ लेने वालों के राज पर्दाफाश करना, समाज में स्वस्थ मानक स्थापित करना, लोक चेतना जागृत करना इत्यादि शामिल हैं। प्रेस की भूमिका पर टिप्पणी करते हुए महात्मा गांधी ने कहा था, ‘‘प्रेस का प्रथम उद्देश्य जनता की इच्छाओं व विचारों को समझना और उन्हें सही ढ़ंग से व्यक्त करना है जबकि दूसरा उद्देश्य जनता में वांछनीय भावनाओं को जागृत करना और तीसरा उद्देश्य सार्वजनिक दोषों को निर्भयतापूर्वक प्रकट करना है।’’</div><div><br></div><div>लोकतंत्र में प्रेस की भूमिका के बारे में पूर्व राष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा ने कहा था कि प्रेस पर लोकतांत्रिक परम्पराओं की रक्षा करने और शांति व भाईचारा बढ़ाने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। राष्ट्रीय अखण्डता के संदर्भ में पत्रकारिता की भूमिका की बात करें तो लोकतंत्र के अन्य स्तंभों के मुकाबले प्रेस की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि विश्वभर में भारत की प्रतिष्ठा के जो तीन प्रमुख कारण माने गए हैं, वे हैं जागरूक मतदाता, स्वतंत्र न्यायपालिका व स्वतंत्र प्रेस। भारत में प्रेस को जनता की एक ऐसी ‘संसद’ की उपाधि दी गई है, जिसका कभी सत्रावसान नहीं होता और जो सदैव जनता के लिए ही कार्य करती है। इसे समाज में परिवर्तन लाने का अथवा उसे जागृत करने के लिए जन संचार का सशक्त माध्यम माना गया है। प्रेस को समाज की चिंतन प्रक्रिया का एक ऐसा अनिवार्य तत्व माना गया है, जो उसे दिशा व गति देने में सक्षम हो। इसे जनता की ऐसी आंख माना गया है, जो सभी पर अपनी पैनी और निष्पक्ष दृष्टि रखे। प्रेस को जनता की उंगली माना गया है, जो गलत कार्यों के विरोध में स्वतः ही उठ जाती है। प्रेस को समाज के प्रति पूर्ण समर्पण के रूप में देखा जाता है। इसे केवल एक पेशा न मानकर जनसेवा का सबसे बड़ा माध्यम माना गया है।</div><div><br></div><div>वर्तमान में जहां देशभर में नैतिक मूल्यों में बड़ी गिरावट आई है और राजनीतिज्ञों, विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायिक व्यवस्था पर से लोगों का विश्वास कम हो रहा है, वहीं हिन्दी पत्रकारिता भी इस नैतिक पतन का शिकार होने से नहीं बची है। फिर भी इतना संतोष तो किया ही जा सकता है कि इसने इसके बावजूद अधिकांश अवसरों पर सराहनीय भूमिका निभाई है। हालांकि आज के पूर्ण व्यावसायिकता के दौर में पत्रकारिता को अव्यावसायिक बनाए रखने की बात करना बेमानी होगा क्योंकि इस पेशे से जुड़े लोगों को भी अपने परिवार के पालन-पोषण के लिए इसे एक व्यवसाय के रूप में अपनाना अनिवार्य होता गया है लेकिन व्यावसायिकता के इस दौर में भी इसे एक उद्योग-धंधे के रूप में स्थापित करने के प्रयासों के चलते पत्रकारिता के मानदंडों को ताक पर रखने की प्रवृति से तो हर हाल में बचना ही चाहिए।</div><div><br></div><div>- योगेश कुमार गोयल</div><div>(लेखक 36 वर्षों से हिन्दी पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’, ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ सहित कई चर्चित पुस्तकों के लेखक हैं)</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 30 May 2026 12:21:37 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-state-and-direction-of-hindi-journalism</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[हीट वेव की गिरफ्त में भारत: तपती धरती, तड़पता जीवन]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/india-in-the-grip-of-a-heatwave-scorching-earth-suffering-life]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बदलती जलवायु के कारण भारत सहित दुनिया के अनेक हिस्से भीषण हीट वेव की चपेट में है। अब यह संकट पारंपरिक क्षेत्रों से निकलकर तटीय इलाकों तक फैल चुका है। अंधाधुंध शहरीकरण, घटती हरियाली और कंक्रीट के बढ़ते निर्माण से ‘अर्बन हीट आइलैंड’ का प्रभाव बढ़ रहा है, जिससे दिन और रातें अत्यधिक गर्म हो रही हैं। राजस्थान के बाड़मेर से लेकर दिल्ली की गलियों और विदर्भ के मैदानों तक पारा 45 डिग्री सेल्सियस के स्तर को पार कर चुका है। यह केवल बढ़ते तापमान का आंकड़ा नहीं है बल्कि यह एक गहराता सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट और आर्थिक चेतावनी है। हीट वेव अब केवल मौसमी असुविधा नहीं बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और मानव अस्तित्व के लिए गंभीर संकट बन चुकी है। बढ़ते तापमान, घटती हरियाली और कंक्रीट के फैलते जंगलों ने जीवन को लू की लपटों में समेट दिया है।</div><div><br></div><div>मौसम विभाग और पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के ताजा आंकड़ों ने एक डरावनी तस्वीर पेश की है। पिछले चार दशकों में हीट वेव (लू) से होने वाली मौतों में 62 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। गौर करने वाली बात यह है कि हीट वेव अब केवल अपने पारंपरिक गढ़ (उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत) तक सीमित नहीं रही बल्कि इसने दक्षिण भारत के उन तटीय इलाकों को भी अपनी चपेट में ले लिया है, जो ऐतिहासिक रूप से कम ताप प्रभावित रहते थे। अध्ययन बताते हैं कि 1981 से 2000 के बीच लू की औसत अवधि जहां 2.5 से 5.5 दिन थी, वहीं 2001 से 2020 के बीच यह बढ़कर 8.5 दिन तक पहुंच गई। लू का भौगोलिक दायरा भी 11.9 लाख वर्ग किलोमीटर से फैलकर 18.1 लाख वर्ग किलोमीटर हो चुका है। यह विस्तार बताता है कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की आशंका नहीं, वर्तमान की कड़वी हकीकत है। हमारे शहर कंक्रीट के जंगलों में तब्दील हो चुके हैं, जो दिनभर गर्मी सोखते हैं और रात में उसे मुक्त करते हैं, जिससे ‘अर्बन हीट आइलैंड’ का प्रभाव पैदा होता है। इस तपती आग में सबसे अधिक जोखिम उन लोगों (रेहड़ी-पटरी वाले, निर्माण श्रमिक और दिहाड़ी मजदूर) का है, जो खुले आसमान के नीचे अपना वजूद तलाशते हैं। इनके पास न तो कूलिंग सेंटर की सुविधा है और न ही काम के घंटों में लचीलापन। इसके साथ ही बच्चे और बुजुर्ग इस बढ़ते ‘डिस्कंफर्ट इंडेक्स’ के सबसे आसान शिकार बन रहे हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/scorching-earth-scorched-lives-the-challenge-of-heatwaves-facing-the-public" target="_blank">तपती धरती, झुलसता जीवन: जनता के समक्ष हीटवेव की चुनौती</a></h3><div>वैज्ञानिकों के मुताबिक तापमान में वृद्धि से आगामी वर्षों में हीट वेव, गर्मी का मौसम ज्यादा समय तक रहने और सर्दी के मौसम का समय घटने जैसी स्थितियां पैदा होंगी। इस बारे में वैज्ञानिकों का स्पष्ट कहना है कि जिस जलवायु परिवर्तन के बारे में अब तक हम केवल पढ़ते-सुनते रहे थे, वह अब हमारे सामने आकर खड़ा हो गया है। भारत में मई का महीना गर्म हवाओं (लू) का चरम समय होता है और लू की घटनाओं को भी मौसम में दिन-प्रतिदिन बदलाव का स्वाभाविक हिस्सा माना जाता है लेकिन चिंता की बात यही है कि लू की तीव्रता लगातार वर्ष दर वर्ष बढ़ रही है। पिछले करीब डेढ़ दशकों में 2009, 2010, 2016, 2017 और 2022 भारत में रिकॉर्ड किए गए पांच सबसे गर्म वर्ष रहे। आईएमडी के मुताबिक 15 सबसे गर्म वर्षों में से 11 वर्ष 2008 से 2022 के बीच ही दर्ज किए गए।</div><div><br></div><div>यह जानना भी जरूरी कि हीट वेव आखिर है क्या? जैसा कि नाम से ही जाहिर है, हीट वेव अत्यधिक गर्म मौसम की अवधि है, जो प्रायः दो या ज्यादा दिनों तक रहती है। जब तापमान किसी क्षेत्र के सामान्य औसत तापमान से अधिक हो जाता है तो उसे ‘हीट वेव’ कहा जाता हं। आईएमडी के अनुसार मैदानी इलाकों का अधिकतम तापमान जब 40 डिग्री सेल्सियस तक और पहाड़ी क्षेत्रों का तापमान 30 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है तो लू चलने लगती है और यदि तापमान 47 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है तो यह खतरनाक लू की श्रेणी में कही जाती है। इसी प्रकार तटीय क्षेत्रों में जब तापमान 37 डिग्री सेल्सियस हो जाता है तो लू चलने लगती है। हीट वेव के कारण लोगों के बीमार होने और हीट स्ट्रोक का खतरा बहुत बढ़ जाता है तथा सैंकड़ों लोगों की मौत हो जाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 1998 से 2017 के बीच हीट वेव के कारण 1.66 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी और यह आंकड़ा अब वर्ष दर वर्ष तेजी से बढ़ रहा है।</div><div><br></div><div>आईआईटी खड़गपुर के एक अध्ययन से यह स्पष्ट हो चुका है कि तापमान में वृद्धि तथा लू का मानव शरीर पर व्यापक असर पड़ रहा है। गर्म हवाओं से ब्रेन स्ट्रोक, हृदयाघात, नसों में खून के थक्के जमने की आशंका, स्थायी विकलांगता का खतरा बढ़ जाता है और इससे मृत्यु दर में भी वृद्धि हो सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, हीट वेव बाढ़ के बाद दूसरी सबसे घातक आपदा है, जो मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौतियां पेश कर रही है। लू का असर हृदय तथा फेफड़े जैसे अंगों पर सर्वाधिक पड़ता है, जो बेहद खतरनाक हो सकता है। हीट वेव से ऐसे लोगों की स्थिति और खराब होने की संभावना होती है, जो हृदय रोग, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, गुर्दे की बीमारी इत्यादि समस्याओं से पीड़ित हैं। आईएमडी के मुताबिक वैसे तो हर साल दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, गुजरात, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना इत्यादि उत्तर पश्चिमी भारत, मध्य, पूर्व और उत्तर प्रायद्वीपीय भारत के मैदानी इलाकों में मार्च से जून के दौरान हीट वेव का दौर चलता है लेकिन जैसे-जैसे पृथ्वी की जलवायु गर्म होती जा रही है, दिन और रात भी सामान्य से अधिक गर्म होते जा रहे हैं, जिससे हीट वेव की घटनाएं बढ़ रही हैं और मौतों तथा बीमारियों की आशंका भी बढ़ रही है।</div><div><br></div><div>प्रश्न यह है कि भारत में हीट वेव को लेकर ऐसी स्थिति क्यों निर्मित हो रही है? पिछले 30 वर्षों के तापमान तथा गर्म हवाओं का आकलन करते हुए आईआईटी खड़गपुर के एक अध्ययन में यह स्पष्ट किया गया था कि घटती हरियाली, शहरीकरण तथा कंक्रीट से निर्माण के कारण ही अब प्रतिवर्ष हीट वेव में वृद्धि हो रही है। प्रायः देखा जाता है कि एक ही शहर में कुछ जगहों पर उच्च तापमान दर्ज किया जाता है तो कुछ जगहों पर तापमान कम रहता है। कुछ स्थानीय कारण इसके लिए जिम्मेदार होते हैं। दरअसल अधिक हरे-भरे इलाकों में तापमान कम दर्ज किया जाता है जबकि चारों ओर बसी कालोनियों तथा ऊंची-ऊंची इमारतों वाले इलाकों में तापमान ज्यादा दर्ज होता है। तकनीकी भाषा में इसे ‘अर्बन हीट आईलैंड इफैक्ट’ कहा जाता है। पेड़-पौधों की कमी, अधिक शहरीकरण तथा कंक्रीट से अधिक निर्माण इत्यादि विविध कारणों से शहर ज्यादा तप रहे हैं। इसके पीछे एक बड़ी वजह शहरों में निरन्तर बढ़ता जनसंख्या घनत्व भी है। जनसंख्या का घनत्व बढ़ते जाने से हरियाली नष्ट हो रही है और शहरों में हरे-भरे प्राकृतिक क्षेत्रों को भी सीमेंट तथा कंक्रीट के तपते जंगलों में तब्दील किया जा रहा है। दुनियाभर में विभिन्न शोधों के आधार पर वैज्ञानिक जलवायु संकट को ही लू के लिए जिम्मेदार मान रहे है, जिनका कहना है कि शहरीकरण तथा जनसंख्या घनत्व इसमें बड़ा योगदान देते हैं।</div><div><br></div><div>विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) के मुताबिक लू से अर्थव्यवस्था को चौतरफा नुकसान होता है। डब्ल्यूएमओ का कहना है कि बढ़ते तापमान का अर्थ हीट वेव का बढ़ना, बहुत ज्यादा मात्रा में बर्फ का पिघलना, समुद्र जलस्तर का बढ़ना तथा मौसम की चरम घटनाओं का और ज्यादा विनाशकारी होना है, जिसका सीधा प्रभाव पर्यावरण, स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा और सतत विकास पर पड़ेगा। इतिहास के सबसे गर्म वर्षों में लगभग सभी साल पिछले तथा इस दशक से ही रहे हैं। ब्रिटिश मौसम कार्यालय के एक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने कहा है कि यदि जलवायु पविर्तन नहीं हो रहा होता तो ऐसा चरम तापमान प्रत्येक 312 वर्षों में एक बार ही देखने को मिलता। अध्ययन में शोधकर्ताओं ने भारत और पाकिस्तान में हर तीन साल बाद प्रचण्ड लू की आशंका जताते हुए दावा किया कि जलवायु परिवर्तन गर्मी की तीव्रता को जिस तेजी से बढ़ा रहा है, उससे इन क्षेत्रों के लोगों को आने वाले वर्षों में सौ गुना ज्यादा लू के थपेड़े झेलने पड़ सकते हैं।</div><div><br></div><div>बहरहाल, अत्यधिक तापमान से जहां सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों में प्राथमिक तथा माध्यमिक स्तर की स्वास्थ्य प्रणालियों की चिंता बढ़ जाती है, वहीं हीट वेव का श्रमिकों की उत्पादकता पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है, जिससे देश की समग्र अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत अत्यधिक गर्मी के कारण करीब 101 अरब घंटे खो देता है, जो पूरी दुनिया में सर्वाधिक है और 3.5 करोड़ लोगों द्वारा एक वर्ष में 8 घंटे कार्य करने वाले लोगों द्वारा किए गए कार्य के बराबर है। आईएलओ की रिपोर्ट में भीषण गर्मी तथा लू के कारण 2030 तक दुनियाभर में अर्थव्यवस्था को 4.2 ट्रिलियन डॉलर की क्षति का अनुमान लगाया गया है। भारत के संदर्भ में इम्पीरियल कॉलेज में जलवायु विज्ञान के सीनियर लेक्चरर डॉ. फ्रेडरिक औटो कहते हैं कि भारत में मौजूदा गर्म हवाओं का एक बड़ा कारण कोयला तथा अन्य जीवाश्म ईंधन का जलाया जाना है और जब तक ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन बंद नहीं होगा, तब तक भारत तथा अन्य स्थानों पर हीट वेव और भी गर्म व खतरनाक होती जाएगी। इन घातक स्थितियों से बचने के लिए जलवायु संकट से निपटने के अन्य उपायों के अलावा प्राकृतिक जंगलों के संरक्षण तथा आवासीय इलाकों में भी हरियाली बढ़ाने के लिए वृक्षारोपण अभियान को भी बढ़ावा देना होगा।</div><div><br></div><div>- योगेश कुमार गोयल</div><div>(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में निरंतर सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार, पर्यावरण मामलों के जानकार तथा पर्यावरण पर ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ पुस्तक के लेखक हैं)</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 29 May 2026 16:11:48 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/india-in-the-grip-of-a-heatwave-scorching-earth-suffering-life</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[India के साथ खड़ा हो गया China! Pakistan हैरान, Shehbaz Sharif, Asim Munir के लौटते ही Jinping ने किया बड़ा खेल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/india-china-border-talks-related-news-and-analysis]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेनाध्यक्ष आसिम मुनीर के चीन दौरे से लौटते ही चीन ने एक बड़ा सामरिक और कूटनीतिक खेल खेल दिया। एक ओर बीजिंग में पाकिस्तान के साथ चीन ने अपने रिश्तों को अटूट बताते हुए सुरक्षा, रक्षा और पश्चिम एशिया में साझा रणनीति पर खुला समर्थन दिया, वहीं दूसरी ओर उसी समय भारत के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा पर रचनात्मक और भविष्य उन्मुख वार्ता कर संबंधों को सामान्य बनाने की दिशा में आगे बढ़ने का संकेत भी दे दिया।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि बीजिंग में भारत और चीन के बीच परामर्श एवं समन्वय कार्य तंत्र की बैठक में दोनों पक्षों ने पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा यानि एलएसी की स्थिति पर विस्तार से चर्चा की। भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा कि वार्ता रचनात्मक और भविष्य उन्मुख रही तथा दोनों देशों ने सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता बनाए रखने में हुई प्रगति पर संतोष व्यक्त किया। दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हुए कि सीमा पर शांति बनाए रखने से द्विपक्षीय संबंधों को सामान्य बनाने की दिशा में प्रगति संभव हुई है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/india-holds-major-meeting-in-china-to-decide-on-lac" target="_blank">LAC पर फैसले के लिए चीन में भारत की बड़ी बैठक, शांति और स्थिरता पर फोकस</a></h3><div>यह बैठक ऐसे समय हुई जब 2020 के गलवान संघर्ष के बाद पैदा हुए लंबे सैन्य गतिरोध को समाप्त करने की दिशा में दोनों देश धीरे धीरे आगे बढ़ रहे हैं। कई दौर की सैन्य और कूटनीतिक वार्ताओं के बाद देपसांग और डेमचोक जैसे अंतिम तनाव वाले क्षेत्रों में भी सैनिकों की वापसी का समझौता हुआ था। हम आपको यह भी याद दिला दें कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच कजान और तियानजिन में हुई बैठकों ने रिश्तों को नई दिशा देने का प्रयास किया। भारत ने स्पष्ट किया है कि वह आपसी विश्वास, सम्मान और संवेदनशीलता के आधार पर चीन के साथ संबंध आगे बढ़ाना चाहता है।</div><div><br></div><div>दूसरी ओर चीन ने पाकिस्तान के साथ भी अपने संबंधों को और मजबूत करने का खुला संकेत दिया। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की हालिया बीजिंग यात्रा के दौरान चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने शहबाज शरीफ को पुराना मित्र बताते हुए कहा कि चीन और पाकिस्तान की मित्रता अटूट है। उन्होंने पाकिस्तान की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के समर्थन का भरोसा दोहराया। इतना ही नहीं, चीन ने पाकिस्तान की उस भूमिका की भी सराहना की जिसमें उसने पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता का प्रयास किया। शी जिनपिंग ने कहा कि दोनों देशों को सुरक्षा सहयोग और अधिक व्यापक बनाना चाहिए तथा क्षेत्रीय स्थिरता के लिए साथ मिलकर काम करना चाहिए।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि शहबाज शरीफ और आसिम मुनीर का यह दौरा केवल औपचारिक नहीं था। दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, जलवायु परिवर्तन, कृषि और सुरक्षा सहयोग से जुड़े पंद्रह समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। पाकिस्तान ने चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के अगले चरण को तेजी से आगे बढ़ाने का भरोसा भी दिया। साथ ही पाकिस्तान ने चीन के अंतरिक्ष कार्यक्रम और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे नए क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की प्रतिबद्धता जताई।</div><div><br></div><div>विशेषज्ञ मानते हैं कि चीन की यह दोहरी रणनीति बेहद महत्वपूर्ण है। एक तरफ वह पाकिस्तान को अपने सबसे भरोसेमंद सामरिक साझेदार के रूप में मजबूत कर रहा है, वहीं दूसरी ओर भारत के साथ सीमा पर तनाव कम करके एशिया में स्थिरता बनाए रखना चाहता है। इसका सबसे बड़ा कारण अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्धा है। चीन नहीं चाहता कि भारत पूरी तरह अमेरिका के रणनीतिक खेमे में चला जाए। इसलिए वह सीमा विवाद को नियंत्रित रखते हुए आर्थिक और राजनीतिक संबंधों को सामान्य बनाने का प्रयास कर रहा है।</div><div><br></div><div>इसी बीच, सिंगापुर में जारी एशिया प्रशांत क्षेत्रीय सुरक्षा आकलन रिपोर्ट ने भी भारत की सामरिक चुनौतियों को रेखांकित किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के लिए पारंपरिक सैन्य खतरे का केंद्र आगे भी चीन और पाकिस्तान ही रहेंगे। रिपोर्ट के अनुसार भारत की स्थिति ऐसी है जिसमें न युद्ध है और न पूर्ण शांति। भारत अपनी सेना को बड़े पारंपरिक युद्धों के लिए तैयार कर रहा है क्योंकि उसे दोनों परमाणु शक्ति संपन्न पड़ोसियों के साथ सीमा विवादों का सामना करना पड़ रहा है।</div><div><br></div><div>रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि भारत की सैन्य नीति लगातार विकसित हो रही है और पाकिस्तान के खिलाफ 2016, 2019 और 2025 में की गई कार्रवाईयों ने उसकी रणनीतिक सोच को नया रूप दिया है। दूसरी ओर चीन हिंद महासागर क्षेत्र और मलक्का जलडमरूमध्य जैसे क्षेत्रों में अपनी सैन्य उपस्थिति तेजी से बढ़ा रहा है, जिससे एशिया में शक्ति संतुलन का नया दौर शुरू हो गया है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, चीन ने एक ही समय में भारत और पाकिस्तान दोनों के साथ सक्रिय कूटनीतिक चाल चलकर यह स्पष्ट कर दिया है कि वह एशिया में अपनी रणनीतिक पकड़ और प्रभाव को हर हाल में बनाए रखना चाहता है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम बात यह है कि मोदी सरकार की आक्रामक और संतुलित कूटनीति ने चीन को भी अपने रुख में नरमी लाने के लिए मजबूर किया है। गलवान संघर्ष के बाद भारत ने जिस मजबूती से सीमा पर सैन्य दबाव बनाया, आर्थिक मोर्चे पर सख्ती दिखाई और वैश्विक मंचों पर अपनी स्थिति मजबूत की, उसका असर अब साफ दिखाई दे रहा है। यही कारण है कि चीन एक तरफ पाकिस्तान को साधने की कोशिश कर रहा है, तो दूसरी तरफ भारत के साथ संबंध सामान्य करने के लिए लगातार संवाद बढ़ा रहा है। भारत ने यह संदेश दे दिया है कि नया भारत दबाव में झुकने वाला नहीं, बल्कि अपनी शर्तों पर बातचीत करने वाला देश है। आने वाले समय में चीन और पाकिस्तान की बढ़ती नजदीकियां निश्चित रूप से भारत के लिए चुनौती रहेंगी, लेकिन मोदी सरकार की रणनीतिक तैयारी, सैन्य मजबूती और वैश्विक कूटनीतिक सक्रियता ने भारत की स्थिति पहले से कहीं अधिक मजबूत कर दी है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>

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      <pubDate>Thu, 28 May 2026 15:50:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/india-china-border-talks-related-news-and-analysis</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[क्या एआई मानवता के महाविनाश का कारण बनेगी?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/will-ai-cause-the-mass-extinction-of-humanity]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई आज केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं रह गई है, बल्कि वह मानव सभ्यता के भविष्य का निर्णायक मोड़ बनती जा रही है। जिस गति से यह तकनीक विकसित हुई है, उसने दुनिया को आश्चर्यचकित भी किया है और चिंतित भी। अभी तक विज्ञान और तकनीक मनुष्य के हाथों में उपकरण थे, किंतु कृत्रिम बुद्धिमत्ता पहली ऐसी शक्ति है जो निर्णय लेने, सीखने, विश्लेषण करने और सृजन करने की क्षमता के साथ स्वयं को निरंतर विकसित कर रही है। यही कारण है कि विश्व के प्रमुख धर्मगुरु, वैज्ञानिक और नीति-निर्माता इसके खतरों को लेकर गंभीर चेतावनियां दे रहे हैं। हाल ही में वर्तमान पोप लियो चौदहवें द्वारा कृत्रिम बुद्धिमत्ता के संदर्भ में व्यक्त की गई चिंताएं अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि युद्ध को नैतिक नहीं बनाया जा सकता और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित युद्ध प्रणाली मानवता के लिए गंभीर खतरा बन सकती है। यह चेतावनी केवल धार्मिक दृष्टि नहीं, बल्कि मानवीय अस्तित्व की रक्षा का प्रश्न है। दुनिया को इसे गंभीरता से लेने की आवश्यकता है।</div><div><br></div><div>पोप ने सामाजिक और वैश्विक मुद्दों पर जारी अपने आधिकारिक संदेश में एआई को मानवता के समक्ष उभरती सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक बताया। उन्होंने विशेष रूप से इस बात पर चिंता व्यक्त की कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता केवल तकनीकी परिवर्तन का माध्यम नहीं रह गई है, बल्कि यह युद्ध, राजनीति, अर्थव्यवस्था और सामाजिक संरचना को प्रभावित करने वाली शक्ति बनती जा रही है। उन्होंने दुनिया को चेताया कि तकनीक का उद्देश्य मनुष्य पर प्रभुत्व स्थापित करना नहीं, बल्कि उसकी सेवा करना होना चाहिए। उनका संदेश मानव-केंद्रित विकास की अवधारणा को बल देता है, जिसमें विज्ञान और तकनीक को नैतिकता, मानवीय गरिमा और करुणा के अधीन रखा जाए। पोप की यह चेतावनी केवल धार्मिक दृष्टिकोण नहीं है, बल्कि एक वैश्विक मानवीय आह्वान है कि एआई की अंधी दौड़ में मानवता, संवेदना और नैतिकता का क्षरण न होने दिया जाए। आज जब महाशक्तियां एआई के माध्यम से प्रभाव और नियंत्रण की प्रतिस्पर्धा में लगी हैं, तब पोप का यह संदेश विश्व समुदाय को संयम, उत्तरदायित्व और मानवीय मूल्यों की ओर लौटने का मार्ग दिखाता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/global-challenges-facing-india-arising-from-china-us-rapprochement" target="_blank">चीन-अमेरिका की निकटता से भारत के सामने वैश्विक चुनौतियाँ</a></h3><div>पोप ने स्पष्ट कहा कि कोई भी एल्गोरिद्म युद्ध को नैतिक नहीं बना सकता और तकनीक को मानव विवेक का विकल्प नहीं बनने दिया जा सकता। पोप ने चर्च के सामाजिक सरोकारों से जुड़े अपने इस आधिकारिक पत्र में पहली बार एआई को प्रमुख विषय बनाया, जो इस बात का संकेत है कि इसका प्रभाव केवल तकनीकी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा, बल्कि मानव जीवन, समाज और वैश्विक व्यवस्था को व्यापक रूप से प्रभावित कर रहा है। उन्होंने विशेष रूप से एआई आधारित स्वायत्त हथियार प्रणालियों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यदि इस तकनीक को पूर्णतः मानवीय नियंत्रण में नहीं रखा गया तो यह युद्ध, शोषण और दासता के नए रूपों को जन्म दे सकती है। पोप ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता को “निरस्त्र” करने का आह्वान करते हुए उसका आशय तकनीक का विरोध नहीं, बल्कि उसके अनियंत्रित और अमानवीय उपयोग पर रोक लगाना बताया। उनका कहना था कि युद्ध और शांति से जुड़े निर्णय अंततः नैतिकता, करुणा और विवेक पर आधारित होने चाहिए, उन्हें मशीनों के हवाले नहीं किया जा सकता। आज जब अमेरिका, चीन और अन्य महाशक्तियां कृत्रिम बुद्धिमत्ता की होड़ में लगी हैं और युद्ध तकनीकों में इसका उपयोग बढ़ रहा है, तब पोप का यह संदेश मानवता के लिए एक नैतिक दिशा-सूचक के रूप में सामने आया है कि तकनीक मनुष्य की सेवक बने, स्वामी नहीं; और विकास का केंद्र मानव गरिमा, संवेदना तथा विश्वशांति ही रहे।</div><div><br></div><div>निश्चित रूप से कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने शिक्षा, चिकित्सा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, बैंकिंग, व्यापार, प्रशासन और संचार के क्षेत्र में अभूतपूर्व परिवर्तन किए हैं। रोगों के निदान से लेकर वित्तीय प्रबंधन तक और शिक्षा से लेकर अनुसंधान तक, इसकी उपयोगिता निर्विवाद है। लेकिन हर तकनीकी क्रांति अपने साथ संकट भी लाती है। आज वही संकट स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। सबसे बड़ा संकट रोजगार का है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने लाखों लोगों के कार्यों को प्रतिस्थापित करना शुरू कर दिया है। ग्राहक सेवा, लेखन, अनुवाद, लेखांकन, सूचना प्रबंधन, प्रोग्रामिंग और कार्यालयी कार्यों में मनुष्य की आवश्यकता तेजी से घट रही है। मशीनें कम लागत, अधिक गति और निरंतर कार्य क्षमता के कारण मनुष्य का स्थान ले रही हैं। इससे केवल बेरोजगारी नहीं बढ़ेगी, बल्कि सामाजिक असंतुलन और आर्थिक विषमता भी गहराएगी। जिन देशों और कंपनियों के पास कृत्रिम बुद्धिमत्ता का नियंत्रण होगा, आर्थिक शक्ति भी उन्हीं के हाथों में केंद्रित हो जाएगी। इससे विश्व व्यवस्था में असमानता का नया स्वरूप उभरेगा।</div><div>इससे भी अधिक गंभीर प्रश्न वैश्विक सुरक्षा का है। आज अमेरिका, चीन और अन्य महाशक्तियां कृत्रिम बुद्धिमत्ता की होड़ में लगी हुई हैं। यह प्रतिस्पर्धा केवल तकनीकी श्रेष्ठता तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक प्रभुत्व का नया संघर्ष बन चुकी है। जैसे कभी परमाणु हथियारों और घातक अस्त्र-शस्त्रों के माध्यम से शक्ति संतुलन स्थापित हुआ था, वैसे ही अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता भविष्य की सामरिक शक्ति बन रही है। स्वायत्त हथियार प्रणाली, बुद्धिमान ड्रोन और बिना मानवीय हस्तक्षेप के निर्णय लेने वाली युद्ध तकनीकें मानवता के लिए भयावह संकेत हैं। यदि युद्ध का निर्णय मशीनों के हाथों में चला गया तो संवेदना, विवेक और नैतिकता समाप्त हो जाएगी। मशीनों के लिए मानव जीवन केवल आंकड़े होंगे। ऐसी स्थिति महाविनाश की संभावना को जन्म दे सकती है। पोप की यह चेतावनी इसी संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक है कि युद्ध का अंतिम निर्णय मानव विवेक के अधीन रहना चाहिए।</div><div><br></div><div>साइबर सुरक्षा भी कृत्रिम बुद्धिमत्ता के कारण नई चुनौतियों से घिर गई है। बैंकिंग व्यवस्था, विद्युत तंत्र, रक्षा नेटवर्क और संचार प्रणाली आज डिजिटल माध्यमों पर निर्भर हैं। एआई आधारित साइबर हमले किसी भी राष्ट्र को कुछ घंटों में अस्थिर कर सकते हैं। झूठे संदेश, भ्रामक वीडियो, कृत्रिम चित्र और आवाजों के माध्यम से सामाजिक तनाव उत्पन्न किए जा सकते हैं। सत्य और असत्य का अंतर मिटने लगा है। यह सूचना तंत्र और लोकतंत्र दोनों के लिए गंभीर संकट है। एआई का एक और चिंताजनक पक्ष है-मानवीय नियंत्रण का कमजोर पड़ना। वैज्ञानिक समुदाय का एक वर्ग मानता है कि भविष्य में ऐसी बुद्धिमत्ता विकसित हो सकती है जो मनुष्य की क्षमता से कई गुना आगे निकल जाए। यदि ऐसा हुआ तो नियंत्रण का प्रश्न सबसे बड़ा संकट बनेगा। यह केवल तकनीकी विषय नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व का प्रश्न होगा।</div><div>भारत के लिए यह विषय और अधिक महत्वपूर्ण है। भारत युवा शक्ति, विशाल जनसंख्या और तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्था वाला देश है। यदि एआई को बिना स्पष्ट नीति और नियंत्रण के बढ़ने दिया गया तो रोजगार, शिक्षा और सामाजिक संरचना पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। भारत को विकास और नियंत्रण दोनों के बीच संतुलन बनाना होगा। एआई को रोकना समाधान नहीं है, लेकिन इसे मानवीय मूल्यों, नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व के अधीन रखना अनिवार्य है। भारत को ऐसी राष्ट्रीय नीति बनानी होगी जिसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग मानव कल्याण, शिक्षा, चिकित्सा और आर्थिक विकास के लिए हो, लेकिन रोजगार संरक्षण, डेटा सुरक्षा, नैतिक मानदंड और युद्ध नियंत्रण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए। साथ ही वैश्विक स्तर पर भी एआई के उपयोग हेतु साझा नियम और अंतरराष्ट्रीय संधियां आवश्यक हैं।</div><div><br></div><div>आज सबसे बड़ा प्रश्न तकनीक का नहीं, मानवता का है। क्या मनुष्य अपनी बनाई हुई शक्ति पर नियंत्रण बनाए रख सकेगा? क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता मानव जीवन को समृद्ध बनाएगी या उसे नियंत्रित करेगी? क्या विकास संवेदनाओं से बड़ा हो जाएगा? क्या एआई रूपी विस्फोट मानवता के महाविनाश का कारण बनेगी? यही वे प्रश्न हैं जिन पर दुनिया को गंभीर चिंतन करना होगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता की दिशा यदि मानवता केंद्रित रही तो यह सभ्यता को नई ऊंचाइयां दे सकती है, लेकिन यदि यह शक्ति नियंत्रण और नैतिकता से मुक्त हो गई तो यह मानव इतिहास के सबसे बड़े संकट एवं महाविनाश का कारण भी बन सकती है। इसलिए आज आवश्यकता तकनीकी प्रगति की नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण प्रगति की है-जहां मशीनें विकसित हों, किंतु मानवता सर्वोच्च बनी रहे।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 27 May 2026 16:58:26 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/will-ai-cause-the-mass-extinction-of-humanity</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[अमेरिका-ईरान युद्ध से महंगाई के कारण आमजन प्रभावित]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/common-people-affected-by-inflation-caused-by-the-us-iran-conflict]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भले ही 1970 के तेल संकट जैसे हालात होने की संभावना ना हो या 2008 जैसी वित्तीय मंदी के हालात ना हो फिर भी एक बात साफ है कि अमेरिका-ईरान के बीच करीब तीन माह से चल रहे युद्ध के नकारात्मक परिणाम सामने आने लगे हैं। चाहे एशिया के देश हो या फिर योरोपीय देश सभी केवल वैश्विक तनाव ही नहीं अपितु ईंधन आपूर्ति प्रभावित होने से बढ़ते दामों को रोकने में विफल ही हो रहे हैं। पिछले दस-पन्द्रह दिनों में ही हमारे देश में पेट्रोल- एलपीजी-सीएनजी- पीएनजी के दामों में एक बार नहीं अपितु तीन बार बढ़ोतरी हो चुकी है। हांलाकि वर्तमान हालातों में सरकार को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। विपक्ष चाहे लाख आरोप लगाये या आंदोलन-प्रदर्शन करें पर अंतरराष्ट्रीय हालातों से आंख नहीं मूंदनी चाहिए। पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आमजन से आग्रह को भी इसी संदर्भ में सकारात्मकता से लिया जाना चाहिए। वैसे भी जब संकट का दौर हो और उस संकट के लिए हम या हमारी सरकार जिम्मेदार नहीं हो तो फिर देश में नकारात्मक माहौल बनाने के स्थान पर सकारात्मक माहौल बनाया जाना चाहिए। यह किसी एक व्यक्ति या किसी एक दल का नहीं अपितु सभी राजनीतिक दलों का दायित्व हो जाता है। अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण कच्चे तेल और एलपीजी की आपूर्ति बुरी तरह से प्रभावित हुई है। ईधन संकट का बड़ा कारण अमेरिका-ईरान युद्ध ना होकर अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण हार्मुज संकट बन गया है। हार्मुज के रास्ते से ही कच्चे तेल की आपूर्ति होती है और तनाव के चलते हार्मुज जनडमरुमध्य रास्ते को अवरुद्ध कर दिया गया है इससे आपूर्ति प्रभावित हो रही है। यह तो वैकल्पिक उर्जा के रुप में देश में सोलर, विण्ड एनर्जी के क्षेत्र में पिछले सालों में योजनावद्ध तरीके से तेजी से और बेहतर काम हुआ है और इसी का परिणाम है कि आज प्रधानमंत्री इलेक्ट्रोनिक वाहनों के उपयोग या सोलर एनर्जी के उपयोग पर खुले तौर पर आग्रह करने की स्थिति में है। नवीकरणीय उर्जा के क्षेत्र में देश में तेजी से काम हुआ है और हो रहा है जो एक हद तक संकट को कम करने में सहायक बन रहा है।&nbsp;</div><div><br></div><div>आज की दुनिया आइसोलेट दुनिया नहीं है। एक देश की दूसरे देश पर निर्भरता बढ़ी है। कहीं से ईंधन के लिए तो कहीं से खाद्यान्न, कहीं दवा, कहीं अन्य किसी वस्तु के लिए निर्भरता बढ़ी है। युद्ध के चलते इंटरनेशनल लोजिस्टिक सेवाएं प्रभावित हुई है। जहां तक देश की ही बात की जाएं तो पेट्रोल, डीजल, एलपीजी आदि के कीमत में बढ़ोतरी का व्यापक प्रभाव पड़ने लगा है। सीधी सी बात है जब आवागमन महंगा होगा चाहे वह आम आदमी, सार्वजनिक क्षेत्र या लोजिस्टिक का हो तो उसका सीधा सीधा वस्तुओं और सेवाओं पर पड़ेगा ही। यही कारण है ईंधन यानी तेल के भावों में बढ़ोतरी के साथ ही वस्तुओं और सेवाओं के भाव प्रभावित होने लगे हैं। इसके साथ ही आयात पर निर्भर वस्तुओं के भाव प्रभावित होने लगे हैं। जहां तक तेल का प्रष्न है देश में खाद्य तेल ओैर अखाद्य तेल दोनों ही प्रभावित हो रहे हैं। खाद्य तेलों में भी आयात पर निर्भरता अधिक है। लाख प्रयासों के बावजूद तिलहन मिशन से तिलहनों का उत्पादन तो बढ़ा है पर अभी विदेशी निर्भरता बनी हुई ही है। इसी तरह से अन्य वस्तुओं के भाव प्रभावित होने लगे हैं। जहां तक सेवा क्षेत्र का प्रष्न है स्वीगी-जोमेटो आदि सेवा प्रदाताओं ने पिछले दिनों में अपने दामों में 16 फीसदी से भी अधिक की बढ़ोतरी कर दी है। मोबाइल सेवा प्रदाताओं ने प्लानों को रिवाइज किया हैं तो उबेर-ओला जैसे सेवा प्रदाताओं ने किराया बढ़ा दिया है। हो तो यहां तक रहा हैं कि बैंकों द्वारा जमाओं पर ब्याज दर में कमी लाना शुरु कर दिया है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/what-is-the-real-meaning-of-the-abraham-accords" target="_blank">आखिर क्या है Abraham Accords का असली मतलब, इस पर साइन करने वाले मुस्लिम देशों को क्या-क्या करना पड़ेगा?</a></h3><div>एक बात साफ हो जानी चाहिए कि लोजिस्टिक लागत बढ़ेगी तो उसका असर सभी वस्तुओं में देखने को मिलेगा। भारत सरकार वेनेजुएला से वैकल्पिक तरीके से कच्चे तेल लाने का प्रयास कर रही है तो अन्य विकल्प भी खोजे जा रहे हैं। पर यह साफ हो जाना चाहिए कि कच्चे तेल की आपूर्ति जब तक सामान्य नहीं हो जाती तब तक पूरी तरह से संकट समाप्त होने की कल्पना नहीं की जा सकती। इन वैश्विक हालातों के पीछे अमेरिका-ईरान की हठधर्मिता ही है। अमेरिका-इजरायल ने ईरान से लड़ाई शुरु करते समय रुस यूक्रेन युद्ध के हालातों से सबक नहीं लिया। रुस के सामने यूक्रेन पिद्दी सा देश होने के बावजूद आज तीन साल से भी अधिक समय होने के बावजूद निर्णायक स्तर पर नहीं पहुंचा है। पर अमेरिका ने यह सोचा था कि दो-तीन दिन में ही ईरान को घुटने टिकवा देंगे और यही अमेरिका की नासमझी रही। मानो या ना मानो पर वास्तविकता यह है कि आज अमेरिका के सामने अपनी प्रतिष्ठा बनाये रखने का संकट आ गया है और यही कारण है कि अंदरखाने अमेरिका और ट्रंप किसी भी तरह से सीज फायर के लिए प्रयासरत है। इसमें भी कोई दो राय नहीं कि युद्ध में नुकसान अमेरिका को ही अधिक हो रहा है। ईरान तो अपने घर से लड़ रहा है और उसके निशाने पर आसपास के देश है। ऐसे में स्टेक तो अमेरिका-इजरायल का ही हो जाता है। इसके अलावा एक बात और समझनी होगी कि ट्रंप 2 में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने आये दिन तुगलकी फरमान जारी कर दुश्मन ही दुश्मन बनाएं है। गली के गुंडे जैसी पहचान बन गई है ट्रंप की तो दूसरी और अमेरिका के ही अधिकांश लोगों का भरोसा ट्रंप ने खो दिया है। ऐसे में सम्मानजनक सीजफायर ही अमेरिका के लिए अब इस संकट से निकलने का रास्ता रह गया है और इसके लिए ही अंदरखाने प्रयास जारी है।&nbsp;</div><div><br></div><div>डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 26 May 2026 15:23:12 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/common-people-affected-by-inflation-caused-by-the-us-iran-conflict</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[देश व समाज हित में डीजल व पेट्रोल की बचत के साथ-साथ स्थाई सादगी समय की मांग!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/in-the-interest-of-the-nation-and-society-the-conservation-of-diesel-and-petrol]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अमेरिका-ईरान युद्ध के चलते जिस समय पूरे विश्व के सामने ऊर्जा संकट व मंहगाई सुरसा राक्षसी की तरह मूंह खोलकर के देश की दौलत को निगलने के लिए खड़ी है, उस दौर में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने डीजल व पेट्रोल को बचाने व सोना ना खरीदने की सभी देशवासियों से अपील की है, क्योंकि मोदी की इस अपील पर अमल करने से भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ने वाला बोझ कम से कम कुछ तो कम होगा, जिससे देश की अर्थव्यवस्था को बेहतर होने का अवसर भी मिलेगा। हालांकि प्रधानमंत्री मोदी की इस अपील के बाद से ही देश के विभिन्न हिस्सों में मोदी के द्वारा चलाई जा रही इस राष्ट्रहित की मुहिम में शामिल होने की होड़ लग गई है। हालांकि अभी तो अधिकतर लोग सांकेतिक रूप से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इस मुहिम में ज्यादा जुड़ रहे हैं, लेकिन सांकेतिक ही सही एक बहुत अच्छी पहल में कम से कम लोगों के जुड़ने की शुरुआत तो हुई और आने वाले दिनों में उम्मीद है कि इस पहल पर बड़े पैमाने पर आम लोग भी अमल करेंगे।</div><div><br></div><div>वैसे तो देशभर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अपील के बाद से ही यह मुहिम धरातल पर धीरे-धीरे रंग लाती जा रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अपील के बाद से ही भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से लेकर के आम कार्यकर्ताओं तक ने सर्वप्रथम बड़े पैमाने पर इस मुहिम में शामिल होकर के इसको एक आंदोलन का रूप देने का कार्य किया। जिसके बाद से ही देश भर में ज्यूडिशियरी, शीर्ष नौकरशाह, कर्मचारी व आम जनमानस तक भी मोदी की इस मुहिम में अब बड़े पैमाने पर शामिल होते हुए नज़र आ रहे हैं। शासन-प्रशासन के शीर्ष स्तर पर काबिज बैठे हुए ताकतवर लोगों में देश भर में वाहनों के लंबे-चौड़े काफिले का त्याग करने की फिलहाल तो एक होड़ लगी हुई है। हालांकि उन लोगों का यह कदम वास्तव में दिल से खर्चों में कटौती करते हुए जीवन में सादगी अपनाने की धरातल पर एक स्थाई पहल है या सिर्फ मीडिया व सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्मों पर अपनी कुछ पोस्ट डालकर के वाहवाही लूटने की एक नौटंकी मात्र है, यह तो आने वाला समय ही बता पायेगा। लेकिन अच्छी बात यह है कि कम से कम युद्ध के माहौल के चलते जब पूरी दुनिया ऊर्जा व आर्थिक संकट के मुहाने पर खड़ी है, उस वक्त प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इस अपील पर भारत में धरातल पर अमल शुरू होना देश व समाज हित के लिए एक बहुत अच्छा संकेत है।</div><div><br></div><div>लेकिन विचारणीय तथ्य यह भी है कि क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की यह मुहिम कुछ समय की ना होकर के देश व समाज हित में धरातल पर दीर्घकालीन स्थाई रूप ले पायेगी, हालांकि यह तो आने वाला समय ही बता पायेगा। लेकिन पूरी दुनिया में जिस तरह से युद्धों के चलते बेहद ही तनावपूर्ण माहौल चल रहा है, उस माहौल का स्पष्ट रूप से संदेश है कि अब वह दौर आ गया है जब देश व समाज के हित में जनता के टैक्स के पैसे के दम पर राजा-महाराजाओं की तरह पूरी शानो-शौकत व ठाट-बाट से जीवन व्यतीत कर रहे शासन-प्रशासन के लोग सादगी से जीवनयापन करने की आम जनमानस के सामने नज़ीर पेश करते हुए लोगों को भी "सादा जीवन उच्च विचार" के लिए प्रेरित करें। वैसे भी देखा जाए तो अब देश व दुनिया में वह दौर शुरू हो गया है, जब देश व समाज के हित की बातें सिर्फ और सिर्फ सरकारी दफ्तरों में बैठकर के आम जनमानस पर अपने विचार या नियम-कानून बना कर के थोप देने मात्र से ही पूरी नहीं हो जाती है, बल्कि उस पर अमल करवाने के लिए शासन-प्रशासन में बैठे हुए ताकतवर लोगों को भी स्वयं अनुशासित होकर के जीवन पथ पर सादगी व जवाबदेही को अपनाकर उदाहरण पेश करना चाहिए, तब ही आम जनमानस भी उन लोगों की देखा-देखी उस पर अमल करने का कार्य करेगा। लेकिन आज के वीवीआईपी बनकर के दिखाने वाले दौर में जिस तरह के राजसी ठाट-बाट के साथ कुछ राजनेताओं व शासन-प्रशासन में बैठे हुए कुछ लोग सरकारी व निजी दौरों के दौरान अनाप-शनाप खर्चा करते हैं, क्या ऐसे लोग के द्वारा देश व समाज हित में उन सभी अनावश्यक खर्चों में स्वयं ही कटौती करने की पहल करके जनता के सामने एक बड़ी मिसाल कायम नहीं करनी चाहिए।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/fuel-price-hike-prices-hiked-for-the-fourth-time-in-10-days-rahul-gandhi-target-pm-modi" target="_blank">Fuel Price Hike: 10 दिन में चौथी बार बढ़े दाम, Rahul Gandhi बोले - महंगाई के सरगना मोदी ने फिर दिखाया खेल</a></h3><div>विचारणीय तथ्य यह भी है कि आजकल देश में जिस तरह से सरकारी या गैरसरकारी लोगों के मन में अपने आपको एक बड़ा वीवीआईपी दिखाने की चाह रहती है, वह चाहते देश व समाज हित में ठीक नहीं है, क्योंकि इन लोगों को वीवीआईपी दिखाने की चाहत में सिस्टम का बड़ा तामझाम, लग्जरी मंहगी गाड़ियों के लंबे-चौड़े काफिले, चार्टर प्लेन आदि दिखावे पर जनता के द्वारा देश के विकास के लिए दिये गये टैक्स की काफी धनराशि का दुरुपयोग होता है, जिसको तत्काल रोका जाना चाहिए। वहीं कुछ लोगों के द्वारा अपना भौकाल बनाने के लिए व दिखावे के लिए ली गयी अत्यधिक सुरक्षा व्यवस्था और रखरखाव में होने वाले अतिरिक्त खर्चों को भी अब बिल्कुल सीमित करना चाहिए। क्योंकि जिस तरह से चंद लोग सिस्टम में बैठे कुछ ताकतवर लोगों की कृपा से सरकारी अमले की आड़ में जनता के टैक्स के पैसों पर मौज मस्ती करते हुए जनता का ही आये दिन उत्पीड़न करते हैं, यह किसी से भी छिपा हुआ नहीं है, सिस्टम में बैठे हुए कुछ लोगों से सांठ-गांठ करके हमारे प्यारे&nbsp; देश में धनपशु, दलाल व अपराधी तक भी सरकारी सुरक्षा व सुविधाओं के भौकाल का आनंद लें रहे हैं, जो नियम कायदे व कानून पसंद देशभक्त देशवासियों के लिए बेहद चिंताजनक स्थिति है। देश व समाज हित में जनता के द्वारा टैक्स के रूप में दी गई धनराशि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, युवाओं, महिलाओं, किसानों और उधोग-धंधों आदि के साथ-साथ देश के सर्वांगीण विकास पर खर्च हो। देश की जनता के टैक्स का धन देश के विकास और आम जनमानस की भलाई में लगे, न कि वीवीआईपी बनने की चाहत के बेफिजूल के खर्चो और शानो-शौकत में लगे। इसलिए अब देश व समाज हित में वह समय आ गया है जब शासन व प्रशासन में बैठे लोग प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सोना ना खरीदने व डीजल और पेट्रोल बचाने की पहल को दो कदम आगे बढ़ाते हुए स्वयं ही अनुशासित होकर के जीवन पथ पर सरलता व सादगी अपनाकर देश व समाज हित को सर्वोपरि रखते हुए कार्य करेंगें और भारत का नव निर्माण करते हुए देश को विश्व गुरु बनायेंगे।</div><div><br></div><div>- दीपक कुमार त्यागी</div><div>अधिवक्ता, स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 25 May 2026 13:23:42 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/in-the-interest-of-the-nation-and-society-the-conservation-of-diesel-and-petrol</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[जन अपेक्षाओं पर खरे उतरने की एक मुख्यमंत्री की सकारात्मक पहल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/a-chief-minister-positive-initiative-to-live-up-to-public-expectations]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>समूचा उत्तरी भारत भीषण गर्मी की चपेट में चल रहा है तो दूसरी और ना तो राजस्थान में कोई आसन्न विधानसभा या लोकसभा के चुनाव है और ना ही कोई ऐसी आपात् स्थिति जिसमें जनता से सीधा संवाद कायम करना आवश्यक हो, ऐसी स्थिति में ही एक संवेदनशील मुख्यमंत्री के नाते राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा गावों में चौपाल आयोजित कर सीधे ग्रामीणों से रुबरु हो रहे हैं, यह वास्तव में जननेता की पहचान व उसकी आमजन के प्रति सोच का परिणाम है। 40 डिग्री से अधिक के तापमान में मुख्यमंत्री की रात्रि चौपाल और फिर रात्रि विश्राम आज के सुविधाभोगी युग में लगभग असंभव लग रहा है पर राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा इस लपलपाती गर्मी में गांवों में रात्रि चौपालों के माध्यम से ग्रामीणों से संवाद कायम कर रहे हैं। 5 मई से 16 मई तक राजधानी जयपुर ही नहीं अपितु दूरदराज के इलाकों के गांवों में पांच चौपाल आयोजित कर ग्रामीणों से सीधा संवाद कायम करने के साथ ही रात को उसी गांव के सरकारी स्कूल में रात्रि विश्राम और फिर सुबह गांव में ही प्रातःकालीन भ्रमण के माध्यम से गांववासियों से आत्मीय संवाद कायम कर रहे हैं। मई माह में मुख्यमंत्री 5 से 16 मई के दौरान प्रतापगढ़ के बम्बोरी, सीकर के जाजोर, अजमेर के पुष्कर के पास कड़ेल, जालौर के पंसेरी और जयपुर के ठिकरिया में ग्राम विकास चौपाल में ग्रामीणों के बीच बैठकर उनसे रुबरु हो चुके हैं। 20 मई को बांसवाड़ा के चुड़ावा और 21 मई को धुम्बाला को ग्रामीण चौपाल और गांव की सरकारी स्कूल में रात्रि विश्राम कर रहे हैं। यह गांव कोई राजधानी जयपुर के पास के नहीं है अपितु प्रदेश के दूरदराज के गांव है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा समय निकाल कर इन गांवों में रात्रि चौपाल में ग्रामवासियों की परिवेदनाओं को सुनते हैं, यथा सभव मौके पर ही समाधान करने का प्रयास करते हैं और रात्रि को भोजन भी गांव के ही किसी ग्रामवासी के घर बिना किसी तामझाम के करते हुए देखा जा सकता है। इसके साथ ही खासबात यह है कि इस भीषण गर्मी के दौर में गांव के स्कूल में ही रात्रि को विश्राम करने के साथ ही प्रातःकालीन भ्रमण के दौरान गांववासियों से अपनत्व के साथ मेलमिलाप कर रहे हैं। यह धरातलीय हालातों को समझने, लोगों से सीधे बातचीत कर उनकी समस्याओं, आवश्यकताओं की जानकारी लेने, स्थानीय समस्याओं को समझने और उनके निराकरण का बेहतरीन माध्यम होने के साथ ही मुख्यमंत्री को अपने बीच पाकर ग्रामवासियों में जिस तरह का संदेश जाता हे उसे हम भलीभांति समझ सकते हैं। क्योंकि आज के हालातों में मुख्यमंत्री तो दूर की बात जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों से मिलना भी इतना आसान नहीं होता। फिर सबसे बड़ी बात यह कि मुख्यमंत्री मतलब सरकार आपके बीच आती है तो फिर उसके परिणाम निश्चित रुप से सकारात्मक होते हैं और धरातलीय हालातों को समझने का बेहतर अवसर आसानी से मिल जाता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की यह पहल सीधा ग्रामीणों से रुबरु होने का सशक्त माध्यम बनता जा रहा है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की ही माने तो इससे गांवों की समस्याओं से रुबरु होने का अवसर मिलता है तो आवश्यक निर्देश मौके पर ही जारी होने से समस्याओं का समाधान भी मौके पर ही हो पाता है। इसके माध्यम से सरकारी योजनाओं व कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के साथ ही स्थानीय समस्याओं यथा पानी, बिजली, स्कूल, स्वास्थ्य, सड़क और इसी तरह की सुविधाओं के धरातल पर हालात को समझने का अवसर मिल जाता है। मौके पर ही समस्याओं के समाधान को इस तरह से भी समझा जा सकता है कि सीकर के जाजोद गांव में ग्रामीण चौपाल के दौरान छात्राओं की मांग पर एक रात में विद्यालय में विज्ञान संकाय खोलने के आदेश जारी हो गए। यही नहीं अजमेर के कड़ेल गांव में ग्रामीणों से चर्चा के दौरान सामने आया तो प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में क्रमोन्नयन के आदेश मुख्यमंत्री के निर्देश पर तत्काल जारी हो गए। यह तो उदाहरण मात्र है पर इससे साफ संदेश जाता है कि ग्रामीण विकास चौपाल कोई दिखावा या औपचारिकता ना होकर ग्रामीणों व आमजन को सीधे राहत पहुंचाने वाली पहल है। निश्चित रुप से यह सराहनीय पहल मानी जानी चाहिए।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/understand-the-life-threatening-side-effects-of-the-heat-in-india" target="_blank">भारत में जानलेवा हुई गर्मी के साइड इफेक्ट्स समझिए, इसके कारण और बचाव के उपाय जानिए</a></h3><div>एक खास बात यह है कि मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की यात्रा में जहां काफिले को सीमित किया गया हैं वहीं दौरों के दौरान ईवी वाहन का उपयोग कर ईंधन बचत पर जोर दिया जा रहा सरकारी स्कूल में ही रात्रि विश्राम से गांववासियों और आमजन में एक अपनेपन का संदेश जा रहा है। लगता है जैसे मुख्यमंत्री अपनो के बीच अपनेपन के साथ मिल रहे हैं, अपनी बात कह रहे हैं, उनकी बात सुन रहे हैं और आवश्यकता के अनुसार समाधान भी कर रहे हैं। इसके साथ ही स्थानीय सरकारी मशीनरी मुख्यमंत्री की रात्रि चौपाल को देखते हुए एक्टिव मोड पर आ जाती है और इसका परिणाम यह होता है कि बहुत सी समस्याओं का समाधान तो मुख्यमंत्री की रात्रि चौपाल से पहले ही हो जाता है। मुख्यमंत्री के दौरे और फिर रात्रि चौपाल की हो तो फिर किसी एक विभाग तक बात सीमित ना रहकर सभी आधारभूत सुविधाओं और समस्याओं के समाधान की हो जाती है और निश्चित रुप से समस्याओं का समाधान होता भी है। इस सबसे अलग ग्राम विकास चौपाल के माध्यम से मुख्यमंत्री और सरकार को लोगों की भावनाओं, क्षेत्र विशेष की समस्याओें, आवश्यकताओं को समझने का अवसर मिलता है वहीं स्थानीय प्रशासन, कानून व्यवस्था आदि का भी चर्चा से फीड बैक मिल जाता है। यह तो सभी जानते हैं कि सभी गांवों में मुख्यमंत्री की ग्रामीण चौपाल नहीं हो सकती पर ग्रामीण चौपाल के माध्यम से संवेदनषील सरकार का संदेश आमजन में जा रहा है। सबसे बड़ी बात यह कि विकसित राजस्थान का सपना पूरा करने में यह ग्रामीण विकास चौपाल अहम् भूमिका निभाएगी ही साथ ही सरकार की भावी योजनाएं करते समय फील्ड का यह व्यावहारिक अनुभव निश्चित रुप से कागजी नहीं रह पायेगा और इससे व्यावहारिक योजनाएं बनने के साथ ही विकास को नई गति मिल सकेगी। यह साफ हो जाना चाहिए कि यह किसी मुख्यमंत्री या राजनेता के महिमा मंडन का प्रयास ना होकर एक राजनेता से आमजन की अपेक्षाओं पर खरा उतरने व आमजन के प्रति सीधे संवाद और जनभावना को समझने का बेहतरीन प्रयास माना जाना चाहिए। आज आमजन अपने जनप्रतिनिधि व मुख्यमंत्री से यही अपेक्षा रखती है कि वहां तक आमजन की सहज पहुंच हो सके। राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की इस पहल की सराहना की जानी चाहिए और संभव हो तो अन्य प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों व जनप्रतिनिधियों को भी इस दिशा में पहल करनी चाहिए।&nbsp;</div><div><br></div><div>- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 23 May 2026 18:27:30 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/a-chief-minister-positive-initiative-to-live-up-to-public-expectations</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[भारत में जानलेवा हुई गर्मी के साइड इफेक्ट्स समझिए, इसके कारण और बचाव के उपाय जानिए]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/understand-the-life-threatening-side-effects-of-the-heat-in-india]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हमारे देश का राजनीतिक तापमान तो वर्षपर्यंत उच्च रहता आया है और चुनावी इलाकों में इसके वैचारिक हीट स्ट्रोक से सिस्टम का झुलसना स्वाभाविक माना जाता है। लेकिन जब मई-जून के महीने में मौसमी तापमान जानलेवा स्तर तक खतरनाक रूप से चढ़ता जाता है तो लोग बाग परेशान हो उठते हैं। फिर अपनी राजनीतिक, प्रशासनिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक गलतियों पर पछतावा के अलावा कुछ नहीं मिलता, क्योंकि विकास के नाम पर आधुनिक भारतीय सभ्यता विनाश की ओर बढ़ती चली जा रही है और पश्चिमी शिक्षा प्राप्त हमारे हुक्मरान तमाशबीन बने बैठे हैं, क्योंकि हरेक आपदा को अवसरों में बदलकर&nbsp; अपनी कमाई बढ़ाने का धंधा उन्होंने सीख लिया है। बेशक अपवाद भी होंगे, लेकिन अल्पमत में, जिनकी लोकतंत्र में कम कद्र होती आई है।</div><div><br></div><div>वहीं, भारत में बढ़ती खतरनाक गर्मी केवल “मौसमी बदलाव” नहीं है, बल्कि जलवायु परिवर्तन, तेजी से शहरीकरण, जंगलों की कटाई और प्रदूषण का संयुक्त परिणाम बन चुकी है। हाल के वर्षों में उत्तर भारत, महाराष्ट्र, गुजरात और मध्य भारत में 46°C–48°C तक तापमान दर्ज हुआ है।&nbsp; मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, देश का एक बड़ा हिस्सा इस समय भट्ठी बना हुआ है। हमारे शहर हीट आइलैंड में तब्दील होते जा रहे हैं। उत्तर भारत से लेकर मध्य भारत तक, ज्यादातर शहरों में औसत तापमान सामान्य से 3-5 डिग्री सेल्सियस ऊपर चल रहा है। कहीं कहीं तो पिछले 14-15 वर्षों के रिकॉर्ड टूट चुके हैं। कोढ़ में खाज यह कि फिलहाल राहत के संकेत नहीं है, क्योंकि अल-नीनो की वजह से मौसम आगे और कड़ी परीक्षा ले सकता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/severe-heatwave-increases-the-risk-of-heat-stroke-with-intense-heat-even-at-night" target="_blank">देशभर में आग उगल रहा आसमान, Severe Heatwave ने बढ़ाया Heat Stroke का खतरा, रात में भी पड़ रही भयंकर गर्मी, जीना हुआ मुहाल</a></h3><div>अलबत्ता आप मानें या न मानें, लेकिन गर्मी की बढ़ती प्रवृति में भविष्य के लिए सबसे बड़ा संदेश छिपा हुआ है। वह यह कि यदि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन नहीं बनाया गया तो भारत में गर्मी केवल असुविधा नहीं बल्कि “राष्ट्रीय स्वास्थ्य और आर्थिक संकट” बन सकती है। लिहाजा, आने वाले वर्षों में जल संरक्षण, हरित विकास और स्वच्छ ऊर्जा ही सबसे बड़े समाधान होंगे।&nbsp;</div><div><br></div><div>विभिन्न अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स के अनुसार, इस सीजन 27 अप्रैल और 19 मई दो ऐसे दिन रहे, जब धरती के सबसे ज्यादा गर्म 50 शहरों में सभी भारत के थे। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्ट हमें चेताती है कि देश के 50% से ज्यादा शहरों में भीषण गर्मी का खतरा 'अधिक' से लेकर 'बेहद अधिक' के स्तर तक पहुंच चुका है। और तो और, साल 2015 से 2020 के दरम्यान लू वाले दिनों का औसत 7.4 दिन से बढ़कर 32.2 दिन हो गया है, और यह लगातार बढ़ रहा है। इसका गहरा दुष्प्रभाव हमारी सेहत और अर्थव्यवस्था दोनों पर पड़ने के आसार प्रबल हैं।</div><div><br></div><div>हमारे शहरों पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं, क्योंकि वो अंधाधुंध विकास की होड़ में अपनी हरियाली उजाड़कर उन्हें कंक्रीट के जंगलों में तब्दील करते जा रहे हैं। लिहाजा, भारत में गर्मी अब हर साल एक नया रेकॉर्ड बना रही है। चिंताजनक बात यह है कि दिन तो तपते ही हैं, अब रातें भी तपने लगी हैं और राहत देने वाली नहीं रहीं। इस 20 मई को दिल्ली ने मई महीने में 13 साल की सबसे गर्म रात देखी, जब न्यूनतम तापमान सामान्य से 5.2 डिग्री सेल्सियस ऊपर रहा। 21 मई को स्थिति उससे भी ज्यादा बुरी हुई।इस प्रकार से हाल के बरसों में हीटवेव की तीव्रता, उसका समय और सीमा अभूतपूर्व रूप से बढ़े हैं। इससे शहरों पर संकट ज्यादा है, जो घटती हरियाली, बढ़ते कंक्रीट स्ट्रक्चर और प्रदूषण की वजह से अर्बन हीट आईलैंड इफेक्ट' झेल रहे हैं।</div><div><br></div><div>इससे हमारे कामकाज पर भी नकारात्मक असर पड़ चुका है, क्योंकि मौसम की यह मार दोतरफा है- सेहत और अर्थव्यवस्था दोनों पर पड़ चुकी है। नैशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल के मुताबिक, 2025 में हीट स्ट्रोक के सात हजार से ज्यादा सस्पेक्टेड केस सामने आए थे। हालांकि माना जाता है कि भारत में हीट स्ट्रोक और उससे होने वाली मौतों का सही आंकड़ा रिपोर्ट नहीं हो पाता। क्योंकि देश की एक बड़ी आबादी मौसम का सीधा वार झेलती रहती है। इनमें गिग वर्कर्स, दिहाड़ी मजदूर, स्ट्रीट वेंडर्स वगैरह भी शामिल हैं। चूंकि घर बैठने से न इनका काम चलेगा और न अपने देश का। लिहाजा इस मौसम में ये सबसे ज्यादा जोखिम में ये लोग ही होते हैं। किसान और मजदूर भी इन्हीं जैसे होते हैं। ऐसे में इनकी सुरक्षा के लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए जा सकते है, जैसे सार्वजनिक शेल्टर, पेयजल की व्यवस्था और जहां संभव हो वहां काम के घंटों और चरित्र में बदलाव। इसे गंभीर चेतावनी के रूप में लिया जा सकता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>चूंकि बढ़ती हुई गर्मी से हमारी आपकी कार्यक्षमता पर सीधा असर पड़ता है, काम के घंटे कम होते हैं और प्रॉडक्टिविटी भी घट जाती है। लिहाजा यह बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह है। एक आकलन के मुताबिक, यदि यही हाल रहा तो 2030 तक गर्मी की वजह से भारत की जीडीपी का 4.5 प्रतिशत प्रभावित होगा। ये सारे आंकड़े एक गंभीर चेतावनी हैं। चूंकि क्लाइमेट चेंज की वजह से मौसम के और बिगड़ने की आशंका है, इसलिए बेहतर रहेगा अगर हमलोग अपनी तैयारी पहले से कर लें।</div><div><br></div><h2># भारत में खतरनाक गर्मी बढ़ने के प्रमुख कारण जानिए</h2><div>भारत में खतरनाक गर्मी बढ़ने के प्रमुख कारण इस प्रकार हैं- पहला, जलवायु परिवर्तन: धरती का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है। वैज्ञानिक रिपोर्टों के अनुसार मानव गतिविधियों से पैदा हुई ग्लोबल वार्मिंग ने भारत में हीटवेव को अधिक लंबा और तीव्र बना दिया है। दूसरा,&nbsp;&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">जंगलों की कटाई: पेड़ प्राकृतिक “कूलिंग सिस्टम” होते हैं। लिहाजा बड़े पैमाने पर वनों की कटाई से नमी कम हो रही है, वर्षा चक्र प्रभावित हो रहा है, जमीन अधिक गर्म हो रही है। तीसरा, शहरी हीट आइलैंड प्रभाव :कंक्रीट, डामर, वाहन, एसी और उद्योग शहरों को “हीट ट्रैप” बना रहे हैं। शहर रात में भी गर्म बने रहते हैं। चौथा, प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैसें: कोयला, पेट्रोल-डीजल, फैक्ट्रियों और वाहनों से निकलने वाली गैसें वातावरण में गर्मी रोकती हैं। पांचवां, कमजोर मानसून और एल-नीनो: एल-नीनो जैसी वैश्विक मौसमी घटनाएँ भारत में सूखा और गर्म हवाएँ बढ़ाती हैं। छठा, भूजल की कमी और सूखी जमीन जब मिट्टी में नमी कम होती है तो धरती तेजी से गर्म होती है। इससे लू और अधिक खतरनाक हो जाती है। सातवां, अनियोजित विकास: खुले मैदान कम होना, झीलों और तालाबों का खत्म होना, अत्यधिक कंक्रीट निर्माण इनसे स्थानीय तापमान तेजी से बढ़ रहा है।</span></div><div><br></div><h2># गर्मी से होने वाले खतरे को समझिए</h2><div>गर्मी से होने वाले खतरे निम्नलिखित हैं:- हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन, हार्ट और बीपी की समस्या, बच्चों और बुजुर्गों में मृत्यु जोखिम, फसल नुकसान, बिजली और पानी संकट श्रमिकों की कार्यक्षमता में कमी, भारत में हीटवेव से स्वास्थ्य संकट तेजी से बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।</div><div>&nbsp;</div><h2># ये हैं व्यक्तिगत स्तर पर बचने के प्रमुख निदान&nbsp;</h2><div>व्यक्तिगत स्तर पर बचने के प्रमुख निदान इस प्रकार हैं- पहला, दोपहर में बाहर निकलने से बचें, विशेषकर 12 बजे से 4 बजे तक। दूसरा, पर्याप्त पानी पिएँ, ओआरएस, नींबू पानी, छाछ, नारियल पानी। तीसरा, हल्के सूती कपड़े पहनें, गहरे रंग और टाइट कपड़ों से बचें। चौथा, शरीर को ठंडा रखें, सिर ढकें, छाता प्रयोग करें, गीला कपड़ा रखें। पांचवां, बच्चों और बुजुर्गों का विशेष ध्यान, उन्हें बंद और गर्म कमरों में न रखें।</div><div><br></div><h2># हमें सामाजिक और सरकारी स्तर पर निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए</h2><div>सामाजिक और सरकारी स्तर पर निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए- पहला, बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण- यह सबसे सस्ता और प्रभावी उपाय है। दूसरा, तालाब और जलस्रोत बचाना: स्थानीय तापमान कम करने में मदद मिलती है। तीसरा, “कूल रूफ” अभियान: सफेद या परावर्तक छतें घरों को ठंडा रखती हैं। चौथा, शहरों में हरित क्षेत्र बढ़ाना: पार्क ग्रीन कॉरिडोर, छायादार सड़कें। पांचवां, प्रदूषण नियंत्रण:&nbsp; स्वच्छ ऊर्जा और इलेक्ट्रिक परिवहन को बढ़ावा देना। छठा, हीट एक्शन प्लान: कई शहर अब हीट अलर्ट, कूलिंग सेंटर और स्वास्थ्य सुविधाएँ बढ़ा रहे हैं।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 22 May 2026 18:07:06 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/understand-the-life-threatening-side-effects-of-the-heat-in-india</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[बिहार की राजनीति के वर्तमान व भविष्य की 'सियासी धुरी' बन चुके हैं सीएम सम्राट चौधरी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/samrat-chaudhary-has-emerged-as-political-axis-of-both-the-present-and-future-of-bihar-politics]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बिहार की राजनीति में जुझारू युवा मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को केवल सुलझते हुए वर्तमान का एक नेता ही नहीं, बल्कि “भविष्य की राजनीतिक धुरी” के रूप में देखने वालों की संख्या पिछले 5 वर्षों में तेजी से बढ़ती ही जा रही है और यह सिलसिला निरंतर आगे भी चलता रहेगा। ऐसा इसलिए कि उनके पीछे कई राजनीतिक, सामाजिक और संगठनात्मक कारण सक्रिय हैं, जो उन्हें राजनीतिक रूप से अजेय बनाते हैं। आइए इन्हें समझते हैं विस्तार से-&nbsp;</div><div><br></div><div>पहला, बिहार में भाजपा के भीष्म पितामह कैलाशपति मिश्रा के संजोए हुए सपनों को पूरा करते हुए पार्टी के&nbsp; पहले मुख्यमंत्री बनने का ऐतिहासिक महत्व है। निःसन्देह साल 2026 में सम्राट चौधरी का बिहार का मुख्यमंत्री बनना भाजपा के लिए ऐतिहासिक मोड़ माना गया, क्योंकि पहली बार बिहार में भाजपा ने मुख्यमंत्री पद अपने हाथ में लिया। इससे प्रदेशवासियों में&nbsp; यह संदेश गया कि भाजपा अब बिहार में “जूनियर पार्टनर” नहीं रहना चाहती बल्कि पार्टी ने बिहार में अपना सूझबूझ युक्त स्वतंत्र नेतृत्व स्थापित कर दिया।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/prashant-kishor-has-a-new-destination-will-he-now-formulate-his-next-strategy-from-patna-ashram" target="_blank">Bihar में Jan Suraj की हार के बाद Prashant Kishor का नया ठिकाना, अब Patna आश्रम से बनाएंगे अगली रणनीति?</a></h3><div>पार्टी मामलों के जानकारों की मानें तो अब सम्राट चौधरी को केवल अंतरिम चेहरा नहीं, बल्कि दीर्घकालिक नेतृत्व के मोहरे के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, जो ओबीसी सियासत के लिए सौभाग्य की बात है। चूंकि उनमें सामाजिक न्याय के सूत्रधार लालू प्रसाद वाली हाजिर जवाबी, सुशासन बाबू नीतीश कुमार वाली सियासी चतुराई के अलावा सद्भावी कैलाशपति मिश्रा वाली सूझबूझ भी भरी हुई है जिससे हरेक जाति-धर्म के लोगों में उनकी स्वीकार्यता दिनप्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है।</div><div><br></div><div>दूसरा, सामाजिक समीकरणों में मजबूत पकड़: बिहार की राजनीति के भाजपाई नव चाणक्य सम्राट चौधरी का सबसे बड़ा राजनीतिक बल उनका व्यापक सामाजिक आधार माना जाता है। चूंकि वे पिछड़े वर्ग, विशेषकर कुशवाहा-कोइरी यानी लव कुश समाज या त्रिवेणी संघ से आते हैं, जो बिहार की राजनीति में निर्णायक प्रभाव रखता है। इससे भाजपा को लालू प्रसाद/नीतीश कुमार के सामाजिक न्याय के बीच यादव बनाम गैर-यादव ओबीसी राजनीति में बढ़त मिली ही, साथ ही ग्रामीण वोटबैंक में विस्तार आया, और मंडल राजनीति का नया जवाब देने का अवसर मिला।</div><div><br></div><div>चूंकि भाजपा लंबे समय से बिहार में एक ऐसा चेहरा खोज रही थी जो हिंदुत्व, ओबीसी राजनीति, और संगठनात्मक निष्ठा तीनों को एक साथ लेकर चल सके। लिहाजा सम्राट चौधरी उस समीकरण में फिट बैठते दिखे। उनकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि राजपूत, भूमिहार, ब्राह्मण, वैश्य, दलितों के साथ-साथ प्रगतिशील यादवों पर भी पूरी पकड़ है, जिसका फायदा भाजपा नीत एनडीए को बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में उन्होंने दिलवाया और पुरस्कार स्वरूप पहले गृहमंत्री, फिर मुख्यमंत्री बने।</div><div><br></div><div>तीसरा, व्यवहारिक आक्रामक भरा लेकिन नियंत्रित राजनीतिक शैली: राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि सम्राट चौधरी की राजनीति, तेजस्वी यादव की तरह ही पलटवारी आक्रामक, लेकिन संगठन के प्रति अनुशासित मानी जाती है। वे सड़क से लेकर सदन तक मुखर सियासी शैली अपनाते रहे हैं। इससे भाजपा कार्यकर्ताओं में ऊर्जा पैदा हुई। भाजपा नेतृत्व अक्सर ऐसे नेताओं को आगे बढ़ाता है जो जनसभाओं में भीड़ खींच सकें, विपक्ष पर हमला कर सकें, और संगठन के प्रति पूर्ण निष्ठावान रहें। ये सभी गुण सम्राट चौधरी में कूट कूट कर भरे हुए हैं। इसलिए उनका सियासी उदय पूर्वी भारत की राजनीति में अहम मायने रखती है।</div><div><br></div><div>चौथा, दिल्ली नेतृत्व का भरोसा: भाजपा के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की राजनीति में “विश्वसनीय नेतृत्व” बहुत महत्व रखता है। चूंकि सम्राट चौधरी इन कसौटियों पर भी खरे उतरते हैं, इसलिए उनपर सबका भरोसा बढ़ा है। वाकई सम्राट चौधरी जमीनी संगठन से निकले नेता हैं, जो भाजपा की स्थापित लाइन से थोड़ा-सा भी विचलित नहीं होते, और गठबंधन राजनीति को भी संभालने की क्षमता रखते हैं। यही कारण है कि बिहार में नेतृत्व परिवर्तन के समय उनके नाम पर सहमति बनी। इससे भाजपा की सूबाई राजनीति को एक नई धार मिली है।</div><div><br></div><div>पांचवां, सूबाई चाणक्य नीतीश युग के बाद की राजनीति का केंद्र बना सम्राट युग: बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लंबे राजनीतिक दौर के बाद बिहार में नेतृत्व का संक्रमण होना तय माना जा रहा था। ऐसे विचित्र समय में भी भाजपा ने युवा, ओबीसी, और आक्रामक राजनीतिक छवि वाले नेता के रूप में सम्राट चौधरी को आगे बढ़ाकर भविष्य की राजनीति का संकेत दे दिया है। इसका उद्देश्य केवल सरकार चलाना नहीं, बल्कि अगले 10–15 वर्षों का राष्ट्रवादी राजनीतिक आधार तैयार करना भी माना जा रहा है। पार्टी की इस रणनीति को अमलीजामा पहनाने के प्रति सम्राट चौधरी ने भी प्रतिबद्धता दिखाई है।</div><div><br></div><div>छठा, सत्ताप्रतिष्ठान की राह में चुनौतियाँ भी कम नहीं:&nbsp;&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">हालाँकि सम्राट चौधरी के सामने कतिपय बड़ी चुनौतियाँ हैं, जिसमें बेरोजगारी, पलायन, कानून व्यवस्था, शिक्षा और स्वास्थ्य, जातीय संतुलन, और गठबंधन राजनीति के प्रबंधन में सम्राट चौधरी निरंतर सधी चाल चल रहे हैं और अहम फैसले ले रहे हैं। इससे बिहार वासियों के दिलोदिमाग पर सकारात्मक असर पड़ा है। भले ही सियासी ईर्ष्यावश विपक्ष लगातार उनकी सरकार को अपराध और प्रशासनिक मुद्दों पर घेर रहा है। लेकिन सम्राट चौधरी लगातार विकास,</span></div><div>रोजगार, और प्रशासनिक सुधार पर ठोस परिणाम देते ।नजर आते हैं, इसलिए सूबे में “भविष्य के नेता” वाली उनकी छवि स्थायी बनती जा रही है।&nbsp;</div><div><br></div><div>सातवां, बिहार की नई राजनीतिक कथा के अहम सूत्रधार और नेतृत्वकर्ता: सम्राट चौधरी का उदय केवल व्यक्ति विशेष का उत्थान नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति में तीन बड़े परिवर्तनों का संकेत माना जा रहा है: पहला, भाजपा का स्वतंत्र प्रभुत्व, दूसरा, ओबीसी नेतृत्व का नया संस्करण, और तीसरा, पोस्ट-नीतीश युग की शुरुआत। चूंकि इस नई राजनीतिक कथा के अहम सूत्रधार और नेतृत्वकर्ता खुद सम्राट चौधरी ही हैं, इसीलिए समर्थक उन्हें “बिहार का वर्तमान और भविष्य” दोनों कह रहे हैं। उनकी तमाम कोशिशें भी इसी ओर इंगित करती दिखाई देती हैं। इसलिए हर ओर उल्लास की स्थिति देखी जा रही है।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 21 May 2026 19:33:10 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/samrat-chaudhary-has-emerged-as-political-axis-of-both-the-present-and-future-of-bihar-politics</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[उर्वरक उपयोग में 50 प्रतिशत कमी से खेती-किसानी में आएगा क्रान्तिकारी बदलाव ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/50-percent-reduction-in-fertilizer-usage-will-bring-about-revolutionary-transformation-agriculture]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा पिछले दिनों देशवासियों से किये गए सात आग्रहों में से एक आग्रह रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में 50 प्रतिशत तक कमी लाने का आग्रह है। इसमें कोई दो राय नहीं कि रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुध उपयोग के दुष्परिणामों को लेकर गत कई सालों से गंभीर आग्रह किये जा रहे हैं। प्रति हैक्टेयर कृषि उत्पादन सेचुरेशन स्तर पर पहुंच गया है तो मिट्टी की उर्वरा शक्ति को नुकसान पहुंच रहा है, मिट्टी और जल प्रदूषण उच्च स्तर पर पहुंच गया है तो रासायनिक उर्वरकों व कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से केंसर जैसी बीमारियों का दायरा बहुत अधिक बढ़ गया है। होना तो यहां तक लग गया है कि अत्यधिक खाद्यान्न उत्पादन वाले किसान और प्रदेश अपने दैनिक उपभोग के लिए जैविक खाद्यान्न या अन्य प्रदेशों के खाद्यान्न के उपयोग पर जोर देने लगे हैं। इसके साथ ही यह भी एक तथ्य है कि देश में लाख प्रयासों के बावजूद रासायनिक उर्वरकों का आयात लगातार बढ़ता जा रहा है। विदेशों से 979 अरब अमेरिकी डॉलर के निर्यात में से ईंधन के बाद बहुत अधिक आयात राशि उर्वरकों पर भी व्यय होती है। देश में करीब 600 लाख टन उर्वरकों की खपत है तो 2030 तक 700 से 800 लाख टन तक पहुंचने की संभावना व्यक्त की जा रही है। तस्वीर का एक पक्ष यह है कि रासायनिक उर्वरकों में देश की मांग के शत-प्रतिशत पोटाश की विदेषों से आयात पर निर्भरता है तो फास्फेट के तकरीबन 90 प्रतिशत और यूरिया के करीब 25 प्रतिशत तक आयात पर निर्भरता है। मजे की बात यह भी है कि यूरिया की आयात निर्भरता तो करीब 25 प्रतिशत तक है पर यूरिया उत्पादन के लिए काम में आने वाली प्राकृतिक गैस की जरुरत करीब 80 प्रतिशत तक विदेशों से आयात से ही संभव हो पाती है। एक मोटे अनुमान के अनुसार रासायनिक उर्वरकों पर दो लाख करोड़ के आसपास अनुदान राषि दी जा रही है।&nbsp;</div><div><br></div><div>प्रधानमत्री नरेन्द्र मोदी ने रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में 50 प्रतिशत तक कटौती का आग्रह किया है। रासायनिक उर्वरकों के उपयोग को सीमित करने के लिए जहां एक और जैविक खेती के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया जा रहा है वहीं पीएम प्रणाम योजना में राज्यों को प्रोत्साहित करने की व्यवस्था है। प्रधानमंत्री का आग्रह है कि 10 प्रतिशत फर्मेंटेड खाद का उपयोग बढ़ाकर किसान बड़ा सहयोग दे सकते हैं। जून 2023 में रासायनिक उर्वरकों के उपयोग को सीमित करने को प्रोत्साहित करने के लिए केन्द्र सरकार ने प्रोत्साहन योजना लागू की है। योजना के अनुसार रासायनिक उर्वरकों के तीन साल के औसत उपयोग से खपत कम करने पर अनुदान के रुप में बचाई गई राशि की 50 प्रतिशत राशि राज्य सरकारों को प्रोत्साहन के रुप में देने की व्यवस्था की गई है। इसमें से 70 प्रतिशत राशि गांवों में वैकल्पिक उर्वरक यानी जैविक खाद&nbsp; उत्पादन व तकनीक के विस्तार पर व्यय करने पर जोर दिया जा रहा है वहीं 30 प्रतिशत राशि रासायनिक उर्वरकों की खपत करने के लिए काश्तकारों को जागरुक करने, अवेयरनेस कार्यक्रम चलाने आदि पर व्यय करने का प्रावधान है। विषेषज्ञों का मानना है कि फर्मेंटेड खाद के उपयोग से रासायनिक उर्वरकों की खपत में अच्छी खासा कमी लाई जा सकती है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने फर्मेंटेड खाद मिलाने पर जोर दिया है। प्रधानमंत्री बीजेयूआर कार्यक्रम के तहत मिट्टी की जांच का जो व्यापक कार्यक्रम चलाया जा रहा है उसका उद्देश्य भी यही है कि खेत की आवश्यकता के अनुसार ही उर्वरकों का उपयोग किया जाए। अंधाधूंध उपयोग को रोक कर मिट्टी की उर्वरा शक्ति बनाएं रखना है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/business/onion-prices-fall-due-to-export-crisis-modi-govt-takes-a-big-step-nafed-will-buy-the-entire-stock" target="_blank">Export पर संकट से गिरे प्याज के दाम, Modi सरकार का बड़ा कदम, NAFED खरीदेगा पूरा स्टॉक</a></h3><div>एक बात तो लगभग सबके संज्ञान में आ गई है कि रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग के कारण खेतों की मिट्टी की उपजाउ क्षमता प्रभावित हो रही है तो भूजल का अत्यधिक दोहन होने से भू जल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है वहीं रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के कारण खतरनाक स्तर पर प्रदूषित हो रहा है। जैविक विविधता प्रभावित हो रही है तो खेती के सहायक कीटनाशकों का अस्तित्व ही समाप्त होने को है। इसके अलावा खाद्यान्नों के विषैला होने व इन खाद्यान्नों के उपयोग से बीमारियों का दायरा तेजी से बढ़ता जा रहा है। इतना सबकुछ होने के बावजूद रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में दिन प्रतिदिन बढ़ोतरी ही हो रही है। 2025-26 के आंकड़़ों की ही बात करें तो यूरिया में 138 प्रतिशत, डीएपी के उपयोग में 94 प्रतिशत और एनपीके के उपयोग में 83 प्रतिशत के आसपास बढ़ोतरी हुई है। ऐसे में प्रधानमंत्री के आग्रह के निहितार्थ को समझना होगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का आग्रह इस मायने में बहस का मुद्दा नहीं होना चाहिए कि सरकार देश की जरुरतों को पूरा नहीं कर पा रही। अपितु गंभीर चिंतन की बात यह है कि हम परंपरागत खेती या जैविक खेती को बढ़ावा देकर आने वाली पीढ़ी और जल-मिट्टी, वायु के प्रदूषण को कम करने में भागीदार बन सकते हैं। केवल 10 प्रतिशत फर्मिंटेड खाद मिलाने से ही बहुत बड़ा सकारात्मक बदलाव देखा जा सकता है। 50 प्रतिशत तक आयात निर्भरता कम की जा सकती है। आज हम रुस, ओमान, सउदी अरब, मोरक्को, चीन आदि पर उर्वरकों के आयात के लिए निर्भर है। और अरबो डालर आयात पर खर्च करके भी प्रदूषण और सेहत से खिलवाड़ पा रहे हैं। हांलाकि आज अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आसन्न संकट को देखते हुए दूरदृष्टि पूर्ण 7 आग्रहों को प्रतिपक्ष आलोचना के स्तर पर ले रहा है पर यह नहीं भूलना चाहिए कि पीएम प्रणाम कार्यक्रम जून 23 से चलाया जा रहा है तो पीएमबीजेयूआर कार्यक्रम जो कि खेत की मिट्टी की जांच से जुड़ा कार्यक्रम है वर्षों से जारी है। इसके साथ ही आज कृषि वैज्ञानिक बार बार आग्रह कर रहे हैं कि उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग घातक स्तर पर पहुंच रहा है। पंजाब और उससे सटते इलाकों में खेती के हालात बयां कर रहे हैं। ऐसे में रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में 50 प्रतिशत कमी के आग्रह को सकारात्मक लिया जाना चाहिए। इस बहाने हमें खेती को सही दिशा देने का अवसर मिला है। खरीफ की बुवाई में ही इस पर अमल किया जा सकता है। खेती और पर्यावरण से जुड़े सरकारी और गैरसरकारी संस्थाओं को प्रोएक्टिव रोल अपनाते हुए आगे आना होगा। यह एक अवसर मिला है और इस अवसर का सकारात्मक उपयोग को देश की खेती किसानी को नई दिशा दी जा सकती है।</div><div><br></div><div>- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 20 May 2026 13:36:27 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/50-percent-reduction-in-fertilizer-usage-will-bring-about-revolutionary-transformation-agriculture</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Gold पर सरकार की सख्ती के चलते Jewellery Industry में हाहाकार! खाली बैठे हैं कारीगर, सूने पड़े हैं बड़े-बड़े शोरूम]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/stir-in-the-jewelry-industry-artisans-are-sitting-idle-and-large-showrooms-lie-empty]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>देशभर में ज्वैलर्स की दुकानें इन दिनों वीरान नजर आने लगी हैं और इस कारोबार से जुड़े लाखों कारीगर खाली बैठने पर मजबूर हो रहे हैं। दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से नागरिकों से एक वर्ष तक सोने के आभूषणों की खरीद टालने की अपील और सोने पर आयात शुल्क को छह प्रतिशत से बढ़ाकर पंद्रह प्रतिशत किए जाने के बाद आभूषण उद्योग में चिंता और असमंजस का माहौल गहरा गया है। सरकार का कहना है कि पश्चिम एशिया संघर्ष, बढ़ती ऊर्जा कीमतों और कमजोर होते रुपये के कारण विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ रहा है, इसलिए सोने के आयात को नियंत्रित करना जरूरी हो गया है।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोना उपभोक्ता देश है। ऐसे में सरकार के इस कदम का असर व्यापक माना जा रहा है। अखिल भारतीय रत्न एवं आभूषण घरेलू परिषद के अध्यक्ष राजेश रोकडे ने कहा कि उद्योग को प्रधानमंत्री की अपील का सम्मान करना चाहिए और किसी प्रकार की घबराहट या हड़ताल से बचना चाहिए। उनका कहना है कि कच्चे तेल के बाद सबसे अधिक विदेशी मुद्रा सोने के आयात पर खर्च होती है और सरकार का उद्देश्य भुगतान संतुलन को बेहतर बनाना है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/customers-flock-to-old-gold-exchange-schemes" target="_blank">Old Gold Exchange Schemes पर टूट रहे ग्राहक, 18 Carats Bridal Jewellery Collections बाजार में छाए</a></h3><div>हम आपको बता दें कि आभूषण उद्योग से सीधे और परोक्ष रूप से लगभग एक करोड़ लोगों की आजीविका जुड़ी हुई है। इसमें कारीगर, बिक्रीकर्मी, पैकेजिंग, सुरक्षा, बैंकिंग और बीमा जैसे क्षेत्र भी शामिल हैं। उद्योग जगत को आशंका है कि यदि स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो कोविड काल जैसी आर्थिक मुश्किलें फिर सामने आ सकती हैं।</div><div><br></div><div>दूसरी ओर, विवाह और पारिवारिक समारोहों में सोने का सांस्कृतिक महत्व भी इस बहस के केंद्र में आ गया है। दक्षिण भारत में कसुमालै, झिमिकी, जडई बिल्ला और पारंपरिक चूड़ियों जैसे आभूषण केवल सजावट नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान और पारिवारिक बचत का प्रतीक माने जाते हैं। कई परिवार अब अपनी योजनाओं में बदलाव कर रहे हैं। एक महिला ने बताया कि उन्होंने विवाह के लिए नकली आभूषण अपनाने और केवल मंगलसूत्र तथा अंगूठियों जैसे सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण गहनों को ही सोने में बनवाने का निर्णय लिया है।</div><div><br></div><div>हालांकि कई ग्राहक इस बदलाव से असहज हैं। उद्योग प्रतिनिधियों का कहना है कि सामान्य ग्राहक जरूरत के अनुसार ही खरीदारी करता है, वह सोना जमा करने के उद्देश्य से नहीं खरीदता। मद्रास ज्वैलर्स एंड डायमंड ट्रेडर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष जयंतीलाल चलानी ने कहा कि शुल्क वृद्धि के बाद ग्राहकों में घबराहट बढ़ी है। कई लोगों ने भविष्य की खरीद पहले ही कर ली ताकि आगे कीमत और न बढ़े।</div><div><br></div><div>व्यापारियों के अनुसार शुल्क वृद्धि का सीधा बोझ ग्राहकों पर पड़ेगा, क्योंकि अतिरिक्त शुल्क बिक्री मूल्य में जोड़ दिया जाएगा। फिर भी इसका अप्रत्यक्ष नुकसान व्यापारियों को भी होगा। उदाहरण के तौर पर, पहले जहां कोई ग्राहक बारह तोले खरीद पाता था, अब वह केवल ग्यारह तोले ही खरीद सकेगा। इससे बिक्री की मात्रा घटेगी।</div><div><br></div><div>उधर, सोने की लगातार बढ़ती कीमतों ने ग्राहकों की खरीद आदतों में भी बदलाव शुरू कर दिया है। उद्योग के अनुसार पिछले पांच वर्षों में सोने की कीमतों में लगभग तीन सौ प्रतिशत और पिछले एक वर्ष में लगभग अस्सी प्रतिशत तक वृद्धि हुई है। अब लगभग आधे ग्राहक पुराने आभूषण बदलकर नए डिजाइन बनवा रहे हैं ताकि केवल निर्माण शुल्क देना पड़े। पारंपरिक आभूषणों को आधुनिक डिजाइन में बदलवाने की प्रवृत्ति भी तेजी से बढ़ रही है।</div><div><br></div><div>युवा ग्राहकों के बीच चांदी, हल्के हीरे वाले आभूषण और चौदह या अठारह कैरेट के हल्के गहनों की मांग बढ़ रही है। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि नई पीढ़ी अब आभूषणों को केवल निवेश नहीं, बल्कि दैनिक फैशन के रूप में भी देख रही है। प्रयोगशाला में बने हीरों और हल्के डिजाइन वाले आभूषणों की लोकप्रियता भी बढ़ रही है। हालांकि उद्योग मानता है कि प्लेटिनम अभी भी सोने का विकल्प नहीं बन पाया है।</div><div><br></div><div>इस बीच, सरकार और उद्योग दोनों की नजर स्वर्ण मुद्रीकरण योजना पर भी है। इस योजना के तहत लोग अपने घरों में पड़ा सोना जमा कर ब्याज प्राप्त कर सकते हैं। न्यूनतम दस ग्राम सोना जमा किया जा सकता है और उस पर लगभग दो से ढाई प्रतिशत वार्षिक ब्याज मिलता है। सरकार का उद्देश्य घरेलू सोने को आर्थिक प्रणाली में लाकर आयात पर निर्भरता कम करना है।</div><div><br></div><div>लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में सोना केवल वित्तीय संपत्ति नहीं, बल्कि भावनात्मक और सांस्कृतिक धरोहर माना जाता है। लोग अपने पारिवारिक आभूषणों को पिघलाकर जमा कराने में सहज महसूस नहीं करते। इसके बजाय वे पुराने गहनों को गिरवी रखकर ऋण लेना या उन्हें बदलकर नए डिजाइन बनवाना अधिक पसंद करते हैं। यही कारण है कि स्वर्ण मुद्रीकरण योजना अपेक्षित सफलता नहीं पा सकी है।</div><div><br></div><div>उद्योग जगत ने सरकार को कई सुझाव भी दिए हैं। इनमें पुराने सोने के विनिमय कार्यक्रम को प्रोत्साहन, स्वर्ण जमा योजनाओं को आकर्षक बनाना, हल्के वजन के आभूषणों को बढ़ावा देना और कर्नाटक की कोलार स्वर्ण खदानों को फिर से सक्रिय करने जैसे प्रस्ताव शामिल हैं। साथ ही चेतावनी भी दी गई है कि अधिक आयात शुल्क से अवैध तस्करी और काले बाजार की गतिविधियां बढ़ सकती हैं।</div><div><br></div><div>इसी बीच, सरकार ने मंदिरों और धार्मिक संस्थानों के सोने के भंडार को सरकारी योजना के तहत शामिल किए जाने संबंधी अफवाहों को सिरे से खारिज कर दिया है। सरकार ने स्पष्ट कहा है कि मंदिरों के सोने को रणनीतिक स्वर्ण भंडार बनाने या उस पर किसी प्रकार की स्वर्ण मुद्रीकरण योजना लागू करने का कोई प्रस्ताव नहीं है। लोगों से अपील की गई है कि वे अपुष्ट सूचनाओं पर विश्वास न करें और केवल आधिकारिक घोषणाओं पर भरोसा करें।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 19 May 2026 13:35:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/stir-in-the-jewelry-industry-artisans-are-sitting-idle-and-large-showrooms-lie-empty</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Old Gold Exchange Schemes पर टूट रहे ग्राहक, 18 Carats Bridal Jewellery Collections बाजार में छाए]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/customers-flock-to-old-gold-exchange-schemes]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत में सोना और चांदी की बढ़ती मांग, वैश्विक अस्थिरता और आयात पर बढ़ते दबाव के बीच केंद्र सरकार, आभूषण उद्योग और खुदरा कंपनियां अब घरों और मंदिरों में पड़े निष्क्रिय सोने को फिर से अर्थव्यवस्था में लाने की दिशा में सक्रिय हो गई हैं। सरकार ने 12 मई को सोना और चांदी पर आयात शुल्क 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत कर दिया। इसका उद्देश्य लगातार बढ़ रहे आयात को नियंत्रित करना और विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ रहे दबाव को कम करना है। इसी क्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नागरिकों से अपील की है कि वह एक वर्ष तक सोने की खरीद टालने पर विचार करें ताकि देश की आर्थिक स्थिति पर अनावश्यक बोझ कम हो सके।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोना उपभोक्ता देश है और अपनी जरूरत का लगभग पूरा सोना विदेशों से आयात करता है। वित्त वर्ष 2025-26 में देश का सोना आयात बढ़कर लगभग 68.9 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जबकि 2016-17 में यह केवल 9.7 अरब डॉलर था। वहीं चांदी का आयात भी एक दशक में तेजी से बढ़ा है और 2025-26 में यह 11.4 अरब डॉलर से अधिक हो गया। दूसरी ओर निर्यात बेहद कम है, जिससे व्यापार घाटा और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ रहा है। स्विट्जरलैंड, संयुक्त अरब अमीरात और पेरू भारत के प्रमुख सोना आपूर्तिकर्ता हैं, जबकि चांदी मुख्य रूप से ब्रिटेन, हांगकांग और अमेरिका से आयात की जाती है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/all-jewelers-have-launched-a-new-scheme-do-not-sell-your-old-gold-exchange-it" target="_blank">सारे Jewellers ले आये नई स्कीम, अब पुराना Gold बेचो नहीं, बदलो! मिलेगा पूरा फायदा</a></h3><div>आभूषण उद्योग का मानना है कि यदि भारतीय घरों और मंदिरों में जमा निष्क्रिय सोने का एक हिस्सा भी औपचारिक व्यवस्था के माध्यम से बाजार में वापस लाया जाए, तो आयात पर निर्भरता काफी कम हो सकती है। टाइटन कंपनी के मुख्य वित्त अधिकारी अशोक सोनथालिया ने कहा कि भारत के नागरिकों और मंदिरों के पास दुनिया का सबसे बड़ा जमीन के ऊपर मौजूद स्वर्ण भंडार है। टाइटन ने लगभग 25 वर्ष पहले पुराना सोना विनिमय कार्यक्रम शुरू किया था और वर्तमान में उसकी कुल सोना जरूरत का लगभग 50 प्रतिशत इसी माध्यम से पूरा होता है।</div><div><br></div><div>कल्याण ज्वैलर्स ने भी “नेशन फर्स्ट गोल्ड फॉर इंडिया” पहल की घोषणा की है। कंपनी का लक्ष्य इस वित्त वर्ष में पांच टन सोना आयात कम करना है। इसके तहत पुराने सोने के विनिमय कार्यक्रम को बढ़ावा दिया जाएगा, हल्के वजन के 18 कैरेट आभूषणों को प्रोत्साहित किया जाएगा और स्वर्ण मुद्रीकरण योजनाओं का विस्तार किया जाएगा। कंपनी अपने 342 स्टोरों में विशेष काउंटर स्थापित करेगी, जहां ग्राहक पारदर्शी व्यवस्था के तहत सोने को नकद में बदल सकेंगे। कंपनी के अनुसार उसके कारोबार में पुराने सोने के विनिमय की हिस्सेदारी 30 प्रतिशत से अधिक हो चुकी है।</div><div><br></div><div>उधर, रत्न एवं आभूषण निर्यात संवर्धन परिषद ने भी प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर कई सुझाव दिए हैं। परिषद का कहना है कि कम कैरेट वाले आभूषणों की बिक्री बढ़ाने से सोना आयात में 20 से 30 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है। साथ ही पुराने सोने को नए आभूषणों में बदलने की संस्कृति को बढ़ावा देना भी जरूरी है। मलाबार गोल्ड एंड डायमंड्स ने भी सरकार को स्वर्ण मुद्रीकरण योजना को और प्रभावी बनाने का प्रस्ताव दिया है। कंपनी के अध्यक्ष एमपी अहमद के अनुसार भारतीय परिवारों के पास भारी मात्रा में निष्क्रिय सोना मौजूद है और यदि उसका कुछ हिस्सा भी औपचारिक व्यवस्था में वापस आए तो नए आयात की आवश्यकता काफी कम हो सकती है।</div><div><br></div><div>विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय परिवार आमतौर पर आभूषण और सोने के सिक्के खरीदकर बैंक लॉकरों में सुरक्षित रखते हैं। यह सोना लंबे समय तक निष्क्रिय रहता है जबकि इसका पुनर्चक्रण देश की अर्थव्यवस्था के लिए उपयोगी हो सकता है। उद्योग जगत अब 22 कैरेट की बजाय 18 और 14 कैरेट के हल्के आभूषणों को बढावा देने पर भी जोर दे रहा है। टाइटन ने हाल ही में 18 कैरेट में दुल्हन आभूषणों का नया संग्रह पेश किया है।</div><div><br></div><div>इधर अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी सोने की कीमतों में भारी उतार चढ़ाव देखने को मिल रहा है। अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव तथा पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण तेल कीमतों में तेजी आई है। इसके चलते मुद्रास्फीति बढ़ने और ब्याज दरों में कटौती की संभावना कम होने से सोने की कीमतों पर दबाव बना है। हाल के दिनों में सोने की कीमतों में 13 प्रतिशत से अधिक गिरावट दर्ज की गई है। डॉलर मजबूत होने और अमेरिकी बांड प्रतिफल बढ़ने से निवेशकों का रुझान भी सोने से दूर हुआ है। विश्लेषकों का कहना है कि बढ़ती तेल कीमतों ने मुद्रास्फीति की आशंकाओं को फिर बढ़ा दिया है, जिससे बाजार में ब्याज दरों को लेकर संशय पैदा हो गया है।</div><div><br></div><div>इस बीच, पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतें भी तेजी से बढ़ रही हैं। इससे भारत जैसे आयात आधारित देशों पर दोहरा दबाव बन रहा है क्योंकि देश अपनी 85 प्रतिशत से अधिक तेल जरूरतें भी विदेशों से पूरी करता है। ऐसे में सोना और तेल दोनों के बढ़ते आयात से चालू खाता घाटा और रुपये पर दबाव बढ़ सकता है। यही कारण है कि सरकार अब नागरिकों से गैर जरूरी सोना और चांदी खरीद में संयम बरतने की अपील कर रही है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>

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      <pubDate>Sat, 16 May 2026 13:15:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/customers-flock-to-old-gold-exchange-schemes</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[सारे Jewellers ले आये नई स्कीम, अब पुराना Gold बेचो नहीं, बदलो! मिलेगा पूरा फायदा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/all-jewelers-have-launched-a-new-scheme-do-not-sell-your-old-gold-exchange-it]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हाल ही में सोने के आयात शुल्क में बढ़ोतरी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लोगों से सोने की खरीद कुछ समय के लिए टालने की अपील के बाद देश की प्रमुख आभूषण कंपनियां अब सोना पुनर्चक्रण योजनाओं यानि गोल्ड रि-साइक्लिंग स्कीम्स को तेजी से बढ़ावा दे रही हैं। इस पहल का उद्देश्य एक ओर घरेलू बाजार में सोने की मांग को संतुलित करना है, वहीं दूसरी ओर सोने के आयात पर निर्भरता कम कर देश को सीमा शुल्क भुगतान में राहत दिलाना भी है।</div><div><br></div><div>देश की जानी मानी कंपनियां जैसे Kalyan Jewellers, Malabar Gold &amp; Diamonds, Muthoot Exim, MMTC-PAMP और Tanishq पुरानी ज्वेलरी, टूटे हुए आभूषण, पुराने डिजाइन के गहने और सोने के सिक्कों को नए गहनों के बदले स्वीकार कर रही हैं। इन कंपनियों का दावा है कि इससे नया कारोबार भी बढ़ेगा और सोने के आयात का दबाव भी घटेगा।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/i-do-not-have-to-buy-new-gold-but-what-are-the-rules-for-keeping-old-gold-at-home" target="_blank">घर पर कितना Gold रखने की इजाजत देती है सरकार? नया सोना खरीदना नहीं है मगर पुराने सोने को रखने के नियम क्या हैं?</a></h3><div>मुथूट एक्जिम के मुख्य कार्यकारी अधिकारी कीयूर शाह के अनुसार सोना पुनर्चक्रण का मतलब ग्राहकों से पुराना सोना खरीदकर उसे शुद्ध करना और फिर दोबारा उद्योग में उपयोग के लिए उपलब्ध कराना है। उनका कहना है कि यदि भारतीय घरों में मौजूद कुल सोने का केवल एक प्रतिशत भी पुनर्चक्रित हो जाए तो देश का सोना आयात लगभग तीन सौ टन तक कम हो सकता है। यह भारत के कुल वार्षिक सोना आयात का लगभग चालीस प्रतिशत है।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि कंपनियों ने ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए अलग अलग योजनाएं शुरू की हैं। कल्याण ज्वेलर्स ने ‘नेशन फर्स्ट गोल्ड फॉर इंडिया’ पहल के तहत पुराना सोना विनिमय योजना शुरू की है। इसके तहत ग्राहक अपने पुराने या अनुपयोगी गहनों को नए डिजाइन में बदलवा सकते हैं। वहीं मालाबार गोल्ड एंड डायमंड्स ने अपनी स्वर्ण मौद्रीकरण योजना में न्यूनतम जमा सीमा दस ग्राम से घटाकर केवल एक ग्राम कर दी है। कंपनी ग्राहकों को सोने के वजन या नकद दोनों रूपों में भुगतान का विकल्प दे रही है।</div><div><br></div><div>मुथूट एक्जिम के देशभर में सौ केंद्र हैं और कंपनी के अनुसार उसने अब तक करीब पांच टन पुराना सोना खरीदा है। चालू वित्त वर्ष में ही लगभग एक हजार किलोग्राम सोना पुनर्चक्रण के लिए जुटाया गया है। दूसरी ओर तनिष्क की ‘ओल्ड गोल्ड न्यू इंडिया’ मुहिम के अंतर्गत नौ कैरेट से बाइस कैरेट तक के सोने को स्वीकार किया जा रहा है। कंपनी किसी भी ज्वेलर का सोना लेने का दावा करती है, चाहे वह टूटा हुआ या छोटा आभूषण ही क्यों न हो।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो ग्राहकों के मन में सबसे बड़ा सवाल यह रहता है कि पुराने गहनों का मूल्यांकन किस प्रकार किया जाता है। कंपनियों का कहना है कि अब पारंपरिक अंदाजे की बजाय वैज्ञानिक तकनीकों का इस्तेमाल हो रहा है। कल्याण ज्वेलर्स के अनुसार सोने की शुद्धता जांचने के लिए कैरेट मीटर और सटीक वजन मशीनों का उपयोग किया जाता है। मुथूट एक्जिम ने बताया कि वह एक्स आर एफ तकनीक वाली मशीनों का प्रयोग करता है, जिससे केवल तीस सेकंड में यह पता चल जाता है कि गहनों में सोने, चांदी, तांबा, जस्ता या निकल की कितनी मात्रा है। वहीं एमएमटीसी पैंप ने कहा कि उसकी प्रक्रिया में जर्मन तकनीक आधारित आधुनिक मशीनों का उपयोग होता है, जिससे ग्राहकों के गहनों को किसी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचता।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि पुराने सोने के बदले मिलने वाली राशि बाजार भाव और शुद्धता पर निर्भर करती है। मुथूट एक्जिम प्रतिदिन भारतीय बुलियन और ज्वेलर्स एसोसिएशन के बाजार भाव के अनुसार मूल्य तय करता है। कुछ कंपनियां सेवा शुल्क भी वसूलती हैं। मुथूट एक्जिम सोने की कीमत का लगभग तीन प्रतिशत सेवा शुल्क लेता है, जबकि एमएमटीसी पैंप वस्तु एवं सेवा कर के साथ अन्य शुल्क भी लागू करता है। कल्याण ज्वेलर्स का कहना है कि पुराने सोने के विनिमय पर कर नहीं लगता, केवल नए गहनों की खरीद पर कर देय होता है। कंपनी ने दावा किया है कि दस ग्राम सोने पर ग्राहकों को लगभग पूरा मूल्य दिया जाता है और केवल मिश्रित धातु अलग करने का मामूली शुल्क लिया जाता है।</div><div><br></div><div>इसी बीच आभूषण उद्योग का विस्तार अब शॉपिंग मॉल संस्कृति को भी प्रभावित कर रहा है। नई दिल्ली समेत देश के प्रमुख शहरों में ज्वेलरी स्टोर अब बड़े मॉलों के प्रमुख आकर्षण बनते जा रहे हैं। चार वर्ष पहले जहां मॉल क्षेत्रफल का केवल एक प्रतिशत हिस्सा आभूषण दुकानों के पास था, वहीं अब यह बढ़कर लगभग दस प्रतिशत तक पहुंच गया है।</div><div><br></div><div>रियल एस्टेट सलाहकार कंपनियों के अनुसार संगठित खुदरा बाजार में आभूषण क्षेत्र की हिस्सेदारी वर्ष 2019 के दो प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2025 में आठ प्रतिशत तक पहुंच गई है। हैदराबाद, चेन्नई, बेंगलुरु और दिल्ली एनसीआर जैसे शहरों में बड़े आकार के ज्वेलरी शोरूम तेजी से खुल रहे हैं। उपभोक्ताओं का भरोसा संगठित और प्रतिष्ठित ब्रांडों की ओर बढ़ने से यह क्षेत्र मॉल संचालकों के लिए प्रमुख किरायेदार बन गया है।</div><div><br></div><div>विशेषज्ञों का मानना है कि आभूषण खरीद अभी भी भरोसे और अनुभव पर आधारित है। लोग परिवार के साथ दुकान जाकर डिजाइन देखना और समझकर खरीदारी करना पसंद करते हैं। यही कारण है कि यह क्षेत्र ऑनलाइन बिक्री से अपेक्षाकृत कम प्रभावित हुआ है। तनिष्क, मालाबार गोल्ड एंड डायमंड्स, कल्याण ज्वेलर्स और कैरटलैन जैसे ब्रांड अब महानगरों के साथ छोटे शहरों में भी मॉलों के लिए भीड़ आकर्षित करने वाले प्रमुख केंद्र बन चुके हैं।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 15 May 2026 13:24:14 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/all-jewelers-have-launched-a-new-scheme-do-not-sell-your-old-gold-exchange-it</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[घर पर कितना Gold रखने की इजाजत देती है सरकार? नया सोना खरीदना नहीं है मगर पुराने सोने को रखने के नियम क्या हैं?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/i-do-not-have-to-buy-new-gold-but-what-are-the-rules-for-keeping-old-gold-at-home]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में देशवासियों से अगले एक वर्ष तक सोना खरीदने से बचने की अपील की। उनका कहना था कि देश को गैर जरूरी आयात कम करने और अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने पर ध्यान देना चाहिए। प्रधानमंत्री की इस अपील के बाद देश में एक बार फिर सोना रखने के नियमों और इससे जुड़े कानूनी प्रावधानों पर चर्चा तेज हो गई है। देखा जाये तो भारत में सोना केवल आभूषण नहीं बल्कि बचत, निवेश और सामाजिक प्रतिष्ठा का महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है। आर्थिक अनिश्चितता, महंगाई और बाजार में उतार चढ़ाव के समय लोग सोने को सुरक्षित निवेश के रूप में देखते हैं। यही कारण है कि गांव से लेकर शहर तक भारतीय परिवारों में सोने की मजबूत मांग बनी रहती है।</div><div><br></div><div>हालांकि देश में किसी व्यक्ति द्वारा सोना रखने की कोई स्पष्ट कानूनी सीमा तय नहीं है, लेकिन केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड यानी सीबीडीटी ने 11 मई 1994 को जारी एक परिपत्र में आयकर अधिकारियों के लिए कुछ दिशा निर्देश निर्धारित किए थे। इन निर्देशों का उद्देश्य आयकर छापों के दौरान अनावश्यक विवादों से बचना था। इसके तहत अधिकारियों को एक निश्चित सीमा तक सोने के आभूषण जब्त नहीं करने की सलाह दी गई थी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/gold-and-silver-prices-rise-sharply-jewelers-say-they-will-be-ruined" target="_blank">Gold, Silver के दाम में भारी वृद्धि, Jewellers बोले हमारी कमर टूट जाएगी, सर्राफा बाजार में हड़कंप, घर में रखे सोने का क्या होगा?</a></h3><div>सीबीडीटी के नियमों के अनुसार विवाहित महिलाओं के पास 500 ग्राम तक सोने के आभूषण होने पर उन्हें जब्त नहीं किया जाएगा। अविवाहित महिलाओं के लिए यह सीमा 250 ग्राम तय की गई है। वहीं पुरुषों के लिए, चाहे वे विवाहित हों या अविवाहित, 100 ग्राम तक सोने के आभूषण रखने की सीमा निर्धारित है। इन सीमाओं के भीतर पाए गए आभूषणों को सामान्य परिस्थितियों में आयकर अधिकारी जब्त नहीं कर सकते।</div><div><br></div><div>सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि किसी व्यक्ति ने अपने सोने का विवरण संपत्ति कर विवरणी में दिया है, या वह सोने के वैध स्रोत का संतोषजनक प्रमाण प्रस्तुत कर देता है, तो ऐसे आभूषण जब्त नहीं किए जाएंगे। इसके अलावा पारिवारिक परंपरा, सामाजिक स्थिति और रीति रिवाजों को देखते हुए अधिकारियों को अधिक मात्रा में सोना होने पर भी विवेकाधिकार इस्तेमाल करने का अधिकार दिया गया है।</div><div><br></div><div>लेकिन यदि कोई व्यक्ति अपने पास मौजूद सोने का वैध स्रोत नहीं बता पाता, या उसका जवाब संतोषजनक नहीं माना जाता, तो उस पर भारी कर लगाया जा सकता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार ऐसे मामलों में लगभग 78 प्रतिशत तक कर वसूला जा सकता है, जिसमें अधिभार और उपकर भी शामिल होता है। इसके अतिरिक्त 10 प्रतिशत तक जुर्माना भी लगाया जा सकता है।</div><div><br></div><div>इस बीच सोने पर बढ़ी आयात शुल्क दरों ने बाजार की चिंता और बढ़ा दी है। उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि आयात शुल्क बढ़ने से सोने की खुदरा कीमतों में तेजी आएगी, जिसका सबसे ज्यादा असर मध्यम वर्ग और सीमित बजट वाले ग्राहकों पर पड़ेगा। माना जा रहा है कि निकट भविष्य में सोने की बिक्री में गिरावट देखने को मिल सकती है।</div><div><br></div><div>जानकारों का कहना है कि भारत अपनी घरेलू जरूरतों का लगभग पूरा सोना आयात के जरिये पूरा करता है। वित्त वर्ष 2026 में देश का सोना आयात बढ़कर 72 अरब डॉलर तक पहुंच गया था, जबकि पिछले वित्त वर्ष में यह 58 अरब डॉलर था। ऐसे में आयात शुल्क में वृद्धि का सीधा असर कीमतों पर पड़ना तय माना जा रहा है।</div><div><br></div><div>सेन्को गोल्ड के प्रबंध निदेशक सुवंकर सेन का कहना है कि आयात शुल्क बढ़ने से कीमतों में तत्काल असर दिखाई देगा और कई ग्राहक फिलहाल खरीदारी टाल सकते हैं। उनके अनुसार निकट अवधि में बिक्री की मात्रा में 10 से 15 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है।</div><div><br></div><div>मालाबार समूह के अध्यक्ष एमपी अहमद का कहना है कि पहली बार सोना खरीदने वाले ग्राहकों को नई कीमतों के अनुसार खुद को ढालने में समय लगेगा। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि पुराने सोने के बदले नया आभूषण लेने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ेगी और आगे चलकर यही खरीदारी का प्रमुख तरीका बन सकता है।</div><div><br></div><div>ज्वेलरी कारोबार से जुड़े उद्योगपति डॉ. जॉय अलुक्कास का मानना है कि भारत में शादी और त्योहारों के साथ सोने का गहरा सांस्कृतिक और भावनात्मक रिश्ता है, इसलिए दीर्घकाल में मांग पूरी तरह कमजोर नहीं होगी। उनका कहना है कि अब ग्राहक सोने को केवल गहनों के रूप में नहीं बल्कि सुरक्षित निवेश के रूप में भी देखने लगे हैं।</div><div><br></div><div>इसी परिस्थिति को देखते हुए कई कंपनियां पुराने सोने के बदले नया आभूषण देने वाली योजनाओं पर जोर दे रही हैं। कल्याण ज्वेलर्स ने गोल्ड फोर इंडिया नाम से अभियान शुरू किया है, जिसके तहत ग्राहकों को पुराने, टूटे या अनुपयोगी आभूषण बदलकर नया सोना खरीदने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। साथ ही कम शुद्धता वाले 18 कैरेट आभूषणों को भी बढ़ावा दिया जा रहा है ताकि कम मात्रा में शुद्ध सोने का उपयोग हो सके।</div><div><br></div><div>रत्न और आभूषण निर्यात संवर्धन परिषद ने भी अपने सदस्यों से कम कैरेट वाले आभूषणों की बिक्री बढ़ाने और सोने की ईंटों तथा सिक्कों में निवेश को हतोत्साहित करने की अपील की है। परिषद का मानना है कि सोने की ईंटों और सिक्कों का आयात कुल आयात का लगभग 20 से 30 प्रतिशत हिस्सा है, जिसे कम करना जरूरी है।</div><div><br></div><div>कुल मिलाकर प्रधानमंत्री की अपील, आयात शुल्क में वृद्धि और सरकार की निगरानी ने सोने के बाजार को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। एक ओर सरकार आयात कम कर अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी ओर भारतीय समाज में सोने की सांस्कृतिक अहमियत के कारण इसकी मांग पूरी तरह खत्म होने की संभावना नहीं दिखती। माना जा रहा है कि आने वाले समय में सोने की खरीदारी का तरीका जरूर बदल सकता है, जहां लोग पुराने आभूषण बदलने, हल्के गहने खरीदने और सोच समझकर निवेश करने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। बहरहाल, आइये देखते हैं इस पूरे मामले पर ज्वैलर्स क्या कह रहे हैं।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 14 May 2026 12:31:53 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/i-do-not-have-to-buy-new-gold-but-what-are-the-rules-for-keeping-old-gold-at-home</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Gold, Silver के दाम में भारी वृद्धि, Jewellers बोले हमारी कमर टूट जाएगी, सर्राफा बाजार में हड़कंप, घर में रखे सोने का क्या होगा?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/gold-and-silver-prices-rise-sharply-jewelers-say-they-will-be-ruined]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम एशिया संकट और वैश्विक अनिश्चितता के बीच भारत सरकार ने सोना, चांदी और प्लैटिनम के आयात पर सीमा शुल्क में भारी बढ़ोतरी कर दी है जिससे इनकी कीमत में जबरदस्त उछाल आ गया है। शादियों के सीजन में सोने, चांदी के भाव में इस तेजी ने कई परिवारों की चिंता बढ़ा दी है लेकिन सरकार का कहना है कि यह कदम बेहद जरूरी हो गया था। हम आपको बता दें कि मोदी सरकार ने सोना और चांदी पर प्रभावी आयात शुल्क छह प्रतिशत से बढ़ाकर पंद्रह प्रतिशत कर दिया है, जबकि प्लैटिनम पर यह शुल्क छह दशमलव चार प्रतिशत से बढ़ाकर पंद्रह दशमलव चार प्रतिशत कर दिया गया है। सरकार का कहना है कि यह कदम विदेशी मुद्रा भंडार की सुरक्षा, चालू खाते के घाटे को नियंत्रित करने और गैर जरूरी आयातों पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से उठाया गया है।</div><div><br></div><div>नई व्यवस्था के तहत सरकार ने सोना और चांदी के आयात पर दस प्रतिशत मूल सीमा शुल्क तथा पांच प्रतिशत कृषि अवसंरचना और विकास उपकर लगाया है, जिससे कुल प्रभावी कर पंद्रह प्रतिशत हो गया है। इसके साथ ही सोना और चांदी के डोरे, सिक्कों तथा अन्य संबंधित उत्पादों पर भी शुल्क बढ़ाया गया है। सरकारी सूत्रों के अनुसार मौजूदा भू राजनीतिक परिस्थितियों और पश्चिम एशिया संकट के कारण कच्चे तेल के वैश्विक बाजार तथा समुद्री आपूर्ति मार्गों में भारी अस्थिरता पैदा हुई है। हम आपको बता दें कि भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातकों में शामिल है, इसलिए ऊंची तेल कीमतों और आपूर्ति बाधाओं से देश के आयात बिल, महंगाई और चालू खाते के घाटे पर दबाव बढ़ सकता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/jewellers-launch-new-scheme-attractive-schemes-for-buying-new-jewellery-in-exchange-of-old-gold" target="_blank">Gold नहीं खरीदने की मोदी की अपील के बाद ज्वैलर्स लाये नई योजना, पुराने सोने के बदले नये गहने खरीदने पर आकर्षक स्कीमें</a></h3><div>मोदी सरकार का कहना है कि ऐसे समय में विदेशी मुद्रा संसाधनों को आवश्यक क्षेत्रों के लिए सुरक्षित रखना जरूरी हो जाता है। दरअसल, विदेशी मुद्रा का उपयोग कच्चे तेल, उर्वरक, औद्योगिक कच्चे माल, रक्षा जरूरतों, महत्वपूर्ण तकनीक और पूंजीगत वस्तुओं जैसे जरूरी आयातों के लिए प्राथमिकता से किया जाना चाहिए, क्योंकि ये देश की अर्थव्यवस्था, विनिर्माण, निर्यात, आधारभूत ढांचे और राष्ट्रीय सुरक्षा से सीधे जुड़े हैं। इसके विपरीत सोना और चांदी जैसे बहुमूल्य धातुओं का आयात मुख्य रूप से उपभोग और निवेश आधारित माना जाता है, जिससे विदेशी मुद्रा का भारी बहिर्गमन होता है।</div><div><br></div><div>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी देशवासियों से एक वर्ष तक सोने की खरीद टालने की अपील की है ताकि विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम किया जा सके। हम आपको बता दें कि भारत अपनी आवश्यकता का लगभग पूरा सोना आयात करता है। पिछले कुछ महीनों में शेयर बाजार से कमजोर प्रतिफल और बुलियन कीमतों में तेजी के कारण निवेश के रूप में सोने की मांग तेजी से बढ़ी है। विश्व स्वर्ण परिषद के आंकड़ों के अनुसार मार्च तिमाही में भारत के स्वर्ण विनिमय कारोबार कोषों में निवेश सालाना आधार पर एक सौ छियासी प्रतिशत बढ़कर बीस मीट्रिक टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो मोदी सरकार के इस फैसले के पीछे केवल बहुमूल्य धातुओं के आयात को नियंत्रित करना ही नहीं, बल्कि तेजी से बढ़ते आयात बिल और विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ते दबाव को कम करना भी एक प्रमुख कारण माना जा रहा है। सरकार का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव तथा होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधा के कारण कच्चे तेल और उर्वरकों के आयात खर्च में भारी बढ़ोतरी हुई है, जिससे देश के भुगतान संतुलन और चालू खाते के घाटे पर गंभीर दबाव बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि आयात शुल्क बढ़ने से अल्पकाल में चालू खाते के घाटे और रुपये पर दबाव कम हो सकता है, लेकिन घरेलू बाजार में सोना और चांदी और महंगे हो सकते हैं तथा तस्करी का खतरा फिर बढ़ सकता है।</div><div><br></div><div>हम आपको याद दिला दें कि सरकार ने इससे पहले भी सोना और चांदी के आयात पर तीन प्रतिशत एकीकृत वस्तु एवं सेवा कर लगाया था, जिसके बाद बैंकों ने एक महीने से अधिक समय तक आयात रोक दिया था। परिणामस्वरूप अप्रैल महीने में सोने का आयात लगभग तीस वर्षों के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया। बाद में बैंक कर भुगतान के बाद आयात फिर शुरू कर पाए, लेकिन अब नई शुल्क बढ़ोतरी के बाद व्यापारियों का मानना है कि आयात में फिर भारी गिरावट आ सकती है।</div><div><br></div><div>इसलिए उद्योग जगत ने सरकार के इस कदम पर चिंता जताई है। अखिल भारतीय रत्न एवं आभूषण परिषद के अध्यक्ष राजेश रोकडे ने कहा कि बढ़े हुए शुल्क और प्रधानमंत्री की मितव्ययिता अपील के कारण कारोबार कठिन दौर में पहुंच सकता है। उनका कहना है कि इससे अवैध बाजार और तस्करी को बढ़ावा मिल सकता है, जिससे समानांतर अर्थव्यवस्था खड़ी होने का खतरा है। परिषद के अनुसार अब सीमा शुल्क, वस्तु एवं सेवा कर तथा कृषि उपकर को मिलाकर सोना प्रति दस ग्राम लगभग सत्ताईस हजार रुपये तक महंगा हो सकता है, जबकि पहले यह बढ़ोतरी लगभग तेरह हजार पांच सौ रुपये थी। इस मुद्दे पर आगे की रणनीति तय करने के लिए उद्योग संगठनों की बैठक मुंबई में बुलाई गई है।</div><div><br></div><div>सेंको गोल्ड एंड डायमंड्स के प्रबंध निदेशक सुवंकर सेन का कहना है कि जब तक पश्चिम एशिया संकट और ऊंची तेल कीमतों की स्थिति बनी रहेगी, तब तक आयात शुल्क ऊंचे स्तर पर रह सकते हैं। उनके अनुसार इस कदम से सोने की मांग में दस से पंद्रह प्रतिशत तक कमी आ सकती है और उपभोक्ता हल्के वजन के आभूषणों की ओर रुख कर सकते हैं।</div><div><br></div><div>वहीं सरकार का तर्क है कि सीमा शुल्क में यह बढ़ोतरी उपभोक्ता विरोधी नहीं बल्कि संतुलित और सावधानीपूर्वक उठाया गया कदम है, जिसका उद्देश्य गैर जरूरी आयातों को नियंत्रित करना और देश की व्यापक आर्थिक स्थिरता को सुरक्षित रखना है। सूत्रों के अनुसार अतीत में भी वैश्विक अस्थिरता के समय सीमा शुल्क का उपयोग आर्थिक संतुलन बनाए रखने के साधन के रूप में किया जाता रहा है। वर्ष 2024-25 के केंद्रीय बजट में जब बाहरी आर्थिक स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत थी, तब सरकार ने सोना और चांदी पर शुल्क पंद्रह प्रतिशत से घटाकर छह प्रतिशत तथा प्लैटिनम पर शुल्क पंद्रह दशमलव चार प्रतिशत से घटाकर छह दशमलव चार प्रतिशत कर दिया था।</div><div><br></div><div>हम आपको यह भी बता दें कि पहले के दौर में भी स्वर्ण नियंत्रण संबंधी कठोर नियम लागू किए गए थे। तत्कालीन वित्त मंत्री मोरारजी देसाई ने 1962 में स्वर्ण नियंत्रण उपाय लागू किए थे, जिनके तहत सोने पर अग्रिम कारोबार पर रोक लगाई गई और बैंकों द्वारा दिए गए स्वर्ण ऋण वापस लिए गए। बाद में 1963 में चौदह कैरेट से अधिक शुद्धता वाले आभूषणों के निर्माण पर रोक लगा दी गई और 1968 में कडा स्वर्ण नियंत्रण कानून लागू किया गया था।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 13 May 2026 13:56:46 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/gold-and-silver-prices-rise-sharply-jewelers-say-they-will-be-ruined</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[योगी सरकार का कैबिनेट विस्तार, भाजपा नेतृत्व की मंशानुरूप करेगा 2027 के विधानसभा चुनावों में भाजपा की नैय्या पार?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-yogi-government-cabinet-expansion]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>राजनीतिक गुणा-भाग व विधानसभा चुनावों के चलते उत्तर प्रदेश की राजनीति में लंबे समय से लंबित चले आ रहे यूपी कैबिनेट के विस्तार पर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की आखिरकार मौहर लग ही गई‌। जिसके बाद से उत्तर प्रदेश में राजनीतिक सरगर्मी बहुत तेज़ हो गयी थी। शनिवार शाम 9 मई को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल से मुलाकात के बाद से ही कैबिनेट विस्तार में शामिल होने वाले चहरों के वारे में राजनीतिक गलियारों में तरह-तरह के कयास लगाये जा रहे थे। वहीं लखनऊ स्थित जन भवन में होने वाले इस शपथ ग्रहण समारोह के लिए भी शासन-प्रशासन के द्वारा सभी तैयारियां पूरी कर ली गई थी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने रविवार 10 मई 2026 की दोपहर 3.30 बजे अपने मंत्रिमंडल का विस्तार करते हुए 6 नये चहरों भूपेंद्र चौधरी व मनोज पांडेय को कैबिनेट मंत्री, कृष्णा पासवान, कैलाश राजपूत, सुरेन्द्र दिलेर व ⁠हंसराज विश्वकर्मा को राज्य मंत्री बनाया, वहीं अजीत पाल और सोमेंद्र तोमर का कद बढ़ाते हुए उन्हें राज्य मंत्री की जगह राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार बनाया गया।</div><div><br></div><div>हालांकि यूपी कैबिनेट विस्तार में कई पुराने चेहरों को हटाकर के कुछ नये चहरों को शामिल करने की देश व प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में जबरदस्त चर्चा चल रही थी, राजनेताओं व राजनीतिक विश्लेषकों की यूपी कैबिनेट विस्तार कि लिस्ट पर निगाहें टिकी हुई थी, लेकिन जब लिस्ट सामने आई तो किसी भी पुराने चेहरों को मंत्रीमंडल से हटाएं बिना ही 6 नये चहरों को मंत्रीमंडल में शामिल किया गया और दो राज्य मंत्रियों का प्रमोशन करते हुए उन्हें राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार बना दिया गया। हालांकि सूत्रों के अनुसार इस यूपी कैबिनेट विस्तार में कुछ चर्चित चेहरों के नाम अंतिम समय में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के राजनीतिक गुणा-भाग की कसौटी पर खरा उतरने में विफल रहे, जिसके चलते अंतिम समय में उनके नाम कैबिनेट विस्तार की राज्यपाल के पास जाने वाली लिस्ट में बाहर हो गये।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/major-pilgrimage-sites-are-falling-victim-to-discriminatory-development" target="_blank">विकास में भेदभाव का शिकार हो रहे हैं प्रमुख तीर्थस्थल</a></h3><div>इस कैबिनेट विस्तार में शामिल राजनेताओं के प्रोफाइल पर संक्षिप्त नज़र डालें तो कैबिनेट मंत्री भूपेंद्र चौधरी वर्ष 2017-2022 वाली योगी सरकार में भी पंचायती राज मंत्री रह चुके हैं और वह भाजपा के निवर्तमान पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भी हैं। वह राजनीति के एक मंझे हुए खिलाड़ी और बड़े जाट नेता के रूप में स्थापित माने जाते हैं। वहीं तेजतर्रार, व्यवहार कुशल, दबंग विधायक मनोज पांडेय ब्राह्मण समाज से आते हैं, वह रायबरेली के ऊंचाहार से विधायक हैं, वह सपा की अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सरकार में कैबिनेट मंत्री रह चुके हैं। उन्होंने राज्यसभा के चुनावों में खुलकर के भाजपा प्रत्याशी का साथ दिया था, जिसके बाद उन्हें सपा से निष्कासित कर दिया गया था, जिसके बाद उन्हें योगी आदित्यनाथ सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाकर के ईनाम दिया गया है। उनकी ताजपोशी से भाजपा के नेतृत्व स्पष्ट संदेश दे दिया है कि भाजपा सहयोग करने वालों का हमेशा ध्यान रखती है।</div><div><br></div><div>मेरठ दक्षिण विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के विधायक डॉक्टर सोमेंद्र तोमर गूर्जर समाज से आते हैं, डॉक्टर तोमर सरल स्वभाव के शानदार राजनेता हैं, फिलहाल वह योगी सरकार में राज्य मंत्री ऊर्जा एवं अतिरिक्त ऊर्जा स्रोत का कार्यभार देख रहे हैं, कैबिनेट विस्तार में उन्हें राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार के रूप में शपथ दिलाई गई है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव निरंतर गूर्जर वोटरों को अपने पक्ष में करने के लिए प्रयास कर रहे हैं, डॉक्टर तोमर के प्रमोशन को गूर्जर वोटरों को साधने की भाजपा नेतृत्व की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।</div><div><br></div><div>वहीं कानपुर देहात के सिकंदरा से भाजपा के विधायक अजीत पाल फिलहाल योगी सरकार में राज्य मंत्री विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी विभाग का कार्य देख रहे हैं। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने उनका प्रमोशन करते हुए उन्हें राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार के पद की शपथ दिलाई है।</div><div><br></div><div>वहीं कैबिनेट विस्तार में शामिल राज्य मंत्रियों की बात करें तो कन्नौज के तिर्वा से विधायक विधायक कैलाश सिंह राजपूत, वाराणसी में भाजपा के जिलाध्यक्ष और विधान परिषद सदस्य हंसराज विश्वकर्मा, अलीगढ़ के खैर से भाजपा के विधायक सुरेंद्र दिलेर, फतेहपुर के खागा से भाजपा की विधायक कृष्णा पासवान ने पहली बार राज्यमंत्री के रूप में पद व गोपनीयता की शपथ ली है। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को योगी सरकार के इस कैबिनेट विस्तार से बहुत उम्मीदें हैं।</div><div><br></div><div>हालांकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा के कोर वोटर माने जाने वाले त्यागी समाज के हाथ इस बार के कैबिनेट विस्तार में भी खाली ही रहे, जबकि त्यागी समाज के एक मात्र विधायक अजीत पाल त्यागी व विधान परिषद सदस्य अश्विनी त्यागी दोनों में से कम से कम एक का नाम कैबिनेट विस्तार की इस लिस्ट में शामिल होने की उम्मीद की जा रही थी।</div><div><br></div><div>राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो योगी आदित्यनाथ सरकार के कैबिनेट विस्तार का लक्ष्य वर्ष 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए राजनीतिक, सामाजिक, जाति और क्षेत्रीय समीकरण साधते हुए योगी सरकार के पक्ष में जबरदस्त उत्साहपूर्ण माहौल बनाने का है। वहीं भाजपा का शीर्ष नेतृत्व सपा प्रमुख अखिलेश यादव के पीडीए फार्मूला तोड़ करते हुए योगी सरकार के पक्ष में ब्राह्मण, ओबीसी, दलित व अन्य सभी सनातनियों को एकजुट करना है। हालांकि यह तो आने वाला समय ही बताएगा की भाजपा का शीर्ष नेतृत्व इसमें राजनीतिक गुणा-भाग में कितना सफल होगा, लेकिन जनता की अदालत में बार-बार के चुनाव परिणामों से यह स्पष्ट है कि मोदी, शाह व योगी की लोकप्रियता व चाणक्य नीति की काट का अभी देश में विपक्षी दलों के पास कोई विकल्प नहीं है।</div><div><br></div><div>- दीपक कुमार त्यागी</div><div>अधिवक्ता, स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 13 May 2026 13:10:59 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-yogi-government-cabinet-expansion</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Gold नहीं खरीदने की मोदी की अपील के बाद ज्वैलर्स लाये नई योजना, पुराने सोने के बदले नये गहने खरीदने पर आकर्षक स्कीमें]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/jewellers-launch-new-scheme-attractive-schemes-for-buying-new-jewellery-in-exchange-of-old-gold]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम एशिया युद्ध के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर बढ़ते दबाव और विदेशी मुद्रा भंडार पर असर को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से देशवासियों से एक वर्ष तक सोने की खरीद टालने की अपील के बाद अब इस मुद्दे पर बहस तेज हो गई है। जहां सरकार विदेशी मुद्रा के बहिर्गमन को नियंत्रित करना चाहती है, वहीं देश का आभूषण उद्योग इस सुझाव को लेकर चिंता जता रहा है। उद्योग संगठनों का कहना है कि मांग को दबाने की बजाय देश में पहले से मौजूद निष्क्रिय सोने को आर्थिक व्यवस्था में शामिल करने पर जोर दिया जाना चाहिए।</div><div><br></div><div>अखिल भारतीय ज्वैलर्स एंड गोल्डस्मिथ फेडरेशन ने सरकार से सोना खरीद टालने की अपील के स्थान पर घरेलू सोना संग्रहण और पुनर्चक्रण व्यवस्था को मजबूत करने की मांग की है। संगठन ने वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल को पत्र लिखकर कहा है कि विदेशी मुद्रा भंडार और बढ़ते आयात बिल को लेकर सरकार की चिंता उचित है, लेकिन व्यापक स्तर पर लोगों को सोना खरीदने से हतोत्साहित करने का असर पूरे आभूषण उद्योग पर पड़ सकता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/why-is-modi-forbidding-people-from-buying-gold-will-work-from-home-be-allowed-again" target="_blank">सोना खरीदने से क्यों मना कर रहे हैं मोदी? क्या फिर से होने वाला है Work From Home? पेट्रोल-डीजल के दाम कबसे बढ़ेंगे?</a></h3><div>फेडरेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष पंकज अरोरा ने कहा कि समाधान मांग को खत्म करना नहीं, बल्कि देश में मौजूद निष्क्रिय सोने को व्यवस्थित तरीके से आर्थिक उपयोग में लाना है। उनके अनुसार घरेलू सोना संग्रहण, पुनर्चक्रण और उत्पादक उपयोग के जरिये विदेशी मुद्रा की बचत की जा सकती है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि उपभोक्ताओं की सोच अचानक नकारात्मक हुई तो दुकानों पर ग्राहकों की संख्या घटेगी, निर्माण आदेश कम होंगे और छोटे ज्वैलर्स तथा कारीगरों की आय पर गंभीर असर पड़ेगा।</div><div><br></div><div>फेडरेशन का कहना है कि यह केवल व्यापार का मामला नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका से जुड़ा मुद्दा है। हम आपको बता दें कि भारत में लगभग साढ़े तीन करोड़ लोग प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आभूषण उद्योग से जुड़े हुए हैं। देश के ग्रामीण और शहरी परिवारों में सोना केवल विलासिता की वस्तु नहीं माना जाता, बल्कि यह बचत, सामाजिक सुरक्षा और विवाह परंपराओं का महत्वपूर्ण हिस्सा है। कई परिवारों के लिए आभूषण पहनने योग्य बचत के रूप में काम करते हैं।</div><div><br></div><div>इसी कारण फेडरेशन ने सरकार को कई वैकल्पिक सुझाव दिए हैं। संगठन ने गिफ्ट आईएफएससी या इंडिया इंटरनेशनल बुलियन एक्सचेंज व्यवस्था के भीतर एक समर्पित बुलियन बैंक स्थापित करने की मांग की है। यह संस्था घरेलू सोने के संग्रहण, शुद्धिकरण, उधार व्यवस्था और निपटान का केंद्रीय मंच बन सकती है। इसके अलावा गोल्ड ईटीएफ को अपने भौतिक सोना भंडार का बीस से तीस प्रतिशत तक नियामित ढांचे के तहत उधार देने की अनुमति देने का भी सुझाव दिया गया है।</div><div><br></div><div>फेडरेशन ने वर्ष 2015 में शुरू की गई स्वर्ण मुद्रीकरण योजना की समीक्षा की भी मांग की है। संगठन का कहना है कि संरचनात्मक कमजोरियों के कारण यह योजना अपेक्षित स्तर तक सफल नहीं हो सकी। इसके साथ ही डीमैट स्वरूप वाले बुलियन जमा प्रमाणपत्र, सोना हस्तांतरण पर कर और जीएसटी तटस्थता तथा राष्ट्रीय स्तर पर सोना संग्रहण और आयात प्रतिस्थापन की निगरानी के लिए डैशबोर्ड बनाने का सुझाव भी दिया गया है।</div><div><br></div><div>विशेषज्ञों का मानना है कि भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां निजी हाथों में सबसे अधिक सोना मौजूद है। यदि इस सोने को औपचारिक आर्थिक ढांचे में शामिल किया जाए तो हर वर्ष दो सौ से तीन सौ टन तक सोना आयात की जरूरत कम की जा सकती है। इससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी और रोजगार पर नकारात्मक असर भी नहीं पड़ेगा।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो भारत में सोने के आयात में लगातार बढ़ोतरी ने सरकार की चिंता और बढ़ा दी है। आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2025-26 में देश का सोना आयात चौबीस प्रतिशत से अधिक बढ़कर रिकॉर्ड इकहत्तर अरब अट्ठानवे करोड़ डॉलर पर पहुंच गया, जबकि इससे पिछले वर्ष यह अट्ठावन अरब डॉलर था। हालांकि मात्रा के हिसाब से आयात घटकर सात सौ इक्कीस टन रह गया, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों में तेज उछाल के कारण आयात बिल तेजी से बढ़ा। भारत चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोना उपभोक्ता है और वैश्विक अनिश्चितता के दौर में लोग सोने को सुरक्षित निवेश मानते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि सोने के बढ़ते आयात से व्यापार घाटा और चालू खाते के घाटे पर दबाव बढ़ रहा है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार पर भी असर पड़ता है।</div><div><br></div><div>इस बीच, मोदी सरकार ने सोने के आयात को नियंत्रित करने के लिए कई कदम उठाए हैं। वर्ष 2022 में आयात शुल्क बढ़ाकर पंद्रह प्रतिशत किया गया था, हालांकि बाद में आभूषण उद्योग को राहत देने और तस्करी रोकने के उद्देश्य से इसे घटाकर छह प्रतिशत कर दिया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि मुक्त व्यापार समझौतों के कारण संयुक्त अरब अमीरात से सोने का आयात तेजी से बढ़ा है। आर्थिक शोध संस्था जीटीआरआई ने चेतावनी दी है कि दुबई के रास्ते तीसरे देशों का सोना कम शुल्क का लाभ लेकर भारत पहुंच रहा है, जिससे व्यापार संतुलन प्रभावित हो सकता है। संस्था ने सरकार से व्यापार समझौतों की समीक्षा, सख्त नियम लागू करने तथा भविष्य के समझौतों में सोना, चांदी और प्लेटिनम जैसे उत्पादों को विशेष रियायतों से बाहर रखने की सिफारिश की है।</div><div><br></div><div>उधर, प्रधानमंत्री की अपील के बाद अब सोना विनिमय योजनाएं भी चर्चा में आ गई हैं। लंबे समय से आभूषण दुकानों में पुराना सोना बदलकर नया आभूषण लेने की सुविधा उपलब्ध है, लेकिन ताजा खरीद की तुलना में यह व्यवस्था अपेक्षाकृत कम लोकप्रिय रही है। अब इसे एक वैकल्पिक उपाय के रूप में देखा जा रहा है।</div><div><br></div><div>कई प्रमुख ज्वैलरी कंपनियां ग्राहकों को पुराना सोना बदलकर नया आभूषण लेने की सुविधा देती हैं। इस प्रक्रिया में पुराने आभूषण, टूटे हुए गहने, अनुपयोगी सोने की वस्तुएं और सोने के सिक्के तक स्वीकार किए जाते हैं। सबसे पहले प्रमाणित विधियों से सोने की शुद्धता जांची जाती है। इसके बाद उस दिन के बाजार भाव के अनुसार मूल्य तय किया जाता है और ग्राहक उसी राशि के आधार पर नया आभूषण खरीद सकता है। हालांकि ग्राहक को नए आभूषण पर मेकिंग चार्ज, जीएसटी तथा पत्थर या अशुद्धि होने पर कटौती का भुगतान करना पड़ता है।</div><div><br></div><div>उदाहरण के तौर पर यदि किसी ग्राहक के पास बीस ग्राम का बाइस कैरेट पुराना आभूषण है और उस दिन सोने का भाव तेरह हजार नौ सौ पैंतालीस रुपये प्रति ग्राम है, तो उसके सोने का अनुमानित मूल्य लगभग दो लाख अठहत्तर हजार नौ सौ रुपये होगा। इस राशि का उपयोग नया आभूषण खरीदने में किया जा सकता है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, सरकार और उद्योग के बीच अब इस बात पर सहमति बनाने की जरूरत महसूस की जा रही है कि विदेशी मुद्रा बचत और रोजगार सुरक्षा दोनों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। उद्योग संगठनों का मानना है कि यदि घरेलू सोने को व्यवस्थित रूप से आर्थिक प्रवाह में लाया जाए तो देश को आयात पर निर्भरता घटाने के साथ रोजगार और कारोबार दोनों को सुरक्षित रखने में मदद मिल सकती है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 12 May 2026 13:05:38 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/jewellers-launch-new-scheme-attractive-schemes-for-buying-new-jewellery-in-exchange-of-old-gold</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[रोगियों की मुस्कान और उम्मीद का दूसरा नाम हैं नर्सें]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/nurses-are-the-other-name-for-patients-smiles-and-hope]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हर वर्ष 12 मई को पूरी दुनिया अंतर्राष्ट्रीय नर्स दिवस मनाती है। यह दिन आधुनिक नर्सिंग सेवा की जननी मानी जाने वाली फ्लोरेंस नाइटिंगेल की जयंती के रूप में मनाया जाता है। यह दिवस उन अनगिनत संवेदनशील हाथों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है, जो दिन-रात रोगियों के दर्द को कम करने, उन्हें जीवन का भरोसा देने और मृत्यु से संघर्ष कर रहे व्यक्ति के भीतर आशा का दीप जलाने का कार्य करते हैं। दुनिया में नर्सों की सेवा सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, हर दिन, नर्सें शांत शक्ति, स्थिर हाथों और करुणा से भरे दिलों के साथ अस्पतालों, क्लीनिकों और विभिन्न सामुदायिक स्थानों पर कदम रखते हुए रोगियों के लिये देवदूत बनती हैं। नर्से भगवान का रूप होती है, वे ही इंसान के जन्म की पहली साक्षी बनती है और उनमें करुणा का बीज बोती है। एक रोगी को स्वस्थ करने में वे अपना सब कुछ दे देती हैं। रोगी की सेवा करते हुए वे अपना पारिवारिक सुख, करियर, जीवन और वर्तमान सबकुछ झोंक देती है। वर्ष 2026 की थीम “हमारी नर्सें, हमारा भविष्य- सशक्त नर्सें जीवन बचाती हैं” पूरी दुनिया को यह संदेश देती है कि यदि स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत बनाना है तो नर्सों को सम्मान, सुरक्षा, संसाधन और सशक्त वातावरण देना होगा। यह दिवस 1965 से इंटरनेशनल काउंसिल ऑफ नर्सेज द्वारा शुरु हुआ है, बहुत से लोग इस दिन का उपयोग अपने देश एवं दुनिया में नर्सों द्वारा किए गए अद्भुत सेवा कार्यों का सम्मान करने के लिए करते हैं।</div><div><br></div><div>सचमुच नर्सें अस्पतालों की आत्मा होती हैं। चिकित्सक जहां रोग की पहचान और उपचार का मार्ग तय करता है, वहीं नर्स अपने स्पर्श, सेवा, सहानुभूति और निरंतर देखभाल से रोगी को जीने की शक्ति देती है। रोगी जब दर्द, भय, चिंता और असहायता से घिरा होता है, तब नर्स ही उसके चेहरे पर विश्वास की मुस्कान बनकर सामने आती है। वह केवल इंजेक्शन लगाने, दवाइयां देने या रिपोर्ट संभालने तक सीमित नहीं होती, बल्कि वह रोगी के मनोबल की संरक्षक होती है। वह अपने व्यवहार, शब्दों और संवेदनाओं से रोगी को यह विश्वास दिलाती है कि वह अकेला नहीं है। यही कारण है कि दुनिया भर में नर्सों को “धरती के फरिश्ते” कहा जाता है। मानवीय सेवा का सबसे जीवंत और प्रभावशाली स्वरूप यदि कहीं दिखाई देता है तो वह नर्सिंग सेवा में दिखाई देता है। एक नर्स रोगी की पीड़ा को केवल देखती नहीं, बल्कि उसे महसूस भी करती है। वह रात-रात भर जागकर मरीजों की देखभाल करती है, उनके दर्द की भाषा समझती है, उनकी छोटी-छोटी जरूरतों का ध्यान रखती है और कई बार अपने परिवार, अपने स्वास्थ्य और अपनी खुशियों की कीमत पर भी रोगियों की सेवा करती है। कोविड-19 जैसी वैश्विक महामारी के समय पूरी दुनिया ने देखा कि जब लोग अपने ही परिजनों से दूरी बना रहे थे, तब नर्सें संक्रमित मरीजों के सबसे निकट खड़ी थीं। उन्होंने मृत्यु के भय को पीछे छोड़कर जीवन की रक्षा का संकल्प निभाया। उस दौर ने यह सिद्ध कर दिया कि नर्सें केवल स्वास्थ्यकर्मी नहीं, बल्कि मानवता की सबसे मजबूत प्रहरी हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/trending/a-salute-to-nurses-an-exemplary-symbol-of-service-and-dedication" target="_blank">International Nurses Day 2026: सेवा और समर्पण की मिसाल Nurses को सलाम, Florence Nightingale ने दिखाई थी सम्मान की राह</a></h3><div>नर्सिंग सेवा केवल पेशा नहीं, बल्कि करुणा, धैर्य और त्याग की साधना है। एक नर्स उस समय भी मुस्कुराती रहती है जब वह स्वयं मानसिक और शारीरिक थकान से गुजर रही होती है। वह रोगियों के बीच आशा का वातावरण बनाती है। कई बार ऐसे मरीज, जो मानसिक रूप से टूट चुके होते हैं, नर्सों की आत्मीयता और प्रेरणा से पुनः जीवन के प्रति सकारात्मक हो जाते हैं। चिकित्सा विज्ञान में दवाइयों की अपनी भूमिका है, लेकिन संवेदनशील देखभाल और मानसिक संबल रोगी के उपचार को अधिक प्रभावी बनाते हैं। यही कारण है कि कहा जाता है कि “नर्स का स्पर्श भी एक औषधि है।” आज जब दुनिया आधुनिक तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में प्रवेश कर चुकी है, तब भी नर्सिंग सेवा की आवश्यकता और महत्ता कम नहीं हुई, बल्कि और अधिक बढ़ी है। मशीनें रोग का परीक्षण कर सकती हैं, लेकिन वे रोगी की आंखों में छिपे भय को नहीं पढ़ सकतीं। तकनीक इलाज का माध्यम बन सकती है, लेकिन वह करुणा का विकल्प नहीं बन सकती। नर्सों की सबसे बड़ी शक्ति उनकी संवेदनशीलता है, जो उन्हें अन्य सभी स्वास्थ्य सेवाओं से अलग पहचान देती है। इसी कारण आज भी नर्सिंग दुनिया का सबसे अधिक अपेक्षित और सम्मानित स्वास्थ्य पेशा माना जाता है।</div><div><br></div><div>विश्व स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने आज सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक प्रशिक्षित नर्सों की कमी है। विकसित देशों में बेहतर वेतन और सुविधाओं के कारण विकासशील देशों की अनेक प्रतिभाशाली नर्सें विदेशों की ओर आकर्षित हो रही हैं। परिणामस्वरूप गरीब और विकासशील देशों की स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित हो रही हैं। विश्व स्तर पर नर्सों की बढ़ती आवश्यकता यह संकेत देती है कि आने वाले समय में स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता नर्सों की उपलब्धता और दक्षता पर ही निर्भर करेगी। इसलिए यह समय नर्सों को केवल “सेवक” के रूप में देखने का नहीं, बल्कि उन्हें स्वास्थ्य व्यवस्था के निर्णायक स्तंभ के रूप में स्वीकार करने का है। भारत जैसे विशाल देश में नर्सिंग सेवा को अधिक सशक्त, सम्मानजनक और सुरक्षित बनाने की अत्यंत आवश्यकता है। नर्सों के लिए बेहतर वेतनमान, सुरक्षित कार्य-परिस्थितियां, पर्याप्त अवकाश, मानसिक स्वास्थ्य सहयोग, कौशल विकास और नेतृत्व के अवसर सुनिश्चित किये जाने चाहिए। निजी और सरकारी अस्पतालों को मिलकर ऐसा वातावरण बनाना होगा जहां नर्सें सम्मान और आत्मविश्वास के साथ कार्य कर सकें। यदि नर्सें स्वयं तनाव, असुरक्षा और उपेक्षा से घिरी रहेंगी, तो स्वास्थ्य सेवाओं की मानवीय गुणवत्ता प्रभावित होगी। इसलिए नर्सों का कल्याण केवल उनका व्यक्तिगत प्रश्न नहीं, बल्कि पूरी मानवता के स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ विषय है।</div><div><br></div><div>अंतर्राष्ट्रीय नर्स दिवस की 2026 की थीम भी इसी सोच को आगे बढ़ाती है कि “सशक्त नर्सें जीवन बचाती हैं।” जब नर्सों को प्रशिक्षण, संसाधन, निर्णय लेने का अधिकार और सामाजिक सम्मान मिलेगा, तभी वे अपनी पूरी क्षमता के साथ समाज को स्वस्थ बना सकेंगी। यह दिवस हमें केवल नर्सों का सम्मान करने की प्रेरणा नहीं देता, बल्कि यह भी याद दिलाता है कि नर्सों के बिना कोई भी स्वास्थ्य व्यवस्था पूर्ण नहीं हो सकती। अस्पतालों की वास्तविक धड़कन नर्सें ही हैं। रोगियों की आंखों में लौटती चमक, परिवारों के चेहरे पर आती राहत और स्वस्थ जीवन की ओर लौटते कदमों में नर्सों की निःस्वार्थ सेवा का मौन योगदान छिपा होता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि समाज नर्सों को केवल एक कर्मचारी के रूप में न देखे, बल्कि उन्हें मानवता के संवेदनशील रक्षकों के रूप में पहचाने। बच्चों के जन्म से लेकर जीवन की अंतिम सांस तक नर्सें हर महत्वपूर्ण क्षण में हमारे साथ खड़ी रहती हैं। वे दर्द को कम करती हैं, टूटे मन को संभालती हैं और निराशा में उम्मीद का प्रकाश जगाती हैं। सच तो यह है कि नर्सें केवल शरीर का उपचार नहीं करतीं, वे मनुष्य के भीतर जीने की इच्छा को भी जीवित रखती हैं।</div><div><br></div><div>आम दिन हो या महामारियों के खिलाफ जंग, ये नर्स बिना किसी डर के सहजता और उत्साह से अपने कर्तव्य का पालन करती है। इसलिए नहीं कि यह उनका काम है और उसके लिए उन्हें पैसे मिलते हैं बल्कि इसलिए कि वह सबसे पहले दूसरों के स्वस्थ होने और उनकी जान की फिक्र करती हैं। स्वास्थ्य के क्षेत्र में मां के स्वरूप में स्नेहपूर्ण और फिक्र के साथ हर किसी की देखभाल और परवाह करने के शब्द को ही नर्स कहा जाता है। वे अस्पताल की रीड होती है। ऐसी मानवीय सेवा की अद्भुत फरिश्तों के कल्याण एवं प्रोत्साहन का चिन्तन अपेक्षित है। उससे निश्चित ही नर्सों की सेवाएं अधिक सक्षम, प्रभावी एवं मानवीय होकर सामने आयेगी। इस अंतर्राष्ट्रीय नर्स दिवस पर यही संकल्प अपेक्षित है कि हम नर्सों की सेवाओं को अधिक सम्मान, सुरक्षा और सहयोग प्रदान करें। उनके कल्याण, प्रोत्साहन और सशक्तिकरण का व्यापक चिंतन हो। जब नर्सों का जीवन अधिक सुरक्षित, संतुलित और सम्मानपूर्ण होगा, तब उनकी सेवाएं और अधिक प्रभावी, संवेदनशील और मानवीय बन सकेंगी। यही इस दिवस का वास्तविक उद्देश्य और मानवता के प्रति हमारी सच्ची संवेदनशीलता होगी।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 12 May 2026 12:25:37 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/nurses-are-the-other-name-for-patients-smiles-and-hope</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[सोना खरीदने से क्यों मना कर रहे हैं मोदी? क्या फिर से होने वाला है Work From Home? पेट्रोल-डीजल के दाम कबसे बढ़ेंगे?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/why-is-modi-forbidding-people-from-buying-gold-will-work-from-home-be-allowed-again]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम एशिया में जारी अमेरिका ईरान तनाव का असर अब भारत की अर्थव्यवस्था और आम लोगों की जिंदगी पर साफ दिखाई देने लगा है। कच्चे तेल की कीमतों में लगातार हो रही तेजी, रुपये पर बढ़ता दबाव और विदेशी मुद्रा भंडार को लेकर गहराती चिंता के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से बचत करने की अपील की है। हैदराबाद में एक जनसभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने लोगों से एक वर्ष तक सोना खरीदने से बचने, विदेश यात्राएं टालने और जहां संभव हो वहां घर से काम करने जैसे उपाय अपनाने का आग्रह किया।</div><div><br></div><div>प्रधानमंत्री ने कहा कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण वैश्विक आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित हुई है और होरमुज जलडमरूमध्य में बाधा आने से तेल की आपूर्ति को लेकर गंभीर संकट पैदा हो गया है। हम आपको बता दें कि यह समुद्री मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में गिना जाता है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के शांति प्रस्ताव को ठुकराए जाने के बाद कच्चे तेल की कीमतें एक सौ पांच डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गईं, जिससे पूरी दुनिया में महंगाई और ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/jairam-ramesh-big-claim-after-pm-modi-7-appeals-shock-of-inflation-fuel-prices-will-increase" target="_blank">Jairam Ramesh का बड़ा दावा: PM Modi की 7 अपीलों के बाद लगेगा महंगाई का झटका, बढ़ेंगे Fuel Price</a></h3><div>भारत अपनी जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में तेजी का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। रुपये में कमजोरी आई है और आयात बिल लगातार बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री ने कहा कि कोरोना काल के दौरान देश ने घर से काम, वर्चुअल बैठकों और वीडियो संवाद जैसी व्यवस्थाओं को अपनाया था। अब समय आ गया है कि इन तरीकों को फिर से व्यापक रूप से अपनाया जाए ताकि ईंधन की खपत कम हो और विदेशी मुद्रा की बचत हो सके।</div><div><br></div><div>उन्होंने लोगों से मेट्रो रेल का अधिक उपयोग करने, कार पूल जैसी शेयरिंग व्यवस्था अपनाने और बिजली से चलने वाले वाहनों को प्राथमिकता देने की अपील की। साथ ही माल परिवहन को सड़कों की बजाय रेलमार्ग की ओर ले जाने की बात भी कही ताकि डीजल पर निर्भरता घटाई जा सके। हम आपको बता दें कि पश्चिम एशिया संकट के बाद भारत का ईंधन आयात खर्च तेजी से बढ़ा है और यदि होरमुज जलडमरूमध्य में बाधा लंबे समय तक बनी रही तो तेल की ऊंची कीमतें कई महीनों तक बनी रह सकती हैं।</div><div><br></div><div>प्रधानमंत्री की सबसे अधिक चर्चा में रही अपील सोने की खरीद को लेकर थी। उन्होंने कहा कि देशहित में नागरिकों को कम से कम एक वर्ष तक सोना खरीदने से बचना चाहिए। हम आपको बता दें कि भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना आयातकों में शामिल है और विवाह तथा त्योहारों के मौसम में इसकी मांग बहुत बढ़ जाती है। चूंकि सोना मुख्य रूप से विदेशों से आयात किया जाता है, इसलिए इसकी अधिक खरीद से डॉलर बाहर भेजना पड़ता है और भारत के घरेलू विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ता है।</div><div><br></div><div>अर्थशास्त्रियों के अनुसार भारत के लिए कच्चे तेल और सोने में एक समानता है। दोनों का बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदा जाता है और भुगतान अमेरिकी डॉलर में किया जाता है। जब तेल महंगा होता है और साथ ही सोने की मांग भी बढ़ जाती है, तब देश को आयात के लिए अधिक डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इससे चालू खाते का घाटा बढ़ता है और रुपये पर दबाव आता है। यही कारण है कि आर्थिक संकट के समय सरकारें अक्सर सोने के आयात को नियंत्रित करने के उपाय करती रही हैं। अतीत में भी आयात शुल्क बढ़ाने, आयात पर रोक लगाने और वैकल्पिक योजनाओं को बढ़ावा देने जैसे कदम उठाए जा चुके हैं।</div><div><br></div><div>प्रधानमंत्री ने लोगों से अनावश्यक विदेश यात्राएं, विदेशी पर्यटन और विदेशों में आयोजित होने वाले विवाह समारोह भी एक वर्ष तक टालने का आग्रह किया। उनका कहना था कि मध्यम वर्ग में विदेश घूमने और विदेश में विवाह करने का चलन तेजी से बढ़ा है, लेकिन मौजूदा वैश्विक संकट के समय विदेशी मुद्रा बचाना राष्ट्रीय आवश्यकता बन गया है।</div><div><br></div><div>इस बीच, अमेरिका ईरान युद्ध का असर वैश्विक सोना बाजार पर भी दिखाई दे रहा है। आम तौर पर युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव के समय निवेशक सोने को सुरक्षित निवेश मानते हैं, जिससे इसकी कीमतें बढ़ती हैं। लेकिन इस बार स्थिति जटिल है क्योंकि तेल की कीमतों में उछाल से महंगाई और ब्याज दरों के लंबे समय तक ऊंचे बने रहने की आशंका बढ़ गई है। ऊंची ब्याज दरों के कारण निवेशक सोने की बजाय ब्याज देने वाले निवेश विकल्पों की ओर आकर्षित हो रहे हैं। इसी कारण युद्ध की अनिश्चितता के बावजूद अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों में उतार-चढ़ाव बना हुआ है।</div><div><br></div><div>हम आपको यह भी बता दें कि प्रधानमंत्री ने केवल ईंधन और सोने तक ही अपनी अपील सीमित नहीं रखी। उन्होंने खाद्य तेल की खपत घटाने, रासायनिक उर्वरकों के उपयोग को कम करने और प्राकृतिक खेती तथा स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देने की भी बात कही। उनका कहना था कि किसी भी तरह विदेशी मुद्रा की बचत करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है और देश को आत्मनिर्भर बनाने में हर नागरिक की भूमिका महत्वपूर्ण है।</div><div><br></div><div>हालांकि विपक्ष ने प्रधानमंत्री की इस अपील पर सवाल भी उठाए हैं। कांग्रेस ने कहा है कि सरकार ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने में विफल रही है और अब आम लोगों पर बोझ डाल रही है। दूसरी ओर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने प्रधानमंत्री की अपील को दूरदर्शी कदम बताते हुए कहा कि इससे भारत ऊर्जा के क्षेत्र में अधिक सुरक्षित और आत्मनिर्भर बन सकेगा।</div><div><br></div><div>उधर, विशेषज्ञों का मानना है कि प्रधानमंत्री का संदेश केवल सोना या ईंधन बचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश को संभावित वैश्विक आर्थिक संकट के लिए तैयार करने का संकेत भी है। यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहीं और सोने का आयात भी बढ़ता रहा, तो महंगाई, आयात बिल और रुपये पर दबाव और अधिक बढ़ सकता है। ऐसे में सरकार नागरिकों से संयम, बचत और स्वदेशी सोच अपनाने की अपील कर रही है ताकि वैश्विक संकट के बीच भारत की आर्थिक स्थिरता बनी रहे।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 11 May 2026 13:05:25 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/why-is-modi-forbidding-people-from-buying-gold-will-work-from-home-be-allowed-again</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[बंगाल की हिंसा है लोकतंत्र पर धब्बा और बड़ी चुनौती]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-violence-in-bengal-is-a-blot-on-democracy-and-a-major-challenge]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम बंगाल में हाल ही में सम्पन्न विधानसभा चुनावों के बाद जिस प्रकार हिंसा, हत्याओं, आगजनी और राजनीतिक प्रतिशोध की घटनाएं सामने आई हैं, उन्होंने केवल राज्य की शांति को ही नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा को भी आहत किया है। चुनाव लोकतंत्र का उत्सव माना जाता है, किंतु जब यह उत्सव हिंसा, भय और प्रतिशोध में बदल जाए तो यह केवल राजनीतिक असफलता नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक पतन का संकेत बन जाता है। बंगाल की ताजा हिंसक घटनाएं इसी चिंता को सामने लाती हैं। चुनाव के दौरान छिटपुट घटनाओं को छोड़ दें तो मतदान अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण ढंग से सम्पन्न हुआ था। लेकिन परिणामों की घोषणा के बाद जिस प्रकार राजनीतिक दलों के समर्थक एक-दूसरे के खिलाफ आक्रामक हुए, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा अब वैचारिक संघर्ष न रहकर प्रतिशोध और वर्चस्व की लड़ाई बनती जा रही है। भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के बीच हिंसक झड़पें, कई लोगों की हत्याएं और विशेष रूप से सुवेंदु अधिकारी के करीबी चंद्रनाथ रथ की हत्या ने पूरे घटनाक्रम को और अधिक गंभीर बना दिया। आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हुआ, लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर लोकतंत्र में हिंसा की कोई जगह क्यों बची रहनी चाहिए?</div><div><br></div><div>यह विडंबना है कि भारत, जिसने विश्व को अहिंसा, करुणा और “वसुधैव कुटुम्बकम्” का मंत्र दिया, आज वही देश राजनीतिक हिंसा के कारण अपनी छवि धूमिल करता दिखाई देता है। महात्मा गांधी ने राजनीति को नैतिकता और सेवा से जोड़ा था, लेकिन आज राजनीति सत्ता, प्रतिशोध और भय का माध्यम बनती जा रही है। बंगाल की हिंसा इस बीमारी का एक भयावह उदाहरण है। पश्चिम बंगाल का राजनीतिक इतिहास हिंसा से अछूता नहीं रहा है। वामपंथी शासन के लंबे दौर से लेकर तृणमूल कांग्रेस के शासनकाल तक राजनीतिक संघर्ष कई बार रक्तरंजित रूप में सामने आया। बूथ कब्जाने, विरोधियों को डराने, स्थानीय दबंगों और अपराधी तत्वों का राजनीतिक संरक्षण-ये सब बंगाल की राजनीति की कटु वास्तविकताएं रही हैं। सत्ता बदलती रही, लेकिन राजनीतिक संस्कृति में अपेक्षित परिवर्तन नहीं आ सका। यही कारण है कि चुनाव परिणामों के बाद भी हिंसा का वातावरण बनता है और आम नागरिक भय तथा असुरक्षा के बीच जीने को मजबूर होता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/mother-first-demand-after-son-suvendu-adhikari-became-cm-provide-justice-to-rg-kar-victim" target="_blank">बेटे Suvendu Adhikari के CM बनने पर मां की पहली मांग- RG Kar पीड़िता को न्याय दिलाओ</a></h3><div>दरअसल जब राजनीति विचार और जनसेवा से हटकर केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम बन जाती है, तब हिंसा उसका स्वाभाविक परिणाम बनती है। हार को लोकतांत्रिक विनम्रता से स्वीकार करने के बजाय प्रतिशोध का माध्यम बना लेना लोकतांत्रिक मूल्यों का अपमान है। यही कारण है कि चुनाव आयोग के स्पष्ट निर्देशों और विजय जुलूसों पर प्रतिबंध के बावजूद हिंसक घटनाएं हुईं। यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों की नैतिक विफलता भी है। ममता बनर्जी द्वारा चुनाव परिणामों पर सवाल उठाना और राजनीतिक टकराव को तीखा बनाना हो या भाजपा द्वारा आक्रामक राजनीतिक प्रतिक्रिया-दोनों पक्षों को आत्ममंथन करने की आवश्यकता है। लोकतंत्र में विपक्ष और सत्ता दोनों की जिम्मेदारी होती है कि वे जनता को शांति और संयम का संदेश दें। दुर्भाग्य से हमारे राजनीतिक दल अक्सर कार्यकर्ताओं की भावनाओं को नियंत्रित करने के बजाय उन्हें उकसाने का काम करते हैं। परिणामस्वरूप हिंसा सामान्य राजनीतिक व्यवहार का हिस्सा बनती जा रही है।</div><div><br></div><div>सबसे अधिक पीड़ा इस बात की है कि राजनीतिक हिंसा की कीमत हमेशा आम जनता को चुकानी पड़ती है। जिन लोगों के घर जलते हैं, जिन परिवारों के सदस्य मारे जाते हैं, जिन छोटे व्यापारियों की दुकानें टूटती हैं, उनका राजनीति से कोई सीधा संबंध नहीं होता। वे केवल उस हिंसक मानसिकता के शिकार बनते हैं जो सत्ता को मानवता से ऊपर मानती है। यह प्रश्न गंभीरता से पूछा जाना चाहिए कि आखिर राजनीतिक दल हिंसा का सहारा क्यों लेते हैं? जबकि इतिहास गवाह है कि हिंसा कभी स्थायी समाधान नहीं देती। हिंसा केवल भय, अविश्वास और प्रतिशोध को जन्म देती है। जो दल हिंसा को हथियार बनाते हैं, वे अंततः जनता की नजरों में अपना नैतिक अधिकार खो देते हैं। राजनीति का उद्देश्य समाज को जोड़ना होना चाहिए, तोड़ना नहीं।</div><div><br></div><div>आज भारत एक नए वैश्विक दौर में प्रवेश कर रहा है। दुनिया भारत को एक उभरती आर्थिक शक्ति, तकनीकी महाशक्ति और लोकतांत्रिक मॉडल के रूप में देख रही है। वर्ष 2047 तक जब भारत अपनी स्वतंत्रता के सौ वर्ष पूरे करेगा, तब हमारा लक्ष्य केवल आर्थिक विकास नहीं होना चाहिए, बल्कि एक ऐसे सभ्य और नैतिक राष्ट्र का निर्माण भी होना चाहिए जहां राजनीति का आधार अहिंसा, संवाद और संवेदनशीलता हो। यदि राजनीतिक दल नफरत, सांप्रदायिकता और हिंसा को अपना हथियार बनाए रखेंगे, तो विकसित भारत का सपना अधूरा रह जाएगा। भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी सांस्कृतिक चेतना रही है। गौतम बुद्ध ने करुणा का संदेश दिया, महावीर ने अहिंसा को जीवन का सर्वोच्च मूल्य बताया, गांधी ने सत्य और अहिंसा के बल पर साम्राज्य को चुनौती दी। यह वही भारत है जिसने दुनिया को यह सिखाया कि मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति प्रेम और सह-अस्तित्व है। लेकिन आज राजनीतिक स्वार्थों और गैर-राजनीतिक आपराधिक तत्वों के कारण देश की छवि प्रभावित हो रही है। अपराधी मानसिकता के लोग राजनीतिक संरक्षण प्राप्त कर लोकतंत्र को कमजोर कर रहे हैं। वे दल बदलते रहते हैं, लेकिन उनका उद्देश्य केवल शक्ति और स्वार्थ की पूर्ति होता है। बंगाल की ताजा घटनाओं में भी ऐसे तत्वों की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता।</div><div><br></div><div>समाधान केवल प्रशासनिक कठोरता में नहीं, बल्कि राजनीतिक संस्कृति के परिवर्तन में निहित है। सबसे पहले सभी राजनीतिक दलों को सार्वजनिक रूप से हिंसा की निंदा करनी चाहिए और अपने कार्यकर्ताओं को संयम बरतने का स्पष्ट संदेश देना चाहिए। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को यह समझना होगा कि लोकतंत्र प्रतिद्वंद्विता का नहीं, सह-अस्तित्व का नाम है। दूसरा, कानून व्यवस्था को लेकर “जीरो टॉलरेंस” की नीति अपनानी होगी। किसी भी दल से जुड़े उपद्रवियों के खिलाफ निष्पक्ष कार्रवाई होनी चाहिए। पुलिस और प्रशासन को राजनीतिक दबाव से मुक्त रखकर संवेदनशील क्षेत्रों में सतर्क निगरानी बढ़ानी होगी। तीसरा, राजनीति के अपराधीकरण पर कठोर नियंत्रण आवश्यक है। ऐसे लोगों को राजनीतिक दलों में प्रवेश ही न मिले जिनकी पृष्ठभूमि हिंसक और आपराधिक रही हो। राजनीतिक दलों को अपने भीतर नैतिक अनुशासन विकसित करना होगा। चैथा, समाज में लोकतांत्रिक शिक्षा और संवेदनशीलता का वातावरण बनाना होगा। विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और सामाजिक संस्थाओं में संवाद, सहिष्णुता और अहिंसा के मूल्यों को मजबूत करना समय की आवश्यकता है। जब तक समाज स्वयं हिंसा को अस्वीकार नहीं करेगा, तब तक राजनीतिक हिंसा का अंत कठिन होगा।</div><div><br></div><div>बंगाल की ताजा हिंसा केवल एक राज्य की समस्या नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के सामने खड़ी एक गंभीर चेतावनी है। यदि हमने समय रहते राजनीति को स्वस्थ मूल्यों की ओर नहीं मोड़ा, तो नफरत और हिंसा लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करती रहेंगी। आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत अपनी आत्मा को पहचाने। यह देश युद्ध और प्रतिशोध की नहीं, बल्कि शांति, सह-अस्तित्व और विश्वबंधुत्व की भूमि है। “वसुधैव कुटुम्बकम्” केवल एक नारा नहीं, बल्कि भारत की सभ्यता का मूल दर्शन है। यदि राजनीति इस दर्शन से विमुख होगी, तो लोकतंत्र केवल सत्ता संघर्ष बनकर रह जाएगा। पश्चिम बंगाल को अब हिंसा और प्रतिशोध की राजनीति से बाहर निकलकर विकास, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक समरसता की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। यही लोकतंत्र की गरिमा है, यही जनता की अपेक्षा है और यही विकसित भारत का मार्ग भी।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 09 May 2026 18:21:07 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-violence-in-bengal-is-a-blot-on-democracy-and-a-major-challenge</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[सम्राट चौधरी सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार के राजनीतिक निहितार्थ को समझिए]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/understand-the-political-implications-of-the-cabinet-expansion-by-samrat-chaudhary-government]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बिहार में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के मंत्रिमंडल विस्तार के कई गहरे राजनीतिक मायने हैं। यह केवल सत्ता संचालन का मामला नहीं, बल्कि 2029 लोकसभा और आगामी बिहार विधानसभा चुनावों की व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी ने इसे राष्ट्रीय स्तर का शक्ति प्रदर्शन बना दिया। पश्चिम बंगाल और असम में भाजपा को मिली अभूतपूर्व विजय से बिहार का महत्व और भी बढ़ चुका है, क्योंकि पश्चिम, उत्तर, मध्य भारत के बाद पूर्वी भारत में भाजपा ने गजब का विस्तार किया है। इसे बरकरार रखने में बिहार की अहम भूमिका होगी।</div><div><br></div><div>राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, सम्राट मंत्रिमंडल विस्तार का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश यह है कि बिहार में भाजपा अब “सहयोगी दल” नहीं बल्कि “मुख्य धुरी” बनना चाहती है। यही वजह है कि वह एनडीए के सामाजिक समीकरणों को फिर से पुनर्गठित कर रहा है। खासकर 'नीतीश युग' से 'सम्राट युग' की ओर नियंत्रित लेकिन सधे हुए कदमों से वह कदमताल भर रही है, जिसका सारा श्रेय मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के साहस, समर्पण, और सहृदयता को जाता है, जिससे मोदी-शाह का काम आसान हुआ।</div><div><br></div><div>देखा जाए तो भाजपा आम चुनाव 2029 की राजनीति की नींव अभी से रखी जा रही है। इसके लिए नीतीश सरकार के जातीय समीकरण को अक्षुण्ण रखते हुए सामाजिक न्याय और हिंदुत्व को नई धार दे चुकी है। इससे बिहार विधानसभा चुनाव 2030 में भी बहुत फायदा मिलेगा। वहीं, पूर्वी भारत के लिए भविष्य की चुनौतियों से निपटने और खासकर ग्रेटर बंगलादेश के सपनों को नेस्तनाबूद करने की अंदरूनी तैयारी भी भाजपा ने तेज कर दी है, जिसमें बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा असम, के अलावा त्रिपुरा, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर आदि की भी अहम भूमिका रहेगी।&nbsp;</div><div><br></div><div><b>लिहाजा, बिहार में सम्राट सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार के अहम मायने इस प्रकार हैं-&nbsp;</b></div><div><br></div><h2>पहला, भाजपा का “नया बिहार नेतृत्व” स्थापित करने की कोशिश और उसके निमित्त जारी जद्दोजहद</h2><div><br></div><div>युवा और कर्मठ राजनेता सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा ने बिहार में “पोस्ट-नीतीश युग” की शुरुआत का संकेत दिया है, लेकिन अब मंत्रिमंडल विस्तार के जरिए पार्टी नेतृत्व द्वारा यह संदेश दिया गया है कि पार्टी बिहार में अपना स्वतंत्र नेतृत्व खड़ा कर रही है। इसमें नए और आक्रामक राजनीतिक चेहरों को जगह दी गई है। विभागों का बंटवारा भी काफी सूझबूझ से किया गया है। इसका श्रेय टीम मोदी-शाह-चौधरी को ही जाता है।</div><div><br></div><h2>दूसरा, गोविंदाचार्य के यूपी सोशल इंजीनियरिंग का बिहार में अबतक का बड़ा प्रयोग</h2><div><br></div><div>सम्राट कैबिनेट के गठन में राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ओबीसी, ईबीसी, दलित, महादलित, सवर्ण, निषाद, कुशवाहा, पासवान और क्षेत्रीय संतुलन का विशेष ध्यान रखा गया है। वहीं, अकस्मात लाए हुए यूजीसी बिल के साइड इफेक्ट्स से भी एनडीए को बचाने की पुरजोर कोशिश दिखी। लिहाजा, इसे भाजपा-जदयू गठबंधन की संयुक्त “सामाजिक समीकरण साधो” रणनीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है। जानकारों के मुताबिक, विशेष रूप से, ओबीसी और ईबीसी वर्ग को बड़ा प्रतिनिधित्व के दृष्टिगत अतिपिछड़ा वोट बैंक पर पकड़ मजबूत करने की कोशिश के साथ साथ दलित-पासवान समीकरण को एनडीए में स्थिर रखने का प्रयास करते हुए सीमांचल और मिथिलांचल को राजनीतिक संदेश दिया गया है। इससे नए चेहरों की भी किस्मत खुली।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/has-vijay-sinha-been-sidelined-in-the-bihar-bjp" target="_blank">कद घटा या जिम्मेदारी बदली? क्या बिहार BJP में साइडलाइन हो गए विजय सिन्हा</a></h3><h2>तीसरा, जदयू और भाजपा के बीच “50-50 का शक्ति संतुलन” ताकि परस्पर सहयोग और मजबूत हो</h2><div><br></div><div>रिपोर्टों के अनुसार भाजपा और जदयू के बीच लगभग बराबरी का फार्मूला अपनाया गया। इससे यह संकेत गया कि गठबंधन में जदयू अभी भी सम्मानजनक स्थिति में है, जबकि भाजपा नेतृत्वकारी भूमिका में आगे बढ़ रही है। आपको बता दें कि भाजपा और जदयू की दोस्ती दोनों दलों के लिए बहुत सुखदायी समझी जाती है। तभी तो एक नहीं बल्कि दो-दो बार नीतीश कुमार एनडीए से बाहर गए, लेकिन भाजपा ने उन्हें बार-बार मौका देकर नीतीश कुमार की इज्जत बनाए रखी। वहीं, उनकी पसंद का मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को बनाकर, भाजपा में ही नीतीश कुमार पैदा करने की अहम चाल चली, जिसका फायदा क्रमबद्ध रूप से समझ में आएगा।</div><div><br></div><h2>चौथा, भरोसेमंद राजनीतिक मित्र नीतीश कुमार की राजनीतिक विरासत को सुरक्षित रखने की महत्वपूर्ण कोशिश</h2><div><br></div><div>पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार को मंत्रिमंडल में बतौर स्वास्थ्य मंत्री शामिल किया जाना बेहद प्रतीकात्मक कदम माना जा रहा है। इसके लिए पार्टी ने अपने पूर्व स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय तक को दरकिनार करना मुनासिब समझी। इससे जदयू के भीतर उत्तराधिकार राजनीति को संस्थागत रूप देने का संकेत मिलता है। इससे भाजपा का लवकुश समीकरण काफी मजबूत होगा। इसप्रकार यह कदम तीन संदेश देता है: एक, जदयू का भविष्य “परिवार-केंद्रित नेतृत्व” की ओर जा सकता है। दो, भाजपा फिलहाल नीतीश परिवार के साथ टकराव नहीं चाहती। और तीसरा, गठबंधन में स्थिरता बनाए रखने की कोशिश है।</div><div><br></div><h2>पांचवां, पश्चिम बंगाल चुनाव की अभूतपूर्व जीत के बाद पूर्वी भारत में एनडीए का शक्ति प्रदर्शन</h2><div><br></div><div>गांधी मैदान, पटना में बड़े आयोजन और शीर्ष केंद्रीय नेतृत्व की अहम मौजूदगी यह दर्शाती है कि भाजपा बिहार को पूर्वी भारत की राजनीति का केंद्रीय मैदान बना रही है। यह संदेश विपक्ष, खासकर तेजस्वी यादव और महागठबंधन को दिया गया कि एनडीए अभी भी संगठनात्मक और चुनावी रूप से मजबूत है। इसलिए इंडिया गठबंधन अपना कुनबा संभाले न कि एनडीए गठबंधन पर बक्र दृष्टि रखे। इससे उन्हें कोई फायदा नहीं होने वाला है।</div><div><br></div><h2>छठा, सम्राट चौधरी मंत्रिमंडल में युवा और नए चेहरों पर रचनात्मक दांव</h2><div><br></div><div>मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने अपनी कैबिनेट में कई नए चेहरों को मंत्री बनाकर भाजपा और जदयू दोनों के मिशन “जनरेशन शिफ्ट” का संकेत दिया है। इससे एंटी-इंकम्बेंसी कम करने और युवा वोटरों को आकर्षित करने की कोशिश दिखती है। ऐसा इसलिए कि वर्तमान राजनीति में किसानों, मजदूरों, कारीगरों के साथ साथ महिलाओं और युवाओं की भूमिका बढ़ी है। आजकल युवा ड्राइविंग फोर्स की तरह निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं। पूर्वी भारत में भाजपा का आधार जागरूक युवा ही हैं। इसलिए भाजपा उनके सपनों को पूरा करने में जुटी रहती है। यदि ऐसा स्वप्न साकार होता है तो इससे न केवल पूर्वी बिहार, बल्कि मध्य बिहार, उत्तर बिहार और दक्षिण बिहार में भी भाजपा को मजबूती मिलेगी।</div><div><br></div><h2>सातवां, लकीर की फकीर वाली सियासत में निमग्न&nbsp; 'महामूर्ख विपक्ष' के लिए भाजपा की जमीनी रणनीति बनी अहम चुनौती</h2><div><br></div><div>भाजपा के मौजूदा विस्तार से विपक्ष की जातीय और साम्प्रदायिक राजनीति को करारा जवाब देने की रणनीति भी दिखाई देती है। इसका सारा श्रेय नए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को जाता है। लिहाजा अब उनके वफादार लोग और पार्टी की टीम के खास लोग भाजपा को मजबूत करेंगे। खासकर, विपक्ष के हर राजनीतिक दांव पर पलटवार करते हुए। इससे भाजपा केवल हिंदुत्व ही नहीं, बल्कि “हिंदुत्व, सामाजिक प्रतिनिधित्व और विकास” मॉडल पर आगे बढ़ती दिख रही है। इसके लिए भाजपा का प्रयास&nbsp; सराहनीय है, स्तुत्य है। इसका दिल खोलकर स्वागत किया जाना चाहिए।</div><div><br></div><h2>आठवां, चुस्त-दुरुस्त जातीय समीकरण</h2><div><br></div><div>सम्राट चौधरी के कैबिनेट विस्तार में भाजपा के 15 (मुख्यमंत्री सहित 16), जेडीयू के 13 (दो उपमुख्यमंत्री सहित 15), लोजपा रामविलास के 2, हम और आरएलएम के 1-1 नेता ने मंत्रीपद की शपथ ली। इनमें भाजपा से 5 और जेडीयू से 3 नए चेहरों ने शपथ ली, जिनमें पूर्व सीएम नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार, इंजीनियर कुमार शैलेंद्र, मिथिलेश तिवारी, रामचंद्र पासवान, अरुण शंकर, नंदर किशोर राम, बुलो मंडल और श्वेता गुप्ता आदि का नाम शामिल है। बिहार सरकार की कैबिनेट में अब पांच महिला मंत्री हैं, जिनमें जदयू की तीन नेता शामिल हैं।</div><div><br></div><h2>देखिए पूरी सूची, जातीय विवरण सहित:-&nbsp;</h2><div><br></div><div>भारतीय जनता पार्टी (भाजपा): मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पहले ही शपथ ले चुके थे, जबकि उनके मंत्रिमंडल विस्तार में निम्नलिखित नेताओं को शामिल किया गया है:- 1.राम कृपाल यादव - ओबीसी, 2.केदार गुप्ता - कानू/ ईबीसी 3.नीतीश मिश्रा - ब्राह्मण, 4. मिथिलेश तिवारी - ब्राह्मण, 5. रमा निषाद - ईबीसी / मल्लाह , 6. विजय कुमार सिन्हा - भूमिहार ब्राह्मण, 7. दिलीप जायसवाल - ईबीसी, 8. प्रमोद चंद्रवंशी - ईबीसी, 9. लखेन्द्र पासवान - दलित, 10. संजय टाइगर- राजपूत, 11. इंजीनियर कुमार शैलेन्द्र- भूमिहार ब्राह्मण, 12. नंद किशोर राम- दलित, 13. रामचंद्र प्रसाद - वैश्य/ ओबीसी, 14. अरुण शंकर प्रसाद - सूढ़ी वैश्य/ ओबीसी, 15. श्रेयसी सिंह- राजपूत।</div><div><br></div><div>वहीं, जनतादल यूनाइटेड (जदयू) के 2 उपमुख्यमंत्री क्रमशः विजय कुमार चौधरी और बिजेंद्र प्रसाद यादव पहले ही शपथ ले चुके थे, जबकि मंत्रिमंडल विस्तार में निम्नलिखित नेताओं को शामिल किया गया है:- 1. निशांत कुमार- कुर्मी/ ओबीसी, 2. श्रवण कुमार - कुर्मी/ ओबीसी, 3. अशोक चौधरी- दलित, 4. लेसी सिंह- राजपूत,&nbsp; 5. मदन सहनी- मल्लाह/ ईबीसी, 6. सुनील कुमार- दलित, 7. जमा खान- अल्पसंख्यक, 8. भगवान सिंह कुशवाहा- कोइरी/ ओबीसी, 9. शीला मंडल- धानुक / ईबीसी, 10. दामोदर राउत - धानुक/ ईबीसी, 11. बुलो मंडल- गंगोता/ ईबीसी, 12. रत्नेश सदा- दलित, 13. श्वेता गुप्ता- बनिया।</div><div><br></div><div>लोकजनशक्ति पार्टी (रामविलास) यानी लोजपा (आर) से निम्नलिखित नेताओं को शामिल किया गया है:-1. संजय पासवान- दलित 2. संजय सिंह - राजपूत। वहीं, हिन्दुस्तान अवामी मोर्चा यानी हम से निम्नलिखित नेता को शामिल किया गया है:-1. संतोष मांझी- दलित। वहीं,&nbsp; जबकि राष्ट्रीय लोकतांत्रिक मोर्चा (रालोमो) से निम्नलिखित नेताको शामिल किया गया है:-1. दीपक प्रकाश - कुशवाहा। इस नए मंत्रिमंडल में कोसी और सीमांचल को भी तवज्जो दी गई है, जो पूर्वी बिहार का अभिन्न अंग है।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 08 May 2026 19:19:42 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/understand-the-political-implications-of-the-cabinet-expansion-by-samrat-chaudhary-government</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[मीठा-मीठा गप, कड़वा-कड़वा थू, संवैधानिक मर्यादाओं को तोड़ता विपक्ष]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-opposition-breaching-constitutional-norms]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम बंगाल के साथ पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के पश्चात् जो तस्वीर निर्मित हुई है, वह कड़वाहट और मिठास दोनों का ही स्वाद दे रही है। विपक्ष के राजनीतिक दल जहाँ एक ओर तमिलनाडु और केरल के मनमाफिक परिणाम देखकर मिठास का स्वाद ले रहा है, वहीं पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम को सभी विपक्षी दल भाजपा की प्रायोजित जीत के रूप में प्रचारित करने का असंवैधानिक कार्य कर रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी को इस बार जनता ने विपक्ष में बैठने का जनादेश दिया है, लेकिन ममता बनर्जी कुर्सी से चिपके रहने के अंदाज में पराजय को स्वीकार करने का मानस नहीं बना पा रही हैं।</div><div>&nbsp;</div><div> लोकतान्त्रिक मर्यादा के तहत उनको मुख्यमंत्री की कुर्सी का त्याग करना चाहिए। लेकिन ममता बनर्जी ऐसा न करके एक प्रकार से लोक के निर्णय को ठेंगा दिखाने का कार्य कर रही हैं। खास बात यह है कि विपक्ष के कुछ अन्य दल भी तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी के इस कदम का समर्थन करती हुई लग रही हैं। लोकतंत्र में विरोध करने का सभी को अधिकार है, लेकिन यह विरोध संवैधानिक मर्यादायों के तहत ही होना चाहिए।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/suvendu-adhikari-political-profile-family-details-and-net-worth" target="_blank">Suvendu Adhikari को Giant Killer और भूमिपुत्र के रूप में देखती है जनता, Bengal में BJP को अपने पैरों पर खड़ा करके दिखा दिया</a></h3><div>देश के इतिहास में यह पहली बार हो रहा है, ज़ब चुनाव में पराजित हो जाने के बाद मुख्यमंत्री अपना त्याग पत्र देने से मना कर रहा है, ममता बनर्जी का यह रवैया निश्चित ही जनमत के साथ विश्वासघात ही कहा जाएगा। लोकतंत्र का असली आशय यही होता है कि जनता अपने बीच में से अपने प्रतिनिधि चुनकर अपनी सरकार बनाती है। जनता ने जनादेश दे दिया है। विपक्ष को भी यह स्वीकार करना चाहिए। पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम यह संदेश प्रवाहित कर रहे हैं कि अब देश में तुष्टिकरण के दिन ख़त्म हो गए हैं। जनता भी ऐसा ही चाहती है। मजेदार तथ्य यह है कि बंगाल के चुनाव के साथ ही पांच राज्य असम, केरल, तमिलनाडु और पंडिचेरी में भी चुनाव हुए असम को छोड़ दिया जाए तो सभी राज्यों में परिणाम सत्ता के विरोध में ही आए, लेकिन सवाल यह है कि इन राज्यों के परिणाम पर कोई आरोप नहीं लगा रहा। इसके पीछे यही कारण माना जा रहा कि वहां भाजपा नहीं जीती। भाजपा की जीतना विपक्ष को कभी नहीं पचा। विपक्ष का व्यवहार ऐसा होता जा रहा है जैसे ये केवल सत्ता के लिए ही बने हैं। चुनाव में जय पराजय होती ही है, केवल एक को ही विजय मिलती है।</div><div><br></div><div>पश्चिम बंगाल के बारे में यह सभी जानते हैं कि ममता सरकार के कार्यकाल में भ्रष्टाचार चरम पर था। जनता भी इस भ्रष्टाचार से त्रस्त रही और प्रशासनिक अधिकारी भी। इसी के चलते तृणमूल कांग्रेस के नेताओं के विरोध में एक राजनीतिक हवा बनी। भाजपा ने अपने प्रचार के दौरान ममता के भ्रष्टाचार को लेकर जमकर हमला बोला। इसके विपरीत विपक्ष के अन्य दल भी इन मुद्दों पर मुखर रहे। कांग्रेस ने सार्वजनिक रूप से ममता को निशाने पर लिया। इसका आशय स्पष्ट है कि पश्चिम बंगाल में ममता सरकार के विरोध में लहर थी। दूसरी एक और प्रमुख बात यह भी है कि पश्चिम बंगाल में पिछले जितने भी चुनाव हुए, उनमें हिंसा के माध्यम से मतदाताओं को भयभीत करने का काम भी खुलेआम हुआ। ऐसा कोई भी चुनाव नहीं हुआ, जिसे हिंसा मुक्त कहा जा सकता हो। इस बार के विधानसभा चुनाव में चुनाव आयोग ने हिंसा मुक्त चुनाव करके दिखा दिया। इसी कारण आम मतदाता बिना किसी भय के मतदान केंद्र तक पहुँचने में सफल हुआ। इसी ने भाजपा की राह आसान की।</div><div><br></div><div>पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत का एक बड़ा कारण यह भी माना जा रहा है कि वहां की मतदाता सूची से फर्जी नाम विलोपित किए गए। इन नामों में कई तो ऐसे थे, जो इस दुनिया में नहीं हैं। हालांकि यह एक सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है, इसलिए इसे खास मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए। प्रति वर्ष मतदाता सूची से नाम हटाने और जोड़ने का क्रम चलता है। बंगाल का मामला बांग्लादेशी घुसपैठियों से जुडा था, इसलिए वहां एसआईआर जरुरी था। इससे जहाँ विदेशी मतदाता चुनाव में वोट का प्रयोग करने से वंचित हो गया, वहीं ऐसे मतदाता भी चुनाव में हिस्सा नहीं ले सके, जो फर्जी थे। उल्लेखनीय है कि पूर्व के चुनाव में यह वोट भी उपयोग में आते थे, इनके वोट कैसे पड़ते थे और कौन उंगली से बटन दबाता था, इसमें भले ही संदेह हो, लेकिन इसका आरोप तृणमूल के कार्यकर्ताओं पर ही लगते थे। इसी हिंसा को रोकने के लिए चुनाव आयोग ने सुरक्षा बलों की तैनाती कराई। सुरक्षा बल केवल नागरिक सुरक्षा एवं भय मुक्त मतदान के लिए ही लगाया, लेकिन ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस सहित विपक्ष के कई राजनीतिक दलों ने उनकी निष्ठा पर ही सवाल उठा दिए।</div><div>&nbsp;</div><div>पश्चिम बंगाल के इस बार के चुनाव में ऐसे कई कारण रहे जो भाजपा की जीत और तृणमूल कांग्रेस की हार में काफी प्रभावी रहे। उसमें तृणमूल सरकार विरोधी लहर तो थी ही, साथ ही जो मुस्लिम वोट पूरा का पूरा तृणमूल को मिलता था, इस बार नहीं मिल सका। उसके पीछे मुसलमान नेताओं की सक्रियता रही। इस चुनाव में एक ओर ओवैसी की पार्टी मैदान में थी, वहीं हुमायूं कबीर ने एक नई पार्टी बनाकर ममता की परेशानी में बढ़ोत्तरी की। इस कारण मुसलमान वर्ग के वोट निश्चित ही विभाजित हो गए। इसके साथ ही राज्य का हिन्दू मतदाता कुछ ज्यादा सक्रियता के साथ मैदान में उतर आया। यह मतदाता निश्चित ही भाजपा के पक्ष में गया। इसलिए विपक्ष की ओर से यह कहना कि एसआईआर के कारण या चुनाव आयोग द्वारा भाजपा का साथ देने के आरोप प्रथम दृष्टि में ही तर्कहीन से लगते हैं। अब ममता बनर्जी को अपनी हार की समीक्षा करनी ही चाहिए, जो कमियां रही, उसे दूर करने का प्रयास करना चाहिए।</div><div><br></div><div>चुनाव परिणाम के बाद आरोप प्रत्यारोप का खेल जारी है। इसमें विपक्ष बिना प्रमाण के भाजपा और चुनाव आयोग पर आरोप लगा रहा है। तृणमूल कांग्रेस और भाजपा विरोधी अन्य राजनीतिक दल जिस प्रकार के आरोप लगा रहे हैं, वह केवल जुबानी ही हैं। उसके पुख्ता प्रमाण किसी के पास नहीं हैं। ऐसी राजनीति न तो लोकतंत्र को सुरक्षित रख सकती है और न ही देश का भला कर सकती है। विपक्ष को सच को स्वीकार करने की मानसिकता बनानी होगी। हर बात के लिए नकारात्मक राय रखना विपक्ष की मजबूरी हो सकती है, लेकिन इसे स्वस्थ लोकतंत्र नहीं कहा जा सकता। जो अच्छा है उसे अच्छा कहना ही होगा। क्योंकि जनता जिस सच के साथ रहती है, विपक्ष को भी उसी सच के साथ ही चलना होगा। विपक्ष को यह भी समझना चाहिए कि आज देश का वातावरण परिवर्तित हो चुका है या हो रहा है। विपक्ष निश्चित रूप से सरकार पर आरोप लगाए, लेकिन जन भावना का अनादर करने से बचना होगा, नहीं तो जैसा पश्चिम बंगाल का परिणाम आया, वैसा अन्य राज्यों का भी आ सकता है।</div><div><br></div><div>- सुरेश हिंदुस्तानी&nbsp;</div><div>वरिष्ठ पत्रकार</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 07 May 2026 19:41:02 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-opposition-breaching-constitutional-norms</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[विकास में भेदभाव का शिकार हो रहे हैं प्रमुख तीर्थस्थल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/major-pilgrimage-sites-are-falling-victim-to-discriminatory-development]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का ससंदीय क्षेत्र होने के कारण काशी में जहां तरक्की और घोषणाओं की बरसात हो रही है, वहीं देश के दूसरे प्रमुख हिन्दू तीर्थ स्थल विकास की बाट जोह रहे रहे हैं। मोदी का निर्वाचन क्षेत्र होने के कारण केंद्र सरकार और उत्तर प्रदेश की योगी सरकार का पूरा जोर काशी तक सीमिट कर रहा गया है। यदि यह मान भी लिया जाए कि काशी हिन्दुओं का प्रमुख तीर्थ स्थल है, इसलिए इसके विकास की दरकार है, तो ऐसे में देश के प्रमुख राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त अन्य तीर्थ स्थल विकास की दौड़ में काशी से काफी पीछे क्यों हैं। कारण साफ नजर आता है कि पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र होने के कारण काशी में विकास की गंगा बह रही, वहीं अन्य प्रमुख धार्मिक स्थल वाले जिले बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं।</div><div><br></div><div>वर्ष 2014 से मार्च 2025 तक काशी में विकास के तहत कुल 48,459 करोड़ रुपय की लागत से 580 परियोजनाओं पर काम शुरू किया गया है। काशी के विकास की घोषणाओं की शुरुआत मोदी के पहली बार सांसद बनने के साथ ही शुुरु हो गई थी। यह सिलसिला लगातार जारी है। हाल ही में पीएम मोदी ने अपने दो दिवसीय वाराणसी दौरे के दौरान 6332 करोड़ रुपये की कुल 163 विकास परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास किया। इनमें गंगा पर सिग्नेचर ब्रिज सबसे बड़ी परियोजना है। जिसकी लागत करीब ₹2464.46 करोड़ है। यह ब्रिज काशी की कनेक्टिविटी और ट्रैफिक व्यवस्था को नई दिशा देगा। प्रधानमंत्री के हाथों ₹1054.69 करोड़ की 50 परियोजनाओं का लोकार्पण और ₹5277.39 करोड़ की 113 परियोजनाओं का शिलान्यास किया गया।</div><div><br></div><div>काशी के अलावा देश के अन्य प्रमुख तीर्थ स्थल वाले जिलों में विकास चींटी की रफ्तार से रेंग रहा है या फिर उसकी सुध नहीं ली जा रही है। काशाी के अलावा देश के प्रमुख हिन्दू तीर्थ स्थलों में आधारभूत सुविधाओं की बेहद कमी है। वैष्णों देवी के लिए प्रसिद्ध कटरा जिले में मूसलाधार बारिश के दौरान भूस्खलन की गंभीर समस्या है। जम्मू और कटरा के बीच सड़क और रेल संपर्क अक्सर टूट जाता है। विशेष रूप से, 2025 की बाढ़ के बाद से ट्रेनों का रद्दीकरण और पुलों (जैसे कठुआ, उधमपुर के पास) को नुकसान ने यात्रा और स्थानीय अर्थव्यवस्था को गंभीर झटका दिया है। कटरा में स्मार्ट सड़कों, सुव्यवस्थित पार्किंग, और आधुनिक बुनियादी ढांचे की कमी है। यात्रियों की बढ़ती संख्या को संभालने के लिए मौजूदा सुविधाएं नाकाफी हैं। बढ़ती भीड़ के कारण गर्मियों में पेयजल और निरंतर बिजली आपूर्ति की समस्या बनी रहती है। लगातार निर्माण, वनों की कटाई और भीड़भाड़ के कारण पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/modi-and-shah-election-strategy-is-amazing-there-is-a-lot-to-learn-from-them-shashi-tharoor" target="_blank">Modi और Shah की चुनावी रणनीति गजब की होती है, इनसे बहुत कुछ सीखने की जरूरत हैः Shashi Tharoor</a></h3><div>राम मंदिर के विख्यात अयोध्या में बाल विकास विभाग की एक रिपोर्ट ने जिले में कुपोषण की चिंताजनक स्थिति को उजागर की है। जिले के 2,381 आंगनबाड़ी केंद्रों में पंजीकृत 2,28,018 बच्चों की जांच में 7,520 बच्चे कुपोषित पाए गए हैं। इनमें 1,199 बच्चे अति कुपोषित (सैम) और 6,321 बच्चे मध्यम गंभीर कुपोषित (मैम) श्रेणी में हैं। वित्तीय वर्ष 2023-24 में 264 और 2024-25 में 286 अति कुपोषित बच्चों को पुनर्वास केंद्र भेजा गया। विकास परियोजनाओं के कारण हजारों लोग, विशेषकर छोटे व्यापारी और गरीब, अपने पुश्तैनी आवासों और व्यवसायों से विस्थापित हो गए हैं। परियोजनाओं के कारण उड़ने वाली धूल और निर्माण सामग्री से स्थानीय लोगों को सांस संबंधी बीमारियां हो रही हैं। जल भराव और सीवर के गंदे पानी के घरों में घुसने की समस्या से लोग लंबे समय से परेशान हैं। पुरानी अयोध्या (फैजाबाद) और अयोध्या धाम के बीच आवागमन में मुश्किल हो रही है।</div><div><br></div><div>देश के 12 ज्योतिर्लिंग में शामिल केदारनाथ के रुद्रप्रयाग जिले के कई सुदूरवर्ती गांव अभी भी प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव से जूझ रहे हैं, जहाँ आपदा प्रभावित क्षेत्रों में संपर्क मार्ग बाधित होने और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के कारण लोगों को स्वास्थ्य उपचार के लिए भटकना पड़ता है। भारी बारिश के कारण संपर्क मार्ग बाधित होना भी प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच में एक बड़ी बाधा है। जिले भर में लगभग 25 जल स्रोत सूख चुके हैं, जिससे पानी की आपूर्ति प्रभावित हुई है। पानी की कमी से नाराज लोग जल संस्थान के खिलाफ प्रदर्शन कर चुके हैं। इसी तरह उत्तराखंड के हरिद्वार जिले में तेजी से बढ़ते शहरीकरण, धार्मिक पर्यटन के दबाव और प्रशासनिक चुनौतियां मौजूद हैं। नालों और सार्वजनिक भूमि पर अवैध निर्माण के कारण जल निकासी बाधित हो रही है। मानसून से पहले नालों पर अतिक्रमण के कारण जलभराव का खतरा बना रहता है। हरकी पैड़ी और आसपास के क्षेत्रों में भिक्षावृत्ति एक बड़ी समस्या है। चारधाम यात्रा के सुचारू न रहने या व्यवस्थाओं के कारण स्थानीय होटलों और पर्यटन व्यवसाय पर भी असर पड़ रहा है।&nbsp;</div><div><br></div><div>कृष्ण की जन्मभूमि मथुरा में ₹30,000 करोड़ से अधिक की ब्रज मास्टर प्लान परियोजनाओं और नई आवासीय योजनाओं के लिए ₹850 करोड़ के बावजूद, कई विकास कार्य फाइलों में अटके हैं। वर्ष 2026-2030 के मास्टर प्लान के अंतर्गत शहर को हाई-स्पीड कनेक्टिविटी और आधुनिक सुविधाओं से जोड़ने का विज़न है, लेकिन प्रशासनिक प्रक्रियाओं के चलते जमीनी स्तर पर गति धीमी है। मथुरा-वृंदावन में वर्षभर धार्मिक आयोजनों की लंबी श्रृंखला चलती रहती है। प्रमुख आयोजनों में होलिकोत्सव, मुड़िया मेला, जन्माष्टमी, राधाष्टमी, झूलन उत्सव, कार्तिक मास, गोवर्धन पूजा और ब्रज की विभिन्न परिक्रमाएं शामिल हैं। आयोजनों के दौरान श्रद्धालुओं की संख्या 8 से 10 लाख तक पहुंच जाती है। भीड़ प्रबंधन अब भी मुख्यतः पुलिस के भरोसे ही संचालित हो रहा है। कई बार मास्टर प्लान और विस्तृत प्रस्ताव तैयार किए गए, लेकिन जमीन पर उतरते हुए नजर नहीं आए।&nbsp;</div><div><br></div><div>हिन्दुओं के प्रमुख तीर्थस्थल में शुमार प्रयागराज शहर वर्तमान में कई गंभीर सामाजिक और बुनियादी समस्याओं से जूझ रहा है। मुख्य समस्याओं में गंगा-यमुना की बाढ़ से फसल व जनजीवन का नुकसान, बजबजाती नालियां व कूड़े के ढेर के कारण गंदगी, सीवर लाइन का अभाव, यातायात जाम और अवैध अतिक्रमण शामिल हैं। इसके अलावा, बाढ़ के बाद बीमारियां और मच्छरों का प्रकोप भी एक बड़ी चुनौती है। गुजरात के देवभूमि द्वारका जिले में विकास और पर्यटन के बावजूद कई प्रमुख सामाजिक और नागरिक समस्याएं मौजूद हैं, जो स्थानीय निवासियों और तीर्थयात्रियों को प्रभावित करती हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>गुजरात सोमनाथ मंदिर (प्रथम ज्योतिर्लिंग) जिले में पर्यटन और आस्था के केंद्र होने के साथ-साथ कई महत्वपूर्ण सामाजिक और नागरिक समस्याएं भी विद्यमान हैं। इस क्षेत्र में दलित समुदाय के खिलाफ अत्याचार की घटनाएं (जैसे ऊना की घटना) और हाशिए पर स्थित समुदायों के उत्पीड़न की समस्या रही है। जमीन के अधिकारों को लेकर विवाद और अवैध संरचनाओं को हटाने के दौरान लोगों का विस्थापन और पुनर्वास न होना एक प्रमुख समस्या है। वेरावल जैसे तटीय क्षेत्रों में बंदरगाह आधारित विकास के बावजूद नागरिक सुविधाओं की कमी है। सोमनाथ मंदिर के कारण बड़ी संख्या में पर्यटकों के आगमन से स्थानीय बुनियादी ढांचे पर दबाव बढ़ता है, जिससे स्वच्छता और यातायात प्रबंधन की चुनौती बनी रहती है। तटीय जिला होने के कारण यहां चक्रवात और बाढ़ का खतरा बना रहता है, जिसके लिए जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण को लगातार काम करना पड़ता है। ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं और उच्च शिक्षा के बुनियादी ढांचे का अभाव है।&nbsp;</div><div><br></div><div>तमिलनाडु के रामेश्वरम (रामनाथस्वामी मंदिर) रामनाथपुरम जिला धार्मिक और तटीय पर्यटन के बढ़ते आकर्षण के बावजूद अपर्याप्त बुनियादी ढांचा (जैसे: बेहतर सड़कें, आवास और सार्वजनिक सुविधाएं) मांग के अनुरूप तालमेल बिठाने में संघर्ष कर रहा है। रामेश्वरम और धनुषकोडी जैसे प्रमुख पर्यटन स्थलों तक भारी आवागमन के कारण सड़कों पर दबाव, जिससे अक्सर यातायात जाम की स्थिति बनती है। पीक सीजन में आवास, पार्किंग और स्वच्छता सुविधाओं की कमी, जो पर्यटकों के अनुभव को प्रभावित करती है। आंध्र प्रदेश का चित्तूर जिला तिरुपति बालाजी (वेंकटेश्वर मंदिर) ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के बावजूद विकास के मोर्चे पर कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। चित्तूर का 'हाई रोड' (ओल्ड मद्रास रोड) इतिहास के साथ विकसित हुआ है, लेकिन वर्तमान में यह यातायात जाम और बुनियादी ढांचे के अभाव के कारण विकास की मुख्यधारा से पिछड़ रहा है। शहर के मुख्य मार्गों पर भारी ट्रैफिक और संकरी सड़कें विकास में बड़ी बाधा हैं, जिससे आर्थिक गतिविधियां और सुगम आवागमन प्रभावित होता है। रोजगार के सीमित अवसरों के कारण, युवाओं को बेहतर अवसरों की तलाश में अन्य स्थानों पर पलायन करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। काशी के धार्मिक, पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व से इंकार नहीं है, किन्तु देश के अन्य समकक्ष धार्मिक स्थलों और मंदिरों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव भेदभाव पर सवाल उठाता रहेगा।</div><div><br></div><div>- योगेन्द्र योगी</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 05 May 2026 15:04:56 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/major-pilgrimage-sites-are-falling-victim-to-discriminatory-development</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Mythos AI चमत्कारी भी है और विनाशकारी भी, इसके प्रभावों को लेकर दुनियाभर की सरकारों की नींद उड़ गई है]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/mythos-ai-is-both-miraculous-and-destructive-with-govts-around-the-world-worried-about-its-impact]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>एआई के क्षेत्र में तेजी से हो रहे विकास के बीच एक नया मॉडल वैश्विक चिंता का केंद्र बन गया है। यह है एन्थ्रोपिक द्वारा विकसित मॉडल मिथोस। यह उन्नत प्रणाली जहां साइबर सुरक्षा के लिए एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है, वहीं इसके संभावित दुरुपयोग को लेकर सरकारों, बैंकों और विशेषज्ञों के बीच गंभीर आशंकाएं भी उभर रही हैं। हम आपको बता दें कि मिथोस एक ऐसा एआई मॉडल है जो कंप्यूटर प्रणालियों में मौजूद छिपी कमजोरियों को पहचानने और उनका फायदा उठाने में सक्षम बताया गया है। कंपनी के अनुसार यह उन त्रुटियों को भी खोज सकता है जिनके बारे में सॉफ्टवेयर बनाने वालों को खुद जानकारी नहीं होती। इन्हें जीरो डे कमजोरियां कहा जाता है, क्योंकि इनके सामने आने के बाद सुधार का समय नहीं मिल पाता। मिथोस की यही क्षमता इसे अत्यंत शक्तिशाली और साथ ही खतरनाक बनाती है।</div><div>&nbsp;</div><div>कंपनी ने सात अप्रैल को इस मॉडल के अस्तित्व की घोषणा की थी, लेकिन इसे सार्वजनिक उपयोग के लिए जारी करने से साफ इंकार कर दिया। कारण स्पष्ट है कि यदि यह तकनीक गलत हाथों में चली गई तो वैश्विक साइबर सुरक्षा को गंभीर खतरा हो सकता है। हालांकि, सीमित रूप से कुछ कंपनियों और बैंकों को इसके परीक्षण की अनुमति दी गई है ताकि वह इसके जोखिमों को समझ सकें।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/business/cognizant-prepares-for-project-leap-15000-it-jobs-in-jeopardy-with-significant-impact-on-india" target="_blank">Cognizant में 'Project Leap' की तैयारी, 15 हजार IT Jobs पर लटकी तलवार, भारत पर बड़ा असर</a></h3><div>हाल ही में स्थिति तब और गंभीर हो गई जब यह सामने आया कि कुछ अनधिकृत लोगों ने इस मॉडल तक पहुंच हासिल कर ली थी। यह घटना इस बात का संकेत है कि इतने संवेदनशील उपकरण को पूरी तरह नियंत्रित रखना कितना कठिन है। इससे तकनीकी कंपनियों की क्षमता पर भी सवाल उठे हैं कि वह अपने सबसे जोखिमपूर्ण उत्पादों को कितनी सुरक्षित रख सकती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार मिथोस केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं बल्कि एआई की तेजी से बढ़ती शक्ति का संकेत है। पिछले कुछ वर्षों में इस क्षेत्र में जिस गति से प्रगति हुई है, उससे यह आशंका भी बढ़ी है कि अन्य कंपनियां भी जल्द ही ऐसे मॉडल विकसित कर सकती हैं। इससे साइबर हमलों और बचाव के बीच एक नई प्रतिस्पर्धा शुरू हो सकती है।</div><div><br></div><div>ब्रिटेन के एआई सुरक्षा संस्थान ने भी मिथोस का परीक्षण किया है और इसे पहले के मॉडलों की तुलना में अधिक सक्षम और खतरनाक बताया है। यह मॉडल कई चरणों वाले साइबर हमलों का अनुकरण करने में सफल रहा है और बिना मानवीय निर्देश के कमजोरियों की पहचान कर सकता है। हालांकि, यह भी स्पष्ट नहीं है कि यह अत्यधिक सुरक्षित प्रणालियों पर कितना प्रभावी होगा। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इस मॉडल को लेकर जितनी चर्चा हो रही है, उसमें कुछ हद तक अतिशयोक्ति भी शामिल हो सकती है। उनका कहना है कि कई सस्ते मॉडल भी कुछ कमजोरियों की पहचान करने में सक्षम हैं। इसके अलावा अधिकांश साइबर हमले अब भी साधारण कमजोरियों जैसे कमजोर पासवर्ड या पुराने सॉफ्टवेयर के कारण होते हैं।</div><div><br></div><div>फिर भी, मिथोस के संभावित प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। विशेष रूप से बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र में इसका असर बहुत गंभीर हो सकता है। यदि इस तरह की तकनीक का दुरुपयोग हुआ तो भुगतान प्रणाली ठप हो सकती है, लोगों के वेतन और लेनदेन रुक सकते हैं, और व्यापक आर्थिक अस्थिरता पैदा हो सकती है। इसी कारण अमेरिका में भी इस मॉडल को लेकर उच्च स्तर पर चर्चा हो रही है। वहां की सरकार ने इसके उपयोग और पहुंच को लेकर सख्त रुख अपनाया है और इसे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मामला माना जा रहा है। प्रारंभिक योजना के तहत सीमित संस्थाओं को ही इसकी पहुंच दी गई है और इसके विस्तार को लेकर भी सावधानी बरती जा रही है।</div><div><br></div><div>भारत में भी इस मुद्दे ने तेजी से ध्यान आकर्षित किया है। देश को इस मॉडल के शुरुआती परीक्षण से बाहर रखा गया, जिससे नीति निर्माताओं और तकनीकी विशेषज्ञों के बीच चिंता बढ़ गई। सरकार अब अमेरिका और कंपनी के साथ बातचीत कर रही है ताकि भारतीय कंपनियों को भी इस तकनीक तक उचित पहुंच मिल सके। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस विषय को अत्यंत गंभीर बताते हुए कहा है कि यह साइबर चुनौती बहुत बड़ी हो सकती है। सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, बैंकों और सुरक्षा एजेंसियों के साथ उच्च स्तरीय बैठकें की हैं। उद्देश्य यह है कि देश के महत्वपूर्ण ढांचे जैसे बैंकिंग नेटवर्क, दूरसंचार और बिजली प्रणाली को सुरक्षित रखा जा सके।</div><div><br></div><div>भारत की चिंता केवल पहुंच तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य के जोखिमों को लेकर भी है। यदि अन्य कंपनियां भी इसी तरह के मॉडल विकसित करती हैं और उनका वितरण असमान रहता है, तो कुछ देशों की सुरक्षा कमजोर पड़ सकती है। यही कारण है कि भारत समान अवसर और संतुलित नीति की मांग कर रहा है।</div><div><br></div><div>इसके साथ ही, देश की साइबर सुरक्षा एजेंसियों को भी सतर्क कर दिया गया है। उन्हें संवेदनशील प्रणालियों की जांच करने और सुरक्षा ढांचे को मजबूत करने के निर्देश दिए गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी तकनीक दोधारी तलवार की तरह है, इसका उपयोग सुरक्षा बढ़ाने के लिए भी किया जा सकता है और हमलों के लिए भी।</div><div><br></div><div>बहरहाल, मिथोस ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता अब केवल सुविधा का साधन नहीं रही, बल्कि यह वैश्विक सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और नीति निर्माण का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि दुनिया इस नई तकनीकी शक्ति के साथ संतुलन कैसे बनाती है ताकि इसका लाभ भी मिले और जोखिम भी नियंत्रित रहें।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 02 May 2026 18:34:49 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Vishwakhabram: Trump ने अब जर्मन चांसलर Friedrich Merz पर हमला बोला, US-Germany संबंधों में आई दरार]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/donald-trump-now-attacks-friedrich-merz-a-major-rift-in-us-germany-relations]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अमेरिका और जर्मनी के बीच राजनीतिक तनाव तेज होता दिख रहा है। दरअसल अक्सर दुनिया के राष्ट्राध्यक्षों से भिड़ने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अब जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ पर लगातार हमले कर रहे हैं। ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखते हुए कहा कि मर्ज़ को अपने देश की समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए और उन्हें ईरान जैसे मामलों में हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए। यह ताजा बयान उस समय आया जब दोनों नेताओं के बीच ईरान युद्ध, रूस यूक्रेन संघर्ष और नाटो सहयोग जैसे मुद्दों पर मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं।</div><div><br></div><div>ट्रंप ने मर्ज़ पर आरोप लगाया है कि वह रूस यूक्रेन युद्ध को समाप्त कराने में पूरी तरह असफल रहे हैं और अपने देश की आंतरिक समस्याओं जैसे आव्रजन और ऊर्जा संकट को संभालने में भी कमजोर साबित हुए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान के परमाणु खतरे को खत्म करने के लिए अमेरिका जो प्रयास कर रहा है, उसमें जर्मनी को बाधा नहीं बनना चाहिए।</div><div><br></div><div>इस बयान से पहले मर्ज़ ने भी अमेरिका की आलोचना करते हुए कहा था कि ईरान के साथ चल रही बातचीत में अमेरिका अपमानित हो रहा है और उसके पास युद्ध से बाहर निकलने की कोई स्पष्ट रणनीति नहीं है। यही टिप्पणी ट्रंप को काफी नागवार गुजरी और उन्होंने तीखी प्रतिक्रिया दी।</div><div><br></div><div>तनाव तब और बढ गया जब ट्रंप ने जर्मनी में तैनात अमेरिकी सैनिकों की संख्या कम करने की संभावना जताई। हम आपको बता दें कि वर्तमान में जर्मनी में लगभग 36 हजार से 39 हजार अमेरिकी सैनिक तैनात हैं, जिनमें से अधिकतर स्टुटगार्ट और रामस्टाइन जैसे प्रमुख सैन्य ठिकानों पर मौजूद हैं। शीत युद्ध के समय की तुलना में यह संख्या पहले ही काफी कम हो चुकी है। हालांकि जर्मनी ने इस स्थिति को शांत करने की कोशिश की। जर्मनी के विदेश मंत्री जोहान डेविड वाडेफुल ने कहा कि अमेरिका द्वारा सैनिकों की तैनाती में बदलाव की बात कोई नई नहीं है। उन्होंने याद दिलाया कि बराक ओबामा, जो बाइडन और बिल क्लिंटन के समय में भी इस तरह की चर्चाएं होती रही हैं। उन्होंने कहा कि जर्मनी इस स्थिति के लिए तैयार है और नाटो ढांचे के भीतर अमेरिका के साथ संवाद जारी है।</div><div><br></div><div>उधर, मर्ज़ ने भी बाद में अपने रुख को कुछ नरम करते हुए नाटो और अमेरिका के साथ मजबूत संबंधों की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि जर्मनी एक भरोसेमंद पार अटलांटिक साझेदारी में विश्वास करता है और मध्य पूर्व संकट का समाधान भी नाटो के नेतृत्व में ही संभव है। उन्होंने ईरान की आलोचना करते हुए कहा कि वह शांति वार्ता में भाग लेने से बच रहा है।</div><div><br></div><div>दूसरी ओर, विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद केवल व्यक्तिगत बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरे रणनीतिक मतभेद छिपे हैं। जर्मन मार्शल फंड की विशेषज्ञ क्लॉडिया मेजर के अनुसार ट्रंप पहले भी सैन्य ठिकानों को दबाव के साधन के रूप में इस्तेमाल करते रहे हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिका से आने वाले संदेश यूरोप के लिए अस्थिरता पैदा करने वाले हैं और इससे यह सवाल उठता है कि अमेरिका कितना भरोसेमंद साझेदार बना रहेगा।</div><div><br></div><div>जर्मनी के रक्षा विशेषज्ञ रोडरिच कीसवेटर ने भी लोगों को अधिक प्रतिक्रिया नहीं देने की सलाह दी है। उन्होंने कहा है कि सैनिकों की संख्या में बदलाव की घोषणा पहले भी की जा चुकी है और यह कोई चौंकाने वाली बात नहीं है। उन्होंने कहा कि जर्मनी में मौजूद अमेरिकी ठिकाने केवल जर्मनी की सुरक्षा के लिए नहीं बल्कि अमेरिका की वैश्विक रणनीति के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण हैं। वहीं सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता क्रिस्टोफ़ वॉन श्मिड ने कहा कि अल्पकाल में अमेरिकी सैनिकों की वापसी संभव नहीं है और ऐसा कदम अमेरिका की वैश्विक सैन्य क्षमता को कमजोर कर देगा।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो इस पूरे घटनाक्रम के पीछे एक और महत्वपूर्ण पहलू जर्मनी की आंतरिक राजनीति भी है। दरअसल मर्ज़ को अपने देश में भी दबाव का सामना करना पड़ रहा है, जहां ईरान युद्ध और ट्रंप की नीतियों को लेकर जनता में असंतोष है। ऐसे में मर्ज़ को एक संतुलन बनाना पड़ रहा है ताकि वह अमेरिका से संबंध भी बनाए रखें और घरेलू आलोचना का जवाब भी दे सकें। ट्रंप और मर्ज़ के संबंध पहले काफी अच्छे माने जाते थे। मार्च में व्हाइट हाउस में हुई मुलाकात के दौरान ट्रंप ने मर्ज़ को मित्र बताया था और उनके काम की सराहना की थी। लेकिन हाल के घटनाक्रम ने इस मित्रता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।</div><div><br></div><div>इस बीच, यूरोप के अन्य नेताओं के साथ भी ट्रंप के संबंधों में तनाव देखा गया है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर और स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज़ के साथ भी ईरान युद्ध को लेकर मतभेद सामने आए थे, हालांकि ट्रंप ने अपने कई कड़े कदमों को अंततः लागू नहीं किया। विश्लेषकों का मानना है कि जर्मनी धीरे-धीरे अमेरिका पर अपनी निर्भरता कम करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, लेकिन अभी भी उसे अमेरिकी सैन्य और खुफिया सहयोग की आवश्यकता बनी हुई है। ऐसे में यह विवाद दोनों देशों के लिए एक परीक्षा की तरह है, जहां उन्हें अपने संबंधों को संतुलित रखना होगा।</div><div><br></div><div>बहरहाल, यह विवाद केवल बयानबाजी का मामला नहीं है, बल्कि यह वैश्विक शक्ति संतुलन, नाटो की भूमिका और यूरोप की रणनीतिक स्वतंत्रता जैसे महत्वपूर्ण सवालों को भी सामने लाता है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह तनाव और बढ़ता है या फिर दोनों पक्ष अपने मतभेदों को सुलझाने में सफल होते हैं।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 01 May 2026 18:09:35 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/donald-trump-now-attacks-friedrich-merz-a-major-rift-in-us-germany-relations</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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