सरकार भी मान गयी, किसान भी मान गये पर कई सवालों के जवाब अब भी बाकी रह गये

By उमेश चतुर्वेदी | Dec 10, 2021

आखिरकार केंद्र सरकार और आंदोलनकारी संयुक्त किसान मोर्चे के रिश्तों पर जमी बर्फ पिघलनी शुरू हो गई है। संयुक्त किसान मोर्चा ने दिल्ली की घेराबंदी उठाने का ऐलान कर दिया है। इस घोषणा के मुताबिक, शनिवार यानी 11 दिसंबर से धरनारत किसान अपने घरों को लौटना शुरू हो जाएंगे। किसानों की इस घोषणा के बाद सिर्फ सरकारों ने ही राहत की सांस नहीं ली है, बल्कि यह दिल्ली के सिंघु बार्डर और गाजीपुर के रास्ते बाहर से आने वाले लोग भी राहत महसूस कर रहे हैं।

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केंद्र सरकार ने किसान संगठनों के समक्ष सुलह प्रस्ताव रखकर विवाद टालने का जो कदम उठाया है, उसका स्वागत होना चाहिए। सरकार मान गई है कि वह न्यूनतम समर्थन मूल्य के लिए कानून बनाने की दिशा में प्रयास करेगी। इस पर विचार के लिए जो समिति बनाई जानी है, उसमें केंद्र और राज्य सरकारों के प्रतिनिधियों के साथ ही किसान संगठनों के प्रतिनिधि के साथ कृषि वैज्ञानिकों को शामिल करने का प्रस्ताव निश्चित ही संतुलित कदम है। केंद्र सरकार किसान आंदोलन के दौरान किसानों पर दर्ज मामलों को वापस लेने को भी तैयार हो गई है। भारतीय जनता पार्टी शासित राज्यों उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और मध्य प्रदेश ने इस दिशा में कदम उठाने पर हामी भर दी है। किसान संगठन आंदोलन के दौरान सात सौ किसानों के मरने या मारे जाने का दावा कर रहे हैं। इस बारे में संसद में भी सवाल पूछा गया था, जिसके जवाब में सरकार ने कह दिया है कि ऐसी मौतों का आंकड़ा राज्यों के पास होता है। वैसे उत्तर प्रदेश और हरियाणा किसानों को मुआवजा देने पर अंशत: सहमत भी हो चुके है। किसान संगठनों की मांग बिजली को लेकर भी थी। इस बारे में भी सरकार सहमत हो गई है कि बिजली को लेकर जो भी चर्चा होगी, उसमें किसानों के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया जाएगा। इसके साथ ही पराली जलाने के दंड स्वरूप किसानों को जेल भेजने के प्रावधान को भी संबंधित कानून हटाने पर सहमति हो गई है। 

केंद्र सरकार जिस तरह किसानों के समक्ष झुकती नजर आ रही है, उसे किसान संगठन अपनी जीत जरूर बताएंगे। लेकिन यह अर्धसत्य ही है। दरअसल सरकार भी जानती है कि ज्यादा दिनों तक किसानों का खेतों से बाहर रहना आखिरकार देश के लिए ही नुकसान दायक है। इसलिए वह चाहती है कि किसान आंदोलन जल्द से जल्द खत्म हो और देश का उत्पादक वर्ग एक बार फिर अपने अनमोल उत्पादन प्रक्रिया में शामिल हो। 

इस आंदोलन के खत्म होने के बावजूद कुछ सवाल हैं जो आने वाले दिनों में राजनीति और सामान्य किसानों को मथते रहेंगे। इनमें सबसे महत्वपूर्ण यह है कि क्या किसानों को इससे सचमुच फायदा होने जा रहा है। 2015 में शांता कुमार समिति मान ही चुकी थी कि न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सिर्फ छह प्रतिशत किसान ही अपनी उपज बेच पाते हैं। ऐसे में सवाल यह है कि बदले माहौल में अगर कोई कानून बनेगा भी तो क्या उसका सचमुच फायदा समूचे किसान आंदोलन को मिलेगा। सवाल यह भी है कि क्या अपनी मांग के लिए किसान आंदोलन की आड़ में देश की शान के प्रतीक लालकिले पर जो कुछ 26 जनवरी को हुआ, या उसके दाग धुल जाएंगे।

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सवाल यह भी उठेगा कि क्या किसानों की राजनीति ऐसे ही चलती रहेगी और कुछ लोगों के फायदे के लिए व्यापक किसानों के हित के लिए खेती-किसानी में जो सुधार होने चाहिए, वे नहीं हो सकेंगे। सवाल यह भी उठेगा कि क्या किसान आंदोलनकारी अगले साल की शुरूआत में होने जा रहे पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में नहीं उतरेंगे और राजनीतिक रूख अख्तियार नहीं करेंगे। 

निश्चित तौर पर इन सवालों के जवाब में भी भावी किसान आंदोलन, उसकी सफलता और किसानों के हितों का मसला जुड़ा हुआ है। फिलहाल इस आंदोलन का खत्म होना शांति व्यवस्था की एक तरफ उठने वाला कदम भी होने जा रहा है। इसलिए किसान संगठनों की नई घोषणा और सरकार की लचीली नीति का स्वागत ही होना चाहिए।

- उमेश चतुर्वेदी

वरिष्ठ पत्रकार

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