अब लोगों ने विवेक ओबेरॉय को भी घसीट लिया नेपोटिज्म के विवाद में!

By श्वेता उपाध्याय | Jul 08, 2020

बॉलीवुड का माहौल इन दिनों काफी गरमाया हुआ है और साल 2020 तो खुद में ही किसी मसालेदार बॉलीवुड फिल्म से कम नहीं महसूस हो रहा है। बस फर्क ये है कि यह फिल्म कब ख़त्म होगी फ़िलहाल कोई नहीं बता सकता। इस वर्ष ने लोगों को ऐसा सबक सिखाया है जिसे शायद ही अब कोई कभी भूल पायेगा। कोरोना काल में लोगों ने हर उन चीज़ों पर बारीकी से ध्यान दिया है जो कहीं न कहीं गलत थी और जिसे हम आज तक नज़रअंदाज़ करते रहे। फिर चाहे वे मुद्दे आम हों, देश से जुड़े हुए हों या बॉलीवुड से।

दरअसल यह बहस तब शुरू हुयी जब निर्देशक संजय गुप्ता ने एक समुच्चित चित्र अपने ट्विटर अकाउंट पर साझा की जिसमें सभी बड़े अभिनेताओं की तस्वीर है जिन्होंने अपने बल पर इंडस्ट्री में अपना नाम बनाया और उसपर उन्होंने लिखा 'और लोगों को लगता है कि यहाँ नेपोटिज्म को बढ़ावा मिलता है'। इसके बाद फिरसे विवाद शुरू हो गया और लोगों ने तरह-तरह के सवालों से उन्हें घेरना शुरू कर दिया।

किसी ने उनसे पिछले 20 साल में खुद के बल पर आये अभिनेताओं को लेकर सवाल किया और नेपोटिज्म के खिलाफ एक पोस्ट में चार अभिनेताओं की तस्वीर साझा की। जिसमें रणदीप हुडा, सुशांत सिंह राजपूत, विवेक ऑबेरॉय और शाइनी आहूजा शामिल थे। इस पोस्ट पर एक यूजर ने कमेंट करते हुए लिखा कि 'विवेक ऑबेरॉय नेपोटिज्म बॉर्न हैं।' जिसे देखकर संजय गुप्ता गुस्से में आ गए।

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विवेक का नाम नेपोटिज्म में आने पर संजय गुप्ता ने उस यूजर को आड़े हाथों ले लिया। उन्होंने विवेक के समर्थन में उस ट्रोलर को खूब लताड़ा। संजय ने उस ट्वीट पर रिट्वीट करते हुए लिखा, 'ये क्या बकवास है, तुम्हें अहसास भी है कि विवेक ने अपनी फिल्म कंपनी कैसे हासिल की थी? उनके पिता का उसमें कोई योगदान नहीं था। और विवेक की परफॉर्मेंस इतनी बेहतरीन थी कि उनका डेब्यू सबसे अच्छा माना जाता है।'

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संजय गुप्ता के इस ट्वीट के बाद विवेक ओबेरॉय ने उन्हें धन्यवाद कहते हुए लिखा 'लोगों को नहीं पता कि कुछ लोग सिर्फ हुनर के बल पर इंडस्ट्री में काम करना चाहते हैं न की किसी की सिफारिश पर। बहुत दुःख होता है जब लोग हर किसी को एक ही तराज़ू में तौलने लगते हैं. ऐसी टिप्पणी किसी के सालों की मेहनत को व्यर्थ कर देती है।

अब जब जंग छिड़ ही गयी है तो हम भी देखना चाहेंगे कि इस बार जीत किसकी होती है। वैसे हमारी तो यही आशा है कि परिवारवाद को लेकर इस क्रांति की ये जो हवा चली है इसका निष्कर्ष न्यायसंगत हो।

- श्वेता उपाध्याय

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