Shaurya Path: भारत की Defence Diplomacy दिखा रही कमाल, CDS की Armenia Visit की सफलता देख दुश्मन देश हैरान

By नीरज कुमार दुबे | Feb 04, 2026

भारत के रक्षा निर्यात और स्वदेशी हथियारों की गूंज अब दुनिया भर में सुनाई दे रही है। कभी आयात पर निर्भर रहने वाला भारत आज मित्र देशों की सुरक्षा का भरोसेमंद साझेदार बनकर उभरा है। भारतीय मिसाइलें, रॉकेट प्रणाली, राडार और रक्षा तकनीक अब वैश्विक मंच पर अपनी ताकत का लोहा मनवा रहे हैं। इसी उभरती सैन्य और सामरिक शक्ति की कड़ी में प्रमुख रक्षा अध्यक्ष जनरल अनिल चौहान की आर्मेनिया यात्रा एक बड़ा और निर्णायक कदम मानी जा रही है, जो साफ संकेत देती है कि भारत अब रक्षा कूटनीति के जरिये विश्व मंच पर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रहा है। हम आपको बता दें कि जनरल चौहान के नेतृत्व में उच्च स्तरीय भारतीय रक्षा प्रतिनिधिमंडल एक फरवरी को येरेवन पहुंचा जहां उनका औपचारिक स्वागत किया गया और सम्मान गारद भी दी गयी। यह पहला अवसर है जब भारत के इतने वरिष्ठ सैन्य नेतृत्व ने आर्मेनिया के साथ सीधे और व्यापक रक्षा संवाद को इस स्तर पर आगे बढ़ाया है।

इसे भी पढ़ें: पूर्व आर्मी चीफ की अनपब्लिश्ड बुक और संसद में हंगामा! जनरल नरवणे की किताब में चीन पर ऐसा क्या लिखा है?

येरेवन में स्थित राष्ट्रीय रक्षा अनुसंधान विश्वविद्यालय के दौरे के दौरान जनरल चौहान ने बदलते वैश्विक सुरक्षा परिवेश, शक्ति के प्रमुख निर्धारक के रूप में प्रौद्योगिकी के उदय और युद्ध के बदलते स्वरूप पर व्याख्यान दिया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि आधुनिक युद्ध अब बहु क्षेत्रीय रूप ले रहा है जहां स्थल, आकाश, समुद्र, अंतरिक्ष और डिजिटल फील्ड एक साथ जुड़ते जा रहे हैं। भारतीय सेना का अनुभव, अनुकूलन क्षमता और स्वदेशी प्रौद्योगिकी इस नये युद्ध वातावरण में निर्णायक साबित हो रही है।

अपनी यात्रा के दौरान जनरल चौहान ने आर्मेनियाई जनसंहार स्मारक और संग्रहालय में पुष्पांजलि अर्पित कर उन लगभग पंद्रह लाख आर्मेनियाई नागरिकों को श्रद्धांजलि भी दी जिन्होंने प्रथम विश्व युद्ध के दौर में जान गंवाई। यह जनसंहार उस दौर में उस्मानी साम्राज्य द्वारा आर्मेनियाई ईसाई समुदाय के विरुद्ध किये गये सामूहिक कत्ल और जबरन निर्वासन से जुड़ा रहा है। अनेक इतिहासकार इसे बीसवीं सदी के शुरुआती बड़े जनसंहारों में गिनते हैं। आर्मेनिया के लिए यह उसकी राष्ट्रीय स्मृति और कूटनीति का संवेदनशील आधार है, जबकि तुर्की आज भी इसे जनसंहार मानने से इंकार करता है। इस स्मारक पर भारतीय प्रमुख रक्षा अध्यक्ष की उपस्थिति ने मानवीय संवेदना और ऐतिहासिक पीड़ा के प्रति सम्मान का संदेश दिया।

हम आपको बता दें कि भारत और आर्मेनिया के संबंधों की धुरी तेजी से रक्षा सहयोग बनती जा रही है। वर्ष 2020 के बाद से आर्मेनिया ने भारत से कई बड़े रक्षा समझौते किये हैं। इनमें पिनाका बहु नली रॉकेट प्रक्षेपक, आकाश वायु रक्षा प्रक्षेपास्त्र, तोपें, टैंक रोधी प्रक्षेपास्त्र, राडार, गोला बारूद और अन्य सैन्य सामग्री शामिल हैं। आर्मेनिया आकाश प्रणाली को अपनाने वाला पहला विदेशी देश बना। स्वाति अस्त्र खोजी राडार की आपूर्ति भी भारत ने की। हम आपको याद दिला दें कि वर्ष 2022 में पिनाका प्रणाली की चार बैटरी का समझौता हुआ था जिसकी कीमत हजारों करोड़ रुपये आंकी गयी। हाल ही में निर्देशित पिनाका रॉकेट की पहली खेप भी रवाना की गयी। आर्मेनिया ने अन्य प्रक्षेपास्त्र में भी रुचि दिखाई है और अपने सुखोई 30 लड़ाकू विमानों के अपग्रेडेशन पर भी विचार कर रहा है।

हम आपको बता दें कि आर्मेनिया लंबे समय तक सोवियत और रूसी मूल के हथियारों पर निर्भर रहा है। भारत ने भी ऐसे हथियारों को आधुनिक बनाने और नयी प्रणालियों के साथ जोड़ने में दक्षता दिखाई है। यही साझा पृष्ठभूमि दोनों देशों को स्वाभाविक साझेदार बनाती है। आर्मेनियाई अधिकारियों ने भारतीय अनुभव को प्रभावशाली बताया है। बदलते क्षेत्रीय हालात, खासकर अजरबैजान और तुर्की से तनाव ने आर्मेनिया को अपने रक्षा स्रोतों में विविधता लाने को प्रेरित किया है। ऐसे समय भारत एक भरोसेमंद साथी के रूप में उभरा है।

दूसरी ओर तुर्की, पाकिस्तान और अजरबैजान के बीच बढ़ती सामरिक नजदीकी भी क्षेत्रीय समीकरणों को प्रभावित कर रही है। इन तीनों ने कई मौकों पर एक दूसरे को खुला समर्थन दिया है, संयुक्त अभ्यास किये हैं और सैन्य सहयोग बढ़ाया है। नागोर्नो कराबाख संघर्ष के दौरान भी यह मेलजोल दिखा। पाकिस्तान और तुर्की के रक्षा संबंध गहरे हैं और तकनीकी सहयोग भी हो रहा है। ऐसे में आर्मेनिया के साथ भारत की मजबूत साझेदारी दक्षिण काकेशस क्षेत्र में संतुलन बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

दोनों देशों के बीच आर्थिक मोर्चे पर भी संभावनाएं दिख रही हैं। द्विपक्षीय व्यापार अभी सीमित है, पर आर्मेनिया यूरेशियाई आर्थिक संघ का सदस्य होने, ईरान के निकट होने और सजीव सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र तथा विश्व भर में फैले प्रवासी समुदाय के कारण भारत के लिए प्रवेश द्वार बन सकता है। भारत की उत्तर दक्षिण परिवहन गलियारा जैसी पहलें और पश्चिम एशिया से यूरोप जोड़ने की योजनाएं इस क्षेत्र को और महत्व देती हैं।

खनन और महत्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्र में भी सहयोग की राह खुल रही है। आर्मेनिया में सोना, तांबा और मोलिब्डेनम के भंडार हैं। मोलिब्डेनम के वैश्विक भंडार में उसका उल्लेखनीय हिस्सा है। भारत को अपनी रक्षा विनिर्माण, नवीकरणीय ऊर्जा और विद्युत वाहन क्षेत्र के लिए इन खनिजों की जरूरत है। संयुक्त उपक्रम, निवेश, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और पर्यावरण मानकों के अनुरूप खनन दोनों के लिए लाभकारी हो सकता है। भारतीय औद्योगिक समूह इसमें भूमिका निभा सकते हैं और तकनीकी शिक्षा तथा अनुसंधान सहयोग भी बढ़ सकता है।

कुल मिलाकर जनरल अनिल चौहान की यह यात्रा केवल औपचारिक नहीं बल्कि रणनीतिक संकेत है कि भारत अपनी रक्षा कूटनीति को नये क्षेत्रों तक फैला रहा है और मित्र देशों की सुरक्षा जरूरतों में भरोसेमंद भागीदार बन रहा है।

भारत और आर्मेनिया की बढ़ती नजदीकी बदलते विश्व संतुलन में उभरती नयी धुरी का संकेत भी है। जब भारत के स्वदेशी प्रक्षेपास्त्र, रॉकेट प्रक्षेपक और रक्षा प्रणालियां दूर देश की सीमाओं की रक्षा में भरोसा जगा रही हों, तो यह भारतीय विज्ञान, उद्योग और सैनिक कौशल की सीधी विजय है। भारतीय सैनिकों का शौर्य केवल रणभूमि तक सीमित नहीं, वह मित्र राष्ट्रों को आत्मविश्वास देने में भी दिखता है।

आर्मेनिया ने जब अपनी सुरक्षा के लिए भारत की ओर देखा तो उसने दरअसल उस देश पर भरोसा जताया जो वचन निभाता है। यह भरोसा वर्षों की साख से बनता है। आज भारतीय हथियार केवल बिक नहीं रहे, बल्कि भारत की रणनीतिक उपस्थिति दर्शा रहे हैं। इससे स्पष्ट संदेश जाता है कि भारत अब केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि प्रदाता और निर्माता शक्ति है।

पाकिस्तान के लिए यह विकास स्वाभाविक रूप से झटका है। जो देश वर्षों से भारत को घेरने के सपने देखते रहे, वे अब देख रहे हैं कि भारत उनके प्रभाव क्षेत्र माने जाने वाले इलाकों में भी सम्मानित साझेदार बन रहा है। तुर्की, पाकिस्तान, अजरबैजान की तिकड़ी के सामने भारत-आर्मेनिया की समझदारी भरी साझेदारी संतुलन खड़ा कर रही है। यह किसी के खिलाफ आक्रामकता नहीं, बल्कि अपने हितों की दृढ़ रक्षा है।

बहरहाल, भारत को अब रक्षा निर्यात, सामरिक साझेदारी और आर्थिक सहयोग को साथ लेकर आगे बढ़ना होगा। आर्मेनिया जैसे देश भारत के लिए सेतु बन सकते हैं जो उसे यूरोप, यूरेशिया और पश्चिम एशिया से गहराई से जोड़ें। यह समय है जब भारत अपने शौर्य, अपने शस्त्र और अपनी नीति तीनों का प्रभाव एक साथ दिखा रहा है। जनरल अनिल चौहान की यात्रा उसी नये आत्मविश्वास की गूंज है।

प्रमुख खबरें

Archery World Cup: Deepika Kumari का गोल्डन कमबैक, शूट-ऑफ में चीन को हराकर जीता स्वर्ण

West Asia संकट के बीच Gold Supply पर Titan बेफिक्र, CFO बोले- हमारे पास है Plan B

Bigg Boss फेम Elvish Yadav को विदेश से धमकी, मांगी 10 करोड़ की रंगदारी, Police जांच में जुटी

Indian Market से FPI का मोहभंग, कमजोर रुपए और वैश्विक संकेतों से अब तक ₹14,231 करोड़ निकाले