भारत का इतिहास भाईचारे का, इस अमेरिकी के नाम से जन्मा है 'मॉब लिंचिंग'

By अभिनय आकाश | May 02, 2020

मॉब लिंचिंग आपने इस शब्द के बारे में बहुत सुना होगा, बहुत पढ़ा होगा। यह एक फैशनेबल शब्द माना जाता है और सूडो सेक्यूलर, देश के सेलिब्रिटी और कुछ राजनीतिक कार्यकर्ताओं का मनपसंद शब्द बन गया है यह। इसी मॉब लिंचिंग का सहारा लेकर यह तमाम लोग खुलकर राजनीति करते हैं और पूरे देश में असहनशीलता का एजेंडा चलाते हैं।  अब ऐसा लगने लगा है कि मॉब लिंचिंग हिन्दी का ही शब्द है। कुछ ही समय पहले लोगों को समझाना पड़ता था कि जब भीड़ किसी को घेरकर पीट-पीटकर मार डालती है तब उसे मॉब लिंचिंग कहा जाता है। 

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इसी शब्द का इस्तेमाल कुछ अंग्रेजी बोलने वाले सेलिब्रिटी लगातार करते रहे हैं और मॉब लिंचिंग को एक गुप्त एजेंडे के तहत धर्म विशेष से जोड़ कर समाज को बांटने की लगातार कोशिश भी हुई है। ये साबित करने की कोशिश हुई की हिंसा और इस तरह की घटना के लिए बहुसंख्यक आबादी ही जिम्मेदार है और अल्पसंख्यकों को जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है।  

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मॉब लिंचिंग दरअसल आज से नहीं बल्कि सैकड़ों सालों से हो रही है। 19 अगस्त, 1901 को तीन अफ्रीकी अमेरिकियों को दी गई मौत की सजा के बाद मार्क ट्वेन ने अमेरिकियों पर लिंचिंग का आरोप लगाते हुए "यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ लिंचरडम" का प्रसिद्ध लेख लिखा था।

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लिंचिंग का इतिहास

' लिंचिंग’ ये शब्द अमेरिका से ही आया है इस बात में संदेह नही है , कुछ लोग जिसे विलियम लिंच के नाम से जानते है तो कुछ चार्ल्स लिंच के नाम से उसने एक क्रांति के दौरान अपनी निजी अदालतें बिठानी शुरू की और अपराधियों तथा विरोधी षड्यंत्रकारियों को बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के सजा देने लगा। धीरे-धीरे ‘लिंचिंग’ के रूप में यह शब्द पूरे अमेरिका में फैल गया । याद रहे इस निजी अदालत में विरोधी षडयंत्रकारियो को बिना कोई कानूनी प्रक्रिया के तहत सजा दी जाती थी। जिसको चार्ल्स लिंच ने 1782 में "लिंच लॉ" के नाम से वर्णित करते हुए कहा कि उनके सहयोगी ने इसके माध्यम से टोरिस और नीग्रो लोगों को निशाना बनाया था। 

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भीड़हत्या पर दुनियाभर में किए गए अध्ययनों में पाया गया है कि रूस के किसान अपने घोड़ों को सबसे बहुमूल्य संपत्ति मानते थे और उनके घोड़े चुराने वालों को वे प्रायः पीट-पीटकर जान से मार देते थे, क्योंकि पुलिस और अदालतों पर उनको भरोसा नहीं होता था। जर्मनी के दो इतिहासकारों मैनफ्रेड बर्ग और साइमन वेंट ने अपने अध्ययन में पाया है कि बर्लिन में भी ऐसे दृश्य आम होते थे, जहां लोगों की भीड़ किसी भी संदिग्ध बलात्कारी या अपराधी को बुरी तरह पीट रही होती थी। जर्मन पुलिस ऐसे पीड़ितों को उनके चंगुल से छुड़ाती जरूर थी लेकिन भीड़ में शामिल लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाती थी।

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 आज से सवा सौ साल पहले मोहनदास करमचंद गांधी का ऐसी ही एक भीड़ से सामना दक्षिण अफ्रीका में हुआ था। भीड़-हिंसा, जिसे आज 'मॉब लिंचिंग' कहा जाता है, उससे गांधी मुश्किल से बच पाए थे। वरना, गांधी के महात्मा बनने की कहानी वहीं ठहर जाती और उनकी पहचान मोहनदास करमचंद तक ही सीमित हो गई रहती।

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जब मॉब लिंचिंग का शिकार होने से बचे थे महात्मा गांधी

कारोबारी दादा अब्दुल्ला के बुलावे पर उनकी कंपनी को कानूनी मदद देने सन् 1893 में दक्षिण अफ्रीका पहुंचे बैरिस्टर मोहनदास करमचंद गांधी अपने संघर्षो के बल पर महज तीन साल के भीतर यानी सन् 1896 तक एक राजनेता के रूप में स्थापित हो चुके थे। उन्होंने 22 अगस्त, 1894 को नताल इंडियन कांग्रेस (एनआईसी) की स्थापना की और दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के हितों के लिए संघर्ष करते रहे। 30 नवंबर, 1896 को दक्षिण अफ्रीका के लिए रवाना हुए। गांधी के दक्षिण अफ्रीका पहुंचने से पहले ही उनके 'ग्रीन पंफ्लेट' ने वहां तूफान खड़ा कर दिया था. हरे रंग की इस पुस्तिका में भारतीयों के सामने खड़ी समस्याओं का जिक्र था, लेकिन दक्षिण अफ्रीका में यह अफवाह फैलाई गई थी कि गांधी ने इस पुस्तिका में गोरे यूरोपियों के बारे में बुरा-भला लिखा है, और भारत में उन्होंने इस समुदाय के खिलाफ अभियान चला रखा है, और अब वह दो जहाजों में भारतीयों को भरकर नताल में बसाने ला रहे हैं। गांधी की जहाज जब डर्बन पहुंची तो माहौल इतना गरम था कि जहाज के किसी यात्री को उतरने नहीं दिया गया और जहाज 21 दिनों तक समुद्र में प्रशासन के नियंत्रण में रहा। लेकिन गांधी के खिलाफ गुस्सा फिर भी कम नहीं हुआ था। गिरिराज किशोर अपनी पुस्तक 'बा' में लिखते हैं कि वक्त की नजाकत को समझते हुए गांधी ने पत्नी और बच्चों को अपने मित्र जीवनजी रुस्तमजी के घर एक गाड़ी में सुरक्षित भेज दिया। तभी युवाओं की एक भीड़ ने उन्हें पहचान लिया. भीड़ 'गांधी..गांधी..' चिल्लाते हुए मोहनदास पर टूट पड़ी।

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अगर डरबन के पुलिस सुपरिंटेंडेंट आर.सी. अलेक्जेंडर की पत्नी सारा अलेक्जेंडर वहां से न गुजर रही होतीं तो गोरों की हिंसक भीड़ गांधी की हत्या कर दी होती। अंत में सुपरिंटेंडेंट की सलाह पर गांधी सिपाही का भेष धारण कर वहां से जान बचाकर निकल गए।

विवेक जब शून्य हो जाता है, तब व्यक्ति भीड़ का हिस्सा बन जाता है, और ऐसी विवेक-शून्य भीड़ क्या कुछ करती है, आज के इस दौर में यह बताने की जरूरत शायद नहीं रह गई है। तबरेज अंसारी, पहलू खान, अखलाक ये कुछ नाम है जो आपने बीते कुछ बरस में कई बार सुना होगा। इन नामों के सामने आने पर जहन में उभरती है बिना शक्ल की भीड़। साथ ही सांप्रदायिक एंगल तालशने की भी कोशिश कई बुद्धिजीवी, तथाकथित पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ताओं की ओर से की जाती है। लेकिन आजआपको मांब लिंचिंग के एक दूसरे पहलू से रूबरू करवाउंगा और साथ ही इससे जुड़े कुछ कहानी भी बताऊंगा जिसके जिक्र के नाम पर ही मीडिया, राजनेता और सोशल सर्विस के सेल्फ डिक्लेयर्ड चैंपियन मौन हो जाते हैं। 

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वो चेहरे जिनकी लिंचिंग पर सेक्लयूलर गैंग ने साधी चुप्पी

विष्णु गोस्वामी– 16 मई 2019 को यूपी के गोंडा जिले में इमरान, तुफैल, रमज़ान और निज़ामुद्दीन ने विष्णु गोस्वामी को पेट्रोल डालकर जिंदा जला दिया। विष्णु की गलती बस ये थी कि वे अपने पिता के साथ लौटते हुए सड़क के किनारे लगे नल पर पानी पीने लगा था। बस इसी दौरान इन्होंने विष्णु व उसके पिता से विवाद बढ़ाया और बात खिंचने पर उसे पेट्रोल डालकर आग के हवाले झोंक दिया।

वी.रामलिंगम– तमिलनाडु में दलितों के इलाके में धर्म परिवर्तन की प्रक्रिया को चलता देख वी राम लिंगम ने पीएफआई के कुछ लोगों का विरोध किया था। 7 फरवरी 2019 में इलाके में धर्मांतरण को लेकर कुछ लोगों से सवाल करने पर वी रामलिंगम की कथित तौर पर हत्या कर दी गई थी। 

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ध्रुव त्यागी– नई दिल्ली में मोती नगर के बसई दारापुर की बात है। 51 साल के धुव्र राज त्यागी देर रात अपनी बेटी और बेटे के साथ अस्पताल से वापस आ रहे थे। घर के पास पहुंचे तो गली में खड़े लोगों से रास्ता मांगने के पीछे उनका झगड़ा हो गया। बेटी के साथ छेड़खानी का विरोध करने पर 51 वर्षीय  त्यागी को सरेआम सबके सामने मोहम्मद आलम और जहाँगीर खान ने धारधार हथियारों से राष्ट्रीय राजधानी के मोती नगर में मौत के घाट उतारा था।

चंदन गुप्ता–  26 जनवरी 2018 को सुबह करीब 10 बजे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से जुड़े करीब 100 युवा बाइकों पर तिरंगा यात्रा निकाल रहे थे। इसी दौरान उनका काफिला बलराम गेट इलाके की तरफ पहुंचा।  ये मुस्लिम बाहुल्य इलाका है। उसी दौरान कासगंज में हिंसा की चिंगारी फैल गई। इसी दौरान वहां पत्थरबाजी शुरू हो गई और फायरिंग भी हुई। इसमें चंदन गुप्ता नामक नौजवान की जान चल गई। 

डॉ. पंकज नारंग – साल 2016 में दिल्ली के विकासपुरी में पंकज नारंग की हत्या की गई। इसमें 9 लोगों को गिरफ्तार किया गया। इनमें 4 नाबालिग थे। उनकी मौत का कारण सिर्फ ये था कि उन्होंने अपने भांजे के साथ क्रिकेट खेलने के दौरान कुछ लोगों को मना किया था कि वे गाड़ी तेज न चलाएँ। जिसके बाद उन लोगों ने पंकज नारंग पर हमला कर दिया।

अंकित सक्सेना– मुस्लिम गर्लफ्रेंड के परिवार वालों ने जिसे दिल्ली के टैगोर गार्डन की एक गली में सबके सामने मौत के घाट उतारा, उस अंकित शर्मा को भुला पाना नमुमकिन हैं। 

रतन लाल– 24-25 फरवरी को उत्तरपूर्वी दिल्ली में हुई हिंसा में वीरगति को प्राप्त हुए रतन लाल का नाम शायद ही आने वाले समय में कोई भूल पाए। एक ऐसा वीर जिसने दिल्ली को जलने से रोकने के लिए खुद को भीड़ का बलि बना दिया।

अंकित शर्मा- उत्तर-पूर्वी दिल्ली के दंगों के दौरान IB के अंकित शर्मा की निर्मम तरीके से हत्या हुई थी। उन्हें मारने के दौरान उनपर 400 बार चाकुओं से हमला हुआ था। करीब 6 लोगों ने 2 से 4 घंटे तक चाकुओं से लगातार उनपर वार किए थे।

महाराज कल्पवृक्ष गिरी, सुशील गिरी, निलेश तेलगड़े– महाराष्ट्र के पालघर में मारे गए वो दो साधु और उनका ड्राइवर जिन्हें एक भीड़ ने पुलिस की उपस्थिति में मार डाला गया।

बहरहाल, ये सूची यही पर समाप्त नहीं होती। ये उन लोगों की लिस्ट से केवल चंद नाम हैं। जिन्हें पिछले सालों में निशाना बनाया गया। इनके अतिरिक्त भी कई नाम हैं और होते रहेंगे। 

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क्या कहता है कानून

मॉब लिंचिंग के मामले में पुलिस सबसे पहले भारतीय दंड संहिता यानी आईपीसी की धारा 153 A के तहत मामला दर्ज करती है। इसमें 3 साल तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा आईपीसी की धारा 34, 147, 148 और 149 के तहत कार्रवाई की जा सकती है। अगर भीड़ द्वारा किसी की पीट-पीटकर हत्या कर दी जाती है, तो आईपीसी कि धारा 302 के तहत मुकदमा दर्ज किया जाएगा और साथ में धारा 34 या 149 लगाई जाएगी। इसके बाद जितने लोग भी मॉब लिंचिंग में शामिल रहे होंगे उन सबको हत्या का दोषी ठहराया जाएगा और फांसी या आजीवन कारावास से दंडित किया जाएगा। इसके अलावा सभी पर जुर्माना भी लगाया जा सकता है।

बहरहाल, मॉब लिंचिंग की घटनाओं का एक दुखद पहलू यह है कि राजनीतिक और सामाजिक संगठन इन घटनाओं को अपनी ‘सुविधाओं’ के हिसाब से कम या ज्यादा करके उठाते हैं। ऐसे में उनका विरोध असली न होकर ‘राजनीतिक’ ज्यादा दिखाई देता है, जो कि इसे हलका भी करता है।

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