India-China Relation क्या वाकई सुधर रहे हैं? चीन में रह रहे भारतीयों ने चौंकाने वाला सच उजागर किया है!

चीन में रह रहे भारतीयों की शिकायतें और भारत में मीडिया की पहुंच को लेकर चीन की नई मांग यह संकेत देती है कि राजनीतिक स्तर पर संवाद बढ़ने के बावजूद जमीनी स्तर पर विश्वास की कमी अब भी पूरी तरह दूर नहीं हुई है।
ऐसे समय में जब भारत और चीन के रिश्तों में सुधार की बातें हो रही हैं, वर्षों बाद सीमा व्यापार फिर से शुरू हुआ है और दोनों देशों के बीच राजनीतिक संवाद भी तेज हुआ है, उसी बीच चीन में रह रहे भारतीयों ने ऐसी शिकायतें सामने रखी हैं, जिन्होंने सबको चौंका दिया है। भारतीयों का कहना है कि चीन के सोशल मीडिया पर भारत और भारतीयों के खिलाफ आपत्तिजनक सामग्री तेजी से बढ़ रही है, भारतीय पेशेवरों को नौकरी के वीज़ा मिलने में मुश्किलें आ रही हैं और उनके जीवनसाथियों के रोजगार पर भी कई तरह की पाबंदियां हैं। इतना ही नहीं, भारत में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से पहले चीन ने नई दिल्ली से ऐसी मांग भी कर दी है, जिसने दोनों देशों के संबंधों को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है।
हम आपको बता दें कि बीजिंग स्थित भारतीय दूतावास ने हाल के वर्षों में पहली बार भारतीय समुदाय के साथ 'ओपन हाउस' कार्यक्रम आयोजित किया। इस कार्यक्रम में भारत के राजदूत विक्रम दोरईस्वामी, काउंसलर (कॉन्सुलर, शिक्षा एवं सामुदायिक मामलों) नितिनजीत सिंह और काउंसलर (वीजा) रमेश सिंह ने विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रहे भारतीयों से सीधे संवाद किया। इस बातचीत में भारतीय समुदाय ने जिन मुद्दों को सबसे प्रमुखता से उठाया, वह भारत-चीन संबंधों के वास्तविक हालात की एक अलग तस्वीर पेश करते हैं।
भारतीयों ने शिकायत की कि चीन के सोशल मीडिया मंचों पर भारत, भारतीय संस्कृति और भारतीय खान-पान को लेकर अपमानजनक और भड़काऊ सामग्री तेजी से बढ़ रही है। उनका कहना था कि यह केवल ऑनलाइन ट्रोलिंग का मामला नहीं है, बल्कि इससे चीन में रह रहे भारतीयों के सामाजिक माहौल और सुरक्षा की भावना पर भी असर पड़ रहा है। इसके अलावा भारतीय पेशेवरों को नौकरी के लिए वर्क वीज़ा मिलने में लगातार कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। कई लोगों ने यह भी बताया कि उनके जीवनसाथियों को रोजगार की अनुमति नहीं मिलने से परिवारों के सामने गंभीर आर्थिक और सामाजिक चुनौतियां खड़ी हो रही हैं। कुछ लोगों ने दूतावास से जुड़ी काउंसलर सेवाओं में आने वाली व्यावहारिक परेशानियों का मुद्दा भी उठाया।
राजदूत विक्रम दोरईस्वामी ने इन चिंताओं को गंभीर बताते हुए कहा कि चीन सरकार स्वयं भी सोशल मीडिया पर बढ़ती भारत-विरोधी सामग्री को लेकर चिंतित है और इस दिशा में कदम उठा रही है। उन्होंने कहा कि भारतीय दूतावास भी गलत सूचनाओं और दुष्प्रचार का मुकाबला तथ्य आधारित जानकारी साझा करके कर रहा है। इसके साथ ही दूतावास भारतीय संस्कृति, खान-पान और विविधता को बेहतर ढंग से प्रस्तुत करने के लिए वसंत मेला जैसे लोकप्रिय सांस्कृतिक आयोजनों का दायरा बढ़ाने की योजना बना रहा है ताकि चीन में भारत की सकारात्मक छवि और मजबूत हो सके।
दोरईस्वामी ने यह भी बताया कि भारतीय पेशेवरों को रोजगार संबंधी विवादों में कानूनी सहायता उपलब्ध कराने के लिए दूतावास वकीलों और कानूनी विशेषज्ञों का एक सहयोगी नेटवर्क तैयार कर रहा है। उन्होंने संकेत दिया कि भारतीयों की समस्याओं के समाधान के लिए ऐसे 'ओपन हाउस' कार्यक्रम नियमित रूप से आयोजित किए जाएंगे। वहीं, चीन के नागरिकों के लिए भारतीय वीज़ा प्रक्रिया को भी और सरल बनाने की तैयारी की जा रही है ताकि दोनों देशों के बीच लोगों का आवागमन बढ़ सके।
दूसरी ओर, भारत में सितंबर में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से पहले चीन की एक और पहल ने नई कूटनीतिक चर्चा को जन्म दे दिया है। जानकारी के अनुसार, चीनी दूतावास ने भारत सरकार के समक्ष यह चिंता जताई है कि फालुन गोंग और तिब्बती समुदाय से जुड़े मीडिया संगठनों को सम्मेलन के दौरान सीमित पहुंच दी जाए। चीन नहीं चाहता कि ऐसे मीडिया संस्थानों को उसके प्रतिनिधिमंडल से सवाल पूछने या सम्मेलन के मीडिया कार्यक्रमों में सक्रिय भूमिका निभाने का अवसर मिले।
हम आपको बता दें कि फालुन गोंग चीन में प्रतिबंधित आध्यात्मिक संगठन है और उससे जुड़े कई मीडिया संस्थान, जैसे 'द एपॉक टाइम्स', चीन की नीतियों के आलोचक रहे हैं। इसी तरह भारत में बड़ी संख्या में तिब्बती शरणार्थी रहते हैं और धर्मशाला सहित कई स्थानों से तिब्बती समुदाय के अपने मीडिया संस्थान संचालित होते हैं। भारत अब तक इन संगठनों को देश के कानूनों के दायरे में स्वतंत्र रूप से काम करने की अनुमति देता रहा है। ऐसे में चीन की यह मांग केवल मीडिया प्रबंधन का मुद्दा नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की कसौटी के रूप में भी देखी जा रही है।
हम आपको यह भी बता दें कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के ब्रिक्स सम्मेलन में शामिल होने के लिए भारत आने की संभावना जताई जा रही है। यदि यह यात्रा होती है तो जिनपिंग सात साल बाद भारत की धरती पर होंगे। उल्लेखनीय है कि 2020 के गलवान संघर्ष के बाद दोनों देशों के संबंध बेहद तनावपूर्ण हो गए थे, लेकिन अक्टूबर 2024 में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के विवादित क्षेत्रों से सैनिकों की वापसी पर सहमति बनने के बाद रिश्तों में धीरे-धीरे सुधार शुरू हुआ। इसके बाद दोनों देशों के शीर्ष नेताओं की कई मुलाकातें हुईं, भारत ने चीनी नागरिकों के लिए वीज़ा फिर से जारी करना शुरू किया और चीन ने कैलाश मानसरोवर यात्रा भी बहाल कर दी।
बहरहाल, चीन में रह रहे भारतीयों की शिकायतें और भारत में मीडिया की पहुंच को लेकर चीन की नई मांग यह संकेत देती है कि राजनीतिक स्तर पर संवाद बढ़ने के बावजूद जमीनी स्तर पर विश्वास की कमी अब भी पूरी तरह दूर नहीं हुई है। यही वजह है कि दोनों देशों के रिश्ते फिलहाल सहयोग और संदेह, इन दोनों के बीच संतुलन साधने की चुनौती से गुजर रहे हैं। आने वाला ब्रिक्स शिखर सम्मेलन केवल आर्थिक और रणनीतिक सहयोग का मंच नहीं होगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि भारत और चीन अपने रिश्तों को वास्तविक विश्वास और पारदर्शिता की दिशा में कितना आगे ले जा पाते हैं।
-नीरज कुमार दुबे
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