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    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
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      <title><![CDATA[Operation Safed Sagar Review | IAF की जांबाजी और बलिदान की दमदार कहानी, जिमी शेरगिल और सिद्धार्थ का बेहतरीन अभिनय]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/operation-safed-sagar-review-a-powerful-story-of-the-iaf-valor-and-sacrifice]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>1999 के कारगिल युद्ध की गाथा को भारतीय सिनेमा ने कई बार भुनाया है, लेकिन नेटफ्लिक्स की नई वेब सीरीज 'ऑपरेशन सफेद सागर' इस ऐतिहासिक लड़ाई के उस पहलू को सामने लाती है, जिसकी चर्चा अक्सर कम होती है—इंडियन एयर फोर्स (IAF) का ऐतिहासिक हाई-एल्टीट्यूड कॉम्बैट मिशन। 'असुर' फेम डायरेक्टर ओनी सेन के निर्देशन में बनी यह सीरीज 'गोल्डन एरो स्क्वाड्रन' के पराक्रम और वॉर ज़ोन के पीछे की मानवीय संवेदनाओं को बेहद ईमानदारी से पर्दे पर उतारती है।</div><div><span style="font-size: 1rem;"><br></span></div><div><b>कहानी और प्लॉट: 18,000 फीट की ऊंचाई पर IAF का शौर्य</b></div><div>यह सीरीज 1999 में कारगिल की बर्फ़ीली और दुर्गम पहाड़ियों में 16,000 से 18,000 फीट की ऊंचाई पर चलाए गए ग्राउंड अटैक ऑपरेशन्स पर केंद्रित है। इसमें दिखाया गया है कि कैसे MiG-21, MiG-23 और MiG-27 जैसे फाइटर जेट्स के जरिए भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तानी घुसपैठियों के ठिकानों को तबाह किया था। कहानी सिर्फ हवाई हमलों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह वर्दी के पीछे छिपे इंसानों के बीच की दोस्ती, उन पर टिके जिम्मेदारी के भारी बोझ और घर पर उनका इंतजार कर रहे परिवारों के त्याग को भी गहराई से छूती है।</div><div>&nbsp;</div><div><b>ऑपरेशन सफेद सागर: परफॉर्मेंस</b></div><div>जिमी शेरगिल इस सीरीज़ की जान हैं। वे विंग कमांडर बी.एस. धनोआ 'टोनी' के किरदार में बिना ज़्यादा कोशिश किए ही अधिकार और शांति का भाव लाते हैं। सिद्धार्थ ने स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा के तौर पर हाल के समय की अपनी सबसे सधी हुई परफॉर्मेंस दी है। वे इस रोल में गरिमा, साहस और भावनात्मक गहराई लाते हैं।</div><div><br></div><div>अभय वर्मा, मिहिर आहूजा, तारुक रैना और अर्णव भसीन युवा फाइटर पायलट के तौर पर असरदार लगे हैं। उनकी केमिस्ट्री सहज लगती है और आप उनके लिए महसूस करते हैं। कम स्क्रीन टाइम के बावजूद दीया मिर्ज़ा और आदिल हुसैन अपनी गहरी छाप छोड़ते हैं। प्राजक्ता कोली ने ईमानदारी से काम किया है, हालांकि उनके किरदार के लिए और बेहतर लेखन की ज़रूरत थी और कभी-कभी वे कहानी के बहाव में ठीक से फिट नहीं बैठती थीं।</div><div><br></div><div><b>ऑपरेशन सफ़ेद सागर: सबसे बेहतरीन पल</b></div><div>हवाई लड़ाई के सीन 'ऑपरेशन सफ़ेद सागर' की सबसे बड़ी खासियत हैं। ये सीन रोमांचक और असरदार हैं, और बिना किसी दिखावे के भी देखने में शानदार लगते हैं। VFX पर बहुत मेहनत की गई है, और यह साफ़ दिखता है।</div><div><br></div><div>'ऑपरेशन सफ़ेद सागर' की सबसे बड़ी खूबियों में से एक इसकी कास्टिंग है। हर एक्टर अपने रोल के लिए एकदम सही लगता है, जिससे किरदार तुरंत असली लगने लगते हैं। अक्सर कहा जाता है कि अच्छी कास्टिंग बेहतरीन स्क्रिप्ट को और भी बेहतर बना सकती है, और यह बात यहाँ भी सच साबित होती है। चाहे मुख्य कलाकार हों या सहायक कलाकार, हर किरदार का अपना मकसद है और वे कहानी में आसानी से घुल-मिल जाते हैं। वे सब मिलकर कहानी में वज़न, सच्चाई और इमोशनल गहराई लाते हैं।</div><div><br></div><div>स्क्वाड्रन के लोगों के बीच का आपसी तालमेल भी खास है। पायलटों के बीच तनावपूर्ण और हल्के-फुल्के पलों की वजह से इमोशनल सीन और भी ज़्यादा असरदार लगते हैं। परिवार वाले सीन, जब छोटे रखे जाते हैं, तो कहानी में अपनापन लाते हैं और दर्शकों को याद दिलाते हैं कि युद्ध के मैदान से दूर भी कितनी कुर्बानियाँ दी जाती हैं। वे आपको रुककर सोचने पर मजबूर करते हैं कि सेना के परिवारों में कितनी बहादुरी होती है।</div><div><br></div><div><b>ऑपरेशन सफ़ेद सागर: डायरेक्शन</b></div><div>सुपरहिट 'असुर' सीरीज़ के डायरेक्टर ओनी सेन ने इस गंभीर विषय को बहुत समझदारी से संभाला है। वे देशभक्ति को बढ़ा-चढ़ाकर नहीं दिखाते और न ही असर पैदा करने के लिए ज़ोरदार डायलॉग का सहारा लेते हैं। इसके बजाय, वे कहानी और किरदारों को ही मुख्य फोकस में रखते हैं। और यह सच्चाई पूरी फ़िल्म में दिखती है। ऑपरेशन के माहौल से लेकर मिलिट्री की बारीकियों तक, इतिहास के इस हिस्से को फिर से दिखाने में की गई मेहनत साफ़ नज़र आती है।</div><div><br></div><div>बड़े कैनवस पर होने के बावजूद, उन्होंने भावनाओं को ज़मीन से जुड़ा रखा है। उनकी सबसे बड़ी कामयाबी यह है कि वे दर्शकों को मिशन से पहले उसमें शामिल लोगों की परवाह करने के लिए प्रेरित करते हैं।</div><div><br></div><div><b>ऑपरेशन सफ़ेद सागर: क्या अच्छा है और क्या नहीं</b></div><div>यह सीरीज़ अपनी असलियत की वजह से खास बन जाती है। इसमें की गई गहरी रिसर्च, एयर फ़ोर्स की असली लोकेशन और दमदार एक्टिंग इसे भरोसेमंद बनाती है। एक्शन सीन बहुत अच्छे से फ़िल्माए गए हैं और कहीं भी बढ़ा-चढ़ाकर नहीं दिखाए गए। इमोशनल पल, खासकर स्क्वाड्रन के सदस्यों के बीच, दिल को छू लेते हैं। इसमें पॉलिटिक्स भी है। हालांकि, आपको एक पल के लिए भी ऐसा नहीं लगेगा कि यह कहानी या सीरीज़ के असल मकसद पर हावी हो रही है। ऑपरेशन सफ़ेद सागर का असली हीरो एयर मिशन है। और आखिरी यानी छठे एपिसोड के अंत तक यही इसका मुख्य हिस्सा बना रहता है।</div><div><br></div><div>हालांकि, कुछ जगहों पर इसकी रफ़्तार धीमी पड़ जाती है। कुछ इमोशनल सीन ज़रूरत से ज़्यादा लंबे खिंच जाते हैं। प्राजक्ता कोली के किरदार 'माधवी' वाले कुछ सीन कहानी से भटकाव जैसे लगते हैं। हालांकि इनका मकसद अफ़सरों के मानवीय पहलू को दिखाना और उनके परिवारों के संघर्ष को उजागर करना था, लेकिन ये हमेशा कहानी को आगे नहीं बढ़ाते।</div><div><br></div><div>सीरीज़ की एडिटिंग और बेहतर हो सकती थी। कुछ बातचीत में उन्हीं भावनाओं को दोहराया गया है जो पहले ही दिखाई जा चुकी हैं। मौजूदा सब-प्लॉट को खींचने के बजाय कुछ सपोर्टिंग किरदारों को बेहतर ढंग से दिखाया जा सकता था।</div><div><br></div><div><b>ऑपरेशन सफ़ेद सागर: आखिरी राय</b></div><div>ऑपरेशन सफ़ेद सागर सिर्फ़ एक और वॉर ड्रामा नहीं है। यह इंडियन एयर फ़ोर्स और उन जांबाज़ों को एक सच्ची श्रद्धांजलि है जिन्होंने भारतीय सैन्य इतिहास के सबसे मुश्किल कॉम्बैट मिशन में हिस्सा लिया था। यह उनकी बहादुरी का सम्मान करती है और साथ ही ड्यूटी के दौरान जुड़ी भावनाओं को भी नज़रअंदाज़ नहीं करती। और सबसे अच्छी बात? यह बिना किसी फालतू बात के सीधे मुद्दे पर बात करती है।</div><div><br></div><div>इसके बावजूद, सीरीज़ में कुछ कमियां भी हैं। कुछ धीमी गति वाले हिस्से इसकी रफ़्तार पर असर डालते हैं। लेकिन दमदार एक्टिंग, बेहतरीन डायरेक्शन और रोमांचक एरियल सीक्वेंस इसे शुरू से आखिर तक दिलचस्प बनाए रखते हैं।</div><div><br></div><div><br></div><div>ओटीटी प्लेटफॉर्म: नेटफ्लिक्स (Netflix)</div><div>निर्देशक: ओनी सेन</div><div>मुख्य कलाकार: जिमी शेरगिल, सिद्धार्थ, अभय वर्मा, मिहिर आहूजा, तारुक रैना, दीया मिर्जा, आदिल हुसैन और प्राजक्ता कोली</div><div>रेटिंग: 3.5/5 स्टार</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 07 Aug 2026 16:57:10 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/operation-safed-sagar-review-a-powerful-story-of-the-iaf-valor-and-sacrifice</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Aryabhatt Ka Zero Movie Review | उम्मीद, संघर्ष और आत्मसम्मान की इमोशनल कहानी, हिमांश कोहली और नीरज सूद का दमदार अभिनय]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/aryabhatt-ka-zero-movie-review-an-emotional-story-of-hope-struggle-and-self-respect]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारतीय सिनेमा में असफलता के बाद फिर से उठ खड़े होने और अपनी पहचान तलाशने की कहानियों की हमेशा से एक खास जगह रही है। कमल चंद्रा के निर्देशन में बनी फिल्म 'आर्यभट्ट का ज़ीरो' एक ऐसे ही मध्यमवर्गीय युवा के बिखरने और खुद को फिर से संवारने की कहानी है। हिमांश कोहली और सोनाली सहगल स्टारर यह फिल्म केवल UPSC की तैयारी या दिल टूटने का ड्रामा नहीं है, बल्कि यह एक बेटे की अपने पिता का सम्मान पाने और समाज द्वारा थपेड़े गए 'ज़ीरो' के टैग को मिटाने की इमोशनल जद्दोजहद है।</div><div><br></div><div><b>कहानी और प्लॉट</b></div><div>फिल्म की कहानी उत्तराखंड के एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाले ब्रह्मगुप्त श्रीवास्तव यानी 'बग्गू' (हिमांश कोहली) के इर्द-गिर्द घूमती है। बग्गू के पिता आर्यभट्ट श्रीवास्तव (नीरज सूद) एक सरकारी दफ्तर में ग्रुप-D कर्मचारी हैं, जिनकी अपने बेटे से बहुत बड़ी उम्मीदें हैं।</div><div><br></div><div>बग्गू की जिंदगी में असली भूचाल तब आता है जब उसकी गर्लफ्रेंड रिंकू (सोनाली सहगल) उसकी नाकामी से तंग आकर एक SDM से शादी कर लेती है। दिल टूटने के बाद बग्गू दिल्ली के मुखर्जी नगर पहुँचता है और उस SDM से भी बड़ा अफसर बनने का संकल्प लेकर UPSC की तैयारी में जुट जाता है। हालांकि, बार-बार की नाकामी और रिश्तेदार-समाज का 'आर्यभट्ट का ज़ीरो' कहकर तंज कसना बग्गू का आत्मविश्वास तोड़ देता है। फिल्म इसी यात्रा को दर्शाती है कि क्या बग्गू समाज के तय मानकों से परे जाकर अपनी असली अहमियत को पहचान पाता है या नहीं।</div><div><br></div><div><b>आर्यभट्ट का ज़ीरो: निर्देशन और तारिक़ मोहम्मद की लेखन शैली</b></div><div>निर्देशक कमल चंद्र ने फ़िल्म को ज़्यादा ड्रामेबाज़ी और बनावटी दिखावे से दूर रखा है और असलियत के करीब रहने की कोशिश की है। उन्होंने एक छोटे शहर के नौजवान की सोच और मध्यम-वर्गीय परिवार के संघर्षों को सादगी और ईमानदारी से दिखाया है। हालाँकि लेखक तारिक़ मोहम्मद की कहानी शायद बहुत नई न लगे, लेकिन उनके संवाद और हालात स्वाभाविक और विश्वसनीय लगते हैं। पिता और बेटे के बीच की बातचीत खास तौर पर दिल को छू लेने वाली है, जो कई आम भारतीय परिवारों की सच्चाई को दर्शाती है। निर्देशक ने कॉमेडी और ड्रामा के बीच संतुलन बनाए रखने की भी कोशिश की है, जिससे कहानी दिलचस्प बनी रहती है। हालाँकि, कुछ हिस्सों में उनकी पकड़ कमज़ोर पड़ जाती है, खासकर तब जब फ़िल्म अपने मुख्य विषय से भटककर गैर-ज़रूरी उप-कहानियों में उलझ जाती है।</div><div><br></div><div><b>आर्यभट्ट का ज़ीरो: तकनीकी पहलू और प्रोडक्शन वैल्यू</b></div><div>तकनीकी नज़रिए से फ़िल्म का काम संतोषजनक है। सिनेमैटोग्राफ़ी ने उत्तराखंड के शांत नज़ारों और दिल्ली के मुखर्जी नगर की भीड़-भाड़ वाली गलियों के बीच के अंतर को खूबसूरती से दिखाया है। कैमरा वर्क सादगी भरा है और कहानी के मिज़ाज के अनुकूल है। बैकग्राउंड स्कोर भावनात्मक पलों को असरदार बनाता है और दर्शकों को किरदारों के संघर्ष से जुड़ने में मदद करता है। हालाँकि, एडिटिंग फ़िल्म के कमज़ोर पहलुओं में से एक है। अगर दूसरे हाफ़ में कुछ गैर-ज़रूरी दृश्यों को काट दिया जाता, तो फ़िल्म की गति और बेहतर होती। संगीत ठीक-ठाक है, कुछ गाने कहानी में स्वाभाविक रूप से घुल-मिल जाते हैं, लेकिन फ़िल्म खत्म होने के बाद कोई भी गाना लंबे समय तक याद नहीं रहता।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/shreya-kalra-winner-of-lock-upp-2-she-won-the-trophy-along-with-prize-money-of-1-crore" target="_blank">Lock Upp 2 की विजेता बनीं Shreya Kalra! ट्रॉफी के साथ जीती 1 करोड़ रुपये की इनामी राशि, Netflix पर व्यूअरशिप ने तोड़े रिकॉर्ड्स</a></h3><div><br></div><div><b>आर्यभट्ट का ज़ीरो: परफॉर्मेंस</b></div><div>परफॉर्मेंस की बात करें तो हिमांश कोहली ने ज़बरदस्त छाप छोड़ी है। 'बग्गू' के रोल में, उन्होंने एक परेशान, टूटे हुए लेकिन दिल से मासूम नौजवान के जज़्बातों को बहुत अच्छे से दिखाया है। हल्के-फुल्के पलों में उनकी कॉमिक टाइमिंग कमाल की है, जबकि उनकी आँखों में दिखने वाली बेबसी इमोशनल सीन को और भी असरदार बनाती है। नीरज सूद, बग्गू के पिता के रोल में फिल्म की इमोशनल जान हैं। उन्होंने एक मिडिल-क्लास पिता की बेबसी, गुस्से और बिना कहे प्यार को अपनी दिल को छू लेने वाली एक्टिंग से जीवंत कर दिया है।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/jiya-shankar-gets-engaged-to-us-based-businessman-karan-dhanak-flaunts-her-diamond-ring" target="_blank">Bigg Boss OTT 2 फेम Jiya Shankar ने की सगाई, US के बिजनेसमैन कारन धनक को बनाया हमसफर, फ्लॉन्ट की डायमंड रिंग</a></h3><div><br></div><div>रवि किशन जब भी स्क्रीन पर आते हैं, अपने खास देसी अंदाज़ से दर्शकों के चेहरे पर मुस्कान ले आते हैं। उनका किरदार कहानी में हल्का-फुल्का मनोरंजन जोड़ता है। सोनाली सहगल ने प्रैक्टिकल और समझदार गर्लफ्रेंड 'रिंकू' के रोल के साथ पूरा न्याय किया है। हालाँकि दर्शना बनिक का रोल छोटा है, फिर भी वह अपनी एक्टिंग से छाप छोड़ने में कामयाब रही हैं। इसके अलावा, अलका अमीन, राजेश शर्मा और शिल्पा शिंदे जैसे अनुभवी सपोर्टिंग एक्टर्स ने भी फिल्म को और मज़बूत बनाया है।</div><div><br></div><div><b>आर्यभट्ट का ज़ीरो: फिल्म कहाँ कमज़ोर पड़ जाती है</b></div><div>कई अच्छी बातों के बावजूद, 'आर्यभट्ट का ज़ीरो' में कुछ कमियाँ हैं जो इसे एक बेहतरीन फिल्म बनने से रोकती हैं। पहली बात, कहानी में नयापन नहीं है। '12th फेल' और 'शादी में ज़रूर आना' जैसी फिल्मों के बाद, दिल टूटे प्रेमी का UPSC परीक्षा पास करने की कोशिश वाला प्लॉट अब थोड़ा जाना-पहचाना और पहले से अंदाज़ा लगाने लायक लगता है। दर्शक पहले ही अंदाज़ा लगा सकते हैं कि आगे क्या होने वाला है, जिससे सरप्राइज़ का एलिमेंट कम हो जाता है।</div><div><br></div><div>फिल्म का दूसरा हाफ भी काफी धीमा हो जाता है। बग्गू के संघर्ष को दिखाने की कोशिश में, कई सीन दोहराव वाले लगने लगते हैं, जिससे फिल्म दर्शकों को थोड़ी उबाऊ लग सकती है। कुछ किरदारों का विकास और अचानक आए प्लॉट ट्विस्ट भी थोड़े बनावटी लगते हैं और उन्हें और बेहतर तरीके से लिखा जा सकता था। इसके अलावा, फिल्म का अंत वैसा असर नहीं छोड़ता जैसा होना चाहिए था और थोड़ा जल्दबाजी में किया हुआ लगता है।</div><div><b><br></b></div><div><b>आर्यभट्ट का ज़ीरो: आखिरी फैसला</b></div><div>'आर्यभट्ट का ज़ीरो' एक साफ-सुथरी और सरल फिल्म है जो एक पॉज़िटिव मैसेज देती है और दर्शकों को याद दिलाती है कि किसी व्यक्ति की असफलता उसकी पहचान तय नहीं करती। हिमांश कोहली और नीरज सूद की शानदार एक्टिंग, पिता-बेटे का इमोशनल रिश्ता और हल्का-फुल्का ह्यूमर इस फिल्म को देखने लायक बनाते हैं। हालांकि, इसकी जानी-पहचानी कहानी और कमज़ोर दूसरा हाफ इसे उस मुकाम तक पहुँचने से रोकते हैं, जिसकी यह उम्मीद करती है। अगर आप बिना बहुत ज़्यादा उम्मीदें रखे परिवार के साथ देखने के लिए कोई हल्की-फुल्की, इमोशनल और प्रेरणादायक फ़िल्म ढूंढ रहे हैं, तो यह एक ऐसी फ़िल्म है जिसे आप कम से कम एक बार ज़रूर देख सकते हैं।</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 06 Aug 2026 14:30:08 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/aryabhatt-ka-zero-movie-review-an-emotional-story-of-hope-struggle-and-self-respect</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Musafir Cafe Review | भागदौड़ भरी जिंदगी में ठहराव और सुकून का अहसास देती है विक्रांत मैसी की यह नई सीरीज]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/musafir-cafe-review-a-sense-of-pause-and-tranquility-amidst-a-hectic-life]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज की तेज़-तर्रार दुनिया में, जहाँ ज़िंदगी महज 'स्क्रॉलिंग' और 'ट्रोलिंग' के बीच सिमट कर रह गई है, ऐसे में नेटफ्लिक्स की नई वेब सीरीज 'मुसाफिर कैफ़े' एक ताज़ा हवा के झोंके की तरह आती है। रुचिर अरुण द्वारा निर्देशित और 8 एपिसोड्स में बंटी यह श्रृंखला दिव्या प्रकाश दुबे के मशहूर हिंदी उपन्यास पर आधारित है। यह कहानी हमें याद दिलाती है कि जिंदगी में कभी-कभी रुकना, ठहराव लेना और पलों को जीना कितना ज़रूरी है।</div><div><br></div><div><b>कहानी: प्यार, सपने और अधूरे अहसास</b></div><div>कहानी की शुरुआत भोपाल में अरेंज्ड मैरिज के लिए मिले चंदर (विक्रांत मैसी) और सुधा (वेदिका पिंटो) से होती है। पहली मुलाकात में एक-दूसरे को रिजेक्ट करने के बाद भी किस्मत उन्हें बार-बार आमने-सामने लाती है। दोनों में गहरा और सच्चा प्यार हो जाता है, लेकिन सुधा अपने लॉ फर्म के सपनों को पूरा करने के लिए शादी से इनकार कर देती है।</div><div><br></div><div>सालों बाद, चंदर अपनी नौकरी छोड़कर पहाड़ों में एक कैफ़े खोलने का सपना पूरा करता है और उसकी ज़िंदगी में प्रीति (महिमा मकवाना) की एंट्री होती है। प्रीति एक आत्मनिर्भर, प्रैक्टिकल और समझदार महिला है जो चंदर के साथ एक खूबसूरत रिश्ता बनाती है। हालांकि, चंदर के दिल के किसी कोने में सुधा की यादें अब भी बाकी हैं। यह कहानी किसी एक को सही या गलत ठहराने के बजाय प्यार, महत्वाकांक्षा और गलत समय के ताने-बाने को बहुत ही खूबसूरती से पेश करती है।</div><div><br></div><div><b>मुसाफिर कैफ़े: परफॉर्मेंस</b></div><div>'मुसाफिर कैफ़े' की आत्मा क्या है, यह किसी एक चीज़ के बारे में कहना मुश्किल है। चाहे परफॉर्मेंस हो, कहानी हो या सेटिंग, सब कुछ मिलकर एक ऐसा फ़्लेवर बनाते हैं जो बिल्कुल अनोखा है। चंदर के रोल में विक्रांत मैसी ने ऐसे आदमी का किरदार निभाया है जैसा हर औरत चाहती है। वे मिलनसार, सब्र रखने वाले और इमोशनली साथ देने वाले इंसान हैं; वे एक 'सेफ़ स्पेस' (सुरक्षित जगह) की मिसाल हैं। कई बार विक्रांत और चंदर के बीच फ़र्क करना मुश्किल हो जाता है क्योंकि यह किरदार उन पर बहुत स्वाभाविक लगता है। वे अपनी एक्टिंग को बहुत आसान और सहज बना देते हैं। आप यह सोचना छोड़ देते हैं कि वे एक्टिंग कर रहे हैं या नहीं, क्योंकि वे पूरी तरह से उस किरदार में ढल जाते हैं।</div><div><br></div><div>सुधा के रोल में वेदिका पिंटो भी उतनी ही प्रभावशाली हैं। वे एक जोश से भरी युवा महिला के रोल में आसानी से ढल जाती हैं, जो प्यार और अपने सपनों के करियर के बीच फंसी हुई है। उनकी परफॉर्मेंस स्वाभाविक लगती है और विक्रांत के साथ उनकी केमिस्ट्री फ़िल्म की सबसे बड़ी खूबियों में से एक है। दोनों के बीच का हर पल सच्चा और असल लगता है।</div><div><br></div><div>महिमा मकवाना का 'प्रीति' वाला किरदार शायद फ़िल्म का एक सुखद सरप्राइज़ है। वह कॉन्फिडेंट है, इमोशनली मज़बूत है और उसे पता है कि उसे ज़िंदगी से क्या चाहिए। वह सफलतापूर्वक एक बिज़नेस चलाती है, राइटर बनने का सपना भी पूरा करती है और रिश्ते (या अपने बिज़नेस) में खुद को खोए बिना प्यार के लिए भी जगह बनाती है।</div><div><br></div><div>खासकर एक सीन बहुत यादगार है, जिसमें वह मानती है कि चंदर और सुधा का रिश्ता बहुत गहरा था और वह उसकी ज़िंदगी के उस हिस्से में दखल न देने का फैसला करती है। अतीत से मुकाबला करने के बजाय, वह अपनी बनाई ज़िंदगी और रिश्ते में सुकून पाती है। ठीक उसी पल प्रीति आपका दिल जीत लेती है।</div><div><br></div><div>कास्ट के अलावा, कैफ़े और पहाड़ भी बराबर क्रेडिट के हकदार हैं। वे लगभग खामोश किरदारों की तरह हैं, जो बिना कुछ कहे माहौल बनाते हैं। चाहे भोपाल की जानी-पहचानी गलियां हों या पहाड़ों के बीच बसा आरामदायक कैफ़े, हर लोकेशन कहानी में गर्माहट और एक अलग पहचान जोड़ती है। एक्टिंग, सेटिंग और राइटिंग मिलकर कुछ सुकून देने वाला अनुभव बनाते हैं, जैसे एक बेहतरीन कप कॉफ़ी।</div><div><br></div><div><b>मुसाफिर कैफ़े: म्यूज़िक और डायलॉग्स</b></div><div>'मुसाफिर कैफ़े' डायलॉग्स के बजाय राइटिंग और स्क्रीनप्ले पर ज़्यादा निर्भर करती है। यह बातचीत का एक सिलसिला है - ऐसी बातचीत जो लंबे समय तक याद रहती है और आपको सोचने पर मजबूर करती है।</div><div><br></div><div>हालांकि, 'मुसाफिर कैफ़े' में म्यूज़िक अहम भूमिका निभाता है। यह बहुत ही सुकून देने वाला है और सही पलों पर इस्तेमाल किया गया है। 'तेरा हुआ साहिबा', 'काफ़ी है ना', 'दरमियां', 'रोज़ाना', 'टूटा रहूंगा' और 'रोज़ाना रिप्राइज़' जैसे गाने कहानी को आगे बढ़ाने और खास पलों को और बेहतर बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं।</div><div>&nbsp;</div><div><b> मुसाफिर कैफे: निर्देशन</b></div><div>रुचिर अरुण द्वारा निर्देशित, 8 एपिसोड की यह श्रृंखला लगभग पूरी तरह से तैयार केक की तरह लगती है। सरल कहानी को अनावश्यक रूप से जटिल नहीं बनाया गया है, और यही बात फिल्म की सफलता का कारण है। वे नाटकीय मोड़ों पर निर्भर रहने के बजाय संवादों और मौन को भावनाओं को व्यक्त करने का अवसर देते हैं।</div><div><br></div><div>कभी-कभी गति धीमी लग सकती है, लेकिन यह जीवन के एक पहलू को दर्शाती है और ध्यान भटकाने के बजाय उसे और निखारती है। तीनों मुख्य पात्रों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार के लिए अरुण प्रशंसा के पात्र हैं। किसी को भी नायक या खलनायक के रूप में चित्रित नहीं किया गया है। यह श्रृंखला इस बारे में नहीं है कि किसे सबसे अधिक स्क्रीन टाइम मिलता है। इसके बजाय, वे उन्हें त्रुटिपूर्ण लेकिन फिर भी प्रासंगिक लोगों के रूप में प्रस्तुत करते हैं।</div><div><b><br></b></div><div><b>मुसाफिर कैफ़े: क्या अच्छा है और क्या नहीं</b></div><div>अगर ज़िंदगी आपसे थोड़ा रुककर ऐसा शो देखने के लिए कह रही है जो आपकी आत्मा को सुकून दे, तो 'मुसाफिर कैफ़े' बिल्कुल वैसा ही शो है। इसमें कोई सस्पेंस या अगले एपिसोड में किसी धमाकेदार कहानी का वादा नहीं है। फिर भी, आप तीनों मुख्य किरदारों की कहानी में दिलचस्पी लेंगे क्योंकि आप उन तीनों में कहीं न कहीं खुद की झलक पाएंगे। इसमें पहाड़ हैं; बढ़िया कॉफ़ी और अच्छी चाय का ज़िक्र है, किताबें हैं और प्यार भी है - तो भला क्या पसंद नहीं आएगा!</div><div><br></div><div>'मुसाफिर कैफ़े' की कुछ कमियों में से एक यह हो सकती है कि यह कहानी बहुत ज़्यादा सुरक्षित रास्ते पर चलती है। जब कहानी में इमोशनल उलझनें आती भी हैं, तो वे शायद ही कभी ऐसे पलों में बदलती हैं जो शो खत्म होने के बाद भी आपके ज़हन में बने रहें। उलझनों को उसी नरमी से सुलझाया जाता है जो इस फ़िल्म की पहचान है; यह इसके मूड के हिसाब से तो ठीक है, लेकिन इससे उनका असर भी कम हो जाता है।</div><div><b><br></b></div><div><b>मुसाफिर कैफ़े: आखिरी राय</b></div><div>'मुसाफिर कैफ़े' देखना शनिवार की धीमी दोपहर या रविवार की शांत सुबह जैसा लगता है - ऐसा सुकून भरा पल जिसकी चाहत हमें भागदौड़ भरे हफ़्ते के बाद होती है। अगर आप कोई सुकून देने वाली, दिल को छू लेने वाली कहानी देखना चाहते हैं, तो इसे अपनी वॉचलिस्ट में ज़रूर शामिल करें। वैसे भी, 'मुसाफिर कैफ़े' आपका समय देने लायक है। सिर्फ़ इसलिए नहीं कि इसमें बेहतरीन कलाकार और दिल को छू लेने वाली कहानी है, बल्कि इसलिए भी क्योंकि यह आपको धीरे चलने, सोच-समझकर ब्रेक लेने और ज़िंदगी में कुछ छूट जाने की चिंता न करने की याद दिलाता है।</div><div>&nbsp;</div><div>रेटिंग: 3.5 / 5 स्टार&nbsp;</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 03 Aug 2026 12:58:32 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/musafir-cafe-review-a-sense-of-pause-and-tranquility-amidst-a-hectic-life</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[OTT Release This Week | The Devil Wears Prada 2 से लेकर Musafir Cafe तक, इस हफ़्ते ओटीटी पर लगेगा मनोरंजन का तड़का]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/the-devil-wears-prada-2-to-musafir-cafe-get-ready-for-dose-of-entertainment-on-ott-this-week]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सिनेमाघरों में जहाँ इन दिनों 'जना नायकन' और 'द ओडिसी' जैसी विभिन्न शैलियों की फ़िल्में दर्शकों का मनोरंजन कर रही हैं, वहीं ओटीटी (OTT) प्लेटफ़ॉर्म्स भी इस हफ़्ते नए और रोमांचक कंटेंट के साथ तैयार हैं। बड़े पर्दे के अलावा डिजिटल स्पेस में इस हफ़्ते हॉलीवुड के बहुप्रतीक्षित सीक्वल से लेकर ऐतिहासिक डॉक्युड्रामा और दिलचस्प भारतीय शो रिलीज़ हो रहे हैं। यदि आप भी इस वीकेंड घर बैठे बिंज-वॉच (Bingo Watch) का प्लान बना रहे हैं, तो आइए जानते हैं इस हफ़्ते ओटीटी पर आने वाली बड़ी रिलीज़ और हाल ही में स्ट्रीम हुए शो के बारे में।</div><div><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/christopher-nolan-latest-blockbuster-the-odyssey-crosses-the-100-crore-mark-in-india" target="_blank">Christopher Nolan का नया धमाका! The Odyssey ने भारत में पार किया ₹100 करोड़ का आंकड़ा, तोड़े कई बड़े रिकॉर्ड्स</a></h3><div><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div><div><span style="font-size: 1rem;">आने वाले हफ़्ते में अलग-अलग तरह की कई रोमांचक फ़िल्में और शो रिलीज़ होने वाले हैं, जिनमें हॉलीवुड की बहुप्रतीक्षित सीक्वल 'द डेविल वेयर्स प्राडा 2' और डॉक्युड्रामा 'द बॉम्बिंग ऑफ़ पैन एम 103' शामिल हैं। आइए जानते हैं उन शो के बारे में जिन्हें आप इस हफ़्ते ऑनलाइन देख सकते हैं।</span></div><div><br></div><div><b>1. द बॉम्बिंग ऑफ़ पैन एम 103</b></div><div>डॉक्युड्रामा सीरीज़ 'द बॉम्बिंग ऑफ़ पैन एम 103' 1988 में हुए लॉकरबी बम धमाके की घटनाओं पर आधारित है। इसे जोनाथन ली और एडम मोने-ग्रिफ़िथ्स ने बनाया है। यह ऐतिहासिक एक्शन ड्रामा सीरीज़ 30 जुलाई, 2026 को नेटफ़्लिक्स पर रिलीज़ होगी। शो की मुख्य कास्ट में कॉनर स्विंडेल्स, पैट्रिक जे एडम्स और लॉरेन लाइल शामिल हैं।</div><div><br></div><div>रिलीज़ की तारीख - 30 जुलाई</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/kaun-banega-crorepati-18-returns-with-amitabh-bachchan" target="_blank">Kaun Banega Crorepati 18: अमिताभ बच्चन के साथ लौटेगा ज्ञान का महामंच, 1 अगस्त से शुरू होगी शूटिंग</a></h3><div><br></div><div><b>2. द डेविल वेयर्स प्राडा 2</b></div><div>मेरिल स्ट्रीप, ऐनी हैथवे और एमिली ब्लंट की फ़िल्म 'द डेविल वेयर्स प्राडा 2' 29 जुलाई, 2026 को भारत में JioHotstar पर OTT पर रिलीज़ होने जा रही है। यह फ़िल्म अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों भाषाओं में स्ट्रीमिंग के लिए उपलब्ध होगी।</div><div>रिलीज़ की तारीख - 29 जुलाई</div><div>&nbsp;</div><div>फ़िल्म की OTT रिलीज़ की तारीख और ट्रेलर शेयर करते हुए JioHotstar ने लिखा, "तैयार हो जाइए, क्योंकि 'द रनवे' घर आ रही है #TheDevilWearsPrada2 29 जुलाई को JioHotstar पर स्ट्रीम होगी।"</div><div><br></div><div><b>OTT पर हाल ही में रिलीज़ हुई सीरीज़</b></div><div>नई रिलीज़ के अलावा, विक्रांत मैसी और वेदिका पिंटो की 'मुसाफ़िर कैफ़े' और के के मेनन की 'आदर्श बाल विद्यालय' जैसी सीरीज़ भी OTT प्लेटफ़ॉर्म पर आई हैं और दर्शकों का ध्यान खींच रही हैं।</div><div>&nbsp;</div><div><b> 1. मुसाफिर कैफे</b></div><div>विक्रांत मैसी, वेदिका पिंटो और महिमा मकवाना की 'मुसाफिर कैफे' भी नेटफ्लिक्स पर आ गई है, जो इस हफ़्ते की OTT लाइनअप में शामिल हो गई है। यह दिव्या प्रकाश दुबे के इसी नाम के नॉवेल पर आधारित है; यह रोमांटिक ड्रामा चंदर (विक्रांत मैसी), सुधा (वेदिका पिंटो) और प्रीति (महिमा मकवाना) की ज़िंदगी के इर्द-गिर्द घूमता है, जब एक इमोशनल सफ़र में उनके रास्ते आपस में मिलते हैं।</div><div>OTT प्लेटफ़ॉर्म - नेटफ्लिक्स</div><div><br></div><div><b>2. आदर्श बाल विद्यालय</b></div><div>हिमांक गौर की डायरेक्ट की हुई कॉमेडी-ड्रामा सीरीज़ 'आदर्श बाल विद्यालय' अब OTT प्लेटफ़ॉर्म प्राइम वीडियो पर स्ट्रीम हो रही है। सात एपिसोड वाली इस सीरीज़ में कई कलाकार हैं, जिनमें के के मेनन, अर्चना पूरन सिंह, नवीन कस्तूरिया, प्रसन्ना बिष्ट, देवेन भोजानी, अजितेश गुप्ता, अन्नपूर्णा सोनी, प्राची शाह और अभिमन्यु सिंह शामिल हैं।</div><div><br></div><div>OTT प्लेटफ़ॉर्म - प्राइम वीडियो</div><div>&nbsp;</div><div>'आदर्श बाल विद्यालय' को दर्शकों और क्रिटिक्स से मिले-जुले रिव्यू मिले हैं; कुछ लोगों ने कलाकारों की एक्टिंग की तारीफ़ की है, जबकि कुछ दर्शकों को यह सीरीज़ धीमी, उपदेश देने वाली और पहले से अंदाज़ा लगाई जा सकने वाली (predictable) लगी।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 27 Jul 2026 09:20:50 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/the-devil-wears-prada-2-to-musafir-cafe-get-ready-for-dose-of-entertainment-on-ott-this-week</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Adarsh Baal Vidyalaya Review | के के मेनन की उम्दा एक्टिंग, लेकिन धीमी रफ्तार और कमजोर सब-प्लॉट्स ने फीका किया मजा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/adarsh-??baal-vidyalaya-review-kay-kay-menon-stellar-acting-but-slow-pace-and-weak-sub-plots]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हाल के सालों में भारतीय ओटीटी स्पेस में 'पंचायत' और 'ग्राम चिकित्सालय' जैसी सिटकॉम सीरीजों ने हल्के-फुल्के अंदाज में गंभीर सामाजिक और जमीनी मुद्दों को उठाकर दर्शकों के दिलों में खास जगह बनाई है। प्राइम वीडियो की नई सीरीज़ 'आदर्श बाल विद्यालय' भी इसी राह पर चलने की कोशिश करती है। यह कहानी एक शांत स्वभाव वाले सरकारी स्कूल के प्रिंसिपल की है, जिसकी सुस्त जिंदगी में तब नया मोड़ आता है जब एक सरकारी स्कीम के तहत उन्हें अपने स्कूल का बोर्ड रिजल्ट बेहतर करने का चैलेंज मिलता है। के के मेनन जैसे दिग्गज अभिनेता से सजी यह सीरीज़ क्या अपनी उम्मीदों पर खरी उतरती है? आइए जानते हैं।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/has-the-cjp-protest-transformed-pakistan-as-well-here-is-what-was-said-in-the-initial-reaction" target="_blank">CJP Protest ने पाकिस्तान को भी बदल कर रख दिया? पहले रिएक्शन में ये क्या कह दिया</a></h3><div><br></div><div><b>आदर्श बाल विद्यालय: कहानी</b></div><div>'आदर्श बाल विद्यालय' की कहानी दिल्ली के टिंकी टोली इलाके के एक सरकारी स्कूल के प्रिंसिपल ज्ञानेश्वर त्रिपाठी (के के मेनन) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो बहुत शांत स्वभाव के हैं। उन्हें स्कूल की खराब सुविधाओं और सीमित संसाधनों की आदत हो चुकी है, लेकिन एक सरकारी स्कीम सब कुछ बदल देती है। इस स्कीम के तहत, दिल्ली के टॉप 10 सरकारी स्कूलों के प्रिंसिपलों को - जिनके स्कूल 10वीं क्लास के बोर्ड एग्ज़ाम में शानदार रिज़ल्ट लाते हैं - उनके जीवनसाथी के साथ कैम्ब्रिज घूमने का मौका मिलेगा।</div><div><br></div><div>इस इनाम से प्रेरित होकर, ज्ञानेश्वर अपनी टीचरों की टीम के साथ 'आदर्श बाल विद्यालय' को बेहतर बनाने की कोशिश करते हैं। यह शहर के सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले स्कूलों में से एक है, और उन्हें सरकारी स्कूल की रोज़मर्रा की चुनौतियों का भी सामना करना पड़ता है।</div><div><br></div><div>सीरीज़ की शुरुआत शिक्षा निदेशालय के अधिकारियों के 'आदर्श बाल विद्यालय' पहुँचने और हेडमास्टर से मिलने की कोशिश से होती है। हालाँकि, वे स्कूल का रास्ता पूछने के लिए सड़क किनारे चाय बेच रहे एक छात्र से पूछते हैं। छात्र बताता है कि पिछले कुछ दिनों से क्लास नहीं हो रही हैं क्योंकि दो क्लासरूम और एक लैब पर स्थानीय विधायक गोल्डी (देवेन भोजानी) की बेटी की शादी में आए मेहमानों के ठहरने का इंतज़ाम किया गया है। सीरीज़ की शुरुआत सरकारी स्कूल की मुश्किलों को दिखाकर होती है, जिससे आगे की कहानी का माहौल बनता है।</div><div><br></div><div>जब ज्ञानेश्वर त्रिपाठी (के के मेनन) 'आदर्श बाल विद्यालय' को दिल्ली के टॉप 10 सरकारी स्कूलों में शामिल करने के लिए स्कूल मैनेजमेंट कमेटी (SMC) बनाते हैं, तो टीम को जल्द ही एहसास होता है कि यह काम आसान नहीं है। एक्स्ट्रा क्लास चलाने के लिए फंड की ज़रूरत होती है, जबकि कम अटेंडेंस एक और चुनौती बनी रहती है। एक सीन में, छात्र मानते हैं कि वे ज़्यादातर मंगलवार को स्कूल इसलिए आते हैं क्योंकि उस दिन मिड-डे मील स्कीम के तहत "खीर" मिलती है। क्या ज्ञानेश्वर स्कूल की किस्मत बदलने और कैम्ब्रिज जाने का अपना सपना पूरा करने में कामयाब हो पाते हैं, यही कहानी का मुख्य हिस्सा है।</div><div><br></div><div><b>आदर्श बाल विद्यालय: लेखन और निर्देशन</b></div><div>लेखक बिस्वपति सरकार, अक्षय नूपुर पाई, तत्सत पांडे और मेघना श्रीवास्तव ने ह्यूमर और सामाजिक मुद्दों पर टिप्पणी का अच्छा तालमेल बिठाया है। मज़ेदार डायलॉग और टीचर-स्टूडेंट के बीच बातचीत के ज़रिए, लेखन कहानी को शुरू में दिलचस्प बनाए रखता है और साथ ही सरकारी स्कूलों के संघर्ष और पढ़ाई में छात्रों की कम दिलचस्पी को भी दिखाता है।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/congress-imran-masood-calls-sonam-wangchuk-the-second-anna-bjp-hits-back" target="_blank">Congress के Imran Masood ने Sonam Wangchuk को बताया 'दूसरा Anna', BJP ने किया पलटवार</a></h3><div><br></div><div>अर्चना पूरन सिंह का किरदार उर्मिला देवी, जो MLA गोल्डी (देवेन भोजानी) की करीबी सहयोगी हैं, फंड पाने के लिए प्रिंसिपल की एकमात्र उम्मीद बन जाती हैं। इसके ज़रिए, सीरीज़ यह भी दिखाती है कि स्कूलों की बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए भी अक्सर राजनीतिक प्रभाव की ज़रूरत कैसे पड़ जाती है।</div><div><br></div><div>सीरीज़ संवेदनशील विषयों को पढ़ाने, छात्रों को अनुशासित करने पर लगी पाबंदियों और बदलते क्लासरूम नियमों के हिसाब से खुद को ढालने में शिक्षकों के संघर्ष जैसे मुद्दों को भी उजागर करती है।</div><div><br></div><div>निर्देशक हेमांक गौर ज़्यादातर समय सीरीज़ को दिलचस्प बनाए रखने में कामयाब रहे हैं। हालाँकि, कुछ सब-प्लॉट असरदार नहीं रहे और पाँचवें एपिसोड के बाद कहानी की रफ़्तार धीमी पड़ जाती है; कुछ सब-प्लॉट खिंचे हुए लगते हैं और कहानी की गति को धीमा कर देते हैं।</div><div><br></div><div><b>आदर्श बाल विद्यालय: तकनीकी पहलू</b></div><div>तकनीकी तौर पर, सीरीज़ को सरल लेकिन असरदार रखा गया है। एडिटिंग और सिनेमैटोग्राफ़ी सरकारी स्कूल के माहौल को जीवंत बनाती हैं, जो पुरानी यादों और खराब इंफ्रास्ट्रक्चर की कठोर सच्चाइयों के बीच संतुलन बनाती हैं। बैकग्राउंड स्कोर कहानी में स्वाभाविक रूप से घुल-मिल जाता है और बिना किसी रुकावट के माहौल को और बेहतर बनाता है।</div><div><br></div><div><b>आदर्श बाल विद्यालय: एक्टिंग और क्या अच्छा रहा</b></div><div>के के मेनन ने आदर्श बाल विद्यालय के हेडमास्टर ज्ञानेश्वर त्रिपाठी के रोल में बहुत नैचुरल एक्टिंग की है। शुरू में अपनी पत्नी (प्राची शाह) के साथ कैम्ब्रिज जाने के सपने में खोए रहने वाले ज्ञानेश्वर को धीरे-धीरे स्टूडेंट्स का भविष्य बेहतर बनाने की अहमियत समझ आती है। मेनन ने अपने रोल के साथ न्याय किया है, हालांकि उनकी कहानी को और गहराई से दिखाया जा सकता था।</div><div><br></div><div>प्राची शाह को स्क्रीन पर कम समय मिला है, लेकिन उन्होंने अपनी ईमानदार एक्टिंग से उसका पूरा फायदा उठाया है। अर्चना पूरन सिंह, MLA गोल्डी की करीबी सहयोगी उर्मिला देवी के रोल में एकदम सही लगती हैं। उनका दबदबे वाला अंदाज़ इस किरदार के लिए बिल्कुल सही है। सख्त हिंदी टीचर हंसराज मीणा के रोल में अभिमन्यु सिंह की एक्टिंग शानदार रही है। वे दर्शकों को स्कूल के उन टीचरों की याद दिलाते हैं जिनसे बच्चे डरते थे, साथ ही यह सीरीज़ उनकी निजी मुश्किलों को भी दिखाती है। सिंह ने पूरी सीरीज़ में दमदार एक्टिंग की है।</div><div><br></div><div>देवेन भोजानी ने MLA गोल्डी के रोल में अच्छा काम किया है, लेकिन कमज़ोर कहानी का असर उनके किरदार पर पड़ा है। उनका सब-प्लॉट ज़बरदस्ती का लगता है और कोई खास असर नहीं छोड़ पाता। नई मैथ्स टीचर कंचन के रोल में प्रसन्ना बिष्ट ने प्रभावित किया है; उन्हें स्टाफ की कमी के कारण फिजिक्स भी पढ़ानी पड़ती है।</div><div><br></div><div>अंग्रेज़ी टीचर के रोल में ऐतेश गुप्ता नैचुरल लगे हैं; डिस्लेक्सिया की वजह से वे अक्सर अजीब स्थितियों में फंस जाते हैं। वहीं, शर्मा मैम के रोल में अन्नपूर्णा सोनी ठीक-ठाक रही हैं, हालांकि उनके किरदार को और ज़्यादा स्क्रीन टाइम मिलना चाहिए था। मुकुल और पलक के रोल में नवीन कस्तूरिया और अक्षरा पडवाल के बीच पिता-बेटी का रिश्ता भरोसेमंद लगता है। मुकुल स्टूडेंट्स की समस्याओं में तो मदद करते हैं, लेकिन अपनी बेटी को समझने में उन्हें मुश्किल होती है। पडवाल ने बागी टीनएजर के रोल में ईमानदार एक्टिंग की है।</div><div><br></div><div>कबीर साजिद, अश्वनाथ कुमार, वीरेंद्र पुंडियाल, किरण दीप शर्मा, आर्यन प्रजापति, यतेंद्र बहुगुणा और जेरेड अल्बर्ट सविले जैसे सपोर्टिंग कलाकारों ने कम स्क्रीन टाइम के बावजूद अच्छा काम किया है। इनमें कबीर साजिद और आर्यन प्रजापति ने सबसे ज़्यादा प्रभावित किया है। बिस्वपति सरकार भी एक छोटे से कैमियो रोल में नज़र आते हैं।</div><div><br></div><div><b>आदर्श बाल विद्यालय: क्या अच्छा नहीं रहा</b></div><div>अच्छी कहानी के बावजूद, 'आदर्श बाल विद्यालय' अपने सात एपिसोड के दौरान एक जैसा असर नहीं बना पाती। हालांकि पहला हाफ दर्शकों को बांधे रखता है, लेकिन पांचवें एपिसोड के बाद कहानी की रफ़्तार धीमी पड़ने लगती है। कुछ सब-प्लॉट, खासकर MLA गोल्डी वाला हिस्सा, गैर-ज़रूरी लगते हैं और कहानी में कुछ खास नहीं जोड़ते।</div><div><br></div><div>सीरीज़ के दूसरे हाफ में रफ़्तार को लेकर भी दिक्कतें हैं, और कुछ हिस्से बहुत खिंचे हुए लगते हैं। अगर इन सब-प्लॉट की राइटिंग बेहतर होती और उन्हें अच्छे से दिखाया जाता, तो यह सीरीज़ और भी असरदार हो सकती थी।</div><div><br></div><div><b>आदर्श बाल विद्यालय: आखिरी राय</b></div><div>आदर्श बाल विद्यालय की नीयत साफ़ है। हालांकि इसमें TVF के कुछ बेहतरीन शो जैसी इमोशनल गहराई या निरंतरता नहीं है, फिर भी यह एक ईमानदार और आज के समय के हिसाब से ज़रूरी शो है जो सरकारी स्कूलों की हालत पर रोशनी डालता है। इसमें कलाकारों की सच्ची एक्टिंग और एक सार्थक कहानी है; फिर भी, अगर आप सामाजिक संदेश वाला ज़मीन से जुड़ा ड्रामा देखना चाहते हैं, तो यह सीरीज़ देखने लायक है, भले ही यह अपनी पूरी क्षमता तक न पहुँच पाई हो।</div><div><br></div><div><b>आदर्श बाल विद्यालय के लिए 2.5/5</b></div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 24 Jul 2026 13:17:45 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/adarsh-??baal-vidyalaya-review-kay-kay-menon-stellar-acting-but-slow-pace-and-weak-sub-plots</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Dhamaal 4 Review | बॉक्स ऑफिस पर 10 दिनों से मचा रही है 'धमाल 4' बवाल, जानिए फिल्म देखने के 10 बड़े कारण]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/dhamaal-4-creating-storm-at-the-box-office-for-10-days-10-great-reasons-to-watch-the-film]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बॉलीवुड में इन दिनों सीक्वल और पुरानी हिट फ्रैंचाइज़ी के रिवाइवल का दौर जारी है। जब बात बिना लॉजिक वाली, हल्की-फुल्की और ज़ोरदार सिचुएशनल कॉमेडी की आती है, तो 'धमाल' फ्रैंचाइज़ी का नाम सबसे पहले ज़हन में आता है। वर्ष 2007 में आई ओरिजिनल फिल्म के लगभग दो दशक बाद, निर्देशक इंद्र कुमार इस फ्रैंचाइज़ी की चौथी किस्त 'धमाल 4' लेकर आए हैं।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">बॉक्स ऑफिस पर बीते 10 दिनों से शानदार प्रदर्शन कर रही यह फिल्म दर्शकों को थिएटर तक खींचने में कामयाब रही है। अगर आप इस वीकेंड अपने परिवार के साथ बिना ज़्यादा दिमाग लगाए सिर्फ हंसने-मुस्कुराने का प्लान बना रहे हैं, तो यह फिल्म आपके लिए एक सही विकल्प साबित हो सकती है।&nbsp;</span></div><div><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/jp-nadda-and-jitendra-singh-visited-the-hospital-to-meet-sonam-wangchuk" target="_blank">NEET विवाद पर सड़कों से लेकर संसद तक राजनीति तेज़, JP Nadda और जितेंद्र सिंह ने मेदांता अस्पताल में Sonam Wangchuk से की मुलाकात</a></h3><div><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div><div><span style="font-size: 1rem;"><b>आइए जानते हैं 'धमाल 4' की कहानी, इसकी खूबियाँ और इसे देखने के 10 प्रमुख कारण:</b></span></div><div><br></div><div><b>खजाने की खोज और रहस्यमयी द्वीप की कहानी</b></div><div>'धमाल 4' की कहानी फ्रैंचाइज़ी के आज़माए हुए फॉर्मूले पर ही टिकी है—सौ साल पुराने छिपे हुए खजाने की आपाधापी। इस बार खजाना एक रहस्यमयी द्वीप पर छिपा है, जिसका सुराग 'पृथ्वी' (उपेंद्र लिमये) की याददाश्त में बंद है।&nbsp;</div><div><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div><div><span style="font-size: 1rem;">इस खजाने को पाने के लिए तीन विरोधी टीमें दौड़ में शामिल होती हैं: -</span></div><div><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span><span style="font-size: 1rem;">गुड्डू (अजय देवगन) और उनके वफ़ादार साथी जॉनी (संजय मिश्रा), साथ में आलिया (ईशा गुप्ता)।</span></div><div><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div><div><span style="font-size: 1rem;">फ्रैंचाइज़ी की आइकॉनिक जोड़ी आदि (अरशद वारसी) और मानव (जावेद जाफ़री), जिनके साथ इस बार आदि की पत्नी (संजीदा शेख़) भी शामिल हैं।</span></div><div><br></div><div>लल्लन (रितेश देशमुख) और उनकी पत्नी पारो (अंजलि आनंद)।</div><div><br></div><div>इनके अलावा कहानी में तड़का लगाने के लिए 'अधूरा' (रवि किशन) नाम का एक अजीब और खतरनाक समुद्री डाकू भी मैदान में है।</div><div><br></div><div><b>फिल्म देखने के 10 बड़े कारण (Key Highlights)</b></div><div>अजय देवगन का सहज कॉमिक अवतार: अजय देवगन एक बार फिर कॉमेडी जॉनर में आसानी से ढल गए हैं। वे इस पूरी अफरातफरी के बीच फिल्म के एंकर का काम करते हैं।</div><div><br></div><div>आदि और मानव की आइकॉनिक जोड़ी: अरशद वारसी और जावेद जाफ़री की केमिस्ट्री और टाइमिंग आज भी इस फ्रैंचाइज़ी की सबसे बड़ी रीढ़ है।</div><div><br></div><div>सरप्राइज़ पैकेज—रवि किशन: एक अजीब विलेन और समुद्री डाकू के रूप में रवि किशन के डायलॉग डिलीवरी और हाव-भाव फिल्म के सबसे मनोरंजक पलों में से एक हैं।</div><div><br></div><div>अंजलि आनंद और रितेश की देसी कॉमेडी: लल्लन के रूप में रितेश देशमुख और उनकी पत्नी के किरदार में अंजलि आनंद ने बेहतरीन कॉमिक टाइमिंग दिखाई है।</div><div><br></div><div>संजय मिश्रा के वन-लाइनर्स: अपनी खास कॉमिक टाइमिंग से संजय मिश्रा एक बार फिर दर्शकों को हंसाने में सफल रहते हैं।</div><div><br></div><div>पूरी तरह से फैमिली एंटरटेनर: एडल्ट ह्यूमर से दूर रहकर इंद्र कुमार ने इसे बच्चों और पूरे परिवार के साथ देखने योग्य सिचुएशनल व फिजिकल कॉमेडी बनाया है।</div><div><br></div><div>नॉस्टेल्जिया और रेफरेंस: पुरानी 'धमाल' फिल्मों और 90 के दशक की कॉमेडी शैली की यादें पुराने फैंस के चेहरे पर मुस्कान लाती हैं।</div><div><br></div><div>शानदार सिनेमैटोग्राफी: सुधीर कुमार चौधरी द्वारा शूट किए गए द्वीप, समुद्र और जंगलों के विज़ुअल्स फिल्म को एक भव्य सिनेमाई लुक देते हैं।</div><div><br></div><div>हाई-एनर्जी म्यूज़िक: 'बेला चाओ' का रीमेक और 'साड़ी' व 'चटनी' जैसे जोश भरे गाने थिएटर के माहौल को मनोरंजक बनाते हैं।</div><div><br></div><div>खूबसूरत इमोशनल सीख: फिल्म के अंत में पंचतंत्र जैसी एक सीख दी गई है कि लालच से मुसीबत आती है और परिवार व अपनों का साथ ही सबसे बड़ी संपत्ति है।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/trump-approves-nuclear-deal-with-saudi-arabia-permission-for-uranium-enrichment-likely-sources" target="_blank">Donald Trump ने सऊदी अरब के साथ परमाणु समझौते को मंजूरी दी, यूरेनियम संवर्धन की अनुमति संभव: सूत्र</a></h3><div><br></div><div><b>कमज़ोर कड़ियाँ: जहाँ फिल्म मात खाती है</b></div><div>फिल्म में कुछ कमियाँ भी हैं जो ध्यान खींचती हैं:</div><div><br></div><div>पुराने जोक्स: कुछ मज़ाक 90 के दशक की शैली के लगते हैं, जो आज के दर्शकों को थोड़े पुराने ज़माने के लग सकते हैं।</div><div><br></div><div>कमज़ोर VFX: शेर, मगरमच्छ और तूफ़ान वाले दृश्यों में ग्रीन स्क्रीन और विज़ुअल इफ़ेक्ट्स काफी बनावटी और औसत दर्जे के लगते हैं।</div><div><br></div><div>धीमी रफ़्तार: सेकंड हाफ में खजाने की खोज के कई सीन ज़रूरत से ज़्यादा लंबे खिंचे हुए महसूस होते हैं।</div><div><br></div><div><b>अंतिम निर्णय (Verdict)</b></div><div>'धमाल 4' खुद को कोई गहरी या बौद्धिक कॉमेडी होने का दावा नहीं करती। यह एक विशुद्ध पॉपकॉर्न एंटरटेनर है। अगर आप लॉजिक को एक तरफ रखकर केवल हंसना चाहते हैं, तो यह स्टार-स्टडेड फिल्म आपको निराश नहीं करेगी।</div><div><br></div><div><b>रेटिंग: 3 / 5 स्टार</b></div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 22 Jul 2026 08:55:51 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/dhamaal-4-creating-storm-at-the-box-office-for-10-days-10-great-reasons-to-watch-the-film</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[The Odyssey Movie Review | (5/5 स्टार) 3000 साल पुराने महाकाव्य को पर्दे पर उतार Christopher Nolan ने फिर रचा सिनेमाई इतिहास]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/the-odyssey-movie-review-nolan-creates-cinematic-history-by-3000-year-old-epic-to-the-screen]]></guid>
      <description><![CDATA[<div><span style="font-size: 1rem;">ग्रीक कवि होमर द्वारा रचित 'द ओडिसी' (The Odyssey) पश्चिमी साहित्य के इतिहास के सबसे प्राचीन, महान और सदाबहार महाकाव्यों में से एक है। यह मूल रूप से इथाका के राजा और ट्रोजन युद्ध के महान योद्धा ओडिसियस (Odysseus) की दस साल लंबी और बेहद खतरनाक घर वापसी की महागाथा है, जिसमें वे समुद्र के देवता पोसीडॉन के प्रकोप, क्रूर राक्षसों, जादूगरनियों और विनाशकारी तूफानों का सामना करते हैं। लगभग 3,000 साल से भी पुरानी इसी पौराणिक साहित्यिक रचना को आधुनिक सिनेमा के सबसे बड़े जादूगर क्रिस्टोफर नोलन ने एक भव्य ब्लॉकबस्टर फिल्म में बदल दिया है। कुछ फिल्में आपका मनोरंजन करती हैं, कुछ प्रभावित करती हैं, और फिर कभी-कभी ऐसी फिल्में आती हैं जो याद दिलाती हैं कि सिनेमा आखिर बना ही क्यों है। नोलन की 'द ओडिसी' इसी बेहद खास और दुर्लभ श्रेणी का हिस्सा है, जिसे बड़े पर्दे पर देखना किसी दिव्य अनुभव से कम नहीं है।</span></div><div><br></div><div>लगभग तीन घंटे लंबी यह फिल्म एक पल के लिए भी दर्शकों के धैर्य की परीक्षा नहीं लेती। ओडिसियस की घर वापसी का हर एक अध्याय एक रोमांचक सफर की तरह खुलता है, जहाँ भव्य दृश्य, पौराणिक कथाएं, मानवीय भावनाएं और बड़े पैमाने का एक्शन एक साथ मिलकर एक जादुई संतुलन बनाते हैं। यह फिल्म नहीं, एक मुकम्मल अनुभव है जो थिएटर में एंट्री करते ही आपको अपने विज़न में डुबो लेता है और बाहरी दुनिया को ओझल कर देता है।</div><div><br></div><div><b>मैट डेमन का करियर-बेस्ट परफॉर्मेंस और दमदार स्टार कास्ट</b></div><div>इस महाकाव्य के केंद्र में हैं मैट डेमन, जिन्होंने अपने जीवन की सबसे बेहतरीन परफॉर्मेंस दी है। उनका ओडिसियस कोई पारंपरिक आदर्श नेता नहीं है; फिल्म कई मौकों पर उनके फैसलों को कटघरे में खड़ा करती है। लेकिन उनका सबसे बड़ा हथियार उनकी बुद्धिमानी और दृढ़ता है—चाहे ट्रोजन हॉर्स से भागना हो या जादूगरनी सर्सी का सामना करना। डेमन ने घर लौटने के लिए बेताब एक सैनिक के दर्द, अपराधबोध और अटूट संकल्प को अपनी आँखों और अदाकारी से जीवंत कर दिया है।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/dhamaal-4-creates-a-tsunami-at-the-box-office-alpha-nears-the-100-crore-mark" target="_blank">Box Office Report | बॉक्स ऑफिस पर Dhamaal 4 की सुनामी, 100 करोड़ के करीब Alpha, अब Welcome to the Jungle ने भी पकड़ी रफ्तार!</a></h3><div><br></div><div>टॉम हॉलैंड ने भी इस फिल्म में कमाल का काम किया है। 'स्पाइडर-मैन' के रूप में दुनिया बचाने वाले हॉलैंड को एक ऐसे युवा (टेलीमैकस) के रूप में देखना अद्भुत है जो बिना पिता के बड़ा हुआ है। उनका सुपरहीरो वाला आत्मविश्वास यहाँ पूरी तरह गायब है और उनकी यही कमज़ोरी उनकी सबसे बड़ी ताकत बनती है। ऐनी हैथवे ने पेनेलोप के किरदार में उम्मीद, कर्तव्य और शांत मजबूती का एक खूबसूरत मेल पेश किया है। ज़ेंडाया का स्क्रीन टाइम भले ही छोटा हो, लेकिन वे हर फ्रेम में अपनी अमिट छाप छोड़ती हैं।</div><div><br></div><div>इसके अलावा रॉबर्ट पैटिनसन की अनिश्चितता, इलियट पेज का खामोश दर्द और हिमेश पटेल का हॉलीवुड के इन दिग्गज नामों के बीच अपनी जगह बनाना सराहनीय है। लुपिता न्योंगो,充ार्लीज़ थेरॉन और जॉन बर्नथल जैसे सितारों को भी नोलन ने फिल्म में एक खास मकसद के साथ स्क्रीन पर उतारा है।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/akansha-chamola-pamela-serene-intimacy-in-lock-upp-2" target="_blank">Lock Upp 2 में Akansha Chamola और Pamela Serene की नजदीकियों पर भड़के लोग, Viral Video ने मचाया कोहराम</a></h3><div><br></div><div><b>युद्ध का मानवीय चेहरा और पौराणिक जड़ें</b></div><div>शानदार विजुअल्स से परे, 'द ओडिसी' युद्ध की मानवीय कीमत की एक संवेदनशील कहानी है। यह सिर्फ देवताओं, राजाओं और राक्षसों की बात नहीं करती, बल्कि यह उस दर्द को दिखाती है जो युद्ध पर गए सैनिकों के परिवार सालों तक भोगते हैं। यह उन सैनिकों की आत्मा को भी झकझोरती है जो लंबे समय तक खून-खराबा देखने के बाद भूल जाते हैं कि 'घर' का असल मतलब क्या होता है।</div><div><br></div><div>फिल्म ग्रीक पौराणिक कथाओं और ज़्यूस के दैवीय कानूनों के साथ मजबूती से जुड़ी रहती है। हालांकि, कुछ क्रिएटिव फैसले थोड़े अजीब लगते हैं; जैसे हज़ारों साल पुरानी इस कहानी में टेलीमैकस द्वारा पेनेलोप और ओडिसियस को 'मॉम' और 'डैड' कहना दर्शकों को थोड़ी देर के लिए उस ऐतिहासिक माहौल से बाहर खींच लेता है। इसके उलट, नोलन ने कहानी में बहुत ही बारीक ह्यूमर (Humor) पिरोया है। मिसाल के तौर पर, जब सैनिकों का सामना पोसीडॉन के विशालकाय बेटे साइक्लोप्स से होता है, तो एक सैनिक का यह कहना—"क्या तुम चींटियों से बात करते हो?"—न सिर्फ गुदगुदाता है, बल्कि देवताओं के सामने इंसानों की तुच्छता को भी दर्शाता है।</div><div><b><br></b></div><div><b>क्लाइमैक्स की सटीकता और पूरी तरह IMAX पर शूटिंग का चमत्कार</b></div><div>फिल्म के आखिरी तीस मिनट कमाल के हैं। यहाँ एक्शन, भावनाएं और बरसों से प्रतीक्षित टकराव इतनी अद्भुत सटीकता और तेज रफ्तार के साथ सामने आते हैं कि दर्शक दांतों तले उंगली दबा लेते हैं। नोलन का निर्देशन यहाँ अपनी काबिलियत के चरम पर दिखता है। उफनते समुद्र, विशाल ट्रोजन हॉर्स और महाकाल्पनिक युद्ध के दृश्यों को देखकर साफ हो जाता है कि कहानी के लिए विजुअल्स की और विजुअल्स के लिए कहानी की बलि नहीं दी गई है।</div><div><br></div><div>सबसे खास बात यह है कि यह फिल्म पूरी तरह से IMAX कैमरों पर शूट की गई है। यह जानकर हैरानी होती है कि इन कैमरों में रील रीलोड करने से पहले सिर्फ तीन मिनट का फुटेज ही रिकॉर्ड किया जा सकता है। ऐसे में बिना किसी कमी (सीमलेस) के इतने जटिल एक्शन और इमोशनल दृश्यों को फिल्माना यह बताता है कि हर फ्रेम की कितनी कड़ी रिहर्सल की गई होगी।</div><div><br></div><div>भव्य दृश्यों के साथ-साथ इसका जादुई म्यूज़िक स्कोर भी केवल बैकग्राउंड में नहीं बजता, बल्कि वह हर धुन के साथ दुख, सस्पेंस और जीत के अहसास को और गहरा कर देता है। 'द ओडिसी' केवल एक फिल्म नहीं है; यह तकनीक, सिनेमाई महत्वाकांक्षा और क्रिस्टोफर नोलन के सिनेमा के प्रति अटूट प्यार का एक बेजोड़ जश्न है।</div><div>&nbsp;</div><div><a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood" target="_blank" style="background-color: rgb(255, 255, 255); font-size: 1rem;"><span style="font-family: &quot;Segoe UI&quot;, sans-serif; background-image: initial; background-position: initial; background-size: initial; background-repeat: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial;">Entertainment News Hindi </span></a><span style="background-image: initial; background-position: initial; background-size: initial; background-repeat: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; font-size: 1rem; font-family: &quot;Segoe UI&quot;, sans-serif;">Today
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width:100%;" target="_blank"> <div style=" display: flex; flex-direction: row; align-items: center;"> <div style="background-color: #F4F4F4; border-radius: 50%; flex-grow: 0; height: 40px; margin-right: 14px; width: 40px;"></div> <div style="display: flex; flex-direction: column; flex-grow: 1; justify-content: center;"> <div style=" background-color: #F4F4F4; border-radius: 4px; flex-grow: 0; height: 14px; margin-bottom: 6px; width: 100px;"></div> <div style=" background-color: #F4F4F4; border-radius: 4px; flex-grow: 0; height: 14px; width: 60px;"></div></div></div><div style="padding: 19% 0;"></div> <div style="display:block; height:50px; margin:0 auto 12px; width:50px;"><svg width="50px" height="50px" viewBox="0 0 60 60" version="1.1" xmlns="https://www.w3.org/2000/svg" xmlns:xlink="https://www.w3.org/1999/xlink"><g stroke="none" stroke-width="1" fill="none" fill-rule="evenodd"><g transform="translate(-511.000000, -20.000000)" fill="#000000"><g><path d="M556.869,30.41 C554.814,30.41 553.148,32.076 553.148,34.131 C553.148,36.186 554.814,37.852 556.869,37.852 C558.924,37.852 560.59,36.186 560.59,34.131 C560.59,32.076 558.924,30.41 556.869,30.41 M541,60.657 C535.114,60.657 530.342,55.887 530.342,50 C530.342,44.114 535.114,39.342 541,39.342 C546.887,39.342 551.658,44.114 551.658,50 C551.658,55.887 546.887,60.657 541,60.657 M541,33.886 C532.1,33.886 524.886,41.1 524.886,50 C524.886,58.899 532.1,66.113 541,66.113 C549.9,66.113 557.115,58.899 557.115,50 C557.115,41.1 549.9,33.886 541,33.886 M565.378,62.101 C565.244,65.022 564.756,66.606 564.346,67.663 C563.803,69.06 563.154,70.057 562.106,71.106 C561.058,72.155 560.06,72.803 558.662,73.347 C557.607,73.757 556.021,74.244 553.102,74.378 C549.944,74.521 548.997,74.552 541,74.552 C533.003,74.552 532.056,74.521 528.898,74.378 C525.979,74.244 524.393,73.757 523.338,73.347 C521.94,72.803 520.942,72.155 519.894,71.106 C518.846,70.057 518.197,69.06 517.654,67.663 C517.244,66.606 516.755,65.022 516.623,62.101 C516.479,58.943 516.448,57.996 516.448,50 C516.448,42.003 516.479,41.056 516.623,37.899 C516.755,34.978 517.244,33.391 517.654,32.338 C518.197,30.938 518.846,29.942 519.894,28.894 C520.942,27.846 521.94,27.196 523.338,26.654 C524.393,26.244 525.979,25.756 528.898,25.623 C532.057,25.479 533.004,25.448 541,25.448 C548.997,25.448 549.943,25.479 553.102,25.623 C556.021,25.756 557.607,26.244 558.662,26.654 C560.06,27.196 561.058,27.846 562.106,28.894 C563.154,29.942 563.803,30.938 564.346,32.338 C564.756,33.391 565.244,34.978 565.378,37.899 C565.522,41.056 565.552,42.003 565.552,50 C565.552,57.996 565.522,58.943 565.378,62.101 M570.82,37.631 C570.674,34.438 570.167,32.258 569.425,30.349 C568.659,28.377 567.633,26.702 565.965,25.035 C564.297,23.368 562.623,22.342 560.652,21.575 C558.743,20.834 556.562,20.326 553.369,20.18 C550.169,20.033 549.148,20 541,20 C532.853,20 531.831,20.033 528.631,20.18 C525.438,20.326 523.257,20.834 521.349,21.575 C519.376,22.342 517.703,23.368 516.035,25.035 C514.368,26.702 513.342,28.377 512.574,30.349 C511.834,32.258 511.326,34.438 511.181,37.631 C511.035,40.831 511,41.851 511,50 C511,58.147 511.035,59.17 511.181,62.369 C511.326,65.562 511.834,67.743 512.574,69.651 C513.342,71.625 514.368,73.296 516.035,74.965 C517.703,76.634 519.376,77.658 521.349,78.425 C523.257,79.167 525.438,79.673 528.631,79.82 C531.831,79.965 532.853,80.001 541,80.001 C549.148,80.001 550.169,79.965 553.369,79.82 C556.562,79.673 558.743,79.167 560.652,78.425 C562.623,77.658 564.297,76.634 565.965,74.965 C567.633,73.296 568.659,71.625 569.425,69.651 C570.167,67.743 570.674,65.562 570.82,62.369 C570.966,59.17 571,58.147 571,50 C571,41.851 570.966,40.831 570.82,37.631"></path></g></g></g></svg></div><div style="padding-top: 8px;"> <div style=" color:#3897f0; font-family:Arial,sans-serif; font-size:14px; font-style:normal; font-weight:550; line-height:18px;">View this post on Instagram</div></div><div style="padding: 12.5% 0;"></div> <div style="display: flex; flex-direction: row; margin-bottom: 14px; align-items: center;"><div> <div style="background-color: #F4F4F4; border-radius: 50%; height: 12.5px; width: 12.5px; transform: translateX(0px) translateY(7px);"></div> <div style="background-color: #F4F4F4; height: 12.5px; transform: rotate(-45deg) translateX(3px) translateY(1px); width: 12.5px; flex-grow: 0; margin-right: 14px; margin-left: 2px;"></div> <div style="background-color: #F4F4F4; border-radius: 50%; height: 12.5px; width: 12.5px; transform: translateX(9px) translateY(-18px);"></div></div><div style="margin-left: 8px;"> <div style=" background-color: #F4F4F4; border-radius: 50%; flex-grow: 0; height: 20px; width: 20px;"></div> <div style=" width: 0; height: 0; border-top: 2px solid transparent; border-left: 6px solid #f4f4f4; border-bottom: 2px solid transparent; transform: translateX(16px) translateY(-4px) rotate(30deg)"></div></div><div style="margin-left: auto;"> <div style=" width: 0px; border-top: 8px solid #F4F4F4; border-right: 8px solid transparent; transform: translateY(16px);"></div> <div style=" background-color: #F4F4F4; flex-grow: 0; height: 12px; width: 16px; transform: translateY(-4px);"></div> <div style=" width: 0; height: 0; border-top: 8px solid #F4F4F4; border-left: 8px solid transparent; transform: translateY(-4px) translateX(8px);"></div></div></div> <div style="display: flex; flex-direction: column; flex-grow: 1; justify-content: center; margin-bottom: 24px;"> <div style=" background-color: #F4F4F4; border-radius: 4px; flex-grow: 0; height: 14px; margin-bottom: 6px; width: 224px;"></div> <div style=" background-color: #F4F4F4; border-radius: 4px; flex-grow: 0; height: 14px; width: 144px;"></div></div></a><p style=" color:#c9c8cd; font-family:Arial,sans-serif; font-size:14px; line-height:17px; margin-bottom:0; margin-top:8px; overflow:hidden; padding:8px 0 7px; text-align:center; text-overflow:ellipsis; white-space:nowrap;"><a href="https://www.instagram.com/reel/DX8Ww8_MK67/?utm_source=ig_embed&amp;utm_campaign=loading" style=" color:#c9c8cd; font-family:Arial,sans-serif; font-size:14px; font-style:normal; font-weight:normal; line-height:17px; text-decoration:none;" target="_blank">A post shared by Odyssey Movie (@theodysseymovie)</a></p></div></blockquote>]]></description>
      <pubDate>Thu, 16 Jul 2026 10:08:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/the-odyssey-movie-review-nolan-creates-cinematic-history-by-3000-year-old-epic-to-the-screen</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Evil Dead Full Movie Review | ज्यादा खून-खराबा, डर कम... फिल्म ने 'Gore' को ही समझ लिया हॉरर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/evil-dead-full-movie-review-more-bloodshed-less-fear-film-mistook-gore-for-horror]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अगर सिनेमाई पर्दे पर इंसानों को बेरहमी से काटने-छांटने और तड़पाने के नए व अजीबोगरीब तरीके खोजने की कोई प्रतियोगिता होती, तो 'इविल डेड बर्न' (Evil Dead Burn) उसमें निश्चित रूप से गोल्ड मेडल जीतती। फिल्म शुरू होने के कुछ ही मिनटों के भीतर शरीर के अंग हवा में उड़ने लगते हैं, हड्डियां चटकती हैं, मांस उधड़ता है और स्क्रीन पर इतना खून बहता है कि कोई पूरा ब्लड बैंक भी कम पड़ जाए। लेकिन दिक्कत यही है—एक घंटे तक लगातार ऐसा भयावह कत्लेआम देखने के बाद आप डरना या सिहरना बंद कर देते हैं। दिमाग सुन्न हो जाता है और आप बस इस तबाही के खत्म होने का इंतज़ार करने लगते हैं।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/rashmika-mandanna-described-vijay-deverakonda-look-in-ranabaali-as-extremely-scary" target="_blank">Rashmika Mandanna ने Ranabaali में Vijay Deverakonda के लुक को बताया 'बेहद डरावना', तो पति विजय ने सुधारा- बोले 'डरावना नहीं, दिव्य'</a></h3><div><br></div><div><b>भूल गई फ्रैंचाइज़ी का असली मिजाज</b></div><div>'इविल डेड' फ्रैंचाइज़ी की फिल्में कभी भी बहुत सलीके वाली या छुपी हुई नहीं रही हैं। सैम राइमी की कल्ट क्लासिक फिल्मों की यूएसपी ही यही थी—अति का खून-खराबा, भद्दी जुबान बोलने वाली बुरी आत्माएं और सबसे बढ़कर, एक कमाल का डार्क ह्यूमर (अजीबोगरीब कॉमेडी)। पहले की फिल्मों में जब किसी को चेनसा (आरी) से दो हिस्सों में काटा भी जाता था, तो उस पागलपन में एक एंटरटेनमेंट और मज़ा होता था। मेकर और दर्शक दोनों जानते थे कि यह एक मजेदार हॉरर राइड है। अफ़सोस, सेबेस्टियन वैनिएक के निर्देशन में बनी 'इविल डेड बर्न' वह मज़ाक और मिजाज ही भूल गई है।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/will-deepika-padukone-play-the-dream-girl-in-hema-malini-biopic-veteran-actress-expresses" target="_blank">Hema Malini की बायोपिक में 'ड्रीम गर्ल' बनेंगी Deepika Padukone? आलिया-करीना के बजाय सीनियर एक्ट्रेस ने जताई अपनी पसंद</a></h3><div><br></div><div><b>कमजोर माइथोलॉजी और बिखरी कहानी</b></div><div>फिल्म की कहानी एलिस (सोहेला याकूब) के इर्द-गिर्द घूमती है। वह एक दुखी विधवा है, जो न चाहते हुए भी अपने दिवंगत पति के परिवार से मिलने उनके एक सुनसान पुश्तैनी घर पहुंचती है। हॉरर फिल्मों के घिसे-पिटे फॉर्मूले के तहत, यहाँ एक रहस्यमयी अटारी (Attic) है, घर का एक डरावना अतीत है, किरदारों के अपने-अपने राज़ हैं और फिर उम्मीद के मुताबिक, सब लोग बेहद घिनौने तरीके से मरने लगते हैं।</div><div><br></div><div>इस फ्रैंचाइज़ी की सबसे बड़ी ताकत इसकी अपनी एक अनूठी 'माइथोलॉजी' (भूत-प्रेतों और बुराई का इतिहास) रही है, जिसे यहाँ पूरी तरह नजरअंदाज किया गया है, जो दर्शकों को झुंझलाता है। फिल्म यह बताने में नाकाम रहती है कि आखिर इन राक्षसी ताकतों या 'डेडाइट्स' को वापस क्यों और कैसे बुलाया गया। मेकर्स मानकर चल रहे हैं कि दर्शक बिना वजह जाने बस इस अफरातफरी को स्वीकार कर लें।</div><div><br></div><div><b>कत्लेआम की अति, पर हॉरर गायब</b></div><div>तकनीकी तौर पर फिल्म में किसी भी चीज़ की कसर नहीं छोड़ी गई है। हर अगला सीन पिछले से ज़्यादा खूंखार बनाने की कोशिश की गई है। अगर एक डेडाइट किसी का चेहरा कुचल रहा है, तो दूसरा किसी के शरीर को ऐसे फाड़ रहा है जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते। घर के रोजमर्रा के सामान हत्या के हथियार बन जाते हैं। जो लोग शुद्ध रूप से 'स्लैशर' या 'गोर' (Gore) सिनेमा के दीवाने हैं, उनके लिए यह शायद किसी स्वर्ग जैसा हो, लेकिन आम दर्शकों के लिए यह सिरदर्द और थका देने वाला अनुभव बन जाता है।</div><div><br></div><div>समस्या फिल्म की हिंसा नहीं, बल्कि यह है कि हिंसा ही इस फिल्म की पूरी पहचान बन गई है। जब भी स्क्रीनप्ले दुख, अपराध-बोध या टूटे पारिवारिक रिश्तों जैसे इमोशनल पहलुओं को छूने की कोशिश करता है, उससे पहले ही कोई न कोई किरदार बुरी आत्मा के वश में (Possessed) हो जाता है और मार-काट शुरू हो जाती है।</div><div><br></div><div><b>परफॉर्मेंस और डेडाइट्स में फीकापन</b></div><div>मुख्य अभिनेत्री सोहेला याकूब ने इस खूनी खेल के बीच अपने किरदार में थोड़ी इंसानियत और भावनाएं लाने की पूरी कोशिश की है। लेकिन वह ज्यादातर समय अपने आस-पास हो रहे नरसंहार को देखकर सिर्फ सदमे में ही नजर आती हैं। जब स्क्रिप्ट किरदारों को विकसित करने के बजाय स्क्रीन पर आँखें फोड़ने जैसे दृश्यों में ज्यादा दिलचस्पी रखे, तो कोई भी कलाकार भला क्या ही कर सकता है।</div><div><br></div><div>इस बार फिल्म के विलेन यानी 'डेडाइट्स' भी अधूरे लगते हैं। इस फ्रैंचाइज़ी के राक्षस हमेशा से डरावने होने के साथ-साथ थोड़े व्यंग्यात्मक, नाटकीय और मजे लेकर क्रूरता करने वाले रहे हैं। लेकिन 'इविल डेड बर्न' में वे सिर्फ चीखने-चिल्लाने वाली हत्यारी मशीनें बनकर रह गए हैं। उनमें वह यादगार विलेनिक व्यक्तित्व गायब है। नतीजा यह होता है कि कुछ समय बाद हर हत्या एक जैसी लगने लगती है, शॉक वैल्यू खत्म हो जाती है और कोई इमोशनल जुड़ाव नहीं बन पाता।</div><div><br></div><div><b>विजुअल्स और प्रैक्टिकल इफेक्ट्स हैं लाजवाब</b></div><div>ऐसा नहीं है कि फिल्म पूरी तरह खराब है। फिल्म तब सबसे शानदार लगती है जब यह जबरदस्ती डराने की कोशिश छोड़कर थोड़ा थ्रिल पैदा करती है। कार वाला एक एक्शन सीक्वेंस कहानी में गजब का तनाव और रफ्तार लाता है। निर्देशक वैनिएक ने कुछ बेहतरीन 'लॉन्ग टेक्स' (बिना कट के लंबे सीन) फिल्माए हैं, जो उनके विजुअल हुनर को दिखाते हैं। कैमरा खून से सने गलियारों में बेहद आत्मविश्वास के साथ घूमता है, जो इशारा करता है कि इस मार-काट के पीछे एक बेहतरीन हॉरर फिल्म छिपी थी, जिसे स्क्रिप्ट ने दबा दिया।</div><div><br></div><div>इसके अलावा, आज के दौर में जहां हर जगह कंप्यूटर ग्राफिक्स (CGI) का इस्तेमाल होता है, इस फिल्म में पुराने ज़माने के 'प्रैक्टिकल इफेक्ट्स' और मेकअप का जो अद्भुत व घिनौना तालमेल दिखाया गया है, वह तारीफ के काबिल है।</div><div><br></div><div>'इविल डेड बर्न' आपको रोजमर्रा की घरेलू चीजों से जुड़े कम से कम तीन-चार नए डर जरूर दे देगी। लेकिन नकली खून की बहती नदियों और अंतहीन बॉडी हॉरर के नीचे दबी यह फिल्म फ्रैंचाइज़ी का सबसे बुनियादी सबक भूल गई—सिर्फ घिनौना होना ही मनोरंजक होना नहीं होता।</div><div><br></div><div>रेटिंग: 2/5 स्टार</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 13 Jul 2026 16:02:59 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/evil-dead-full-movie-review-more-bloodshed-less-fear-film-mistook-gore-for-horror</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Ikka Movie Review | पुरानी कहानी और पुराने मिजाज में उलझी सनी देओल-अक्षय खन्ना की कोर्टरूम थ्रिलर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/ikka-movie-review-a-courtroom-thriller-starring-sunny-deol-and-akshaye-khanna]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>एक समय था जब बॉलीवुड सस्पेंस से भरी मर्डर मिस्ट्री बनाने में माहिर था। चाहे अब्बास-मस्तान की ज़बरदस्त थ्रिलर हों या 'गुप्त' और 'इत्तेफ़ाक' जैसी फ़िल्में, दर्शक न सिर्फ़ यह जानने में दिलचस्पी रखते थे कि कातिल कौन है, बल्कि यह भी कि घटनाक्रम कैसे आगे बढ़ता है। ऐसी फ़िल्में दर्शकों को आखिर तक उलझाए रखती थीं। लेकिन सिनेमा बदल गया है और आज के दर्शक कहीं ज़्यादा पेचीदा लीगल ड्रामा और बेहतरीन क्राइम थ्रिलर देख चुके हैं। इस वजह से सिद्धार्थ पी. मल्होत्रा ​​की 'इक्का' ऐसी फ़िल्म लगती है जो कम से कम दो दशक देर से आई है।</div><div><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div><div>फिल्म रिव्यू: 'इक्का' (Ikka)</div><div>कलाकार: सनी देओल, अक्षय खन्ना, आकांक्षा रंजन कपूर और अन्य</div><div>निर्देशक: सिद्धार्थ पी मल्होत्रा</div><div><span style="font-size: 1rem;">रेटिंग: 2.5/5</span><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div><div><br></div><div><b>क्या है फिल्म की कहानी?</b></div><div>फिल्म की शुरुआत काफी सस्पेंस के साथ होती है। सोमा (आकांक्षा रंजन कपूर) को शौर्यमान (अक्षय खन्ना) के साथ नाइट आउट एन्जॉय करते देखा जाता है, लेकिन कुछ ही पलों बाद उसे एक तेज रफ्तार लग्जरी कार से बाहर फेंक दिया जाता है। सड़क किनारे गंभीर रूप से घायल मिली सोमा का यह मामला देखते ही देखते रसूख, राजनीति और सत्ता के खेल में बदल जाता है।</div><div><br></div><div>तभी एंट्री होती है अर्जुन (सनी देओल) की, जो एक मशहूर डिफेंस लॉयर (बचाव पक्ष के वकील) हैं। अर्जुन अदालत में उसी नैतिक दृढ़ता के साथ कदम रखते हैं, जिसने कभी फिल्म 'दामिनी' में उनके किरदार को आइकॉनिक बनाया था। अपने शुरुआती तर्कों में वे बात करते हैं कि कैसे ताकत और क्लास अक्सर न्याय को प्रभावित करते हैं। वे वकीलों की उस छवि पर भी प्रहार करते हैं जिसमें माना जाता है कि वकील सिर्फ पैसे के पीछे भागते हैं। फिल्म का एक डायलॉग ध्यान खींचता है— "कानून और न्याय हमेशा एक जैसे नहीं होते।"</div><div><br></div><div>इसके समानांतर अर्जुन की निजी जिंदगी की कहानी चलती है। उनकी बेटी, जो एक होनहार तैराक (Swimmer) है, एक महत्वपूर्ण सिलेक्शन ट्रायल के दौरान अचानक उसकी नाक से खून बहने लगता है। अगर आपने 90 के दशक की बॉलीवुड फिल्में देखी हैं, तो डॉक्टर के यह कहते ही कि उसे एक जानलेवा बीमारी है और इलाज के लिए माता-पिता में से किसी एक के स्टेम सेल्स की जरूरत होगी, आप अगली पूरी कहानी का अंदाजा आसानी से लगा लेंगे।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/locarno-film-festival-2026-|naseeruddin-shah-punjabi-film-rahmat-selected-for-the-main-competition" target="_blank">Locarno Film Festival 2026 | मुख्य कॉम्पिटिशन में शामिल हुई Naseeruddin Shah स्टारर पंजाबी फिल्म 'रहमत', 'गोल्डन लेपर्ड' पर नजर</a></h3><div><br></div><div><b>पुराना मिजाज और किरदारों का टकराव</b></div><div>फिल्म में यह देखना काफी अजीब और थोड़ा हास्यास्पद है कि इस उम्र में अक्षय खन्ना एक शक्तिशाली राजनेता के बिगड़ैल बेटे का किरदार निभा रहे हैं। वह एक ऐसा प्रिविलेज्ड मैन-चाइल्ड है जो रातों को दूसरी महिलाओं के साथ पार्टियां करता है, जबकि उसकी पत्नी घर पर उसका इंतजार करती है। जब उसका केस अर्जुन के पास आता है, तो अतीत के कुछ कड़वे अनुभवों के कारण अर्जुन पहले तो मना कर देते हैं, लेकिन बेटी के इलाज के हालात उन्हें यह केस लड़ने पर मजबूर कर देते हैं। इसके बाद शुरू होती है व्यक्तिगत इतिहास और सबूतों के बीच की कोर्टरूम जंग।</div><div><br></div><div>फिल्म एक दिलचस्प मोड़ तब लेती है जब सनी देओल का किरदार एक कथित बलात्कारी का केस लड़ रहा होता है। लेकिन 'दामिनी' की ही तरह, अर्जुन अपनी टीम को पीड़िता के चरित्र हनन की इजाजत नहीं देते। जब एक गवाह ऐसा करने की कोशिश करता है, तो सनी देओल अपने सिग्नेचर 'एंग्री यंग मैन' मोड में आ जाते हैं और अदालत में उनका चिल्लाना दर्शकों को सीधे 90 के दशक के सिनेमा की याद दिला देता है।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/anupam-kher-first-look-from-shri-rambhumi-revealed-he-will-play-the-role-of-ashok-singhal" target="_blank">'श्री रामभूमि' से Anupam Kher का फर्स्ट लुक आया सामने: फिल्म में निभाएंगे Ashok Singhal का किरदार, अभिनेता ने बताया बड़ी जिम्मेदारी</a></h3><div><br></div><div>दूसरी तरफ, अक्षय खन्ना को देखकर ऐसा लगता है कि मानो उनके पुराने 'रहमान डकैत' वाले किरदार को ही इस फिल्म में डाल दिया गया हो। वही डार्क वार्डरोब, बात करने के बीच में ठहराव, तिरछी नजरें, थोड़ा झुककर चलना और हर वक्त का अहंकार। एक सीन में तो बैकग्राउंड डांसर उनका वही पुराना वायरल डांस स्टेप करता दिखता है, जिससे साफ है कि मेकर्स उनके पुराने स्क्रीन स्वैग को भुनाना चाहते थे।</div><div><b><br></b></div><div><b>निर्देशन और स्क्रीनप्ले में कहां रह गई कमी?</b></div><div>फिल्म अपने आखिरी घंटे में कई ट्विस्ट और टर्न्स लाती है और दर्शकों को हर देखे हुए सीन पर शक करने को मजबूर करती है। लेकिन स्क्रीनप्ले इन खुलासों को जितना मास्टरस्ट्रोक दिखाना चाहता है, दर्शक उन्हें बहुत पहले ही भांप लेते हैं। यहां तक कि क्लाइमेक्स, जिसे बेहद चौंकाने वाला बनाने की कोशिश की गई थी, पूरी तरह प्रेडिक्टेबल (अनुमानित) साबित होता है।</div><div><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div><div><span style="font-size: 1rem;">डायरेक्टर सिद्धार्थ पी. मल्होत्रा ​​एक ही फिल्म में बहुत कुछ भरने की कोशिश करते हैं। इसमें कोर्टरूम ड्रामा, मर्डर मिस्ट्री, परिवार का इमोशनल पहलू और यहाँ तक कि विशेषाधिकार और न्याय पर टिप्पणी भी है। अलग-अलग तौर पर देखें तो हर आइडिया अच्छा है, लेकिन एक साथ वे ध्यान खींचने के लिए होड़ करते हैं। फिल्म यह तय किए बिना कि वह असल में क्या बनना चाहती है, बार-बार अपनी दिशा बदलती रहती है, जिससे कहानी दिलचस्प लगने के बजाय बिखरी-बिखरी सी लगती है।</span></div><div><div><br></div><div>जैसा कि इसके टाइटल से पता चलता है, फिल्म को लगता है कि उसके पास आखिर तक 'इक्का' (सबसे मज़बूत पत्ता) है। बदकिस्मती से, जब तक वह पत्ता टेबल पर आता है, दर्शक पहले ही बाज़ी समझ चुके होते हैं। शानदार कास्ट और दिलचस्प कहानी के बावजूद, मल्होत्रा ​​की थ्रिलर कभी भी जीत दिलाने वाला दांव नहीं चल पाती। जो फिल्म एक दिलचस्प लीगल थ्रिलर बन सकती थी, वह आखिर में एक जानी-पहचानी कहानी और बहुत आसानी से अंदाज़ा लगाने लायक अंत वाली फिल्म बनकर रह जाती है।</div></div><div><br></div><div>क्यों देखें: अगर आप सनी देओल के पुराने 'दामिनी' वाले अंदाज और अक्षय खन्ना के विलेन वाले तेवर के शौकीन हैं, तो इसे एक बार देख सकते हैं।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 10 Jul 2026 13:36:27 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/ikka-movie-review-a-courtroom-thriller-starring-sunny-deol-and-akshaye-khanna</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Alpha Movie Review: आलिया-शरवरी का धमाकेदार एक्शन, बॉबी देओल का खौफ, पर क्या कहानी में है दम?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/alpha-movie-review-alia-and-sharvari-explosive-action]]></guid>
      <description><![CDATA[<div><span style="font-size: 1rem;">जब यशराज फिल्म्स (YRF) ने अपनी ब्लॉकबस्टर स्पाई यूनिवर्स में पहली महिला-प्रधान (Female-led) एक्शन फिल्म बनाने की घोषणा की, तो सिनेमा प्रेमियों का उत्साह सातवें आसमान पर था। 'टाइगर', 'पठान' और 'वॉर' जैसी बड़ी फ्रेंचाइजी के बाद आलिया भट्ट और शरवरी का 'अल्फा' के तौर पर सामने आना एक बड़ा दांव था। कई बदलावों के बाद आखिरकार फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। कागजों पर यह फिल्म एक ऑल-टाइम ब्लॉकबस्टर नजर आती है, लेकिन क्या पर्दे पर यह मिशन कामयाब रहा? आइए विस्तार से जानते हैं।</span></div><div><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/taj-mahal-tejo-mahalaya-survey-row" target="_blank">Jan Gan Man : Taj Mahal है या Tejo Mahalaya ? अदालत के रुख के बाद बंद कमरों का सच सामने आने की उम्मीद बढ़ी!</a></h3><div><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div><div>मूवी रिव्यू: 'अल्फा' (Alpha)</div><div>कलाकार: आलिया भट्ट, शरवरी, बॉबी देओल, अनिल कपूर, दिव्येंदु भट्टाचार्य और ऋतिक रोशन (कैमियो)</div><div>निर्देशक: शिव रवैल</div><div>फ्रेंचाइजी: YRF स्पाई यूनिवर्स</div><div>रेटिंग: 2.5/5 स्टार</div><div><br></div><div><b>कहानी (स्पॉइलर अलर्ट)</b></div><div>फिल्म की कहानी फतेह सिंह लखावत (बॉबी देओल) से शुरू होती है, जो बेहद बेरहम और क्रूर है। वह सीता (आलिया भट्ट) का अपहरण कर लेता है और उसे भावनाओं से परे एक 'लैब रैट' की तरह पालता है। लखावत सीता पर एक प्रायोगिक 'अल्फा ड्रग' का परीक्षण करता है, जिसे सैनिकों के घावों को तेजी से भरने और उनकी मानवीय समझ को सुपर-ह्यूमन स्तर पर ले जाने के लिए बनाया गया है। इस ड्रग के असर से सीता एक निडर 'किलिंग मशीन' बन जाती है।</div><div><br></div><div>कहानी में नया मोड़ तब आता है जब दुर्गा (शरवरी) की एंट्री होती है। दुर्गा किसी तरह सीता को शांत करने और उससे संवाद स्थापित करने में सफल होती है। आगे बढ़ते हुए दोनों के हाथ लखावत की जिंदगी का एक गहरा और काला राज लगता है। क्या ये दोनों महिला एजेंट मिलकर लखावत के इस साम्राज्य को ध्वस्त कर पाती हैं? यही फिल्म का मुख्य आधार है।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/pm-modi-major-statement-in-indonesia-cooperation-in-the-indian-ocean-will-heighten-china-anxiety" target="_blank">Indonesia में PM Modi का बड़ा बयान, Indian Ocean में सहयोग से बढ़ेगी China की टेंशन!</a></h3><div><br></div><div><b>अभिनय और परफॉर्मेंस</b></div><div>आलिया भट्ट: फिल्म की मुख्य कमान आलिया के कंधों पर है। इसमें कोई शक नहीं कि वह इस दौर की बेहतरीन अभिनेत्रियों में से हैं। हालांकि, फिल्म की शुरुआत में एक खतरनाक और रफ-टफ एक्शन स्टार के रूप में उन्हें स्वीकार करने में थोड़ा समय लगता है। अंत तक आते-आते वह इस रूप में ढल जाती हैं और उनका एक्शन अवतार प्रभावित करने लगता है, फिर भी उनके प्रदर्शन में कहीं न कहीं कुछ कमी जरूर अखरती है।</div><div><br></div><div>शरवरी: फिल्म में शरवरी को आलिया के मुकाबले काफी कम स्क्रीन टाइम मिला है, जो थोड़ा खटकता है। इसके बावजूद वह अपने हिस्से आए हर सीन में गहरी छाप छोड़ती हैं। एक्शन दृश्यों में वह बेहद उग्र, दमदार और प्रभावशाली नजर आई हैं।</div><div><br></div><div>बॉबी देओल: 'एनिमल' के बाद बॉबी देओल ने एक बार फिर साबित किया है कि उन्हें विलेन के किरदारों में मजा आने लगा है। फतेह सिंह लखावत के रूप में वह स्क्रीन पर बेहद खूंखार और डरावने लगे हैं। उनका स्क्रीन प्रेजेंस कमाल का है।</div><div><br></div><div>अनिल कपूर और दिव्येंदु: रॉ (RAW) चीफ विक्रांत कौल के रूप में अनिल कपूर ने अपने अनुभव से फिल्म में भावनात्मक गहराई जोड़ी है। एक पिता का दर्द उनके चेहरे पर साफ दिखता है। वहीं, साइंटिस्ट बने दिव्येंदु भट्टाचार्य छोटे से रोल में भी प्रभावित करते हैं, काश मेकर्स ने उनके लिए कुछ और दृश्य लिखे होते।</div><div><br></div><div>ऋतिक रोशन (सरप्राइज पैकेज): फिल्म का सबसे बड़ा हाईपॉइंट 'वॉर' के कबीर (ऋतिक रोशन) की एंट्री है। कबीर के पर्दे पर आते ही थिएटर तालियों से गूंज उठता है। उनका एक्शन और 'अल्फा' गर्ल्स के साथ मिलकर दुश्मनों को धूल चटाना फिल्म का बेस्ट पार्ट है।</div><div><br></div><div><b>निर्देशन, विजुअल्स और म्यूजिक</b></div><div>'द रेलवे मेन' से चर्चा में आए निर्देशक शिव रवैल ने इस बार सीधे बड़े बजट के एक्शन जॉनर में हाथ आजमाया है। उन्हें एक्शन की बारीकियों की अच्छी समझ है। लड़ाई के दृश्यों में 'शेकी कैमरावर्क', लो-एंगल शॉट्स और क्लोज-अप्स का उनका विजुअल चयन बेहतरीन है, जो फिल्म के बेहद औसत स्क्रीनप्ले (पटकथा) को काफी हद तक सहारा देता है।</div><div><br></div><div>फिल्म में संवाद (डायलॉग्स) बहुत कम रखे गए हैं और कहानी को एक्शन के जरिए आगे बढ़ने दिया गया है, जो इसे थोड़ा वास्तविक टच देता है। फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर (म्यूजिक) काफी लाउड और दमदार है, जो आलिया और शरवरी के गन-फाइट सीन्स में रोमांच को दोगुना कर देता है।</div><div><br></div><div><b>आखिरी फैसला</b></div><div>'अल्फा' बॉलीवुड की पहली महिला-प्रधान स्पाई फिल्म होने के नाते एक सराहनीय और सही दिशा में उठाया गया कदम है। यह फिल्म विजुअली बहुत भव्य और महंगी लगती है। एक्शन सीन्स और अदाकारों की एक्टिंग में कोई कमी नहीं है।</div><div><br></div><div>लेकिन, इन सबके बीच फिल्म एक ऐसी मजबूत और यादगार कहानी देने से चूक जाती है जो दर्शकों के दिलों में घर कर सके। धमाकों, यूनिवर्स बिल्डिंग और कैमियो के शोर में फिल्म की मूल आत्मा कहीं खो जाती है। 'अल्फा' एक अच्छा प्रयास जरूर है, लेकिन यह अपने मिशन को उतने असरदार तरीके से पूरा नहीं कर पाई, जिसकी उम्मीद की जा रही थी। यह एक बार देखी जाने वाली औसत एक्शन फिल्म बनकर रह जाती है।<br></div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 07 Jul 2026 16:09:23 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/alpha-movie-review-alia-and-sharvari-explosive-action</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Baby Do Die Do Review: बिना बोले Huma Qureshi ने आँखों से लिखा अभिनय का नया व्याकरण, चंकी पांडे का खौफनाक ट्रांसफॉर्मेशन]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/baby-do-die-do-review-without-uttering-a-word-huma-qureshi-has-written-a-new-grammar]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पारंपरिक मसाला फिल्मों और घिसी-पिटे थ्रिलर फॉर्मूलों से अलग जब कोई सिनेमा अपनी एक नई राह चुनने का जोखिम उठाता है, तो सिनेप्रेमियों का ध्यान उसकी तरफ खिंचा चला आता है। इस शुक्रवार बड़े पर्दे पर रिलीज हुई निर्देशक नचिकेत सामंत की फिल्म 'बेबी डू डाई डू' (Baby Do Die Do) हिंदी सिनेमा के इसी ढर्रे को तोड़ने का एक साहसिक प्रयास है।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">फिल्म का शीर्षक पहली बार सुनने में थोड़ा अजीब या उलझा हुआ लग सकता है, लेकिन कहानी की गहराई में उतरते ही इसका गणित साफ हो जाता है। दरअसल, यह नाम मुख्य किरदार 'बेबी करमरकर' के उपनाम से निकला है—'कर-मर-कर' (Kar-Mar-Kar) यानी 'डू, डाई, डू' (Do, Die, Do)। 2 घंटे 5 मिनट की यह 'A' सर्टिफाइड एक्शन-क्राइम-थ्रिलर पल्प फिक्शन और डार्क ह्यूमर की एक ऐसी अनोखी दुनिया रचती है, जहां खामोशी की गूंज हथियारों की आवाज से कहीं ज्यादा तेज है।</span></div><div><b><br></b></div><div><b>कहानी: अतीत का स्याह साया और छाते वाली 'हिटवुमन'</b></div><div>फिल्म की शुरुआत किसी शोर-शराबे से नहीं, बल्कि एक डरावनी खामोशी से होती है। मुख्य किरदार 'बेबी' (हुमा कुरैशी) न तो बोल सकती है और न ही सुन सकती है। बचपन में एक अनजाने सफर के दौरान बेबी अपनी जुड़वां बहन के साथ एक खाली आलीशान फाइव-स्टार होटल में दाखिल हो जाती है, जहां दोनों बहनें अनजाने में एक खौफनाक मर्डर की चश्मदीद बन जाती हैं। बेरहम कातिल बेबी की जुड़वां बहन का गला घोंटकर उसे मौत के घाट उतार देता है, जबकि बेबी किसी तरह अपनी जान बचाकर भाग निकलती है। एक शराबी पिता के साये में पली-बढ़ी बेबी के सीने में उस रात बदले की जो चिंगारी सुलगती है, वह उसे एक सामान्य जीवन से बहुत दूर ले जाती है।</div><div><br></div><div>बड़ी होने पर बेबी का सामना पीएम जैन (चंकी पांडे) से होता है, जो उसे कॉन्ट्रैक्ट किलिंग (सुपारी लेकर हत्या करने) के स्याह और बेरहम अंडरवर्ल्ड में ले आता है। अपनी शारीरिक अक्षमता को कमजोरी बनाने के बजाय बेबी उसे अपनी सबसे बड़ी ढाल बना लेती है और इस अपराध जगत की सबसे अचूक 'हिटवुमन' बनकर उभरती है।</div><div><br></div><div>कातिलाना अंदाज: बेबी का मर्डर करने का तरीका बेहद जुदा है। वह किसी पारंपरिक गन या चाकू के बजाय एक विशेष रूप से डिजाइन किए गए 'छाते' (Umbrella) का इस्तेमाल करती है, जो देखने में जितना साधारण है, एक्शन में उतना ही जानलेवा।</div><div><br></div><div>शहर में एक के बाद एक होने वाली हाई-प्रोफाइल हत्याएं पुलिस महकमे को हिलाकर रख देती हैं। हालांकि, बेबी का असली मकसद सिर्फ एक पेशेवर कातिल बने रहना नहीं है; वह तो उस बड़े कॉर्पोरेट और क्रिमिनल नेक्सस को भेदकर अपनी बहन के असली कातिल तक पहुंचना चाहती है। इसी बीच उसकी जिंदगी में प्यार की दस्तक होती है, और कहानी प्रतिशोध से आगे बढ़कर पहचान, जज्बात और मुक्ति के मुहाने पर जा खड़ी होती है।</div><div><b><br></b></div><div><b>अभिनय: हुमा की खामोशी दमदार, चंकी पांडे का सरप्राइज पैकेज</b></div><div>हुमा कुरैशी (बेबी): यह फिल्म पूरी तरह से हुमा के कंधों पर टिकी है और यह उनके करियर की सबसे परिपक्व परफॉर्मेंस है। बिना एक भी शब्द बोले, सिर्फ अपनी आंखों के उतार-चढ़ाव, चेहरे की सूक्ष्म रेखाओं और सधी हुई बॉडी लैंग्वेज से उन्होंने बेबी के दर्द और आक्रोश को जीवंत कर दिया है। पर्दे पर बिना किसी लाउड मेकअप के खुद को पेश करने का उनका फैसला किरदार को बेहद वास्तविक (Raw) बनाता है। वह एक पल में क्रूर शूटर तो दूसरे ही पल एक संवेदनशील प्रेमी के रूप में ढल जाती हैं।</div><div><br></div><div><b>चंकी पांडे (पीएम जैन): </b>चंकी पांडे इस फिल्म के सबसे बड़े 'सरप्राइज पैकेज' हैं। अपनी पुरानी कॉमिक छवि को पूरी तरह ध्वस्त करते हुए उन्होंने अंडरवर्ल्ड के एक शांत, गंभीर और बेहद क्रूर गैंग लीडर के रूप में स्क्रीन पर खौफ पैदा किया है।</div><div><br></div><div><b>सिकंदर खेर (ज़फ़र):</b> एक चालाक और लालची बिल्डर के निगेटिव रोल में सिकंदर खेर ने अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराई है, जो कहानी के तनाव को और गहरा करती है।</div><div><b><br></b></div><div><b>सीमा पाहवा (DCP अंजुम खान): </b>अनुभवी सीमा पाहवा ने हमेशा की तरह बेहद स्वाभाविक अभिनय किया है। उनका एक संवाद—"हम पुलिस हैं, हीरो नहीं"—फिल्म के यथार्थवादी मिजाज को बखूबी बयां करता है।</div><div><br></div><div>रचित सिंह (सिद्धू): बेबी के प्रेमी 'सिद्धू' के रूप में रचित सिंह काफी ईमानदार लगे हैं। उनका किरदार पारंपरिक और टॉक्सिक मस्कुलर हीरो जैसा नहीं है, बल्कि वह एक 'घरेलू' और केयरिंग पार्टनर होने में गर्व महसूस करते हैं। ब्लैक-एंड-व्हाइट फ्लैशबैक दृश्यों में हुमा और उनके बीच का रोमांस फिल्म की हिंसा के बीच ताजी हवा के झोंके जैसा है।</div><div><br></div><div>इसके अलावा विद्या मालवड़े, हिमांशु मलिक, रूपेश बाने, अरुण कुशवाहा और मरुधर शेखावत ने अपने छोटे लेकिन दिलचस्प किरदारों के साथ पूरा न्याय किया है।</div><div><br></div><div><b>निर्देशन और तकनीकी पक्ष: शानदार 'नॉयर' ट्रीटमेंट</b></div><div>निर्देशक नचिकेत सामंत ने एक बेहद संवेदनशील और बोल्ड विषय को कमर्शियल मनोरंजन के सांचे में बेहतरीन तरीके से ढाला है। वह मुंबई के क्राइम नेटवर्क को बेवजह का ग्लैमर देने के बजाय एक ऐसे ऑर्गनाइज़्ड सिस्टम के रूप में दिखाते हैं, जहां हिंसा महज एक बिजनेस डील है। फिल्म की रफ्तार तेज है, जो दर्शकों को बांधकर रखती है।</div><div><br></div><div><b>Baby Do Die Do: डार्क ह्यूमर, नॉयर ट्रीटमेंट और दमदार डायरेक्शन</b></div><div>डायरेक्टर नचिकेत सामंत ने एक बोल्ड और संवेदनशील विषय को पूरी तरह से कमर्शियल और मनोरंजक फॉर्मेट में ढालने की कोशिश की है। वे मुंबई के क्राइम नेटवर्क को बहुत ज़्यादा ग्लैमरस या काल्पनिक नहीं, बल्कि एक ऐसे ऑर्गनाइज़्ड सिस्टम के तौर पर दिखाते हैं जहाँ हिंसा एक बिज़नेस डील की तरह काम करती है। डार्क कॉमेडी, सस्पेंस और एक्शन के बीच बैलेंस बनाने की डायरेक्टर की कोशिश काफी हद तक सफल रही है। फिल्म शुरू से ही तेज़ रफ़्तार बनाए रखती है, जिससे दर्शक कभी बोर नहीं होते।</div><div><br></div><div>तकनीकी तौर पर फिल्म काफी शानदार है। टोजो ज़ेवियर की सिनेमैटोग्राफी फिल्म की एक और बड़ी खूबी है। वे मुंबई की बारिश से भीगी सड़कों, तंग गलियों और कम रोशनी वाले कमरों को क्लासिक नॉयर सिनेमा के अंदाज़ में दिखाते हैं, जिससे पूरे समय एक रहस्यमयी और इंटेंस माहौल बना रहता है। मुंबई शहर खुद कहानी में एक खामोश किरदार की तरह उभरता है। एडिटिंग कसी हुई है, जिससे कहानी कहीं भी बेवजह खिंचती नहीं है। एक्शन सीक्वेंस बहुत स्टाइलिश तरीके से कोरियोग्राफ किए गए हैं, खासकर मुंबई लोकल ट्रेन के अंदर फिल्माया गया मर्डर सीक्वेंस, जो बेहद डरावना और रोंगटे खड़े कर देने वाला है। बैकग्राउंड स्कोर और म्यूज़िक सीन के असर को बढ़ाते हैं, और गानों को कहानी में इस तरह पिरोया गया है कि वे कहानी के बहाव में रुकावट नहीं डालते।</div><div><br></div><div>इसके अलावा, फिल्म में कुछ दिलचस्प समकालीन सिनेमाई रेफरेंस भी शामिल हैं, जैसे 'अल्फा' का ज़िक्र और साकिब सलीम वाला 'अल्फा Q' नाम का क्वीर क्लब नंबर। फिल्म में सोनाक्षी सिन्हा से जुड़ा एक स्मार्ट 'ईस्टर एग' भी है।</div><div><br></div><div><b>Baby Do Die Do: 'Baby' कहाँ कमज़ोर पड़ गई?</b></div><div>इतनी खूबियों के बावजूद, 'Baby Do Die Do' में कुछ कमियां भी हैं। पहले हाफ में सेटअप बनाने में काफी समय लगता है और 'Baby' के सामने आने वाली चुनौतियां काफी देर से सामने आती हैं, जो थोड़ा सुस्त लग सकता है। हालांकि, अगर आप शुरुआती 10-12 मिनट की उस सुस्ती को झेल लेते हैं, तो कहानी बाद में कहीं भी निराश नहीं करती।</div><div><br></div><div>इसके अलावा, फिल्म ऐसे मोड़ पर खत्म होती है जहाँ पार्ट 2 की गुंजाइश बनती है। हालांकि, यह ट्विस्ट शायद ज़रूरी नहीं था। वजह यह है कि जिस मकसद के लिए 'Baby' क्रिमिनल बनी थी - बदला लेने की उसकी इच्छा - वह पहले ही पूरा हो चुका है। ऐसे में, दूसरे हिस्से में उसका कोई निजी मकसद नहीं रह जाता और वह सिर्फ़ इसलिए अपराध करती रहती है क्योंकि अपराध की दुनिया में एक बार घुसने के बाद, पीछे मुड़ने का कोई रास्ता नहीं होता। यह पूरी तरह से कमर्शियल कोशिश ज़्यादा लगती है।</div><div><br></div><div><b>बेबी डू डाई डू: फ़िल्म की खास बातें</b></div><div>फ़िल्म हर पल सस्पेंस बनाए रखती है और आखिर तक यह अंदाज़ा लगाना मुश्किल होता है कि आगे क्या होगा। दूसरे हाफ़ में सस्पेंस धीरे-धीरे खुलता है। फ़िल्म का दूसरा हाफ़ बहुत अच्छे से लिखा गया है और इसमें कई ट्विस्ट हैं। क्लाइमैक्स फ़िल्म का सबसे मज़बूत हिस्सा है; यह आपको हैरान कर सकता है और ऐसा एहसास दिलाता है कि "हमने इसकी उम्मीद नहीं की थी"।</div><div><br></div><div>सिनेमैटोग्राफ़ी बेहतरीन है; पानी की बूंदों के टपकने से लेकर लंबे शॉट्स तक, सब कुछ शानदार ढंग से शूट किया गया है।</div><div><b><br></b></div><div><b>बेबी डू डाई डू: फ़ाइनल वर्डिक्ट</b></div><div>कमियों के बावजूद, ‘बेबी डू डाई डू’ एक बहुत ईमानदार, बोल्ड और मनोरंजक थ्रिलर फ़िल्म है। इस फ़िल्म की एक बड़ी खासियत यह है कि ऐसे दौर में जब महिलाओं पर केंद्रित एक्शन फ़िल्में अक्सर सीधे OTT प्लेटफ़ॉर्म पर रिलीज़ होती हैं, इसके मेकर्स (साकिब सलीम) ने इसे सिनेमाघरों में रिलीज़ करने का साहस दिखाया। यह फ़िल्म साबित करती है कि मेनस्ट्रीम हिंदी सिनेमा में नए विचारों और प्रयोगों के लिए अभी भी जगह है।</div><div><br></div><div>अगर आपको पारंपरिक, फ़ॉर्मूला-बेस्ड मसाला फ़िल्मों से कुछ अलग, स्टाइलिश, थोड़ी डार्क और सस्पेंस से भरपूर फ़िल्में देखना पसंद है, तो आपको हुमा कुरैशी के शांत लेकिन दमदार अवतार को देखने के लिए ज़रूर सिनेमाघर जाना चाहिए। यह फ़िल्म निश्चित रूप से आपकी वॉचलिस्ट में जगह पाने की हकदार है।</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 03 Jul 2026 14:30:28 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/baby-do-die-do-review-without-uttering-a-word-huma-qureshi-has-written-a-new-grammar</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[बिना स्टार पावर, बिना शोर-शराबा... थियेटर्स में इन 5 फिल्मों ने ऐसे पलटी बाजी कि हिल गया पूरा बॉलीवुड!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/these-5-films-turned-the-tide-in-theatres-so-dramatically-that-entire-bollywood-industry-shaken]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारतीय बॉक्स ऑफिस पर अकसर बड़ी स्टार पावर और करोड़ों के मार्केटिंग बजट वाली फिल्मों का शोर रहता है। लेकिन सिनेमा का इतिहास गवाह है कि बॉक्स ऑफिस की असली बाजी हमेशा ओपनिंग वीकेंड तय नहीं करता। कई बार कुछ फिल्में बिना किसी शोर-शराबे के सिनेमाघरों में कदम रखती हैं और केवल अपनी दमदार कहानी के दम पर दर्शकों के दिलों में जगह बना लेती हैं। सिनेमा की भाषा में इन्हें 'स्लीपर हिट' (Sleeper Hit) कहा जाता है।</div><div><br></div><div>'क्वीन' से लेकर हालिया रिलीज़ 'मैं वापस आऊंगा' तक, ऐसी कई फिल्में हैं जिन्होंने साबित किया कि यदि कहानी में दम हो, तो 'पॉजिटिव वर्ड ऑफ माउथ' (दर्शकों की अच्छी राय) बॉक्स ऑफिस पर बड़े-से-बड़े रिकॉर्ड को भी पछाड़ सकता है। आइए नजर डालते हैं ऐसी ही 5 शानदार फिल्मों के बॉक्स ऑफिस सफर पर:</div><div><br></div><div><b>1. क्वीन (2014)</b></div><div>जब मार्च 2014 में विकास बहल के निर्देशन में बनी 'क्वीन' रिलीज हुई थी, तो किसी ने नहीं सोचा था कि यह फिल्म भारतीय सिनेमा की सबसे यादगार फिल्मों में शुमार हो जाएगी। कंगना रनौत स्टारर इस फिल्म की शुरुआत बेहद ठंडी और साधारण रही थी। लेकिन जैसे-जैसे लोगों ने 'रानी' की पेरिस यात्रा और खुद को खोजने के सफर (Self-discovery) को देखा, सिनेमाघरों में भीड़ बढ़ने लगी।</div><div><br></div><div>बॉक्स ऑफिस कलेक्शन: Sacnilk के आंकड़ों के अनुसार, इस फिल्म ने भारत और विदेशों को मिलाकर कुल ₹78.90 करोड़ की शानदार कमाई की और एक कल्ट क्लासिक स्लीपर हिट बनी।</div><div><br></div><div><b>2. बदलापुर (2015)</b></div><div>अकसर चॉकलेट बॉय की भूमिका निभाने वाले वरुण धवन को जब निर्देशक श्रीराम राघवन ने 'बदलापुर' में एक बेहद डार्क और एग्रेसिव लुक में पेश किया, तो शुरुआत में दर्शकों ने थोड़ा संकोच दिखाया। फरवरी 2015 में आई इस रिवेंज ड्रामा को कोई धमाकेदार ओपनिंग नहीं मिली थी। हालांकि, फिल्म के कड़े सस्पेंस और वरुण धवन-नवाजुद्दीन सिद्दीकी की बेजोड़ एक्टिंग की बदौलत फिल्म ने लंबी रेस का घोड़ा साबित होने का तमगा हासिल किया।</div><div><br></div><div>बॉक्स ऑफिस कलेक्शन: Sacnilk की रिपोर्ट के मुताबिक, मजबूत माउथ पब्लिसिटी के दम पर फिल्म ने भारत में ₹52 करोड़ (नेट) का बेहतरीन बिजनेस किया।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/ketan-siya-case-5-films-where-love-turns-deadly" target="_blank">Pune का 'खूनी' लव ट्रायंगल! इन 5 Bollywood फिल्मों में भी पत्नी ने दिया पति को धोखा और मौत, OTT पर देखें ये फिल्में</a></h3><div><br></div><div><b>3. दम लगा के हईशा (2015)</b></div><div>यशराज फिल्म्स के बैनर तले बनी इस फिल्म की रिलीज से पहले मार्केट में कोई खास बज़ या चर्चा नहीं थी। फरवरी 2015 में रिलीज हुई इस फिल्म ने आयुष्मान खुराना के साथ भूमि पेडनेकर को बॉलीवुड में लॉन्च किया। 90 के दशक के हरिद्वार की पृष्ठभूमि और एक अनूठे पारिवारिक ताने-बाने पर आधारित इस कहानी को दर्शकों ने धीरे-धीरे अपना प्यार देना शुरू किया। वीकेंड के बाद जहां बड़ी फिल्में दम तोड़ देती हैं, वहीं इसने अपनी रफ्तार बढ़ाई।</div><div><br></div><div>बॉक्स ऑफिस कलेक्शन: दर्शकों की बेहतरीन सिफारिशों की बदौलत फिल्म ने दुनियाभर में ₹42.79 करोड़ का कलेक्शन किया।</div><div><br></div><div><b>4. 12th फेल (2023)</b></div><div>विधु विनोद चोपड़ा के निर्देशन में बनी '12th फेल' हाल के वर्षों में 'स्लीपर हिट' का सबसे सटीक और सबसे बड़ा उदाहरण है। अक्टूबर 2023 में जब यह फिल्म थियेटर्स में आई, तो इसके सामने कई बड़ी कमर्शियल फिल्में चुनौती बनकर खड़ी थीं। विक्रांत मैसी स्टारर इस फिल्म की ओपनिंग बेहद धीमी थी, लेकिन सोशल मीडिया और आम जनता के बीच इसके रिव्यू इतने शानदार रहे कि यह फिल्म हफ्तों तक सिनेमाघरों से उतरी ही नहीं।</div><div><br></div><div>बॉक्स ऑफिस कलेक्शन: Sacnilk के अनुसार, फिल्म का वर्ल्डवाइड कलेक्शन ₹67 करोड़ रहा, जिसने शुरुआती अनुमानों को पूरी तरह गलत साबित कर दिया।</div><div><br></div><div><b>5. मैं वापस आऊंगा (2026)</b></div><div>हाल ही में जून 2026 में रिलीज हुई फिल्म 'मैं वापस आऊंगा' भी इसी जादुई ट्रेंड पर आगे बढ़ती दिख रही है। रिलीज के पहले तीन दिनों (ओपनिंग वीकेंड) में फिल्म का बिजनेस काफी सुस्त था और कयास लगाए जा रहे थे कि फिल्म फ्लॉप हो जाएगी। लेकिन दमदार स्क्रीनप्ले और इमोशनल कनेक्ट के कारण दर्शकों ने इसे हाथों-हाथ लिया और वर्किंग डेज में फिल्म की कमाई में भारी उछाल देखा गया।</div><div><br></div><div>बॉक्स ऑफिस कलेक्शन: Sacnilk के ताजा आंकड़ों के अनुसार, फिल्म अब तक भारत में ₹41.80 करोड़ से ज्यादा की कमाई कर चुकी है। चूंकि फिल्म अभी भी थियेटर्स में मजबूती से टिकी हुई है, इसलिए इसके फाइनल लाइफटाइम कलेक्शन में और बड़ी बढ़ोतरी की उम्मीद है।</div><div><br></div><div><br></div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/controversy-erupts-over-revolver-rani-kissing-scene-vir-das-defends-kangana-ranaut" target="_blank">Kangana Ranaut Kissing Scene Controversy | रिवॉल्वर रानी के किसिंग सीन पर छिड़ा विवाद! वीर दास ने कंगना रनौत का किया बचाव, दावों को बताया 'काल्पनिक'</a></h3><div><br></div><div>ये सभी फिल्में फिल्म इंडस्ट्री के लिए एक बेहद जरूरी सबक हैं कि स्टार पावर, भारी-भरकम बजट और पीआर मार्केटिंग फिल्म को केवल एक अच्छी ओपनिंग दिला सकते हैं, लेकिन फिल्म का लंबा और सफल सफर सिर्फ और सिर्फ दर्शकों की पसंद (Content) पर ही निर्भर करता है। धीमी शुरुआत का मतलब हमेशा अंत नहीं होता, कभी-कभी यह एक लंबी और ऐतिहासिक पारी की शुरुआत होती है।</div><div>&nbsp;</div><div><p class="MsoNormal"><a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood" target="_blank"><span style="font-family: &quot;Segoe UI&quot;, sans-serif; background-image: initial; background-position: initial; background-size: initial; background-repeat: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial;">Entertainment News Hindi </span></a><span style="font-family: &quot;Segoe UI&quot;, sans-serif; background-image: initial; background-position: initial; background-size: initial; background-repeat: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial;">Today
only at Prabhasakshi</span><span style="font-family: &quot;Segoe UI&quot;, sans-serif; background-image: initial; background-position: initial; background-size: initial; background-repeat: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial;">&nbsp;</span><o:p></o:p></p></div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 29 Jun 2026 14:05:40 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/these-5-films-turned-the-tide-in-theatres-so-dramatically-that-entire-bollywood-industry-shaken</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Welcome To The Jungle Review:  थिएटर में ठहाके लगाने पर मजबूर करती है अहमद खान द्वारा डायरेक्टेड अक्षय कुमार स्टारर यह फिल्म]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/welcome-to-the-jungle-film-review-a-comedy-spectacle]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आजकल ज्यादातर फिल्में या तो बड़े-बड़े एक्शन सेट पीस, गंभीर कहानियां या सोशल मैसेज के सहारे दर्शकों को जोड़ने की कोशिश करती हैं। ऐसे दौर में वेलकम टू द जंगल बिल्कुल अलग रास्ता चुनती है। यह फिल्म न तो लॉजिक का बोझ उठाती है और न ही खुद को जरूरत से ज्यादा गंभीर बनाने की कोशिश करती है। इसका पूरा फोकस सिर्फ एक चीज पर है, दर्शकों को खुलकर हंसाना और दो-ढाई घंटे तक भरपूर मनोरंजन करना। वेलकम फ्रेंचाइज़ी की पहचान रहे पागलपन, कन्फ्यूजन और मजेदार किरदारों को इस बार और बड़े स्तर पर पेश किया गया है। सवाल बस इतना है कि क्या अहमद खान इस हंगामे को पर्दे पर उतनी ही खूबसूरती से पेश कर पाए हैं? आइए जानते हैं। तो चलिए आपको बताते हैं इस हलचल से भरी फिल्म का रिव्यू।</div><div><br></div><h2><b>कहानी में हर मोड़ पर नया हंगामा</b></h2><div>वेलकम टू द जंगल की कहानी एक ऐसी फिल्म यूनिट की है, जिसके साथ कुछ भी सामान्य नहीं होता। एक अमीर शख्स अपनी एक खास योजना के तहत फिल्म बनाने का फैसला करता है, लेकिन शूटिंग शुरू होते ही सब कुछ बिखर जाता है। मजबूरी में पूरी टीम गांव पहुंचती है, जहां असली लोगों और फिल्मी दुनिया के बीच ऐसा कन्फ्यूजन पैदा होता है कि हर सीन में कोई न कोई नया बवाल खड़ा हो जाता है। यही लगातार होने वाली अफरा-तफरी फिल्म को मजेदार बनाए रखती है।</div><div><br></div><h2><b>हर कलाकार को मिला चमकने का मौका</b></h2><div>इतनी बड़ी स्टारकास्ट होने के बावजूद फिल्म किसी एक चेहरे तक सीमित नहीं रहती। अक्षय कुमार अपनी शानदार कॉमिक टाइमिंग से शुरुआत से आखिर तक फिल्म की कमान संभालते हैं। सुनील शेट्टी का 'येडा अन्ना' वाला किरदार हर बार हंसी लेकर आता है। अरशद वारसी और लारा दत्ता भी अपने किरदारों में जंचते हैं। वहीं परेश रावल, जॉनी लीवर और राजपाल यादव अपने अनुभव से कई मजेदार पल रचते हैं। लेकिन फरीदा जलाल और किरण कुमार की जोड़ी कई जगह पूरी महफिल लूट ले जाती है।</div><div><br></div><h2><b>पुरानी यादों के साथ नया मजा</b></h2><div>फिल्म की सबसे अच्छी बात यह है कि यह पुराने दर्शकों और नई पीढ़ी, दोनों को साथ लेकर चलती है। अक्षय कुमार, सुनील शेट्टी और रवीना टंडन को फिर से एक साथ देखना पुराने दौर की याद दिलाता है, लेकिन फिल्म सिर्फ इसी पर नहीं टिकी रहती। नए किरदार, नए मजाक और अलग तरह की कॉमिक सिचुएशन्स इसे ताजा एहसास भी देते हैं।</div><div><br></div><h2><b>निर्देशन में दिखी अच्छी पकड़</b></h2><div>इतनी बड़ी कास्ट वाली फिल्म में हर कलाकार को जगह देना आसान नहीं होता, लेकिन अहमद खान ने इसे अच्छी तरह संभालने की कोशिश की है। फिल्म कहीं भी ज्यादा उलझी हुई नहीं लगती और कहानी लगातार आगे बढ़ती रहती है। कॉमेडी का फ्लो बना रहता है और जब भी रफ्तार थोड़ी कम होती है, कोई नया मजेदार सीन फिर से माहौल बना देता है।</div><div><br></div><h2><b>मनोरंजन ही सबसे बड़ा मकसद</b></h2><div>यह फिल्म किसी गहरे संदेश या गंभीर कहानी के साथ नहीं आती। इसका पूरा फोकस सिर्फ दर्शकों को हंसाने और एंटरटेन करने पर है। हल्की-फुल्की कॉमेडी, मजेदार किरदार और लगातार आने वाले कन्फ्यूजन फिल्म को शुरू से आखिर तक दिलचस्प बनाए रखते हैं। यही वजह है कि बड़े पर्दे पर इसका मजा और ज्यादा आता है।</div><div><br></div><h2><b>बड़ी स्टारकास्ट, बड़ा मनोरंजन</b></h2><div>फिल्म में अक्षय कुमार, सुनील शेट्टी, दिशा पटानी, जैकलीन फर्नांडिस, अरशद वारसी, जैकी श्रॉफ, परेश रावल, रवीना टंडन, लारा दत्ता, फरीदा जलाल, जॉनी लीवर, श्रेयस तलपड़े, तुषार कपूर, राजपाल यादव, कृष्णा अभिषेक, कीकू शारदा, दलेर मेहंदी, आफताब शिवदासानी, मुकेश तिवारी, यशपाल शर्मा, किरण कुमार, जाकिर हुसैन, विंदू दारा सिंह, उर्वशी रौतेला, हेमंत पांडे, बृजेंद्र काला, फिरोज खान (अर्जुन), स्वर्गीय पंकज धीर, पुनीत इस्सर, सुदेश बेरी, जीतू वर्मा, वृहि कोडवारा, आदित्या सिंह और भाग्य भानुशाली जैसे कलाकार नजर आते हैं। इतने सारे कलाकार मिलकर फिल्म को और भव्य बना देते हैं।</div><div><br></div><h2><b>मजबूत प्रोडक्शन का साथ</b></h2><div>फिल्म को ए.ए. नाडियाडवाला, केप ऑफ गुड फिल्म्स और स्टार स्टूडियोज ने सीता फिल्म्स के सहयोग से प्रस्तुत किया है। बेस इंडस्ट्रीज ग्रुप के बैनर तले बनी इस फिल्म के निर्माता राकेश डांग, वेदांत विकास बाली और फिरोज ए. नाडियाडवाला हैं। बड़े स्तर पर तैयार की गई इस फिल्म में प्रोडक्शन वैल्यू भी साफ दिखाई देती है।</div><div><br></div><h2><b>क्यों है मस्ट वॉच</b></h2><div>अगर आप ऐसी फिल्म देखना चाहते हैं जो दो-ढाई घंटे तक आपको हंसाए, हल्का महसूस कराए और बिना किसी भारी-भरकम कहानी के मनोरंजन करे, तो वेलकम टू द जंगल आपके लिए अच्छी पसंद हो सकती है। बड़ी स्टारकास्ट, भरपूर कॉमेडी, पुराने सितारों का नॉस्टैल्जिया और लगातार आने वाले फनी मोमेंट्स इसे एक बढ़िया फैमिली एंटरटेनर बनाते हैं।</div><div><br></div><div><b>डायरेक्टर - </b>अहमद खान</div><div><b>कास्ट – </b>अक्षय कुमार, सुनील शेट्टी, दिशा पटानी, जैकलीन फर्नांडिस, अरशद वारसी, जैकी श्रॉफ, परेश रावल, रवीना टंडन, लारा दत्ता, फरीदा जलाल, जॉनी लीवर, श्रेयस तलपड़े, तुषार कपूर, राजपाल यादव, कृष्णा अभिषेक, कीकू शारदा, दलेर मेहंदी, आफताब शिवदासानी, मुकेश तिवारी, यशपाल शर्मा, किरण कुमार, जाकिर हुसैन, विंदू दारा सिंह, उर्वशी रौतेला, हेमंत पांडे, बृजेंद्र काला, फिरोज खान (अर्जुन), स्वर्गीय पंकज धीर जी, पुनीत इस्सर, सुदेश बेरी, जीतू वर्मा, वृहि कोडवारा, आदित्या सिंह और भाग्य भानुशाली।</div><div><b>रनटाइम – </b>2 घंटे 44 मिनट</div><div><b>रेटिंग –</b> 3.5</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 26 Jun 2026 11:36:19 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/welcome-to-the-jungle-film-review-a-comedy-spectacle</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Gram Chikitsalay Season 2 Review: शोर-शराबे के बीच भटखंडी लौटना सुकून देने वाला अनुभव, अमोल पाराशर और विनय पाठक ने फिर जीता दिल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/gram-chikitsalay-season-2-review-returning-to-bhatkhandi-amidst-chaos-is-soothing-experience]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आजकल जब ओटीटी प्लेटफॉर्म्स मर्डर मिस्ट्री, गैंगस्टर्स की जंग और दुनिया खत्म होने जैसी डार्क व हिंसक कहानियों से भरे पड़े हैं, ऐसे में भटखंडी गाँव की सादगी भरी दुनिया में लौटना एक बेहद सुकून देने वाला अनुभव है। द वायरल फीवर (TVF) की बहुप्रतीक्षित वेब सीरीज़ 'ग्राम चिकित्सालय सीज़न 2' रिलीज हो चुकी है। यह शो किसी सनसनीखेज शॉक वैल्यू के पीछे भागने के बजाय रोज़मर्रा की आम ज़िंदगी में ही बेहतरीन ड्रामा और भावनाओं को ढूंढ निकालता है। यह सीज़न लोगों, उनकी जमीनी समस्याओं और उन छोटी-छोटी जीतों के बारे में है, जो असल जिंदगी में मायने रखती हैं।</div><div><b>&nbsp;</b></div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/censor-board-18-cuts-in-welcome-to-the-jungle-including-bikini-scenes-of-disha-jacqueline" target="_blank">Welcome To The Jungle को सेंसर बोर्ड से मिला झटका, दिशा और जैकलीन के बिकिनी सीन्स समेत 18 जगह चली कैंची</a></h3><div><b><br></b></div><div><b>क्या है सीज़न 2 की कहानी?</b></div><div>सीज़न 2 में हम डॉ. प्रभात सिन्हा (अमोल पाराशर) को भटखंडी गाँव की ज़िंदगी में पहले के मुकाबले बेहतर ढंग से ढलने की कोशिश करते हुए देखते हैं। अब वह इस जगह के लिए पूरी तरह अजनबी तो नहीं रहे, लेकिन गाँव वालों का अटूट भरोसा जीतना अभी भी उनके लिए एक लंबी और चुनौतीपूर्ण प्रक्रिया है।</div><div><br></div><div>प्रभात की सबसे बड़ी चुनौती वही है जो हमेशा से रही है—गाँव के लोगों को यह समझाना कि अंधविश्वास, रूढ़िवादिता और स्थानीय नीम-हकीम (झोलाछाप डॉक्टर) के बजाय सही वैज्ञानिक इलाज चुनना क्यों बेहतर है। गौरतलब है कि वह स्थानीय नीम-हकीम गाँव वालों के बीच डॉ. प्रभात से कहीं ज़्यादा लोकप्रिय है।</div><div><br></div><div>नया सीज़न प्रभात की उन कोशिशों के इर्द-गिर्द घूमता है जिनसे वह प्राइमरी हेल्थ सेंटर (PHC) की सूरत बदलना चाहते हैं ताकि ग्रामीण उस पर सच में भरोसा कर सकें। लेकिन जैसा कि अक्सर होता है, राहें आसान नहीं हैं। दवाओं की भारी कमी, सरकारी अड़चनें, सिस्टम का भ्रष्टाचार और लोगों की गहरी जड़ें जमा चुकी पुरानी मान्यताएँ हर मोड़ पर उनके रास्ते में दीवार बनकर खड़ी हो जाती हैं।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/filmreview/cocktail-2-movie-review-glitzy-but-the-screenplay-is-flawed-this-love-triangle-falls-flat" target="_blank">Cocktail 2 Movie Review: चकाचौंध से भरपूर, लेकिन पटकथा में झोल! फीका रह गया इस त्रिकोणीय प्रेम कहानी का स्वाद</a></h3><div><br></div><div><b>लेखन और निर्देशन: बनावटीपन से दूर, सच्चाई के करीब</b></div><div>इस सीरीज़ की सबसे बड़ी ताकत इसका लाजवाब लेखन और निर्देशन है। कहानी में स्वास्थ्य सेवा, रिश्वतखोरी और पुराने रीति-रिवाजों जैसे गंभीर मुद्दों को इतनी सहजता से पिरोया गया है कि ऐसा कभी नहीं लगता कि लेखक जबरन कोई सामाजिक संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं। सब कुछ किरदारों की परिस्थितियों से स्वाभाविक रूप से निकलकर आता है।</div><div><br></div><div><b>हमदर्दी भरा नज़रिया:</b></div><div>डायरेक्टर ललिताम आनंद ने ग्रामीण भारत को न तो कोई काल्पनिक फैंटेसी बनाया है और न ही कोई भयानक ट्रेजेडी। उन्होंने भटखंडी को एक असली जगह के रूप में पेश किया है। सीरीज़ का नजरिया हर किरदार के प्रति बेहद हमदर्दी भरा है। जो ग्रामीण इलाज कराने से कतराते हैं, उनका मज़ाक नहीं उड़ाया जाता और न ही भ्रष्ट सरकारी अधिकारियों को किसी कार्टून जैसे विलेन के रूप में दिखाया गया है। जब कोई किरदार गलत फैसला भी लेता है, तो कहानी उसके पीछे की सोच को समझने का पूरा समय लेती है।</div><div><br></div><div><b>कॉमेडी और कड़वी सच्चाई का मेल:</b> </div><div>यह शो आम पलों में भी कमाल का हास्य ढूंढ लेता है। सबसे मज़ेदार सीन तब देखने को मिलते हैं जब डॉ. प्रभात का शहरी और आदर्शवादी नज़रिया गाँव की ज़िंदगी की कठोर और व्यावहारिक सच्चाई से टकराता है।</div><div><br></div><div><b>एक्टिंग: कलाकारों ने फूंक दी किरदारों में जान</b></div><div>'ग्राम चिकित्सालय' की सबसे बड़ी खूबियों में से एक इसकी बेहतरीन स्टारकास्ट है:</div><div><br></div><div><b>अमोल पाराशर (डॉ. प्रभात सिन्हा): </b>अमोल ने एक बार फिर डॉ. प्रभात के किरदार में गजब का अपनापन और ईमानदारी दिखाई है। उन्होंने इस रोल को एक 'परफेक्ट हीरो' बनाने के बजाय एक ऐसे इंसान के रूप में पेश किया है जिसमें झुंझलाहट, खुद पर शक और कमज़ोरियाँ भी हैं। यही वजह है कि दर्शक खुद को उनसे जुड़ा हुआ पाते हैं।</div><div><br></div><div><b>विनय पाठक (डॉ. चेतक कुमार): </b>डॉ. चेतक कुमार के रोल में विनय पाठक ने हमेशा की तरह शानदार काम किया है। वह आकर्षक भी हैं, चिढ़ाने वाले भी, और अक्सर एक ही सीन में ये सारे रंग दिखा देते हैं। पाठक यह बखूबी पक्का करते हैं कि उनका किरदार कभी भी सिर्फ एक सपाट विलेन बनकर न रह जाए, जिससे उनके और प्रभात के बीच का टकराव बेहद दिलचस्प हो जाता है।</div><div><br></div><div><b>आकांक्षा रंजन और अन्य कलाकार: </b>आकांक्षा रंजन को इस सीज़न में अपनी प्रतिभा दिखाने के ज़्यादा मौके मिले हैं और उन्होंने पराशर के साथ एक बहुत ही सहज केमिस्ट्री साझा की है। आनंदेश्वर द्विवेदी अपनी बेहतरीन कॉमिक टाइमिंग से एक बार फिर महफिल लूट ले जाते हैं, वहीं आकाश मखीजा ने 'गोविंद' के एंगल में बेहतरीन इमोशनल गहराई जोड़ी है।</div><div><br></div><div><b>तकनीकी पहलू: सादगी ही इसकी सुंदरता है</b></div><div>यह कोई ऐसी सीरीज़ नहीं है जो अपनी तकनीकी तामझाम से आपका ध्यान भटकाए, बल्कि इसकी सादगी ही इसकी यूएसपी (USP) है। सिनेमैटोग्राफ़ी गाँव को बिना वजह चमकाए या सुंदर दिखाए, उसे उसके वास्तविक और कच्चे रूप में पेश करती है। बैकग्राउंड म्यूज़िक भी काफी हल्का और शांत रखा गया है, जो दृश्यों पर हावी हुए बिना कहानी को आगे बढ़ाता है। गाँव की रोज़मर्रा की प्राकृतिक आवाज़ें माहौल को जीवंत बनाती हैं।</div><div><br></div><div><b>कुछ कमियां जो खटकती हैं</b></div><div>अपनी तमाम खूबियों के बावजूद, सीज़न 2 में कुछ कमियां भी हैं जो इसे 'मास्टरपीस' बनने से रोकती हैं:</div><div><br></div><div><b>धीमी रफ़्तार (पेसिंग):</b> इस सीज़न की सबसे बड़ी समस्या इसकी रफ़्तार है। कुछ सब-प्लॉट्स को बेवजह लंबा खींचा गया है, जिससे कहानी कई जगह थमी हुई सी लगती है और दर्शकों के सब्र का इम्तिहान लेती है।</div><div><br></div><div><b>अनुमानित कहानी: </b>कई जगहों पर यह सीज़न उन्हीं घिसे-पिटे तरीकों और ग्रामीण पंचलाइनों पर निर्भर करता है जो हम पहले भी TVF के दूसरे शोज़ में देख चुके हैं। आदर्शवाद बनाम नौकरशाही की यह लड़ाई कुछ जगहों पर काफी प्रेडिक्टेबल (जिसका अंदाजा पहले से लगाया जा सके) हो जाती है।</div><div><br></div><div><b>कमजोर चरित्र विकास:</b> कुछ नए और दिलचस्प सहायक किरदारों को पेश तो किया गया, लेकिन उन्हें ठीक से विकसित नहीं किया गया, जिससे कुछ भावुक पल उतना गहरा असर नहीं छोड़ पाते जितनी उनसे उम्मीद थी।</div><div><b><br></b></div><div><b>निष्कर्ष: देखें या न देखें?</b></div><div>'ग्राम चिकित्सालय सीज़न 2' ने भले ही खुद को पूरी तरह से नया रूप न दिया हो, लेकिन इसकी ताकत इसकी ईमानदारी और सादगी में है। हर एपिसोड शायद उतना परफेक्ट न हो, लेकिन इसके किरदारों का असलीपन आपको स्क्रीन से बांधे रखता है।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">आज के इस दौर में जहाँ ओटीटी कंटेंट में दिखावे और सनसनी पर ज़्यादा ज़ोर दिया जाता है, वहाँ यह सीरीज़ छोटे, निजी और ज़मीन से जुड़े रहकर सफल होती है। यह भले ही TVF की सबसे बेहतरीन सीरीज़ न हो, लेकिन निस्संदेह यह उनकी सबसे ईमानदार और दिल छू लेने वाली कहानियों में से एक है। इसे अपने परिवार के साथ ज़रूर देखा जा सकता है।</span></div><div><br></div><div><b>हमारी रेटिंग: 3.5/5 स्टार</b></div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 23 Jun 2026 13:16:52 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Cocktail 2 Movie Review: चकाचौंध से भरपूर, लेकिन पटकथा में झोल! फीका रह गया इस त्रिकोणीय प्रेम कहानी का स्वाद]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/cocktail-2-movie-review-glitzy-but-the-screenplay-is-flawed-this-love-triangle-falls-flat]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>वर्ष 2012 में जब निर्देशक होमी अदजानिया ने सैफ अली खान, दीपिका पादुकोण और डायना पेंटी के साथ 'कॉकटेल' पेश की थी, तो वह आधुनिक सिनेमा के लिए एक ताज़ा ड्रिंक की तरह थी। भले ही त्रिकोणीय प्रेम कहानी (Love Triangle) बॉलीवुड के लिए घिसा-पिटा विषय था, लेकिन उस फिल्म में महानगरीय आधुनिकता, जज्बातों का बिखराव और सबसे बढ़कर 'वेरोनिका' के रूप में दीपिका का एक ऐसा यादगार किरदार था, जिसने कहानी में जान फूंक दी थी।</div><div><br></div><div>अब पूरे चौदह साल बाद, इसी फ्रेंचाइजी का अगला दौर यानी 'कॉकटेल 2' सिनेमाघरों में आ चुका है। इस बार स्क्रीन पर कृति सेनन, शाहिद कपूर और रश्मिका मंदाना की तिकड़ी है। तड़क-भड़क वाले इस नए ग्लास में परोसी गई यह कहानी क्या दर्शकों को थिएटर्स में बांधने में कामयाब होती है या यह सिर्फ एक बेस्वाद मिश्रण बनकर रह गई है? आइए विस्तार से विश्लेषण करते हैं।</div><div><br></div><div><b>क्या है 'कॉकटेल 2' की कहानी?</b></div><div>फिल्म का ताना-बाना कुणाल (शाहिद कपूर) और दिया (रश्मिका मंदाना) के इर्द-गिर्द बुना गया है, जो पिछले 16 वर्षों से एक-दूसरे के साथ रिलेशनशिप में हैं। अपने इस लंबे रिश्ते के बीच वे इटली के सिसिली में छुट्टियां बिताने का फैसला करते हैं। यहाँ उनकी मुलाकात दिया की पुरानी सहेली एली (कृति सेनन) से होती है, जिससे वे पिछले एक दशक से नहीं मिले हैं।</div><div><br></div><div>कहानी में अजीब मोड़ तब आता है जब दिया को अचानक अपने इतने पुराने रिश्ते पर संदेह होने लगता है। वह अपने पार्टनर के प्रति असुरक्षा की भावना के कारण अपनी हॉट और आकर्षक सहेली एली को अपने ही बॉयफ्रेंड को रिझाने (Seduce) का एक अजीबोगरीब काम सौंप देती है।</div><div><br></div><div>ट्विस्ट: एली शुरुआत में दिया को समझाने का प्रयास करती है, लेकिन दिया के अड़ियल और अजीब बर्ताव के कारण कुणाल धीरे-धीरे उससे दूर और एली के करीब आने लगता है।</div><div><br></div><div>टकराव: जैसा कि दर्शकों को पहले से अंदाजा होता है, एली सचमुच कुणाल के प्यार में गिरफ्तार हो जाती है। इसके बाद सहेलियों का आपसी रिश्ता ताश के पत्तों की तरह बिखरने लगता है और कुणाल दोनों के बीच एक 'ट्रॉफी' की तरह बनकर रह जाता है। पूरी फिल्म "सिस्टर्स बिफोर मिस्टर्स" के सिद्धांत को तार-तार करती हुई आगे बढ़ती है।</div><div><br></div><div><b>कलाकारों का अभिनय और किरदार (Performances)</b></div><div>&nbsp;</div><div><b>कृति सेनन (एली)</b></div><div>पूरी फिल्म में कृति सेनन को बेहद ग्लैमरस और स्टाइलिश अंदाज में पेश किया गया है। उनके लुक्स, परिधान और हेयरस्टाइल पर स्टाइलिस्ट ने बहुत मेहनत की है, जो स्क्रीन पर साफ दिखती है। हालांकि, 'एली' का किरदार कृति के कंधों पर सबसे भारी होने के बावजूद पटकथा की कमजोरी के कारण गहरा प्रभाव छोड़ने में नाकाम रहता है। वे केवल एक 'गोल्डन गर्ल' के रूप में चमकती हुई दिखती हैं, जिसके पीछे की भावनाएं अधूरी लगती हैं।</div><div><br></div><div><b>शाहिद कपूर (कुणाल)</b></div><div>एक बेहतरीन अभिनेता होने के बावजूद शाहिद कपूर के पास इस फिल्म में करने के लिए बहुत सीमित गुंजाइश थी। उनका चरित्र दोनों अभिनेत्रियों के बीच केवल एक पुरस्कार की तरह इस्तेमाल हुआ है। फिल्म का नैरेटिव दर्शकों को उनके चरित्र की गहराई को समझने का अवसर ही नहीं देता। हालांकि, क्लाइमेक्स के अंतिम 15 मिनटों में शाहिद को अपनी अभिनय क्षमता दिखाने का थोड़ा मौका मिलता है, जहाँ वे प्रभावित करते हैं।</div><div><b><br></b></div><div><b>रश्मिका मंदाना (दिया)</b></div><div>रश्मिका मंदाना का इस फिल्म में पूरी तरह से दुरुपयोग हुआ है। उनका स्क्रीन प्रेजेंस, संवाद अदायगी और पहनावा काफी फीका नजर आता है। उनका किरदार एक ऐसी इनसिक्योर प्रेमिका का है जो अपने बॉयफ्रेंड पर भरोसा करने के बजाय अपनी सहेली की चालों में उलझ जाती है। चरित्र लेखन की इस कमजोरी के कारण दर्शक उनसे जुड़ाव महसूस नहीं कर पाते।</div><div><br></div><div><b>संगीत, निर्देशन और संवाद</b></div><div>इस फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष इसका संगीत (Soundtrack) है। फिल्म के गाने जैसे 'माशूका', 'वल्लाह' और 'तुझको' बेहतरीन बन पड़े हैं और बैकग्राउंड में दर्शकों को बांधकर रखते हैं।</div><div><br></div><div>राहत की बात: मेकर्स ने इस बार 'तुम ही हो बंधु 2.0' को एक लाउड रीमिक्स बनाने की गलती नहीं की। इस क्लासिक गाने को बिना किसी फालतू छेड़छाड़ के बहुत कम समय के लिए इस्तेमाल किया गया है, जो कानों को सुकून देता है।</div><div><br></div><div>निर्देशन की बात करें तो होमी अदजानिया का दृष्टिकोण हमेशा की तरह आधुनिक और पश्चिमी संभ्रांत वर्ग (First-world problems) को दिखाने वाला है। लेकिन इस बार किरदारों की बुनावट बेहद कच्ची रह गई है। संवादों को बेहद सरल और आज के दौर का रखने की कोशिश की गई है। उदाहरण के लिए यह संवाद ध्यान खींचता है: "प्यार फटी हुई टी-शर्ट की तरह होता है जिसमें हम आराम से सोते हैं।"</div><div>&nbsp;</div><div><b>कॉकटेल 2: क्या अच्छा है और क्या नहीं</b></div><div>'कॉकटेल 2' आपको कुछ समय के लिए यकीन दिलाएगी कि दुनिया बहुत खूबसूरत है और आपको बस अपने सेविंग्स अकाउंट से पैसे निकालने हैं, सपनों की छुट्टियों पर जाना है और वहाँ जो हुआ उसे भूल जाना है। लेकिन ज़्यादा आराम से न बैठें - यह फ़िल्म जल्द ही आपको असलियत में वापस ले आती है, वही असलियत जिससे हममें से ज़्यादातर लोग भागने की कोशिश कर रहे हैं।</div><div><br></div><div>साथ ही, अगर आप कृति सेनन के फ़ैन हैं, तो आपको उन्हें स्क्रीन पर देखकर मज़ा आएगा - और शायद उनके स्टाइलिस्ट का काम देखकर और भी ज़्यादा मज़ा आएगा। कुछ पल ऐसे हैं जो सच में यादगार हैं, जैसे जब एली एक अजनबी को गले लगाती है और बदले में उसकी आँखों में आँसू आ जाते हैं। यह एक ही समय में दिल को छू लेने वाला और थोड़ा फीका भी लगता है। क्यों? क्योंकि अगर यह वेरोनिका होती, तो हम समझ पाते कि वे भावनाएँ कहाँ से आ रही थीं। ग्लैमर और दिखावे के पीछे एक बुरी तरह टूटी हुई औरत थी, जो अपने माता-पिता के साथ रिश्ते की वजह से गहरे ज़ख्म लिए हुए थी। उसके पीछे एक कहानी थी।</div><div><br></div><div>लेकिन एली के मामले में, हम बस अंदाज़ा ही लगाते रह जाते हैं। वह क्यों रोई? उसके मन में क्या चल रहा है? फ़िल्म हमें यह बताने की कोशिश भी नहीं करती। यह फ़िल्म अपने मुख्य तीन किरदारों और उनकी बहुत ही असल, 'फ़र्स्ट-वर्ल्ड' समस्याओं पर इतनी ज़्यादा ध्यान देती है कि जिन लोगों के लिए हमें महसूस करना चाहिए, उन्हें ठीक से दिखा ही नहीं पाती।</div><div><br></div><div>स्क्रीनप्ले चाहता है कि सब कुछ बहुत अच्छा और शानदार दिखे, लेकिन किसी मोड़ पर यह सब बहुत ज़्यादा लगने लगता है। हर फ़्रेम में तेवर, दिल टूटने का दर्द, रोमांस, तड़प और जुनून भरा होता है, और ये सब एक साथ ध्यान खींचने की कोशिश करते हैं। और जैसा कि कहा जाता है, किसी भी चीज़ की अति अच्छी नहीं होती।</div><div><br></div><div><b>कॉकटेल 2: फ़ाइनल फ़ैसला</b></div><div>कुछ कॉकटेल समय के साथ बेहतर होती जाती हैं। कुछ का मज़ा बस एक बार ही लिया जा सकता है। 'कॉकटेल 2' पूरी कोशिश करती है कि अपनी पिछली फ़िल्म जैसा जादू फिर से पैदा करे, लेकिन डिज़ाइनर कपड़े, शानदार छुट्टियां, इमोशनल उतार-चढ़ाव और वही पुराने रिश्तों वाले ड्रामे के बीच, यह भूल जाती है कि असल फ़िल्म में क्या बात थी जिसने उसे इतना मज़ेदार बनाया था। यह देखने में महंगी और सुनने में बढ़िया लगती है और इसमें इतना ग्लैमर है कि आपका इंस्टाग्राम फ़ीड भर जाए, लेकिन जब इसका नशा उतरता है, तो आप सोचते रह जाते हैं कि आपने असल में क्या देखा।</div><div><br></div><div>यह एक ऐसी कॉकटेल है जो आसानी से गले से तो उतर जाती है, लेकिन इसका स्वाद ऐसा होता है जिसे आप जल्दी ही भूल जाते हैं। न तो यह पूरी तरह से बेकार है और न ही बहुत शानदार - बस एक ऐसी ड्रिंक जिसमें सजावट कम और थोड़ी और 'जान' (soul) होती, तो बेहतर होता।</div><div><b><br></b></div><div><b>'कॉकटेल 2' के लिए 5 में से 2.5 स्टार।</b></div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 16:11:47 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Deewana Movie Review | जानी-पहचानी शुरुआत पर इंटरवल का वो चौंकाने वाला ट्विस्ट, जो फिल्म को बनाता है खास]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/deewana-movie-review-familiar-beginning-followed-by-that-shocking-interval-twist]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>'कल्कि' और 'शुभम' जैसी फिल्मों से दर्शकों और समीक्षकों के बीच अपनी खास पहचान बनाने वाले अभिनेता हर्षित रेड्डी ने एक बार फिर बड़े पर्दे पर वापसी की है। उनकी नई फिल्म 'दीवाना' (Deewana) आज, 20 जून 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज़ हो गई है। श्रीकांत संगीशेट्टी द्वारा लिखित और निर्देशित यह फिल्म एक यूथफुल रोमांटिक एंटरटेनर है। प्रतिष्ठित डिस्ट्रीब्यूशन हाउस 'गीता आर्ट्स' द्वारा वितरित इस फिल्म को लेकर दर्शकों में इस कदर क्रेज था कि रिलीज़ से पहले ही इसके कई पेड प्रीमियर शो आयोजित किए गए थे। आइए जानते हैं कि एक प्यारी सी दिखने वाली यह यूथ लव स्टोरी बॉक्स ऑफिस और दर्शकों की उम्मीदों पर कितनी खरी उतरती है।</div><div><br></div><div><b>क्या है फिल्म की कहानी?</b></div><div>कहानी के केंद्र में है मुन्ना (हर्षित रेड्डी), जो एक आम बेफिक्र युवा है। वह अपनी जिम्मेदारियों से कोसों दूर अपने दोस्तों के साथ मौज-मस्ती में समय बिताना पसंद करता है। मुन्ना की इस आसान और सुस्त जिंदगी में तब एक बड़ा मोड़ आता है, जब उसकी मुलाकात अम्मू यानी अमूल्या (स्नेहा मणिमेघलाई) से होती है। अम्मू के आने से मुन्ना की जिंदगी में रोमांस, हंसी-मजाक के पल और कॉलेज के विरोधी ग्रुप के साथ छोटी-मोटी लड़ाइयों का सिलसिला शुरू हो जाता है। मुन्ना के माता-पिता शेखर (नरेश) और माँ (झांसी) भी कहानी में एंट्री लेते हैं, जो मुन्ना के रवैये और फैसलों पर अपने-अपने अनोखे अंदाज में प्रतिक्रिया देते हैं। शुरुआत में यह फिल्म एक आम कैंपस लव स्टोरी की तरह आगे बढ़ती है, लेकिन ठीक इंटरवल पर एक ऐसा अप्रत्याशित और ज़बरदस्त ट्विस्ट आता है, जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की होती। यहाँ से फिल्म पूरी तरह बदल जाती है और गहरे जज्बातों व पारिवारिक भावनाओं की ओर मुड़ जाती है।</div><div><br></div><div><b>अभिनय और परफ़ॉर्मेंस: मुख्य जोड़ी ने जीता दिल</b></div><div><b>&nbsp;</b></div><div><b>हर्षित रेड्डी (मुन्ना):</b> हर्षित ने इस किरदार को बेहद आत्मविश्वास के साथ निभाया है। बेफिक्र और आलसी युवा से लेकर एक जिम्मेदार प्रेमी बनने तक का उनका बदलाव उनकी आंखों और बॉडी लैंग्वेज में साफ झलकता है। उन्होंने तेलंगाना स्लैंग (स्थानीय लहजे) को बहुत ही स्वाभाविक तरीके से पकड़ा है, जो युवाओं से सीधा कनेक्ट करता है।</div><div><b><br></b></div><div><b>स्नेहा मणिमेघलाई (अम्मू):</b> स्नेहा ने इस फिल्म से एक ज़बरदस्त और ताज़गी भरा डेब्यू किया है। वह फनी और इमोशनल, दोनों ही दृश्यों में कमाल का संतुलन रखती हैं। प्री-क्लाइमेक्स और क्लाइमेक्स में उनका अभिनय देखने लायक है, जहाँ उन्होंने बिना किसी लाउड ड्रामे या नकली आँसुओं के उस पल को बेहद ईमानदार और गहरा बना दिया है।</div><div><br></div><div><b>सपोर्टिंग कास्ट</b>: पिता के रोल में अनुभवी अभिनेता नरेश का काम बेहद सधा हुआ है और वे बिना किसी शोर-शराबे के पारिवारिक दृश्यों को भारीपन देते हैं। माँ के रूप में झांसी ने अपनेपन और बेहतरीन कॉमिक व इमोशनल टाइमिंग से प्रभावित किया है। मुन्ना के दोस्त के रूप में विक्रांत ने फिल्म में गजब की एनर्जी भरी है। रोलर रघु और ज़बरदस्त वेणु का स्क्रीन टाइम भले ही कम हो, पर वे अपनी कॉमिक टाइमिंग से छाप छोड़ जाते हैं।</div><div><br></div><div><b>फिल्म के मजबूत पक्ष (Strengths)</b></div><div>'दीवाना' फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसका अप्रत्याशित और चौंकाने वाला इंटरवल ट्विस्ट है। जहां पहला हिस्सा एक बेहद साधारण कॉलेज लव स्टोरी की तरह आगे बढ़ता है, वहीं मध्यांतर पर आने वाला मोड़ पूरी कहानी का रुख बदलकर इसे बेहद गंभीर और इमोशनल ड्रामा में तब्दील कर देता है। फिल्म का दूसरा हाफ मजबूत पारिवारिक भावनाओं और Gen Z (आज के दौर के युवाओं) की जिम्मेदारियों को बखूबी दर्शाता है, जो दर्शकों को गहराई से भावुक करने में सफल रहता है। इसके अलावा, मुख्य जोड़ी के रूप में हर्षित रेड्डी और स्नेहा मणिमेघलाई की ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री कमाल की है। हर्षित ने बेफिक्र युवा से एक जिम्मेदार प्रेमी बनने के बदलाव को अपनी बॉडी लैंग्वेज से शानदार ढंग से दिखाया है, तो वहीं स्नेहा ने अपनी पहली ही फिल्म में बिना किसी लाउड ड्रामे या नकली आंसुओं के प्री-क्लाइमेक्स और क्लाइमेक्स के दृश्यों में बेहद परिपक्व और ईमानदार अभिनय किया है। तकनीकी मोर्चे पर, वामसी पचिपुुलुसु की खूबसूरत सिनेमैटोग्राफी और ईश्वर चंद का बैकग्राउंड स्कोर फिल्म की भावनाओं को बहुत मजबूती देता है।</div><div><b><br></b></div><div><b>फिल्म के कमजोर पक्ष (Weaknesses)</b></div><div>फिल्म के कमजोर पक्षों की बात करें, तो इसकी शुरुआत काफी धीमी और घिसी-पिटी लगती है। फिल्म का पहला हाफ बेहद साधारण है, जिसमें कॉलेज के पुराने ढर्रे के लड़ाई-झगड़े, दोस्तों के साथ आवारागर्दी और गलतफहमियां दिखाई गई हैं, जो कई जगह पुरानी फिल्मों की याद दिलाती हैं और नयापन महसूस नहीं होने देतीं। इसके अलावा, कुछ दृश्यों में स्क्रीनप्ले की रफ़्तार इतनी धीमी हो जाती है कि कहानी खिंची हुई लगने लगती है। ऋषिकेश पसपाल की एडिटिंग पहले हाफ में थोड़ी ढीली रही है; अगर मुन्ना और उसके दोस्तों के कुछ आम दृश्यों को छोटा (ट्रिम) कर दिया जाता, तो फिल्म की गति और बेहतर हो सकती थी। साथ ही, सहायक कलाकारों में जीवन कुमार का अभिनय कुछ खास दृश्यों में जरूरत से ज्यादा लाउड और तेज आवाज वाला लगता है, जो फिल्म के बाकी किरदारों के स्वाभाविक लहजे के साथ पूरी तरह मेल नहीं खाता।</div><div><br></div><div><b>सिनेमाई विश्लेषण (Direction &amp; Technical Analysis)</b></div><div>डायरेक्टर श्रीकांत संगीशेट्टी ने जानबूझकर फिल्म के पहले हाफ को हल्का-फुल्का और थोड़ा आम रखा है, ताकि दर्शक किरदारों की दुनिया से अच्छी तरह जुड़ सकें। लेकिन इंटरवल का टर्निंग पॉइंट कहानी को एक नया नज़रिया देता है और इमोशनल दूसरे हाफ की एक मजबूत नींव रखता है। डायरेक्टर ने 'Gen Z' (आज के युवा दर्शकों) की पसंद को ध्यान में रखते हुए कुछ बेहतरीन ट्विस्ट जोड़े हैं, जो लव स्टोरी की मूल आत्मा को खोने नहीं देते।</div><div><br></div><div>तकनीकी मोर्चे पर, वामसी पचिपुुलुसु की सिनेमैटोग्राफी शानदार है। वार्म टोन और साफ-सुथरे फ्रेम्स ने तेलंगाना के बैकड्रॉप को खूबसूरती से दिखाया है। संगीतकार ईश्वर चंद ने युवाओं को पसंद आने वाले गाने दिए हैं और उनका बैकग्राउंड स्कोर (BGM) विशेषकर दूसरे हाफ के इमोशनल दृश्यों को काफी मजबूती देता है। ऋषिकेश पसपाल की एडिटिंग ठीक है, हालांकि पहले हाफ के कुछ दृश्यों को ट्रिम किया जा सकता था।</div><div><br></div><div>'दीवाना' एक जानी-पहचानी प्रेम कहानी होने के बावजूद अपने साहसी ट्विस्ट, शानदार अभिनय और मजबूत पारिवारिक भावनाओं के संतुलन के कारण एक सफल और मुकम्मल फिल्म बनकर उभरती है। यह एक सकारात्मक, 'फील-गुड' सिनेमा है जो दर्शकों को एक उम्मीद भरे नोट पर छोड़कर जाता है।</div><div><br></div><div><b>रेटिंग: 3.5/5 स्टार्स (एक बार जरूर देखने लायक)</b></div><div><b>&nbsp;</b></div><div><a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood" target="_blank" style="background-color: rgb(255, 255, 255); font-size: 1rem;"><span style="font-family: &quot;Segoe UI&quot;, sans-serif; background-image: initial; background-position: initial; background-size: initial; background-repeat: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial;">Entertainment News Hindi </span></a><span style="background-image: initial; background-position: initial; background-size: initial; background-repeat: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; font-size: 1rem; font-family: &quot;Segoe UI&quot;, sans-serif;">Today
only at Prabhasakshi</span><span style="background-image: initial; background-position: initial; background-size: initial; background-repeat: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; font-size: 1rem; font-family: &quot;Segoe UI&quot;, sans-serif;">&nbsp;</span><b>&nbsp;</b></div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 20 Jun 2026 13:03:09 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/deewana-movie-review-familiar-beginning-followed-by-that-shocking-interval-twist</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Your Fault London Review | स्पैनिश हिट के ब्रिटिश रीमेक ने किया निराश, न जोश दिखा, न रोमांस का मज़ा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/your-fault-london-review-british-remake-of-spanish-hit-disappoints-lacking-both-energy]]></guid>
      <description><![CDATA[<div><span style="font-size: 1rem;">अमेज़न प्राइम वीडियो (Amazon Prime Video) की मशहूर स्पैनिश रोमांटिक फ्रैंचाइज़ी 'माई फॉल्ट' के ब्रिटिश रीमेक का अगला भाग 'योर फॉल्ट: लंदन' (Your Fault: London) रिलीज हो चुका है। स्पैनिश लेखिका मर्सिडीज़ रॉन के बेस्टसेलिंग रोमांस नॉवेल ट्रिलॉजी (Trilogy) पर आधारित यह कहानी सौतेले भाई-बहन नोआ और निक के बीच के 'फॉरबिडन लव' (प्रतिबंधित रोमांस) को दर्शाती है।&nbsp;</span><span style="font-size: 1rem;">स्पैनिश भाषा में तो इस फ्रैंचाइज़ी की फिल्मों ने जबरदस्त लोकप्रियता बटोरी थी, लेकिन इसका यह नया ब्रिटिश रीमेक दर्शकों और समीक्षकों को रिझाने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रहा है। 17 जून 2026 से प्राइम वीडियो पर स्ट्रीम हो रही इस फिल्म में न तो वह पुराना पैशन (जोश) नजर आता है और न ही कोई मनोरंजन।</span></div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/bigg-boss-20-a-storm-is-brewing-with-the-old-vs-new-faces-theme" target="_blank">Bigg Boss 20 | 'पुराने बनाम नए चेहरे' की थीम के साथ मचेगा बवाल, Uorfi Javed से लेकर Faisal Shaikh तक ये सितारे आ सकते हैं नज़र</a></h3><div><br></div><div><b>क्या है फिल्म की कहानी? (The Plot)</b></div><div>फिल्म की कहानी वहीं से आगे बढ़ती है जहां पिछला भाग खत्म हुआ था। अब नोआ (आशा बैंक्स) और निक (मैथ्यू ब्रूम) पूरी तरह से एक-दूसरे के साथ रिलेशनशिप में आ चुके हैं।</div><div><br></div><div><b>रिश्ते का सस्पेंस:</b> निक इस रिश्ते को अपने माता-पिता से छिपाकर रखना चाहता है, जिनकी हाल ही में शादी हुई है। उसे डर है कि उसके दबंग अरबपति पिता (रे फियरन) को अगर इस सौतेले भाई-बहन के रोमांस का पता चला, तो अंजाम बुरा होगा।</div><div><br></div><div><b>दूरी और नए किरदार: </b>नोआ अनिच्छा से इस बात को मान लेती है और पढ़ाई के लिए ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी चली जाती है। वहां उसकी जिंदगी में माइकल (जोएल नैनकर्विस) नाम का एक समझदार छात्र आता है, जिसे नोआ "सिर्फ दोस्त" बताती है।</div><div><br></div><div>दूसरी तरफ, निक गैर-कानूनी ड्रैग-रेसिंग छोड़कर अपने पिता के बिजनेस में हाथ बंटा रहा है, जहां उसकी मुलाकात एक खूबसूरत टेक स्टार्ट-अप फाउंडर सोफिया (लुईसा बाइंडर) से होती है, जिसे वह "सिर्फ कलीग" कहता है। यहीं से रिश्ते में गलतफहमियां शुरू होती हैं।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/batwara-1947-teaser-release-sunny-deol-preity-zinta-win-hearts-again-pain-of-partition-unfolds" target="_blank">Batwara 1947 Teaser Release | सनी देओल और प्रीति ज़िंटा की जोड़ी ने फिर जीता दिल, बिखरा विभाजन का दर्द</a></h3><div><br></div><div><b>समीक्षा: कहाँ चूक गई फिल्म? (Review &amp; Drawbacks)</b></div><div>इस जॉनर (Genre) की फिल्मों में दर्शक आमतौर पर दो चीजें देखने आते हैं— हाई-क्लास लग्जरी लाइफस्टाइल और स्क्रीन पर आग लगा देने वाली केमिस्ट्री (सेक्स और पैसा)। लेकिन 'योर फॉल्ट: लंदन' इन दोनों ही मोर्चों पर बेहद कमजोर साबित होती है।</div><div><br></div><div><b>बजट की कमी और कमजोर लाइफस्टाइल</b></div><div>फिल्म में किरदारों को बेहद रईस और अरबपति दिखाया गया है, लेकिन मेकर्स का बजट इतना कम लगता है कि वह अमीरी पर्दे पर दिखाई ही नहीं देती। उदाहरण के लिए, जब अरबपति का बेटा निक एक बहुत बड़ी बिजनेस डील पक्की करने के बाद अपने होटल के कमरे में पार्टी रखता है, तो वह कमरा किसी आलीशान फाइव-स्टार सुइट के बजाय एक सस्ते 'बेस्ट वेस्टर्न' बजट होटल जैसा नजर आता है।</div><div><br></div><div><b>ठंडी केमिस्ट्री और थकाऊ एक्टिंग</b></div><div>फिल्म के मुख्य कलाकारों (एक्टर्स) के चेहरे के हाव-भाव पूरी फिल्म में जमे हुए और हैरान-परेशान से लगते हैं। उन्हें देखकर ऐसा लगता है जैसे उन्हें एक्टिंग सेट पर नहीं, बल्कि किसी लग्जरी वेकेशन या हॉलिडे विज्ञापन की शूटिंग से उठाकर जबरदस्ती बैठा दिया गया हो।</div><div><br></div><div><b>कमजोर स्क्रीन प्रेजेंस:</b> निक और नोआ का जुनून ऐसा होना चाहिए था कि वे एक-दूसरे से दूर न रह पाएं, लेकिन फिल्म के लव मेकिंग और सेक्स सीन्स बेहद फीके और सॉफ्टकोर-लाइट (Softcore-light) हैं। इन्हें इस तरह कोरियोग्राफ किया गया है कि किरदारों के बीच का आकर्षण और तड़प दर्शकों तक पहुंच ही नहीं पाती।</div><div><br></div><div><b>निष्कर्ष (Verdict)</b></div><div>यदि आप मर्सिडीज़ रॉन की किताबों के बहुत बड़े फैन हैं, तो शायद आप इसे एक बार देख सकते हैं। लेकिन अगर आप एक बेहतरीन, इंटेंस और मनोरंजक रोमांटिक-ड्रामा की उम्मीद कर रहे हैं, तो 'योर फॉल्ट: लंदन' आपको पूरी तरह निराश करेगी। इससे बेहतर होगा कि आप इसका ऑरिजनल स्पैनिश वर्जन ही देखें।</div><div><br></div><div><b>हमारा वर्डिक्ट: (1.5/5 स्टार)</b></div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 19 Jun 2026 16:53:20 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/your-fault-london-review-british-remake-of-spanish-hit-disappoints-lacking-both-energy</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Raakh Review | अली फज़ल की नई सीरीज ने ताजा की रंगा-बिल्ला केस की खौफनाक यादें, झकझोर देगी कहानी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/raakh-review-ali-fazal-new-series-revives-chilling-memories-of-the-ranga-billa-case]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>ओटीटी प्लेटफॉर्म पर क्राइम थ्रिलर का जॉनर हमेशा से दर्शकों का पसंदीदा रहा है। लेकिन जब कोई सीरीज देश को हिलाकर रख देने वाले किसी सच्चे और खौफनाक क्राइम केस पर आधारित हो, तो उम्मीदें दोगुनी हो जाती हैं। डायरेक्टर प्रोसित रॉय की नई सीरीज 'राख' एक ऐसी ही कोशिश है। यह सीरीज साल 1978 के उस कुख्यात 'रंगा-बिल्ला अपहरण और हत्याकांड' से प्रेरित है, जिसने दशकों पहले पूरे भारत को झकझोर कर रख दिया था। इस मुश्किल और संवेदनशील विषय को बिना सनसनीखेज बनाए पर्दे पर उतारने में मेकर्स काफी हद तक कामयाब रहे हैं।</div><div><br></div><div><b>क्या है 'राख' की कहानी?</b></div><div>सीरीज की कहानी एक आम दिन से शुरू होती है, जब दो मासूम बच्चे अपने घर से एक रेडियो स्टेशन के लिए निकलते हैं, लेकिन वहां कभी पहुंच नहीं पाते। बच्चों के गायब होने से परिवार में कोहराम मच जाता है और माता-पिता (सोनाली बेंद्रे और आमिर बशीर) मदद के लिए पुलिस का दरवाजा खटखटाते हैं।</div><div><br></div><div>इस पेचीदा मामले की जांच की जिम्मेदारी मिलती है सब-इंस्पेक्टर जयप्रकाश (अली फज़ल) को, जो अपने करियर का पहला बड़ा केस संभाल रहे हैं। काफी खोजबीन के बाद बच्चों के शव एक पहाड़ी इलाके में लावारिस हालत में मिलते हैं। इसके बाद शुरू होती है भारत के दो सबसे खूंखार अपराधियों— बाबू और रज्जो (जिन्हें दुनिया 'रंगा और बिल्ला' के नाम से जानती है) की धरपकड़ की रोंगटे खड़े कर देने वाली तफ्तीश।</div><div>&nbsp;</div><div><b>राख: डायलॉग्स</b></div><div>यह शो यादगार वन-लाइनर्स या लंबे भाषणों पर निर्भर नहीं है। इसके बजाय, यह खामोशी, ठहराव और तनाव पर टिका है। सीरीज़ के माहौल की वजह से छोटी-सी आवाज़ भी बहुत तेज़ महसूस होती है। लेखक को पता है कि कब चुप रहना है, और यह बात शो के पक्ष में जाती है।</div><div><br></div><div><b>राख: परफॉर्मेंस</b></div><div>अली फ़ज़ल ने बहुत ही संयम के साथ शो को संभाला है। SI जयप्रकाश के तौर पर, वे एक युवा अफ़सर की बेचैनी को दिखाते हैं जो अपनी असुरक्षाओं से जूझते हुए एक भयानक केस को सुलझाने की कोशिश कर रहा है। उनकी परफॉर्मेंस कभी भी बढ़ा-चढ़ाकर नहीं लगती और यही इसे और भी असरदार बनाती है।</div><div><br></div><div>लेकिन 'राख' सिर्फ़ एक एक्टर की कहानी नहीं है। सोनाली बेंद्रे एक ऐसी माँ के रोल में दिल तोड़ने वाली लगती हैं जिनकी पूरी दुनिया रातों-रात बिखर जाती है। उनके हर सीन में दर्द झलकता है। आमिर बशीर एक पिता के तौर पर उन्हें बखूबी साथ देते हैं, जो मज़बूत बने रहने की कोशिश तो करते हैं लेकिन अंदर ही अंदर टूट रहे होते हैं।</div><div><br></div><div>राकेश बेदी का स्क्रीन टाइम कम है, लेकिन वे गहरी छाप छोड़ते हैं। अली फ़ज़ल के साथ उनका रिश्ता इस गंभीर कहानी में थोड़ी गर्माहट लाता है। दिब्येंदु भट्टाचार्य SP के रोल में भरोसेमंद हैं और अपने हर सीन में दमदार मौजूदगी दिखाते हैं। दविंदर गिल ने 'कोहरा 2' में बरुण सोबती की मदद करने वाले पुलिस अफ़सर का रोल किया था। इस बार वे अली फ़ज़ल की मदद कर रहे हैं। इस एक्टर के पास एक गंभीर थ्रिलर के माहौल को हल्का करने का शानदार अंदाज़ है। 'राख' में भी वे ऐसा करने में कामयाब रहे हैं।</div><div><br></div><div>हालांकि, सबसे बड़ा सरप्राइज़ आकाश मखीजा और रमनदीप यादव की ओर से मिलता है, जिन्होंने रंगा और बिल्ला का रोल किया है। उनकी परफॉर्मेंस बहुत परेशान करने वाली है। वे कभी भी सिर्फ़ दिखावे के लिए किरदार नहीं निभाते। इसके बजाय, वे बहुत आसानी से उन किरदारों की परेशान करने वाली सोच में ढल जाते हैं। अगर उनकी मौजूदगी आपको असहज करती है, तो एक्टर्स ने वही किया है जो वे करना चाहते थे।</div><div><br></div><div><b>राख: डायरेक्शन</b></div><div>कहानी को सनसनीखेज बनाने के लालच से बचने के लिए प्रोसित रॉय तारीफ़ के हकदार हैं। इसे ड्रामैटिक तमाशा बनाने के बजाय, वे तथ्यों और भावनाओं को खुद अपनी बात कहने देते हैं। कहानी का अंदाज़ ज़मीनी हकीकत से जुड़ा रहता है और इसी वजह से कई सीन और भी ज़्यादा परेशान करने वाले लगते हैं। क्राइम थ्रिलर में अक्सर असर पैदा करने के लिए सनसनी फैलाई जाती है। लेकिन 'राख' सही सुर पकड़ती है।</div><div><br></div><div><b>राख: क्या अच्छा है</b></div><div>इस सीरीज़ की सबसे मज़बूत बातों में से एक है सिर्फ़ इन्वेस्टिगेशन को ग्लोरिफ़ाई करने के बजाय क्रिमिनल्स को समझने में समय लगाना। ज़्यादातर क्राइम ड्रामा में मिस्ट्री सुलझाने वाले पुलिस अफ़सर को ही हीरो बनाया जाता है। यहाँ, कहानी यह भी दिखाती है कि क्राइम से पहले के दिनों में रंगा और बिल्ला क्या कर रहे थे, जिससे उनकी परेशान करने वाली सोच के बारे में पता चलता है। और अगर आप इसे रात में देखने का प्लान बना रहे हैं, तो यकीन मानिए, टीवी बंद होने के काफ़ी देर बाद तक भी आपको नींद नहीं आएगी।</div><div><br></div><div>'राख' की रफ़्तार भी तारीफ़ के काबिल है। यह न तो बहुत धीमी है और न ही बेवजह जल्दबाज़ी में आगे बढ़ती है। सीरीज़ एक ऐसा बैलेंस बनाती है जिससे पूरी कहानी में टेंशन बनी रहती है।</div><div><br></div><div><b>राख: क्या अच्छा नहीं है</b></div><div>जर्नलिस्ट वाला ट्रैक कभी-कभी मुख्य कहानी से अलग-थलग लगता है और इसे छोटा किया जा सकता था। कुछ पल ऐसे भी हैं जहाँ कुछ बातें अधूरी लगती हैं और कुछ सवाल बिना जवाब के रह जाते हैं। इन छोटी-मोटी कमियों से फ़िल्म का मज़ा खराब नहीं होता, लेकिन ये ध्यान ज़रूर खींचती हैं।</div><div><b><br></b></div><div><b>राख: फ़ाइनल फ़ैसला</b></div><div>'राख' एक ज़बरदस्त क्राइम थ्रिलर है जो फ़िल्म खत्म होने के बाद भी आपके ज़हन में बनी रहती है। यह एक मुश्किल विषय को ईमानदारी से दिखाती है और इसमें सभी कलाकारों ने दमदार एक्टिंग की है, खासकर अली फ़ज़ल और रंगा-बिल्ला का किरदार निभाने वाले एक्टर्स ने।</div><div>&nbsp;</div><div><a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood" target="_blank" style="background-color: rgb(255, 255, 255); font-size: 1rem;"><span style="font-family: &quot;Segoe UI&quot;, sans-serif; background-image: initial; background-position: initial; background-size: initial; background-repeat: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial;">Entertainment News Hindi </span></a><span style="background-image: initial; background-position: initial; background-size: initial; background-repeat: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; font-size: 1rem; font-family: &quot;Segoe UI&quot;, sans-serif;">Today
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width:100%;" target="_blank"> <div style=" display: flex; flex-direction: row; align-items: center;"> <div style="background-color: #F4F4F4; border-radius: 50%; flex-grow: 0; height: 40px; margin-right: 14px; width: 40px;"></div> <div style="display: flex; flex-direction: column; flex-grow: 1; justify-content: center;"> <div style=" background-color: #F4F4F4; border-radius: 4px; flex-grow: 0; height: 14px; margin-bottom: 6px; width: 100px;"></div> <div style=" background-color: #F4F4F4; border-radius: 4px; flex-grow: 0; height: 14px; width: 60px;"></div></div></div><div style="padding: 19% 0;"></div> <div style="display:block; height:50px; margin:0 auto 12px; width:50px;"><svg width="50px" height="50px" viewBox="0 0 60 60" version="1.1" xmlns="https://www.w3.org/2000/svg" xmlns:xlink="https://www.w3.org/1999/xlink"><g stroke="none" stroke-width="1" fill="none" fill-rule="evenodd"><g transform="translate(-511.000000, -20.000000)" fill="#000000"><g><path d="M556.869,30.41 C554.814,30.41 553.148,32.076 553.148,34.131 C553.148,36.186 554.814,37.852 556.869,37.852 C558.924,37.852 560.59,36.186 560.59,34.131 C560.59,32.076 558.924,30.41 556.869,30.41 M541,60.657 C535.114,60.657 530.342,55.887 530.342,50 C530.342,44.114 535.114,39.342 541,39.342 C546.887,39.342 551.658,44.114 551.658,50 C551.658,55.887 546.887,60.657 541,60.657 M541,33.886 C532.1,33.886 524.886,41.1 524.886,50 C524.886,58.899 532.1,66.113 541,66.113 C549.9,66.113 557.115,58.899 557.115,50 C557.115,41.1 549.9,33.886 541,33.886 M565.378,62.101 C565.244,65.022 564.756,66.606 564.346,67.663 C563.803,69.06 563.154,70.057 562.106,71.106 C561.058,72.155 560.06,72.803 558.662,73.347 C557.607,73.757 556.021,74.244 553.102,74.378 C549.944,74.521 548.997,74.552 541,74.552 C533.003,74.552 532.056,74.521 528.898,74.378 C525.979,74.244 524.393,73.757 523.338,73.347 C521.94,72.803 520.942,72.155 519.894,71.106 C518.846,70.057 518.197,69.06 517.654,67.663 C517.244,66.606 516.755,65.022 516.623,62.101 C516.479,58.943 516.448,57.996 516.448,50 C516.448,42.003 516.479,41.056 516.623,37.899 C516.755,34.978 517.244,33.391 517.654,32.338 C518.197,30.938 518.846,29.942 519.894,28.894 C520.942,27.846 521.94,27.196 523.338,26.654 C524.393,26.244 525.979,25.756 528.898,25.623 C532.057,25.479 533.004,25.448 541,25.448 C548.997,25.448 549.943,25.479 553.102,25.623 C556.021,25.756 557.607,26.244 558.662,26.654 C560.06,27.196 561.058,27.846 562.106,28.894 C563.154,29.942 563.803,30.938 564.346,32.338 C564.756,33.391 565.244,34.978 565.378,37.899 C565.522,41.056 565.552,42.003 565.552,50 C565.552,57.996 565.522,58.943 565.378,62.101 M570.82,37.631 C570.674,34.438 570.167,32.258 569.425,30.349 C568.659,28.377 567.633,26.702 565.965,25.035 C564.297,23.368 562.623,22.342 560.652,21.575 C558.743,20.834 556.562,20.326 553.369,20.18 C550.169,20.033 549.148,20 541,20 C532.853,20 531.831,20.033 528.631,20.18 C525.438,20.326 523.257,20.834 521.349,21.575 C519.376,22.342 517.703,23.368 516.035,25.035 C514.368,26.702 513.342,28.377 512.574,30.349 C511.834,32.258 511.326,34.438 511.181,37.631 C511.035,40.831 511,41.851 511,50 C511,58.147 511.035,59.17 511.181,62.369 C511.326,65.562 511.834,67.743 512.574,69.651 C513.342,71.625 514.368,73.296 516.035,74.965 C517.703,76.634 519.376,77.658 521.349,78.425 C523.257,79.167 525.438,79.673 528.631,79.82 C531.831,79.965 532.853,80.001 541,80.001 C549.148,80.001 550.169,79.965 553.369,79.82 C556.562,79.673 558.743,79.167 560.652,78.425 C562.623,77.658 564.297,76.634 565.965,74.965 C567.633,73.296 568.659,71.625 569.425,69.651 C570.167,67.743 570.674,65.562 570.82,62.369 C570.966,59.17 571,58.147 571,50 C571,41.851 570.966,40.831 570.82,37.631"></path></g></g></g></svg></div><div style="padding-top: 8px;"> <div style=" color:#3897f0; font-family:Arial,sans-serif; font-size:14px; font-style:normal; font-weight:550; line-height:18px;">View this post on Instagram</div></div><div style="padding: 12.5% 0;"></div> <div style="display: flex; flex-direction: row; margin-bottom: 14px; align-items: center;"><div> <div style="background-color: #F4F4F4; border-radius: 50%; height: 12.5px; width: 12.5px; transform: translateX(0px) translateY(7px);"></div> <div style="background-color: #F4F4F4; height: 12.5px; transform: rotate(-45deg) translateX(3px) translateY(1px); width: 12.5px; flex-grow: 0; margin-right: 14px; margin-left: 2px;"></div> <div style="background-color: #F4F4F4; border-radius: 50%; height: 12.5px; width: 12.5px; transform: translateX(9px) translateY(-18px);"></div></div><div style="margin-left: 8px;"> <div style=" background-color: #F4F4F4; border-radius: 50%; flex-grow: 0; height: 20px; width: 20px;"></div> <div style=" width: 0; height: 0; border-top: 2px solid transparent; border-left: 6px solid #f4f4f4; border-bottom: 2px solid transparent; transform: translateX(16px) translateY(-4px) rotate(30deg)"></div></div><div style="margin-left: auto;"> <div style=" width: 0px; border-top: 8px solid #F4F4F4; border-right: 8px solid transparent; transform: translateY(16px);"></div> <div style=" background-color: #F4F4F4; flex-grow: 0; height: 12px; width: 16px; transform: translateY(-4px);"></div> <div style=" width: 0; height: 0; border-top: 8px solid #F4F4F4; border-left: 8px solid transparent; transform: translateY(-4px) translateX(8px);"></div></div></div> <div style="display: flex; flex-direction: column; flex-grow: 1; justify-content: center; margin-bottom: 24px;"> <div style=" background-color: #F4F4F4; border-radius: 4px; flex-grow: 0; height: 14px; margin-bottom: 6px; width: 224px;"></div> <div style=" background-color: #F4F4F4; border-radius: 4px; flex-grow: 0; height: 14px; width: 144px;"></div></div></a><p style=" color:#c9c8cd; font-family:Arial,sans-serif; font-size:14px; line-height:17px; margin-bottom:0; margin-top:8px; overflow:hidden; padding:8px 0 7px; text-align:center; text-overflow:ellipsis; white-space:nowrap;"><a href="https://www.instagram.com/p/DY6ni0GOg-I/?utm_source=ig_embed&amp;utm_campaign=loading" style=" color:#c9c8cd; font-family:Arial,sans-serif; font-size:14px; font-style:normal; font-weight:normal; line-height:17px; text-decoration:none;" target="_blank">A post shared by prime video IN (@primevideoin)</a></p></div></blockquote>]]></description>
      <pubDate>Thu, 18 Jun 2026 13:33:29 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/raakh-review-ali-fazal-new-series-revives-chilling-memories-of-the-ranga-billa-case</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Bharat Bhhagya Viddhaata Review | कामा हॉस्पिटल के 'गुमनाम नायकों' की रोमांचक दास्तान, कंगना रनौत की सधी हुई अदाकारी ने जीता दिल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/bharat-bhhagya-viddhaata-review-kangana-ranaut-powers-a-thrilling-real-life]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>Bharat Bhhagya Viddhaata Review | 26/11 के उस महाविनाश की कहानी को हम सबने कई बार देखा और सुना है। वो खौफनाक तस्वीरें, वो मूक कर देने वाले नाम और वो तीन दिन जब मुंबई पूरी तरह ठहर गई थी, हमारी यादों में आज भी जिंदा हैं। लेकिन डायरेक्टर मनोज तापड़िया की 'भारत भाग्य विधाता' तबाही के उस पुराने ढर्रे से हटकर एक बिल्कुल अलग और अनछुआ रास्ता चुनती है। साल 2008 के आतंकी हमले के दौरान मुंबई के 'कामा हॉस्पिटल' में घटी वास्तविक घटनाओं से प्रेरित यह फिल्म हमें 'गीता माधव' (कंगना रनौत) नाम की एक नर्स के नजरिए से उस काली रात के बीच ले जाती है। हालांकि सिनेमाई लिबर्टी लेते हुए नाम बदले गए हैं और कुछ ड्रामैटिक लेयर्स जोड़ी गई हैं, लेकिन फिल्म का इरादा बिल्कुल साफ है— यह कहानी उन आस्तीन के सांपों (आतंकवादियों) की नहीं है, बल्कि यह कहानी उन जांबाज इंसानों की है जो चारों तरफ बरसती गोलियों के बीच भी खामोशी से अपना फर्ज निभाते रहे।"</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/ott-release-date-announced-for-akshay-kumar-and-priyadarshan-bhooth-bangla" target="_blank">Bhooth Bangla OTT Release | 'भूत बंगला' का तहलका! अक्षय कुमार की हॉरर-कॉमेडी फिल्म की नेटफ्लिक्स रिलीज डेट आउट</a></h3><div>&nbsp;</div><div>बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत एक बार फिर एक बेहद संवेदनशील और दमदार विषय के साथ बड़े पर्दे पर लौटी हैं। सच्ची घटना पर आधारित फिल्म 'भारत भाग्य विधाता' सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। यह फिल्म आतंक के तांडव के बीच मानवता, हौसले और सर्वाइवल (Survival) की एक ऐसी अद्भुत कहानी है, जो दर्शकों को भावुक भी करती है और उनके रोंगटे भी खड़े कर देती है।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/bollywood-wrap-up--internet-outraged-over-the-teaser-of-alia-bhatt-alpha" target="_blank">Bollywood Wrap Up | आलिया भट्ट की 'Alpha' के टीजर पर भड़का इंटरनेट | सिनेमा गलियारों की सबसे बड़ी खबरें | Bollywood News Today In Hindi </a></h3><div>&nbsp;</div><div><b>क्विक फैक्ट्स (Quick Facts):</b></div><div>फिल्म: भारत भाग्य विधाता</div><div>डायरेक्टर/राइटर: मनोज तापड़िया</div><div>कास्ट: कंगना रनौत, गिरिजा ओक, स्मिता तांबे, प्रिया अरुण बेर्डे, रसिका अगाशे</div><div>रनटाइम: 2 घंटे 10 मिनट</div><div>रेटिंग: 3.5 / 5 स्टार (साढ़े तीन स्टार)</div><div>&nbsp;</div><div><b>क्या है फिल्म की कहानी?</b></div><div>यह थ्रिलर फिल्म भारत के इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक, यानी 26/11 के मुंबई हमलों की पृष्ठभूमि पर बनी है। फिल्म की कहानी पूरा ध्यान शहर के आतंक पर केंद्रित करने के बजाय 'कामा हॉस्पिटल' के अंदर ले जाती है। यहाँ हथियारबंद आतंकवादियों द्वारा मचाई गई तबाही के बीच, निहत्थे हॉस्पिटल कर्मचारियों और नर्सों ने अपनी जान दांव पर लगाकर 400 से ज्यादा मरीजों और तीमारदारों को सुरक्षित रखा। यह फिल्म उन हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स के बलिदान और अदम्य साहस को एक सच्ची श्रद्धांजलि है, जिनकी बहादुरी अक्सर इतिहास के पन्नों में कहीं खो गई थी।</div><div><br></div><div><b>फिल्म की खूबियां (What's Good)</b></div><div>अनोखा और अनसुना विषय: इस फिल्म की सबसे बड़ी यूएसपी (USP) इसकी कहानी है। 26/11 पर कई फिल्में बनी हैं, लेकिन कामा अस्पताल के डॉक्टरों और नर्सों के निस्वार्थ भाव को इस तरह पर्दे पर पहली बार उतारा गया है।</div><div><br></div><div>इमोशनल कनेक्ट: निर्देशक मनोज तापड़िया ऐसे दृश्य रचने में सफल रहे हैं जो दर्शकों को उस खौफनाक रात के डर, अनिश्चितता और तनाव का सीधा अहसास कराते हैं। जीवन और मृत्यु के बीच फंसी नर्सों की इंसानियत दर्शकों के दिल को छू जाती है।</div><div><br></div><div>सटीक सिनेमैटोग्राफी और प्रोडक्शन: फिल्म का प्रोडक्शन डिजाइन अस्पताल के माहौल को पूरी तरह वास्तविक बनाता है। कैमरे का काम और बैकग्राउंड स्कोर बिना हावी हुए सस्पेंस और डर के माहौल को दोगुना कर देते हैं।</div><div><br></div><div><b>कहाँ रह गई कमी? (What's Bad)</b></div><div>धीमी रफ्तार: फिल्म के मध्य भाग (Second Quarter) में स्क्रीनप्ले अपनी गति बनाए रखने में थोड़ा संघर्ष करता दिखाई देता है।</div><div><br></div><div>कमजोर चरित्र चित्रण: कुछ सहायक किरदारों (Supporting Characters) को थोड़ा और समय दिया जा सकता था, जिससे उनकी बैकस्टोरी और गहरी लगती। यदि फिल्म का दूसरा हिस्सा थोड़ा और कसा हुआ होता, तो इसका प्रभाव और भी गहरा होता।</div><div><br></div><div><b>कलाकारों का अभिनय (Performances)</b></div><div>फिल्म की पूरी स्टारकास्ट ने अपने किरदारों के साथ पूरा न्याय किया है:</div><div><br></div><div>कंगना रनौत (गीता के रोल में): कंगना ने इस गंभीर विषय को बेहद ईमानदारी और संयम के साथ निभाया है। उन्होंने एक साधारण महिला की कमजोरी और संकट के समय उसकी शांत मजबूती (Silent Strength) के बीच बेहतरीन संतुलन बनाया है। स्क्रीन पर उनका समर्पण फिल्म को मजबूती देता है।</div><div><br></div><div>गिरिजा ओक (शीतल के रोल में): गिरिजा ने अपने अभिनय में गजब का अपनापन और सच्चाई भरी है। उनका किरदार फिल्म का सबसे भरोसेमंद हिस्सा बनकर उभरता है।</div><div><br></div><div>स्मिता तांबे (तृप्ति के रोल में): स्मिता ने अपने कच्चे और असरदार अभिनय से गहरी छाप छोड़ी है। उन्होंने फ्रंटलाइन वर्कर्स के पक्के इरादे को बखूबी पर्दे पर जिया है।</div><div><br></div><div>सपोर्टिंग कास्ट: आशा शेलार, प्रिया अरुण बेर्डे और रसिका अगाशे जैसे कलाकारों ने सामूहिक रूप से फिल्म के माहौल को विश्वसनीय और असल बनाने में अहम भूमिका निभाई है।</div><div><br></div><div><b>निष्कर्ष (Verdict)</b></div><div>'भारत भाग्य विधाता' महज एक फिल्म नहीं, बल्कि उन गुमनाम नायकों (Unsung Heroes) को दिया गया एक सम्मानजनक सलाम है, जिन्होंने खुद मौत के साये में रहकर सैकड़ों लोगों की जान बचाई। रफ्तार में मामूली कमियों के बावजूद, इसकी भावुक सच्चाई, देशभक्ति का जज्बा और उम्दा अभिनय इसे एक 'मस्ट वॉच' (Must Watch) फिल्म बनाते हैं। अगर आप असल जिंदगी से प्रेरित और दिल को छू लेने वाले सिनेमा के शौकीन हैं, तो यह फिल्म आपको बिल्कुल निराश नहीं करेगी।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 11:41:42 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/bharat-bhhagya-viddhaata-review-kangana-ranaut-powers-a-thrilling-real-life</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Brown Series Review | धीमी रफ़्तार के बावजूद Karisma Kapoor ने डार्क थ्रिलर में किया करियर का सबसे बेहतरीन अभिनय]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/brown-series-review-karisma-kapoor-delivers-best-performance-of-career-in-this-dark-thriller]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सिनेमा और वेब सीरीज़ की दुनिया में कोलकाता को अक्सर पीली टैक्सियों, हावड़ा ब्रिज, भव्य विक्टोरिया मेमोरियल, दुर्गा पूजा के रंगों और मिट्टी के कुल्हड़ में चाय की चुस्कियों के साथ बेहद जीवंत दिखाया जाता है। लेकिन निर्देशक अभिनय देव की सात-एपिसोड की नई सस्पेंस वेब सीरीज़ 'ब्राउन' आपको एक ऐसे कोलकाता में ले जाती है जो बिल्कुल अलग, ठंडा, उदास, लगातार बारिश में भीगा हुआ और एक बेचैन कर देने वाली खामोशी में डूबा हुआ है। अभीक बरुआ के मशहूर उपन्यास 'सिटी ऑफ़ डेथ' पर आधारित यह सीरीज़ एक रोंगटे खड़े कर देने वाले मर्डर और किरदारों के गहरे मानसिक सदमे की एक सघन कहानी है। </div><div><b>&nbsp;</b></div><div><div><b>कहानी: हाई सोसाइटी मर्डर और एक टूटी हुई कॉप</b></div><div>कहानी की शुरुआत कोलकाता के एक बेहद रईस और रसूखदार बिजनेसमैन (अजिंक्य देव) की बेटी अहाना जायसवाल की बेरहमी से हुई हत्या से होती है। अहाना का बिना सिर वाला शव उसके आलीशान बंगले में मिलता है, जिससे शहर के रईसों और पुलिस महकमे में हड़कंप मच जाता है। मीडिया के भारी दबाव के बीच यह केस डीसीपी रीटा ब्राउन (करिश्मा कपूर) को सौंपा जाता है।</div><div><br></div><div>रीटा ब्राउन कभी विभाग की सबसे काबिल अफसर हुआ करती थीं, लेकिन अपने पति की मौत के सदमे और कई सालों के निलंबन (Suspension) के बाद अब वे शराब की भयंकर लत, डिप्रेशन और सिगरेट के धुएं में खुद को बर्बाद कर रही हैं। सिस्टम उन्हें यह केस मुख्य रूप से इसलिए सौंपता है ताकि वे इस उलझे हुए मामले में फेल हो जाएं और रसूखदारों के राज़ दफन रहें।</div><div><br></div><div>रीटा के साथ इस जांच में शामिल होते हैं इंस्पेक्टर अर्जुन सिन्हा (सूर्या शर्मा), जो खुद अपनी पत्नी को खोने के गम और 'सर्वाइवर गिल्ट' से जूझ रहे हैं। जैसे ही ये दोनों टूटे हुए अफसर तफ्तीश शुरू करते हैं, ठीक उसी ढर्रे पर एक और मर्डर हो जाता है। जल्द ही उन्हें समझ आ जाता है कि उनका सामना किसी आम कातिल से नहीं, बल्कि एक साइको सीरियल किलर से है जो खुद को किसी दैवीय मिशन पर मानता है।</div></div><div>&nbsp;</div><div><b> परफॉर्मेंस</b></div><div>'ब्राउन' की सबसे बड़ी खूबी, और शायद एकमात्र लगातार प्रभावशाली पहलू, इसकी कास्ट है, खासकर करिश्मा कपूर। जिन दर्शकों को 'कुली नंबर 1' और 'राजा हिंदुस्तानी' जैसी फिल्मों में उनका ग्लैमरस अंदाज़ याद है, उन्हें यह बदलाव चौंकाने वाला लग सकता है। बिना किसी ग्लैमर के, दुख से थके हुए चेहरे के साथ, लगातार सिगरेट पीते हुए और शराब में अपना दर्द डुबोते हुए, करिश्मा ने शायद अपने करियर की सबसे बेहतरीन परफॉर्मेंस दी है। वह रीटा ब्राउन की कमियों और तीखेपन को बहुत ईमानदारी से अपनाती हैं। स्क्रीन पर एक स्टार को देखने के बजाय, दर्शक एक बुरी तरह से टूटी हुई महिला को देखते हैं जो जीने के लिए संघर्ष कर रही है। यह एक ऐसी परफॉर्मेंस है जो संयमित भी है और दिल को छू लेने वाली भी।</div><div><br></div><div>इंस्पेक्टर अर्जुन सिन्हा के तौर पर सूर्या शर्मा ने मज़बूत सपोर्ट दिया है। दुख, गुस्से और भावनात्मक उथल-पुथल को दिखाने का उनका अंदाज़ नपा-तुला और विश्वसनीय है। सोनी राज़दान रीटा की फिक्रमंद माँ के रोल में असरदार हैं, जबकि अजिंक्य देव एक प्रभावशाली बिज़नेसमैन के रोल में अधिकार और बारीकियां लेकर आते हैं।</div><div><br></div><div>सबसे यादगार कैमियो अनुभवी एक्ट्रेस हेलेन का है, जिन्होंने रीटा की आंटी बर्था का रोल निभाया है। उनका परिचय बहुत ही अनोखा और अजीब है, क्योंकि वह अपने ही कटे हुए पैर के अंतिम संस्कार की तैयारी कर रही हैं, जिसे डायबिटीज़ की वजह से हुई दिक्कतों के कारण काटना पड़ा था। आर्यन भौमिक, जो अहाना के म्यूज़िशियन बॉयफ्रेंड बने हैं, सस्पेंस को बढ़ाने में असरदार भूमिका निभाते हैं, जबकि सपोर्टिंग कास्ट, जिसमें फोरेंसिक टीम भी शामिल है, कहानी में असलियत और स्थानीय रंग भरती है।</div><div><br></div><div><b>ब्राउन: डायरेक्शन और टेक्निकल पहलू</b></div><div>अभिनय देव एक ऐसी नियो-नॉयर थ्रिलर बनाने के लिए तारीफ़ के हकदार हैं जिसका विज़ुअल अंदाज़ एकदम डार्क और गंभीर है। अमोग देशपांडे की सिनेमैटोग्राफी निस्संदेह शो की सबसे मज़बूत खूबियों में से एक है। कोलकाता को ग्रे, काले और नीले रंगों के शेड्स में दिखाया गया है; बारिश से भीगी सड़कें, कम रोशनी वाले कमरे और सीलन भरी दीवारें एक दम घोंटू उदासी का माहौल बनाती हैं। बैकग्राउंड म्यूज़िक और खामोशी का इस्तेमाल पहले ही फ्रेम से बेचैनी का एहसास कराने में मदद करता है। फिर भी, सीरीज़ की रफ़्तार धीमी होने की वजह से इसका असर कम हो जाता है।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/why-did-8-ips-officers-suddenly-reach-the-pakistan-border-what-is-india-going-to-do" target="_blank">Pakistan Border पर अचानक क्यों पहुंचे 8 IPS अधिकारी, क्या करने वाला है भारत?</a></h3><div><br></div><div>इसके मेकर्स ने मिस्ट्री के बजाय किरदारों के भावनात्मक दुख और मानसिक संघर्ष पर ज़्यादा ध्यान दिया है। जब लगभग हर किरदार ट्रॉमा, डिप्रेशन या निजी नुकसान के बोझ तले दबा हो, तो दर्शकों के लिए उनमें से किसी एक के साथ भी गहरे भावनात्मक स्तर पर जुड़ना मुश्किल हो जाता है।</div><div>&nbsp;</div><div><b>ब्राउन: फ़ैसला</b></div><div>ऊपर से देखने पर 'ब्राउन' एक स्टाइलिश, शानदार माहौल वाली और उम्मीद जगाने वाली सीरीज़ लगती है, लेकिन इसके शानदार बाहरी रूप के नीचे एक काफ़ी आम और औसत कहानी छिपी है। अगर आप करिश्मा कपूर को ग्लैमर से दूर, एकदम अलग अवतार में और ज़बरदस्त एक्टिंग करते हुए देखना चाहते हैं, तो यह सीरीज़ ज़रूर देखनी चाहिए। कोलकाता का डार्क अंदाज़ और शानदार सिनेमैटोग्राफ़ी भी इसकी ख़ासियतें हैं।</div><div><br></div><div>हालांकि, जो दर्शक तेज़ रफ़्तार वाली मर्डर मिस्ट्री देखना चाहते हैं जिसमें अचानक आने वाले ट्विस्ट और ज़बरदस्त सस्पेंस हो, उन्हें 'ब्राउन' देखने में शायद थकान महसूस हो सकती है। बेहतरीन एक्टिंग और शानदार विज़ुअल स्टाइल के बावजूद, इसकी धीमी रफ़्तार और आसानी से अंदाज़ा लगाया जा सकने वाला अंत इसे अपनी पूरी क्षमता तक पहुँचने से रोकते हैं।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/business/promoters-have-great-confidence-in-zepto-ipo" target="_blank">Zepto IPO पर Promoters का बड़ा भरोसा, 11,000 करोड़ के इश्यू में नहीं बेचेंगे अपनी हिस्सेदारी</a></h3><div><br></div><div>कमियों के बावजूद, 'ब्राउन' को 5 में से 3 स्टार मिलने चाहिए।&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 09 Jun 2026 13:03:42 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/brown-series-review-karisma-kapoor-delivers-best-performance-of-career-in-this-dark-thriller</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Bandar Movie Review: अनुराग कश्यप के उलझे हुए कानूनी ड्रामे में चमके बॉबी देओल, करियर की दी सबसे बेहतरीन परफॉर्मेंस]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/bandar-movie-review-bobby-deol-shines-in-anurag-kashyap-convoluted-legal-drama]]></guid>
      <description><![CDATA[<div><span style="font-size: 1rem;">सिनेमा की दुनिया में निर्देशक अनुराग कश्यप कभी भी आसान और सीधे रास्ते चुनने वाले फिल्ममेकर नहीं रहे हैं। उनकी फिल्में अक्सर दर्शकों को नैतिक रूप से एक ऐसे दोराहे पर लाकर खड़ा कर देती हैं, जहां सही और गलत के बीच का अंतर धुंधला हो जाता है। उनकी नई फिल्म 'बंदर' भी इसी कड़वी हकीकत और बेचैनी की परंपरा को आगे बढ़ाती है। सच्ची घटनाओं से प्रेरित यह फिल्म दिखाती है कि कैसे किसी व्यक्ति की हँसती-खेलती दुनिया महज एक आपराधिक आरोप के बाद ताश के पत्तों की तरह बिखर जाती है, और फिर शुरू होता है देश की सुस्त न्याय व्यवस्था का अंतहीन चक्रव्यूह। यह फिल्म किसी के दोषी या निर्दोष होने का फैसला सुनाने का ठेका नहीं लेती, बल्कि यह एक असंवेदनशील सिस्टम में फंसने के मानवीय और मानसिक परिणामों पर फोकस करती है। धीमी रफ्तार के बावजूद, बॉबी देओल की संजीदा एक्टिंग के दम पर यह फिल्म दर्शकों के दिलो-दिमाग पर गहरा भावनात्मक असर छोड़ती है।</span></div><div><br></div><div><b>कहानी: हेडलाइंस के फीके पड़ने के बाद का कड़वा सच</b></div><div>फिल्म की कहानी 'समीर मेहरा' (बॉबी देओल) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक नामचीन टीवी पर्सनैलिटी हैं। समीर का करियर पहले से ही थोड़ा डगमगा रहा होता है, लेकिन तभी उन पर अचानक 'रेप' (बलात्कार) का एक संगीन आरोप लगता है। इसके बाद शुरू होता है अंतहीन कानूनी कार्यवाहियों, मीडिया ट्रायल और सामाजिक बहिष्कार का एक ऐसा दर्दनाक सफर जो समीर को पूरी तरह तोड़कर रख देता है। रातों-रात, समीर एक ऐसे विलेन में तब्दील हो जाते हैं जिसके बारे में तथ्यों की जांच किए बिना ही समाज अपनी राय बना लेता है। अनुराग कश्यप ने इसे एक पारंपरिक और लाउड 'कोर्टरूम थ्रिलर' बनाने के बजाय इस बात पर फोकस किया है कि जब टीवी चैनलों की ब्रेकिंग न्यूज और हेडलाइंस फीकी पड़ जाती हैं, तब क्या होता है? जेल की कालकोठरी का मानसिक असर, बिखरते निजी रिश्ते और घुट-घुटकर दम तोड़ती उम्मीद ही इस कहानी की मुख्य आत्मा है। फिल्म की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें कोई साफ-सुथरा 'हीरो' या 'विलेन' नहीं है, बल्कि हर किरदार ग्रे-शेड्स (उलझा हुआ) लिए हुए है।</div><div><br></div><div><b>'बंदर': लेखन और निर्देशन</b></div><div>कश्यप ने इस कहानी को बहुत ही संयम के साथ पेश किया है। फिल्म का मैसेज समझाने के लिए कोई बड़े-बड़े भाषण नहीं हैं और बहुत कम ऐसे पल हैं जिन्हें सिर्फ़ गुस्सा दिलाने के लिए बनाया गया हो। डायरेक्टर ने फिल्म की स्थितियों को स्वाभाविक रूप से आगे बढ़ने दिया है। 'बंदर' के ज़रिए, अनुराग कश्यप अपने दर्शकों पर भरोसा करते हैं कि वे चीज़ों को खुद समझें, न कि हर सोच और भावना को उन्हें चम्मच से खिलाया जाए। इसलिए, स्क्रीनप्ले तब सबसे अच्छा लगता है जब यह घटनाओं के मानवीय असर को उजागर करता है। लेकिन 'बंदर' की सबसे अच्छी बात यह है कि इसके सबसे इमोशनल पल बहुत शांत होते हैं: जेल में बातचीत, अकेलेपन का एहसास, या बेबसी भरी नज़र। ये छोटे-छोटे पल अक्सर लंबे-चौड़े डायलॉग्स से कहीं ज़्यादा असरदार होते हैं।</div><div><br></div><div>हालांकि, फिल्म की स्क्रिप्ट तब लड़खड़ाती है जब वह एक साथ कई आइडियाज़ को संभालने की कोशिश करती है - वही अनुराग कश्यप वाली समस्या जो उनकी ज़्यादातर फिल्मों में दिखती है। यह फिल्म एक साथ जेल ड्रामा, लीगल थ्रिलर, मीडिया कल्चर पर कमेंट्री और किरदारों की गहराई से पड़ताल करने वाली कहानी बनना चाहती है। भले ही ये सभी चीज़ें अलग-अलग दिलचस्प हों, लेकिन वे हमेशा उतनी आसानी से एक साथ नहीं जुड़ पातीं जितनी अच्छी तरह जुड़नी चाहिए थीं।</div><div><br></div><div>फिर भी, कश्यप को एक संवेदनशील विषय को समझदारी से संभालने के लिए क्रेडिट मिलना चाहिए। फिल्म मुश्किल सवाल पूछती है, बिना उन्हें आसान या सतही तर्कों में बदले।</div><div><br></div><div><b>बंदर: टेक्निकल पहलू</b></div><div>टेक्निकली, 'बंदर' अपने गंभीर माहौल के साथ अच्छी तरह मेल खाती है। अनुराग कश्यप की ज़्यादातर फिल्मों की तरह, इसमें भी सिनेमैटोग्राफी के ज़रिए असलियत दिखाने की कोशिश की गई है और दिखावे के लिए कोई जगह नहीं छोड़ी गई है, जिससे फिल्म ज़मीन से जुड़ी और अपनी सी लगती है। जेल के सीन असली लगते हैं, जो सीधे असर करते हैं और फिल्म को गहराई देते हैं।</div><div><br></div><div>प्रोडक्शन डिज़ाइन भी बहुत मदद करता है। लोकेशन नकली या बहुत ज़्यादा चमकीली नहीं हैं। जेल की कोठरियां हों, पूछताछ के कमरे हों या कोर्टरूम - सब कुछ इस्तेमाल किया हुआ सा लगता है और कहानी को सपोर्ट करता है।</div><div><br></div><div>बैकग्राउंड म्यूज़िक बहुत कम सुनाई देता है, लेकिन समझदारी से इस्तेमाल किया गया है और कहानी में रुकावट नहीं डालता। यह हमें यह बताने के बजाय कि क्या महसूस करना है, ज़्यादातर इमोशनल भार को एक्टर्स पर छोड़ देता है। एडिटिंग का काम भी ज़्यादातर अच्छा है, फिर भी फिल्म की लंबाई कभी-कभी कहानी की रफ़्तार धीमी कर देती है। थोड़ी और कट-छांट से उन हिस्सों में एनर्जी बनी रह सकती थी।</div><div><br></div><div><b>बंदर: कमियां</b></div><div>'बंदर' की अपनी खूबियां हैं, लेकिन यह परफेक्ट नहीं है। इसकी रफ़्तार एक बड़ी समस्या है। कानूनी कहानी और समीर का इमोशनल सफ़र धीरे-धीरे आगे बढ़ता है, लेकिन कभी-कभी यह खिंचा हुआ लगता है। शायद इसीलिए कई सीन दोहराव वाले लगते हैं, जिससे कहानी में ज़रूरी तेज़ी या गंभीरता की कमी महसूस होती है। इस वजह से, फिल्म का दूसरा हिस्सा बहुत ज़्यादा लंबा लगता है।</div><div><br></div><div>साथ ही, कुछ सपोर्टिंग किरदारों को ठीक से डेवलप नहीं किया गया है। वे बड़े रोल का संकेत तो देते हैं, लेकिन वैसा होता नहीं है। इससे फिल्म जिन इमोशन्स को जगाने की कोशिश करती है, उनके लिए आपको और बेहतर नतीजे की चाहत रह जाती है।</div><div><br></div><div>और सच कहें तो, फिल्म का एंडिंग लोगों की राय को बांट सकता है। बिना ज़्यादा कुछ बताए, यह कहा जा सकता है कि कहानी को आगे बढ़ाने में इतना समय लगाने के बाद, फ़िल्म का अंत काफ़ी जल्दी हो जाता है। फ़िल्म के आखिरी पल भावनात्मक रूप से असरदार हैं, लेकिन वे यह एहसास दिलाते हैं कि कहानी में अभी और भी कुछ बताया जा सकता था।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">इन कमियों की वजह से फ़िल्म बिगड़ती तो नहीं है, लेकिन ये इसे सच में बेहतरीन फ़िल्म बनने से रोक देती हैं।</span></div><div><br></div><div><b>एक्टिंग: बॉबी देओल का 'पुनर्जन्म' और सान्या की सादगी</b></div><div>अगर 'बंदर' को देखने की कोई एक सबसे बड़ी और अचूक वजह है, तो वह हैं बॉबी देओल। 'आश्रम' और 'एनिमल' के बाद बॉबी ने खुद को पूरी तरह री-इन्वेंट किया है, लेकिन इस फिल्म में उन्होंने जो लाचारी, भावुकता और मानसिक थकान दिखाई है, उसकी कल्पना किसी ने नहीं की होगी। उनका अभिनय चीखने-चिल्लाने के बजाय खामोशी और आंखों के हाव-भाव पर आधारित है। उन्होंने समीर के डर को इतनी शिद्दत से जिया है कि दर्शकों को उनसे हमदर्दी होने लगती है। यह बॉबी के करियर की सर्वश्रेष्ठ परफॉर्मेंस कही जा सकती है। इंद्रजीत सुकुमारन और जितेंद्र जोशी सहित बाकी सभी सहयोगी कलाकारों ने भी कहानी की वास्तविकता को बनाए रखने में शानदार योगदान दिया है।</div><div><br></div><div><b>फाइनल वर्डिक्ट (निष्कर्ष)</b></div><div>'बंदर' कोई 'पॉपकॉर्न एंटरटेनर' फिल्म नहीं है; इसे देखना कई जगह असहज करने वाला और आपके सब्र की परीक्षा लेने वाला अनुभव हो सकता है। लेकिन आज के सोशल मीडिया के दौर में, जहां बिना सच जाने लोग कुछ ही मिनटों में किसी को भी मुजरिम बना देते हैं, वहां यह फिल्म बेहद प्रासंगिक और समयोचित सवाल उठाती है। बॉबी देओल की लाजवाब एक्टिंग और कश्यप के कड़क निर्देशन के लिए इस गंभीर ड्रामे को एक बार जरूर देखा जाना चाहिए।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 06 Jun 2026 15:49:43 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/bandar-movie-review-bobby-deol-shines-in-anurag-kashyap-convoluted-legal-drama</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Made in India A Titan Story Review | भरोसे और इनोवेशन की कहानी! 'मेड इन इंडिया: ए टाइटन स्टोरी' में चमके नसीरुद्दीन शाह और जिम सरभ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/made-in-india-a-titan-story-review-in-hindi]]></guid>
      <description><![CDATA[<div><span style="font-size: 1rem;">भारतीय कॉरपोरेट जगत के इतिहास में कुछ ब्रांड्स ऐसे हैं जो सिर्फ व्यवसाय नहीं, बल्कि देश की औद्योगिक और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन जाते हैं। 'टाईटन' (Titan) एक ऐसा ही नाम है। ओटीटी प्लेटफॉर्म पर आई नई वेब सीरीज़ 'मेड इन इंडिया: ए टाइटन स्टोरी' (Made in India: A Titan Story) इसी ऐतिहासिक ब्रांड के उदय, संघर्ष और उसकी कामयाबी की अनकही दास्तान को परदे पर लेकर आई है। 6 एपिसोड की यह सीरीज़ एक ऐसे ब्रांड की कहानी है जो आज भारतीय मध्यम वर्ग के भरोसे और इनोवेशन का पर्याय बन चुका है। </span></div><div><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div><div><span style="font-size: 1rem;">आइए जानते हैं कि नसीरुद्दीन शाह और जिम सरभ के अभिनय से सजी यह सीरीज़ दर्शकों पर कितना गहरा प्रभाव छोड़ पाती है। शुरू से ही, यह सीरीज़ ऐसा एहसास कराती है कि इसे बहुत सोच-समझकर और बारीकी से लिखा गया है।</span></div><div><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div><div><span style="font-size: 1rem;"> इसकी कहानी की नींव बहुत मज़बूत है, जिसमें कई अलग-अलग पहलू शामिल हैं - सिर्फ़ बिज़नेस से जुड़े फ़ैसले ही नहीं, बल्कि आपसी रिश्ते, महत्वाकांक्षा और मुश्किलों का सामना करने का जज़्बा भी।</span></div><div><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div><div><span style="font-size: 1rem;"> हालाँकि, हर विचार या आइडिया परदे पर उतना असरदार नहीं लगता, जितना शायद कागज़ पर लगा होगा। शाह और सरभ जैसे दिग्गज कलाकारों के होने के बावजूद, कुछ पल ऐसे भी आते हैं जहाँ लगता है कि उन्हें और बेहतर ढंग से पेश किया जा सकता था। फिर भी, यह शो अपने सभी छह एपिसोड में लगातार दर्शकों को बांधे रखता है। यह आपको अपनी ओर खींचता रहता है - इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि आप यह जानने के लिए उत्सुक रहते हैं कि आगे क्या होने वाला है। इसकी कहानी कहने के अंदाज़ में एक तरह की ईमानदारी झलकती है, जो इसके पक्ष में काम करती है। इस ईमानदारी को और भी मज़बूती मिलती है शाह के शांत और नपे-तुले अंदाज़ से (JRD Tata के किरदार में), और सरभ के जोशीले और जुनूनी अंदाज़ से (Xerxes Desai के किरदार में)।</span></div><div><br></div><div><b>Made in India: A Titan Story - कहानी का सारांश</b></div><div>इस सीरीज़ का मुख्य विषय Titan का सफ़र है - उसके शुरुआती दिनों से लेकर बाज़ार में एक बड़ा नाम बनने तक का सफ़र। नसीरुद्दीन शाह द्वारा निभाया गया किरदार JRD Tata, इस कहानी में एक स्थिर और मार्गदर्शक शक्ति के रूप में मौजूद रहते हैं; वहीं जिम सरभ द्वारा निभाया गया किरदार Xerxes Desai, एक ऐसे जोशीले और दूरदर्शी व्यक्ति के रूप में सामने आता है जो अक्सर ऐसे जोखिम भरे फ़ैसले लेता है, जो कंपनी को उसके भविष्य की ओर ले जाने में अहम भूमिका निभाते हैं।</div><div><br></div><div>सिर्फ़ उपलब्धियों की एक लंबी सूची गिनाने के बजाय, Made in India: A Titan Story उन लोगों पर रोशनी डालती है जिन्होंने इस ब्रांड को खड़ा करने में अपनी जान लगा दी। यह सीरीज़ सब कुछ दिखाती है: आपसी मतभेद, मन में उठने वाले सवाल, बड़ी-बड़ी असफलताएँ, छोटी-छोटी सफलताएँ और फिर मिलने वाली बड़ी जीत। इस कहानी का एक और अहम पहलू है JRD Tata और Xerxes Desai के बीच का गहरा रिश्ता।</div><div><br></div><div>इस शो की एक और भी ज़्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि यह उस दौर की 'आत्मा' को - उस समय के माहौल और मिज़ाज को - बहुत ही खूबसूरती से परदे पर उतारता है। उस ज़माने की सामाजिक और आर्थिक सच्चाइयों का इस कहानी में बहुत बड़ा योगदान है। आप यहाँ सिर्फ़ एक कंपनी को आगे बढ़ते हुए नहीं देख रहे हैं; आप उस माहौल को भी देख रहे हैं जिसमें वह ग्रोथ होनी थी। सबसे असरदार तरीकों में से एक है असल ज़िंदगी की फुटेज और पुरानी तस्वीरों का इस्तेमाल। ये चीज़ें कहानी को ज़्यादा असली बनाती हैं और कभी-कभी एक खास तरह का इमोशनल जुड़ाव भी पैदा करती हैं।</div><div><br></div><div>फिर भी, कहानी की रफ़्तार हमेशा एक जैसी नहीं रहती। कुछ हिस्से ऐसे हैं जहाँ सीन ज़रूरत से ज़्यादा लंबे खिंच जाते हैं, जिससे कहानी धीमी पड़ जाती है। इससे शो पूरी तरह से खराब तो नहीं होता, लेकिन आपको यह महसूस ज़रूर होता है। इसके बावजूद, पूरी कहानी इतनी दिलचस्प बनी रहती है कि आप उसमें खोए रहते हैं।</div><div><br></div><div><b>Made in India: A Titan Story - लेखन और निर्देशन</b></div><div>लेखन में साफ़ तौर पर मेहनत और रिसर्च दिखाई देती है। डायलॉग ज़्यादातर सधे हुए हैं, जो उस टोन के हिसाब से बिल्कुल सही बैठते हैं जो यह सीरीज़ अपनाना चाहती है। इसमें बेवजह का ड्रामा बहुत कम है, और इमोशनल पलों को काफ़ी संजीदगी से दिखाया गया है।</div><div><br></div><div>जहाँ यह थोड़ी कमज़ोर पड़ती है, वह है इसका एग्ज़ीक्यूशन। कुछ आइडिया जो सुनने में तो बहुत दमदार लगते हैं, वे स्क्रीन पर आते ही उतना असरदार नहीं रह जाते। कभी-कभी कहानी का बहाव थोड़ा टूटा-टूटा सा लगता है, जिसकी मुख्य वजह है बारीक जानकारियों और ड्रामा के बीच सही तालमेल बिठाने की कोशिश।</div><div><br></div><div>जहाँ तक निर्देशन की बात है, तो इसमें कई दिलचस्प बातें देखने को मिलती हैं। सबसे पहले, आपको कई बेहतरीन क्लोज़-अप शॉट्स देखने को मिलेंगे, खासकर उन सीन्स में जहाँ इमोशंस हावी होते हैं। दर्शकों के लिए किरदारों की बातें सुनने के बजाय उनके चेहरों के हाव-भाव पर ध्यान देना ज़्यादा दिलचस्प होता है।</div><div><br></div><div>समय के गुज़रने को जिस तरह से दिखाया गया है, उसके लिए भी मेकर्स की तारीफ़ होनी चाहिए। किरदारों की बढ़ती उम्र और अलग-अलग एपिसोड्स के माहौल में आने वाले बदलावों को आप साफ़ तौर पर महसूस कर पाते हैं, और यह सब काफ़ी असली लगता है।</div><div><b><br></b></div><div><b>Made in India: A Titan Story - संगीत और तकनीकी पहलू</b></div><div>तकनीकी तौर पर, यह सीरीज़ काफ़ी मज़बूत है। पुरानी फुटेज और तस्वीरों का इस्तेमाल इसकी सबसे बड़ी ताकतों में से एक है। यह कहानी को ज़्यादा विश्वसनीय बनाता है, और उससे भी बढ़कर, यह शो में एक खास तरह की गर्माहट और पुरानी यादों का एहसास जगाता है।</div><div><br></div><div>पुराने मुंबई, तमिलनाडु और बैंगलोर को जिस तरह से दोबारा रचा गया है, वह भी तारीफ़ के काबिल है। इन जगहों को बनाने और दिखाने में बारीकियों पर साफ़ तौर पर ध्यान दिया गया है। ये जगहें किसी बनावटी सेट की तरह नहीं, बल्कि असल ज़िंदगी की तरह लगती हैं, और यही बात इसे खास बनाती है।</div><div><br></div><div>पुराने हिंदी और तमिल गानों का इस्तेमाल करना भी एक बेहतरीन आइडिया है। इन गानों को बस यूँ ही कहानी में नहीं डाल दिया गया है; बल्कि कहानी में इनका एक खास मकसद है। कभी-कभी ये गाने चुपके से किसी सीन को और भी ज़्यादा असरदार बना देते हैं, और बिना खुद पर ज़्यादा ध्यान खींचे, सीन में इमोशनल गहराई भर देते हैं। ये उस समय के दौर को और मज़बूत बनाने में भी मदद करते हैं, और जैसे-जैसे सीरीज़ आगे बढ़ती है, उसे थोड़ा पुराना और 'जीया हुआ' सा एहसास देते हैं।</div><div><br></div><div>बैकग्राउंड स्कोर ज़्यादातर बैकग्राउंड में ही रहता है, जो कि अच्छा काम करता है। यह कहानी को बिना खुद को अलग से दिखाने की कोशिश किए, सहारा देता है। हो सकता है कि शो खत्म होने के बाद आपको यह याद न रहे, लेकिन यह अपना काम बखूबी करता है।</div><div><br></div><div><b>Made in India: A Titan Story - एक्टिंग</b></div><div>Made in India: A Titan Story की सबसे मज़बूत चीज़ों में से एक है इसकी एक्टिंग। नसीरुद्दीन शाह ने JRD Tata के किरदार में एक शांत लेकिन दमदार असर डाला है। उनकी एक्टिंग में संयम है, लेकिन वह बहुत असरदार है। उन्होंने किसी भी चीज़ को बढ़ा-चढ़ाकर पेश नहीं किया है, और यह बात उनके किरदार के लिए एकदम सही बैठती है।</div><div><br></div><div>ज़र्क्सिस देसाई के किरदार में जिम सरभ भी उतने ही शानदार लगे हैं, हालांकि उनका अंदाज़ बिल्कुल अलग है। उनकी एक्टिंग में एक ऐसी तीव्रता है जो उन्हें सबसे अलग बनाती है। वह कहानी में जान डाल देते हैं, खासकर उन जगहों पर जहाँ जोश और पक्के इरादे की ज़रूरत होती है।</div><div><br></div><div>सहायक कलाकारों ने भी अपना किरदार बखूबी निभाया है। वैभव तत्ववादी, कावेरी सेठ और लक्षवीर सिंह सरन, और उनके साथ Titan के संस्थापक सदस्यों का किरदार निभाने वाले दूसरे कलाकारों ने कहानी में जान डाल दी है। वे टीम को बिल्कुल असली, लगभग एक परिवार जैसा दिखाते हैं, जो इस तरह के शो के लिए बहुत ज़रूरी है।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/shilpa-shinde-confession-sexual-harassment-case-against-bhabiji-ghar-par-hain-producer-false" target="_blank">'भाबीजी घर पर हैं' फेम Shilpa Shinde का बड़ा कबूलनामा! बोलीं- 'प्रोड्यूसर पर किया सेक्सुअल हैरेसमेंट का केस झूठा था'</a></h3><div><br></div><div><b>Made in India: A Titan Story - कमज़ोर पहलू</b></div><div>अपनी तमाम खूबियों के बावजूद, यह सीरीज़ कुछ जगहों पर लड़खड़ाती है, खासकर आखिर में।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">पाँचवें और छठे एपिसोड कुछ ज़्यादा ही जल्दबाज़ी में निपटाए गए लगते हैं। यह वह जगह थी जहाँ शो को थोड़ा धीमा होना चाहिए था और कहानी के नतीजे को ठीक से उभरने देना चाहिए था, लेकिन इसके बजाय, यह बहुत तेज़ी से आगे बढ़ जाता है। कहानी को बनाने में इतना समय लगाने के बाद, उसका अंत थोड़ा अचानक सा लगता है।</span></div><div><br></div><div>एक दर्शक के तौर पर, आप जीत के उस पल को जी भर के महसूस करना चाहते हैं, उसे पूरी तरह से अपने अंदर उतारना चाहते हैं। यह सीरीज़ आपको ऐसा करने का पूरा मौका नहीं देती, और यहीं पर यह सबसे ज़्यादा निराश करती है।</div><div><br></div><div>इसके अलावा भी कुछ छोटी-मोटी कमियाँ हैं। कुछ दृश्यों को छोटा किया जा सकता था, और कुछ जगहों पर—खासकर देसाई के फैसलों के मामले में—उनके पीछे की सोच के बारे में थोड़ी और जानकारी दी जाती तो बेहतर होता। कभी-कभी उनके फैसले सिर्फ़ जोखिम उठाने वाले लगते हैं, जिनके पीछे कोई ठोस वजह नहीं बताई गई होती।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/manoj-bajpayees-film-governor-reveals-no-one-knows-those-who-save-the-country-from-crisis" target="_blank">Manoj Bajpayee की Film 'Governor' खोलेगी राज, बोले- देश को संकट से उबारने वालों को कोई नहीं जानता</a></h3><div><br></div><div><b>Made in India: A Titan Story - फ़ैसला</b></div><div>Made in India: A Titan Story एक ज़रूरी कहानी को बताने की एक सच्ची कोशिश है, और ज़्यादातर मामलों में यह सफल भी रही है। हो सकता है कि यह हर पैमाने पर खरी न उतरे, लेकिन यह इतना तो ज़रूर करती है कि इसकी छाप आपके मन पर बनी रहे।</div><div><br></div><div>इसकी सबसे बड़ी खूबी इसका मकसद है। यह आपको याद दिलाती है कि भारतीय प्रतिभा और लगन क्या कुछ हासिल कर सकती है। यह उन इंजीनियरों, नेताओं और विचारकों पर रोशनी डालती है जिन्होंने अपने विचारों पर तब भी भरोसा बनाए रखा, जब दूसरे उन पर शक कर रहे थे। जिस तरह से यह दिखाता है कि टीमें कैसे एक साथ आती हैं, आइडिया को हकीकत में बदलती हैं, और लोगों को गलत साबित करती हैं, उसमें कुछ ऐसा है जो चुपचाप मन को सुकून देता है।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">हाँ, इसकी गति थोड़ी और कसी हुई हो सकती थी, और इसके अंत को थोड़ा और समय मिलना चाहिए था। लेकिन इसमें कलाकारों का अभिनय, इसकी कहानी का मूल, और पूरी सीरीज़ की ईमानदारी इसे देखने लायक बनाती है।</span></div><div><br></div><div>कुल मिलाकर, 'मेड इन इंडिया: ए टाइटन स्टोरी' को 5 में से 3 स्टार मिलते हैं।</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 03 Jun 2026 13:52:28 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/made-in-india-a-titan-story-review-in-hindi</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Obsession का जलवा! 7 करोड़ की हॉरर फ़िल्म ने बॉलीवुड की सबसे बड़ी समस्या उजागर कर दी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/the-power-of-obsession-a-7-crore-horror-film-exposes-bollywood-biggest-problem]]></guid>
      <description><![CDATA[<div><span style="font-size: 1rem;">ऐसे समय में जब दुनिया भर के स्टूडियो बड़े-बड़े विज़ुअल तमाशों, फ़्रैंचाइज़ी यूनिवर्स और भारी-भरकम बजट वाली ब्लॉकबस्टर फ़िल्मों पर अरबों रुपये का दांव लगा रहे हैं, हॉलीवुड की एक ताज़ा सफलता की कहानी ने सबको हैरान कर दिया है। यह कहानी किसी बड़े स्टूडियो या नामचीन डायरेक्टर की नहीं, बल्कि एक छोटी सी इंडी हॉरर फ़िल्म की है, जिसे 26 साल के एक YouTuber ने बनाया है – Obsession. इस नन्ही सी फ़िल्म ने न केवल बॉक्स ऑफ़िस पर तहलका मचाया है, बल्कि भारतीय सिनेमा (बॉलीवुड) के मौजूदा संकट और उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी को भी दुनिया के सामने लाकर खड़ा कर दिया है।</span></div><div><br></div><div><b>7 करोड़ की हॉरर फ़िल्म जिसने हॉलीवुड को चौंका दिया</b></div><div>करी बार्कर के निर्देशन में बनी और माइकल जॉनस्टन व इंडे नवरेट के शानदार अभिनय से सजी फ़िल्म Obsession का बजट कथित तौर पर सिर्फ़ $750,000 से $1 मिलियन (लगभग 6–8 करोड़ रुपये) था। रिलीज़ के महज़ दो हफ़्तों के अंदर इस फ़िल्म ने दुनिया भर में लगभग $80 मिलियन कमा लिए और अब यह $100 मिलियन (लगभग 830–850 करोड़ रुपये) के जादुई आंकड़े को छूने की तैयारी में है।</div><div><br></div><div>ROI (निवेश पर रिटर्न) का गणित: इसका सीधा मतलब यह है कि फ़िल्म ने अपनी प्रोडक्शन लागत का लगभग 80 से 100 गुना मुनाफ़ा कमाया है। आज के कॉर्पोरेट सिनेमाई कारोबार में इस तरह के रिटर्न (ROI) के बारे में शायद ही कभी सुना जाता है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि Obsession किसी स्थापित सिनेमाई यूनिवर्स, वीएफएक्स (VFX) के तमाशे, पुरानी यादों (Nostalgia) या किसी बड़े सुपरस्टार के चेहरे पर निर्भर नहीं थी। इसने दर्शकों को सिर्फ़ एक चीज़ बेची: एक दमदार आइडिया और खौफ का नया अनुभव। और यहीं से बॉलीवुड के लिए एक बड़ा सबक शुरू होता है।</div><div><br></div><div><b>"बड़ा करो या घर जाओ" — बॉलीवुड का बढ़ता संकट</b></div><div>आज का हिंदी सिनेमा पूरी तरह से "Go big or go home" (या तो बहुत बड़ा करो, या फिर मैदान छोड़ दो) की सोच पर चल रहा है। मध्यम बजट वाली फ़िल्में (Medium-budget films), जो कभी इस इंडस्ट्री की असली रीढ़ हुआ करती थीं, आज पूरी तरह गायब होने की कगार पर हैं। आज बॉलीवुड में फ़िल्में या तो सैकड़ों करोड़ की लागत से बड़े-बड़े सिनेमाई "इवेंट" के तौर पर बनाई जा रही हैं, या फिर उन्हें चुपचाप बिना किसी शोर-शराबे के स्ट्रीमिंग प्लेटफ़ॉर्म (OTT) पर डाल दिया जाता है।</div><div><br></div><div><b>गायब होता 'मिडिल' और पुरानी यादें</b></div><div>एक ज़माना था जब बॉलीवुड इसी मध्यम दायरे में Kahaani, Queen, Vicky Donor, Andhadhun, Tumbbad और मूल फ़िल्म Stree जैसी फ़िल्मों के दम पर खूब फलता-फूलता था। इन फ़िल्मों ने साबित किया था कि मज़बूत कॉन्सेप्ट और सीमित बजट के सहारे भी थिएटर में इतिहास रचा जा सकता है। लेकिन आज स्थिति बदल चुकी है।</div><div><br></div><div>उदाहरण के लिए, Bhooth Bangla को ही लें, जिसका बजट कथित तौर पर 100 करोड़ रुपये से ज़्यादा था; या Mardaani को, जिसके बारे में कहा जाता है कि उस पर 80 से 100 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। हाल ही में आई Pati Patni Aur Woh Do, जिसका अनुमानित बजट 45–60 करोड़ रुपये था, बॉक्स ऑफ़िस पर अपनी लागत भी मुश्किल से निकाल पाई। चूँकि इनमें से कई फ़िल्में अपनी लागत भी नहीं निकाल पातीं, इसलिए उनके बढ़ते बजट के पीछे की वजह पर इंडस्ट्री के अंदर लगातार सवाल उठते रहते हैं। हॉलीवुड की बड़ी फ़िल्मों के साथ भी ऐसी ही तुलना की जा सकती है। क्योंकि जहाँ एक तरफ़ ग्लोबल ब्लॉकबस्टर फ़िल्में अभी भी ज़बरदस्त कमाई कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ़ उनके बजट इतने ज़्यादा बढ़ गए हैं कि उनकी मुनाफ़े की दरें (profit margins) तुलना में काफ़ी कम नज़र आती हैं।</div><div><br></div><div>उदाहरण के लिए, Michael को ही लें, जो इस साल हॉलीवुड की सबसे बड़ी फ़िल्मों में से एक है। इस फ़िल्म ने दुनिया भर में लगभग 788 मिलियन डॉलर (लगभग 6,550 करोड़ रुपये) कमाए हैं। लेकिन इसके कथित बजट (लगभग 155 मिलियन डॉलर या 1,290 करोड़ रुपये) के मुकाबले, फ़िल्म का रिटर्न इस समय इसके प्रोडक्शन खर्च का लगभग पाँच गुना है। इसी तरह, 'प्रोजेक्ट हेल मेरी', जिसे एक बड़े पैमाने के साइंस-फिक्शन तमाशे के तौर पर बनाया गया था, ने दुनिया भर में लगभग $675 मिलियन (मोटे तौर पर 5,600 करोड़ रुपये) कमाए हैं। लेकिन $200 मिलियन (लगभग 1,660 करोड़ रुपये) से ज़्यादा के अनुमानित बजट के साथ, इसका रिटर्न इसकी लागत का लगभग तीन गुना रहा।</div><div><br></div><div>यहीं पर 'ऑब्सेशन' एक बहुत ही ज़बरदस्त केस स्टडी बन जाती है</div><div>खबरों के मुताबिक, इस फ़िल्म की शूटिंग एक महीने से भी कम समय में पूरी हो गई थी। इसमें कोई बड़ा स्टार नहीं था। कोई फ़्रैंचाइज़ी का बोझ नहीं था। कोई "पैन-वर्ल्ड" पोज़िशनिंग नहीं थी। फिर भी, दर्शक बड़ी संख्या में इसे देखने आए, क्योंकि लोगों की ज़ुबानी तारीफ़ ही इसकी मार्केटिंग का इंजन बन गई थी। असल में, खबरों के मुताबिक, फ़िल्म ने अपने दूसरे वीकेंड में लगभग 39% की बढ़त हासिल की, जो आज के बॉक्स ऑफ़िस के माहौल में एक बहुत ही दुर्लभ बात है।</div><div><br></div><div><b>ब्लमहाउस मॉडल और कम जोखिम वाली कहानी कहने की ताकत</b></div><div>हॉलीवुड की हॉरर फ़िल्मों की दुनिया इस मॉडल को सालों से समझती आ रही है। ब्लमहाउस प्रोडक्शंस जैसे स्टूडियो ने अपना पूरा बिज़नेस प्लान ही सीमित बजट और बड़े आइडिया वाली कहानियों के इर्द-गिर्द बनाया है। 'पैरानॉर्मल एक्टिविटी' (2007), जो लगभग $15,000 (करीब 12 लाख रुपये) में बनी थी, उसने सालों में दुनिया भर में लगभग $194 मिलियन (1610 करोड़ रुपये) की कमाई की। जॉर्डन पील की 'गेट आउट' (2017) ने महज़ $4.5 मिलियन (लगभग 37 करोड़ रुपये) के बजट पर दुनिया भर में $255 मिलियन (करीब 2,120 करोड़ रुपये) से ज़्यादा कमाए। इसमें जोखिम और मुनाफ़े का अनुपात बुनियादी तौर पर ज़्यादा सुरक्षित होता है।</div><div><br></div><div><b>इसका फ़ॉर्मूला बेहद आसान है: कम जोखिम, ज़्यादा प्रयोग, ज़बरदस्त मुनाफ़ा</b></div><div>वहीं, बॉलीवुड का रवैया अब ऐसा होता जा रहा है, जैसे हर शुक्रवार रिलीज़ होने वाली फ़िल्म एक राष्ट्रीय तमाशा होनी चाहिए। इस बदलाव की एक वजह इंडस्ट्री की पूरे भारत और पूरी दुनिया में फैलने की बढ़ती महत्वाकांक्षाएँ भी हैं। एक्टर, स्टूडियो और फ़िल्ममेकर अब ऐसी फ़िल्में बना रहे हैं जो अलग-अलग भाषाओं और अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में ज़्यादा दर्शकों तक पहुँच सकें; रचनात्मक नज़रिए से यह भारतीय सिनेमा के लिए एक रोमांचक बदलाव है। लेकिन इन महत्वाकांक्षाओं की वजह से फ़िल्मों का बजट भी तेज़ी से बढ़ रहा है।</div><div><br></div><div>उदाहरण के लिए, 'टॉक्सिक' या 'रामायण' को ही ले लीजिए। ख़बरों के मुताबिक, यश की फ़िल्म और रणबीर कपूर-साई पल्लवी की फ़िल्म को इस पैमाने पर बनाया जा रहा है कि वे दुनिया भर के दर्शकों को पसंद आएँ; इनमें ज़बरदस्त एक्शन, अंतरराष्ट्रीय तकनीशियन और कई भाषाओं में रिलीज़ करने की योजना शामिल है। यह महत्वाकांक्षा यकीनन रोमांचक है। भारतीय सिनेमा का दुनिया भर में ज़्यादा दर्शकों तक पहुँचना एक सकारात्मक बात है।</div><div><br></div><div>चुनौती यह है कि जब फ़िल्मों को दुनिया भर के लिए "बड़े इवेंट" के तौर पर बनाया जाता है, तो उनका बजट तेज़ी से बढ़ने लगता है, और इसके साथ ही फ़िल्म की लागत वसूलने का भारी दबाव भी आ जाता है। और यह तरीका लंबे समय तक नहीं चल सकता।</div><div><br></div><div>क्योंकि कोई भी इंडस्ट्री सिर्फ़ "टेंटपोल" (बड़े बजट की मुख्य फ़िल्मों) के सहारे ज़िंदा नहीं रह सकती। टेंटपोल फ़िल्में सुर्खियाँ तो बटोरती हैं, लेकिन मध्यम बजट की फ़िल्में ही इंडस्ट्री के पूरे माहौल को बनाए रखती हैं। ये फ़िल्में नए लेखकों, युवा निर्देशकों, नए तरह की कहानियों और नए सितारों के लिए जगह बनाती हैं। साथ ही, ये दर्शकों को अलग-अलग तरह की फ़िल्में देखने का मौका देती हैं—एक ऐसी चीज़ जिसकी आज के हिंदी सिनेमा में लगातार कमी महसूस हो रही है।</div><div><br></div><div>मज़े की बात यह है कि बॉलीवुड की हाल की कुछ सफल कहानियों में से एक ऐसी ही शैली से आई है, जिसने ठीक इसी संतुलन को अपनाया है: हॉरर-कॉमेडी। मैडॉक फ़िल्म्स की बढ़ती हुई हॉरर फ़िल्मों की दुनिया इसलिए सफल नहीं हुई कि उसने सुपरहीरो फ़िल्मों की तरह बड़े पैमाने पर बनने की होड़ लगाई, बल्कि इसलिए सफल हुई क्योंकि उसने अपनी जड़ों से जुड़ी कहानियों और अपनी शैली की पहचान पर भरोसा किया। वह बीच की जगह ही शायद वह जगह है जहाँ बॉलीवुड का पुनरुद्धार फिर से हो सकता है।</div><div><br></div><div>क्योंकि अभी, हॉलीवुड की 7 करोड़ रुपये की एक हॉरर फ़िल्म एक ऐसी कड़वी सच्चाई सामने ला रही है: दर्शक आज भी स्टूडियो की सोच से कहीं ज़्यादा, फ़िल्म में कुछ नयापन, माहौल और कहानी कहने के तरीके को अहमियत देते हैं।</div><div><br></div><div>हर फ़िल्म पर 500 करोड़ रुपये खर्च करना ज़रूरी नहीं है। हर शुक्रवार को किसी 'सिनेमैटिक यूनिवर्स' की ज़रूरत नहीं होती। और हर फ़िल्मी अनुभव को जान-बूझकर एक 'पैन-इंडिया इवेंट' की तरह पेश करना भी ज़रूरी नहीं है।</div><div><br></div><div>कभी-कभी, बस एक ज़बरदस्त आइडिया ही काफ़ी होता है। और 2026 में, वह आइडिया एक YouTuber की बनाई छोटी सी हॉरर फ़िल्म से आया,&nbsp; करी बार्कर।</div><div>&nbsp;</div><div><a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood" target="_blank" style="background-color: rgb(255, 255, 255); font-size: 1rem;"><span style="font-family: &quot;Segoe UI&quot;, sans-serif; background-image: initial; background-position: initial; background-size: initial; background-repeat: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial;">Entertainment News Hindi </span></a><span style="background-image: initial; background-position: initial; background-size: initial; background-repeat: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; font-size: 1rem; font-family: &quot;Segoe UI&quot;, sans-serif;">Today
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      <pubDate>Sat, 30 May 2026 13:16:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/the-power-of-obsession-a-7-crore-horror-film-exposes-bollywood-biggest-problem</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[The Great Grand Superhero Review | बचपन की मासूमियत और पुरानी यादें ताजा करती है जैकी श्रॉफ की यह प्यारी और मजेदार फिल्म]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/the-great-grand-superhero-review-it-rekindles-innocence-of-childhood-brings-back-old-memories]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज सिनेमाघरों में रिलीज हुई मनीष सैनी के निर्देशन में बनी फिल्म 'द ग्रेट ग्रैंड सुपरहीरो – एलियंस का आगमन' एक ऐसी दुनिया में ले जाती है, जिसे आज का बॉलीवुड लगभग भूल ही चुका है। हिंसा, डार्क यूनिवर्स और लाउड एक्शन फिल्मों के इस दौर में, यह फिल्म याद दिलाती है कि बच्चों के लिए भी उनके हिसाब से शुद्ध और मासूम मनोरंजन वाली फिल्में बननी चाहिए। एलियंस, सुपरहीरो और स्कूली बच्चों की कल्पना पर आधारित यह फिल्म थोड़ी अटपटी और बिखरी हुई जरूर है, लेकिन इसका दिल पूरी तरह से हिंदुस्तानी और पुराने जमाने जैसा प्यारा है।</div><div><br></div><h2>क्या है फिल्म की कहानी?</h2><div>फिल्म की कहानी 11 साल के एक लड़के, दीपू (मिहिर गोडबोले) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक नए शहर में रहने आता है।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">अपने नए क्लासमेट्स को इंप्रेस करने की होड़ में दीपू एक मनगढ़ंत कहानी सुना देता है कि उसके दादा (जैकी श्रॉफ) असल में एक सीक्रेट सुपरहीरो हैं, जो एलियंस के हमले को रोकने की तैयारी कर रहे हैं।&nbsp;</span><span style="font-size: 1rem;">बचपन की एक आम शेखी के रूप में शुरू हुई यह बात तब रोमांचक मोड़ लेती है, जब चमकीली पोशाकों में दो दिलचस्प किरदार (सहरश शुक्ला और कुमार सौरभ) एंट्री मारते हैं और बच्चों की इस काल्पनिक कहानी को सच में बदल देते हैं। इसके बाद बच्चे पूरी तरह 'मिशन मोड' में आ जाते हैं।</span></div><div><br></div><h2>'दादा-सुपरहीरो' के रूप में छा गए जैकी श्रॉफ</h2><div>यह कोई मार्वल (Marvel) स्टाइल की वीएफएक्स-हैवी फिल्म नहीं है और न ही 'कृष' जैसी स्टाइलिश उड़ने वाली फिल्म है; बल्कि यह अपने देसी और कॉमिक-बुक वाले अंदाज में सबसे ज्यादा निखरती है।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">&nbsp;फिल्म में जैकी श्रॉफ एक प्यारे और उम्रदराज दादा के रोल में हैं, जो एक तरफ तो दुनिया बचाने का दावा करते हैं, लेकिन दूसरी तरफ जब एक मामूली छिपकली को देखकर बुरी तरह डर जाते हैं, तो उनका सारा 'सुपरहीरो' वाला रौब पल भर में हवा हो जाता है। जैकी ने इस किरदार को भारी-भरकम उपदेश देने वाले बुजुर्ग के बजाय बेहद जिंदादिल, रहस्यमयी और मजेदार बनाया है।</span></div><div><br></div><h2>स्टार परफॉर्मेंस और मुख्य आकर्षण</h2><div><b>सशक्त बाल कलाकार: </b>दीपू के लीड रोल में मिहिर गोडबोले ने गजब का आत्मविश्वास दिखाया है। वहीं उनके दोस्तों के रूप में शिवंश चोरगे और जिहान होदार की खेल के मैदान वाली स्वाभाविक केमिस्ट्री और मासूमियत दिल जीत लेती है।</div><div><br></div><div><b>शानदार सपोर्टिंग कास्ट: </b>प्रतीक स्मिता पाटिल ने एलियन के किरदार को सामान्य कैरिकेचर बनाने के बजाय उसमें रहस्य और आकर्षण का बेहतरीन तड़का लगाया है। भाग्यश्री पटवर्धन का कैमियो और 'भारत माता की जय' वाला दृश्य फिल्म के ड्रामे को और रोमांचक बनाता है। वहीं दुर्गेश कुमार का बेतुका किरदार भी फिल्म के माहौल में सहजता से फिट बैठता है।</div><div><br></div><div>साफ़-साफ़ कहें तो, यह कोई 'मार्वल' स्टाइल की शानदार फ़िल्म नहीं है जो दुनिया भर की बड़ी फ़िल्मों से मुक़ाबला करने की कोशिश कर रही हो, और न ही यह 'कृष' जैसी कोई फ़िल्म है जिसमें हीरो स्टाइलिश उड़ने वाली पोशाक पहनता हो। असल में, यह फ़िल्म तब सबसे अच्छी लगती है जब यह अपने देसी, थोड़े कच्चे-पक्के और कॉमिक-बुक वाले अंदाज़ को पूरी तरह से अपना लेती है। एलियंस काफ़ी नाटकीय हैं, हालात थोड़े अजीबोगरीब हैं और बच्चे हर समय 'मिशन मोड' में रहते हैं। कई लोगों को यह फ़िल्म थोड़ी मज़ाकिया या पैरोडी जैसी भी लग सकती है, लेकिन जिस ईमानदारी से इसकी कहानी कही गई है, उसकी वजह से 'द ग्रेट ग्रैंड सुपरहीरो' दर्शकों के दिलों को छूने में कामयाब रहती है।</div><div><br></div><div>और फिर, फ़िल्म में जैकी श्रॉफ की एंट्री होती है। वह एक प्यारे और उम्रदराज़ दादा के किरदार में नज़र आते हैं, जो या तो दुनिया को बचा सकते हैं या फिर आपको उनके खोए हुए चश्मे को ढूंढने पर मजबूर कर सकते हैं। फ़िल्म के सबसे प्यारे और मज़ेदार पलों में से एक वह है, जब पोते का बताया हुआ यह 'निडर' दादा एक छिपकली को देखकर बुरी तरह डर जाता है, और इस तरह उसका 'सुपरहीरो' वाला रौब पल भर में ही हवा हो जाता है।</div><div><br></div><div>यह साफ़ ज़ाहिर है कि जैकी इस फ़िल्म को करते हुए काफ़ी मज़े कर रहे हैं, और इसी वजह से उन्हें देखना और भी ज़्यादा मनोरंजक हो जाता है। किसी फ़िल्म में हीरो को ज़िंदगी के सबक सिखाने वाले किसी दूसरे गंभीर बुज़ुर्ग का किरदार निभाने के बजाय, उन्हें एक 'दादा-सुपरहीरो' के रूप में देखना अपने आप में एक बेहद प्यारा अनुभव है। वह अपने अभिनय में गर्माहट, हास्य और थोड़ा सा रहस्य लेकर आते हैं, जिससे बच्चे - और सच कहूँ तो, दर्शक भी - यह मानने लगते हैं कि शायद यह आदमी सचमुच रात के खाने के बाद एलियंस से लड़ता है।</div><div><br></div><div>यह फिल्म बचपन की एक आम याद को भी चतुराई से छूती है: दादा-दादी द्वारा सुनाई गई हर मनगढ़ंत कहानी पर विश्वास करना। चाहे भूत हों, छिपे हुए खजाने हों, गुप्त शक्तियाँ हों या असंभव रोमांच, दादा-दादी हमेशा से ही कहानी सुनाने में माहिर रहे हैं। द ग्रेट ग्रैंड सुपरहीरो इसी विचार के इर्द-गिर्द अपनी पूरी भावनात्मक बुनावट करता है, और यहीं से यह फिल्म सिर्फ एक मनोरंजक बच्चों की फिल्म से कहीं अधिक बन जाती है।</div><div><br></div><div>युवा कलाकारों की सराहना करनी चाहिए क्योंकि फिल्म की ऊर्जा काफी हद तक उनके द्वारा पूरी ईमानदारी से पागलपन को निभाने पर निर्भर करती है। मिहिर गोडबोले पूरी लगन और आत्मविश्वास के साथ फिल्म का नेतृत्व करते हैं, जबकि उनके दोस्तों के रूप में शिवंश चोरगे और जिहान होदार रोमांच वाले दृश्यों में एक अद्भुत मासूमियत और खेल के मैदान जैसी ऊर्जा भर देते हैं। उनकी केमिस्ट्री स्वाभाविक, जोशीली और बेहद बेपरवाह लगती है, खासकर उन पलों में जब उन्हें लगता है कि वे किसी भयानक एलियन हमले के बीच में हैं।</div><div><br></div><div>प्रतीक स्मिता पाटिल ने भी अराजकता के केंद्र में मौजूद एलियन किरदार के रूप में अपनी छाप छोड़ी है, और इसे एक सामान्य साइंस फिक्शन कैरिकेचर में बदलने के बजाय इसमें रहस्य और आकर्षण का संगम पैदा किया है। भाग्यश्री पटवर्धन की दमदार कैमियो और 'भारत माता की जय' का दृश्य अंतर-ग्रहीय ड्रामा को और भी रोमांचक बनाते हैं, जबकि दुर्गेश कुमार का बेतुका किरदार फिल्म के विलक्षण छोटे ब्रह्मांड में सहजता से समा जाता है।</div><div><br></div><div>फिल्म की एक और खासियत यह है कि यह शिक्षाप्रद, प्रेरणादायक या भावुक होने का प्रयास नहीं करती। यह बस बच्चों, कल्पना, दोस्ती और एक अनिच्छुक लेकिन साहसी दादाजी की एक मनोरंजक कहानी सुनाना चाहती है। और ऐसे उद्योग में जो आजकल हिंसा, अंधकारमय ब्रह्मांडों और अति-पुरुषवादी नायकों के प्रति आसक्त है, एलियंस, बचपन की उथल-पुथल और दादाजी की ऊर्जा से भरपूर यह फिल्म वाकई ताजगी का एहसास कराती है।</div><div><br></div><div>बेशक, फिल्म त्रुटिहीन नहीं है। दो घंटे से कम की अवधि के बावजूद, कुछ हिस्से खिंचे हुए से लगते हैं। भाव-भंगिमा में बदलाव भी कभी-कभी अनियमित हो जाते हैं, और सुगठित विज्ञान कथा की तलाश करने वाले वयस्क दर्शक शायद कभी-कभी अपने फोन में उलझकर बेचैन हो जाएं। साथ ही, परग्रही आक्रमण की ऊर्जा से पर्यावरण संरक्षण मिशन की ओर क्षणिक बदलाव भी कई लोगों को निराश कर सकता है।</div><div><br></div><div>हालांकि, द ग्रेट ग्रैंड सुपरहीरो की सबसे बड़ी खूबी है इसका अद्भुत अनुभव। यह समझता है कि बच्चों को हमेशा परफ़ेक्शन की ज़रूरत नहीं होती; कभी-कभी उन्हें बस एक ऐसी कहानी चाहिए होती है, जो उन्हें यह यकीन दिला सके कि उनके आस-पास भी कुछ जादुई चीज़ें हो सकती हैं। शायद उनके स्कूल में, शायद उनके मोहल्ले में, या शायद उनके अपने ही घर में। या शायद उनके दादाजी में। और इसी तरह सिनेमा जादू रचता है।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 29 May 2026 15:36:11 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/the-great-grand-superhero-review-it-rekindles-innocence-of-childhood-brings-back-old-memories</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Aakhri Sawal Movie Review | संजय दत्त और नमाशी चक्रवर्ती के बीच इतिहास और RSS पर तथ्यों से भरी कड़क बहस]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/aakhri-sawal-movie-review-history-and-the-rss-between-sanjay-dutt-and-namashi-chakraborty]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>डायरेक्टर अभिजीत मोहन वारंग की नई फिल्म 'आखिरी सवाल' सिनेमाघरों में दस्तक दे चुकी है। यह फिल्म महज मनोरंजन नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास, राजनीति और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के इर्द-गिर्द बुनी गई एक वैचारिक और तथ्यों से भरी बहस (Debate Drama) है। फिल्म दिखावे की सोशल मीडिया वाली नकली दुनिया और देश की जमीनी हकीकत के बीच के अंतर को बेहद संजीदगी से उजागर करती है। हाल ही में 100 साल पूरे कर चुके संगठन RSS के उन पहलुओं और योगदानों को यह फिल्म सामने लाती है, जिनसे आम जनता अनजान है।</div><div><br></div><div><b>क्या है 'आखिरी सवाल' की कहानी?</b></div><div>फिल्म की कहानी घूमती है एक बेहद होनहार, बुद्धिमान लेकिन गुस्सैल युवक विक्की हेगड़े (नमाशी चक्रवर्ती) के इर्द-गिर्द। विक्की ने RSS पर एक थीसिस लिखी है, जिसे कॉलेज द्वारा खारिज कर दिया जाता है। इस बात से नाराज होकर विक्की अपने ही सम्मानित गुरु प्रोफेसर गोपाल नाडकर्णी (संजय दत्त) पर संस्थागत पक्षपात (Institutional Bias) का आरोप लगा देता है।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/actress-meenakshi-seshadri-returns-to-mumbai-seeks-impactful-roles" target="_blank">बॉलीवुड में फिर कदम रखेंगी 'दामिनी' फेम Meenakshi Seshadri, 62 की उम्र में फिल्मों और ओटीटी के लिए तलाश रहीं प्रभावशाली भूमिकाएं</a></h3><div>&nbsp;</div><div><br></div><div>अकादमिक स्तर पर शुरू हुआ यह विवाद धीरे-धीरे एक बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बन जाता है और आखिरकार एक हाई-वोल्टेज लाइव टीवी डिबेट का रूप ले लेता है। इस बहस के जरिए डायरेक्टर अभिजीत मोहन वारंग और लेखक उत्कर्ष नैथानी ने देश के कई बेहद संवेदनशील और ऐतिहासिक मुद्दों को छुआ है, जिनमें शामिल हैं:</div><div><br></div><div>महात्मा गांधी की हत्या और उससे जुड़े तथ्य।</div><div>आपातकाल (Emergency) के काले दौर में RSS की भूमिका।</div><div>बाबरी मस्जिद विध्वंस का घटनाक्रम।</div><div>सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाओं में संगठन का राहत कार्य।</div><div>केरल में एक संघ कार्यकर्ता की दुखद मौत का संवेदनशील मुद्दा।</div><div><br></div><div>फिल्म में प्रोफेसर नाडकर्णी के जरिए यह नैरेटिव सेट किया गया है कि संगठन का मूल उद्देश्य जाति, पंथ और वर्ग के भेदभाव को मिटाकर हिंदू समाज को एकजुट करना और नागरिकों में सांस्कृतिक गौरव जगाना है।</div><div><br></div><div><b>उत्कर्ष नैथानी के दमदार डायलॉग्स ने मारी बाजी</b></div><div>इस फिल्म की असली जान इसकी कसी हुई स्क्रिप्ट और कड़क डायलॉग्स हैं। लेखक उत्कर्ष नैथानी ने RSS के प्रति समाज में बनी धारणाओं और जमीनी सच्चाई दोनों पक्षों को बहुत ही तार्किक और विश्वसनीय तरीके से आमने-सामने रखा है।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/mistreating-deepika-padukone-is-impossible-in-this-lifetime-imtiaz-ali-clarifies" target="_blank">'Deepika Padukone के साथ बुरा बर्ताव इस जन्म में मुमकिन नहीं', 'कॉकटेल' विवाद पर Imtiaz Ali ने दी सफाई</a></h3><div>&nbsp;</div><div><br></div><div>यह फिल्म सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहती, बल्कि हिंदू धर्म और इस्लाम दोनों के ही धार्मिक और ऐतिहासिक तथ्यों की गहराई में उतरती है। संवादों के जरिए दर्शकों को कुछ ऐसी अनोखी जानकारियां मिलती हैं, जैसे:</div><div><br></div><div><b>नटराज की मूर्ति के नीचे दबी बच्चे जैसी आकृति (अपस्मार पुरुष) का आध्यात्मिक महत्व क्या है?</b></div><div><b><br></b></div><div><b>इस्लामी ग्रंथों और शरिया के अनुसार मस्जिद बनाने के लिए कौन सी अनिवार्य शर्तें तय की गई हैं?</b></div><div><br></div><div>तकनीक का मास्टरस्ट्रोक: अतीत को दिखाने के लिए AI का बेहतरीन इस्तेमाल</div><div>फिल्म की एक और सबसे बड़ी यूएसपी (USP) इसका तकनीकी पक्ष है। अतीत की ऐतिहासिक घटनाओं और संगठन की 100 साल की यात्रा को स्क्रीन पर जीवंत करने के लिए मेकर्स ने किसी पुराने धुंधले फुटेज का इस्तेमाल करने के बजाय AI-जनरेटेड विजुअल्स (AI-Generated Footage) का सहारा लिया है। तकनीक का यह इस्तेमाल इतना शानदार और सटीक है कि हर सीन की बारीकी और कारीगरी स्क्रीन पर साफ झलकती है, जो दर्शकों को सीधे उस दौर से जोड़ देती है।</div><div><br></div><div><b>अभिनय: छा गए संजू बाबा, नमाशी चक्रवर्ती ने किया हैरान</b></div><div>संजय दत्त: प्रोफेसर गोपाल नाडकर्णी के रूप में संजय दत्त ने अपने करियर का वन ऑफ द बेस्ट परफॉर्मेंस दिया है। शुद्ध हिंदी और कठिन संस्कृत श्लोकों के संवाद बोलते हुए संजू बाबा का ठहराव, गंभीरता और संयम देखने लायक है।</div><div><br></div><div>नमाशी चक्रवर्ती: एक बागी और वैचारिक रूप से मजबूत छात्र 'विक्की हेगड़े' के रोल में मिथुन चक्रवर्ती के बेटे नमाशी ने चौंकाया है। पूरी फिल्म में वे संजय दत्त जैसे दिग्गज के सामने पूरी शिद्दत और भरोसे के साथ टिके रहते हैं।</div><div><br></div><div>सपोर्टिंग कास्ट: अमित साध ने 'आदित्य राव' के एक छोटे से कैमियो रोल में हमेशा की तरह प्रभावित किया है। मृणाल कुलकर्णी ने प्रोफेसर की पत्नी के रूप में शानदार अभिनय किया है। हालांकि, समीरा रेड्डी (डॉ. पल्लवी) के चेहरे के बनावटी हाव-भाव निराश करते हैं। त्रिधा चौधरी और नीतू चंद्रा के पास फिल्म में करने के लिए कुछ खास नहीं था, वे सिर्फ सजावटी किरदारों में सिमट कर रह गईं।</div><div><br></div><div><b>निर्देशन और संगीत</b></div><div>117 मिनट की इस कसी हुई फिल्म को एडिट और डायरेक्ट करने का पूरा श्रेय अभिजीत मोहन वारंग को जाता है। उन्होंने फिल्म को कहीं भी बोझिल या उबाऊ नहीं होने दिया है, खासकर सेकंड हाफ और फिल्म का क्लाइमेक्स, जो पूरी तरह से अकाट्य तथ्यों (Facts) पर आधारित है, दर्शकों को बांधकर रखता है।</div><div><br></div><div>मोंटी शर्मा का बैकग्राउंड स्कोर दृश्यों के तनाव को बखूबी बढ़ाता है। फिल्म के अंत में बजने वाला इंदीवर का लिखा क्लासिक गाना 'है प्रीत जहाँ की रीत सदा' थिएटर से बाहर निकलते हुए दर्शकों के दिलों में देशभक्ति का एक अलग जज्बा छोड़ जाता है।</div><div><br></div><div>रेटिंग: 3.5/5 स्टार (तथ्यात्मक सिनेमा और कड़क राजनीतिक ड्रामा पसंद करने वालों के लिए एक मस्ट-वॉच फिल्म)।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 27 May 2026 14:21:39 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/aakhri-sawal-movie-review-history-and-the-rss-between-sanjay-dutt-and-namashi-chakraborty</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Chand Mera Dil Movie Review: शानदार संगीत और उम्दा कोशिश के बावजूद कमजोर लेखन की भेंट चढ़ी अनन्या पांडे और लक्ष्य की फिल्म]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/chand-mera-dil-movie-review--ananya-panday-lakshya-film]]></guid>
      <description><![CDATA[<div><span style="font-size: 1rem;">कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जो सिनेमाघर के अंधेरे से बाहर आने के बाद भी आपके दिलो-दिमाग में एक गहरी छाप छोड़ जाती हैं, जबकि कुछ फिल्में अपने पूरे रनटाइम के दौरान दर्शकों को हर एक मिनट घड़ी देखने पर मजबूर कर देती हैं। अनन्य पांडे और नवोदित अभिनेता लक्ष्य की नई फिल्म 'चाँद मेरा दिल' बदकिस्मती से दूसरी श्रेणी में खड़ी नजर आती है। यह फिल्म उन युवाओं की एक बेहद भावुक दास्तां बयां करने की कोशिश करती है जिन्हें परिस्थितियों के कारण वक्त से पहले परिपक्व होना पड़ा, लेकिन मेलोड्रामा और उलझी हुई राइटिंग के भंवर में फंसकर यह अपनी मूल राह से भटक जाती है।</span></div><div><br></div><div>देखा जाए तो फिल्म का उद्देश्य बॉलीवुड में रोमांस की किसी नई परिभाषा को गढ़ना नहीं था। एक सीधी-सादी, मर्मस्पर्शी कहानी भी दर्शकों को थियेटर तक खींच सकती है बशर्ते उसमें सच्चाई हो। लेकिन 'चाँद मेरा दिल' कभी अत्यधिक साधारण तो कभी बेवजह पेचीदा लगने लगती है। धर्मा प्रोडक्शंस के बैनर तले बनी इस फिल्म में कुछ प्यारे पल, बेहतरीन संगीत और कलाकारों की केमिस्ट्री की झलक जरूर मिलती है, परंतु फिल्म को एक सूत्र में पिरोकर रखने वाली 'आत्मा' नदारद है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/how-voice-of-radio-become-bollywood-superstar-know-journey" target="_blank">Sunil Dutt Death Anniversary: रेडियो की आवाज से कैसे बने Bollywood के Superstar, जानें सफर</a></h3><div>&nbsp;</div><div><br></div><h2>क्या है 'चाँद मेरा दिल' की कहानी?</h2><div>फिल्म की पटकथा चांदनी (अनन्या पांडे) और आरव (लक्ष्य) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो इंजीनियरिंग के छात्र हैं और कॉलेज के दिनों में एक-दूसरे के प्यार में गिरफ्तार हो जाते हैं। उनका यह प्रेम-प्रसंग बेहद तीव्र गति से आगे बढ़ता है और जल्द ही चांदनी गर्भवती (प्रेग्नेंट) हो जाती है। दोनों परिवारों के कड़े विरोध और सामाजिक बंधनों की परवाह न करते हुए वे इस बच्चे को दुनिया में लाने का साहसिक निर्णय लेते हैं। इसके बाद शुरू होता है आर्थिक तंगी, भावनात्मक अपरिपक्वता और समाज के तानों से जूझते हुए अपनी नई गृहस्थी बसाने का संघर्ष। इसी बीच दोनों के मध्य एक बड़ा विवाद होता है, जो उनकी संपूर्ण जीवन-यात्रा की दिशा बदल देता है।</div><div><br></div><div>कागज पर यह कहानी जितनी सुगठित और मर्मस्पर्शी लगती है, स्क्रीनप्ले में आते-आते इसके इमोशनल उतार-चढ़ाव उतने ही बेअसर साबित होते हैं। कई दृश्य स्वाभाविक न लगकर जबरन जोड़े हुए प्रतीत होते हैं।</div><div><br></div><h2>अभिनय: अनन्या की मेहनत और लक्ष्य की स्क्रीन प्रेजेंस</h2><div>अनन्या पांडे (चांदनी): अनन्या ने इस किरदार के लिए सचमुच काफी पसीना बहाया है। वे चांदनी की संवेदनशीलता और आंतरिक संघर्ष को पर्दे पर उतारने का पूरा प्रयास करती हैं। कई दृश्यों में उनकी यह कोशिश रंग लाती है और उनका अभिनय जीवंत लगता है, हालांकि कमजोर स्क्रिप्ट के कारण कुछ जगहों पर उनके हाव-भाव कृत्रिम लगने लगते हैं।</div><div><br></div><div>लक्ष्य (आरव): नवोदित अभिनेता लक्ष्य की स्क्रीन प्रेजेंस कमाल की है। उनकी बॉडी लैंग्वेज और संवाद अदायगी कई मौकों पर अभिनेता रणबीर कपूर की शुरुआती फिल्मों की याद दिलाती है। कुछ दृश्यों में अनन्या के साथ उनकी केमिस्ट्री में बेहतरीन चिंगारी दिखती है, लेकिन लेखन की शिथिलता के कारण उनका किरदार पूरी तरह निखर नहीं पाता।</div><div><br></div><div>फिल्म के कुछ हिस्सों में सह-कलाकारों का अभिनय इतना रिहर्सल किया हुआ और बनावटी लगता है कि दर्शक पल को महसूस करने के बजाय यह सोचने लगते हैं कि कलाकार कैमरे के पीछे से मिल रहे संकेतों का इंतजार कर रहे हैं।</div><div><br></div><h2>निर्देशन और संगीत: सचिन-जिगर का जादू बरकरार</h2><div>विवेक सोनी द्वारा निर्देशित यह फिल्म शुरू से ही अपने टोन (लहजे) को लेकर असमंजस में दिखती है। यह एक साथ यथार्थवादी और अत्यधिक नाटकीय होने की कोशिश करती है, जिसके कारण दोनों का संतुलन बिगड़ जाता है। महत्वपूर्ण भावनात्मक मोड़ों को बहुत जल्दबाजी में समेट दिया गया है, जबकि कुछ गैर-जरूरी दृश्य बहुत लंबे खींच दिए गए हैं।</div><h2><br>फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष:</h2><div>'चाँद मेरा दिल' का सबसे बड़ा और सकारात्मक पहलू इसका संगीत है। संगीतकार जोड़ी सचिन-जिगर ने एक ऐसा जबरदस्त साउंडट्रैक तैयार किया है जो फिल्म के ढीले दृश्यों में भी जान फूंक देता है। फिल्म का शीर्षक गीत (टाइटल ट्रैक) और कुछ कोमल धुनें किरदारों के संवादों से भी अधिक गहराई से भावनाओं को व्यक्त करने में सफल रही हैं।</div><div><br></div><h2>चाँद मेरा दिल: क्या अच्छा है</h2><div>कुछ पल ऐसे भी हैं जब फिल्म अपनी लय लगभग पा ही लेती है। एक शांत बातचीत। एक छोटी-सी बहस। मुख्य किरदारों के बीच एक संवेदनशील संवाद। ये हिस्से वास्तविक लगते हैं। अनन्या और लक्ष्य के बीच की केमिस्ट्री कुछ पलों के लिए ही सही, लेकिन असरदार लगती है—खासकर कॉलेज वाले हल्के-फुल्के दृश्यों में। जब पटकथा कमज़ोर पड़ती है, तब भी संगीत भावनात्मक माहौल को जीवंत बनाए रखने में मदद करता है।</div><div><br></div><h2>चाँद मेरा दिल: क्या अच्छा नहीं है</h2><div>कहानी खुद ही अपनी सबसे बड़ी बाधा बन जाती है। यह सरलता और ज़बरदस्ती की जटिलता के बीच लगातार झूलती रहती है, और कोई भी पक्ष पूरी तरह से सफल नहीं हो पाता। पटकथा में भावनात्मक निरंतरता की कमी है, और कई दृश्य अधूरे से लगते हैं। इसी वजह से कलाकारों के अभिनय पर भी बुरा असर पड़ता है। कुछ पल ऐसे भी आते हैं जब संवाद अस्वाभाविक लगते हैं, और प्रतिक्रियाएँ देर से आती हैं—मानो कैमरे के पीछे से कोई उन्हें संकेत दे रहा हो।</div><div><br></div><div>फिल्म अपनी गति (pacing) को लेकर भी संघर्ष करती है। जिन जगहों पर इसे तेज़ी से आगे बढ़ना चाहिए, वहाँ यह धीमी पड़ जाती है; और जिन दृश्यों को वास्तव में समय की ज़रूरत होती है, उन्हें यह जल्दबाजी में निपटा देती है।</div><div><br></div><h2>चाँद मेरा दिल: अंतिम फैसला</h2><div>'चाँद मेरा दिल' में एक दिल को छू लेने वाले रोमांटिक ड्रामा के लिए ज़रूरी सभी तत्व मौजूद थे, लेकिन यह फिल्म उन तत्वों को एक साथ पिरोकर एक संपूर्ण कृति नहीं बन पाई। कलाकारों ने मेहनत की है, संगीत भी अच्छा है, और कुछ भावनात्मक पल भी हैं जो असरदार हैं। लेकिन कमज़ोर लेखन और असमान प्रस्तुति फिल्म को दर्शकों पर एक स्थायी छाप छोड़ने से रोक देते हैं। यह कोई बहुत बुरी फिल्म नहीं है; बस निराशाजनक रूप से औसत दर्जे की है। 'चाँद मेरा दिल' को 5 में से 2 स्टार।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 25 May 2026 14:01:37 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/chand-mera-dil-movie-review--ananya-panday-lakshya-film</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[System Movie Review | सत्ता के खेल, रसूख और जज्बात की जंग में चमकीं ज्योतिका और सोनाक्षी सिन्हा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/system-movie-review-jyothika-sonakshi-sinha-shine-in-battle-power-games-influence-and-emotions]]></guid>
      <description><![CDATA[<div><div><span style="font-size: 1rem;">कोर्टरूम ड्रामा की दुनिया में जब भी कोई फिल्म आती है, तो अमूमन उम्मीद चीख-पुकार, नाटकीय बहस और आखिरी मिनट में मिलने वाले किसी चौंकाने वाले ट्विस्ट की होती है। लेकिन निर्देशक अश्विनी अय्यर तिवारी की नई फिल्म 'System' इन घिसे-पिटे रास्तों से अलग हटकर बड़े इरादों, दबे हुए जज्बातों और सिस्टम के अंदर सुलगती आग के साथ कदम रखती है। पहली नज़र में यह सत्ता के खेल और नैतिक दुविधाओं के इर्द-गिर्द बुना गया एक जाना-पहचाना लीगल ड्रामा लगता है, लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, यह कानूनी से ज्यादा इंसानी और निजी जंग में तब्दील हो जाती है।</span></div><div><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div><div><span style="font-size: 1rem;">ओटीटी प्लेटफॉर्म: प्राइम वीडियो (Prime Video)</span></div><div>निर्देशक: अश्विनी अय्यर तिवारी</div><div>मुख्य कलाकार: सोनाक्षी सिन्हा, ज्योतिका, आशुतोष गोवारिकर</div><div><span style="font-size: 1rem;">रेटिंग: 3.5/5</span><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div><div><br></div><h2>क्या है 'System' की कहानी?</h2><div>फिल्म का ताना-बाना नेहा राजवंश (सोनाक्षी सिन्हा) के इर्द-गिर्द बुना गया है। नेहा एक बेहद महत्वाकांक्षी और आत्मविश्वास से भरी पब्लिक प्रॉसिक्यूटर (सरकारी वकील) है। वह अपने पिता (आशुतोष गोवारिकर) की प्रतिष्ठित लॉ फर्म में पार्टनर बनने की चाहत रखती है और खुद को साबित करने की जद्दोजहद में जुटी है। कहानी में मोड़ तब आता है, जब उसके पिता उसे एक ऐसा पेचीदा केस सौंप देते हैं, जो नेहा को नैतिकता के 'ग्रे शेड' (सही और गलत के धुंधले दायरे) में धकेल देता है।</div><div><br></div><div>इस अदालती और कानूनी भूलभुलैया से पार पाने के लिए नेहा हाथ मिलाती है सारिका रावत (ज्योतिका) से। सारिका एक बेहद तेज-तर्रार कोर्ट स्टेनोग्राफर है। वह इस पूरे 'सिस्टम' की रग-रग से वाकिफ है, लेकिन उसके शांत चेहरे के पीछे कुछ छिपे हुए निजी इरादे और पुराने राज भी हैं। इसके बाद शुरू होता है पेशेवर जिम्मेदारियों और निजी मकसदों के टकराव का एक दिलचस्प दौर।</div><div><br></div><h2>सधी हुई पटकथा और मारक संवाद</h2><div>'System' की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह हर कुछ मिनट में कोर्टरूम के मेलोड्रामा की तरफ भागने के बजाय, अपने किरदारों की परतों को धीरे-धीरे खोलने का समझदारी भरा तरीका अपनाती है। फिल्म का दूसरा हाफ थोड़ा जाना-पहचाना लग सकता है, लेकिन इसका भावनात्मक वजन दर्शकों को बांधे रखता है।</div><div><br></div><div>फिल्म के संवाद इसकी रीढ़ की हड्डी हैं। डायलॉग्स बेहद तीखे और धारदार हैं, जिन्हें जबरदस्ती लाउड बनाने की कोशिश नहीं की गई है। फिल्म का एक संवाद पूरी कहानी का सार बयां कर देता है:</div><div><br></div><h2>"अमीरी के शोर में गरीब की आवाज़ खो जाती है"</h2><div>लेखन की परिपक्वता इस बात से भी झलकती है कि फिल्म में खामोशी का इस्तेमाल बेहतरीन तरीके से किया गया है। कई जगहों पर औपचारिक शब्दों के पीछे छिपे किरदारों के अनकहे जज्बात ज्यादा गहरा असर छोड़ जाते हैं।</div></div><div><br></div><div><b>सिस्टम: परफॉर्मेंस</b></div><div>ज्योतिका यकीनन इस फिल्म की जान हैं। सारिका रावत के रूप में उनका किरदार बेहद जीवंत और स्वाभाविक लगता है। वह ताकत, संवेदनशीलता और होशियारी को इतनी सहजता से एक साथ पेश करती हैं कि आप कभी पूरी तरह समझ नहीं पाते कि सारिका क्या सोच रही है; और यही बात देखने में बेहद दिलचस्प लगती है। पूरी फिल्म के दौरान, उनके शांत और संयमित चेहरे के पीछे एक गहरा दर्द छिपा रहता है। उनकी एक्टिंग में बनावटीपन बिल्कुल नहीं लगता। सब कुछ एकदम असली लगता है।</div><div><br></div><div>सोनाक्षी सिन्हा ने हाल के समय में अपनी सबसे सधी हुई परफॉर्मेंस दी है। नेहा राजवंश का किरदार आसानी से बहुत ज़्यादा रूखा या बहुत ज़्यादा ग्लैमरस हो सकता था, लेकिन सोनाक्षी ने अधिकार और भावनात्मक उथल-पुथल के बीच एक बेहतरीन संतुलन बनाए रखा है। वह अपने किरदार के अंदरूनी टकराव को बखूबी निभाती हैं, खासकर तब जब दबाव के चलते नेहा का आत्मविश्वास धीरे-धीरे डगमगाने लगता है।</div><div><br></div><div>आशुतोष गोवारिकर अपने किरदार में एक गंभीरता और गरिमा लाते हैं, बिना किसी सीन पर बेवजह हावी हुए। उनकी मौजूदगी कानूनी और भावनात्मक दांव-पेच को और भी ज़्यादा वज़नदार बना देती है। सहायक कलाकारों ने भी बेहतरीन काम किया है, भले ही कुछ किरदारों में और ज़्यादा गहराई की गुंजाइश थी।</div><div><br></div><div><b>सिस्टम: निर्देशन</b></div><div>अश्विनी अय्यर तिवारी ने फिल्म को अत्यधिक नाटकीयता के बजाय संवेदनशीलता के साथ संभाला है, और यही बात 'सिस्टम' को आम कोर्टरूम ड्रामा फिल्मों से अलग बनाती है। यह फिल्म तमाशों या भव्यता के बजाय किरदारों और इंसानी पहलुओं को दिखाने में ज़्यादा दिलचस्पी रखती है, और यही बात इसके पक्ष में काम करती है। भावनात्मक पलों को खुलकर उभरने का पूरा मौका दिया गया है।</div><div><br></div><div>इसके साथ ही, फिल्म की गति (पेस) कुछ जगहों पर थोड़ी और तेज़ या कसी हुई हो सकती थी। कुछ सीन ज़रूरत से ज़्यादा लंबे खिंच जाते हैं, और कभी-कभी फिल्म उन भावनात्मक विचारों को दोहराती है जिन्हें दर्शक पहले ही समझ चुके होते हैं। फिर भी, अश्विनी केवल कहानी में आने वाले ट्विस्ट्स के भरोसे न रहकर, किरदारों के आपसी तालमेल और बातचीत के ज़रिए फिल्म में तनाव बनाए रखने में सफल रहती हैं—और यह बात तारीफ़ के काबिल है।</div><div><br></div><div>जिस तरह से वह इंसानी कमज़ोरियों और खामियों वाले किरदारों को पेश करती हैं, उसमें एक खास तरह की ईमानदारी झलकती है। यहाँ कोई भी किरदार पूरी तरह से हीरो जैसा नहीं लगता। और न ही कोई पूरी तरह से खलनायक या बुरा इंसान लगता है। किरदारों का यह 'ग्रे' (न अच्छा न बुरा) पहलू ही फिल्म को शुरू से आखिर तक दिलचस्प बनाए रखता है।</div><div><br></div><div><b>System: क्या अच्छा है</b></div><div>System की सबसे अच्छी बात यह है कि यह कितनी खामोशी से असरदार लगती है। फिल्म हर कुछ मिनट में चालाक या नाटकीय दिखने की बहुत ज़्यादा कोशिश नहीं करती, और यही संयम असल में इसकी ताकत बन जाता है। कई भावुक पल इसलिए असरदार लगते हैं क्योंकि कलाकार खामोशी को अपना काम करने देते हैं। ज्योतिका यहाँ सचमुच शानदार हैं। उनके हाव-भाव के पीछे लगभग हर समय उदासी, गुस्सा और हिसाब-किताब छिपा रहता है, लेकिन वह इसे कभी भी ज़रूरत से ज़्यादा नहीं दिखातीं। सोनाक्षी सिन्हा भी कुछ हिस्सों में अपने अभिनय से चौंकाती हैं; उनका अभिनय बहुत ज़्यादा तराशा हुआ न होकर, संयमित और विश्वसनीय लगता है। यहाँ तक कि कोर्टरूम के दृश्य भी ज़्यादातर ज़मीनी लगते हैं। भड़कीले नहीं। बस एक बहुत ही मानवीय तरीके से तनावपूर्ण।</div><div><b><br></b></div><div><b>System: क्या अच्छा नहीं है</b></div><div>इसके बावजूद, फिल्म कुछ जगहों पर थोड़ी ऊबड़-खाबड़ हो जाती है। बीच के हिस्सों में फिल्म की गति (pacing) काफ़ी धीमी हो जाती है, और कुछ दृश्य ज़रूरत से ज़्यादा लंबे खिंच जाते हैं। कभी-कभी ऐसा लगता है कि फिल्म उन भावुक बातों को दोहरा रही है जो पहले से ही साफ़ थीं। अगर एडिटिंग थोड़ी और कसी हुई होती, तो फिल्म का कुल मिलाकर असर काफ़ी बेहतर होता।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/demand-for-fir-against-bengali-actors-parambrata-chatterjee-and-swastika-mukherjee" target="_blank">चुनाव बाद हुई हिंसा भड़काने का आरोप! बंगाली कलाकार Parambrata Chatterjee और Swastika Mukherjee के खिलाफ FIR की मांग</a></h3><div><br></div><div>कुछ ऐसे पल भी आते हैं जब System जानी-पहचानी कोर्टरूम ड्रामा वाली राह पर चलने लगती है। फिल्म के बीच में कुछ घटनाक्रमों का अंदाज़ा लगाना आसान हो जाता है, खासकर अगर आप इस जॉनर की बहुत सारी फिल्में देखते हैं। कुछ सहायक किरदारों को भी ठीक से गढ़ा नहीं गया है; ऐसा लगता है जैसे वे सिर्फ़ मुख्य कहानी को आगे बढ़ाने के लिए ही मौजूद हैं। और जहाँ एक तरफ फिल्म को अपने शांत और सूक्ष्म अंदाज़ से फ़ायदा होता है, वहीं कुछ पल ऐसे भी आते हैं जब आप चाहते हैं कि फिल्म थोड़ी और बेतरतीब और भावनात्मक रूप से ज़्यादा विस्फोटक होती।</div><div><br></div><div><b>System: अंतिम फ़ैसला</b></div><div>System कोई एकदम सही कोर्टरूम ड्रामा नहीं है, लेकिन यह भावनात्मक रूप से काफ़ी दिलचस्प है। यह इसलिए सफल होती है क्योंकि यह कानूनी दुनिया को एक भड़कीले युद्ध के मैदान की तरह दिखाने के बजाय, सिस्टम में फँसे लोगों पर ज़्यादा ध्यान केंद्रित करती है। दमदार अभिनय—खासकर ज्योतिका और सोनाक्षी का—और सोच-समझकर लिखी गई कहानी फिल्म को इसके जाने-पहचाने ढाँचे से ऊपर उठाने में मदद करते हैं।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/demand-for-fir-against-bengali-actors-parambrata-chatterjee-and-swastika-mukherjee" target="_blank">चुनाव बाद हुई हिंसा भड़काने का आरोप! बंगाली कलाकार Parambrata Chatterjee और Swastika Mukherjee के खिलाफ FIR की मांग</a></h3><div><br></div><div>फिल्म की गति में कहीं-कहीं थोड़ी-बहुत दिक्कतें हैं, और कुछ हिस्से थोड़े-बहुत अनुमान लगाने लायक लगते हैं। लेकिन फिर भी, फिल्म कुछ ऐसे सवाल छोड़ जाती है जिन पर सोचना ज़रूरी है। सच के बारे में। सत्ता के बारे में। और इस बारे में कि जब सब कुछ लेन-देन का सौदा बन जाता है, तो असल में किसकी आवाज़ सुनी जाती है।</div><div><span style="font-size: 1rem;">और सच कहूँ तो, फिल्म जो एक शांत-सी बेचैनी आपके मन में छोड़ जाती है—वह फिल्म के फ़ैसले से भी ज़्यादा समय तक आपके साथ रहती है।</span></div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 22 May 2026 12:37:22 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/system-movie-review-jyothika-sonakshi-sinha-shine-in-battle-power-games-influence-and-emotions</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Kartavya Movie Review | सस्पेंस और सधे हुए अभिनय के बावजूद अपनी ही महत्वाकांक्षाओं के बोझ तले दबी सैफ अली खान की 'कर्तव्य']]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/kartavya-movie-review-saif-ali-khan-kartavya-crushed-under-the-weight-of-ambitions]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>एक जमाना था जब बॉलीवुड में कॉप ड्रामा (Police Movies) का मतलब होता था—हीरो की स्लो-मोशन एंट्री, कान फाड़ने वाले लाउड डायलॉग और बिना पसीना बहाए अकेले ही दस गुंडों को हवा में उड़ा देना। लेकिन निर्देशक पुलकित के निर्देशन में बनी सैफ अली खान की नई नेटफ्लिक्स (Netflix) फिल्म 'कर्तव्य' (Kartavya) इस घिसे-पिटे कमर्शियल फॉर्मूले को तोड़ने की कोशिश करती है। 'भक्षक' जैसी गंभीर फिल्म बना चुके पुलकित इस बार तड़क-भड़क के बजाय असलियत को चुनते हैं। वे पुलिस अफसर को 'लार्जर-दैन-लाइफ' सुपरहीरो के बजाय एक थके हुए और टूटते हुए आम इंसान के रूप में पेश करते हैं।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">फिल्म की सोच नेक है और यह कर्तव्य, नैतिकता, भ्रष्टाचार और पारिवारिक दबाव जैसे कई संवेदनशील मुद्दों को एक साथ छूती है। लेकिन क्या यह फिल्म अपनी इस भारी-भरकम महत्वाकांक्षा के बोझ को संभाल पाई? आइए जानते हैं विस्तृत समीक्षा में।</span></div><div><br></div><h2>क्या है 'कर्तव्य' की कहानी?</h2><div>फिल्म की कहानी घूमती है एसएचओ (SHO) पवन मलिक (सैफ अली खान) के इर्द-गिर्द, जिसकी निजी और पेशेवर जिंदगी इस वक्त बेहद नाजुक दौर से गुजर रही है। थाने में उसके सामने एक हाई-प्रोफाइल पत्रकार की हत्या की जांच का जिम्मा है, जो धीरे-धीरे सिस्टम के अंदर छिपे कई सफेदपोश चेहरों और असहज कर देने वाले सच को उजागर करने लगती है।</div><div><br></div><div>दूसरी तरफ, पवन का घर भी किसी जंग के मैदान से कम नहीं है। रूढ़िवादी पिता के साथ उसके रिश्ते बेहद तनावपूर्ण हैं, और उसका बागी छोटा भाई इस आग में घी डालने का काम करता है। इस मानसिक उथल-पुथल के बीच पवन को एकमात्र राहत और कोमल सहारा अपनी पत्नी (रसिका दुग्गल) से मिलता है, जो उसकी खामोशी को भी बिना कहे पढ़ लेती है। जैसे-जैसे मर्डर मिस्ट्री की जांच आगे बढ़ती है, पवन का शक अपराधियों के साथ-साथ अपने ही महकमे के लोगों पर गहराने लगता है। कहानी में एक 'गॉडमैन' (धर्मगुरु) की भी एंट्री होती है, जहाँ आस्था और अंधविश्वास के बीच एक वैचारिक टकराव दिखाने की कोशिश की गई है।</div><div><br></div><h2>अभिनय: सैफ अली खान का शानदार और संयमित रूप</h2><div>सैफ अली खान निसंदेह इस पूरी फिल्म की सबसे मजबूत रीढ़ हैं। उन्होंने बिना किसी चीख-पुकार या आक्रामकता के, बेहद संयम के साथ पवन मलिक के किरदार को जिया है। पूरी फिल्म में उनकी आंखों में एक अजीब सी मानसिक थकान दिखाई देती है, जो उनके किरदार को बेहद विश्वसनीय बनाती है। उनका हरियाणवी लहजा कहीं-कहीं थोड़ा लाउड जरूर लगता है, लेकिन उनके जज्बात पूरी तरह सच्चे हैं।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/bollywood-wrap-up-the-truth-behind-salman-lonely-post" target="_blank">Bollywood Wrap-Up: सलमान के 'लोनली' पोस्ट का सच, इम्तियाज की फिल्म का धमाका और आलिया-शरवरी की लीक फोटो ने बढ़ाया इंटरनेट का पारा!</a></h3><div><br></div><div>रसिका दुग्गल का स्क्रीन टाइम भले ही कम हो, लेकिन वे जब भी पर्दे पर आती हैं, अपनी सहजता से फिल्म के भारी माहौल में एक गर्माहट और सुकून भर देती हैं। संजय मिश्रा हमेशा की तरह अपने बेहतरीन और मंझे हुए अंदाज में प्रभावित करते हैं। इनके अलावा युद्धवीर अहलावत, जाकिर हुसैन, मनीष चौधरी और दुर्गेश कुमार ने भी अपने किरदारों के साथ पूरा न्याय किया है।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/punjabi-singer-inder-kaur-killed-for-refusing-marriage" target="_blank">शादी से इनकार करने पर पंजाबी सिंगर Inder Kaur की हत्या, नहर से मिला शव, Canada भागा आरोपी!</a></h3><div><br></div><div><b>कास्टिंग की सबसे कमजोर कड़ी</b></div><div><b>&nbsp;</b>'गॉडमैन' (बाबा) के मुख्य विलेन वाले किरदार में सौरभ द्विवेदी का चुनाव पूरी तरह गलत साबित होता है। जिस किरदार में एक खौफ और अप्रत्याशित खतरा झलकना चाहिए था, वहाँ उनका भावहीन चेहरा और बोरिंग संवाद अदायगी सब कुछ फीका कर देती है। चेहरे पर हमेशा रहने वाली मुस्कान के कारण वे विलेन के बजाय एक सामान्य व्यक्ति नजर आते हैं, जो दर्शकों को डराने में पूरी तरह नाकाम रहता है।</div><div><br></div><p><b>तकनीकी पक्ष</b></p><div>तकनीकी तौर पर फिल्म काफी सुसंगत है। इसकी सिनेमैटोग्राफी बिना किसी भड़कीले तड़के के छोटे शहरों के पुलिस स्टेशनों, गलियों और घरों के माहौल की असलियत को बखूबी पकड़ती है। फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक जज्बाती पलों में काफी असरदार है, हालांकि फिल्म के दूसरे हाफ की एडिटिंग थोड़ी और कसी जा सकती थी क्योंकि कुछ दृश्य जरूरत से ज्यादा लंबे खिंच गए हैं।</div><div><br></div><h2>कर्तव्य: तकनीकी पहलू</h2><div>फिल्म के तकनीकी पहलू की बात करें तो यह काफी सुसंगत और बेहतरीन लगती है। इसकी सिनेमैटोग्राफी बिना ज़्यादा भड़कीली हुए, ज़रूरी माहौल बनाए रखने में कामयाब रहती है; जिससे छोटे शहरों की सेटिंग, पुलिस स्टेशन, घर और फिल्म में दिखाए गए दूसरे स्थानों की असलियत को महसूस करना आसान हो जाता है।</div><div><br></div><div>जब फिल्म में गहरे जज़्बात शामिल होते हैं, तो बैकग्राउंड म्यूज़िक सुनने में खास तौर पर अच्छा लगता है। वहीं दूसरी ओर, एडिटिंग में सुधार की गुंजाइश है, क्योंकि फिल्म का दूसरा हिस्सा कहीं-कहीं बेवजह लंबा हो जाता है।</div><div><br></div><h2>कर्तव्य: फ़ैसला</h2><div>'कर्तव्य' उन फिल्मों में से एक है, जिसकी सोच तो नेक है, लेकिन वह अपने विचारों को पूरी तरह से परदे पर उतारने में थोड़ी कमज़ोर पड़ जाती है। यह फिल्म एक पुलिस अधिकारी होने की भावनात्मक कीमत को टटोलना चाहती है, और कई दृश्यों में वह ऐसा करने में सचमुच कामयाब भी होती है। यह फिल्म अपने मुख्य किरदार का महिमामंडन करने के बजाय, उसे एक आम इंसान के तौर पर पेश करती है, और यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है। इसके साथ ही, फिल्म को इस बात का भी नुकसान उठाना पड़ता है कि वह एक साथ बहुत सारे विषयों को समेटने की कोशिश करती है। </div><div>&nbsp;</div><div>भ्रष्टाचार, पारिवारिक ड्रामा, आध्यात्मिकता, जाँच-पड़ताल, विश्वासघात और भावनात्मक आघात—ये सभी विषय दर्शकों का ध्यान खींचने की होड़ में लगे रहते हैं, जिससे फिल्म की कई कहानियाँ अधूरी ही रह जाती हैं। कुल मिलाकर, 'कर्तव्य' एक यथार्थवादी, भावनात्मक और सच्ची फिल्म है, लेकिन साथ ही यह निराशाजनक रूप से अधूरी भी लगती है। इसलिए, हालाँकि 'कर्तव्य' में तारीफ़ करने लायक बहुत कुछ है, फिर भी यह 5 में से केवल 2.5 स्टार की ही हकदार है।</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 20 May 2026 15:18:27 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/kartavya-movie-review-saif-ali-khan-kartavya-crushed-under-the-weight-of-ambitions</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Inspector Avinash 2 Review | Randeep Hooda का 'स्वैग' और यूपी का क्राइम ड्रामा, इंस्पेक्टर अविनाश सीजन 2 में कितना है दम?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/inspector-avinash-2-review-randeep-hooda-swag-and-up-crime-drama]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारतीय ओटीटी (OTT) की दुनिया में उत्तर प्रदेश के अपराध और पुलिसिया कहानियों का एक अलग ही क्रेज है। 'मिर्जापुर' और 'पाताल लोक' जैसी सीरीज ने जो पैमाना सेट किया है, उसी कड़ी में अब रणदीप हुड्डा की सीरीज 'इंस्पेक्टर अविनाश' का दूसरा सीजन दस्तक दे चुका है। नीरज पाठक के निर्देशन में बनी यह सीरीज पहले सीजन की कहानी को और भी भव्य और हिंसक अंदाज में आगे बढ़ाती है।'इंस्पेक्टर अविनाश सीजन 2' की कहानी वहीं से शुरू होती है जहाँ पहला सीजन खत्म हुआ था। एसटीएफ (STF) ऑफिसर अविनाश मिश्रा (रणदीप हुड्डा) एक ऐसा किरदार है जिसके नाम सौ से ज्यादा एनकाउंटर दर्ज हैं। इस बार कहानी का दायरा केवल यूपी तक सीमित नहीं है, बल्कि नेपाल, मध्य प्रदेश, बिहार और ओडिशा तक फैल जाता है।</div><div><br></div><h2>इंस्पेक्टर अविनाश 2: कहानी</h2><div>सीज़न 2 ठीक वहीं से शुरू होता है जहाँ पहला सीज़न खत्म हुआ था, लेकिन इस बार इसका दायरा काफ़ी बड़ा है। कहानी सिर्फ़ उत्तर प्रदेश की सड़कों तक ही सीमित नहीं रहती, बल्कि नेपाल, मध्य प्रदेश, बिहार और ओडिशा तक फैल जाती है। कहानी STF अफ़सर अविनाश मिश्रा के इर्द-गिर्द घूमती है, जो न सिर्फ़ बाहर अपराधियों से लड़ रहे हैं, बल्कि सिस्टम के अंदर चल रही विभागीय राजनीति और सस्पेंशन के ख़तरे का भी सामना कर रहे हैं। इस बार, उनका सामना शेख़ (अमित सियाल) के हथियारों के कार्टेल और बेकाबू अपराधी देविकांत त्रिवेदी (अभिमन्यु सिंह) से होता है। हालाँकि, इस सीज़न की सबसे बड़ी ताक़त इसका निजी पहलू है। जब अविनाश के बेटे वरुण पर अपने एक क्लासमेट की हत्या का आरोप लगता है, तो कहानी एक एक्शन-बेस्ड पुलिस ड्रामा से बदलकर एक इमोशनल कहानी बन जाती है। यह ट्रैक दिखाता है कि कैसे एक पुलिसवाला, जो बाहर गोलियों के दम पर इंसाफ़ दिलाता है, अपने ही घर के अंदर पैदा हुए कानूनी और नैतिक उथल-पुथल में फँसकर बेबस हो जाता है। स्क्रीनप्ले इस निजी त्रासदी को राजनीतिक साज़िशों और गैंगवार के साथ जोड़ने की कोशिश करता है, जिससे दर्शक कहानी से जुड़े रहते हैं; हालाँकि कई छोटी-छोटी कहानियों (subplots) की वजह से कभी-कभी कहानी थोड़ी बोझिल भी लगने लगती है।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/orry-reignites-feud-with-sara-ali-khan-over-simmba" target="_blank">Orry ने Sara Ali Khan पर फिर बोला हमला, Simmba का जिक्र कर करियर पर कसा तंज</a></h3><div><br></div><h2>अभिनय: रणदीप हुड्डा का वन-मैन शो</h2><div>इस सीरीज की जान और शान रणदीप हुड्डा हैं। उन्होंने अविनाश मिश्रा के किरदार को महज एक 'फिल्मी हीरो' नहीं, बल्कि एक हाड़-मांस के इंसान के रूप में पेश किया है।</div><div>&nbsp;</div><div><b>रणदीप हुड्डा: </b>उनके चेहरे का घमंड, परिवार के लिए चिंता और दमदार फिजीक सीरीज को जीवंत कर देती है। राइटिंग कमजोर होने के बावजूद हुड्डा अपने हाव-भाव से सीन को संभाल लेते हैं।</div><div>&nbsp;</div><div><b>अमित सियाल और अभिमन्यु सिंह: </b>अमित सियाल अपनी सधी हुई अदाकारी से एक निरंतर खतरा बनाए रखते हैं, वहीं अभिमन्यु सिंह का पागलपन दर्शकों को बेचैन करता है।</div><div>&nbsp;</div><div><b>उर्वशी रौतेला: </b>पूनम के किरदार में उर्वशी एक सरप्राइज पैकेज की तरह हैं। खासकर बेटे की गिरफ्तारी वाले दृश्यों में उनका अभिनय काफी सच्चा लगता है।</div><div><br></div><h2>निर्देशन और तकनीकी पक्ष</h2><div>नीरज पाठक का निर्देशन बारीकियों से ज्यादा माहौल (Atmosphere) बनाने पर केंद्रित है। यह सीरीज पुराने जमाने के 'मास एंटरटेनमेंट' की याद दिलाती है। चिरंतन दास की सिनेमैटोग्राफी इस शो का सबसे मजबूत तकनीकी हिस्सा है। 90 के दशक के उत्तर प्रदेश के धूल भरे और हिंसक मिजाज को उन्होंने बेहतरीन हवाई शॉट्स और चौड़े फ्रेम के साथ कैद किया है। एडिटिंग कहानी को कसा हुआ रखने की कोशिश करती है, जबकि बैकग्राउंड स्कोर तनाव भरे पलों में जान फूंक देता है। एडिटिंग का काम अर्चित डी. रस्तोगी ने संभाला है। वह इस लंबी और उलझी हुई कहानी को कसा हुआ रखने की कोशिश करते हैं, हालाँकि स्क्रिप्ट की गति में उतार-चढ़ाव की वजह से कई जगहों पर दोहराव महसूस होता है। बैकग्राउंड स्कोर और साउंड डिज़ाइन भी तारीफ़ के काबिल हैं, जो तनाव भरे पलों में कहानी को और गहरा बनाते हैं। तकनीकी तौर पर यह शो काफ़ी समृद्ध है, लेकिन तकनीकी चमक हमेशा लेखन की कमियों को नहीं छिपा सकती।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/abhishek-bachchan-ferocious-look-leaked-from-the-sets-of-king" target="_blank">King के सेट से Abhishek Bachchan का खूंखार लुक लीक! हाथ में शॉटगन और ग्रे ओवरकोट में 'विलेन' बने </a></h3><div><br></div><h2>Inspector Avinash 2: यह सीरीज़ कहाँ कमज़ोर पड़ती है?</h2><div>Inspector Avinash Season 2 की सबसे बड़ी कमज़ोरी इसकी राइटिंग है। इसके डायलॉग्स अक्सर वैसे ही घिसे-पिटे लगते हैं, जो पिछले दो दशकों में नॉर्थ इंडियन क्राइम फ़िल्मों में बार-बार सुनने को मिले हैं। सिस्टम और वर्दी के बारे में कही गई बड़ी-बड़ी बातें सुनने में तो दमदार लग सकती हैं, लेकिन दर्शकों पर उनका कोई खास असर नहीं पड़ता। किरदारों की भीड़ भी एक और समस्या है। इतने सारे विलेन और सब-प्लॉट्स होने की वजह से, मुख्य कहानी कभी-कभी अपनी धार खो देती है।</div><div><br></div><div>कुछ एक्शन सीन, खासकर सचिन पहाड़ी वाला एनकाउंटर, ज़रूरत से ज़्यादा ड्रामैटिक और अफरा-तफरी भरे लगते हैं। कभी-कभी ऐसा लगता है कि यह शो असलियत के बजाय "स्वैग" को ज़्यादा अहमियत देता है। इसके अलावा, महिला किरदारों को भी बहुत सीमित तरीके से दिखाया गया है; वे या तो मुखबिर हैं या फिर पुरुषों के फ़ैसलों से प्रभावित होने वाली सिर्फ़ मोहरे। डबिंग और ऑडियो ट्रांज़िशन में भी कुछ कमियाँ साफ़ नज़र आती हैं, जिससे कुछ सीन का असर कम हो जाता है।</div><div><br></div><h2>Inspector Avinash 2: आख़िरी फ़ैसला</h2><div>कुल मिलाकर, Inspector Avinash Season 2 उन दर्शकों के लिए एक अच्छा ऑप्शन है, जिन्हें देसी-स्टाइल के पुलिस ड्रामा पसंद हैं। यह कोई ऐसी सीरीज़ नहीं है जो नैतिकता और कानून के बीच के दार्शनिक बहसों में बहुत गहराई तक जाती हो; बल्कि, यह एक ऐसी कहानी है जो अपनी तेज़ रफ़्तार और माहौल की वजह से आगे बढ़ती है। रणदीप हुड्डा की ज़बरदस्त परफ़ॉर्मेंस और चिरंतन दास की सिनेमैटोग्राफ़ी इस सफ़र को देखने लायक बनाती है। भले ही इसमें कुछ नयापन न हो और यह घिसी-पिटी चीज़ों पर ज़्यादा निर्भर हो, लेकिन यह अपने टारगेट ऑडियंस का मनोरंजन करना बखूबी जानती है। यह थोड़ी बिखरी हुई और कभी-कभी दोहराव वाली लग सकती है, लेकिन हुड्डा की शानदार परफ़ॉर्मेंस और इसकी क्राइम की दुनिया की पेचीदगियाँ इसे बोरिंग होने से बचा लेती हैं। अगर आपको नॉर्थ इंडिया की कच्ची और हिंसक कहानियाँ पसंद हैं, तो यह सीज़न आपको निराश नहीं करेगा।</div><div><br></div><div>रणदीप हुड्डा की Inspector Avinash Season 2 को 5 में से 3 स्टार।</div><div>&nbsp;</div><div><a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood" target="_blank" style="background-color: rgb(255, 255, 255); font-size: 1rem;"><span style="font-family: &quot;Segoe UI&quot;, sans-serif; background-image: initial; background-position: initial; background-size: initial; background-repeat: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial;">Entertainment News Hindi </span></a><span style="background-image: initial; background-position: initial; background-size: initial; background-repeat: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; font-size: 1rem; font-family: &quot;Segoe UI&quot;, sans-serif;">Today
only at Prabhasakshi</span><span style="background-image: initial; background-position: initial; background-size: initial; background-repeat: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; font-size: 1rem; font-family: &quot;Segoe UI&quot;, sans-serif;">&nbsp;</span>&nbsp;</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 15 May 2026 14:07:26 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/inspector-avinash-2-review-randeep-hooda-swag-and-up-crime-drama</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Sapne Vs Everyone Season 2 Review | दिल्ली की सत्ता और मुंबई के संघर्ष के बीच पिसते सपनों की कड़वी हकीकत]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/sapne-vs-everyone-season-2-review-the-bitter-reality-of-dreams-crushed]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>TVF (The Viral Fever) हमेशा से मध्यम वर्ग की आकांक्षाओं और युवाओं के संघर्ष को पर्दे पर उतारने के लिए जाना जाता रहा है। 'Sapne Vs Everyone' का दूसरा सीज़न इसी विरासत को आगे बढ़ाता है, लेकिन इस बार कैनवास बड़ा है। यह सीरीज़ हमें दो अलग दुनियाओं—दिल्ली की आक्रामक राजनीति और मुंबई फिल्म इंडस्ट्री की अनिश्चितता—के बीच ले जाती है। अमरीश वर्मा द्वारा लिखित और निर्देशित यह सीज़न सिर्फ सपनों की बात नहीं करता, बल्कि उन सपनों को हासिल करने के लिए चुकाई जाने वाली भारी कीमत पर सवाल उठाता है।</div><div><b><br></b></div><div><b>ओटीटी प्लेटफॉर्म: YouTube (TVF)</b></div><div><b>निर्देशक और लेखक: अमरीश वर्मा</b></div><div><b>कलाकार: अमरीश वर्मा, परमवीर सिंह चीमा, अभिषेक चौहान, विजयांत कोहली</b></div><div><br></div><h2>कहानी: दो शहर, दो रास्ते</h2><div>सीज़न 2 की कहानी दो समानांतर रास्तों पर चलती है। एक तरफ जिमी मेहता (अमरीश वर्मा) है, जो दिल्ली/गुरुग्राम की रियल एस्टेट और राजनीति की दुनिया में अपना साम्राज्य खड़ा करना चाहता है। जिमी खुद को 'सेल्स गॉड' कहता है और उसका मानना है कि सफलता के लिए नैतिकता का बलिदान जायज है। उसका मुख्य टकराव अपने चाचा कुकरेजा (विजयांत कोहली) से है, जिनका राजनीतिक रसूख वह खत्म करना चाहता है। हालाँकि, टोनी (अभिषेक चौहान) की एंट्री जिमी के बुने हुए जाल को उलझा देती है।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/urvashi-rautela-at-cannes-2026-urvashi-rautela-dazzles-in-a-bold-sheer-silver-gown" target="_blank">Urvashi Rautela Cannes 2026 | उर्वशी रौतेला ने बोल्ड 'शीयर सिल्वर' गाउन में बिखेरा जलवा, पांचवीं बार किया भारत का प्रतिनिधित्व</a></h3><div><br></div><div>दूसरी तरफ जिमी का दोस्त प्रशांत (परमवीर सिंह चीमा) है, जो एक अभिनेता बनने का सपना लेकर मुंबई पहुँचता है। यहाँ कहानी का मिजाज बदल जाता है। प्रशांत का संघर्ष उन हजारों कलाकारों की कहानी है जो कास्टिंग एजेंट के चक्कर काटते हैं और एक मौके की तलाश में अपनी पहचान खोने से बचते हैं। जहाँ दिल्ली में जिमी 'शक्ति' (Power) के पीछे भाग रहा है, वहीं मुंबई में प्रशांत अपने 'मूल्यों' (Values) और ईमानदारी को बचाने की जद्दोजहद में है।</div><div><br></div><h2>Sapne Vs Everyone S2: निर्देशन और लेखन</h2><div>अमरीश वर्मा इस सीज़न में एक ज़्यादा गहरा और परिपक्व नज़रिया लेकर आए हैं। वह दोनों शहरों के माहौल को बहुत ही खूबसूरती से पर्दे पर उतारने में कामयाब रहे हैं। दिल्ली के सीन में अधिकार और दबदबा दिखता है, जबकि मुंबई के सीन में हवा में घुला तनाव साफ़ महसूस होता है। अमरीश वर्मा अपनी कहानी कहने की कला से यह पक्का करते हैं कि कहानी असली लगे और उसका अंत हमेशा सफलता के साथ ही न हो।</div><div><br></div><div>यह शो किसी एक पक्ष का साथ लिए बिना, उम्मीदों और नैतिकता के बीच के संघर्ष को दिखाता है। फिर भी, इसकी स्क्रिप्ट और बेहतर हो सकती थी। बॉलीवुड में अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष कर रहे कलाकारों के इर्द-गिर्द घूमने वाली कहानियाँ पहले भी कई बार दिखाई जा चुकी हैं, जिससे कहानी का आगे का हिस्सा पहले से ही पता चल जाता है।</div><div><br></div><h2>Sapne Vs Everyone S2: एक्टिंग</h2><div>कलाकारों का अभिनय बहुत शानदार है। अमरीश वर्मा ने स्क्रिप्ट लिखने, निर्देशन करने और अभिनय करने—तीनों की ज़िम्मेदारी बखूबी निभाई है, और साथ ही जिमी मेहता के किरदार को भी गहराई दी है। उनके अभिनय में आत्मविश्वास, तीव्रता और हर चीज़ पर अपना नियंत्रण रखने की ज़बरदस्त चाह साफ़ झलकती है। हालाँकि उनके अभिनय में दूसरे कलाकारों की झलक भी दिखती है, फिर भी वे अपनी एक अलग ही छाप छोड़ते हैं। प्रशांत के किरदार में परमवीर सिंह चीमा ने बहुत ही संतुलित अभिनय किया है। उन्होंने एक संघर्षरत कलाकार की निराशा, उम्मीद और मन के द्वंद्व को बहुत ही स्वाभाविक ढंग से पेश किया है, जिससे दर्शक इस किरदार से खुद को आसानी से जोड़ पाते हैं।</div><div><br></div><div>सहायक कलाकारों में, अभिषेक चौहान ने टोनी के किरदार को बहुत ही बारीकी और असरदार ढंग से निभाकर उसे और भी ज़्यादा प्रभावशाली बना दिया है। प्रशांत के रूममेट—अश्विन और मनीष—का किरदार निभाने वाले अखिल कयामल और रजत दहिया ने भी अपने-अपने किरदारों के साथ पूरा न्याय किया है। मनीष का किरदार बहुत ही असली लगता है; वह एक हुनरमंद कलाकार तो है, लेकिन अपने हुनर ​​को लेकर उसका अपना ही नज़रिया उसकी राह में रुकावट बन जाता है। अंकल के किरदार में विजयंत कोहली ने बहुत ही सधा हुआ अभिनय किया है।</div><div><br></div><h2>Sapne Vs Everyone S2: तकनीकी पहलू</h2><div>तकनीकी नज़रिए से देखें तो, यह सीरीज़ बहुत ही बढ़िया बनी है। इसकी सिनेमैटोग्राफी में रंगों और रोशनी का इस्तेमाल करके दोनों शहरों के बीच का अंतर साफ़ दिखाया गया है। दिल्ली का माहौल खुला और रोशन लगता है, जबकि मुंबई का माहौल कुछ तंग और घुटन भरा महसूस होता है। इसका बैकग्राउंड म्यूज़िक कहानी के मिज़ाज को और भी ज़्यादा उभारता है और उसमें तनाव पैदा करता है। इसकी एडिटिंग और भी ज़्यादा कसी हुई हो सकती थी, क्योंकि कुछ सीन थोड़े ज़्यादा लंबे लगते हैं, जिससे कहानी की रफ़्तार थोड़ी धीमी पड़ जाती है। इसके बावजूद, इसकी तकनीकी गुणवत्ता बहुत ही मज़बूत है।</div><div><br></div><h2>Sapne Vs Everyone S2: कमियाँ</h2><div>इसकी सबसे बड़ी कमी यह है कि इसका पूरा माहौल लगातार उदासी भरा रहता है। कभी-कभी तो इसे देखते रहना भी मुश्किल हो जाता है। इस शो में कोई भी हल्का-फुल्का या मज़ेदार पल नहीं है, जिससे यह और भी ज़्यादा असंतुलित सा लगता है। जिमी से जुड़े कुछ सीन थोड़े बढ़ा-चढ़ाकर दिखाए गए लगते हैं और वे असली दुनिया से कटे हुए लगते हैं। कहानी के अंत में कई ऐसे सवाल अधूरे रह जाते हैं जिनके जवाब नहीं मिलते; हो सकता है कि इन सवालों के जवाब अगले सीज़न में मिलें, लेकिन इसकी वजह से यह मौजूदा सीज़न अधूरा सा लगता है।</div><div><br></div><div>'Sapne Vs Everyone Season 2' एक ईमानदार कोशिश है जो हमें यह याद दिलाती है कि सपने देखना जितना खूबसूरत है, उन्हें हकीकत में बदलना उतना ही क्रूर। यदि आप गंभीर ड्रामा और हकीकत से जुड़ी कहानियों के शौकीन हैं, तो यह सीरीज़ आपके लिए है। हालाँकि, पिछले सीज़न जैसी ताजगी की उम्मीद करने वालों को यह थोड़ी भारी लग सकती है।</div><div>&nbsp;</div><div><a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood" target="_blank" style="background-color: rgb(255, 255, 255); font-size: 1rem;"><span style="font-family: &quot;Segoe UI&quot;, sans-serif; background-image: initial; background-position: initial; background-size: initial; background-repeat: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial;">Entertainment News Hindi </span></a><span style="background-image: initial; background-position: initial; background-size: initial; background-repeat: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; font-size: 1rem; font-family: &quot;Segoe UI&quot;, sans-serif;">Today
only at Prabhasakshi</span><span style="background-image: initial; background-position: initial; background-size: initial; background-repeat: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; font-size: 1rem; font-family: &quot;Segoe UI&quot;, sans-serif;">&nbsp;</span>&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 13 May 2026 15:53:45 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/sapne-vs-everyone-season-2-review-the-bitter-reality-of-dreams-crushed</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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