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    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
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      <title><![CDATA[जन अपेक्षाओं पर खरे उतरने की एक मुख्यमंत्री की सकारात्मक पहल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/a-chief-minister-positive-initiative-to-live-up-to-public-expectations]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>समूचा उत्तरी भारत भीषण गर्मी की चपेट में चल रहा है तो दूसरी और ना तो राजस्थान में कोई आसन्न विधानसभा या लोकसभा के चुनाव है और ना ही कोई ऐसी आपात् स्थिति जिसमें जनता से सीधा संवाद कायम करना आवश्यक हो, ऐसी स्थिति में ही एक संवेदनशील मुख्यमंत्री के नाते राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा गावों में चौपाल आयोजित कर सीधे ग्रामीणों से रुबरु हो रहे हैं, यह वास्तव में जननेता की पहचान व उसकी आमजन के प्रति सोच का परिणाम है। 40 डिग्री से अधिक के तापमान में मुख्यमंत्री की रात्रि चौपाल और फिर रात्रि विश्राम आज के सुविधाभोगी युग में लगभग असंभव लग रहा है पर राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा इस लपलपाती गर्मी में गांवों में रात्रि चौपालों के माध्यम से ग्रामीणों से संवाद कायम कर रहे हैं। 5 मई से 16 मई तक राजधानी जयपुर ही नहीं अपितु दूरदराज के इलाकों के गांवों में पांच चौपाल आयोजित कर ग्रामीणों से सीधा संवाद कायम करने के साथ ही रात को उसी गांव के सरकारी स्कूल में रात्रि विश्राम और फिर सुबह गांव में ही प्रातःकालीन भ्रमण के माध्यम से गांववासियों से आत्मीय संवाद कायम कर रहे हैं। मई माह में मुख्यमंत्री 5 से 16 मई के दौरान प्रतापगढ़ के बम्बोरी, सीकर के जाजोर, अजमेर के पुष्कर के पास कड़ेल, जालौर के पंसेरी और जयपुर के ठिकरिया में ग्राम विकास चौपाल में ग्रामीणों के बीच बैठकर उनसे रुबरु हो चुके हैं। 20 मई को बांसवाड़ा के चुड़ावा और 21 मई को धुम्बाला को ग्रामीण चौपाल और गांव की सरकारी स्कूल में रात्रि विश्राम कर रहे हैं। यह गांव कोई राजधानी जयपुर के पास के नहीं है अपितु प्रदेश के दूरदराज के गांव है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा समय निकाल कर इन गांवों में रात्रि चौपाल में ग्रामवासियों की परिवेदनाओं को सुनते हैं, यथा सभव मौके पर ही समाधान करने का प्रयास करते हैं और रात्रि को भोजन भी गांव के ही किसी ग्रामवासी के घर बिना किसी तामझाम के करते हुए देखा जा सकता है। इसके साथ ही खासबात यह है कि इस भीषण गर्मी के दौर में गांव के स्कूल में ही रात्रि को विश्राम करने के साथ ही प्रातःकालीन भ्रमण के दौरान गांववासियों से अपनत्व के साथ मेलमिलाप कर रहे हैं। यह धरातलीय हालातों को समझने, लोगों से सीधे बातचीत कर उनकी समस्याओं, आवश्यकताओं की जानकारी लेने, स्थानीय समस्याओं को समझने और उनके निराकरण का बेहतरीन माध्यम होने के साथ ही मुख्यमंत्री को अपने बीच पाकर ग्रामवासियों में जिस तरह का संदेश जाता हे उसे हम भलीभांति समझ सकते हैं। क्योंकि आज के हालातों में मुख्यमंत्री तो दूर की बात जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों से मिलना भी इतना आसान नहीं होता। फिर सबसे बड़ी बात यह कि मुख्यमंत्री मतलब सरकार आपके बीच आती है तो फिर उसके परिणाम निश्चित रुप से सकारात्मक होते हैं और धरातलीय हालातों को समझने का बेहतर अवसर आसानी से मिल जाता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की यह पहल सीधा ग्रामीणों से रुबरु होने का सशक्त माध्यम बनता जा रहा है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की ही माने तो इससे गांवों की समस्याओं से रुबरु होने का अवसर मिलता है तो आवश्यक निर्देश मौके पर ही जारी होने से समस्याओं का समाधान भी मौके पर ही हो पाता है। इसके माध्यम से सरकारी योजनाओं व कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के साथ ही स्थानीय समस्याओं यथा पानी, बिजली, स्कूल, स्वास्थ्य, सड़क और इसी तरह की सुविधाओं के धरातल पर हालात को समझने का अवसर मिल जाता है। मौके पर ही समस्याओं के समाधान को इस तरह से भी समझा जा सकता है कि सीकर के जाजोद गांव में ग्रामीण चौपाल के दौरान छात्राओं की मांग पर एक रात में विद्यालय में विज्ञान संकाय खोलने के आदेश जारी हो गए। यही नहीं अजमेर के कड़ेल गांव में ग्रामीणों से चर्चा के दौरान सामने आया तो प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में क्रमोन्नयन के आदेश मुख्यमंत्री के निर्देश पर तत्काल जारी हो गए। यह तो उदाहरण मात्र है पर इससे साफ संदेश जाता है कि ग्रामीण विकास चौपाल कोई दिखावा या औपचारिकता ना होकर ग्रामीणों व आमजन को सीधे राहत पहुंचाने वाली पहल है। निश्चित रुप से यह सराहनीय पहल मानी जानी चाहिए।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/understand-the-life-threatening-side-effects-of-the-heat-in-india" target="_blank">भारत में जानलेवा हुई गर्मी के साइड इफेक्ट्स समझिए, इसके कारण और बचाव के उपाय जानिए</a></h3><div>एक खास बात यह है कि मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की यात्रा में जहां काफिले को सीमित किया गया हैं वहीं दौरों के दौरान ईवी वाहन का उपयोग कर ईंधन बचत पर जोर दिया जा रहा सरकारी स्कूल में ही रात्रि विश्राम से गांववासियों और आमजन में एक अपनेपन का संदेश जा रहा है। लगता है जैसे मुख्यमंत्री अपनो के बीच अपनेपन के साथ मिल रहे हैं, अपनी बात कह रहे हैं, उनकी बात सुन रहे हैं और आवश्यकता के अनुसार समाधान भी कर रहे हैं। इसके साथ ही स्थानीय सरकारी मशीनरी मुख्यमंत्री की रात्रि चौपाल को देखते हुए एक्टिव मोड पर आ जाती है और इसका परिणाम यह होता है कि बहुत सी समस्याओं का समाधान तो मुख्यमंत्री की रात्रि चौपाल से पहले ही हो जाता है। मुख्यमंत्री के दौरे और फिर रात्रि चौपाल की हो तो फिर किसी एक विभाग तक बात सीमित ना रहकर सभी आधारभूत सुविधाओं और समस्याओं के समाधान की हो जाती है और निश्चित रुप से समस्याओं का समाधान होता भी है। इस सबसे अलग ग्राम विकास चौपाल के माध्यम से मुख्यमंत्री और सरकार को लोगों की भावनाओं, क्षेत्र विशेष की समस्याओें, आवश्यकताओं को समझने का अवसर मिलता है वहीं स्थानीय प्रशासन, कानून व्यवस्था आदि का भी चर्चा से फीड बैक मिल जाता है। यह तो सभी जानते हैं कि सभी गांवों में मुख्यमंत्री की ग्रामीण चौपाल नहीं हो सकती पर ग्रामीण चौपाल के माध्यम से संवेदनषील सरकार का संदेश आमजन में जा रहा है। सबसे बड़ी बात यह कि विकसित राजस्थान का सपना पूरा करने में यह ग्रामीण विकास चौपाल अहम् भूमिका निभाएगी ही साथ ही सरकार की भावी योजनाएं करते समय फील्ड का यह व्यावहारिक अनुभव निश्चित रुप से कागजी नहीं रह पायेगा और इससे व्यावहारिक योजनाएं बनने के साथ ही विकास को नई गति मिल सकेगी। यह साफ हो जाना चाहिए कि यह किसी मुख्यमंत्री या राजनेता के महिमा मंडन का प्रयास ना होकर एक राजनेता से आमजन की अपेक्षाओं पर खरा उतरने व आमजन के प्रति सीधे संवाद और जनभावना को समझने का बेहतरीन प्रयास माना जाना चाहिए। आज आमजन अपने जनप्रतिनिधि व मुख्यमंत्री से यही अपेक्षा रखती है कि वहां तक आमजन की सहज पहुंच हो सके। राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की इस पहल की सराहना की जानी चाहिए और संभव हो तो अन्य प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों व जनप्रतिनिधियों को भी इस दिशा में पहल करनी चाहिए।&nbsp;</div><div><br></div><div>- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 23 May 2026 18:27:30 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/a-chief-minister-positive-initiative-to-live-up-to-public-expectations</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[भारत में जानलेवा हुई गर्मी के साइड इफेक्ट्स समझिए, इसके कारण और बचाव के उपाय जानिए]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/understand-the-life-threatening-side-effects-of-the-heat-in-india]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हमारे देश का राजनीतिक तापमान तो वर्षपर्यंत उच्च रहता आया है और चुनावी इलाकों में इसके वैचारिक हीट स्ट्रोक से सिस्टम का झुलसना स्वाभाविक माना जाता है। लेकिन जब मई-जून के महीने में मौसमी तापमान जानलेवा स्तर तक खतरनाक रूप से चढ़ता जाता है तो लोग बाग परेशान हो उठते हैं। फिर अपनी राजनीतिक, प्रशासनिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक गलतियों पर पछतावा के अलावा कुछ नहीं मिलता, क्योंकि विकास के नाम पर आधुनिक भारतीय सभ्यता विनाश की ओर बढ़ती चली जा रही है और पश्चिमी शिक्षा प्राप्त हमारे हुक्मरान तमाशबीन बने बैठे हैं, क्योंकि हरेक आपदा को अवसरों में बदलकर&nbsp; अपनी कमाई बढ़ाने का धंधा उन्होंने सीख लिया है। बेशक अपवाद भी होंगे, लेकिन अल्पमत में, जिनकी लोकतंत्र में कम कद्र होती आई है।</div><div><br></div><div>वहीं, भारत में बढ़ती खतरनाक गर्मी केवल “मौसमी बदलाव” नहीं है, बल्कि जलवायु परिवर्तन, तेजी से शहरीकरण, जंगलों की कटाई और प्रदूषण का संयुक्त परिणाम बन चुकी है। हाल के वर्षों में उत्तर भारत, महाराष्ट्र, गुजरात और मध्य भारत में 46°C–48°C तक तापमान दर्ज हुआ है।&nbsp; मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, देश का एक बड़ा हिस्सा इस समय भट्ठी बना हुआ है। हमारे शहर हीट आइलैंड में तब्दील होते जा रहे हैं। उत्तर भारत से लेकर मध्य भारत तक, ज्यादातर शहरों में औसत तापमान सामान्य से 3-5 डिग्री सेल्सियस ऊपर चल रहा है। कहीं कहीं तो पिछले 14-15 वर्षों के रिकॉर्ड टूट चुके हैं। कोढ़ में खाज यह कि फिलहाल राहत के संकेत नहीं है, क्योंकि अल-नीनो की वजह से मौसम आगे और कड़ी परीक्षा ले सकता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/severe-heatwave-increases-the-risk-of-heat-stroke-with-intense-heat-even-at-night" target="_blank">देशभर में आग उगल रहा आसमान, Severe Heatwave ने बढ़ाया Heat Stroke का खतरा, रात में भी पड़ रही भयंकर गर्मी, जीना हुआ मुहाल</a></h3><div>अलबत्ता आप मानें या न मानें, लेकिन गर्मी की बढ़ती प्रवृति में भविष्य के लिए सबसे बड़ा संदेश छिपा हुआ है। वह यह कि यदि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन नहीं बनाया गया तो भारत में गर्मी केवल असुविधा नहीं बल्कि “राष्ट्रीय स्वास्थ्य और आर्थिक संकट” बन सकती है। लिहाजा, आने वाले वर्षों में जल संरक्षण, हरित विकास और स्वच्छ ऊर्जा ही सबसे बड़े समाधान होंगे।&nbsp;</div><div><br></div><div>विभिन्न अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स के अनुसार, इस सीजन 27 अप्रैल और 19 मई दो ऐसे दिन रहे, जब धरती के सबसे ज्यादा गर्म 50 शहरों में सभी भारत के थे। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्ट हमें चेताती है कि देश के 50% से ज्यादा शहरों में भीषण गर्मी का खतरा 'अधिक' से लेकर 'बेहद अधिक' के स्तर तक पहुंच चुका है। और तो और, साल 2015 से 2020 के दरम्यान लू वाले दिनों का औसत 7.4 दिन से बढ़कर 32.2 दिन हो गया है, और यह लगातार बढ़ रहा है। इसका गहरा दुष्प्रभाव हमारी सेहत और अर्थव्यवस्था दोनों पर पड़ने के आसार प्रबल हैं।</div><div><br></div><div>हमारे शहरों पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं, क्योंकि वो अंधाधुंध विकास की होड़ में अपनी हरियाली उजाड़कर उन्हें कंक्रीट के जंगलों में तब्दील करते जा रहे हैं। लिहाजा, भारत में गर्मी अब हर साल एक नया रेकॉर्ड बना रही है। चिंताजनक बात यह है कि दिन तो तपते ही हैं, अब रातें भी तपने लगी हैं और राहत देने वाली नहीं रहीं। इस 20 मई को दिल्ली ने मई महीने में 13 साल की सबसे गर्म रात देखी, जब न्यूनतम तापमान सामान्य से 5.2 डिग्री सेल्सियस ऊपर रहा। 21 मई को स्थिति उससे भी ज्यादा बुरी हुई।इस प्रकार से हाल के बरसों में हीटवेव की तीव्रता, उसका समय और सीमा अभूतपूर्व रूप से बढ़े हैं। इससे शहरों पर संकट ज्यादा है, जो घटती हरियाली, बढ़ते कंक्रीट स्ट्रक्चर और प्रदूषण की वजह से अर्बन हीट आईलैंड इफेक्ट' झेल रहे हैं।</div><div><br></div><div>इससे हमारे कामकाज पर भी नकारात्मक असर पड़ चुका है, क्योंकि मौसम की यह मार दोतरफा है- सेहत और अर्थव्यवस्था दोनों पर पड़ चुकी है। नैशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल के मुताबिक, 2025 में हीट स्ट्रोक के सात हजार से ज्यादा सस्पेक्टेड केस सामने आए थे। हालांकि माना जाता है कि भारत में हीट स्ट्रोक और उससे होने वाली मौतों का सही आंकड़ा रिपोर्ट नहीं हो पाता। क्योंकि देश की एक बड़ी आबादी मौसम का सीधा वार झेलती रहती है। इनमें गिग वर्कर्स, दिहाड़ी मजदूर, स्ट्रीट वेंडर्स वगैरह भी शामिल हैं। चूंकि घर बैठने से न इनका काम चलेगा और न अपने देश का। लिहाजा इस मौसम में ये सबसे ज्यादा जोखिम में ये लोग ही होते हैं। किसान और मजदूर भी इन्हीं जैसे होते हैं। ऐसे में इनकी सुरक्षा के लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए जा सकते है, जैसे सार्वजनिक शेल्टर, पेयजल की व्यवस्था और जहां संभव हो वहां काम के घंटों और चरित्र में बदलाव। इसे गंभीर चेतावनी के रूप में लिया जा सकता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>चूंकि बढ़ती हुई गर्मी से हमारी आपकी कार्यक्षमता पर सीधा असर पड़ता है, काम के घंटे कम होते हैं और प्रॉडक्टिविटी भी घट जाती है। लिहाजा यह बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह है। एक आकलन के मुताबिक, यदि यही हाल रहा तो 2030 तक गर्मी की वजह से भारत की जीडीपी का 4.5 प्रतिशत प्रभावित होगा। ये सारे आंकड़े एक गंभीर चेतावनी हैं। चूंकि क्लाइमेट चेंज की वजह से मौसम के और बिगड़ने की आशंका है, इसलिए बेहतर रहेगा अगर हमलोग अपनी तैयारी पहले से कर लें।</div><div><br></div><h2># भारत में खतरनाक गर्मी बढ़ने के प्रमुख कारण जानिए</h2><div>भारत में खतरनाक गर्मी बढ़ने के प्रमुख कारण इस प्रकार हैं- पहला, जलवायु परिवर्तन: धरती का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है। वैज्ञानिक रिपोर्टों के अनुसार मानव गतिविधियों से पैदा हुई ग्लोबल वार्मिंग ने भारत में हीटवेव को अधिक लंबा और तीव्र बना दिया है। दूसरा,&nbsp;&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">जंगलों की कटाई: पेड़ प्राकृतिक “कूलिंग सिस्टम” होते हैं। लिहाजा बड़े पैमाने पर वनों की कटाई से नमी कम हो रही है, वर्षा चक्र प्रभावित हो रहा है, जमीन अधिक गर्म हो रही है। तीसरा, शहरी हीट आइलैंड प्रभाव :कंक्रीट, डामर, वाहन, एसी और उद्योग शहरों को “हीट ट्रैप” बना रहे हैं। शहर रात में भी गर्म बने रहते हैं। चौथा, प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैसें: कोयला, पेट्रोल-डीजल, फैक्ट्रियों और वाहनों से निकलने वाली गैसें वातावरण में गर्मी रोकती हैं। पांचवां, कमजोर मानसून और एल-नीनो: एल-नीनो जैसी वैश्विक मौसमी घटनाएँ भारत में सूखा और गर्म हवाएँ बढ़ाती हैं। छठा, भूजल की कमी और सूखी जमीन जब मिट्टी में नमी कम होती है तो धरती तेजी से गर्म होती है। इससे लू और अधिक खतरनाक हो जाती है। सातवां, अनियोजित विकास: खुले मैदान कम होना, झीलों और तालाबों का खत्म होना, अत्यधिक कंक्रीट निर्माण इनसे स्थानीय तापमान तेजी से बढ़ रहा है।</span></div><div><br></div><h2># गर्मी से होने वाले खतरे को समझिए</h2><div>गर्मी से होने वाले खतरे निम्नलिखित हैं:- हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन, हार्ट और बीपी की समस्या, बच्चों और बुजुर्गों में मृत्यु जोखिम, फसल नुकसान, बिजली और पानी संकट श्रमिकों की कार्यक्षमता में कमी, भारत में हीटवेव से स्वास्थ्य संकट तेजी से बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।</div><div>&nbsp;</div><h2># ये हैं व्यक्तिगत स्तर पर बचने के प्रमुख निदान&nbsp;</h2><div>व्यक्तिगत स्तर पर बचने के प्रमुख निदान इस प्रकार हैं- पहला, दोपहर में बाहर निकलने से बचें, विशेषकर 12 बजे से 4 बजे तक। दूसरा, पर्याप्त पानी पिएँ, ओआरएस, नींबू पानी, छाछ, नारियल पानी। तीसरा, हल्के सूती कपड़े पहनें, गहरे रंग और टाइट कपड़ों से बचें। चौथा, शरीर को ठंडा रखें, सिर ढकें, छाता प्रयोग करें, गीला कपड़ा रखें। पांचवां, बच्चों और बुजुर्गों का विशेष ध्यान, उन्हें बंद और गर्म कमरों में न रखें।</div><div><br></div><h2># हमें सामाजिक और सरकारी स्तर पर निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए</h2><div>सामाजिक और सरकारी स्तर पर निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए- पहला, बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण- यह सबसे सस्ता और प्रभावी उपाय है। दूसरा, तालाब और जलस्रोत बचाना: स्थानीय तापमान कम करने में मदद मिलती है। तीसरा, “कूल रूफ” अभियान: सफेद या परावर्तक छतें घरों को ठंडा रखती हैं। चौथा, शहरों में हरित क्षेत्र बढ़ाना: पार्क ग्रीन कॉरिडोर, छायादार सड़कें। पांचवां, प्रदूषण नियंत्रण:&nbsp; स्वच्छ ऊर्जा और इलेक्ट्रिक परिवहन को बढ़ावा देना। छठा, हीट एक्शन प्लान: कई शहर अब हीट अलर्ट, कूलिंग सेंटर और स्वास्थ्य सुविधाएँ बढ़ा रहे हैं।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 22 May 2026 18:07:06 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/understand-the-life-threatening-side-effects-of-the-heat-in-india</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[बिहार की राजनीति के वर्तमान व भविष्य की 'सियासी धुरी' बन चुके हैं सीएम सम्राट चौधरी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/samrat-chaudhary-has-emerged-as-political-axis-of-both-the-present-and-future-of-bihar-politics]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बिहार की राजनीति में जुझारू युवा मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को केवल सुलझते हुए वर्तमान का एक नेता ही नहीं, बल्कि “भविष्य की राजनीतिक धुरी” के रूप में देखने वालों की संख्या पिछले 5 वर्षों में तेजी से बढ़ती ही जा रही है और यह सिलसिला निरंतर आगे भी चलता रहेगा। ऐसा इसलिए कि उनके पीछे कई राजनीतिक, सामाजिक और संगठनात्मक कारण सक्रिय हैं, जो उन्हें राजनीतिक रूप से अजेय बनाते हैं। आइए इन्हें समझते हैं विस्तार से-&nbsp;</div><div><br></div><div>पहला, बिहार में भाजपा के भीष्म पितामह कैलाशपति मिश्रा के संजोए हुए सपनों को पूरा करते हुए पार्टी के&nbsp; पहले मुख्यमंत्री बनने का ऐतिहासिक महत्व है। निःसन्देह साल 2026 में सम्राट चौधरी का बिहार का मुख्यमंत्री बनना भाजपा के लिए ऐतिहासिक मोड़ माना गया, क्योंकि पहली बार बिहार में भाजपा ने मुख्यमंत्री पद अपने हाथ में लिया। इससे प्रदेशवासियों में&nbsp; यह संदेश गया कि भाजपा अब बिहार में “जूनियर पार्टनर” नहीं रहना चाहती बल्कि पार्टी ने बिहार में अपना सूझबूझ युक्त स्वतंत्र नेतृत्व स्थापित कर दिया।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/prashant-kishor-has-a-new-destination-will-he-now-formulate-his-next-strategy-from-patna-ashram" target="_blank">Bihar में Jan Suraj की हार के बाद Prashant Kishor का नया ठिकाना, अब Patna आश्रम से बनाएंगे अगली रणनीति?</a></h3><div>पार्टी मामलों के जानकारों की मानें तो अब सम्राट चौधरी को केवल अंतरिम चेहरा नहीं, बल्कि दीर्घकालिक नेतृत्व के मोहरे के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, जो ओबीसी सियासत के लिए सौभाग्य की बात है। चूंकि उनमें सामाजिक न्याय के सूत्रधार लालू प्रसाद वाली हाजिर जवाबी, सुशासन बाबू नीतीश कुमार वाली सियासी चतुराई के अलावा सद्भावी कैलाशपति मिश्रा वाली सूझबूझ भी भरी हुई है जिससे हरेक जाति-धर्म के लोगों में उनकी स्वीकार्यता दिनप्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है।</div><div><br></div><div>दूसरा, सामाजिक समीकरणों में मजबूत पकड़: बिहार की राजनीति के भाजपाई नव चाणक्य सम्राट चौधरी का सबसे बड़ा राजनीतिक बल उनका व्यापक सामाजिक आधार माना जाता है। चूंकि वे पिछड़े वर्ग, विशेषकर कुशवाहा-कोइरी यानी लव कुश समाज या त्रिवेणी संघ से आते हैं, जो बिहार की राजनीति में निर्णायक प्रभाव रखता है। इससे भाजपा को लालू प्रसाद/नीतीश कुमार के सामाजिक न्याय के बीच यादव बनाम गैर-यादव ओबीसी राजनीति में बढ़त मिली ही, साथ ही ग्रामीण वोटबैंक में विस्तार आया, और मंडल राजनीति का नया जवाब देने का अवसर मिला।</div><div><br></div><div>चूंकि भाजपा लंबे समय से बिहार में एक ऐसा चेहरा खोज रही थी जो हिंदुत्व, ओबीसी राजनीति, और संगठनात्मक निष्ठा तीनों को एक साथ लेकर चल सके। लिहाजा सम्राट चौधरी उस समीकरण में फिट बैठते दिखे। उनकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि राजपूत, भूमिहार, ब्राह्मण, वैश्य, दलितों के साथ-साथ प्रगतिशील यादवों पर भी पूरी पकड़ है, जिसका फायदा भाजपा नीत एनडीए को बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में उन्होंने दिलवाया और पुरस्कार स्वरूप पहले गृहमंत्री, फिर मुख्यमंत्री बने।</div><div><br></div><div>तीसरा, व्यवहारिक आक्रामक भरा लेकिन नियंत्रित राजनीतिक शैली: राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि सम्राट चौधरी की राजनीति, तेजस्वी यादव की तरह ही पलटवारी आक्रामक, लेकिन संगठन के प्रति अनुशासित मानी जाती है। वे सड़क से लेकर सदन तक मुखर सियासी शैली अपनाते रहे हैं। इससे भाजपा कार्यकर्ताओं में ऊर्जा पैदा हुई। भाजपा नेतृत्व अक्सर ऐसे नेताओं को आगे बढ़ाता है जो जनसभाओं में भीड़ खींच सकें, विपक्ष पर हमला कर सकें, और संगठन के प्रति पूर्ण निष्ठावान रहें। ये सभी गुण सम्राट चौधरी में कूट कूट कर भरे हुए हैं। इसलिए उनका सियासी उदय पूर्वी भारत की राजनीति में अहम मायने रखती है।</div><div><br></div><div>चौथा, दिल्ली नेतृत्व का भरोसा: भाजपा के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की राजनीति में “विश्वसनीय नेतृत्व” बहुत महत्व रखता है। चूंकि सम्राट चौधरी इन कसौटियों पर भी खरे उतरते हैं, इसलिए उनपर सबका भरोसा बढ़ा है। वाकई सम्राट चौधरी जमीनी संगठन से निकले नेता हैं, जो भाजपा की स्थापित लाइन से थोड़ा-सा भी विचलित नहीं होते, और गठबंधन राजनीति को भी संभालने की क्षमता रखते हैं। यही कारण है कि बिहार में नेतृत्व परिवर्तन के समय उनके नाम पर सहमति बनी। इससे भाजपा की सूबाई राजनीति को एक नई धार मिली है।</div><div><br></div><div>पांचवां, सूबाई चाणक्य नीतीश युग के बाद की राजनीति का केंद्र बना सम्राट युग: बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लंबे राजनीतिक दौर के बाद बिहार में नेतृत्व का संक्रमण होना तय माना जा रहा था। ऐसे विचित्र समय में भी भाजपा ने युवा, ओबीसी, और आक्रामक राजनीतिक छवि वाले नेता के रूप में सम्राट चौधरी को आगे बढ़ाकर भविष्य की राजनीति का संकेत दे दिया है। इसका उद्देश्य केवल सरकार चलाना नहीं, बल्कि अगले 10–15 वर्षों का राष्ट्रवादी राजनीतिक आधार तैयार करना भी माना जा रहा है। पार्टी की इस रणनीति को अमलीजामा पहनाने के प्रति सम्राट चौधरी ने भी प्रतिबद्धता दिखाई है।</div><div><br></div><div>छठा, सत्ताप्रतिष्ठान की राह में चुनौतियाँ भी कम नहीं:&nbsp;&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">हालाँकि सम्राट चौधरी के सामने कतिपय बड़ी चुनौतियाँ हैं, जिसमें बेरोजगारी, पलायन, कानून व्यवस्था, शिक्षा और स्वास्थ्य, जातीय संतुलन, और गठबंधन राजनीति के प्रबंधन में सम्राट चौधरी निरंतर सधी चाल चल रहे हैं और अहम फैसले ले रहे हैं। इससे बिहार वासियों के दिलोदिमाग पर सकारात्मक असर पड़ा है। भले ही सियासी ईर्ष्यावश विपक्ष लगातार उनकी सरकार को अपराध और प्रशासनिक मुद्दों पर घेर रहा है। लेकिन सम्राट चौधरी लगातार विकास,</span></div><div>रोजगार, और प्रशासनिक सुधार पर ठोस परिणाम देते ।नजर आते हैं, इसलिए सूबे में “भविष्य के नेता” वाली उनकी छवि स्थायी बनती जा रही है।&nbsp;</div><div><br></div><div>सातवां, बिहार की नई राजनीतिक कथा के अहम सूत्रधार और नेतृत्वकर्ता: सम्राट चौधरी का उदय केवल व्यक्ति विशेष का उत्थान नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति में तीन बड़े परिवर्तनों का संकेत माना जा रहा है: पहला, भाजपा का स्वतंत्र प्रभुत्व, दूसरा, ओबीसी नेतृत्व का नया संस्करण, और तीसरा, पोस्ट-नीतीश युग की शुरुआत। चूंकि इस नई राजनीतिक कथा के अहम सूत्रधार और नेतृत्वकर्ता खुद सम्राट चौधरी ही हैं, इसीलिए समर्थक उन्हें “बिहार का वर्तमान और भविष्य” दोनों कह रहे हैं। उनकी तमाम कोशिशें भी इसी ओर इंगित करती दिखाई देती हैं। इसलिए हर ओर उल्लास की स्थिति देखी जा रही है।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 21 May 2026 19:33:10 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/samrat-chaudhary-has-emerged-as-political-axis-of-both-the-present-and-future-of-bihar-politics</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[उर्वरक उपयोग में 50 प्रतिशत कमी से खेती-किसानी में आएगा क्रान्तिकारी बदलाव ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/50-percent-reduction-in-fertilizer-usage-will-bring-about-revolutionary-transformation-agriculture]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा पिछले दिनों देशवासियों से किये गए सात आग्रहों में से एक आग्रह रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में 50 प्रतिशत तक कमी लाने का आग्रह है। इसमें कोई दो राय नहीं कि रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुध उपयोग के दुष्परिणामों को लेकर गत कई सालों से गंभीर आग्रह किये जा रहे हैं। प्रति हैक्टेयर कृषि उत्पादन सेचुरेशन स्तर पर पहुंच गया है तो मिट्टी की उर्वरा शक्ति को नुकसान पहुंच रहा है, मिट्टी और जल प्रदूषण उच्च स्तर पर पहुंच गया है तो रासायनिक उर्वरकों व कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से केंसर जैसी बीमारियों का दायरा बहुत अधिक बढ़ गया है। होना तो यहां तक लग गया है कि अत्यधिक खाद्यान्न उत्पादन वाले किसान और प्रदेश अपने दैनिक उपभोग के लिए जैविक खाद्यान्न या अन्य प्रदेशों के खाद्यान्न के उपयोग पर जोर देने लगे हैं। इसके साथ ही यह भी एक तथ्य है कि देश में लाख प्रयासों के बावजूद रासायनिक उर्वरकों का आयात लगातार बढ़ता जा रहा है। विदेशों से 979 अरब अमेरिकी डॉलर के निर्यात में से ईंधन के बाद बहुत अधिक आयात राशि उर्वरकों पर भी व्यय होती है। देश में करीब 600 लाख टन उर्वरकों की खपत है तो 2030 तक 700 से 800 लाख टन तक पहुंचने की संभावना व्यक्त की जा रही है। तस्वीर का एक पक्ष यह है कि रासायनिक उर्वरकों में देश की मांग के शत-प्रतिशत पोटाश की विदेषों से आयात पर निर्भरता है तो फास्फेट के तकरीबन 90 प्रतिशत और यूरिया के करीब 25 प्रतिशत तक आयात पर निर्भरता है। मजे की बात यह भी है कि यूरिया की आयात निर्भरता तो करीब 25 प्रतिशत तक है पर यूरिया उत्पादन के लिए काम में आने वाली प्राकृतिक गैस की जरुरत करीब 80 प्रतिशत तक विदेशों से आयात से ही संभव हो पाती है। एक मोटे अनुमान के अनुसार रासायनिक उर्वरकों पर दो लाख करोड़ के आसपास अनुदान राषि दी जा रही है।&nbsp;</div><div><br></div><div>प्रधानमत्री नरेन्द्र मोदी ने रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में 50 प्रतिशत तक कटौती का आग्रह किया है। रासायनिक उर्वरकों के उपयोग को सीमित करने के लिए जहां एक और जैविक खेती के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया जा रहा है वहीं पीएम प्रणाम योजना में राज्यों को प्रोत्साहित करने की व्यवस्था है। प्रधानमंत्री का आग्रह है कि 10 प्रतिशत फर्मेंटेड खाद का उपयोग बढ़ाकर किसान बड़ा सहयोग दे सकते हैं। जून 2023 में रासायनिक उर्वरकों के उपयोग को सीमित करने को प्रोत्साहित करने के लिए केन्द्र सरकार ने प्रोत्साहन योजना लागू की है। योजना के अनुसार रासायनिक उर्वरकों के तीन साल के औसत उपयोग से खपत कम करने पर अनुदान के रुप में बचाई गई राशि की 50 प्रतिशत राशि राज्य सरकारों को प्रोत्साहन के रुप में देने की व्यवस्था की गई है। इसमें से 70 प्रतिशत राशि गांवों में वैकल्पिक उर्वरक यानी जैविक खाद&nbsp; उत्पादन व तकनीक के विस्तार पर व्यय करने पर जोर दिया जा रहा है वहीं 30 प्रतिशत राशि रासायनिक उर्वरकों की खपत करने के लिए काश्तकारों को जागरुक करने, अवेयरनेस कार्यक्रम चलाने आदि पर व्यय करने का प्रावधान है। विषेषज्ञों का मानना है कि फर्मेंटेड खाद के उपयोग से रासायनिक उर्वरकों की खपत में अच्छी खासा कमी लाई जा सकती है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने फर्मेंटेड खाद मिलाने पर जोर दिया है। प्रधानमंत्री बीजेयूआर कार्यक्रम के तहत मिट्टी की जांच का जो व्यापक कार्यक्रम चलाया जा रहा है उसका उद्देश्य भी यही है कि खेत की आवश्यकता के अनुसार ही उर्वरकों का उपयोग किया जाए। अंधाधूंध उपयोग को रोक कर मिट्टी की उर्वरा शक्ति बनाएं रखना है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/business/onion-prices-fall-due-to-export-crisis-modi-govt-takes-a-big-step-nafed-will-buy-the-entire-stock" target="_blank">Export पर संकट से गिरे प्याज के दाम, Modi सरकार का बड़ा कदम, NAFED खरीदेगा पूरा स्टॉक</a></h3><div>एक बात तो लगभग सबके संज्ञान में आ गई है कि रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग के कारण खेतों की मिट्टी की उपजाउ क्षमता प्रभावित हो रही है तो भूजल का अत्यधिक दोहन होने से भू जल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है वहीं रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के कारण खतरनाक स्तर पर प्रदूषित हो रहा है। जैविक विविधता प्रभावित हो रही है तो खेती के सहायक कीटनाशकों का अस्तित्व ही समाप्त होने को है। इसके अलावा खाद्यान्नों के विषैला होने व इन खाद्यान्नों के उपयोग से बीमारियों का दायरा तेजी से बढ़ता जा रहा है। इतना सबकुछ होने के बावजूद रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में दिन प्रतिदिन बढ़ोतरी ही हो रही है। 2025-26 के आंकड़़ों की ही बात करें तो यूरिया में 138 प्रतिशत, डीएपी के उपयोग में 94 प्रतिशत और एनपीके के उपयोग में 83 प्रतिशत के आसपास बढ़ोतरी हुई है। ऐसे में प्रधानमंत्री के आग्रह के निहितार्थ को समझना होगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का आग्रह इस मायने में बहस का मुद्दा नहीं होना चाहिए कि सरकार देश की जरुरतों को पूरा नहीं कर पा रही। अपितु गंभीर चिंतन की बात यह है कि हम परंपरागत खेती या जैविक खेती को बढ़ावा देकर आने वाली पीढ़ी और जल-मिट्टी, वायु के प्रदूषण को कम करने में भागीदार बन सकते हैं। केवल 10 प्रतिशत फर्मिंटेड खाद मिलाने से ही बहुत बड़ा सकारात्मक बदलाव देखा जा सकता है। 50 प्रतिशत तक आयात निर्भरता कम की जा सकती है। आज हम रुस, ओमान, सउदी अरब, मोरक्को, चीन आदि पर उर्वरकों के आयात के लिए निर्भर है। और अरबो डालर आयात पर खर्च करके भी प्रदूषण और सेहत से खिलवाड़ पा रहे हैं। हांलाकि आज अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आसन्न संकट को देखते हुए दूरदृष्टि पूर्ण 7 आग्रहों को प्रतिपक्ष आलोचना के स्तर पर ले रहा है पर यह नहीं भूलना चाहिए कि पीएम प्रणाम कार्यक्रम जून 23 से चलाया जा रहा है तो पीएमबीजेयूआर कार्यक्रम जो कि खेत की मिट्टी की जांच से जुड़ा कार्यक्रम है वर्षों से जारी है। इसके साथ ही आज कृषि वैज्ञानिक बार बार आग्रह कर रहे हैं कि उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग घातक स्तर पर पहुंच रहा है। पंजाब और उससे सटते इलाकों में खेती के हालात बयां कर रहे हैं। ऐसे में रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में 50 प्रतिशत कमी के आग्रह को सकारात्मक लिया जाना चाहिए। इस बहाने हमें खेती को सही दिशा देने का अवसर मिला है। खरीफ की बुवाई में ही इस पर अमल किया जा सकता है। खेती और पर्यावरण से जुड़े सरकारी और गैरसरकारी संस्थाओं को प्रोएक्टिव रोल अपनाते हुए आगे आना होगा। यह एक अवसर मिला है और इस अवसर का सकारात्मक उपयोग को देश की खेती किसानी को नई दिशा दी जा सकती है।</div><div><br></div><div>- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 20 May 2026 13:36:27 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/50-percent-reduction-in-fertilizer-usage-will-bring-about-revolutionary-transformation-agriculture</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Gold पर सरकार की सख्ती के चलते Jewellery Industry में हाहाकार! खाली बैठे हैं कारीगर, सूने पड़े हैं बड़े-बड़े शोरूम]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/stir-in-the-jewelry-industry-artisans-are-sitting-idle-and-large-showrooms-lie-empty]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>देशभर में ज्वैलर्स की दुकानें इन दिनों वीरान नजर आने लगी हैं और इस कारोबार से जुड़े लाखों कारीगर खाली बैठने पर मजबूर हो रहे हैं। दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से नागरिकों से एक वर्ष तक सोने के आभूषणों की खरीद टालने की अपील और सोने पर आयात शुल्क को छह प्रतिशत से बढ़ाकर पंद्रह प्रतिशत किए जाने के बाद आभूषण उद्योग में चिंता और असमंजस का माहौल गहरा गया है। सरकार का कहना है कि पश्चिम एशिया संघर्ष, बढ़ती ऊर्जा कीमतों और कमजोर होते रुपये के कारण विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ रहा है, इसलिए सोने के आयात को नियंत्रित करना जरूरी हो गया है।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोना उपभोक्ता देश है। ऐसे में सरकार के इस कदम का असर व्यापक माना जा रहा है। अखिल भारतीय रत्न एवं आभूषण घरेलू परिषद के अध्यक्ष राजेश रोकडे ने कहा कि उद्योग को प्रधानमंत्री की अपील का सम्मान करना चाहिए और किसी प्रकार की घबराहट या हड़ताल से बचना चाहिए। उनका कहना है कि कच्चे तेल के बाद सबसे अधिक विदेशी मुद्रा सोने के आयात पर खर्च होती है और सरकार का उद्देश्य भुगतान संतुलन को बेहतर बनाना है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/customers-flock-to-old-gold-exchange-schemes" target="_blank">Old Gold Exchange Schemes पर टूट रहे ग्राहक, 18 Carats Bridal Jewellery Collections बाजार में छाए</a></h3><div>हम आपको बता दें कि आभूषण उद्योग से सीधे और परोक्ष रूप से लगभग एक करोड़ लोगों की आजीविका जुड़ी हुई है। इसमें कारीगर, बिक्रीकर्मी, पैकेजिंग, सुरक्षा, बैंकिंग और बीमा जैसे क्षेत्र भी शामिल हैं। उद्योग जगत को आशंका है कि यदि स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो कोविड काल जैसी आर्थिक मुश्किलें फिर सामने आ सकती हैं।</div><div><br></div><div>दूसरी ओर, विवाह और पारिवारिक समारोहों में सोने का सांस्कृतिक महत्व भी इस बहस के केंद्र में आ गया है। दक्षिण भारत में कसुमालै, झिमिकी, जडई बिल्ला और पारंपरिक चूड़ियों जैसे आभूषण केवल सजावट नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान और पारिवारिक बचत का प्रतीक माने जाते हैं। कई परिवार अब अपनी योजनाओं में बदलाव कर रहे हैं। एक महिला ने बताया कि उन्होंने विवाह के लिए नकली आभूषण अपनाने और केवल मंगलसूत्र तथा अंगूठियों जैसे सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण गहनों को ही सोने में बनवाने का निर्णय लिया है।</div><div><br></div><div>हालांकि कई ग्राहक इस बदलाव से असहज हैं। उद्योग प्रतिनिधियों का कहना है कि सामान्य ग्राहक जरूरत के अनुसार ही खरीदारी करता है, वह सोना जमा करने के उद्देश्य से नहीं खरीदता। मद्रास ज्वैलर्स एंड डायमंड ट्रेडर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष जयंतीलाल चलानी ने कहा कि शुल्क वृद्धि के बाद ग्राहकों में घबराहट बढ़ी है। कई लोगों ने भविष्य की खरीद पहले ही कर ली ताकि आगे कीमत और न बढ़े।</div><div><br></div><div>व्यापारियों के अनुसार शुल्क वृद्धि का सीधा बोझ ग्राहकों पर पड़ेगा, क्योंकि अतिरिक्त शुल्क बिक्री मूल्य में जोड़ दिया जाएगा। फिर भी इसका अप्रत्यक्ष नुकसान व्यापारियों को भी होगा। उदाहरण के तौर पर, पहले जहां कोई ग्राहक बारह तोले खरीद पाता था, अब वह केवल ग्यारह तोले ही खरीद सकेगा। इससे बिक्री की मात्रा घटेगी।</div><div><br></div><div>उधर, सोने की लगातार बढ़ती कीमतों ने ग्राहकों की खरीद आदतों में भी बदलाव शुरू कर दिया है। उद्योग के अनुसार पिछले पांच वर्षों में सोने की कीमतों में लगभग तीन सौ प्रतिशत और पिछले एक वर्ष में लगभग अस्सी प्रतिशत तक वृद्धि हुई है। अब लगभग आधे ग्राहक पुराने आभूषण बदलकर नए डिजाइन बनवा रहे हैं ताकि केवल निर्माण शुल्क देना पड़े। पारंपरिक आभूषणों को आधुनिक डिजाइन में बदलवाने की प्रवृत्ति भी तेजी से बढ़ रही है।</div><div><br></div><div>युवा ग्राहकों के बीच चांदी, हल्के हीरे वाले आभूषण और चौदह या अठारह कैरेट के हल्के गहनों की मांग बढ़ रही है। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि नई पीढ़ी अब आभूषणों को केवल निवेश नहीं, बल्कि दैनिक फैशन के रूप में भी देख रही है। प्रयोगशाला में बने हीरों और हल्के डिजाइन वाले आभूषणों की लोकप्रियता भी बढ़ रही है। हालांकि उद्योग मानता है कि प्लेटिनम अभी भी सोने का विकल्प नहीं बन पाया है।</div><div><br></div><div>इस बीच, सरकार और उद्योग दोनों की नजर स्वर्ण मुद्रीकरण योजना पर भी है। इस योजना के तहत लोग अपने घरों में पड़ा सोना जमा कर ब्याज प्राप्त कर सकते हैं। न्यूनतम दस ग्राम सोना जमा किया जा सकता है और उस पर लगभग दो से ढाई प्रतिशत वार्षिक ब्याज मिलता है। सरकार का उद्देश्य घरेलू सोने को आर्थिक प्रणाली में लाकर आयात पर निर्भरता कम करना है।</div><div><br></div><div>लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में सोना केवल वित्तीय संपत्ति नहीं, बल्कि भावनात्मक और सांस्कृतिक धरोहर माना जाता है। लोग अपने पारिवारिक आभूषणों को पिघलाकर जमा कराने में सहज महसूस नहीं करते। इसके बजाय वे पुराने गहनों को गिरवी रखकर ऋण लेना या उन्हें बदलकर नए डिजाइन बनवाना अधिक पसंद करते हैं। यही कारण है कि स्वर्ण मुद्रीकरण योजना अपेक्षित सफलता नहीं पा सकी है।</div><div><br></div><div>उद्योग जगत ने सरकार को कई सुझाव भी दिए हैं। इनमें पुराने सोने के विनिमय कार्यक्रम को प्रोत्साहन, स्वर्ण जमा योजनाओं को आकर्षक बनाना, हल्के वजन के आभूषणों को बढ़ावा देना और कर्नाटक की कोलार स्वर्ण खदानों को फिर से सक्रिय करने जैसे प्रस्ताव शामिल हैं। साथ ही चेतावनी भी दी गई है कि अधिक आयात शुल्क से अवैध तस्करी और काले बाजार की गतिविधियां बढ़ सकती हैं।</div><div><br></div><div>इसी बीच, सरकार ने मंदिरों और धार्मिक संस्थानों के सोने के भंडार को सरकारी योजना के तहत शामिल किए जाने संबंधी अफवाहों को सिरे से खारिज कर दिया है। सरकार ने स्पष्ट कहा है कि मंदिरों के सोने को रणनीतिक स्वर्ण भंडार बनाने या उस पर किसी प्रकार की स्वर्ण मुद्रीकरण योजना लागू करने का कोई प्रस्ताव नहीं है। लोगों से अपील की गई है कि वे अपुष्ट सूचनाओं पर विश्वास न करें और केवल आधिकारिक घोषणाओं पर भरोसा करें।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 19 May 2026 13:35:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/stir-in-the-jewelry-industry-artisans-are-sitting-idle-and-large-showrooms-lie-empty</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Old Gold Exchange Schemes पर टूट रहे ग्राहक, 18 Carats Bridal Jewellery Collections बाजार में छाए]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/customers-flock-to-old-gold-exchange-schemes]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत में सोना और चांदी की बढ़ती मांग, वैश्विक अस्थिरता और आयात पर बढ़ते दबाव के बीच केंद्र सरकार, आभूषण उद्योग और खुदरा कंपनियां अब घरों और मंदिरों में पड़े निष्क्रिय सोने को फिर से अर्थव्यवस्था में लाने की दिशा में सक्रिय हो गई हैं। सरकार ने 12 मई को सोना और चांदी पर आयात शुल्क 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत कर दिया। इसका उद्देश्य लगातार बढ़ रहे आयात को नियंत्रित करना और विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ रहे दबाव को कम करना है। इसी क्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नागरिकों से अपील की है कि वह एक वर्ष तक सोने की खरीद टालने पर विचार करें ताकि देश की आर्थिक स्थिति पर अनावश्यक बोझ कम हो सके।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोना उपभोक्ता देश है और अपनी जरूरत का लगभग पूरा सोना विदेशों से आयात करता है। वित्त वर्ष 2025-26 में देश का सोना आयात बढ़कर लगभग 68.9 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जबकि 2016-17 में यह केवल 9.7 अरब डॉलर था। वहीं चांदी का आयात भी एक दशक में तेजी से बढ़ा है और 2025-26 में यह 11.4 अरब डॉलर से अधिक हो गया। दूसरी ओर निर्यात बेहद कम है, जिससे व्यापार घाटा और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ रहा है। स्विट्जरलैंड, संयुक्त अरब अमीरात और पेरू भारत के प्रमुख सोना आपूर्तिकर्ता हैं, जबकि चांदी मुख्य रूप से ब्रिटेन, हांगकांग और अमेरिका से आयात की जाती है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/all-jewelers-have-launched-a-new-scheme-do-not-sell-your-old-gold-exchange-it" target="_blank">सारे Jewellers ले आये नई स्कीम, अब पुराना Gold बेचो नहीं, बदलो! मिलेगा पूरा फायदा</a></h3><div>आभूषण उद्योग का मानना है कि यदि भारतीय घरों और मंदिरों में जमा निष्क्रिय सोने का एक हिस्सा भी औपचारिक व्यवस्था के माध्यम से बाजार में वापस लाया जाए, तो आयात पर निर्भरता काफी कम हो सकती है। टाइटन कंपनी के मुख्य वित्त अधिकारी अशोक सोनथालिया ने कहा कि भारत के नागरिकों और मंदिरों के पास दुनिया का सबसे बड़ा जमीन के ऊपर मौजूद स्वर्ण भंडार है। टाइटन ने लगभग 25 वर्ष पहले पुराना सोना विनिमय कार्यक्रम शुरू किया था और वर्तमान में उसकी कुल सोना जरूरत का लगभग 50 प्रतिशत इसी माध्यम से पूरा होता है।</div><div><br></div><div>कल्याण ज्वैलर्स ने भी “नेशन फर्स्ट गोल्ड फॉर इंडिया” पहल की घोषणा की है। कंपनी का लक्ष्य इस वित्त वर्ष में पांच टन सोना आयात कम करना है। इसके तहत पुराने सोने के विनिमय कार्यक्रम को बढ़ावा दिया जाएगा, हल्के वजन के 18 कैरेट आभूषणों को प्रोत्साहित किया जाएगा और स्वर्ण मुद्रीकरण योजनाओं का विस्तार किया जाएगा। कंपनी अपने 342 स्टोरों में विशेष काउंटर स्थापित करेगी, जहां ग्राहक पारदर्शी व्यवस्था के तहत सोने को नकद में बदल सकेंगे। कंपनी के अनुसार उसके कारोबार में पुराने सोने के विनिमय की हिस्सेदारी 30 प्रतिशत से अधिक हो चुकी है।</div><div><br></div><div>उधर, रत्न एवं आभूषण निर्यात संवर्धन परिषद ने भी प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर कई सुझाव दिए हैं। परिषद का कहना है कि कम कैरेट वाले आभूषणों की बिक्री बढ़ाने से सोना आयात में 20 से 30 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है। साथ ही पुराने सोने को नए आभूषणों में बदलने की संस्कृति को बढ़ावा देना भी जरूरी है। मलाबार गोल्ड एंड डायमंड्स ने भी सरकार को स्वर्ण मुद्रीकरण योजना को और प्रभावी बनाने का प्रस्ताव दिया है। कंपनी के अध्यक्ष एमपी अहमद के अनुसार भारतीय परिवारों के पास भारी मात्रा में निष्क्रिय सोना मौजूद है और यदि उसका कुछ हिस्सा भी औपचारिक व्यवस्था में वापस आए तो नए आयात की आवश्यकता काफी कम हो सकती है।</div><div><br></div><div>विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय परिवार आमतौर पर आभूषण और सोने के सिक्के खरीदकर बैंक लॉकरों में सुरक्षित रखते हैं। यह सोना लंबे समय तक निष्क्रिय रहता है जबकि इसका पुनर्चक्रण देश की अर्थव्यवस्था के लिए उपयोगी हो सकता है। उद्योग जगत अब 22 कैरेट की बजाय 18 और 14 कैरेट के हल्के आभूषणों को बढावा देने पर भी जोर दे रहा है। टाइटन ने हाल ही में 18 कैरेट में दुल्हन आभूषणों का नया संग्रह पेश किया है।</div><div><br></div><div>इधर अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी सोने की कीमतों में भारी उतार चढ़ाव देखने को मिल रहा है। अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव तथा पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण तेल कीमतों में तेजी आई है। इसके चलते मुद्रास्फीति बढ़ने और ब्याज दरों में कटौती की संभावना कम होने से सोने की कीमतों पर दबाव बना है। हाल के दिनों में सोने की कीमतों में 13 प्रतिशत से अधिक गिरावट दर्ज की गई है। डॉलर मजबूत होने और अमेरिकी बांड प्रतिफल बढ़ने से निवेशकों का रुझान भी सोने से दूर हुआ है। विश्लेषकों का कहना है कि बढ़ती तेल कीमतों ने मुद्रास्फीति की आशंकाओं को फिर बढ़ा दिया है, जिससे बाजार में ब्याज दरों को लेकर संशय पैदा हो गया है।</div><div><br></div><div>इस बीच, पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतें भी तेजी से बढ़ रही हैं। इससे भारत जैसे आयात आधारित देशों पर दोहरा दबाव बन रहा है क्योंकि देश अपनी 85 प्रतिशत से अधिक तेल जरूरतें भी विदेशों से पूरी करता है। ऐसे में सोना और तेल दोनों के बढ़ते आयात से चालू खाता घाटा और रुपये पर दबाव बढ़ सकता है। यही कारण है कि सरकार अब नागरिकों से गैर जरूरी सोना और चांदी खरीद में संयम बरतने की अपील कर रही है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>

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      <pubDate>Sat, 16 May 2026 13:15:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/customers-flock-to-old-gold-exchange-schemes</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[सारे Jewellers ले आये नई स्कीम, अब पुराना Gold बेचो नहीं, बदलो! मिलेगा पूरा फायदा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/all-jewelers-have-launched-a-new-scheme-do-not-sell-your-old-gold-exchange-it]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हाल ही में सोने के आयात शुल्क में बढ़ोतरी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लोगों से सोने की खरीद कुछ समय के लिए टालने की अपील के बाद देश की प्रमुख आभूषण कंपनियां अब सोना पुनर्चक्रण योजनाओं यानि गोल्ड रि-साइक्लिंग स्कीम्स को तेजी से बढ़ावा दे रही हैं। इस पहल का उद्देश्य एक ओर घरेलू बाजार में सोने की मांग को संतुलित करना है, वहीं दूसरी ओर सोने के आयात पर निर्भरता कम कर देश को सीमा शुल्क भुगतान में राहत दिलाना भी है।</div><div><br></div><div>देश की जानी मानी कंपनियां जैसे Kalyan Jewellers, Malabar Gold &amp; Diamonds, Muthoot Exim, MMTC-PAMP और Tanishq पुरानी ज्वेलरी, टूटे हुए आभूषण, पुराने डिजाइन के गहने और सोने के सिक्कों को नए गहनों के बदले स्वीकार कर रही हैं। इन कंपनियों का दावा है कि इससे नया कारोबार भी बढ़ेगा और सोने के आयात का दबाव भी घटेगा।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/i-do-not-have-to-buy-new-gold-but-what-are-the-rules-for-keeping-old-gold-at-home" target="_blank">घर पर कितना Gold रखने की इजाजत देती है सरकार? नया सोना खरीदना नहीं है मगर पुराने सोने को रखने के नियम क्या हैं?</a></h3><div>मुथूट एक्जिम के मुख्य कार्यकारी अधिकारी कीयूर शाह के अनुसार सोना पुनर्चक्रण का मतलब ग्राहकों से पुराना सोना खरीदकर उसे शुद्ध करना और फिर दोबारा उद्योग में उपयोग के लिए उपलब्ध कराना है। उनका कहना है कि यदि भारतीय घरों में मौजूद कुल सोने का केवल एक प्रतिशत भी पुनर्चक्रित हो जाए तो देश का सोना आयात लगभग तीन सौ टन तक कम हो सकता है। यह भारत के कुल वार्षिक सोना आयात का लगभग चालीस प्रतिशत है।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि कंपनियों ने ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए अलग अलग योजनाएं शुरू की हैं। कल्याण ज्वेलर्स ने ‘नेशन फर्स्ट गोल्ड फॉर इंडिया’ पहल के तहत पुराना सोना विनिमय योजना शुरू की है। इसके तहत ग्राहक अपने पुराने या अनुपयोगी गहनों को नए डिजाइन में बदलवा सकते हैं। वहीं मालाबार गोल्ड एंड डायमंड्स ने अपनी स्वर्ण मौद्रीकरण योजना में न्यूनतम जमा सीमा दस ग्राम से घटाकर केवल एक ग्राम कर दी है। कंपनी ग्राहकों को सोने के वजन या नकद दोनों रूपों में भुगतान का विकल्प दे रही है।</div><div><br></div><div>मुथूट एक्जिम के देशभर में सौ केंद्र हैं और कंपनी के अनुसार उसने अब तक करीब पांच टन पुराना सोना खरीदा है। चालू वित्त वर्ष में ही लगभग एक हजार किलोग्राम सोना पुनर्चक्रण के लिए जुटाया गया है। दूसरी ओर तनिष्क की ‘ओल्ड गोल्ड न्यू इंडिया’ मुहिम के अंतर्गत नौ कैरेट से बाइस कैरेट तक के सोने को स्वीकार किया जा रहा है। कंपनी किसी भी ज्वेलर का सोना लेने का दावा करती है, चाहे वह टूटा हुआ या छोटा आभूषण ही क्यों न हो।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो ग्राहकों के मन में सबसे बड़ा सवाल यह रहता है कि पुराने गहनों का मूल्यांकन किस प्रकार किया जाता है। कंपनियों का कहना है कि अब पारंपरिक अंदाजे की बजाय वैज्ञानिक तकनीकों का इस्तेमाल हो रहा है। कल्याण ज्वेलर्स के अनुसार सोने की शुद्धता जांचने के लिए कैरेट मीटर और सटीक वजन मशीनों का उपयोग किया जाता है। मुथूट एक्जिम ने बताया कि वह एक्स आर एफ तकनीक वाली मशीनों का प्रयोग करता है, जिससे केवल तीस सेकंड में यह पता चल जाता है कि गहनों में सोने, चांदी, तांबा, जस्ता या निकल की कितनी मात्रा है। वहीं एमएमटीसी पैंप ने कहा कि उसकी प्रक्रिया में जर्मन तकनीक आधारित आधुनिक मशीनों का उपयोग होता है, जिससे ग्राहकों के गहनों को किसी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचता।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि पुराने सोने के बदले मिलने वाली राशि बाजार भाव और शुद्धता पर निर्भर करती है। मुथूट एक्जिम प्रतिदिन भारतीय बुलियन और ज्वेलर्स एसोसिएशन के बाजार भाव के अनुसार मूल्य तय करता है। कुछ कंपनियां सेवा शुल्क भी वसूलती हैं। मुथूट एक्जिम सोने की कीमत का लगभग तीन प्रतिशत सेवा शुल्क लेता है, जबकि एमएमटीसी पैंप वस्तु एवं सेवा कर के साथ अन्य शुल्क भी लागू करता है। कल्याण ज्वेलर्स का कहना है कि पुराने सोने के विनिमय पर कर नहीं लगता, केवल नए गहनों की खरीद पर कर देय होता है। कंपनी ने दावा किया है कि दस ग्राम सोने पर ग्राहकों को लगभग पूरा मूल्य दिया जाता है और केवल मिश्रित धातु अलग करने का मामूली शुल्क लिया जाता है।</div><div><br></div><div>इसी बीच आभूषण उद्योग का विस्तार अब शॉपिंग मॉल संस्कृति को भी प्रभावित कर रहा है। नई दिल्ली समेत देश के प्रमुख शहरों में ज्वेलरी स्टोर अब बड़े मॉलों के प्रमुख आकर्षण बनते जा रहे हैं। चार वर्ष पहले जहां मॉल क्षेत्रफल का केवल एक प्रतिशत हिस्सा आभूषण दुकानों के पास था, वहीं अब यह बढ़कर लगभग दस प्रतिशत तक पहुंच गया है।</div><div><br></div><div>रियल एस्टेट सलाहकार कंपनियों के अनुसार संगठित खुदरा बाजार में आभूषण क्षेत्र की हिस्सेदारी वर्ष 2019 के दो प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2025 में आठ प्रतिशत तक पहुंच गई है। हैदराबाद, चेन्नई, बेंगलुरु और दिल्ली एनसीआर जैसे शहरों में बड़े आकार के ज्वेलरी शोरूम तेजी से खुल रहे हैं। उपभोक्ताओं का भरोसा संगठित और प्रतिष्ठित ब्रांडों की ओर बढ़ने से यह क्षेत्र मॉल संचालकों के लिए प्रमुख किरायेदार बन गया है।</div><div><br></div><div>विशेषज्ञों का मानना है कि आभूषण खरीद अभी भी भरोसे और अनुभव पर आधारित है। लोग परिवार के साथ दुकान जाकर डिजाइन देखना और समझकर खरीदारी करना पसंद करते हैं। यही कारण है कि यह क्षेत्र ऑनलाइन बिक्री से अपेक्षाकृत कम प्रभावित हुआ है। तनिष्क, मालाबार गोल्ड एंड डायमंड्स, कल्याण ज्वेलर्स और कैरटलैन जैसे ब्रांड अब महानगरों के साथ छोटे शहरों में भी मॉलों के लिए भीड़ आकर्षित करने वाले प्रमुख केंद्र बन चुके हैं।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 15 May 2026 13:24:14 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/all-jewelers-have-launched-a-new-scheme-do-not-sell-your-old-gold-exchange-it</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[घर पर कितना Gold रखने की इजाजत देती है सरकार? नया सोना खरीदना नहीं है मगर पुराने सोने को रखने के नियम क्या हैं?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/i-do-not-have-to-buy-new-gold-but-what-are-the-rules-for-keeping-old-gold-at-home]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में देशवासियों से अगले एक वर्ष तक सोना खरीदने से बचने की अपील की। उनका कहना था कि देश को गैर जरूरी आयात कम करने और अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने पर ध्यान देना चाहिए। प्रधानमंत्री की इस अपील के बाद देश में एक बार फिर सोना रखने के नियमों और इससे जुड़े कानूनी प्रावधानों पर चर्चा तेज हो गई है। देखा जाये तो भारत में सोना केवल आभूषण नहीं बल्कि बचत, निवेश और सामाजिक प्रतिष्ठा का महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है। आर्थिक अनिश्चितता, महंगाई और बाजार में उतार चढ़ाव के समय लोग सोने को सुरक्षित निवेश के रूप में देखते हैं। यही कारण है कि गांव से लेकर शहर तक भारतीय परिवारों में सोने की मजबूत मांग बनी रहती है।</div><div><br></div><div>हालांकि देश में किसी व्यक्ति द्वारा सोना रखने की कोई स्पष्ट कानूनी सीमा तय नहीं है, लेकिन केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड यानी सीबीडीटी ने 11 मई 1994 को जारी एक परिपत्र में आयकर अधिकारियों के लिए कुछ दिशा निर्देश निर्धारित किए थे। इन निर्देशों का उद्देश्य आयकर छापों के दौरान अनावश्यक विवादों से बचना था। इसके तहत अधिकारियों को एक निश्चित सीमा तक सोने के आभूषण जब्त नहीं करने की सलाह दी गई थी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/gold-and-silver-prices-rise-sharply-jewelers-say-they-will-be-ruined" target="_blank">Gold, Silver के दाम में भारी वृद्धि, Jewellers बोले हमारी कमर टूट जाएगी, सर्राफा बाजार में हड़कंप, घर में रखे सोने का क्या होगा?</a></h3><div>सीबीडीटी के नियमों के अनुसार विवाहित महिलाओं के पास 500 ग्राम तक सोने के आभूषण होने पर उन्हें जब्त नहीं किया जाएगा। अविवाहित महिलाओं के लिए यह सीमा 250 ग्राम तय की गई है। वहीं पुरुषों के लिए, चाहे वे विवाहित हों या अविवाहित, 100 ग्राम तक सोने के आभूषण रखने की सीमा निर्धारित है। इन सीमाओं के भीतर पाए गए आभूषणों को सामान्य परिस्थितियों में आयकर अधिकारी जब्त नहीं कर सकते।</div><div><br></div><div>सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि किसी व्यक्ति ने अपने सोने का विवरण संपत्ति कर विवरणी में दिया है, या वह सोने के वैध स्रोत का संतोषजनक प्रमाण प्रस्तुत कर देता है, तो ऐसे आभूषण जब्त नहीं किए जाएंगे। इसके अलावा पारिवारिक परंपरा, सामाजिक स्थिति और रीति रिवाजों को देखते हुए अधिकारियों को अधिक मात्रा में सोना होने पर भी विवेकाधिकार इस्तेमाल करने का अधिकार दिया गया है।</div><div><br></div><div>लेकिन यदि कोई व्यक्ति अपने पास मौजूद सोने का वैध स्रोत नहीं बता पाता, या उसका जवाब संतोषजनक नहीं माना जाता, तो उस पर भारी कर लगाया जा सकता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार ऐसे मामलों में लगभग 78 प्रतिशत तक कर वसूला जा सकता है, जिसमें अधिभार और उपकर भी शामिल होता है। इसके अतिरिक्त 10 प्रतिशत तक जुर्माना भी लगाया जा सकता है।</div><div><br></div><div>इस बीच सोने पर बढ़ी आयात शुल्क दरों ने बाजार की चिंता और बढ़ा दी है। उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि आयात शुल्क बढ़ने से सोने की खुदरा कीमतों में तेजी आएगी, जिसका सबसे ज्यादा असर मध्यम वर्ग और सीमित बजट वाले ग्राहकों पर पड़ेगा। माना जा रहा है कि निकट भविष्य में सोने की बिक्री में गिरावट देखने को मिल सकती है।</div><div><br></div><div>जानकारों का कहना है कि भारत अपनी घरेलू जरूरतों का लगभग पूरा सोना आयात के जरिये पूरा करता है। वित्त वर्ष 2026 में देश का सोना आयात बढ़कर 72 अरब डॉलर तक पहुंच गया था, जबकि पिछले वित्त वर्ष में यह 58 अरब डॉलर था। ऐसे में आयात शुल्क में वृद्धि का सीधा असर कीमतों पर पड़ना तय माना जा रहा है।</div><div><br></div><div>सेन्को गोल्ड के प्रबंध निदेशक सुवंकर सेन का कहना है कि आयात शुल्क बढ़ने से कीमतों में तत्काल असर दिखाई देगा और कई ग्राहक फिलहाल खरीदारी टाल सकते हैं। उनके अनुसार निकट अवधि में बिक्री की मात्रा में 10 से 15 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है।</div><div><br></div><div>मालाबार समूह के अध्यक्ष एमपी अहमद का कहना है कि पहली बार सोना खरीदने वाले ग्राहकों को नई कीमतों के अनुसार खुद को ढालने में समय लगेगा। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि पुराने सोने के बदले नया आभूषण लेने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ेगी और आगे चलकर यही खरीदारी का प्रमुख तरीका बन सकता है।</div><div><br></div><div>ज्वेलरी कारोबार से जुड़े उद्योगपति डॉ. जॉय अलुक्कास का मानना है कि भारत में शादी और त्योहारों के साथ सोने का गहरा सांस्कृतिक और भावनात्मक रिश्ता है, इसलिए दीर्घकाल में मांग पूरी तरह कमजोर नहीं होगी। उनका कहना है कि अब ग्राहक सोने को केवल गहनों के रूप में नहीं बल्कि सुरक्षित निवेश के रूप में भी देखने लगे हैं।</div><div><br></div><div>इसी परिस्थिति को देखते हुए कई कंपनियां पुराने सोने के बदले नया आभूषण देने वाली योजनाओं पर जोर दे रही हैं। कल्याण ज्वेलर्स ने गोल्ड फोर इंडिया नाम से अभियान शुरू किया है, जिसके तहत ग्राहकों को पुराने, टूटे या अनुपयोगी आभूषण बदलकर नया सोना खरीदने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। साथ ही कम शुद्धता वाले 18 कैरेट आभूषणों को भी बढ़ावा दिया जा रहा है ताकि कम मात्रा में शुद्ध सोने का उपयोग हो सके।</div><div><br></div><div>रत्न और आभूषण निर्यात संवर्धन परिषद ने भी अपने सदस्यों से कम कैरेट वाले आभूषणों की बिक्री बढ़ाने और सोने की ईंटों तथा सिक्कों में निवेश को हतोत्साहित करने की अपील की है। परिषद का मानना है कि सोने की ईंटों और सिक्कों का आयात कुल आयात का लगभग 20 से 30 प्रतिशत हिस्सा है, जिसे कम करना जरूरी है।</div><div><br></div><div>कुल मिलाकर प्रधानमंत्री की अपील, आयात शुल्क में वृद्धि और सरकार की निगरानी ने सोने के बाजार को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। एक ओर सरकार आयात कम कर अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी ओर भारतीय समाज में सोने की सांस्कृतिक अहमियत के कारण इसकी मांग पूरी तरह खत्म होने की संभावना नहीं दिखती। माना जा रहा है कि आने वाले समय में सोने की खरीदारी का तरीका जरूर बदल सकता है, जहां लोग पुराने आभूषण बदलने, हल्के गहने खरीदने और सोच समझकर निवेश करने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। बहरहाल, आइये देखते हैं इस पूरे मामले पर ज्वैलर्स क्या कह रहे हैं।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 14 May 2026 12:31:53 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/i-do-not-have-to-buy-new-gold-but-what-are-the-rules-for-keeping-old-gold-at-home</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Gold, Silver के दाम में भारी वृद्धि, Jewellers बोले हमारी कमर टूट जाएगी, सर्राफा बाजार में हड़कंप, घर में रखे सोने का क्या होगा?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/gold-and-silver-prices-rise-sharply-jewelers-say-they-will-be-ruined]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम एशिया संकट और वैश्विक अनिश्चितता के बीच भारत सरकार ने सोना, चांदी और प्लैटिनम के आयात पर सीमा शुल्क में भारी बढ़ोतरी कर दी है जिससे इनकी कीमत में जबरदस्त उछाल आ गया है। शादियों के सीजन में सोने, चांदी के भाव में इस तेजी ने कई परिवारों की चिंता बढ़ा दी है लेकिन सरकार का कहना है कि यह कदम बेहद जरूरी हो गया था। हम आपको बता दें कि मोदी सरकार ने सोना और चांदी पर प्रभावी आयात शुल्क छह प्रतिशत से बढ़ाकर पंद्रह प्रतिशत कर दिया है, जबकि प्लैटिनम पर यह शुल्क छह दशमलव चार प्रतिशत से बढ़ाकर पंद्रह दशमलव चार प्रतिशत कर दिया गया है। सरकार का कहना है कि यह कदम विदेशी मुद्रा भंडार की सुरक्षा, चालू खाते के घाटे को नियंत्रित करने और गैर जरूरी आयातों पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से उठाया गया है।</div><div><br></div><div>नई व्यवस्था के तहत सरकार ने सोना और चांदी के आयात पर दस प्रतिशत मूल सीमा शुल्क तथा पांच प्रतिशत कृषि अवसंरचना और विकास उपकर लगाया है, जिससे कुल प्रभावी कर पंद्रह प्रतिशत हो गया है। इसके साथ ही सोना और चांदी के डोरे, सिक्कों तथा अन्य संबंधित उत्पादों पर भी शुल्क बढ़ाया गया है। सरकारी सूत्रों के अनुसार मौजूदा भू राजनीतिक परिस्थितियों और पश्चिम एशिया संकट के कारण कच्चे तेल के वैश्विक बाजार तथा समुद्री आपूर्ति मार्गों में भारी अस्थिरता पैदा हुई है। हम आपको बता दें कि भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातकों में शामिल है, इसलिए ऊंची तेल कीमतों और आपूर्ति बाधाओं से देश के आयात बिल, महंगाई और चालू खाते के घाटे पर दबाव बढ़ सकता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/jewellers-launch-new-scheme-attractive-schemes-for-buying-new-jewellery-in-exchange-of-old-gold" target="_blank">Gold नहीं खरीदने की मोदी की अपील के बाद ज्वैलर्स लाये नई योजना, पुराने सोने के बदले नये गहने खरीदने पर आकर्षक स्कीमें</a></h3><div>मोदी सरकार का कहना है कि ऐसे समय में विदेशी मुद्रा संसाधनों को आवश्यक क्षेत्रों के लिए सुरक्षित रखना जरूरी हो जाता है। दरअसल, विदेशी मुद्रा का उपयोग कच्चे तेल, उर्वरक, औद्योगिक कच्चे माल, रक्षा जरूरतों, महत्वपूर्ण तकनीक और पूंजीगत वस्तुओं जैसे जरूरी आयातों के लिए प्राथमिकता से किया जाना चाहिए, क्योंकि ये देश की अर्थव्यवस्था, विनिर्माण, निर्यात, आधारभूत ढांचे और राष्ट्रीय सुरक्षा से सीधे जुड़े हैं। इसके विपरीत सोना और चांदी जैसे बहुमूल्य धातुओं का आयात मुख्य रूप से उपभोग और निवेश आधारित माना जाता है, जिससे विदेशी मुद्रा का भारी बहिर्गमन होता है।</div><div><br></div><div>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी देशवासियों से एक वर्ष तक सोने की खरीद टालने की अपील की है ताकि विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम किया जा सके। हम आपको बता दें कि भारत अपनी आवश्यकता का लगभग पूरा सोना आयात करता है। पिछले कुछ महीनों में शेयर बाजार से कमजोर प्रतिफल और बुलियन कीमतों में तेजी के कारण निवेश के रूप में सोने की मांग तेजी से बढ़ी है। विश्व स्वर्ण परिषद के आंकड़ों के अनुसार मार्च तिमाही में भारत के स्वर्ण विनिमय कारोबार कोषों में निवेश सालाना आधार पर एक सौ छियासी प्रतिशत बढ़कर बीस मीट्रिक टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो मोदी सरकार के इस फैसले के पीछे केवल बहुमूल्य धातुओं के आयात को नियंत्रित करना ही नहीं, बल्कि तेजी से बढ़ते आयात बिल और विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ते दबाव को कम करना भी एक प्रमुख कारण माना जा रहा है। सरकार का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव तथा होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधा के कारण कच्चे तेल और उर्वरकों के आयात खर्च में भारी बढ़ोतरी हुई है, जिससे देश के भुगतान संतुलन और चालू खाते के घाटे पर गंभीर दबाव बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि आयात शुल्क बढ़ने से अल्पकाल में चालू खाते के घाटे और रुपये पर दबाव कम हो सकता है, लेकिन घरेलू बाजार में सोना और चांदी और महंगे हो सकते हैं तथा तस्करी का खतरा फिर बढ़ सकता है।</div><div><br></div><div>हम आपको याद दिला दें कि सरकार ने इससे पहले भी सोना और चांदी के आयात पर तीन प्रतिशत एकीकृत वस्तु एवं सेवा कर लगाया था, जिसके बाद बैंकों ने एक महीने से अधिक समय तक आयात रोक दिया था। परिणामस्वरूप अप्रैल महीने में सोने का आयात लगभग तीस वर्षों के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया। बाद में बैंक कर भुगतान के बाद आयात फिर शुरू कर पाए, लेकिन अब नई शुल्क बढ़ोतरी के बाद व्यापारियों का मानना है कि आयात में फिर भारी गिरावट आ सकती है।</div><div><br></div><div>इसलिए उद्योग जगत ने सरकार के इस कदम पर चिंता जताई है। अखिल भारतीय रत्न एवं आभूषण परिषद के अध्यक्ष राजेश रोकडे ने कहा कि बढ़े हुए शुल्क और प्रधानमंत्री की मितव्ययिता अपील के कारण कारोबार कठिन दौर में पहुंच सकता है। उनका कहना है कि इससे अवैध बाजार और तस्करी को बढ़ावा मिल सकता है, जिससे समानांतर अर्थव्यवस्था खड़ी होने का खतरा है। परिषद के अनुसार अब सीमा शुल्क, वस्तु एवं सेवा कर तथा कृषि उपकर को मिलाकर सोना प्रति दस ग्राम लगभग सत्ताईस हजार रुपये तक महंगा हो सकता है, जबकि पहले यह बढ़ोतरी लगभग तेरह हजार पांच सौ रुपये थी। इस मुद्दे पर आगे की रणनीति तय करने के लिए उद्योग संगठनों की बैठक मुंबई में बुलाई गई है।</div><div><br></div><div>सेंको गोल्ड एंड डायमंड्स के प्रबंध निदेशक सुवंकर सेन का कहना है कि जब तक पश्चिम एशिया संकट और ऊंची तेल कीमतों की स्थिति बनी रहेगी, तब तक आयात शुल्क ऊंचे स्तर पर रह सकते हैं। उनके अनुसार इस कदम से सोने की मांग में दस से पंद्रह प्रतिशत तक कमी आ सकती है और उपभोक्ता हल्के वजन के आभूषणों की ओर रुख कर सकते हैं।</div><div><br></div><div>वहीं सरकार का तर्क है कि सीमा शुल्क में यह बढ़ोतरी उपभोक्ता विरोधी नहीं बल्कि संतुलित और सावधानीपूर्वक उठाया गया कदम है, जिसका उद्देश्य गैर जरूरी आयातों को नियंत्रित करना और देश की व्यापक आर्थिक स्थिरता को सुरक्षित रखना है। सूत्रों के अनुसार अतीत में भी वैश्विक अस्थिरता के समय सीमा शुल्क का उपयोग आर्थिक संतुलन बनाए रखने के साधन के रूप में किया जाता रहा है। वर्ष 2024-25 के केंद्रीय बजट में जब बाहरी आर्थिक स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत थी, तब सरकार ने सोना और चांदी पर शुल्क पंद्रह प्रतिशत से घटाकर छह प्रतिशत तथा प्लैटिनम पर शुल्क पंद्रह दशमलव चार प्रतिशत से घटाकर छह दशमलव चार प्रतिशत कर दिया था।</div><div><br></div><div>हम आपको यह भी बता दें कि पहले के दौर में भी स्वर्ण नियंत्रण संबंधी कठोर नियम लागू किए गए थे। तत्कालीन वित्त मंत्री मोरारजी देसाई ने 1962 में स्वर्ण नियंत्रण उपाय लागू किए थे, जिनके तहत सोने पर अग्रिम कारोबार पर रोक लगाई गई और बैंकों द्वारा दिए गए स्वर्ण ऋण वापस लिए गए। बाद में 1963 में चौदह कैरेट से अधिक शुद्धता वाले आभूषणों के निर्माण पर रोक लगा दी गई और 1968 में कडा स्वर्ण नियंत्रण कानून लागू किया गया था।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 13 May 2026 13:56:46 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/gold-and-silver-prices-rise-sharply-jewelers-say-they-will-be-ruined</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[योगी सरकार का कैबिनेट विस्तार, भाजपा नेतृत्व की मंशानुरूप करेगा 2027 के विधानसभा चुनावों में भाजपा की नैय्या पार?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-yogi-government-cabinet-expansion]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>राजनीतिक गुणा-भाग व विधानसभा चुनावों के चलते उत्तर प्रदेश की राजनीति में लंबे समय से लंबित चले आ रहे यूपी कैबिनेट के विस्तार पर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की आखिरकार मौहर लग ही गई‌। जिसके बाद से उत्तर प्रदेश में राजनीतिक सरगर्मी बहुत तेज़ हो गयी थी। शनिवार शाम 9 मई को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल से मुलाकात के बाद से ही कैबिनेट विस्तार में शामिल होने वाले चहरों के वारे में राजनीतिक गलियारों में तरह-तरह के कयास लगाये जा रहे थे। वहीं लखनऊ स्थित जन भवन में होने वाले इस शपथ ग्रहण समारोह के लिए भी शासन-प्रशासन के द्वारा सभी तैयारियां पूरी कर ली गई थी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने रविवार 10 मई 2026 की दोपहर 3.30 बजे अपने मंत्रिमंडल का विस्तार करते हुए 6 नये चहरों भूपेंद्र चौधरी व मनोज पांडेय को कैबिनेट मंत्री, कृष्णा पासवान, कैलाश राजपूत, सुरेन्द्र दिलेर व ⁠हंसराज विश्वकर्मा को राज्य मंत्री बनाया, वहीं अजीत पाल और सोमेंद्र तोमर का कद बढ़ाते हुए उन्हें राज्य मंत्री की जगह राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार बनाया गया।</div><div><br></div><div>हालांकि यूपी कैबिनेट विस्तार में कई पुराने चेहरों को हटाकर के कुछ नये चहरों को शामिल करने की देश व प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में जबरदस्त चर्चा चल रही थी, राजनेताओं व राजनीतिक विश्लेषकों की यूपी कैबिनेट विस्तार कि लिस्ट पर निगाहें टिकी हुई थी, लेकिन जब लिस्ट सामने आई तो किसी भी पुराने चेहरों को मंत्रीमंडल से हटाएं बिना ही 6 नये चहरों को मंत्रीमंडल में शामिल किया गया और दो राज्य मंत्रियों का प्रमोशन करते हुए उन्हें राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार बना दिया गया। हालांकि सूत्रों के अनुसार इस यूपी कैबिनेट विस्तार में कुछ चर्चित चेहरों के नाम अंतिम समय में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के राजनीतिक गुणा-भाग की कसौटी पर खरा उतरने में विफल रहे, जिसके चलते अंतिम समय में उनके नाम कैबिनेट विस्तार की राज्यपाल के पास जाने वाली लिस्ट में बाहर हो गये।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/major-pilgrimage-sites-are-falling-victim-to-discriminatory-development" target="_blank">विकास में भेदभाव का शिकार हो रहे हैं प्रमुख तीर्थस्थल</a></h3><div>इस कैबिनेट विस्तार में शामिल राजनेताओं के प्रोफाइल पर संक्षिप्त नज़र डालें तो कैबिनेट मंत्री भूपेंद्र चौधरी वर्ष 2017-2022 वाली योगी सरकार में भी पंचायती राज मंत्री रह चुके हैं और वह भाजपा के निवर्तमान पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भी हैं। वह राजनीति के एक मंझे हुए खिलाड़ी और बड़े जाट नेता के रूप में स्थापित माने जाते हैं। वहीं तेजतर्रार, व्यवहार कुशल, दबंग विधायक मनोज पांडेय ब्राह्मण समाज से आते हैं, वह रायबरेली के ऊंचाहार से विधायक हैं, वह सपा की अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सरकार में कैबिनेट मंत्री रह चुके हैं। उन्होंने राज्यसभा के चुनावों में खुलकर के भाजपा प्रत्याशी का साथ दिया था, जिसके बाद उन्हें सपा से निष्कासित कर दिया गया था, जिसके बाद उन्हें योगी आदित्यनाथ सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाकर के ईनाम दिया गया है। उनकी ताजपोशी से भाजपा के नेतृत्व स्पष्ट संदेश दे दिया है कि भाजपा सहयोग करने वालों का हमेशा ध्यान रखती है।</div><div><br></div><div>मेरठ दक्षिण विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के विधायक डॉक्टर सोमेंद्र तोमर गूर्जर समाज से आते हैं, डॉक्टर तोमर सरल स्वभाव के शानदार राजनेता हैं, फिलहाल वह योगी सरकार में राज्य मंत्री ऊर्जा एवं अतिरिक्त ऊर्जा स्रोत का कार्यभार देख रहे हैं, कैबिनेट विस्तार में उन्हें राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार के रूप में शपथ दिलाई गई है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव निरंतर गूर्जर वोटरों को अपने पक्ष में करने के लिए प्रयास कर रहे हैं, डॉक्टर तोमर के प्रमोशन को गूर्जर वोटरों को साधने की भाजपा नेतृत्व की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।</div><div><br></div><div>वहीं कानपुर देहात के सिकंदरा से भाजपा के विधायक अजीत पाल फिलहाल योगी सरकार में राज्य मंत्री विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी विभाग का कार्य देख रहे हैं। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने उनका प्रमोशन करते हुए उन्हें राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार के पद की शपथ दिलाई है।</div><div><br></div><div>वहीं कैबिनेट विस्तार में शामिल राज्य मंत्रियों की बात करें तो कन्नौज के तिर्वा से विधायक विधायक कैलाश सिंह राजपूत, वाराणसी में भाजपा के जिलाध्यक्ष और विधान परिषद सदस्य हंसराज विश्वकर्मा, अलीगढ़ के खैर से भाजपा के विधायक सुरेंद्र दिलेर, फतेहपुर के खागा से भाजपा की विधायक कृष्णा पासवान ने पहली बार राज्यमंत्री के रूप में पद व गोपनीयता की शपथ ली है। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को योगी सरकार के इस कैबिनेट विस्तार से बहुत उम्मीदें हैं।</div><div><br></div><div>हालांकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा के कोर वोटर माने जाने वाले त्यागी समाज के हाथ इस बार के कैबिनेट विस्तार में भी खाली ही रहे, जबकि त्यागी समाज के एक मात्र विधायक अजीत पाल त्यागी व विधान परिषद सदस्य अश्विनी त्यागी दोनों में से कम से कम एक का नाम कैबिनेट विस्तार की इस लिस्ट में शामिल होने की उम्मीद की जा रही थी।</div><div><br></div><div>राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो योगी आदित्यनाथ सरकार के कैबिनेट विस्तार का लक्ष्य वर्ष 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए राजनीतिक, सामाजिक, जाति और क्षेत्रीय समीकरण साधते हुए योगी सरकार के पक्ष में जबरदस्त उत्साहपूर्ण माहौल बनाने का है। वहीं भाजपा का शीर्ष नेतृत्व सपा प्रमुख अखिलेश यादव के पीडीए फार्मूला तोड़ करते हुए योगी सरकार के पक्ष में ब्राह्मण, ओबीसी, दलित व अन्य सभी सनातनियों को एकजुट करना है। हालांकि यह तो आने वाला समय ही बताएगा की भाजपा का शीर्ष नेतृत्व इसमें राजनीतिक गुणा-भाग में कितना सफल होगा, लेकिन जनता की अदालत में बार-बार के चुनाव परिणामों से यह स्पष्ट है कि मोदी, शाह व योगी की लोकप्रियता व चाणक्य नीति की काट का अभी देश में विपक्षी दलों के पास कोई विकल्प नहीं है।</div><div><br></div><div>- दीपक कुमार त्यागी</div><div>अधिवक्ता, स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 13 May 2026 13:10:59 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-yogi-government-cabinet-expansion</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Gold नहीं खरीदने की मोदी की अपील के बाद ज्वैलर्स लाये नई योजना, पुराने सोने के बदले नये गहने खरीदने पर आकर्षक स्कीमें]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/jewellers-launch-new-scheme-attractive-schemes-for-buying-new-jewellery-in-exchange-of-old-gold]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम एशिया युद्ध के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर बढ़ते दबाव और विदेशी मुद्रा भंडार पर असर को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से देशवासियों से एक वर्ष तक सोने की खरीद टालने की अपील के बाद अब इस मुद्दे पर बहस तेज हो गई है। जहां सरकार विदेशी मुद्रा के बहिर्गमन को नियंत्रित करना चाहती है, वहीं देश का आभूषण उद्योग इस सुझाव को लेकर चिंता जता रहा है। उद्योग संगठनों का कहना है कि मांग को दबाने की बजाय देश में पहले से मौजूद निष्क्रिय सोने को आर्थिक व्यवस्था में शामिल करने पर जोर दिया जाना चाहिए।</div><div><br></div><div>अखिल भारतीय ज्वैलर्स एंड गोल्डस्मिथ फेडरेशन ने सरकार से सोना खरीद टालने की अपील के स्थान पर घरेलू सोना संग्रहण और पुनर्चक्रण व्यवस्था को मजबूत करने की मांग की है। संगठन ने वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल को पत्र लिखकर कहा है कि विदेशी मुद्रा भंडार और बढ़ते आयात बिल को लेकर सरकार की चिंता उचित है, लेकिन व्यापक स्तर पर लोगों को सोना खरीदने से हतोत्साहित करने का असर पूरे आभूषण उद्योग पर पड़ सकता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/why-is-modi-forbidding-people-from-buying-gold-will-work-from-home-be-allowed-again" target="_blank">सोना खरीदने से क्यों मना कर रहे हैं मोदी? क्या फिर से होने वाला है Work From Home? पेट्रोल-डीजल के दाम कबसे बढ़ेंगे?</a></h3><div>फेडरेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष पंकज अरोरा ने कहा कि समाधान मांग को खत्म करना नहीं, बल्कि देश में मौजूद निष्क्रिय सोने को व्यवस्थित तरीके से आर्थिक उपयोग में लाना है। उनके अनुसार घरेलू सोना संग्रहण, पुनर्चक्रण और उत्पादक उपयोग के जरिये विदेशी मुद्रा की बचत की जा सकती है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि उपभोक्ताओं की सोच अचानक नकारात्मक हुई तो दुकानों पर ग्राहकों की संख्या घटेगी, निर्माण आदेश कम होंगे और छोटे ज्वैलर्स तथा कारीगरों की आय पर गंभीर असर पड़ेगा।</div><div><br></div><div>फेडरेशन का कहना है कि यह केवल व्यापार का मामला नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका से जुड़ा मुद्दा है। हम आपको बता दें कि भारत में लगभग साढ़े तीन करोड़ लोग प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आभूषण उद्योग से जुड़े हुए हैं। देश के ग्रामीण और शहरी परिवारों में सोना केवल विलासिता की वस्तु नहीं माना जाता, बल्कि यह बचत, सामाजिक सुरक्षा और विवाह परंपराओं का महत्वपूर्ण हिस्सा है। कई परिवारों के लिए आभूषण पहनने योग्य बचत के रूप में काम करते हैं।</div><div><br></div><div>इसी कारण फेडरेशन ने सरकार को कई वैकल्पिक सुझाव दिए हैं। संगठन ने गिफ्ट आईएफएससी या इंडिया इंटरनेशनल बुलियन एक्सचेंज व्यवस्था के भीतर एक समर्पित बुलियन बैंक स्थापित करने की मांग की है। यह संस्था घरेलू सोने के संग्रहण, शुद्धिकरण, उधार व्यवस्था और निपटान का केंद्रीय मंच बन सकती है। इसके अलावा गोल्ड ईटीएफ को अपने भौतिक सोना भंडार का बीस से तीस प्रतिशत तक नियामित ढांचे के तहत उधार देने की अनुमति देने का भी सुझाव दिया गया है।</div><div><br></div><div>फेडरेशन ने वर्ष 2015 में शुरू की गई स्वर्ण मुद्रीकरण योजना की समीक्षा की भी मांग की है। संगठन का कहना है कि संरचनात्मक कमजोरियों के कारण यह योजना अपेक्षित स्तर तक सफल नहीं हो सकी। इसके साथ ही डीमैट स्वरूप वाले बुलियन जमा प्रमाणपत्र, सोना हस्तांतरण पर कर और जीएसटी तटस्थता तथा राष्ट्रीय स्तर पर सोना संग्रहण और आयात प्रतिस्थापन की निगरानी के लिए डैशबोर्ड बनाने का सुझाव भी दिया गया है।</div><div><br></div><div>विशेषज्ञों का मानना है कि भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां निजी हाथों में सबसे अधिक सोना मौजूद है। यदि इस सोने को औपचारिक आर्थिक ढांचे में शामिल किया जाए तो हर वर्ष दो सौ से तीन सौ टन तक सोना आयात की जरूरत कम की जा सकती है। इससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी और रोजगार पर नकारात्मक असर भी नहीं पड़ेगा।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो भारत में सोने के आयात में लगातार बढ़ोतरी ने सरकार की चिंता और बढ़ा दी है। आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2025-26 में देश का सोना आयात चौबीस प्रतिशत से अधिक बढ़कर रिकॉर्ड इकहत्तर अरब अट्ठानवे करोड़ डॉलर पर पहुंच गया, जबकि इससे पिछले वर्ष यह अट्ठावन अरब डॉलर था। हालांकि मात्रा के हिसाब से आयात घटकर सात सौ इक्कीस टन रह गया, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों में तेज उछाल के कारण आयात बिल तेजी से बढ़ा। भारत चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोना उपभोक्ता है और वैश्विक अनिश्चितता के दौर में लोग सोने को सुरक्षित निवेश मानते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि सोने के बढ़ते आयात से व्यापार घाटा और चालू खाते के घाटे पर दबाव बढ़ रहा है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार पर भी असर पड़ता है।</div><div><br></div><div>इस बीच, मोदी सरकार ने सोने के आयात को नियंत्रित करने के लिए कई कदम उठाए हैं। वर्ष 2022 में आयात शुल्क बढ़ाकर पंद्रह प्रतिशत किया गया था, हालांकि बाद में आभूषण उद्योग को राहत देने और तस्करी रोकने के उद्देश्य से इसे घटाकर छह प्रतिशत कर दिया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि मुक्त व्यापार समझौतों के कारण संयुक्त अरब अमीरात से सोने का आयात तेजी से बढ़ा है। आर्थिक शोध संस्था जीटीआरआई ने चेतावनी दी है कि दुबई के रास्ते तीसरे देशों का सोना कम शुल्क का लाभ लेकर भारत पहुंच रहा है, जिससे व्यापार संतुलन प्रभावित हो सकता है। संस्था ने सरकार से व्यापार समझौतों की समीक्षा, सख्त नियम लागू करने तथा भविष्य के समझौतों में सोना, चांदी और प्लेटिनम जैसे उत्पादों को विशेष रियायतों से बाहर रखने की सिफारिश की है।</div><div><br></div><div>उधर, प्रधानमंत्री की अपील के बाद अब सोना विनिमय योजनाएं भी चर्चा में आ गई हैं। लंबे समय से आभूषण दुकानों में पुराना सोना बदलकर नया आभूषण लेने की सुविधा उपलब्ध है, लेकिन ताजा खरीद की तुलना में यह व्यवस्था अपेक्षाकृत कम लोकप्रिय रही है। अब इसे एक वैकल्पिक उपाय के रूप में देखा जा रहा है।</div><div><br></div><div>कई प्रमुख ज्वैलरी कंपनियां ग्राहकों को पुराना सोना बदलकर नया आभूषण लेने की सुविधा देती हैं। इस प्रक्रिया में पुराने आभूषण, टूटे हुए गहने, अनुपयोगी सोने की वस्तुएं और सोने के सिक्के तक स्वीकार किए जाते हैं। सबसे पहले प्रमाणित विधियों से सोने की शुद्धता जांची जाती है। इसके बाद उस दिन के बाजार भाव के अनुसार मूल्य तय किया जाता है और ग्राहक उसी राशि के आधार पर नया आभूषण खरीद सकता है। हालांकि ग्राहक को नए आभूषण पर मेकिंग चार्ज, जीएसटी तथा पत्थर या अशुद्धि होने पर कटौती का भुगतान करना पड़ता है।</div><div><br></div><div>उदाहरण के तौर पर यदि किसी ग्राहक के पास बीस ग्राम का बाइस कैरेट पुराना आभूषण है और उस दिन सोने का भाव तेरह हजार नौ सौ पैंतालीस रुपये प्रति ग्राम है, तो उसके सोने का अनुमानित मूल्य लगभग दो लाख अठहत्तर हजार नौ सौ रुपये होगा। इस राशि का उपयोग नया आभूषण खरीदने में किया जा सकता है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, सरकार और उद्योग के बीच अब इस बात पर सहमति बनाने की जरूरत महसूस की जा रही है कि विदेशी मुद्रा बचत और रोजगार सुरक्षा दोनों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। उद्योग संगठनों का मानना है कि यदि घरेलू सोने को व्यवस्थित रूप से आर्थिक प्रवाह में लाया जाए तो देश को आयात पर निर्भरता घटाने के साथ रोजगार और कारोबार दोनों को सुरक्षित रखने में मदद मिल सकती है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 12 May 2026 13:05:38 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/jewellers-launch-new-scheme-attractive-schemes-for-buying-new-jewellery-in-exchange-of-old-gold</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[रोगियों की मुस्कान और उम्मीद का दूसरा नाम हैं नर्सें]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/nurses-are-the-other-name-for-patients-smiles-and-hope]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हर वर्ष 12 मई को पूरी दुनिया अंतर्राष्ट्रीय नर्स दिवस मनाती है। यह दिन आधुनिक नर्सिंग सेवा की जननी मानी जाने वाली फ्लोरेंस नाइटिंगेल की जयंती के रूप में मनाया जाता है। यह दिवस उन अनगिनत संवेदनशील हाथों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है, जो दिन-रात रोगियों के दर्द को कम करने, उन्हें जीवन का भरोसा देने और मृत्यु से संघर्ष कर रहे व्यक्ति के भीतर आशा का दीप जलाने का कार्य करते हैं। दुनिया में नर्सों की सेवा सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, हर दिन, नर्सें शांत शक्ति, स्थिर हाथों और करुणा से भरे दिलों के साथ अस्पतालों, क्लीनिकों और विभिन्न सामुदायिक स्थानों पर कदम रखते हुए रोगियों के लिये देवदूत बनती हैं। नर्से भगवान का रूप होती है, वे ही इंसान के जन्म की पहली साक्षी बनती है और उनमें करुणा का बीज बोती है। एक रोगी को स्वस्थ करने में वे अपना सब कुछ दे देती हैं। रोगी की सेवा करते हुए वे अपना पारिवारिक सुख, करियर, जीवन और वर्तमान सबकुछ झोंक देती है। वर्ष 2026 की थीम “हमारी नर्सें, हमारा भविष्य- सशक्त नर्सें जीवन बचाती हैं” पूरी दुनिया को यह संदेश देती है कि यदि स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत बनाना है तो नर्सों को सम्मान, सुरक्षा, संसाधन और सशक्त वातावरण देना होगा। यह दिवस 1965 से इंटरनेशनल काउंसिल ऑफ नर्सेज द्वारा शुरु हुआ है, बहुत से लोग इस दिन का उपयोग अपने देश एवं दुनिया में नर्सों द्वारा किए गए अद्भुत सेवा कार्यों का सम्मान करने के लिए करते हैं।</div><div><br></div><div>सचमुच नर्सें अस्पतालों की आत्मा होती हैं। चिकित्सक जहां रोग की पहचान और उपचार का मार्ग तय करता है, वहीं नर्स अपने स्पर्श, सेवा, सहानुभूति और निरंतर देखभाल से रोगी को जीने की शक्ति देती है। रोगी जब दर्द, भय, चिंता और असहायता से घिरा होता है, तब नर्स ही उसके चेहरे पर विश्वास की मुस्कान बनकर सामने आती है। वह केवल इंजेक्शन लगाने, दवाइयां देने या रिपोर्ट संभालने तक सीमित नहीं होती, बल्कि वह रोगी के मनोबल की संरक्षक होती है। वह अपने व्यवहार, शब्दों और संवेदनाओं से रोगी को यह विश्वास दिलाती है कि वह अकेला नहीं है। यही कारण है कि दुनिया भर में नर्सों को “धरती के फरिश्ते” कहा जाता है। मानवीय सेवा का सबसे जीवंत और प्रभावशाली स्वरूप यदि कहीं दिखाई देता है तो वह नर्सिंग सेवा में दिखाई देता है। एक नर्स रोगी की पीड़ा को केवल देखती नहीं, बल्कि उसे महसूस भी करती है। वह रात-रात भर जागकर मरीजों की देखभाल करती है, उनके दर्द की भाषा समझती है, उनकी छोटी-छोटी जरूरतों का ध्यान रखती है और कई बार अपने परिवार, अपने स्वास्थ्य और अपनी खुशियों की कीमत पर भी रोगियों की सेवा करती है। कोविड-19 जैसी वैश्विक महामारी के समय पूरी दुनिया ने देखा कि जब लोग अपने ही परिजनों से दूरी बना रहे थे, तब नर्सें संक्रमित मरीजों के सबसे निकट खड़ी थीं। उन्होंने मृत्यु के भय को पीछे छोड़कर जीवन की रक्षा का संकल्प निभाया। उस दौर ने यह सिद्ध कर दिया कि नर्सें केवल स्वास्थ्यकर्मी नहीं, बल्कि मानवता की सबसे मजबूत प्रहरी हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/trending/a-salute-to-nurses-an-exemplary-symbol-of-service-and-dedication" target="_blank">International Nurses Day 2026: सेवा और समर्पण की मिसाल Nurses को सलाम, Florence Nightingale ने दिखाई थी सम्मान की राह</a></h3><div>नर्सिंग सेवा केवल पेशा नहीं, बल्कि करुणा, धैर्य और त्याग की साधना है। एक नर्स उस समय भी मुस्कुराती रहती है जब वह स्वयं मानसिक और शारीरिक थकान से गुजर रही होती है। वह रोगियों के बीच आशा का वातावरण बनाती है। कई बार ऐसे मरीज, जो मानसिक रूप से टूट चुके होते हैं, नर्सों की आत्मीयता और प्रेरणा से पुनः जीवन के प्रति सकारात्मक हो जाते हैं। चिकित्सा विज्ञान में दवाइयों की अपनी भूमिका है, लेकिन संवेदनशील देखभाल और मानसिक संबल रोगी के उपचार को अधिक प्रभावी बनाते हैं। यही कारण है कि कहा जाता है कि “नर्स का स्पर्श भी एक औषधि है।” आज जब दुनिया आधुनिक तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में प्रवेश कर चुकी है, तब भी नर्सिंग सेवा की आवश्यकता और महत्ता कम नहीं हुई, बल्कि और अधिक बढ़ी है। मशीनें रोग का परीक्षण कर सकती हैं, लेकिन वे रोगी की आंखों में छिपे भय को नहीं पढ़ सकतीं। तकनीक इलाज का माध्यम बन सकती है, लेकिन वह करुणा का विकल्प नहीं बन सकती। नर्सों की सबसे बड़ी शक्ति उनकी संवेदनशीलता है, जो उन्हें अन्य सभी स्वास्थ्य सेवाओं से अलग पहचान देती है। इसी कारण आज भी नर्सिंग दुनिया का सबसे अधिक अपेक्षित और सम्मानित स्वास्थ्य पेशा माना जाता है।</div><div><br></div><div>विश्व स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने आज सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक प्रशिक्षित नर्सों की कमी है। विकसित देशों में बेहतर वेतन और सुविधाओं के कारण विकासशील देशों की अनेक प्रतिभाशाली नर्सें विदेशों की ओर आकर्षित हो रही हैं। परिणामस्वरूप गरीब और विकासशील देशों की स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित हो रही हैं। विश्व स्तर पर नर्सों की बढ़ती आवश्यकता यह संकेत देती है कि आने वाले समय में स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता नर्सों की उपलब्धता और दक्षता पर ही निर्भर करेगी। इसलिए यह समय नर्सों को केवल “सेवक” के रूप में देखने का नहीं, बल्कि उन्हें स्वास्थ्य व्यवस्था के निर्णायक स्तंभ के रूप में स्वीकार करने का है। भारत जैसे विशाल देश में नर्सिंग सेवा को अधिक सशक्त, सम्मानजनक और सुरक्षित बनाने की अत्यंत आवश्यकता है। नर्सों के लिए बेहतर वेतनमान, सुरक्षित कार्य-परिस्थितियां, पर्याप्त अवकाश, मानसिक स्वास्थ्य सहयोग, कौशल विकास और नेतृत्व के अवसर सुनिश्चित किये जाने चाहिए। निजी और सरकारी अस्पतालों को मिलकर ऐसा वातावरण बनाना होगा जहां नर्सें सम्मान और आत्मविश्वास के साथ कार्य कर सकें। यदि नर्सें स्वयं तनाव, असुरक्षा और उपेक्षा से घिरी रहेंगी, तो स्वास्थ्य सेवाओं की मानवीय गुणवत्ता प्रभावित होगी। इसलिए नर्सों का कल्याण केवल उनका व्यक्तिगत प्रश्न नहीं, बल्कि पूरी मानवता के स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ विषय है।</div><div><br></div><div>अंतर्राष्ट्रीय नर्स दिवस की 2026 की थीम भी इसी सोच को आगे बढ़ाती है कि “सशक्त नर्सें जीवन बचाती हैं।” जब नर्सों को प्रशिक्षण, संसाधन, निर्णय लेने का अधिकार और सामाजिक सम्मान मिलेगा, तभी वे अपनी पूरी क्षमता के साथ समाज को स्वस्थ बना सकेंगी। यह दिवस हमें केवल नर्सों का सम्मान करने की प्रेरणा नहीं देता, बल्कि यह भी याद दिलाता है कि नर्सों के बिना कोई भी स्वास्थ्य व्यवस्था पूर्ण नहीं हो सकती। अस्पतालों की वास्तविक धड़कन नर्सें ही हैं। रोगियों की आंखों में लौटती चमक, परिवारों के चेहरे पर आती राहत और स्वस्थ जीवन की ओर लौटते कदमों में नर्सों की निःस्वार्थ सेवा का मौन योगदान छिपा होता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि समाज नर्सों को केवल एक कर्मचारी के रूप में न देखे, बल्कि उन्हें मानवता के संवेदनशील रक्षकों के रूप में पहचाने। बच्चों के जन्म से लेकर जीवन की अंतिम सांस तक नर्सें हर महत्वपूर्ण क्षण में हमारे साथ खड़ी रहती हैं। वे दर्द को कम करती हैं, टूटे मन को संभालती हैं और निराशा में उम्मीद का प्रकाश जगाती हैं। सच तो यह है कि नर्सें केवल शरीर का उपचार नहीं करतीं, वे मनुष्य के भीतर जीने की इच्छा को भी जीवित रखती हैं।</div><div><br></div><div>आम दिन हो या महामारियों के खिलाफ जंग, ये नर्स बिना किसी डर के सहजता और उत्साह से अपने कर्तव्य का पालन करती है। इसलिए नहीं कि यह उनका काम है और उसके लिए उन्हें पैसे मिलते हैं बल्कि इसलिए कि वह सबसे पहले दूसरों के स्वस्थ होने और उनकी जान की फिक्र करती हैं। स्वास्थ्य के क्षेत्र में मां के स्वरूप में स्नेहपूर्ण और फिक्र के साथ हर किसी की देखभाल और परवाह करने के शब्द को ही नर्स कहा जाता है। वे अस्पताल की रीड होती है। ऐसी मानवीय सेवा की अद्भुत फरिश्तों के कल्याण एवं प्रोत्साहन का चिन्तन अपेक्षित है। उससे निश्चित ही नर्सों की सेवाएं अधिक सक्षम, प्रभावी एवं मानवीय होकर सामने आयेगी। इस अंतर्राष्ट्रीय नर्स दिवस पर यही संकल्प अपेक्षित है कि हम नर्सों की सेवाओं को अधिक सम्मान, सुरक्षा और सहयोग प्रदान करें। उनके कल्याण, प्रोत्साहन और सशक्तिकरण का व्यापक चिंतन हो। जब नर्सों का जीवन अधिक सुरक्षित, संतुलित और सम्मानपूर्ण होगा, तब उनकी सेवाएं और अधिक प्रभावी, संवेदनशील और मानवीय बन सकेंगी। यही इस दिवस का वास्तविक उद्देश्य और मानवता के प्रति हमारी सच्ची संवेदनशीलता होगी।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 12 May 2026 12:25:37 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/nurses-are-the-other-name-for-patients-smiles-and-hope</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[सोना खरीदने से क्यों मना कर रहे हैं मोदी? क्या फिर से होने वाला है Work From Home? पेट्रोल-डीजल के दाम कबसे बढ़ेंगे?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/why-is-modi-forbidding-people-from-buying-gold-will-work-from-home-be-allowed-again]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम एशिया में जारी अमेरिका ईरान तनाव का असर अब भारत की अर्थव्यवस्था और आम लोगों की जिंदगी पर साफ दिखाई देने लगा है। कच्चे तेल की कीमतों में लगातार हो रही तेजी, रुपये पर बढ़ता दबाव और विदेशी मुद्रा भंडार को लेकर गहराती चिंता के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से बचत करने की अपील की है। हैदराबाद में एक जनसभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने लोगों से एक वर्ष तक सोना खरीदने से बचने, विदेश यात्राएं टालने और जहां संभव हो वहां घर से काम करने जैसे उपाय अपनाने का आग्रह किया।</div><div><br></div><div>प्रधानमंत्री ने कहा कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण वैश्विक आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित हुई है और होरमुज जलडमरूमध्य में बाधा आने से तेल की आपूर्ति को लेकर गंभीर संकट पैदा हो गया है। हम आपको बता दें कि यह समुद्री मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में गिना जाता है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के शांति प्रस्ताव को ठुकराए जाने के बाद कच्चे तेल की कीमतें एक सौ पांच डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गईं, जिससे पूरी दुनिया में महंगाई और ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/jairam-ramesh-big-claim-after-pm-modi-7-appeals-shock-of-inflation-fuel-prices-will-increase" target="_blank">Jairam Ramesh का बड़ा दावा: PM Modi की 7 अपीलों के बाद लगेगा महंगाई का झटका, बढ़ेंगे Fuel Price</a></h3><div>भारत अपनी जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में तेजी का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। रुपये में कमजोरी आई है और आयात बिल लगातार बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री ने कहा कि कोरोना काल के दौरान देश ने घर से काम, वर्चुअल बैठकों और वीडियो संवाद जैसी व्यवस्थाओं को अपनाया था। अब समय आ गया है कि इन तरीकों को फिर से व्यापक रूप से अपनाया जाए ताकि ईंधन की खपत कम हो और विदेशी मुद्रा की बचत हो सके।</div><div><br></div><div>उन्होंने लोगों से मेट्रो रेल का अधिक उपयोग करने, कार पूल जैसी शेयरिंग व्यवस्था अपनाने और बिजली से चलने वाले वाहनों को प्राथमिकता देने की अपील की। साथ ही माल परिवहन को सड़कों की बजाय रेलमार्ग की ओर ले जाने की बात भी कही ताकि डीजल पर निर्भरता घटाई जा सके। हम आपको बता दें कि पश्चिम एशिया संकट के बाद भारत का ईंधन आयात खर्च तेजी से बढ़ा है और यदि होरमुज जलडमरूमध्य में बाधा लंबे समय तक बनी रही तो तेल की ऊंची कीमतें कई महीनों तक बनी रह सकती हैं।</div><div><br></div><div>प्रधानमंत्री की सबसे अधिक चर्चा में रही अपील सोने की खरीद को लेकर थी। उन्होंने कहा कि देशहित में नागरिकों को कम से कम एक वर्ष तक सोना खरीदने से बचना चाहिए। हम आपको बता दें कि भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना आयातकों में शामिल है और विवाह तथा त्योहारों के मौसम में इसकी मांग बहुत बढ़ जाती है। चूंकि सोना मुख्य रूप से विदेशों से आयात किया जाता है, इसलिए इसकी अधिक खरीद से डॉलर बाहर भेजना पड़ता है और भारत के घरेलू विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ता है।</div><div><br></div><div>अर्थशास्त्रियों के अनुसार भारत के लिए कच्चे तेल और सोने में एक समानता है। दोनों का बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदा जाता है और भुगतान अमेरिकी डॉलर में किया जाता है। जब तेल महंगा होता है और साथ ही सोने की मांग भी बढ़ जाती है, तब देश को आयात के लिए अधिक डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इससे चालू खाते का घाटा बढ़ता है और रुपये पर दबाव आता है। यही कारण है कि आर्थिक संकट के समय सरकारें अक्सर सोने के आयात को नियंत्रित करने के उपाय करती रही हैं। अतीत में भी आयात शुल्क बढ़ाने, आयात पर रोक लगाने और वैकल्पिक योजनाओं को बढ़ावा देने जैसे कदम उठाए जा चुके हैं।</div><div><br></div><div>प्रधानमंत्री ने लोगों से अनावश्यक विदेश यात्राएं, विदेशी पर्यटन और विदेशों में आयोजित होने वाले विवाह समारोह भी एक वर्ष तक टालने का आग्रह किया। उनका कहना था कि मध्यम वर्ग में विदेश घूमने और विदेश में विवाह करने का चलन तेजी से बढ़ा है, लेकिन मौजूदा वैश्विक संकट के समय विदेशी मुद्रा बचाना राष्ट्रीय आवश्यकता बन गया है।</div><div><br></div><div>इस बीच, अमेरिका ईरान युद्ध का असर वैश्विक सोना बाजार पर भी दिखाई दे रहा है। आम तौर पर युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव के समय निवेशक सोने को सुरक्षित निवेश मानते हैं, जिससे इसकी कीमतें बढ़ती हैं। लेकिन इस बार स्थिति जटिल है क्योंकि तेल की कीमतों में उछाल से महंगाई और ब्याज दरों के लंबे समय तक ऊंचे बने रहने की आशंका बढ़ गई है। ऊंची ब्याज दरों के कारण निवेशक सोने की बजाय ब्याज देने वाले निवेश विकल्पों की ओर आकर्षित हो रहे हैं। इसी कारण युद्ध की अनिश्चितता के बावजूद अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों में उतार-चढ़ाव बना हुआ है।</div><div><br></div><div>हम आपको यह भी बता दें कि प्रधानमंत्री ने केवल ईंधन और सोने तक ही अपनी अपील सीमित नहीं रखी। उन्होंने खाद्य तेल की खपत घटाने, रासायनिक उर्वरकों के उपयोग को कम करने और प्राकृतिक खेती तथा स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देने की भी बात कही। उनका कहना था कि किसी भी तरह विदेशी मुद्रा की बचत करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है और देश को आत्मनिर्भर बनाने में हर नागरिक की भूमिका महत्वपूर्ण है।</div><div><br></div><div>हालांकि विपक्ष ने प्रधानमंत्री की इस अपील पर सवाल भी उठाए हैं। कांग्रेस ने कहा है कि सरकार ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने में विफल रही है और अब आम लोगों पर बोझ डाल रही है। दूसरी ओर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने प्रधानमंत्री की अपील को दूरदर्शी कदम बताते हुए कहा कि इससे भारत ऊर्जा के क्षेत्र में अधिक सुरक्षित और आत्मनिर्भर बन सकेगा।</div><div><br></div><div>उधर, विशेषज्ञों का मानना है कि प्रधानमंत्री का संदेश केवल सोना या ईंधन बचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश को संभावित वैश्विक आर्थिक संकट के लिए तैयार करने का संकेत भी है। यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहीं और सोने का आयात भी बढ़ता रहा, तो महंगाई, आयात बिल और रुपये पर दबाव और अधिक बढ़ सकता है। ऐसे में सरकार नागरिकों से संयम, बचत और स्वदेशी सोच अपनाने की अपील कर रही है ताकि वैश्विक संकट के बीच भारत की आर्थिक स्थिरता बनी रहे।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 11 May 2026 13:05:25 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/why-is-modi-forbidding-people-from-buying-gold-will-work-from-home-be-allowed-again</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[बंगाल की हिंसा है लोकतंत्र पर धब्बा और बड़ी चुनौती]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-violence-in-bengal-is-a-blot-on-democracy-and-a-major-challenge]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम बंगाल में हाल ही में सम्पन्न विधानसभा चुनावों के बाद जिस प्रकार हिंसा, हत्याओं, आगजनी और राजनीतिक प्रतिशोध की घटनाएं सामने आई हैं, उन्होंने केवल राज्य की शांति को ही नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा को भी आहत किया है। चुनाव लोकतंत्र का उत्सव माना जाता है, किंतु जब यह उत्सव हिंसा, भय और प्रतिशोध में बदल जाए तो यह केवल राजनीतिक असफलता नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक पतन का संकेत बन जाता है। बंगाल की ताजा हिंसक घटनाएं इसी चिंता को सामने लाती हैं। चुनाव के दौरान छिटपुट घटनाओं को छोड़ दें तो मतदान अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण ढंग से सम्पन्न हुआ था। लेकिन परिणामों की घोषणा के बाद जिस प्रकार राजनीतिक दलों के समर्थक एक-दूसरे के खिलाफ आक्रामक हुए, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा अब वैचारिक संघर्ष न रहकर प्रतिशोध और वर्चस्व की लड़ाई बनती जा रही है। भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के बीच हिंसक झड़पें, कई लोगों की हत्याएं और विशेष रूप से सुवेंदु अधिकारी के करीबी चंद्रनाथ रथ की हत्या ने पूरे घटनाक्रम को और अधिक गंभीर बना दिया। आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हुआ, लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर लोकतंत्र में हिंसा की कोई जगह क्यों बची रहनी चाहिए?</div><div><br></div><div>यह विडंबना है कि भारत, जिसने विश्व को अहिंसा, करुणा और “वसुधैव कुटुम्बकम्” का मंत्र दिया, आज वही देश राजनीतिक हिंसा के कारण अपनी छवि धूमिल करता दिखाई देता है। महात्मा गांधी ने राजनीति को नैतिकता और सेवा से जोड़ा था, लेकिन आज राजनीति सत्ता, प्रतिशोध और भय का माध्यम बनती जा रही है। बंगाल की हिंसा इस बीमारी का एक भयावह उदाहरण है। पश्चिम बंगाल का राजनीतिक इतिहास हिंसा से अछूता नहीं रहा है। वामपंथी शासन के लंबे दौर से लेकर तृणमूल कांग्रेस के शासनकाल तक राजनीतिक संघर्ष कई बार रक्तरंजित रूप में सामने आया। बूथ कब्जाने, विरोधियों को डराने, स्थानीय दबंगों और अपराधी तत्वों का राजनीतिक संरक्षण-ये सब बंगाल की राजनीति की कटु वास्तविकताएं रही हैं। सत्ता बदलती रही, लेकिन राजनीतिक संस्कृति में अपेक्षित परिवर्तन नहीं आ सका। यही कारण है कि चुनाव परिणामों के बाद भी हिंसा का वातावरण बनता है और आम नागरिक भय तथा असुरक्षा के बीच जीने को मजबूर होता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/mother-first-demand-after-son-suvendu-adhikari-became-cm-provide-justice-to-rg-kar-victim" target="_blank">बेटे Suvendu Adhikari के CM बनने पर मां की पहली मांग- RG Kar पीड़िता को न्याय दिलाओ</a></h3><div>दरअसल जब राजनीति विचार और जनसेवा से हटकर केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम बन जाती है, तब हिंसा उसका स्वाभाविक परिणाम बनती है। हार को लोकतांत्रिक विनम्रता से स्वीकार करने के बजाय प्रतिशोध का माध्यम बना लेना लोकतांत्रिक मूल्यों का अपमान है। यही कारण है कि चुनाव आयोग के स्पष्ट निर्देशों और विजय जुलूसों पर प्रतिबंध के बावजूद हिंसक घटनाएं हुईं। यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों की नैतिक विफलता भी है। ममता बनर्जी द्वारा चुनाव परिणामों पर सवाल उठाना और राजनीतिक टकराव को तीखा बनाना हो या भाजपा द्वारा आक्रामक राजनीतिक प्रतिक्रिया-दोनों पक्षों को आत्ममंथन करने की आवश्यकता है। लोकतंत्र में विपक्ष और सत्ता दोनों की जिम्मेदारी होती है कि वे जनता को शांति और संयम का संदेश दें। दुर्भाग्य से हमारे राजनीतिक दल अक्सर कार्यकर्ताओं की भावनाओं को नियंत्रित करने के बजाय उन्हें उकसाने का काम करते हैं। परिणामस्वरूप हिंसा सामान्य राजनीतिक व्यवहार का हिस्सा बनती जा रही है।</div><div><br></div><div>सबसे अधिक पीड़ा इस बात की है कि राजनीतिक हिंसा की कीमत हमेशा आम जनता को चुकानी पड़ती है। जिन लोगों के घर जलते हैं, जिन परिवारों के सदस्य मारे जाते हैं, जिन छोटे व्यापारियों की दुकानें टूटती हैं, उनका राजनीति से कोई सीधा संबंध नहीं होता। वे केवल उस हिंसक मानसिकता के शिकार बनते हैं जो सत्ता को मानवता से ऊपर मानती है। यह प्रश्न गंभीरता से पूछा जाना चाहिए कि आखिर राजनीतिक दल हिंसा का सहारा क्यों लेते हैं? जबकि इतिहास गवाह है कि हिंसा कभी स्थायी समाधान नहीं देती। हिंसा केवल भय, अविश्वास और प्रतिशोध को जन्म देती है। जो दल हिंसा को हथियार बनाते हैं, वे अंततः जनता की नजरों में अपना नैतिक अधिकार खो देते हैं। राजनीति का उद्देश्य समाज को जोड़ना होना चाहिए, तोड़ना नहीं।</div><div><br></div><div>आज भारत एक नए वैश्विक दौर में प्रवेश कर रहा है। दुनिया भारत को एक उभरती आर्थिक शक्ति, तकनीकी महाशक्ति और लोकतांत्रिक मॉडल के रूप में देख रही है। वर्ष 2047 तक जब भारत अपनी स्वतंत्रता के सौ वर्ष पूरे करेगा, तब हमारा लक्ष्य केवल आर्थिक विकास नहीं होना चाहिए, बल्कि एक ऐसे सभ्य और नैतिक राष्ट्र का निर्माण भी होना चाहिए जहां राजनीति का आधार अहिंसा, संवाद और संवेदनशीलता हो। यदि राजनीतिक दल नफरत, सांप्रदायिकता और हिंसा को अपना हथियार बनाए रखेंगे, तो विकसित भारत का सपना अधूरा रह जाएगा। भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी सांस्कृतिक चेतना रही है। गौतम बुद्ध ने करुणा का संदेश दिया, महावीर ने अहिंसा को जीवन का सर्वोच्च मूल्य बताया, गांधी ने सत्य और अहिंसा के बल पर साम्राज्य को चुनौती दी। यह वही भारत है जिसने दुनिया को यह सिखाया कि मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति प्रेम और सह-अस्तित्व है। लेकिन आज राजनीतिक स्वार्थों और गैर-राजनीतिक आपराधिक तत्वों के कारण देश की छवि प्रभावित हो रही है। अपराधी मानसिकता के लोग राजनीतिक संरक्षण प्राप्त कर लोकतंत्र को कमजोर कर रहे हैं। वे दल बदलते रहते हैं, लेकिन उनका उद्देश्य केवल शक्ति और स्वार्थ की पूर्ति होता है। बंगाल की ताजा घटनाओं में भी ऐसे तत्वों की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता।</div><div><br></div><div>समाधान केवल प्रशासनिक कठोरता में नहीं, बल्कि राजनीतिक संस्कृति के परिवर्तन में निहित है। सबसे पहले सभी राजनीतिक दलों को सार्वजनिक रूप से हिंसा की निंदा करनी चाहिए और अपने कार्यकर्ताओं को संयम बरतने का स्पष्ट संदेश देना चाहिए। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को यह समझना होगा कि लोकतंत्र प्रतिद्वंद्विता का नहीं, सह-अस्तित्व का नाम है। दूसरा, कानून व्यवस्था को लेकर “जीरो टॉलरेंस” की नीति अपनानी होगी। किसी भी दल से जुड़े उपद्रवियों के खिलाफ निष्पक्ष कार्रवाई होनी चाहिए। पुलिस और प्रशासन को राजनीतिक दबाव से मुक्त रखकर संवेदनशील क्षेत्रों में सतर्क निगरानी बढ़ानी होगी। तीसरा, राजनीति के अपराधीकरण पर कठोर नियंत्रण आवश्यक है। ऐसे लोगों को राजनीतिक दलों में प्रवेश ही न मिले जिनकी पृष्ठभूमि हिंसक और आपराधिक रही हो। राजनीतिक दलों को अपने भीतर नैतिक अनुशासन विकसित करना होगा। चैथा, समाज में लोकतांत्रिक शिक्षा और संवेदनशीलता का वातावरण बनाना होगा। विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और सामाजिक संस्थाओं में संवाद, सहिष्णुता और अहिंसा के मूल्यों को मजबूत करना समय की आवश्यकता है। जब तक समाज स्वयं हिंसा को अस्वीकार नहीं करेगा, तब तक राजनीतिक हिंसा का अंत कठिन होगा।</div><div><br></div><div>बंगाल की ताजा हिंसा केवल एक राज्य की समस्या नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के सामने खड़ी एक गंभीर चेतावनी है। यदि हमने समय रहते राजनीति को स्वस्थ मूल्यों की ओर नहीं मोड़ा, तो नफरत और हिंसा लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करती रहेंगी। आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत अपनी आत्मा को पहचाने। यह देश युद्ध और प्रतिशोध की नहीं, बल्कि शांति, सह-अस्तित्व और विश्वबंधुत्व की भूमि है। “वसुधैव कुटुम्बकम्” केवल एक नारा नहीं, बल्कि भारत की सभ्यता का मूल दर्शन है। यदि राजनीति इस दर्शन से विमुख होगी, तो लोकतंत्र केवल सत्ता संघर्ष बनकर रह जाएगा। पश्चिम बंगाल को अब हिंसा और प्रतिशोध की राजनीति से बाहर निकलकर विकास, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक समरसता की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। यही लोकतंत्र की गरिमा है, यही जनता की अपेक्षा है और यही विकसित भारत का मार्ग भी।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 09 May 2026 18:21:07 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-violence-in-bengal-is-a-blot-on-democracy-and-a-major-challenge</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[सम्राट चौधरी सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार के राजनीतिक निहितार्थ को समझिए]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/understand-the-political-implications-of-the-cabinet-expansion-by-samrat-chaudhary-government]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बिहार में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के मंत्रिमंडल विस्तार के कई गहरे राजनीतिक मायने हैं। यह केवल सत्ता संचालन का मामला नहीं, बल्कि 2029 लोकसभा और आगामी बिहार विधानसभा चुनावों की व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी ने इसे राष्ट्रीय स्तर का शक्ति प्रदर्शन बना दिया। पश्चिम बंगाल और असम में भाजपा को मिली अभूतपूर्व विजय से बिहार का महत्व और भी बढ़ चुका है, क्योंकि पश्चिम, उत्तर, मध्य भारत के बाद पूर्वी भारत में भाजपा ने गजब का विस्तार किया है। इसे बरकरार रखने में बिहार की अहम भूमिका होगी।</div><div><br></div><div>राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, सम्राट मंत्रिमंडल विस्तार का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश यह है कि बिहार में भाजपा अब “सहयोगी दल” नहीं बल्कि “मुख्य धुरी” बनना चाहती है। यही वजह है कि वह एनडीए के सामाजिक समीकरणों को फिर से पुनर्गठित कर रहा है। खासकर 'नीतीश युग' से 'सम्राट युग' की ओर नियंत्रित लेकिन सधे हुए कदमों से वह कदमताल भर रही है, जिसका सारा श्रेय मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के साहस, समर्पण, और सहृदयता को जाता है, जिससे मोदी-शाह का काम आसान हुआ।</div><div><br></div><div>देखा जाए तो भाजपा आम चुनाव 2029 की राजनीति की नींव अभी से रखी जा रही है। इसके लिए नीतीश सरकार के जातीय समीकरण को अक्षुण्ण रखते हुए सामाजिक न्याय और हिंदुत्व को नई धार दे चुकी है। इससे बिहार विधानसभा चुनाव 2030 में भी बहुत फायदा मिलेगा। वहीं, पूर्वी भारत के लिए भविष्य की चुनौतियों से निपटने और खासकर ग्रेटर बंगलादेश के सपनों को नेस्तनाबूद करने की अंदरूनी तैयारी भी भाजपा ने तेज कर दी है, जिसमें बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा असम, के अलावा त्रिपुरा, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर आदि की भी अहम भूमिका रहेगी।&nbsp;</div><div><br></div><div><b>लिहाजा, बिहार में सम्राट सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार के अहम मायने इस प्रकार हैं-&nbsp;</b></div><div><br></div><h2>पहला, भाजपा का “नया बिहार नेतृत्व” स्थापित करने की कोशिश और उसके निमित्त जारी जद्दोजहद</h2><div><br></div><div>युवा और कर्मठ राजनेता सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा ने बिहार में “पोस्ट-नीतीश युग” की शुरुआत का संकेत दिया है, लेकिन अब मंत्रिमंडल विस्तार के जरिए पार्टी नेतृत्व द्वारा यह संदेश दिया गया है कि पार्टी बिहार में अपना स्वतंत्र नेतृत्व खड़ा कर रही है। इसमें नए और आक्रामक राजनीतिक चेहरों को जगह दी गई है। विभागों का बंटवारा भी काफी सूझबूझ से किया गया है। इसका श्रेय टीम मोदी-शाह-चौधरी को ही जाता है।</div><div><br></div><h2>दूसरा, गोविंदाचार्य के यूपी सोशल इंजीनियरिंग का बिहार में अबतक का बड़ा प्रयोग</h2><div><br></div><div>सम्राट कैबिनेट के गठन में राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ओबीसी, ईबीसी, दलित, महादलित, सवर्ण, निषाद, कुशवाहा, पासवान और क्षेत्रीय संतुलन का विशेष ध्यान रखा गया है। वहीं, अकस्मात लाए हुए यूजीसी बिल के साइड इफेक्ट्स से भी एनडीए को बचाने की पुरजोर कोशिश दिखी। लिहाजा, इसे भाजपा-जदयू गठबंधन की संयुक्त “सामाजिक समीकरण साधो” रणनीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है। जानकारों के मुताबिक, विशेष रूप से, ओबीसी और ईबीसी वर्ग को बड़ा प्रतिनिधित्व के दृष्टिगत अतिपिछड़ा वोट बैंक पर पकड़ मजबूत करने की कोशिश के साथ साथ दलित-पासवान समीकरण को एनडीए में स्थिर रखने का प्रयास करते हुए सीमांचल और मिथिलांचल को राजनीतिक संदेश दिया गया है। इससे नए चेहरों की भी किस्मत खुली।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/has-vijay-sinha-been-sidelined-in-the-bihar-bjp" target="_blank">कद घटा या जिम्मेदारी बदली? क्या बिहार BJP में साइडलाइन हो गए विजय सिन्हा</a></h3><h2>तीसरा, जदयू और भाजपा के बीच “50-50 का शक्ति संतुलन” ताकि परस्पर सहयोग और मजबूत हो</h2><div><br></div><div>रिपोर्टों के अनुसार भाजपा और जदयू के बीच लगभग बराबरी का फार्मूला अपनाया गया। इससे यह संकेत गया कि गठबंधन में जदयू अभी भी सम्मानजनक स्थिति में है, जबकि भाजपा नेतृत्वकारी भूमिका में आगे बढ़ रही है। आपको बता दें कि भाजपा और जदयू की दोस्ती दोनों दलों के लिए बहुत सुखदायी समझी जाती है। तभी तो एक नहीं बल्कि दो-दो बार नीतीश कुमार एनडीए से बाहर गए, लेकिन भाजपा ने उन्हें बार-बार मौका देकर नीतीश कुमार की इज्जत बनाए रखी। वहीं, उनकी पसंद का मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को बनाकर, भाजपा में ही नीतीश कुमार पैदा करने की अहम चाल चली, जिसका फायदा क्रमबद्ध रूप से समझ में आएगा।</div><div><br></div><h2>चौथा, भरोसेमंद राजनीतिक मित्र नीतीश कुमार की राजनीतिक विरासत को सुरक्षित रखने की महत्वपूर्ण कोशिश</h2><div><br></div><div>पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार को मंत्रिमंडल में बतौर स्वास्थ्य मंत्री शामिल किया जाना बेहद प्रतीकात्मक कदम माना जा रहा है। इसके लिए पार्टी ने अपने पूर्व स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय तक को दरकिनार करना मुनासिब समझी। इससे जदयू के भीतर उत्तराधिकार राजनीति को संस्थागत रूप देने का संकेत मिलता है। इससे भाजपा का लवकुश समीकरण काफी मजबूत होगा। इसप्रकार यह कदम तीन संदेश देता है: एक, जदयू का भविष्य “परिवार-केंद्रित नेतृत्व” की ओर जा सकता है। दो, भाजपा फिलहाल नीतीश परिवार के साथ टकराव नहीं चाहती। और तीसरा, गठबंधन में स्थिरता बनाए रखने की कोशिश है।</div><div><br></div><h2>पांचवां, पश्चिम बंगाल चुनाव की अभूतपूर्व जीत के बाद पूर्वी भारत में एनडीए का शक्ति प्रदर्शन</h2><div><br></div><div>गांधी मैदान, पटना में बड़े आयोजन और शीर्ष केंद्रीय नेतृत्व की अहम मौजूदगी यह दर्शाती है कि भाजपा बिहार को पूर्वी भारत की राजनीति का केंद्रीय मैदान बना रही है। यह संदेश विपक्ष, खासकर तेजस्वी यादव और महागठबंधन को दिया गया कि एनडीए अभी भी संगठनात्मक और चुनावी रूप से मजबूत है। इसलिए इंडिया गठबंधन अपना कुनबा संभाले न कि एनडीए गठबंधन पर बक्र दृष्टि रखे। इससे उन्हें कोई फायदा नहीं होने वाला है।</div><div><br></div><h2>छठा, सम्राट चौधरी मंत्रिमंडल में युवा और नए चेहरों पर रचनात्मक दांव</h2><div><br></div><div>मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने अपनी कैबिनेट में कई नए चेहरों को मंत्री बनाकर भाजपा और जदयू दोनों के मिशन “जनरेशन शिफ्ट” का संकेत दिया है। इससे एंटी-इंकम्बेंसी कम करने और युवा वोटरों को आकर्षित करने की कोशिश दिखती है। ऐसा इसलिए कि वर्तमान राजनीति में किसानों, मजदूरों, कारीगरों के साथ साथ महिलाओं और युवाओं की भूमिका बढ़ी है। आजकल युवा ड्राइविंग फोर्स की तरह निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं। पूर्वी भारत में भाजपा का आधार जागरूक युवा ही हैं। इसलिए भाजपा उनके सपनों को पूरा करने में जुटी रहती है। यदि ऐसा स्वप्न साकार होता है तो इससे न केवल पूर्वी बिहार, बल्कि मध्य बिहार, उत्तर बिहार और दक्षिण बिहार में भी भाजपा को मजबूती मिलेगी।</div><div><br></div><h2>सातवां, लकीर की फकीर वाली सियासत में निमग्न&nbsp; 'महामूर्ख विपक्ष' के लिए भाजपा की जमीनी रणनीति बनी अहम चुनौती</h2><div><br></div><div>भाजपा के मौजूदा विस्तार से विपक्ष की जातीय और साम्प्रदायिक राजनीति को करारा जवाब देने की रणनीति भी दिखाई देती है। इसका सारा श्रेय नए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को जाता है। लिहाजा अब उनके वफादार लोग और पार्टी की टीम के खास लोग भाजपा को मजबूत करेंगे। खासकर, विपक्ष के हर राजनीतिक दांव पर पलटवार करते हुए। इससे भाजपा केवल हिंदुत्व ही नहीं, बल्कि “हिंदुत्व, सामाजिक प्रतिनिधित्व और विकास” मॉडल पर आगे बढ़ती दिख रही है। इसके लिए भाजपा का प्रयास&nbsp; सराहनीय है, स्तुत्य है। इसका दिल खोलकर स्वागत किया जाना चाहिए।</div><div><br></div><h2>आठवां, चुस्त-दुरुस्त जातीय समीकरण</h2><div><br></div><div>सम्राट चौधरी के कैबिनेट विस्तार में भाजपा के 15 (मुख्यमंत्री सहित 16), जेडीयू के 13 (दो उपमुख्यमंत्री सहित 15), लोजपा रामविलास के 2, हम और आरएलएम के 1-1 नेता ने मंत्रीपद की शपथ ली। इनमें भाजपा से 5 और जेडीयू से 3 नए चेहरों ने शपथ ली, जिनमें पूर्व सीएम नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार, इंजीनियर कुमार शैलेंद्र, मिथिलेश तिवारी, रामचंद्र पासवान, अरुण शंकर, नंदर किशोर राम, बुलो मंडल और श्वेता गुप्ता आदि का नाम शामिल है। बिहार सरकार की कैबिनेट में अब पांच महिला मंत्री हैं, जिनमें जदयू की तीन नेता शामिल हैं।</div><div><br></div><h2>देखिए पूरी सूची, जातीय विवरण सहित:-&nbsp;</h2><div><br></div><div>भारतीय जनता पार्टी (भाजपा): मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पहले ही शपथ ले चुके थे, जबकि उनके मंत्रिमंडल विस्तार में निम्नलिखित नेताओं को शामिल किया गया है:- 1.राम कृपाल यादव - ओबीसी, 2.केदार गुप्ता - कानू/ ईबीसी 3.नीतीश मिश्रा - ब्राह्मण, 4. मिथिलेश तिवारी - ब्राह्मण, 5. रमा निषाद - ईबीसी / मल्लाह , 6. विजय कुमार सिन्हा - भूमिहार ब्राह्मण, 7. दिलीप जायसवाल - ईबीसी, 8. प्रमोद चंद्रवंशी - ईबीसी, 9. लखेन्द्र पासवान - दलित, 10. संजय टाइगर- राजपूत, 11. इंजीनियर कुमार शैलेन्द्र- भूमिहार ब्राह्मण, 12. नंद किशोर राम- दलित, 13. रामचंद्र प्रसाद - वैश्य/ ओबीसी, 14. अरुण शंकर प्रसाद - सूढ़ी वैश्य/ ओबीसी, 15. श्रेयसी सिंह- राजपूत।</div><div><br></div><div>वहीं, जनतादल यूनाइटेड (जदयू) के 2 उपमुख्यमंत्री क्रमशः विजय कुमार चौधरी और बिजेंद्र प्रसाद यादव पहले ही शपथ ले चुके थे, जबकि मंत्रिमंडल विस्तार में निम्नलिखित नेताओं को शामिल किया गया है:- 1. निशांत कुमार- कुर्मी/ ओबीसी, 2. श्रवण कुमार - कुर्मी/ ओबीसी, 3. अशोक चौधरी- दलित, 4. लेसी सिंह- राजपूत,&nbsp; 5. मदन सहनी- मल्लाह/ ईबीसी, 6. सुनील कुमार- दलित, 7. जमा खान- अल्पसंख्यक, 8. भगवान सिंह कुशवाहा- कोइरी/ ओबीसी, 9. शीला मंडल- धानुक / ईबीसी, 10. दामोदर राउत - धानुक/ ईबीसी, 11. बुलो मंडल- गंगोता/ ईबीसी, 12. रत्नेश सदा- दलित, 13. श्वेता गुप्ता- बनिया।</div><div><br></div><div>लोकजनशक्ति पार्टी (रामविलास) यानी लोजपा (आर) से निम्नलिखित नेताओं को शामिल किया गया है:-1. संजय पासवान- दलित 2. संजय सिंह - राजपूत। वहीं, हिन्दुस्तान अवामी मोर्चा यानी हम से निम्नलिखित नेता को शामिल किया गया है:-1. संतोष मांझी- दलित। वहीं,&nbsp; जबकि राष्ट्रीय लोकतांत्रिक मोर्चा (रालोमो) से निम्नलिखित नेताको शामिल किया गया है:-1. दीपक प्रकाश - कुशवाहा। इस नए मंत्रिमंडल में कोसी और सीमांचल को भी तवज्जो दी गई है, जो पूर्वी बिहार का अभिन्न अंग है।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 08 May 2026 19:19:42 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/understand-the-political-implications-of-the-cabinet-expansion-by-samrat-chaudhary-government</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[मीठा-मीठा गप, कड़वा-कड़वा थू, संवैधानिक मर्यादाओं को तोड़ता विपक्ष]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-opposition-breaching-constitutional-norms]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम बंगाल के साथ पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के पश्चात् जो तस्वीर निर्मित हुई है, वह कड़वाहट और मिठास दोनों का ही स्वाद दे रही है। विपक्ष के राजनीतिक दल जहाँ एक ओर तमिलनाडु और केरल के मनमाफिक परिणाम देखकर मिठास का स्वाद ले रहा है, वहीं पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम को सभी विपक्षी दल भाजपा की प्रायोजित जीत के रूप में प्रचारित करने का असंवैधानिक कार्य कर रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी को इस बार जनता ने विपक्ष में बैठने का जनादेश दिया है, लेकिन ममता बनर्जी कुर्सी से चिपके रहने के अंदाज में पराजय को स्वीकार करने का मानस नहीं बना पा रही हैं।</div><div>&nbsp;</div><div> लोकतान्त्रिक मर्यादा के तहत उनको मुख्यमंत्री की कुर्सी का त्याग करना चाहिए। लेकिन ममता बनर्जी ऐसा न करके एक प्रकार से लोक के निर्णय को ठेंगा दिखाने का कार्य कर रही हैं। खास बात यह है कि विपक्ष के कुछ अन्य दल भी तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी के इस कदम का समर्थन करती हुई लग रही हैं। लोकतंत्र में विरोध करने का सभी को अधिकार है, लेकिन यह विरोध संवैधानिक मर्यादायों के तहत ही होना चाहिए।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/suvendu-adhikari-political-profile-family-details-and-net-worth" target="_blank">Suvendu Adhikari को Giant Killer और भूमिपुत्र के रूप में देखती है जनता, Bengal में BJP को अपने पैरों पर खड़ा करके दिखा दिया</a></h3><div>देश के इतिहास में यह पहली बार हो रहा है, ज़ब चुनाव में पराजित हो जाने के बाद मुख्यमंत्री अपना त्याग पत्र देने से मना कर रहा है, ममता बनर्जी का यह रवैया निश्चित ही जनमत के साथ विश्वासघात ही कहा जाएगा। लोकतंत्र का असली आशय यही होता है कि जनता अपने बीच में से अपने प्रतिनिधि चुनकर अपनी सरकार बनाती है। जनता ने जनादेश दे दिया है। विपक्ष को भी यह स्वीकार करना चाहिए। पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम यह संदेश प्रवाहित कर रहे हैं कि अब देश में तुष्टिकरण के दिन ख़त्म हो गए हैं। जनता भी ऐसा ही चाहती है। मजेदार तथ्य यह है कि बंगाल के चुनाव के साथ ही पांच राज्य असम, केरल, तमिलनाडु और पंडिचेरी में भी चुनाव हुए असम को छोड़ दिया जाए तो सभी राज्यों में परिणाम सत्ता के विरोध में ही आए, लेकिन सवाल यह है कि इन राज्यों के परिणाम पर कोई आरोप नहीं लगा रहा। इसके पीछे यही कारण माना जा रहा कि वहां भाजपा नहीं जीती। भाजपा की जीतना विपक्ष को कभी नहीं पचा। विपक्ष का व्यवहार ऐसा होता जा रहा है जैसे ये केवल सत्ता के लिए ही बने हैं। चुनाव में जय पराजय होती ही है, केवल एक को ही विजय मिलती है।</div><div><br></div><div>पश्चिम बंगाल के बारे में यह सभी जानते हैं कि ममता सरकार के कार्यकाल में भ्रष्टाचार चरम पर था। जनता भी इस भ्रष्टाचार से त्रस्त रही और प्रशासनिक अधिकारी भी। इसी के चलते तृणमूल कांग्रेस के नेताओं के विरोध में एक राजनीतिक हवा बनी। भाजपा ने अपने प्रचार के दौरान ममता के भ्रष्टाचार को लेकर जमकर हमला बोला। इसके विपरीत विपक्ष के अन्य दल भी इन मुद्दों पर मुखर रहे। कांग्रेस ने सार्वजनिक रूप से ममता को निशाने पर लिया। इसका आशय स्पष्ट है कि पश्चिम बंगाल में ममता सरकार के विरोध में लहर थी। दूसरी एक और प्रमुख बात यह भी है कि पश्चिम बंगाल में पिछले जितने भी चुनाव हुए, उनमें हिंसा के माध्यम से मतदाताओं को भयभीत करने का काम भी खुलेआम हुआ। ऐसा कोई भी चुनाव नहीं हुआ, जिसे हिंसा मुक्त कहा जा सकता हो। इस बार के विधानसभा चुनाव में चुनाव आयोग ने हिंसा मुक्त चुनाव करके दिखा दिया। इसी कारण आम मतदाता बिना किसी भय के मतदान केंद्र तक पहुँचने में सफल हुआ। इसी ने भाजपा की राह आसान की।</div><div><br></div><div>पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत का एक बड़ा कारण यह भी माना जा रहा है कि वहां की मतदाता सूची से फर्जी नाम विलोपित किए गए। इन नामों में कई तो ऐसे थे, जो इस दुनिया में नहीं हैं। हालांकि यह एक सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है, इसलिए इसे खास मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए। प्रति वर्ष मतदाता सूची से नाम हटाने और जोड़ने का क्रम चलता है। बंगाल का मामला बांग्लादेशी घुसपैठियों से जुडा था, इसलिए वहां एसआईआर जरुरी था। इससे जहाँ विदेशी मतदाता चुनाव में वोट का प्रयोग करने से वंचित हो गया, वहीं ऐसे मतदाता भी चुनाव में हिस्सा नहीं ले सके, जो फर्जी थे। उल्लेखनीय है कि पूर्व के चुनाव में यह वोट भी उपयोग में आते थे, इनके वोट कैसे पड़ते थे और कौन उंगली से बटन दबाता था, इसमें भले ही संदेह हो, लेकिन इसका आरोप तृणमूल के कार्यकर्ताओं पर ही लगते थे। इसी हिंसा को रोकने के लिए चुनाव आयोग ने सुरक्षा बलों की तैनाती कराई। सुरक्षा बल केवल नागरिक सुरक्षा एवं भय मुक्त मतदान के लिए ही लगाया, लेकिन ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस सहित विपक्ष के कई राजनीतिक दलों ने उनकी निष्ठा पर ही सवाल उठा दिए।</div><div>&nbsp;</div><div>पश्चिम बंगाल के इस बार के चुनाव में ऐसे कई कारण रहे जो भाजपा की जीत और तृणमूल कांग्रेस की हार में काफी प्रभावी रहे। उसमें तृणमूल सरकार विरोधी लहर तो थी ही, साथ ही जो मुस्लिम वोट पूरा का पूरा तृणमूल को मिलता था, इस बार नहीं मिल सका। उसके पीछे मुसलमान नेताओं की सक्रियता रही। इस चुनाव में एक ओर ओवैसी की पार्टी मैदान में थी, वहीं हुमायूं कबीर ने एक नई पार्टी बनाकर ममता की परेशानी में बढ़ोत्तरी की। इस कारण मुसलमान वर्ग के वोट निश्चित ही विभाजित हो गए। इसके साथ ही राज्य का हिन्दू मतदाता कुछ ज्यादा सक्रियता के साथ मैदान में उतर आया। यह मतदाता निश्चित ही भाजपा के पक्ष में गया। इसलिए विपक्ष की ओर से यह कहना कि एसआईआर के कारण या चुनाव आयोग द्वारा भाजपा का साथ देने के आरोप प्रथम दृष्टि में ही तर्कहीन से लगते हैं। अब ममता बनर्जी को अपनी हार की समीक्षा करनी ही चाहिए, जो कमियां रही, उसे दूर करने का प्रयास करना चाहिए।</div><div><br></div><div>चुनाव परिणाम के बाद आरोप प्रत्यारोप का खेल जारी है। इसमें विपक्ष बिना प्रमाण के भाजपा और चुनाव आयोग पर आरोप लगा रहा है। तृणमूल कांग्रेस और भाजपा विरोधी अन्य राजनीतिक दल जिस प्रकार के आरोप लगा रहे हैं, वह केवल जुबानी ही हैं। उसके पुख्ता प्रमाण किसी के पास नहीं हैं। ऐसी राजनीति न तो लोकतंत्र को सुरक्षित रख सकती है और न ही देश का भला कर सकती है। विपक्ष को सच को स्वीकार करने की मानसिकता बनानी होगी। हर बात के लिए नकारात्मक राय रखना विपक्ष की मजबूरी हो सकती है, लेकिन इसे स्वस्थ लोकतंत्र नहीं कहा जा सकता। जो अच्छा है उसे अच्छा कहना ही होगा। क्योंकि जनता जिस सच के साथ रहती है, विपक्ष को भी उसी सच के साथ ही चलना होगा। विपक्ष को यह भी समझना चाहिए कि आज देश का वातावरण परिवर्तित हो चुका है या हो रहा है। विपक्ष निश्चित रूप से सरकार पर आरोप लगाए, लेकिन जन भावना का अनादर करने से बचना होगा, नहीं तो जैसा पश्चिम बंगाल का परिणाम आया, वैसा अन्य राज्यों का भी आ सकता है।</div><div><br></div><div>- सुरेश हिंदुस्तानी&nbsp;</div><div>वरिष्ठ पत्रकार</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 07 May 2026 19:41:02 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-opposition-breaching-constitutional-norms</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[विकास में भेदभाव का शिकार हो रहे हैं प्रमुख तीर्थस्थल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/major-pilgrimage-sites-are-falling-victim-to-discriminatory-development]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का ससंदीय क्षेत्र होने के कारण काशी में जहां तरक्की और घोषणाओं की बरसात हो रही है, वहीं देश के दूसरे प्रमुख हिन्दू तीर्थ स्थल विकास की बाट जोह रहे रहे हैं। मोदी का निर्वाचन क्षेत्र होने के कारण केंद्र सरकार और उत्तर प्रदेश की योगी सरकार का पूरा जोर काशी तक सीमिट कर रहा गया है। यदि यह मान भी लिया जाए कि काशी हिन्दुओं का प्रमुख तीर्थ स्थल है, इसलिए इसके विकास की दरकार है, तो ऐसे में देश के प्रमुख राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त अन्य तीर्थ स्थल विकास की दौड़ में काशी से काफी पीछे क्यों हैं। कारण साफ नजर आता है कि पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र होने के कारण काशी में विकास की गंगा बह रही, वहीं अन्य प्रमुख धार्मिक स्थल वाले जिले बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं।</div><div><br></div><div>वर्ष 2014 से मार्च 2025 तक काशी में विकास के तहत कुल 48,459 करोड़ रुपय की लागत से 580 परियोजनाओं पर काम शुरू किया गया है। काशी के विकास की घोषणाओं की शुरुआत मोदी के पहली बार सांसद बनने के साथ ही शुुरु हो गई थी। यह सिलसिला लगातार जारी है। हाल ही में पीएम मोदी ने अपने दो दिवसीय वाराणसी दौरे के दौरान 6332 करोड़ रुपये की कुल 163 विकास परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास किया। इनमें गंगा पर सिग्नेचर ब्रिज सबसे बड़ी परियोजना है। जिसकी लागत करीब ₹2464.46 करोड़ है। यह ब्रिज काशी की कनेक्टिविटी और ट्रैफिक व्यवस्था को नई दिशा देगा। प्रधानमंत्री के हाथों ₹1054.69 करोड़ की 50 परियोजनाओं का लोकार्पण और ₹5277.39 करोड़ की 113 परियोजनाओं का शिलान्यास किया गया।</div><div><br></div><div>काशी के अलावा देश के अन्य प्रमुख तीर्थ स्थल वाले जिलों में विकास चींटी की रफ्तार से रेंग रहा है या फिर उसकी सुध नहीं ली जा रही है। काशाी के अलावा देश के प्रमुख हिन्दू तीर्थ स्थलों में आधारभूत सुविधाओं की बेहद कमी है। वैष्णों देवी के लिए प्रसिद्ध कटरा जिले में मूसलाधार बारिश के दौरान भूस्खलन की गंभीर समस्या है। जम्मू और कटरा के बीच सड़क और रेल संपर्क अक्सर टूट जाता है। विशेष रूप से, 2025 की बाढ़ के बाद से ट्रेनों का रद्दीकरण और पुलों (जैसे कठुआ, उधमपुर के पास) को नुकसान ने यात्रा और स्थानीय अर्थव्यवस्था को गंभीर झटका दिया है। कटरा में स्मार्ट सड़कों, सुव्यवस्थित पार्किंग, और आधुनिक बुनियादी ढांचे की कमी है। यात्रियों की बढ़ती संख्या को संभालने के लिए मौजूदा सुविधाएं नाकाफी हैं। बढ़ती भीड़ के कारण गर्मियों में पेयजल और निरंतर बिजली आपूर्ति की समस्या बनी रहती है। लगातार निर्माण, वनों की कटाई और भीड़भाड़ के कारण पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/modi-and-shah-election-strategy-is-amazing-there-is-a-lot-to-learn-from-them-shashi-tharoor" target="_blank">Modi और Shah की चुनावी रणनीति गजब की होती है, इनसे बहुत कुछ सीखने की जरूरत हैः Shashi Tharoor</a></h3><div>राम मंदिर के विख्यात अयोध्या में बाल विकास विभाग की एक रिपोर्ट ने जिले में कुपोषण की चिंताजनक स्थिति को उजागर की है। जिले के 2,381 आंगनबाड़ी केंद्रों में पंजीकृत 2,28,018 बच्चों की जांच में 7,520 बच्चे कुपोषित पाए गए हैं। इनमें 1,199 बच्चे अति कुपोषित (सैम) और 6,321 बच्चे मध्यम गंभीर कुपोषित (मैम) श्रेणी में हैं। वित्तीय वर्ष 2023-24 में 264 और 2024-25 में 286 अति कुपोषित बच्चों को पुनर्वास केंद्र भेजा गया। विकास परियोजनाओं के कारण हजारों लोग, विशेषकर छोटे व्यापारी और गरीब, अपने पुश्तैनी आवासों और व्यवसायों से विस्थापित हो गए हैं। परियोजनाओं के कारण उड़ने वाली धूल और निर्माण सामग्री से स्थानीय लोगों को सांस संबंधी बीमारियां हो रही हैं। जल भराव और सीवर के गंदे पानी के घरों में घुसने की समस्या से लोग लंबे समय से परेशान हैं। पुरानी अयोध्या (फैजाबाद) और अयोध्या धाम के बीच आवागमन में मुश्किल हो रही है।</div><div><br></div><div>देश के 12 ज्योतिर्लिंग में शामिल केदारनाथ के रुद्रप्रयाग जिले के कई सुदूरवर्ती गांव अभी भी प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव से जूझ रहे हैं, जहाँ आपदा प्रभावित क्षेत्रों में संपर्क मार्ग बाधित होने और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के कारण लोगों को स्वास्थ्य उपचार के लिए भटकना पड़ता है। भारी बारिश के कारण संपर्क मार्ग बाधित होना भी प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच में एक बड़ी बाधा है। जिले भर में लगभग 25 जल स्रोत सूख चुके हैं, जिससे पानी की आपूर्ति प्रभावित हुई है। पानी की कमी से नाराज लोग जल संस्थान के खिलाफ प्रदर्शन कर चुके हैं। इसी तरह उत्तराखंड के हरिद्वार जिले में तेजी से बढ़ते शहरीकरण, धार्मिक पर्यटन के दबाव और प्रशासनिक चुनौतियां मौजूद हैं। नालों और सार्वजनिक भूमि पर अवैध निर्माण के कारण जल निकासी बाधित हो रही है। मानसून से पहले नालों पर अतिक्रमण के कारण जलभराव का खतरा बना रहता है। हरकी पैड़ी और आसपास के क्षेत्रों में भिक्षावृत्ति एक बड़ी समस्या है। चारधाम यात्रा के सुचारू न रहने या व्यवस्थाओं के कारण स्थानीय होटलों और पर्यटन व्यवसाय पर भी असर पड़ रहा है।&nbsp;</div><div><br></div><div>कृष्ण की जन्मभूमि मथुरा में ₹30,000 करोड़ से अधिक की ब्रज मास्टर प्लान परियोजनाओं और नई आवासीय योजनाओं के लिए ₹850 करोड़ के बावजूद, कई विकास कार्य फाइलों में अटके हैं। वर्ष 2026-2030 के मास्टर प्लान के अंतर्गत शहर को हाई-स्पीड कनेक्टिविटी और आधुनिक सुविधाओं से जोड़ने का विज़न है, लेकिन प्रशासनिक प्रक्रियाओं के चलते जमीनी स्तर पर गति धीमी है। मथुरा-वृंदावन में वर्षभर धार्मिक आयोजनों की लंबी श्रृंखला चलती रहती है। प्रमुख आयोजनों में होलिकोत्सव, मुड़िया मेला, जन्माष्टमी, राधाष्टमी, झूलन उत्सव, कार्तिक मास, गोवर्धन पूजा और ब्रज की विभिन्न परिक्रमाएं शामिल हैं। आयोजनों के दौरान श्रद्धालुओं की संख्या 8 से 10 लाख तक पहुंच जाती है। भीड़ प्रबंधन अब भी मुख्यतः पुलिस के भरोसे ही संचालित हो रहा है। कई बार मास्टर प्लान और विस्तृत प्रस्ताव तैयार किए गए, लेकिन जमीन पर उतरते हुए नजर नहीं आए।&nbsp;</div><div><br></div><div>हिन्दुओं के प्रमुख तीर्थस्थल में शुमार प्रयागराज शहर वर्तमान में कई गंभीर सामाजिक और बुनियादी समस्याओं से जूझ रहा है। मुख्य समस्याओं में गंगा-यमुना की बाढ़ से फसल व जनजीवन का नुकसान, बजबजाती नालियां व कूड़े के ढेर के कारण गंदगी, सीवर लाइन का अभाव, यातायात जाम और अवैध अतिक्रमण शामिल हैं। इसके अलावा, बाढ़ के बाद बीमारियां और मच्छरों का प्रकोप भी एक बड़ी चुनौती है। गुजरात के देवभूमि द्वारका जिले में विकास और पर्यटन के बावजूद कई प्रमुख सामाजिक और नागरिक समस्याएं मौजूद हैं, जो स्थानीय निवासियों और तीर्थयात्रियों को प्रभावित करती हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>गुजरात सोमनाथ मंदिर (प्रथम ज्योतिर्लिंग) जिले में पर्यटन और आस्था के केंद्र होने के साथ-साथ कई महत्वपूर्ण सामाजिक और नागरिक समस्याएं भी विद्यमान हैं। इस क्षेत्र में दलित समुदाय के खिलाफ अत्याचार की घटनाएं (जैसे ऊना की घटना) और हाशिए पर स्थित समुदायों के उत्पीड़न की समस्या रही है। जमीन के अधिकारों को लेकर विवाद और अवैध संरचनाओं को हटाने के दौरान लोगों का विस्थापन और पुनर्वास न होना एक प्रमुख समस्या है। वेरावल जैसे तटीय क्षेत्रों में बंदरगाह आधारित विकास के बावजूद नागरिक सुविधाओं की कमी है। सोमनाथ मंदिर के कारण बड़ी संख्या में पर्यटकों के आगमन से स्थानीय बुनियादी ढांचे पर दबाव बढ़ता है, जिससे स्वच्छता और यातायात प्रबंधन की चुनौती बनी रहती है। तटीय जिला होने के कारण यहां चक्रवात और बाढ़ का खतरा बना रहता है, जिसके लिए जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण को लगातार काम करना पड़ता है। ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं और उच्च शिक्षा के बुनियादी ढांचे का अभाव है।&nbsp;</div><div><br></div><div>तमिलनाडु के रामेश्वरम (रामनाथस्वामी मंदिर) रामनाथपुरम जिला धार्मिक और तटीय पर्यटन के बढ़ते आकर्षण के बावजूद अपर्याप्त बुनियादी ढांचा (जैसे: बेहतर सड़कें, आवास और सार्वजनिक सुविधाएं) मांग के अनुरूप तालमेल बिठाने में संघर्ष कर रहा है। रामेश्वरम और धनुषकोडी जैसे प्रमुख पर्यटन स्थलों तक भारी आवागमन के कारण सड़कों पर दबाव, जिससे अक्सर यातायात जाम की स्थिति बनती है। पीक सीजन में आवास, पार्किंग और स्वच्छता सुविधाओं की कमी, जो पर्यटकों के अनुभव को प्रभावित करती है। आंध्र प्रदेश का चित्तूर जिला तिरुपति बालाजी (वेंकटेश्वर मंदिर) ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के बावजूद विकास के मोर्चे पर कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। चित्तूर का 'हाई रोड' (ओल्ड मद्रास रोड) इतिहास के साथ विकसित हुआ है, लेकिन वर्तमान में यह यातायात जाम और बुनियादी ढांचे के अभाव के कारण विकास की मुख्यधारा से पिछड़ रहा है। शहर के मुख्य मार्गों पर भारी ट्रैफिक और संकरी सड़कें विकास में बड़ी बाधा हैं, जिससे आर्थिक गतिविधियां और सुगम आवागमन प्रभावित होता है। रोजगार के सीमित अवसरों के कारण, युवाओं को बेहतर अवसरों की तलाश में अन्य स्थानों पर पलायन करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। काशी के धार्मिक, पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व से इंकार नहीं है, किन्तु देश के अन्य समकक्ष धार्मिक स्थलों और मंदिरों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव भेदभाव पर सवाल उठाता रहेगा।</div><div><br></div><div>- योगेन्द्र योगी</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 05 May 2026 15:04:56 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/major-pilgrimage-sites-are-falling-victim-to-discriminatory-development</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Mythos AI चमत्कारी भी है और विनाशकारी भी, इसके प्रभावों को लेकर दुनियाभर की सरकारों की नींद उड़ गई है]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/mythos-ai-is-both-miraculous-and-destructive-with-govts-around-the-world-worried-about-its-impact]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>एआई के क्षेत्र में तेजी से हो रहे विकास के बीच एक नया मॉडल वैश्विक चिंता का केंद्र बन गया है। यह है एन्थ्रोपिक द्वारा विकसित मॉडल मिथोस। यह उन्नत प्रणाली जहां साइबर सुरक्षा के लिए एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है, वहीं इसके संभावित दुरुपयोग को लेकर सरकारों, बैंकों और विशेषज्ञों के बीच गंभीर आशंकाएं भी उभर रही हैं। हम आपको बता दें कि मिथोस एक ऐसा एआई मॉडल है जो कंप्यूटर प्रणालियों में मौजूद छिपी कमजोरियों को पहचानने और उनका फायदा उठाने में सक्षम बताया गया है। कंपनी के अनुसार यह उन त्रुटियों को भी खोज सकता है जिनके बारे में सॉफ्टवेयर बनाने वालों को खुद जानकारी नहीं होती। इन्हें जीरो डे कमजोरियां कहा जाता है, क्योंकि इनके सामने आने के बाद सुधार का समय नहीं मिल पाता। मिथोस की यही क्षमता इसे अत्यंत शक्तिशाली और साथ ही खतरनाक बनाती है।</div><div>&nbsp;</div><div>कंपनी ने सात अप्रैल को इस मॉडल के अस्तित्व की घोषणा की थी, लेकिन इसे सार्वजनिक उपयोग के लिए जारी करने से साफ इंकार कर दिया। कारण स्पष्ट है कि यदि यह तकनीक गलत हाथों में चली गई तो वैश्विक साइबर सुरक्षा को गंभीर खतरा हो सकता है। हालांकि, सीमित रूप से कुछ कंपनियों और बैंकों को इसके परीक्षण की अनुमति दी गई है ताकि वह इसके जोखिमों को समझ सकें।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/business/cognizant-prepares-for-project-leap-15000-it-jobs-in-jeopardy-with-significant-impact-on-india" target="_blank">Cognizant में 'Project Leap' की तैयारी, 15 हजार IT Jobs पर लटकी तलवार, भारत पर बड़ा असर</a></h3><div>हाल ही में स्थिति तब और गंभीर हो गई जब यह सामने आया कि कुछ अनधिकृत लोगों ने इस मॉडल तक पहुंच हासिल कर ली थी। यह घटना इस बात का संकेत है कि इतने संवेदनशील उपकरण को पूरी तरह नियंत्रित रखना कितना कठिन है। इससे तकनीकी कंपनियों की क्षमता पर भी सवाल उठे हैं कि वह अपने सबसे जोखिमपूर्ण उत्पादों को कितनी सुरक्षित रख सकती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार मिथोस केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं बल्कि एआई की तेजी से बढ़ती शक्ति का संकेत है। पिछले कुछ वर्षों में इस क्षेत्र में जिस गति से प्रगति हुई है, उससे यह आशंका भी बढ़ी है कि अन्य कंपनियां भी जल्द ही ऐसे मॉडल विकसित कर सकती हैं। इससे साइबर हमलों और बचाव के बीच एक नई प्रतिस्पर्धा शुरू हो सकती है।</div><div><br></div><div>ब्रिटेन के एआई सुरक्षा संस्थान ने भी मिथोस का परीक्षण किया है और इसे पहले के मॉडलों की तुलना में अधिक सक्षम और खतरनाक बताया है। यह मॉडल कई चरणों वाले साइबर हमलों का अनुकरण करने में सफल रहा है और बिना मानवीय निर्देश के कमजोरियों की पहचान कर सकता है। हालांकि, यह भी स्पष्ट नहीं है कि यह अत्यधिक सुरक्षित प्रणालियों पर कितना प्रभावी होगा। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इस मॉडल को लेकर जितनी चर्चा हो रही है, उसमें कुछ हद तक अतिशयोक्ति भी शामिल हो सकती है। उनका कहना है कि कई सस्ते मॉडल भी कुछ कमजोरियों की पहचान करने में सक्षम हैं। इसके अलावा अधिकांश साइबर हमले अब भी साधारण कमजोरियों जैसे कमजोर पासवर्ड या पुराने सॉफ्टवेयर के कारण होते हैं।</div><div><br></div><div>फिर भी, मिथोस के संभावित प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। विशेष रूप से बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र में इसका असर बहुत गंभीर हो सकता है। यदि इस तरह की तकनीक का दुरुपयोग हुआ तो भुगतान प्रणाली ठप हो सकती है, लोगों के वेतन और लेनदेन रुक सकते हैं, और व्यापक आर्थिक अस्थिरता पैदा हो सकती है। इसी कारण अमेरिका में भी इस मॉडल को लेकर उच्च स्तर पर चर्चा हो रही है। वहां की सरकार ने इसके उपयोग और पहुंच को लेकर सख्त रुख अपनाया है और इसे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मामला माना जा रहा है। प्रारंभिक योजना के तहत सीमित संस्थाओं को ही इसकी पहुंच दी गई है और इसके विस्तार को लेकर भी सावधानी बरती जा रही है।</div><div><br></div><div>भारत में भी इस मुद्दे ने तेजी से ध्यान आकर्षित किया है। देश को इस मॉडल के शुरुआती परीक्षण से बाहर रखा गया, जिससे नीति निर्माताओं और तकनीकी विशेषज्ञों के बीच चिंता बढ़ गई। सरकार अब अमेरिका और कंपनी के साथ बातचीत कर रही है ताकि भारतीय कंपनियों को भी इस तकनीक तक उचित पहुंच मिल सके। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस विषय को अत्यंत गंभीर बताते हुए कहा है कि यह साइबर चुनौती बहुत बड़ी हो सकती है। सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, बैंकों और सुरक्षा एजेंसियों के साथ उच्च स्तरीय बैठकें की हैं। उद्देश्य यह है कि देश के महत्वपूर्ण ढांचे जैसे बैंकिंग नेटवर्क, दूरसंचार और बिजली प्रणाली को सुरक्षित रखा जा सके।</div><div><br></div><div>भारत की चिंता केवल पहुंच तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य के जोखिमों को लेकर भी है। यदि अन्य कंपनियां भी इसी तरह के मॉडल विकसित करती हैं और उनका वितरण असमान रहता है, तो कुछ देशों की सुरक्षा कमजोर पड़ सकती है। यही कारण है कि भारत समान अवसर और संतुलित नीति की मांग कर रहा है।</div><div><br></div><div>इसके साथ ही, देश की साइबर सुरक्षा एजेंसियों को भी सतर्क कर दिया गया है। उन्हें संवेदनशील प्रणालियों की जांच करने और सुरक्षा ढांचे को मजबूत करने के निर्देश दिए गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी तकनीक दोधारी तलवार की तरह है, इसका उपयोग सुरक्षा बढ़ाने के लिए भी किया जा सकता है और हमलों के लिए भी।</div><div><br></div><div>बहरहाल, मिथोस ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता अब केवल सुविधा का साधन नहीं रही, बल्कि यह वैश्विक सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और नीति निर्माण का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि दुनिया इस नई तकनीकी शक्ति के साथ संतुलन कैसे बनाती है ताकि इसका लाभ भी मिले और जोखिम भी नियंत्रित रहें।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 02 May 2026 18:34:49 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/mythos-ai-is-both-miraculous-and-destructive-with-govts-around-the-world-worried-about-its-impact</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Vishwakhabram: Trump ने अब जर्मन चांसलर Friedrich Merz पर हमला बोला, US-Germany संबंधों में आई दरार]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/donald-trump-now-attacks-friedrich-merz-a-major-rift-in-us-germany-relations]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अमेरिका और जर्मनी के बीच राजनीतिक तनाव तेज होता दिख रहा है। दरअसल अक्सर दुनिया के राष्ट्राध्यक्षों से भिड़ने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अब जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ पर लगातार हमले कर रहे हैं। ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखते हुए कहा कि मर्ज़ को अपने देश की समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए और उन्हें ईरान जैसे मामलों में हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए। यह ताजा बयान उस समय आया जब दोनों नेताओं के बीच ईरान युद्ध, रूस यूक्रेन संघर्ष और नाटो सहयोग जैसे मुद्दों पर मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं।</div><div><br></div><div>ट्रंप ने मर्ज़ पर आरोप लगाया है कि वह रूस यूक्रेन युद्ध को समाप्त कराने में पूरी तरह असफल रहे हैं और अपने देश की आंतरिक समस्याओं जैसे आव्रजन और ऊर्जा संकट को संभालने में भी कमजोर साबित हुए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान के परमाणु खतरे को खत्म करने के लिए अमेरिका जो प्रयास कर रहा है, उसमें जर्मनी को बाधा नहीं बनना चाहिए।</div><div><br></div><div>इस बयान से पहले मर्ज़ ने भी अमेरिका की आलोचना करते हुए कहा था कि ईरान के साथ चल रही बातचीत में अमेरिका अपमानित हो रहा है और उसके पास युद्ध से बाहर निकलने की कोई स्पष्ट रणनीति नहीं है। यही टिप्पणी ट्रंप को काफी नागवार गुजरी और उन्होंने तीखी प्रतिक्रिया दी।</div><div><br></div><div>तनाव तब और बढ गया जब ट्रंप ने जर्मनी में तैनात अमेरिकी सैनिकों की संख्या कम करने की संभावना जताई। हम आपको बता दें कि वर्तमान में जर्मनी में लगभग 36 हजार से 39 हजार अमेरिकी सैनिक तैनात हैं, जिनमें से अधिकतर स्टुटगार्ट और रामस्टाइन जैसे प्रमुख सैन्य ठिकानों पर मौजूद हैं। शीत युद्ध के समय की तुलना में यह संख्या पहले ही काफी कम हो चुकी है। हालांकि जर्मनी ने इस स्थिति को शांत करने की कोशिश की। जर्मनी के विदेश मंत्री जोहान डेविड वाडेफुल ने कहा कि अमेरिका द्वारा सैनिकों की तैनाती में बदलाव की बात कोई नई नहीं है। उन्होंने याद दिलाया कि बराक ओबामा, जो बाइडन और बिल क्लिंटन के समय में भी इस तरह की चर्चाएं होती रही हैं। उन्होंने कहा कि जर्मनी इस स्थिति के लिए तैयार है और नाटो ढांचे के भीतर अमेरिका के साथ संवाद जारी है।</div><div><br></div><div>उधर, मर्ज़ ने भी बाद में अपने रुख को कुछ नरम करते हुए नाटो और अमेरिका के साथ मजबूत संबंधों की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि जर्मनी एक भरोसेमंद पार अटलांटिक साझेदारी में विश्वास करता है और मध्य पूर्व संकट का समाधान भी नाटो के नेतृत्व में ही संभव है। उन्होंने ईरान की आलोचना करते हुए कहा कि वह शांति वार्ता में भाग लेने से बच रहा है।</div><div><br></div><div>दूसरी ओर, विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद केवल व्यक्तिगत बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरे रणनीतिक मतभेद छिपे हैं। जर्मन मार्शल फंड की विशेषज्ञ क्लॉडिया मेजर के अनुसार ट्रंप पहले भी सैन्य ठिकानों को दबाव के साधन के रूप में इस्तेमाल करते रहे हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिका से आने वाले संदेश यूरोप के लिए अस्थिरता पैदा करने वाले हैं और इससे यह सवाल उठता है कि अमेरिका कितना भरोसेमंद साझेदार बना रहेगा।</div><div><br></div><div>जर्मनी के रक्षा विशेषज्ञ रोडरिच कीसवेटर ने भी लोगों को अधिक प्रतिक्रिया नहीं देने की सलाह दी है। उन्होंने कहा है कि सैनिकों की संख्या में बदलाव की घोषणा पहले भी की जा चुकी है और यह कोई चौंकाने वाली बात नहीं है। उन्होंने कहा कि जर्मनी में मौजूद अमेरिकी ठिकाने केवल जर्मनी की सुरक्षा के लिए नहीं बल्कि अमेरिका की वैश्विक रणनीति के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण हैं। वहीं सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता क्रिस्टोफ़ वॉन श्मिड ने कहा कि अल्पकाल में अमेरिकी सैनिकों की वापसी संभव नहीं है और ऐसा कदम अमेरिका की वैश्विक सैन्य क्षमता को कमजोर कर देगा।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो इस पूरे घटनाक्रम के पीछे एक और महत्वपूर्ण पहलू जर्मनी की आंतरिक राजनीति भी है। दरअसल मर्ज़ को अपने देश में भी दबाव का सामना करना पड़ रहा है, जहां ईरान युद्ध और ट्रंप की नीतियों को लेकर जनता में असंतोष है। ऐसे में मर्ज़ को एक संतुलन बनाना पड़ रहा है ताकि वह अमेरिका से संबंध भी बनाए रखें और घरेलू आलोचना का जवाब भी दे सकें। ट्रंप और मर्ज़ के संबंध पहले काफी अच्छे माने जाते थे। मार्च में व्हाइट हाउस में हुई मुलाकात के दौरान ट्रंप ने मर्ज़ को मित्र बताया था और उनके काम की सराहना की थी। लेकिन हाल के घटनाक्रम ने इस मित्रता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।</div><div><br></div><div>इस बीच, यूरोप के अन्य नेताओं के साथ भी ट्रंप के संबंधों में तनाव देखा गया है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर और स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज़ के साथ भी ईरान युद्ध को लेकर मतभेद सामने आए थे, हालांकि ट्रंप ने अपने कई कड़े कदमों को अंततः लागू नहीं किया। विश्लेषकों का मानना है कि जर्मनी धीरे-धीरे अमेरिका पर अपनी निर्भरता कम करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, लेकिन अभी भी उसे अमेरिकी सैन्य और खुफिया सहयोग की आवश्यकता बनी हुई है। ऐसे में यह विवाद दोनों देशों के लिए एक परीक्षा की तरह है, जहां उन्हें अपने संबंधों को संतुलित रखना होगा।</div><div><br></div><div>बहरहाल, यह विवाद केवल बयानबाजी का मामला नहीं है, बल्कि यह वैश्विक शक्ति संतुलन, नाटो की भूमिका और यूरोप की रणनीतिक स्वतंत्रता जैसे महत्वपूर्ण सवालों को भी सामने लाता है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह तनाव और बढ़ता है या फिर दोनों पक्ष अपने मतभेदों को सुलझाने में सफल होते हैं।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 01 May 2026 18:09:35 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/donald-trump-now-attacks-friedrich-merz-a-major-rift-in-us-germany-relations</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[करुणा, शांति और आत्मजागरण के प्रकाशस्तंभ हैं गौतम बुद्ध]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/gautam-buddha-is-the-beacon-of-compassion-peace-and-enlightenment]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>मानव सभ्यता के इतिहास में कुछ ऐसे महापुरुष हुए हैं, जिनका जीवन केवल एक युग तक सीमित नहीं रहता, बल्कि युगों-युगों तक मानवता के पथ को आलोकित करता है। गौतम बुद्ध ऐसे ही एक अद्वितीय प्रकाशस्तंभ हैं, जिनका करुणा, अहिंसा और आत्मजागरण का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना ढाई हजार वर्ष पूर्व था। बुद्ध पूर्णिमा का पावन दिवस केवल एक ऐतिहासिक स्मृति नहीं, बल्कि आत्मबोध, समता और शांति के उस दिव्य संदेश का पुनर्स्मरण है, जिसकी आज के हिंसाग्रस्त और तनावपूर्ण विश्व को अत्यंत आवश्यकता है। बुद्ध पूर्णिमा का दिन अद्वितीय है, क्योंकि इसी दिन गौतम बुद्ध का जन्म, ज्ञानप्राप्ति और महापरिनिर्वाण-तीनों घटनाएं घटित हुईं। नेपाल के लुम्बिनी में जन्मे सिद्धार्थ ने बोधगया में बोधिवृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त किया और कुशीनगर में निर्वाण को प्राप्त हुए। इस दृष्टि से यह दिन केवल एक महापुरुष का स्मरण नहीं, बल्कि जीवन की पूर्णता, जागरण और मुक्ति का प्रतीक है। आज विश्व के विभिन्न देशों-श्रीलंका, थाईलैंड, म्यांमार, जापान, कोरिया और भारत में इसे विभिन्न नामों और परंपराओं के साथ मनाया जाता है। श्रीलंका में ‘वेसाक’ के रूप में दीपों और करुणा के उत्सव के रूप में यह दिन विशेष रूप से उल्लास और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।</div><div><br></div><div>गौतम बुद्ध एक प्रकाशस्तंभ है, जिसका प्रकाश केवल बाहरी दुनिया को ही नहीं, बल्कि भीतरी दुनिया को भी आलोकिक करता है। बुद्ध को सबसे महत्वपूर्ण भारतीय आध्यात्मिक महामनीषी, देवपुरुष, सिद्ध-संन्यासी, समाज-सुधारक धर्मगुरु माना जाता हैं। बुद्ध को भगवान विष्णु का नौवां अवतार भी माना जाता है, इस दृष्टि से हिन्दू धर्म में भी वे पूजनीय है। उन्हें धर्मक्रांति के साथ-साथ व्यक्ति एवं विचारक्रांति के सूत्रधार भी कह सकते हैं। उनकी क्रांतिवाणी उनके क्रांत व्यक्तित्व की द्योतक ही नहीं वरन् धार्मिक, सामाजिक विकृतियों एवं अंधरूढ़ियों पर तीव्र कटाक्ष एवं परिवर्तन की प्रेरणा भी है, जिसने असंख्य मनुष्यों का जीवन-निर्माण किया एवं उनकी जीवन दिशा को बदला। बुद्ध ने जब अपने युग की जनता को धार्मिक-सामाजिक, आध्यात्मिक एवं अन्य यज्ञादि अनुष्ठानों को लेकर अज्ञान में घिरा देखा, साधारण जनता को धर्म के नाम पर अज्ञान में पाया, नारी को अपमानित होते देखा, शुद्रों के प्रति अत्याचार होते देखे-तो उनका मन जनता की सहानुभूति में उद्वेलित हो उठा। लोकजीवन को ऊंचा उठाने के लिये उन्होंने जो हिमालयी प्रयत्न किये, वे अद्भुत और आश्चर्यकारी है। बुद्ध के अनुसार जीवन में हजारों लड़ाइयां जीतने से बेहतर स्वयं पर विजय प्राप्त करना है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/find-out-how-the-world-is-celebrating-the-festival-of-lord-buddha" target="_blank">Bodh Gaya से Sri Lanka तक 'Vesak' की धूम, जानें दुनिया कैसे मना रही है भगवान बुद्ध का पर्व</a></h3><div>गौतम बुद्ध के बचपन का नाम सिद्धार्थ था, वे एक राजकुमार थे, किन्तु जीवन के दुख-जरा, व्याधि और मृत्यु ने उनके अंतर्मन को विचलित कर दिया। 29 वर्ष की आयु में उन्होंने राजवैभव का त्याग कर सत्य की खोज का मार्ग अपनाया। कठोर तप और साधना के पश्चात उन्होंने पाया कि न तो भोग का मार्ग उचित है और न ही अत्यधिक तप का। उन्होंने “मध्यम मार्ग” का सिद्धांत दिया-संतुलन, सजगता और समत्व का मार्ग। गौतम बुद्ध ने सारनाथ में अपना प्रथम उपदेश दिया, जिसे “धर्मचक्र प्रवर्तन” कहा जाता है। उनके चार आर्य सत्य-दुःख, दुःख का कारण, दुःख का निरोध और दुःखनिरोधगामिनी प्रतिपदा-मानव जीवन के गहन विश्लेषण और समाधान प्रस्तुत करते हैं। आज का विश्व युद्ध, आतंकवाद, हिंसा, असहिष्णुता और मानसिक तनाव से जूझ रहा है। ऐसे समय में बुद्ध का करुणा एवं शांति का संदेश अत्यंत प्रासंगिक हो उठता है। उन्होंने स्पष्ट कहा- “द्वेष से द्वेष कभी समाप्त नहीं होता, प्रेम से ही द्वेष समाप्त होता है।” यह केवल एक नैतिक उपदेश नहीं, बल्कि सामाजिक और वैश्विक शांति का सूत्र है। यदि आज के राष्ट्र, समाज और व्यक्ति इस एक सिद्धांत को आत्मसात कर लें, तो अनेक संघर्षों का समाधान संभव हो सकता है।</div><div><br></div><div>महात्मा बुद्ध के जीवन का एक प्रेरक प्रसंग उनकी करुणा और क्षमाशीलता का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता है। एक व्यक्ति जो उन्हें निरंतर अपशब्द कहता था, जब दुर्घटनाग्रस्त होकर पीड़ा में पड़ा, तब बुद्ध स्वयं उसके पास पहुंचे, उसके घावों की सेवा की और अपने भिक्षुओं को उसकी देखभाल का निर्देश दिया। बुद्ध के इस अप्रत्याशित प्रेम और करुणा से उसका हृदय परिवर्तन हो गया और उसने अपने व्यवहार के लिए क्षमा मांगी। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि सच्ची महानता प्रतिशोध में नहीं, बल्कि क्षमा और करुणा में निहित है और यही भाव मानवता को जोड़ने की सबसे बड़ी शक्ति है।</div><div><br></div><div>बुद्ध ने केवल बाह्य हिंसा का विरोध नहीं किया, बल्कि मन की हिंसा-ईर्ष्या, क्रोध, लोभ और अहंकार को भी सबसे बड़ा शत्रु बताया। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति स्वयं पर विजय प्राप्त कर लेता है, वही सच्चा विजेता है। हजारों युद्ध जीतने वाला भी उस व्यक्ति के सामने छोटा है, जिसने अपने मन को जीत लिया। गौतम बुद्ध ने उस समय के समाज में व्याप्त जातिवाद, छुआछूत और लैंगिक भेदभाव का विरोध किया। उन्होंने सभी मनुष्यों को समान बताया और कहा कि व्यक्ति की श्रेष्ठता जन्म से नहीं, कर्म से निर्धारित होती है। बुद्ध का संघ एक समतामूलक समाज का आदर्श उदाहरण था, जहाँ सभी वर्गों के लोग समान रूप से स्वीकार किए जाते थे। यही कारण है कि उनका आंदोलन केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक क्रांति का भी आधार बना। बाद में भीमराव आम्बेडकर ने भी बुद्ध के इसी समतामूलक दृष्टिकोण को अपनाते हुए लाखों लोगों को सामाजिक सम्मान का मार्ग दिखाया। यह दर्शाता है कि बुद्ध का विचार केवल प्राचीन नहीं, बल्कि आधुनिक समाज के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है।</div><div><br></div><div>महान करुणामूर्ति बुद्ध का एक अत्यंत महत्वपूर्ण संदेश है-“अप्प दीपो भव” अर्थात् अपना दीपक स्वयं बनो। यह संदेश व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनने, अपने भीतर प्रकाश खोजने और बाहरी सहारों से मुक्त होने की प्रेरणा देता है। बुद्ध का चिंतन हमें भीतर झांकने, मन को निर्मल करने और करुणा, मैत्री, मुदिता एवं उपेक्षा जैसे भावों को जीवन में उतारने की प्रेरणा देता है। वे बताते हैं कि शांति बाहर नहीं, हमारे अंतर्मन में ही निवास करती है और जब मन जाग्रत होता है, तब अहंकार, क्रोध और हिंसा स्वतः विलीन हो जाते हैं। आज के अशांत और तनावग्रस्त वातावरण में बुद्ध का यह संदेश जन-जन को प्रेम, सह-अस्तित्व और सहिष्णुता की राह पर चलने के लिए प्रेरित करता है। आज जब व्यक्ति बाहरी उपलब्धियों, तकनीकी साधनों और भौतिक सुखों में उलझा हुआ है, तब यह संदेश उसे भीतर की यात्रा करने के लिए प्रेरित करता है। मानसिक शांति, संतुलन और आत्मसंतोष केवल बाहरी साधनों से नहीं, बल्कि भीतर की सजगता और जागरूकता से प्राप्त होते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>बुद्ध ने वर्तमान में जीने का महत्व बताया। उन्होंने कहा कि अतीत की स्मृतियाँ और भविष्य की चिंताएँ मन को अशांत करती हैं। जो व्यक्ति वर्तमान क्षण में जीना सीख लेता है, वही सच्चे अर्थों में जीवन का आनंद प्राप्त करता है। आज के तनावग्रस्त जीवन में “माइंडफुलनेस” (सचेतनता) की जो अवधारणा विश्वभर में लोकप्रिय हो रही है, उसका मूल स्रोत बुद्ध की ही शिक्षाएँ हैं। यह दर्शाता है कि उनका दर्शन समय से परे है। आज मानवता जिन संकटों से जूझ रही है-पर्यावरणीय असंतुलन, युद्ध, सामाजिक विभाजन, मानसिक अवसाद, उनका समाधान केवल तकनीकी प्रगति से संभव नहीं है। इसके लिए मानवीय मूल्यों की पुनर्स्थापना आवश्यक है। गौतम बुद्ध का करुणा, अहिंसा, समता और आत्मसंयम का संदेश इन सभी समस्याओं के समाधान की दिशा प्रदान करता है। यदि व्यक्ति अपने भीतर करुणा का विकास करे, तो समाज में शांति और सौहार्द स्वतः स्थापित हो सकते हैं।</div><div><br></div><div>बुद्ध पूर्णिमा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का अवसर है। यह हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि क्या हम बुद्ध के बताए मार्ग पर चल रहे हैं या केवल उनके उपदेशों का औपचारिक स्मरण कर रहे हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम बुद्ध को केवल पूजें नहीं, बल्कि उन्हें जियें। उनके विचारों को अपने व्यवहार में उतारें। करुणा, प्रेम, सहिष्णुता और समता को अपने जीवन का आधार बनाएं। जब प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर एक “बुद्ध” को जागृत करेगा, तभी एक शांत, संतुलित और समतामूलक विश्व की स्थापना संभव होगी। यही बुद्ध पूर्णिमा का सच्चा संदेश है और यही मानवता के उज्ज्वल भविष्य की दिशा भी।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 30 Apr 2026 13:01:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/gautam-buddha-is-the-beacon-of-compassion-peace-and-enlightenment</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Operation Global Hunt से विदेशों में बैठे Drug Mafias के बीच मची खलबली, Salim Dola को दबोच कर भारत ने तोड़ डला Dawood Network]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/operation-global-hunt-creates-panic-among-drug-mafias-arrest-of-salim-dola-breaks-dawood-network]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत की धरती पर नशे के जहर का कारोबार कर खासतौर पर युवा पीढ़ी को बर्बादी की राह पर ले जाने को आतुर अंतरराष्ट्रीय गिरोहों पर मोदी सरकार का शिकंजा कस चुका है। वर्षों तक कानून को धता बताकर विदेशों में छिपे बैठे ड्रग माफिया अब सुरक्षित नहीं हैं। हम आपको बता दें कि एक बड़ा और निर्णायक वार करते हुए भारत ने कुख्यात तस्कर और अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम के करीबी सहयोगी सलीम डोला को तुर्की से वापस लाकर अपनी गिरफ्त में ले लिया है। यह कार्रवाई उस पूरे नेटवर्क के खिलाफ खुली जंग का ऐलान है जिसने देश की युवा पीढ़ी को नुकसान पहुंचाया।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि कुछ महीने पहले केंद्रीय एजेंसी ने गृह मंत्रालय को एक तीन साल का खाका सौंपा था, जिसके तहत “ऑपरेशन ग्लोबल हंट” शुरू किया गया। इस मिशन का सीधा लक्ष्य है विदेशों में बैठे सौ बड़े ड्रग नेटवर्क को जड़ से खत्म करना। दुबई, कनाडा और यूरोप जैसे ठिकानों से चल रहे इन गिरोहों को अब भारतीय एजेंसियां वैश्विक स्तर पर घेर रही हैं। इसी मिशन का पहला बड़ा शिकार बना सलीम डोला।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/drug-mafia-salim-dola-ran-an-international-syndicate-extending-all-the-way-to-europe" target="_blank">NCB का बड़ा खुलासा: ड्रग्स माफिया Salim Dola चलाता था Europe तक फैला International Syndicate</a></h3><div>मंगलवार की सुबह जब डोला को दिल्ली लाया गया, तो यह सिर्फ एक गिरफ्तारी नहीं बल्कि सिस्टम की जीत थी। तुर्की की खुफिया एजेंसी और स्थानीय पुलिस के साथ संयुक्त अभियान में उसे पकड़ा गया। भारत पहुंचते ही उसे सीधे नशीले पदार्थ नियंत्रण ब्यूरो के कब्जे में लिया गया और आगे पूछताछ शुरू हुई। जल्द ही उसे मुंबई पुलिस को सौंपा जाएगा, जहां उसके खिलाफ कई गंभीर मामले दर्ज हैं।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि सलीम डोला कोई मामूली अपराधी नहीं है। मुंबई के भायखला इलाके में मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मा यह व्यक्ति धीरे धीरे अंडरवर्ल्ड की गहराइयों में उतरता चला गया। दाऊद इब्राहिम और छोटा शकील जैसे कुख्यात नामों से उसकी नजदीकी ने उसे अपराध की दुनिया में तेजी से ऊपर पहुंचाया। शुरुआत में गुटखा तस्करी से लेकर गांजा व्यापार तक सीमित रहने वाला यह व्यक्ति बाद में सिंथेटिक ड्रग्स का बड़ा खिलाड़ी बन गया।</div><div><br></div><div>उसका नेटवर्क इतना व्यापक था कि महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश तक फैले कारखानों में एमडी और अन्य नशीले पदार्थ बनाए जाते थे। इनका वितरण देश ही नहीं बल्कि विदेशों तक किया जाता था। संगली और सूरत से लेकर यूएई और तुर्की तक फैली सप्लाई चेन को वह विदेश बैठकर नियंत्रित करता था। सलीम डोला का आपराधिक इतिहास भी उतना ही चौंकाने वाला है। 1998 में पहली बार उसका नाम सामने आया, जब वह मंड्रेक्स की बड़ी खेप को हवाई अड्डे के जरिए बाहर भेजने की कोशिश कर रहा था। वह पकड़ा गया, लेकिन सबूतों की कमजोर कड़ी ने उसे अदालत से बाहर निकाल दिया। इसके बाद तो जैसे यह उसका पैटर्न बन गया कि गिरफ्तारी, फिर रिहाई और फिर और बड़ा नेटवर्क।</div><div><br></div><div>हम आपको याद दिला दें कि 2012 में उसे अस्सी किलो गांजे के साथ पकड़ा गया, लेकिन पांच साल जेल में रहने के बाद वह बरी हो गया था। 2018 में उसे फिर पकड़ा गया था फेंटेनिल जैसी खतरनाक दवा के साथ। लेकिन फोरेंसिक रिपोर्ट में तकनीकी आधार पर मामला कमजोर पड़ा और वह जमानत पर छूट गया। यही वह मौका था जब उसने देश छोड़कर भागने की योजना बनाई और पश्चिम एशिया में जाकर अपना अड्डा जमा लिया।</div><div><br></div><div>विदेश में बैठकर उसने अपने काले धन को रियल एस्टेट में लगाया, जो उसके बेटे के नाम पर चल रहा था। यह साफ संकेत था कि उसका ड्रग साम्राज्य सिर्फ फैल ही नहीं रहा था, बल्कि मजबूत भी हो रहा था। उसके बेटे ताहिर और भतीजे मुस्तफा को पहले ही यूएई से वापस लाकर गिरफ्तार किया जा चुका है, जिससे उसके नेटवर्क को काफी झटका लगा। अब उसकी गिरफ्तारी के बाद जांच एजेंसियों को उम्मीद है कि पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश होगा। उसके जरिए उन तमाम कड़ियों तक पहुंचा जा सकेगा जो वर्षों से कानून से बचती रही हैं। यह भी सामने आ सकता है कि कैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ड्रग्स का यह जाल फैला हुआ है और किन किन लोगों की इसमें मिलीभगत है।</div><div><br></div><div>मोदी सरकार ने साफ कर दिया है कि नशे के कारोबार के खिलाफ अब जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई जाएगी। एजेंसियां अब इंटरपोल नोटिस, संपत्ति जब्ती और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के जरिए इन अपराधियों को दुनिया के किसी भी कोने से खींचकर लाने को तैयार हैं। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने मादक पदार्थों की तस्करी में शामिल गिरोहों के खिलाफ कतई बर्दाश्त नहीं करने की नीति पर जोर देते हुए ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, “मादक पदार्थ तस्करी गिरोहों को बेरहमी से कुचलने के मोदी सरकार के मिशन के तहत, हमारी स्वापक नियंत्रण एजेंसियों ने वैश्विक एजेंसियों के एक मजबूत नेटवर्क के माध्यम से सीमापार भी अपनी पकड़ मजबूत की है।” उन्होंने लिखा, “अब मादक पदार्थ तस्कर कहीं भी छिपें, उनके लिए कोई जगह सुरक्षित नहीं है।” गृह मंत्रालय ने कहा, “प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के मार्गदर्शन में सलीम डोला को वापस लाया जाना, मादक पदार्थ की तस्करी से जुड़े मामलों के सभी भगोड़ों और संगठित अपराधिक गिरोहों के सदस्यों को न्याय के कटघरे में लाने के सरकार के दृढ़ संकल्प को दर्शाता है।” मंत्रालय ने बताया कि डोला दो दशक से अधिक समय से अपराध की दुनिया में सक्रिय है और वह महाराष्ट्र और गुजरात में हेरोइन, चरस, मेफेड्रोन, मैंड्रैक्स एवं मेथामफेटामीन की कई बड़ी खेपों की बरामदगी से जुड़े मामलों में शामिल रहा है। मंत्रालय ने कहा कि यह प्रयास तुर्किये के अधिकारियों, इंटरपोल और भारतीय एजेंसियों के बीच घनिष्ठ सहयोग और समन्वित कार्रवाई का उदाहरण है।</div><div><br></div><div>सलीम डोला की गिरफ्तारी इस बात का संकेत है कि अब खेल बदल चुका है। जो लोग अब तक खुद को कानून से ऊपर समझते थे, उनके लिए यह साफ संदेश है कि भागने का कोई रास्ता नहीं बचा। यह सिर्फ शुरुआत है, और आने वाले दिनों में ऐसे कई बड़े नाम कानून के शिकंजे में होंगे। देखा जाये तो भारत अब वैश्विक स्तर पर इस जहर के खिलाफ युद्ध लड़ रहा है। और इस युद्ध में अब कोई नरमी नहीं होगी, कोई समझौता नहीं होगा।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 29 Apr 2026 15:54:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/operation-global-hunt-creates-panic-among-drug-mafias-arrest-of-salim-dola-breaks-dawood-network</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौते का वैश्विक अर्थ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-global-significance-of-the-india-new-zealand-free-trade-agreement]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>वैश्विक परिदृश्य इन दिनों युद्ध की अनिश्चितताओं, तनावों और भू-राजनीतिक खींचतान से भरा हुआ है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, आपूर्ति श्रृंखलाओं में व्यवधान और महाशक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा ने विश्व अर्थव्यवस्था के सामने कई प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। ऐसे समय में भारत और न्यूजीलैंड के बीच 27 अप्रैल 2026 को नई दिल्ली में हस्ताक्षरित मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) केवल एक द्विपक्षीय आर्थिक दस्तावेज नहीं, बल्कि वैश्विक निराशा के बीच आशा का एक सशक्त संदेश बनकर उभरा है। यह समझौता उस विश्वास को पुनर्जीवित करता है कि सहयोग, संवाद और साझेदारी ही भविष्य की स्थायी समृद्धि का मार्ग हैं। यह समझौता कई दृष्टियों से ऐतिहासिक है। सबसे पहले, इसे मात्र नौ महीनों में अंतिम रूप दिया जाना अपने आप में एक उपलब्धि है, जो दोनों देशों की प्रतिबद्धता और व्यावहारिक कूटनीति को दर्शाता है। दूसरी ओर, यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब विश्व व्यापार व्यवस्था में बहुपक्षीय संस्थाओं की प्रभावशीलता पर प्रश्न उठ रहे हैं और देश तेजी से द्विपक्षीय या क्षेत्रीय समझौतों की ओर अग्रसर हो रहे हैं। विश्व व्यापार संगठन की धीमी गति और जटिलताओं के बीच यह समझौता एक नई दिशा का संकेत देता है, जहां लचीले और उद्देश्यपरक समझौते अधिक प्रभावी साबित हो रहे हैं।</div><div><br></div><div>इस समझौते की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है कि न्यूजीलैंड द्वारा भारतीय निर्यातकों को लगभग सभी उत्पादों पर शुल्क-मुक्त बाजार पहुंच प्रदान करना। यह भारतीय उद्योग, विशेषकर श्रम-प्रधान क्षेत्रों के लिए एक स्वर्णिम अवसर है। कपड़ा, चमड़ा, इंजीनियरिंग वस्तुएं और प्लास्टिक उत्पाद जैसे क्षेत्रों को इससे अभूतपूर्व बढ़ावा मिलेगा। इससे न केवल निर्यात बढ़ेगा, बल्कि भारत में रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे। भारतीय अर्थव्यवस्था, जो पहले से ही वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना रही है, इस समझौते के माध्यम से और अधिक सशक्त होगी। निवेश के क्षेत्र में भी यह समझौता नई संभावनाओं के द्वार खोलता है। अगले 15 वर्षों में न्यूजीलैंड द्वारा भारत में 20 अरब डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि विश्वास का प्रतीक है। यह निवेश बुनियादी ढांचे, कृषि, तकनीक और सेवा क्षेत्रों में नई ऊर्जा का संचार करेगा। जब कोई विकसित देश किसी उभरती अर्थव्यवस्था में इस स्तर का निवेश करता है, तो यह अन्य वैश्विक निवेशकों के लिए भी सकारात्मक संकेत होता है। इस प्रकार यह समझौता एक ‘ट्रिगर पॉइंट’ के रूप में कार्य कर सकता है, जिससे भारत में विदेशी निवेश की नई लहर उत्पन्न हो। सेवा क्षेत्र के दृष्टिकोण से यह समझौता और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। आईटी, शिक्षा, वित्तीय सेवाएं, पर्यटन और आयुष जैसे क्षेत्रों में सहयोग से दोनों देशों को लाभ होगा। भारतीय पेशेवरों के लिए न्यूजीलैंड में काम करने के अवसरों का विस्तार, विशेष रूप से हर वर्ष हजारों कार्य वीजा की सुविधा, वैश्विक प्रतिभा प्रवाह को नई दिशा देगा। यह न केवल आर्थिक, बल्कि सांस्कृतिक और बौद्धिक आदान-प्रदान को भी प्रोत्साहित करेगा।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/india-new-zealand-fta-opens-up-avenues-for-large-number-of-jobs-and-investment" target="_blank">India-New Zealand FTA ने खोले बड़ी संख्या में नौकरी और निवेश के रास्ते, छोटे-बड़े उद्योगों को भी होगा भरपूर लाभ</a></h3><div>इस समझौते का एक और महत्वपूर्ण पहलू है कृषि सहयोग। न्यूजीलैंड अपनी उन्नत कृषि तकनीकों और उच्च उत्पादकता के लिए जाना जाता है, जबकि भारत के पास विशाल भूमि और विविध जलवायु है। दोनों देशों के बीच सहयोग से कीवी, सेब, शहद और अन्य उत्पादों के क्षेत्र में नई संभावनाएं विकसित हो सकती हैं। इससे भारतीय किसानों को आधुनिक तकनीक, बेहतर उत्पादन और वैश्विक बाजार तक पहुंच मिलेगी। साथ ही, यह भी उल्लेखनीय है कि भारत ने अपने डेयरी और संवेदनशील कृषि क्षेत्रों की सुरक्षा सुनिश्चित की है, जो इस समझौते की संतुलित प्रकृति को दर्शाता है। वैश्विक दृष्टि से देखें तो यह समझौता उस समय आया है जब दुनिया व्यापार के नए मॉडल तलाश रही है। एक समय था जब वैश्विक व्यापार मुख्यतः केंद्रीकृत संस्थाओं के माध्यम से संचालित होता था, लेकिन अब देश अपने-अपने हितों के अनुसार लचीले और त्वरित समझौते कर रहे हैं। भारत ने पिछले कुछ वर्षों में कई महत्वपूर्ण व्यापार समझौते किए हैं, जो उसकी सक्रिय आर्थिक कूटनीति का प्रमाण हैं। यह समझौता भी उसी श्रृंखला की एक महत्वपूर्ण कड़ी है, जो भारत को वैश्विक मूल्य श्रृंखला में और गहराई से जोड़ता है।</div><div><br></div><div>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इस समझौते को किसानों, युवाओं, महिलाओं, कारीगरों और उद्यमियों के लिए लाभकारी बताना केवल एक राजनीतिक वक्तव्य नहीं, बल्कि इसकी व्यापक सामाजिक-आर्थिक संभावनाओं का संकेत है। यह समझौता समावेशी विकास की अवधारणा को भी सुदृढ़ करता है, जहां आर्थिक प्रगति का लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुंचता है। इस समझौते का एक महत्वपूर्ण संदेश यह भी है कि भारत अब किसी एक देश या क्षेत्र पर निर्भर रहने की नीति से आगे बढ़ रहा है। विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ व्यापार समझौते में हो रही देरी के बीच भारत का यह कदम उसकी रणनीतिक स्वतंत्रता और बहुविकल्पीय दृष्टिकोण को दर्शाता है। यह स्पष्ट संकेत है कि भारत अपने लिए नए बाजारों और साझेदारों की तलाश में सक्रिय है, जिससे उसकी आर्थिक स्थिरता और मजबूती बनी रहे। हालांकि, इस समझौते के साथ कुछ चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं। भारतीय उद्योगों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार होना होगा। गुणवत्ता, नवाचार और लागत-प्रभावशीलता के क्षेत्र में सुधार आवश्यक होगा। साथ ही, सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि इस समझौते के लाभ व्यापक रूप से वितरित हों और छोटे तथा मध्यम उद्यम भी इसका पूरा लाभ उठा सकें। इसके बावजूद, यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौता वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में एक सकारात्मक और प्रेरणादायक पहल है। यह न केवल दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों को नई ऊंचाई देगा, बल्कि वैश्विक व्यापार व्यवस्था में भी एक नई ऊर्जा का संचार करेगा। यह समझौता उस दिशा में एक कदम है, जहां प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ सहयोग भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।</div><div><br></div><div>दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहे भारत के लिए न्यूजीलैंड के साथ हुआ मुक्त व्यापार समझौता केवल एक आर्थिक करार नहीं, बल्कि एक रणनीतिक छलांग के रूप में देखा जाना चाहिए। यह समझौता भारत की व्यापारिक सक्रियता, निर्यात क्षमता और वैश्विक बाजार में उसकी विश्वसनीयता को नई ऊँचाइयों तक ले जाने की क्षमता रखता है। इससे भारतीय उद्योगों, विशेषकर एमएसएमई, कृषि और सेवा क्षेत्रों को नया विस्तार मिलेगा और भारत वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में अधिक सशक्त उपस्थिति दर्ज कर सकेगा। इस प्रकार के समझौते यह संकेत देते हैं कि भारत अब केवल एक उभरती अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक नेतृत्व की ओर बढ़ता हुआ एक निर्णायक शक्ति केंद्र बन रहा है। वर्ष 2047 में स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूर्ण होने के लक्ष्य को सामने रखते हुए, ऐसे मुक्त व्यापार समझौते भारत के उज्ज्वल भविष्य के संकेतक प्रतीत होते हैं। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत जिस प्रकार बहुआयामी विकास, आत्मनिर्भरता और वैश्विक साझेदारी की दिशा में आगे बढ़ रहा है, वह उसे एक सशक्त, प्रभावशाली और नेतृत्वकारी राष्ट्र के रूप में स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त करता है। ये समझौते केवल आर्थिक समृद्धि के साधन नहीं, बल्कि भारत को वैश्विक मंच पर एक निर्णायक भूमिका निभाने के लिए तैयार करने वाले उपकरण भी हैं। स्पष्ट है कि आने वाला समय भारत के लिए अवसरों से भरा हुआ है, जहां यह देश न केवल आर्थिक दृष्टि से, बल्कि कूटनीतिक और रणनीतिक रूप से भी विश्व में अपनी अग्रणी उपस्थिति दर्ज कराएगा।</div><div><br></div><div>निश्चिततौर पर यह समझौता केवल व्यापार और निवेश तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक दृष्टिकोण का प्रतीक है, जिसमें आर्थिक प्रगति, सामाजिक समावेशन और वैश्विक सहयोग का समन्वय है। युद्ध और तनाव के इस दौर में यह समझौता एक संदेश देता है कि शांति, साझेदारी और परस्पर विश्वास ही वह आधार हैं, जिन पर भविष्य की समृद्ध दुनिया का निर्माण संभव है। भारत के लिए यह समझौता न केवल आर्थिक अवसरों के नए द्वार खोलता है, बल्कि उसे एक जिम्मेदार और दूरदर्शी वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित भी करता है।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 29 Apr 2026 15:01:16 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-global-significance-of-the-india-new-zealand-free-trade-agreement</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[पंजाब से दिल्ली तक सियासी ‘सुनामी’: संकट में 'आप']]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/political-tsunami-from-punjab-to-delhi-aap-in-crisis]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत की समकालीन राजनीति में शायद ही कोई घटना इतनी तेजी से राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में आई हो, जितनी राघव चड्ढा सहित सात राज्यसभा सांसदों के आम आदमी पार्टी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने से आई है। राघव चड्ढा सहित 7 सांसदों का भाजपा में विलय केवल एक खबर नहीं बल्कि आम आदमी पार्टी के 15 साल के इतिहास का सबसे बड़ा 'ब्लैकआउट' है। भारतीय राजनीति के क्षितिज पर यह घटनाक्रम एक बड़े ‘पॉलिटिकल अर्थक्वेक’ के रूप में दर्ज हो गया है। आम आदमी पार्टी (आप) के ‘पोस्टर बॉय’ माने जाने वाले राघव चड्ढा सहित राज्यसभा के 7 सांसदों का एक साथ पाला बदलकर भाजपा में शामिल होना न केवल ‘आप’ के लिए एक अस्तित्वगत संकट है बल्कि यह देश की राजनीति की दिशा और दशा बदलने वाला घटनाक्रम भी है। यह सिर्फ दल-बदल नहीं बल्कि सत्ता, विचारधारा और राजनीतिक रणनीति के बीच गहरे संघर्ष का संकेत है। जब राज्यसभा में पार्टी के कुल 10 में से 7 सांसद (दो-तिहाई बहुमत) एक साथ अलग होकर भाजपा में विलय करने का निर्णय लेते हैं तो यह दलबदल नहीं, एक वैचारिक और संगठनात्मक विद्रोह का प्रतीक बन जाता है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ है जब भारतीय राजनीति 2027 के बड़े चुनावी चक्र की ओर बढ़ रही है। ऐसे में इस घटनाक्रम ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या ‘आप’ का ‘पंजाब किला’ अब ढ़हने के कगार पर है? क्या 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव की पटकथा अभी से लिखी जा चुकी है? और सबसे बड़ा प्रश्न कि क्या यह ‘आप’ के पतन की शुरुआत है या फिर एक अस्थायी राजनीतिक झटका?</div><div><br></div><h2>‘आप’ के अस्तित्व पर खड़ा सबसे बड़ा सवाल</h2><div>आम आदमी पार्टी ने इस पूरे घटनाक्रम को केवल राजनीतिक असहमति नहीं बल्कि लोकतंत्र पर सुनियोजित प्रहार करार दिया है। पार्टी नेतृत्व का स्पष्ट आरोप है कि केंद्रीय एजेंसियों के भय, दबाव और राजनीतिक प्रलोभनों के माध्यम से उसके सांसदों को तोड़ा गया, जिसे वह संस्थागत दुरुपयोग की श्रेणी में रखती है। यह आरोप भारतीय राजनीति में सत्ता बनाम विपक्ष की उस पुरानी बहस को फिर जीवित कर देता है, जहां नैतिकता और रणनीति आमने-सामने खड़ी दिखाई देती हैं। संवैधानिक दृष्टि से यह कदम और भी दिलचस्प हो जाता है। दलबदल विरोधी कानून की तकनीकी बारीकी (दो-तिहाई सदस्यों के एक साथ अलग होने की शर्त) का उपयोग करते हुए राघव चड्ढ़ा के नेतृत्व में सात सांसदों का भाजपा में विलय यह संकेत देता है कि यह केवल भावनात्मक निर्णय नहीं बल्कि गहन कानूनी सलाह और रणनीतिक योजना का परिणाम था। सबसे गंभीर आघात वैचारिक स्तर पर है। जब भीतर से ही यह स्वर उठे कि पार्टी अपने मूल सिद्धांतों से भटक गई है तो यह केवल संगठनात्मक संकट नहीं बल्कि पहचान के संकट का संकेत बन जाता है और यही चुनौती ‘आप’ के लिए सबसे कठिन परीक्षा है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/will-the-aam-aadmi-party-face-questions" target="_blank">सवालों का सामना करेगी आम आदमी पार्टी?</a></h3><h2>पंजाब की राजनीति और 2027 का रण</h2><div>पंजाब की राजनीति में उठी यह हलचल महज दल-बदल नहीं बल्कि सत्ता समीकरणों के पुनर्गठन का संकेत है। इस विद्रोह का सबसे गहरा असर पंजाब की सियासत पर पड़ना तय है। राज्यसभा में पंजाब का प्रतिनिधित्व करने वाले चेहरे (हरभजन सिंह, अशोक मित्तल, संजीव अरोड़ा और विक्रमजीत सिंह साहनी) का पार्टी से अलग होना ‘आप’ की उस सामाजिक पकड़ को कमजोर करता है, जो विविध वर्गों के प्रतिनिधित्व से बनी थी। यह बदलाव केवल संख्या का नहीं बल्कि भरोसे और प्रभाव का क्षरण है। सबसे बड़ी चुनौती भगवंत मान के सामने है। यह उनके नेतृत्व और राजनीतिक संतुलन की सीधी परीक्षा है। राघव चड्ढ़ा को लंबे समय तक सरकार और संगठन के बीच रणनीतिक कड़ी माना जाता रहा, उनके हटने से यह संतुलन डगमगाता दिख रहा है। दूसरी ओर, भाजपा इस घटनाक्रम को अवसर में बदलने की कोशिश में है। भाजपा पंजाब में हमेशा से एक 'छोटा भाई' (अकाली दल के साथ) बनकर रही है लेकिन 7 सांसदों के आने से, जिनमें सिखों और उद्योगपतियों का प्रतिनिधित्व है, भाजपा अब 2027 में 'अकेले दम' पर सरकार बनाने का सपना देख रही है। अब तक सहयोगी राजनीति तक सीमित रही भाजपा अब पंजाब में स्वतंत्र शक्ति बनने की दिशा में आक्रामक कदम बढ़ाती दिख रही है और 2027 का रण अब पहले से कहीं अधिक खुला और अनिश्चित हो गया है।</div><div><br></div><h2>क्या खत्म हो जाएगी 'आप'?</h2><div>इतिहास गवाह है कि क्षेत्रीय दल जब ऐसे बड़े विद्रोह का सामना करते हैं तो अक्सर वे या तो बिखर जाते हैं या फिर सिमटकर रह जाते हैं लेकिन आप की स्थिति थोड़ी भिन्न है। इसका सबसे बड़ा कारण है अरविंद केजरीवाल का व्यक्तित्व। आम आदमी पार्टी का आधार अरविंद केजरीवाल की ‘व्यक्तिगत ब्रांडिंग’ पर टिका है। जब तक दिल्ली और पंजाब जैसे अहम राज्यों में उनका जनाधार सुरक्षित है, तब तक ‘आप’ का पूर्ण पतन लगभग असंभव प्रतीत होता है। इसके समानांतर, ‘आप’ की ताकत उसका विकसित कैडर ढांचा है। आप ने पिछले एक दशक में एक मजबूत कैडर तैयार किया है। हालांकि शीर्ष स्तर पर योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण और अब राघव चड्ढा जैसे प्रमुख चेहरों का अलग होना पार्टी को बड़ा झटका देता है लेकिन जमीनी कार्यकर्ता अब भी पार्टी की विचारधारा से जुड़े हैं। एक वैकल्पिक, जनोन्मुख और व्यवस्था-विरोधी नेता की केजरीवाल की छवि अब भी पार्टी की सबसे बड़ी पूंजी बनी हुई है।</div><div><br></div><h2>राष्ट्रीय राजनीति में बदलता खेल</h2><div>राष्ट्रीय राजनीति के व्यापक परिप्रेक्ष्य में यह घटनाक्रम सत्ता-संतुलन को निर्णायक रूप से प्रभावित करता है। राज्यसभा में सात सांसदों के जुड़ने से भाजपा की स्थिति और सुदृढ़ हुई है, जिससे अब महत्वपूर्ण विधेयकों के पारित होने में उसकी छोटे दलों पर निर्भर रहने की बाध्यता कम हो गई है। इसके विपरीत, विपक्षी गठबंधन के लिए यह स्पष्ट झटका है क्योंकि ‘आप’ इस गठबंधन की मुखर आवाज रही है। सबसे गंभीर आघात ‘आप’ की वैचारिक विश्वसनीयता पर पड़ा है। जो पार्टी ‘ईमानदार राजनीति’ को अपनी पहचान मानती रही, उसी के भीतर से वैचारिक विचलन और आरोपों का उठना उसके नैरेटिव को कमजोर करता है। यह स्थिति नेतृत्व शैली पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है, लगातार बड़े चेहरों का अलग होना इस ओर संकेत करता है कि संवाद की कमी और निर्णय प्रक्रिया का केंद्रीकरण आंतरिक असंतोष को जन्म दे रहा है। राष्ट्रीय विस्तार की महत्वाकांक्षा पर भी इसका प्रभाव पड़ना तय है। दिल्ली और पंजाब से आगे बढ़ने की जो रणनीति थी, वह अब धीमी पड़नी तय है, विशेषकर तब, जब पंजाब, जो ‘आप’ का सबसे मजबूत गढ़ है, स्वयं इस राजनीतिक भूकंप के केंद्र में आ खड़ा हुआ है।</div><div><br></div><h2>आप के लिए अग्निपरीक्षा का समय</h2><div>यह कहना जल्दबाजी होगी कि 7 सांसदों के जाने से आम आदमी पार्टी खत्म हो जाएगी। राजनीति में रिक्तियां हमेशा भर दी जाती हैं। हालांकि यह निश्चित है कि आप अब अपनी सबसे कठिन अग्निपरीक्षा से गुजर रही है। यदि अरविंद केजरीवाल और भगवंत मान अगले कुछ महीनों में पंजाब और दिल्ली के कैडर को एकजुट रखने में विफल रहे तो 2027 का चुनाव उनके लिए एक राजनीतिक ढ़लान साबित हो सकता है। दूसरी ओर, भाजपा ने इस ‘मास्टरस्ट्रोक’ के जरिए यह संदेश दे दिया है कि वह दिल्ली और पंजाब की सत्ता के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है। बहरहाल, ‘आप’ के लिए चुनौती अब केवल चुनाव जीतना नहीं बल्कि अपने अस्तित्व और साख को बचाए रखना है।</div><div><br></div><div>- योगेश कुमार गोयल</div><div>(लेखक साढ़े तीन दशक से पत्रकारिता में निरंतर सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार हैं)</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 28 Apr 2026 15:37:31 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/political-tsunami-from-punjab-to-delhi-aap-in-crisis</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[US में बढ़ती राजनीतिक हिंसा ने सबको चौंकाया, Trump से पहले भी कई अमेरिकी राष्ट्रपति बन चुके हैं बंदूक का निशाना]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/political-violence-has-risen-again-in-the-us]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>वाशिंगटन में घटी एक चौंकाने वाली घटना ने एक बार फिर अमेरिका की राजनीति में हिंसा की गहरी जड़ों को उजागर कर दिया है। शनिवार रात लगभग आठ बजकर छत्तीस मिनट पर व्हाइट हाउस संवाददाताओं के वार्षिक रात्रिभोज के दौरान अचानक गोलियों की आवाज ने माहौल को दहला दिया। यह कार्यक्रम वाशिंगटन हिल्टन होटल में आयोजित हो रहा था, जहां देश की राजनीति, मीडिया और मनोरंजन जगत के प्रमुख लोग एकत्रित थे। इस अप्रत्याशित हमले के बाद सुरक्षा एजेंसियों ने तुरंत कार्रवाई करते हुए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को सुरक्षित बाहर निकाल लिया। इस घटना ने न केवल उस शाम को अफरातफरी में बदल दिया, बल्कि अमेरिका के राजनीतिक इतिहास में हिंसा की पुरानी यादों को भी ताजा कर दिया।</div><div><br></div><div>यह हमला ऐसे समय हुआ है जब ट्रंप पहले ही पिछले दो वर्षों में तीन हमलों का सामना कर चुके हैं। यह हालिया प्रयास एक बार फिर इस बात को रेखांकित करता है कि अमेरिका में राजनीतिक तनाव किस हद तक बढ़ चुका है। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, हमलावर कोल एलन नामक एक 31 वर्षीय व्यक्ति था, जिसे मुख्य सभागार तक पहुंचने से पहले ही काबू कर लिया गया। राष्ट्रपति को इस घटना में कोई चोट नहीं आई, लेकिन इसने देश भर में चिंता की लहर पैदा कर दी है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/after-all-why-are-the-world-policeman-trump-and-his-america-themselves-so-insecure" target="_blank">आखिर दुनिया का “थानेदार” ट्रंप और उनका अमेरिका खुद इतना असुरक्षित क्यों है?</a></h3><div>हम आपको याद दिला दें कि इससे पहले जुलाई 2024 में पेंसिल्वेनिया के बटलर नामक छोटे शहर में चुनावी रैली के दौरान ट्रंप पर गोलीबारी हुई थी। एक हमलावर ने पास की इमारत की छत से आठ गोलियां चलाई थीं। इस हमले में ट्रंप के कान को हल्की चोट लगी थी, जबकि एक व्यक्ति की मौत हो गई थी और दो अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए थे। इसके बाद सितंबर में फ्लोरिडा स्थित ट्रंप के गोल्फ क्लब के पास भी एक संदिग्ध व्यक्ति को हथियार के साथ पकड़ा गया था, जिसे हत्या की साजिश के रूप में देखा गया। उसी वर्ष अक्टूबर में कैलिफोर्निया में एक और संदिग्ध को हथियारों के साथ गिरफ्तार किया गया था, जिसने ट्रंप की सुरक्षा को लेकर चिंताओं को और बढ़ा दिया था।</div><div><br></div><div>वैसे अमेरिका का इतिहास राष्ट्रपति स्तर पर राजनीतिक हिंसा से अछूता नहीं रहा है। 1865 में अब्राहम लिंकन की हत्या से लेकर 1963 में जॉन एफ केनेडी की हत्या तक कई ऐसी घटनाएं हुई हैं जिन्होंने देश की लोकतांत्रिक नींव को झकझोर दिया। लिंकन और केनेडी के अलावा जेम्स गारफील्ड और विलियम मैकिनले भी ऐसे राष्ट्रपति रहे जिन्हें पद पर रहते हुए गोली मार दी गई थी। इसके अलावा कई ऐसे नेता भी रहे जिन्होंने हमलों से बचकर अपनी जान बचाई। थियोडोर रूजवेल्ट पर 1912 में एक व्यक्ति ने गोली चलाई थी, लेकिन वह बच गए थे। इसी तरह 1981 में रोनाल्ड रीगन पर वाशिंगटन में एक हमलावर ने गोली चलाई थी। रीगन को गंभीर चोटें आईं, लेकिन त्वरित चिकित्सा सहायता से उनकी जान बच गई। इस घटना ने उनकी लोकप्रियता को भी बढ़ा दिया और उनके राजनीतिक कॅरियर को मजबूती मिली थी।</div><div><br></div><div>इतिहासकार मानते हैं कि रीगन पर हमला अमेरिका के एक अशांत दौर का अंत था, जिसमें रॉबर्ट केनेडी और मार्टिन लूथर किंग जैसे नेताओं की हत्या शामिल थी। इसके बाद भी राजनीतिक हिंसा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई। हाल के वर्षों में यह प्रवृत्ति फिर से उभरती दिखाई दे रही है। 2021 में कैपिटल भवन पर हमला, उग्रवादी सशस्त्र समूहों का बढ़ता प्रभाव और विभिन्न राजनीतिक हस्तियों पर हमले इस बढ़ती अस्थिरता के संकेत हैं। 2017 में एक व्यक्ति ने रिपब्लिकन सांसदों पर गोली चलाई थी जिसमें कई लोग घायल हुए। 2022 में सुप्रीम कोर्ट के एक न्यायाधीश की हत्या की साजिश का खुलासा हुआ, जबकि एक अन्य हमलावर ने विस्कॉन्सिन में एक न्यायाधीश की हत्या कर दी और कई अन्य नेताओं को निशाना बनाने की योजना बनाई थी।</div><div><br></div><div>इसी प्रकार मिशिगन की गवर्नर ग्रेचेन व्हिटमर के अपहरण की साजिश और सैन फ्रांसिस्को में नैन्सी पेलोसी के पति पर हमला भी इस हिंसक माहौल को दर्शाते हैं। हाल ही में यूटा में एक राजनीतिक नेता चार्ली किर्क की हत्या ने इस प्रवृत्ति को और गंभीर बना दिया है। इन सभी घटनाओं को देखते हुए यह स्पष्ट होता है कि अमेरिका एक बार फिर राजनीतिक हिंसा के खतरनाक दौर से गुजर रहा है। राष्ट्रपति ट्रंप पर लगातार हमले इस बात का संकेत हैं कि देश में राजनीतिक ध्रुवीकरण और असंतोष चरम पर है। अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या सुरक्षा उपायों को और मजबूत किया जाएगा और क्या इस हिंसक प्रवृत्ति को रोका जा सकेगा। बहरहाल, अमेरिका की लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए यह एक गंभीर चेतावनी है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो राजनीतिक अस्थिरता और गहरा सकती है।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 27 Apr 2026 12:36:35 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/political-violence-has-risen-again-in-the-us</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[आप सांसद राघव चड्डा के भाजपा में शामिल होने से पंजाब में आप सरकार की हिल सकती है नींव]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/raghav-chadha-joining-the-bjp-could-shake-the-foundations-of-the-aap-government-in-punjab]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>दिल्ली के बाद भाजपा अब पंजाब से भी आम आदमी पार्टी को बेदखल करेगी। इसी के चलते उसने ऑपरेशन लोटस राज्यसभा को अंजाम दिया। बता दें कि आम आदमी पार्टी से राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने उपनेता पद से हटाए जाने के बाद हाल ही में आप (AAP) छोड़कर भाजपा में खुशी खुशी शामिल होने का ऐलान किया, जिसमें राज्यसभा के दो-तिहाई आप सांसद (लगभग 7 में से 10) उनके साथ हैं। इससे साफ है कि अब पंजाब में आप की सरकार भी हिलाई जाएगी।</div><div><br></div><div>संविधान के जानकार बताते हैं कि चड्डा का यह कदम संविधान के विलय प्रावधानों के तहत लिया गया, जिससे आप को संसदीय ताकत में बड़ा झटका लगा। लिहाजा, इसके राजनीतिक मायने तलाशे जा रहे हैं। उल्लेखनीय है कि सांसद राघव चड्ढा ने गत 24 अप्रैल को प्रेस कॉन्फ्रेंस में घोषणा की कि वे संदीप पाठक, अशोक मित्तल समेत अन्य सांसदों के साथ बीजेपी में विलय कर रहे हैं। उन्होंने आप पर सिद्धांतों से भटकने का आरोप लगाया और खुद को "गलत पार्टी में सही आदमी" बताया। आप ने इसे ऑपरेशन लोटस करार दिया, लेकिन विलय के कारण एंटी-डिफेक्शन कानून लागू नहीं होता।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/major-crisis-for-the-aap-when-will-kejriwal-step-down-from-the-post-of-party-supremo" target="_blank">आम आदमी पार्टी पर बड़ा संकट- केजरीवाल कब छोड़ेंगे पार्टी सुप्रीमो की कुर्सी?</a></h3><div>चूंकि भाजपा के लिए यह अप्रत्याशित लाभ की स्थिति है क्योंकि बीजेपी को युवा, वाक्पटु और शहरी चेहरे के रूप में चड्ढा मिला, जो विपक्ष के सॉफ्ट वोट बैंक में घुसपैठ करेगा। राज्यसभा में संख्या बढ़ेगी और दिल्ली-पंजाब में आप के संगठन को कमजोर करने में मदद मिलेगी। यह नैरेटिव वॉर में बीजेपी को बढ़त देता है, जहां चड्ढा आप मॉडल पर सवाल उठा सकते हैं। आपने गौर किया होगा कि जनहितकारी मुद्दों को लेकर चड्डा ने सोशल मीडिया में एक अभियान चलवाया था और राज्यसभा में भी आमलोगों के मुद्दे को उठाया, जिससे उनकी राष्ट्रीय लोकप्रियता बढ़ी और भाजपा ने उन्हें हाथोंहाथ लोक लिया।</div><div><br></div><div>समझा जा रहा है कि पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 में भाजपा उन्हें मुख्यमंत्री का उम्मीदवार भी घोषित कर सकती है। इससे आप भी भावी रणनीति पर गहरा प्रभाव पड़ेगा। जहां तक आप पर प्रभाव की बात है तो आप की राज्यसभा ताकत 10 से घटकर 3 रह गई, जो राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा को चोट पहुंचाएगी। वहीं दूसरी पंक्ति लीडरशिप कमजोर हुई, क्लीन पॉलिटिक्स की इमेज पर दरार आई और कैडर मनोबल गिरा। पंजाब में संगठनात्मक नुकसान होगा, खासकर 2027 चुनावों से पहले। चूंकि राघव चड्ढा ने आप&nbsp; छोड़ने का मुख्य कारण पार्टी के मूल सिद्धांतों, मूल्यों और नैतिकता से भटक जाना बताया। उन्होंने कहा कि उन्होंने 15 साल अपनी जवानी दी, लेकिन अब पार्टी व्यक्तिगत फायदे के लिए काम कर रही है और भ्रष्टाचार हटाने वाली पार्टी समझौतों में उलझ गई।</div><div><br></div><div>जहां तक व्यक्तिगत कारण की बात है तो चड्ढा ने पार्टी की गतिविधियों से खुद को अलग किया क्योंकि वे "उनके गुनाहों में शामिल नहीं होना चाहते थे।" उन्होंने खुद को "गलत पार्टी में सही आदमी" करार दिया। प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि आप अब देश के लिए नहीं, पर्सनल एजेंडे पर चल रही है। समझा जाता है कि यह पार्टी कार्रवाई का दुष्प्रभाव है क्योंकि आप ने उन्हें राज्यसभा उपनेता पद से हटाया और सदन में बोलने पर रोक लगाई, जिसे अशोक मित्तल को सौंपा गया। संजय सिंह की गिरफ्तारी के बाद राज्यसभा नेता बनने की कोशिश नाकाम रही, जो तल्खी बढ़ाने वाला था। ये कदम चड्ढा को पंजाब जाने पर मजबूर कर दिए।</div><div><br></div><h2># जानिए, आप के बाकी सांसद कौन थे जो बीजेपी में शामिल हुए</h2><div><br></div><div>राघव चड्ढा के अलावा आप के 6 अन्य राज्यसभा सांसदों ने बीजेपी में विलय किया, जो कुल 7 सांसदों का समूह बनाते हैं। यह विलय पंजाब और अन्य क्षेत्रों के सांसदों पर केंद्रित था, जिससे आप की राज्यसभा ताकत 10 से घटकर 3 रह गई। भाजपा में शामिल अन्य सांसदों की सूची निम्नलिखित है- संदीप पाठक (राष्ट्रीय संगठन महामंत्री, IIT ग्रेजुएट), अशोक मित्तल (शिक्षाविद, लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी संस्थापक), हरभजन सिंह (क्रिकेटर), स्वाति मालीवाल (पूर्व DCW चीफ), राजेंद्र गुप्ता (ट्राइडेंट ग्रुप संस्थापक, पद्म श्री), विक्रमजीत सिंह साहनी (उद्योगपति, सन फाउंडेशन प्रमुख)। ये ज्यादातर पंजाब से राज्यसभा सदस्य थे, जिन्होंने चड्ढा के नेतृत्व में विलय का हस्ताक्षर किया।।&nbsp;</div><div><br></div><div>वहीं, आप ने इसे ऑपरेशन लोटस बताया, लेकिन विलय प्रावधान के तहत कोई अयोग्यता नहीं हुई। अरविंद केजरीवाल ने राघव चड्ढा और अन्य आप सांसदों की बगावत पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए बीजेपी पर पंजाबियों को धोखा देने का आरोप लगाया। उन्होंने सोशल मीडिया X पर ट्वीट किया, "बीजेपी ने एक बार फिर पंजाबियों को धोखा दिया है।" केजरीवाल ने इसे पंजाब सरकार को कमजोर करने की साजिश बताया और अमित शाह व नरेंद्र मोदी से अपील की कि "यह घिनौना काम पंजाब की जनता कभी माफ नहीं करेगी।" यह पहली प्रतिक्रिया थी, जिसमें उन्होंने सांसदों पर सीधे निशाना साधने से परहेज किया।</div><div><br></div><div>वहीं, आप नेताओं की प्रतिक्रिया भी आई है। संजय सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में इसे "ऑपरेशन लोटस" करार दिया और कहा कि पंजाब की जनता भाजपा को माफ नहीं करेगी। पार्टी ने इसे भाजपा की साजिश बताया, लेकिन विलय प्रावधान के कारण कानूनी कार्रवाई मुश्किल हुई।</div><div>&nbsp;</div><div>संजय सिंह ने राघव चड्ढा और अन्य 7 आप सांसदों की बगावत को "पंजाब के साथ गद्दारी" करार दिया। उन्होंने इसे BJP का "ऑपरेशन लोटस" बताया, जिसमें प्रशासनिक तंत्र का दुरुपयोग कर भगवंत मान सरकार को तोड़ने की साजिश रची गई। संजय सिंह ने कहा, "प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह से कहना चाहता हूं कि भगवंत मान के अच्छे कार्यों को रोकने के लिए आपने जो किया, पंजाब की जनता कभी माफ नहीं करेगी।" उन्होंने दलबदलुओं को चेतावनी दी कि आप ने इन्हें संसद तक पहुंचाया, लेकिन इन्होंने पंजाब जनता को धोखा दिया।</div><div><br></div><div>वहीं राजनीतिक निशाना साधते हुए&nbsp; सिंह ने बीजेपी पर पंजाब सरकार के शिक्षा-स्वास्थ्य मॉडल को नष्ट करने का आरोप लगाया और कहा कि ये सांसदों को पंजाब की जनता माफ नहीं करेगी। यह प्रतिक्रिया पार्टी की रणनीति का हिस्सा बनी, जहां जनता को भावुक अपील की गई।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 25 Apr 2026 18:58:23 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/raghav-chadha-joining-the-bjp-could-shake-the-foundations-of-the-aap-government-in-punjab</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[क्या हम कृत्रिम मेधा के प्रयोग से उत्पन्न संकटों के लिए तैयार हैं?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/are-we-prepared-for-the-crises-arising-from-the-use-of-artificial-intelligence]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>मानव सभ्यता के इतिहास में तकनीकी क्रांतियों ने सदैव हमारे अस्तित्व की दिशा को बदला है, किंतु वर्तमान में कृत्रिम मेधा यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का जो तीव्र विस्तार हम देख रहे हैं, वह पूर्ववर्ती सभी आविष्कारों से मौलिक रूप से भिन्न है। यह केवल एक उपकरण नहीं, बल्कि एक समानांतर बुद्धिमत्ता है जो हमारे सोचने, निर्णय लेने और सामाजिक ताने-बाने को समझने के पारंपरिक तरीकों को चुनौती दे रही है। आज जब हम इस प्रश्न पर विचार करते हैं कि क्या हम इस तकनीक से उत्पन्न संकटों के लिए तैयार हैं, तो उत्तर केवल तकनीकी प्रगति में नहीं, बल्कि हमारी नैतिक, कानूनी और सामाजिक तैयारियों में छिपा है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में जेनेरेटिव एआई के उदय ने सूचनाओं की सत्यता पर एक गहरा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। डीपफेक तकनीक और परिष्कृत एल्गोरिदम के माध्यम से जिस प्रकार से भ्रामक सूचनाएं या मिसइन्फॉर्मेशन फैलाई जा रही हैं, उसने न केवल लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को प्रभावित किया है, बल्कि व्यक्तिगत गरिमा को भी जोखिम में डाल दिया है। अंतरराष्ट्रीय साइबर सुरक्षा रिपोर्टों के अनुसार, पिछले 2 वर्षों में एआई-जनित भ्रामक सामग्रियों में 900 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है। यह स्थिति दर्शाती है कि हमारी कानूनी प्रणालियां और डिजिटल साक्षरता के मानक इस गति का मुकाबला करने में फिलहाल अक्षम सिद्ध हो रहे हैं।</div><div><br></div><div>आर्थिक दृष्टिकोण से देखें तो कृत्रिम मेधा का प्रभाव रोजगार के बाजारों पर अत्यंत गहरा और बहुआयामी होने वाला है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की भविष्य की नौकरियों से जुड़ी रिपोर्टों के अनुसार, एआई और ऑटोमेशन के कारण अगले दशक में करोड़ों नौकरियों के स्वरूप में आमूलचूल परिवर्तन आएगा। जहाँ एक ओर यह तकनीक उत्पादकता बढ़ाने और नए प्रकार के व्यवसायों को जन्म देने की क्षमता रखती है, वहीं दूसरी ओर यह निम्न और मध्यम कौशल वाले श्रमिकों के लिए एक बड़ा विस्थापन संकट भी पैदा कर रही है। क्या हमारी शिक्षा प्रणालियां और कौशल विकास कार्यक्रम इस गति से परिवर्तित हो रहे हैं कि वे भविष्य की कार्यशक्ति को इस नई व्यवस्था के अनुकूल बना सकें? यह प्रश्न अनुत्तरित है क्योंकि विकासशील देशों में डिजिटल विभाजन आज भी एक कठोर वास्तविकता है। जब तक हम एक समावेशी तकनीकी ढांचे का निर्माण नहीं करते, तब तक कृत्रिम मेधा केवल वैश्विक असमानता को बढ़ाने का एक माध्यम बनकर रह जाएगी। इसके अतिरिक्त, एआई मॉडल्स के भीतर मौजूद 'एल्गोरिथमिक बायस' या पक्षपात एक और बड़ा संकट है, जो ऐतिहासिक डेटा के आधार पर लिंग, जाति और राष्ट्रीयता के प्रति पूर्वाग्रहों को अनजाने में सुदृढ़ कर रहा है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/artificial-intelligence-a-boon-of-convenience-or-a-crisis-of-values" target="_blank">कृत्रिम बुद्धिमत्ता: सुविधा का वरदान या मूल्यों का संकट</a></h3><div>तकनीकी सुरक्षा और स्वायत्त हथियारों का मुद्दा कृत्रिम मेधा के सबसे भयावह संकटों में से एक है। 'लीथल ऑटोनॉमस वेपन्स सिस्टम्स' या स्वायत्त घातक हथियार प्रणालियों का विकास वैश्विक शांति के लिए एक नई चुनौती पेश कर रहा है। जब युद्ध के मैदान में जीवन और मृत्यु का निर्णय एक एल्गोरिदम द्वारा लिया जाने लगेगा, तो मानवीय उत्तरदायित्व और युद्ध के अंतरराष्ट्रीय कानूनों का क्या होगा? संयुक्त राष्ट्र और कई वैश्विक मानवाधिकार संगठनों ने इस पर नियंत्रण की अपील की है, लेकिन महाशक्तियों के बीच एआई की प्रतिस्पर्धा ने एक नई डिजिटल शीत युद्ध जैसी स्थिति उत्पन्न कर दी है। यह तकनीकी रेस हमें एक ऐसे बिंदु पर ले जा सकती है जहाँ नियंत्रण की लगाम मानव के हाथ से निकलकर मशीनों के पास चली जाए। सुरक्षा का अर्थ केवल भौतिक हथियारों से नहीं है, बल्कि डेटा की गोपनीयता और एल्गोरिदम के माध्यम से किए जाने वाले 'बिहेवियरल मैनिपुलेशन' या व्यवहारिक हेरफेर से भी है। बड़ी तकनीकी कंपनियाँ जिस प्रकार डेटा का एकत्रीकरण कर रही हैं, वह व्यक्तिगत स्वतंत्रता और स्वायत्तता को एक संकीर्ण घेरे में बंद कर रहा है।</div><div><br></div><div>पर्यावरणीय दृष्टिकोण से भी कृत्रिम मेधा की तैयारी पर प्रश्न उठना लाजिमी है। विशाल एआई मॉडल्स को प्रशिक्षित करने के लिए अत्यधिक ऊर्जा और जल संसाधनों की आवश्यकता होती है, जो कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्यों को प्राप्त करने में बाधा उत्पन्न कर सकता है। एक शोध के अनुसार, एक बड़े लैंग्वेज मॉडल को प्रशिक्षित करने में उतनी कार्बन फुटप्रिंट पैदा होती है, जितनी पांच कारें अपने पूरे जीवनकाल में उत्सर्जित करती हैं। जलवायु परिवर्तन के संकट से जूझती दुनिया के लिए यह एक अतिरिक्त भार है। इसलिए, जब हम एआई के संकटों की बात करते हैं, तो हमें 'सस्टेनेबल एआई' या संवहनीय कृत्रिम मेधा की दिशा में भी ठोस कदम उठाने होंगे। क्या हमारे पास ऐसी नीतियां हैं जो इन कंपनियों को पर्यावरणीय रूप से उत्तरदायी बना सकें? वर्तमान में अधिकांश विनियमन केवल लाभ और तकनीकी श्रेष्ठता पर केंद्रित हैं, जबकि पारिस्थितिक संतुलन को हाशिए पर धकेल दिया गया है।</div><div><br></div><div>निष्कर्षतः कृत्रिम मेधा के संकटों के लिए हमारी तैयारी अभी भी प्रारंभिक और खंडित अवस्था में है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 'यूरोपीय संघ एआई अधिनियम' जैसे प्रयास एक सकारात्मक दिशा दिखाते हैं, लेकिन यह वैश्विक स्तर पर एक समान मानकों के बिना अपर्याप्त हैं। हमें एक ऐसे वैश्विक गठबंधन की आवश्यकता है जो न केवल तकनीक के विकास की निगरानी करे, बल्कि मानवीय मूल्यों, नैतिकता और न्याय को इसके केंद्र में रखे। तैयारी का अर्थ केवल उन्नत फायरवॉल बनाना नहीं है, बल्कि एक जागरूक समाज का निर्माण करना है जो सत्य और मिथ्या के बीच अंतर कर सके। कृत्रिम मेधा एक शक्तिशाली लहर की तरह है, जिसे रोका नहीं जा सकता, लेकिन यदि हम इसके लिए सही बांध और नहरें तैयार नहीं करते, तो यह हमारी सामाजिक व्यवस्था के तटबंधों को नष्ट कर सकती है। हमें तकनीकी प्रगति के साथ-साथ अपनी नैतिक चेतना को भी उन्नत करना होगा, क्योंकि अंततः तकनीक का उद्देश्य मानव कल्याण होना चाहिए, न कि उसका विनाश। समय कम है और चुनौतियां अपार हैं, अतः भविष्य की तैयारी के लिए हमें आज ही अपनी प्राथमिकताओं को पुन: परिभाषित करना होगा।</div><div><br></div><div>- डॉ. शैलेश शुक्ला</div><div>वैश्विक समूह संपादक, सृजन संसार अंतरराष्ट्रीय पत्रिका समूह</div><div>सलाहकार संपादक, नईदुनिया</div><div>आशियाना, लखनऊ - 226012, उत्तर प्रदेश</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 24 Apr 2026 12:28:41 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/are-we-prepared-for-the-crises-arising-from-the-use-of-artificial-intelligence</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[पुस्तकें हैं जीवन का दीप, समाधान का सेतु]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/books-are-the-lamp-of-life-the-bridge-to-solutions]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हर वर्ष 23 अप्रैल को समूचा विश्व ज्ञान, सृजनशीलता और मानवीय सभ्यता की अमूल्य धरोहर पुस्तकों का उत्सव मनाता है। यूनेस्को द्वारा 1995 में प्रारंभ किया गया यह दिवस केवल औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि लेखकों के सम्मान, सृजनाधिकार की रक्षा और पठन संस्कृति के संवर्धन का वैश्विक संकल्प है। इस तिथि का चयन भी अत्यंत अर्थपूर्ण है, क्योंकि इसी दिन विलियम शेक्सपियर और मिगुएल डी सर्वांटेस जैसे महान साहित्यकारों का अवसान हुआ, जिनकी रचनाओं ने मानव सभ्यता को नई दिशा दी। वर्ष 2026 में इस दिवस का मुख्य संदेश यह है कि व्यक्ति अपनी रुचियों के अनुसार पढ़े और पठन को आनंदमय अनुभव बनाए। आज आवश्यकता इस बात की है कि पढ़ने को बोझ नहीं, बल्कि आत्मविकास और आत्मानंद का माध्यम माना जाए। इसी क्रम में मोरक्को की राजधानी रबात को वर्ष 2026 के लिए विश्व पुस्तक राजधानी घोषित किया गया है, जो इस तथ्य को रेखांकित करता है कि पुस्तक संस्कृति किसी एक देश की नहीं, बल्कि समूची मानवता की साझा धरोहर है।</div><div><br></div><div>पुस्तकें केवल कागज और शब्दों का संयोजन नहीं होतीं, वे जीवन का साक्षात अनुभव कराती हैं। वे समय, समाज और संवेदनाओं का जीवंत इतिहास होती हैं। महान कवि रविन्द्रनाथ टैगोर ने कहा था कि उच्च शिक्षा केवल जानकारी प्रदान नहीं करती, बल्कि जीवन को संतुलित और शांतिपूर्ण बनाती है। यही कार्य पुस्तकें करती हैं, वे मनुष्य के भीतर विवेक, करुणा और सहिष्णुता का विकास करती हैं। संकट के समय में पुस्तकें सच्चे मित्र की तरह साथ निभाती हैं, यह तथ्य वैश्विक महामारी के दौर में स्पष्ट रूप से देखने को मिला, जब लोगों ने अकेलेपन और अनिश्चितता के बीच पुस्तकों में ही आश्रय पाया। भारत में पुस्तक संस्कृति का इतिहास अत्यंत प्राचीन और गौरवपूर्ण रहा है। वेद, उपनिषद, रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों ने न केवल भारतीय समाज को दिशा दी, बल्कि समूचे विश्व को ज्ञान का प्रकाश प्रदान किया। नालंदा विश्वविद्यालय और तक्षशिला विश्वविद्यालय जैसे प्राचीन विश्वविद्यालय ज्ञान के ऐसे केंद्र थे, जहाँ दूर-दूर से विद्यार्थी अध्ययन हेतु आते थे। ताड़पत्रों और भोजपत्रों पर लिखी गई पांडुलिपियों ने भारतीय ज्ञान परंपरा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित रखा। यह परंपरा केवल धार्मिक ग्रंथों तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसमें विज्ञान, चिकित्सा, साहित्य और दर्शन के विविध आयाम समाहित थे।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/trending/the-erosion-of-book-culture-the-harbinger-of-an-impending-crisis" target="_blank">World Book and Copyright Day: पुस्तक संस्कृति का क्षरण, आने वाले संकट की आहट</a></h3><div>जीवन के अंधकारमय क्षणों में पुस्तकें सचमुच एक दीपक की तरह मार्ग को प्रकाशित करती हैं। जब मनुष्य समस्याओं, तनाव और द्वंद्व से घिर जाता है, तब पुस्तकें उसे नया दृष्टिकोण प्रदान करती हैं। वे केवल ज्ञान का भंडार नहीं, बल्कि एक सच्चे मित्र, दार्शनिक और मार्गदर्शक के रूप में उसकी चेतना को जागृत करती हैं। पुस्तकें हमें यह सिखाती हैं कि हर समस्या का समाधान बाहर नहीं, भीतर की समझ और दृष्टि में छिपा होता है। चीनी दार्शनिक कन्फ्यूशियस ने भी कहा था कि “अज्ञानता मन का अंधकार है और ज्ञान ही उसका प्रकाश।” इसी प्रकार महान् दार्शनिक आचार्य महाप्रज्ञ ने जीवन की सरलता और संतुलन पर बल देते हुए बताया कि सच्चा ज्ञान वही है जो मन को शांत और संतुलित बनाए। पुस्तकें इसी संतुलन की साधना कराती हैं-वे हमें सोचने, समझने और धैर्यपूर्वक निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करती हैं। आधुनिक भारत में भी पुस्तक संस्कृति को सशक्त बनाने के लिए अनेक प्रयास किए गए हैं। आचार्य विनोबा भावे द्वारा स्थापित सर्वोदय साहित्य भंडार तथा आचार्य तुलसी द्वारा स्थापित आदर्श साहित्य संघ जैसे संस्थानों ने नैतिक और प्रेरणादायक साहित्य को जन-जन तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन प्रयासों का उद्देश्य केवल ज्ञान का प्रसार नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण और मानवीय मूल्यों का संवर्धन भी रहा है। वर्तमान समय में जब तकनीकी साधनों का विस्तार हुआ है, तब भी पुस्तकों की उपयोगिता और महत्ता में कोई कमी नहीं आई है। यद्यपि अध्ययन के अनेक नए माध्यम विकसित हुए हैं, फिर भी मुद्रित पुस्तकों का आत्मीय स्पर्श और उनकी गहराई अद्वितीय है। पुस्तकें मनुष्य के विचारों को विस्तार देती हैं, उसे सही और गलत का बोध कराती हैं तथा जीवन के प्रति एक संतुलित दृष्टिकोण प्रदान करती हैं।</div><div><br></div><div>भारत में पुस्तक संस्कृति को प्रोत्साहित करने में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में कई उल्लेखनीय पहलें हुई हैं। उन्होंने उपहार के रूप में पुष्पगुच्छ के स्थान पर पुस्तक देने का संदेश देकर समाज में ज्ञान के प्रति सम्मान की भावना को प्रबल किया है। इसके साथ ही देशभर में पठन-पाठन और पुस्तकालयों के विकास को लेकर विभिन्न अभियान चलाए गए हैं, जिनका उद्देश्य युवाओं में अध्ययन के प्रति रुचि जागृत करना है। यह प्रयास केवल साक्षरता बढ़ाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि एक जागरूक, संवेदनशील और सशक्त समाज के निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। महान वैज्ञानिक एवं पूर्व राष्ट्रपति ए. पी. जे. अब्दुल कलाम ने कहा था कि एक अच्छी पुस्तक अनेक मित्रों के समान होती है। वास्तव में पुस्तकें मनुष्य के मानसिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक विकास में अत्यंत सहायक होती हैं। वे व्यक्ति को आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करती हैं, समाज की विसंगतियों को समझने का दृष्टिकोण देती हैं और सकारात्मक परिवर्तन के लिए प्रेरित करती हैं। प्रसिद्ध लेखिका टोनी मोरिसन का यह कथन भी उल्लेखनीय है कि यदि वह पुस्तक उपलब्ध नहीं है जिसे आप पढ़ना चाहते हैं, तो आपको स्वयं उसे लिखना चाहिए। यह विचार सृजनशीलता और आत्मविश्वास को प्रोत्साहित करता है। आज के त्वरित सूचना युग में जब ध्यान भटकाने वाले साधनों की भरमार है, तब गहन अध्ययन और मनन की आवश्यकता और भी बढ़ गई है। पुस्तकें ही वह माध्यम हैं जो मनुष्य को एकाग्रता, धैर्य और गहराई प्रदान करती हैं। वे केवल जानकारी नहीं देतीं, बल्कि जीवन को दिशा देती हैं और व्यक्ति को बेहतर मनुष्य बनने के लिए प्रेरित करती हैं।</div><div><br></div><div>पुस्तकें मानसिक शांति और भावनात्मक स्थिरता का आधार भी हैं। जब जीवन की भागदौड़ मन को विचलित करती है, तब एक अच्छी पुस्तक ध्यान के समान कार्य करती है, जो मन को एकाग्र और शांत बनाती है। महान चीनी चिंतक मेन्शियस ने कहा था कि मनुष्य का स्वभाव मूलतः शुभ होता है, उसे केवल सही दिशा की आवश्यकता होती है। पुस्तकें वही दिशा प्रदान करती हैं। वे अकेलेपन में सच्चा साथी बनती हैं, दुःख में सहारा देती हैं और निराशा में आशा का संचार करती हैं। पुस्तक के माध्यम से हम अनेक महापुरुषों के अनुभवों से जुड़ते हैं, उनके संघर्षों को समझते हैं और अपने जीवन के लिए प्रेरणा प्राप्त करते हैं। वास्तव में पुस्तकें जीवन-निर्माण का कल्पवृक्ष और कामधेनु हैं। उनकी छाया में बैठकर मनुष्य ज्ञान, विवेक, शांति और समाधान सब कुछ प्राप्त कर सकता है। वे हमारे भीतर ऐसी मानसिकता का विकास करती हैं, जिसमें हम हर परिस्थिति में समाधान खोजने लगते हैं। पुस्तकें हमारे विचारों को व्यापक बनाती हैं, हमारी संवेदनाओं को परिष्कृत करती हैं और हमें एक बेहतर मनुष्य बनने की दिशा में अग्रसर करती हैं। इसलिए कहा जा सकता है कि पुस्तकें केवल जीवन को प्रकाशित ही नहीं करतीं, बल्कि उसे सार्थक, संतुलित और समृद्ध भी बनाती हैं।</div><div><br></div><div>विश्व पुस्तक दिवस मनाते हुए यह स्पष्ट है कि पुस्तकें केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि भविष्य की आधारशिला हैं। वे समाज में स्थायी और सकारात्मक परिवर्तन लाने की क्षमता रखती हैं। ऐसा परिवर्तन जो किसी बाहरी दबाव से नहीं, बल्कि आंतरिक चेतना से उत्पन्न होता है। इसलिए आवश्यक है कि हम पुस्तक संस्कृति को अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाएं, घर-घर में अध्ययन का वातावरण निर्मित करें और आने वाली पीढ़ियों को ज्ञान के इस अमूल्य स्रोत से जोड़ें। विश्व पुस्तक एवं कॉपीराइट दिवस हमें यही प्रेरणा देता है कि हम पढ़ने की आदत को विकसित करें, पुस्तकों के प्रति सम्मान की भावना को जागृत करें और एक ऐसे समाज के निर्माण में योगदान दें, जो ज्ञान, संवेदनशीलता और मानवीय मूल्यों पर आधारित हो।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 23 Apr 2026 17:40:18 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/books-are-the-lamp-of-life-the-bridge-to-solutions</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA["ग्रामीण भारत के 30% स्कूलों में मैदान नहीं, कहीं झाड़ियाँ उगीं तो कहीं दबंगों का कब्ज़ा"]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/a-bitter-reality-of-rural-schools]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत की अधिकांश जनसंख्या गाँवों में बसती है, जहाँ की मिट्टी ने मिल्खा सिंह, पी.टी. उषा और नीरज चोपड़ा जैसे महान खिलाड़ी दिए हैं। इसके बावजूद, ग्रामीण क्षेत्रों के प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में खेलों की स्थिति अत्यंत दयनीय बनी हुई है। विभिन्न शिक्षा रिपोर्टों और सरकारी आंकड़ों (जैसे UDISE+) के अनुसार, आज भी लगभग 30 प्रतिशत से अधिक सरकारी स्कूलों के पास अपना स्वयं का खेल का मैदान नहीं है। जहाँ मैदान उपलब्ध भी हैं, वहाँ उनका रखरखाव इतना खराब है कि वे खेल गतिविधियों के लिए सुरक्षित नहीं माने जा सकते। बाउंड्री वॉल का न होना, मैदान में झाड़ियाँ उगना या स्थानीय लोगों द्वारा अतिक्रमण करना एक आम समस्या बन गई है, जिसके कारण बच्चों को सड़कों या संकरी गलियों में खेलने को मजबूर होना पड़ता है।</div><div><br></div><div>संसाधनों की यह कमी केवल बुनियादी ढांचे तक सीमित नहीं है, बल्कि उपकरणों के स्तर पर भी काफी चिंताजनक है। बजट का अभाव ग्रामीण विद्यालयों के लिए सबसे बड़ी बाधा है। शिक्षा का अधिकांश बजट शिक्षकों के वेतन और मिड-डे मील जैसी अनिवार्य योजनाओं में ही समाप्त हो जाता है, जिससे खेलों के लिए नगण्य राशि बचती है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, एक बड़े प्रतिशत स्कूलों में खेल के नाम पर केवल एक फटी हुई फुटबॉल या कुछ पुराने क्रिकेट बैट ही होते हैं। बास्केटबॉल, वॉलीबॉल या एथलेटिक्स जैसे खेलों के लिए आवश्यक नेट, पोल और ट्रैक तो ग्रामीण भारत के अधिकांश विद्यालयों के लिए आज भी एक विलासिता जैसे हैं। इसके अतिरिक्त, शारीरिक शिक्षकों के रिक्त पद एक और गंभीर संकट हैं। देश के लगभग 50 प्रतिशत ग्रामीण माध्यमिक स्कूलों में प्रशिक्षित खेल प्रशिक्षक नहीं हैं, जिसके कारण बच्चों को खेलों की बारीकियों और नियमों की जानकारी नहीं मिल पाती। बिना सही मार्गदर्शन के, प्रतिभाशाली बच्चे भी जिला या राज्य स्तर की प्रतियोगिताओं तक पहुँचने से पहले ही दम तोड़ देते हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/student-suicides-the-burden-of-dreams-or-the-failure-of-the-system" target="_blank">छात्रों का आत्मघातः सपनों का बोझ है या सिस्टम की नाकामी?</a></h3><div>सामाजिक और नीतिगत स्तर पर भी ग्रामीण खेल प्रतिभाओं को वह सहयोग नहीं मिल पाता जिसकी वे हकदार हैं। ग्रामीण परिवेश में आज भी 'पढ़ोगे-लिखोगे तो बनोगे नवाब' वाली कहावत हावी है, जहाँ खेलों को पढ़ाई में बाधा माना जाता है। केंद्र सरकार की 'खेलो इंडिया' जैसी योजनाएं निस्संदेह सराहनीय हैं, लेकिन इनका वास्तविक लाभ अभी भी शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों तक ही सिमटा हुआ है। ग्रामीण ब्लॉकों में इन योजनाओं का क्रियान्वयन बेहद सुस्त है। संसाधनों के इस अभाव का सीधा परिणाम ग्रामीण युवाओं के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। खेलों की अनुपलब्धता के कारण ग्रामीण बच्चे शारीरिक गतिविधियों से दूर होकर मोबाइल गेमिंग और डिजिटल व्यसनों की ओर आकर्षित हो रहे हैं। यदि भारत को वास्तव में एक वैश्विक खेल महाशक्ति बनना है, तो हमें अपनी नीतियों के केंद्र में ग्रामीण विद्यालयों को रखना होगा। जब तक गाँव के हर स्कूल में एक समतल मैदान, आवश्यक खेल उपकरण और एक समर्पित कोच की व्यवस्था नहीं होगी, तब तक 'फिट इंडिया' और ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतने का सपना अधूरा ही रहेगा। इसके लिए पंचायत स्तर पर बजटीय आवंटन बढ़ाना और निजी क्षेत्रों को खेल बुनियादी ढांचे में निवेश के लिए प्रोत्साहित करना अनिवार्य है।&nbsp; &nbsp;</div><div><br></div><div>- भारत भूषण अड़जरिया&nbsp;</div><div>(मीडिया प्रभारी, दिल्ली विश्वविद्यालय)</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 22 Apr 2026 12:42:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/a-bitter-reality-of-rural-schools</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[कृत्रिम बुद्धिमत्ता: सुविधा का वरदान या मूल्यों का संकट]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/artificial-intelligence-a-boon-of-convenience-or-a-crisis-of-values]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>मानव सभ्यता के विकास का इतिहास यदि देखा जाए तो यह स्पष्ट होता है कि हर नई तकनीक अपने साथ संभावनाओं और संकटों का एक द्वंद्व लेकर आती है। आज का समय भी इसी द्वंद्व से गुजर रहा है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के रूप में विकसित हो रही नवीन तकनीक ने जीवन को सरल, तीव्र और सुविधाजनक बनाया है, किंतु इसके साथ ही यह मानवीय मूल्यों, नैतिकता और सामाजिक संतुलन के लिए एक गंभीर चुनौती भी बनकर उभर रही है। समाज के चिंतकों, दार्शनिकों और आध्यात्मिक नेतृत्व ने समय-समय पर इस विषय पर चिंता व्यक्त की है और हाल ही में पोप लियो 14 द्वारा व्यक्त आशंकाओं ने इस चिंता को वैश्विक विमर्श का केंद्र बना दिया है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि यदि इस तकनीक का उपयोग नैतिक मर्यादाओं से परे जाकर किया गया, तो यह विश्व में विभाजन, भय, हिंसा और संघर्ष को बढ़ावा दे सकती है। यह चेतावनी केवल एक धार्मिक नेता की भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि यह उस गहरी चिंता का संकेत है जो आज पूरी मानवता के भीतर कहीं न कहीं विद्यमान है। तकनीक अपने आप में न तो नैतिक होती है और न ही अनैतिक, किंतु उसका उपयोग उसे किसी भी दिशा में ले जा सकता है।</div><div><br></div><div>वर्तमान समय में यह देखा जा रहा है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग केवल रचनात्मक और सकारात्मक कार्यों तक सीमित नहीं रह गया है। इसके माध्यम से झूठी सूचनाओं का निर्माण, नकली चित्रों और ध्वनियों का सृजन तथा जनमत को प्रभावित करने के प्रयास तेजी से बढ़े हैं। चुनावी प्रक्रियाओं में इसका उपयोग लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर कर सकता है। जब कोई मतदाता यह समझ ही नहीं पाता कि जो वह देख रहा है या सुन रहा है वह सत्य है या निर्मित भ्रम, तब उसकी निर्णय क्षमता प्रभावित होती है। यह स्थिति लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति विश्वास को कमजोर करती है। आज सोशल माध्यमों पर ऐसी अनेक घटनाएँ सामने आती हैं, जहाँ किसी व्यक्ति को नरेंद्र मोदी जैसे बड़े नेताओं के साथ दिखाया जाता है, जबकि वास्तविकता में ऐसा कभी हुआ ही नहीं होता। यह केवल व्यक्तिगत भ्रम नहीं, बल्कि सामाजिक स्तर पर विश्वास की संरचना को कमजोर करने वाला प्रवाह है। जब झूठ और सत्य के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है, तब समाज में संशय, अविश्वास और अस्थिरता का वातावरण बनता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/business/ai-adoption-and-education-reform-veteran-banker-kv-kamath-outlines-roadmap-for-the-next-decade" target="_blank">एआई का उपयोग और शिक्षा सुधार: दिग्गज बैंकर  K.V. Kamath ने बताया अगले दशक का रोडमैप</a></h3><div>कृत्रिम बुद्धिमत्ता का एक और चिंताजनक पक्ष है साइबर अपराधों में इसका बढ़ता उपयोग। आज अपराधी किसी व्यक्ति की आवाज की नकल करके उसके परिचितों को धोखा देने में सक्षम हो गए हैं। परिवार के सदस्य या अधिकारी बनकर धन की ठगी करना अब अत्यंत सरल हो गया है। इस प्रकार की घटनाओं ने अनेक लोगों की जीवन भर की कमाई को पल भर में समाप्त कर दिया है। यह केवल आर्थिक क्षति नहीं, बल्कि विश्वास और सुरक्षा की भावना पर गहरा आघात है। वित्तीय क्षेत्र में भी इस तकनीक का दुरुपयोग गंभीर संकट उत्पन्न कर सकता है। स्वचालित हमलों के माध्यम से बैंकिंग व्यवस्था की कमजोरियों का लाभ उठाया जा सकता है। यदि इस प्रकार के हमले व्यापक स्तर पर होते हैं, तो यह केवल व्यक्तिगत हानि तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि राष्ट्रीय और वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी अस्थिर कर सकते हैं। यह स्थिति उस समय और भी गंभीर हो जाती है जब नियामक संस्थाएँ इन जटिल तकनीकों की गति और स्वरूप को समझने में पीछे रह जाती हैं।</div><div><br></div><div>पर्यावरणीय दृष्टि से भी यह तकनीक पूरी तरह निर्दोष नहीं है। विशाल आंकड़ा केंद्रों की स्थापना, ऊर्जा की अत्यधिक खपत, तथा खनिज संसाधनों का दोहन-ये सभी प्रकृति पर अतिरिक्त दबाव डालते हैं। कोबाल्ट और लिथियम जैसे खनिजों की बढ़ती मांग पर्यावरणीय असंतुलन और मानवीय शोषण दोनों को जन्म देती है। इस प्रकार यह तकनीक केवल सामाजिक या नैतिक ही नहीं, बल्कि पर्यावरणीय चुनौती भी बन रही है। इन सभी चिंताओं के बीच यह समझना आवश्यक है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता को नकारा नहीं जा सकता। यह आधुनिक जीवन का अभिन्न अंग बन चुकी है और चिकित्सा, शिक्षा, आपदा प्रबंधन तथा उत्पादन के क्षेत्र में इसके योगदान को अनदेखा नहीं किया जा सकता। समस्या तकनीक में नहीं, बल्कि उसके उपयोग के स्वरूप में है। यदि इसे मानवीय मूल्यों, नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व के साथ जोड़ा जाए, तो यह एक वरदान सिद्ध हो सकती है।</div><div><br></div><div>इसके लिए सबसे पहले आवश्यक है कि इसके विकास और उपयोग के लिए स्पष्ट और सशक्त नियम बनाए जाएं। सरकारों और संस्थाओं को यह सुनिश्चित करना होगा कि इस तकनीक का उपयोग पारदर्शी, सुरक्षित और उत्तरदायी तरीके से हो। कंपनियों को अपने तंत्र में ऐसी व्यवस्थाएँ विकसित करनी चाहिए, जिससे किसी भी प्रकार की भ्रामक सामग्री की पहचान और नियंत्रण संभव हो सके। साथ ही नागरिकों की जागरूकता भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। डिजिटल साक्षरता के बिना कोई भी समाज इस चुनौती का सामना नहीं कर सकता। लोगों को यह समझना होगा कि जो कुछ वे देख या सुन रहे हैं, वह हमेशा सत्य नहीं हो सकता। सत्यापन की प्रवृत्ति को विकसित करना समय की आवश्यकता है। नैतिकता के स्तर पर यह भी आवश्यक है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के प्रशिक्षण के लिए उपयोग किए जाने वाले आंकड़े निष्पक्ष और उच्च गुणवत्ता वाले हों। यदि आधार ही पक्षपाती होगा, तो परिणाम भी पक्षपाती होंगे। इससे सामाजिक असमानता और भेदभाव को बढ़ावा मिल सकता है। इसलिए निष्पक्षता, पारदर्शिता, गोपनीयता और उत्तरदायित्व जैसे सिद्धांतों को इसके विकास का आधार बनाना होगा।</div><div><br></div><div>सांस्कृतिक दृष्टि से भी यह ध्यान रखना आवश्यक है कि तकनीकी विकास हमारी परंपराओं और मूल्यों के साथ संतुलन बनाए रखे। हमारी सांस्कृतिक धरोहर का डिजिटलीकरण और संरक्षण इस दिशा में एक सकारात्मक कदम हो सकता है, किंतु यह भी सुनिश्चित करना होगा कि इसका उपयोग सम्मानपूर्वक और संवेदनशीलता के साथ किया जाए। साररूप में यह कहा जा सकता है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता एक शक्तिशाली साधन है, जो मानव जीवन को नई दिशा दे सकता है। किंतु यदि इसे नैतिकता से अलग कर दिया जाए, तो यह उसी गति से विनाश का कारण भी बन सकता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम तकनीक के विकास के साथ-साथ अपने नैतिक मूल्यों को भी सुदृढ़ करें। विज्ञान और मानवीय संवेदना के बीच संतुलन ही वह मार्ग है, जो हमें सुरक्षित और समृद्ध भविष्य की ओर ले जा सकता है।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 21 Apr 2026 19:28:05 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/artificial-intelligence-a-boon-of-convenience-or-a-crisis-of-values</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[अक्षय तृतीया पर्व है लोक से लोकोत्तर की दिव्य यात्रा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-festival-of-akshaya-tritiya-is-a-divine-journey-from-the-mundane-to-the-transcendental]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अक्षय तृतीया महापर्व का न केवल सनातन परम्परा में बल्कि जैन परम्परा में विशेष महत्व है। इसका लौकिक और लोकोत्तर-दोनों ही दृष्टियों में महत्व है। अक्षय शब्द का अर्थ है कभी न खत्म होने वाला। संस्कृत में, अक्षय शब्द का अर्थ है ‘समृद्धि, आशा, खुशी, सफलता’, जबकि तृतीया का अर्थ है ‘चंद्रमा का तीसरा चरण’। इस त्यौहार के साथ-साथ एक अबूझा मांगलिक एवं शुभ दिन भी है, जब बिना किसी मुहूर्त के विवाह एवं मांगलिक कार्य किये जा सकते हैं। विभिन्न सांस्कृतिक एवं मांगलिक ढांचांे में ढले अक्षय तृतीया पर्व में हिन्दू-जैन धर्म, संस्कृति एवं परम्पराओं का अनूठा संगम है। इस प्रकार अक्षय तृतीया पर किए गए कार्यों जैसे जप-तप, यज्ञ, पितृ-तर्पण, दान-पुण्य आदि का साधक को अक्षय फल प्राप्त होता है। भगवान आदिनाथ ने ही सबसे पहले समाज में दान का महत्व समझाया था, इसलिए इस दिन पर जैन धर्म के लोग आहार दान, ज्ञान दान, औषधि दान करते हैं। रास्ते चाहे कितने ही भिन्न हों पर इस पर्व त्यौहार के प्रति सभी जाति, वर्ग, वर्ण, सम्प्रदाय और धर्मों का आदर-भाव अभिन्नता में एकता का प्रिय संदेश दे रहा है। आज के युद्ध, आतंक, आर्थिक प्रतिस्पर्धा एवं अशांति के समय में संयम एवं तप की, भौतिकता एवं आध्यात्मिकता की अक्षय परम्परा को जन-जन की जीवनशैली बनाने की जरूरत है।&nbsp;</div><div><br></div><div>अक्षय तृतीया यह केवल एक तिथि नहीं, बल्कि भारतीय चेतना की उस अखंड धारा का प्रतीक है, जो जीवन को क्षणभंगुरता से उठाकर ‘अक्षयता’ की ओर ले जाती है। ‘अक्षय’ अर्थात् जो कभी क्षीण न हो, जो निरंतर प्रवहमान रहे, ऐसी ही भावना का यह पर्व है, जो हमारे लौकिक व्यवहार से लेकर लोकोत्तर साधना तक, हर स्तर पर गहन अर्थ रखता है। यह दिन केवल शुभारंभ का नहीं, बल्कि आत्मारंभ का भी दिन है। भारतीय परंपरा में अक्षय तृतीया को ‘अबूझ मुहूर्त’ कहा गया है-अर्थात् ऐसा समय, जिसमें किसी विशेष गणना या ज्योतिषीय विचार की आवश्यकता नहीं होती। यह स्वयं ही शुभता का पर्याय है। यही कारण है कि इस दिन विवाह, गृहप्रवेश, व्यापारारंभ जैसे अनेक मांगलिक कार्य बिना किसी संकोच के सम्पन्न किए जाते हैं। यह विश्वास केवल आस्था नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक अनुभव का परिणाम है, जिसने इस दिन को ‘सर्वसिद्धिदायक’ मान्यता प्रदान की है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/donations-made-on-akshaya-tritiya-yield-greater-rewards" target="_blank">Akshaya Tritiya 2026: अक्षय तृतीया पर किए गए दान का मिलता है अधिक फल</a></h3><div>लौकिक दृष्टि से देखें तो अक्षय तृतीया भारतीय अर्थव्यवस्था और श्रम-संस्कृति से गहराई से जुड़ी हुई है। यह दिन किसानों के लिए नई आशा का संदेश लेकर आता है। प्राचीन काल में राजाओं द्वारा श्रेष्ठ किसानों को बीज भेंट करने की परंपरा केवल सम्मान का प्रतीक नहीं थी, बल्कि कृषि को राष्ट्र की आत्मा मानने का सजीव प्रमाण थी। यह विश्वास कि इन बीजों से उत्पन्न अन्न कभी समाप्त नहीं होगा, दरअसल उस श्रम और प्रकृति के समन्वय पर आस्था थी, जो भारतीय जीवन का आधार है। कुम्हारों, शिल्पकारों, पशुपालकों-विशेषकर बैलों के लिए भी यह दिन विशेष महत्व रखता है। यह पर्व हमें यह स्मरण कराता है कि सृजन, श्रम और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता ही समृद्धि का वास्तविक आधार है। किन्तु अक्षय तृतीया का वास्तविक सौंदर्य उसके लोकोत्तर आयाम में प्रकट होता है, जहाँ यह पर्व आत्मशुद्धि, तप और साधना का महापर्व बन जाता है। जैन परंपरा में यह दिन विशेष रूप से पूज्य है, क्योंकि इसका संबंध प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के जीवन की एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना से जुड़ा हुआ है। यह वह दिन है, जब दीर्घकालीन तपस्या के उपरांत उनका पारणा हुआ, एक ऐसा क्षण, जिसने तप को तृप्ति और साधना को पूर्णता प्रदान की।</div><div><br></div><div>कथा के अनुसार, जब भगवान ऋषभदेव ने राजपाट त्यागकर संन्यास धारण किया, तब एक वर्ष से अधिक समय तक उन्हें उचित आहार नहीं मिला। यह केवल भौतिक अभाव नहीं था, बल्कि उस युग की सामाजिक अपरिपक्वता का द्योतक था, जहाँ लोग ‘अहिंसक आहार’ और ‘संयमित जीवन’ की अवधारणा से अनभिज्ञ थे। अंततः हस्तिनापुर में राजकुमार श्रेयांस ने उन्हें इक्षुरस अर्पित कर उनकी तपस्या का पारणा कराया। उस क्षण ‘अहोदानम्, अहोदानम्’ की ध्वनि गूंजी, यह केवल एक आह्लाद नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक चेतना का उद्घोष था, जिसने दान, संयम और साधना को एक नई दिशा दी। यही कारण है कि अक्षय तृतीया जैन साधकों के लिए ‘वर्षीतप’ जैसे महान तप-अनुष्ठानों का पूर्णाहुति दिवस है। एक वर्ष तक एकान्तर उपवास करने वाले साधक इस दिन पारणा करते हैं। यह तप केवल शरीर को कष्ट देने का साधन नहीं, बल्कि आत्मा को निर्मल करने की प्रक्रिया है। यह हमें सिखाता है कि भोग से नहीं, त्याग से जीवन अक्षय बनता है।</div><div><br></div><div>अक्षय तृतीया का आध्यात्मिक संदेश अत्यंत गहन है। यह हमें बताता है कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल संसाधनों का संचय नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि है। भारतीय संस्कृति में ‘आत्मा’ को सर्वोपरि सत्य माना गया है, और उसकी खोज को जीवन की सर्वोच्च साधना। यह पर्व उसी खोज का निमंत्रण है, एक ऐसा निमंत्रण, जो हमें बाह्य जगत से भीतर की यात्रा पर ले जाता है। ऋषभदेव का जीवन इस संदर्भ में अत्यंत प्रेरणादायक है। ‘ऋषभ’ शब्द का एक अर्थ बैल भी है-जो श्रम, धैर्य और स्थिरता का प्रतीक है और दूसरा अर्थ है तीर्थंकर-जो आत्मोद्धार और लोकमंगल का मार्ग प्रशस्त करता है। इस प्रकार उनका जीवन भौतिक और आध्यात्मिक-दोनों आयामों का अद्भुत समन्वय है। उन्होंने समाज को कृषि, शिल्प, व्यापार जैसी जीवनोपयोगी विधाएं दीं, और साथ ही आत्मा की मुक्ति का मार्ग भी दिखाया। यही समग्रता अक्षय तृतीया के दर्शन में भी झलकती है।</div><div><br></div><div>आज के संदर्भ में यह पर्व और भी प्रासंगिक हो उठता है। जब मानव जीवन भौतिक उपलब्धियों की दौड़ में उलझा हुआ है, तब अक्षय तृतीया हमें संतुलन का पाठ पढ़ाती है। यह हमें याद दिलाती है कि केवल भौतिक समृद्धि से जीवन पूर्ण नहीं होता। यदि भीतर शांति नहीं, तो बाहरी वैभव भी निरर्थक है। और यदि भीतर संतोष है, तो सीमित साधनों में भी जीवन अक्षय बन सकता है। यह पर्व हमें यह भी सिखाता है कि साधना केवल मठों और आश्रमों तक सीमित नहीं है। यह जीवन की प्रत्येक क्रिया में संभव है, यदि उसमें सजगता, संयम और समर्पण का भाव हो। एक किसान जब श्रद्धा से बीज बोता है, एक कुम्हार जब मिट्टी को आकार देता है, एक गृहस्थ जब ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का पालन करता हैकृतब वह भी एक प्रकार की साधना ही कर रहा होता है।</div><div><br></div><div>अक्षय तृतीया का सांस्कृतिक महत्व भी अत्यंत व्यापक है। यह पर्व भारतीय जीवन की उस समन्वयकारी दृष्टि का प्रतीक है, जिसमें भौतिकता और आध्यात्मिकता विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। यहाँ अन्न का भी सम्मान है और आत्मा का भी। यहाँ श्रम का भी महत्व है और ध्यान का भी। यही संतुलन भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है। व्यक्तिगत स्तर पर यह दिन आत्ममंथन का अवसर प्रदान करता है। यह हमें प्रेरित करता है कि हम अपने जीवन में झांकें, क्या हमारा जीवन केवल उपभोग में व्यतीत हो रहा है, या उसमें कोई उच्च उद्देश्य भी है? क्या हम केवल संग्रह कर रहे हैं, या कुछ त्याग भी कर पा रहे हैं? क्या हम केवल बाहर की दुनिया को संवार रहे हैं, या भीतर की दुनिया को भी प्रकाशित कर रहे हैं?</div><div><br></div><div>अक्षय तृतीया हमें यह संदेश देती है कि यदि हम अपने जीवन में तप, संयम और सेवा को स्थान दें, तो हमारा जीवन भी ‘अक्षय’ बन सकता है। यह अक्षयता केवल धन या वस्तुओं की नहीं, बल्कि पुण्य, शांति और आत्मिक संतोष की होती है, जो कभी समाप्त नहीं होती। आज आवश्यकता है कि हम इस पर्व को केवल औपचारिकता तक सीमित न रखें, बल्कि इसके गूढ़ संदेश को अपने जीवन में उतारें। यदि इस दिन हम एक संकल्प लें, संयम का, सेवा का, साधना का, तो यह दिन वास्तव में हमारे जीवन में परिवर्तन का सूत्रधार बन सकता है। अंततः अक्षय तृतीया एक ऐसी पावन गंगा है, जिसमें तप की धारा, संस्कृति की सुवास, श्रम की गरिमा और आत्मा की पवित्रताकृंसस एक साथ प्रवाहित होती हैं। जो इस धारा में स्नान करता है, वह केवल बाह्य रूप से नहीं, बल्कि भीतर से भी निर्मल हो जाता है। यही इस पर्व की सर्वोच्च उपलब्धि है, और यही इसका सनातन संदेश कि जीवन को अक्षय बनाना है, तो उसे तप, त्याग और आत्मबोध से आलोकित करना होगा।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 18 Apr 2026 17:59:54 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-festival-of-akshaya-tritiya-is-a-divine-journey-from-the-mundane-to-the-transcendental</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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