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    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
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      <title><![CDATA[लापरवाही को छिपाना (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/concealing-negligence]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>लापरवाही के नुकसान ही माने जाते हैं। समझदार लोग भी ऐसा ही बताते हैं। बचपन के विशेषज्ञ भी अस्त व्यस्त अभिभावकों को, सलाह देते रहते हैं कि बच्चों की परवरिश में कोताही न बरतें और बच्चों को बताते रहें कि ज़िंदगी में किसी भी तरह की लापरवाही न करें। वह बात अलग है कि विशेषज्ञ और अभिभावक खुद भी कई मामलों में लापरवाही बरतते हैं और कहते रहते है कि जीवन में ऐसा हो जाता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>हमारे यहां लापरवाही एक विकसित परम्परा है। कोई दुर्घटना, नुकसान होता है तो जांच शुरू होने से पहले लापरवाही छिपाने की कोशिश शुरू हो जाती है। इसे बहुत ज़रूरी कर्तव्य की तरह निभाया जाता है। चश्मदीद गवाहों को धमकाने और अपराधी बनाने की सुगबुगाहट के साथ ही लापरवाही छिपाने का सिलसिला शुरू हो जाता है। उन्हें पूरी सजगता से धमकी देनी ज़रूरी होती है ताकि सच सामने न आ सके। अगर ऐसा न किया जाए तो आम आदमी तो क्या कोई भी संपन्न व्यक्ति फंस सकता है वह बात दीगर है कि सुरक्षा व्यवस्था द्वारा की गई लापरवाही उन्हें फंसने नहीं देती । आदमी किसी और की जान बचाने तक में लापरवाह हो सकता है लेकिन अपने मामले में गलती से भी हुई लापरवाही छिपाने की कोशिश करता है।&nbsp;&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/new-ways-of-making-history" target="_blank">इतिहास रचने के नए अंदाज़ (व्यंग्य)</a></h3><div>जांच के दौरान लापरवाही, चतुराई से छिपा देना एक कला है। इसे उचित तरीके से जांच करना भी कहते हैं। यह मेहनत भरा काम है। लापरवाही छिपी रहे सामने न आए, इस सम्बन्ध में एक पुराने गाने को चार सौ बीस बार आधार बनाया जाता है, परदे में रहने दो पर्दा न उठाओ, पर्दा जो उठ गया तो भेद खुल जाएगा और कईयों को फंसा देगा, जो सुलझे बैठे हैं उन्हें उलझा देगा। लापरवाही छिपाने के बहुत से फायदे हैं। लापरवाही छिपाते हुए हर बात उलझा सकते हैं। बयान और रिपोर्टों को अलग अलग कर सकते हैं। महत्त्वपूर्ण संकेत फाइलें बनाने से पहले ही दफ़न कर सकते हैं। रिपोर्ट्स को बार बार अधूरी बताकर फिर से लिखित जानकारियां बार बार मांग कर, उनकी लापरवाही पर शक बढ़ाया जा सकता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>सीधे सवालों के, लापरवाही में लिपटे गोल मोल जवाब देने से, ज्यादा समय और पुख्ता मदद मिलती है ताकि बेचारा नतीजा दूर कहीं झुरमुट में फंसा रहे और गलत व्यक्ति को कटघरे में खड़ा करने का प्रयास सफल हो जाए। यही लापरवाही की सजगता भरी सफलता मानी जाती है। इसका अनुभव बचाव व्यवस्था की बुनियादी खामियों के विशेषज्ञ व्यक्तियों को पहले से होता है। उन्हें लापरवाही से गढ़े आरोपों से निबटना खूब आता है तभी तो जांच एजेंसियों के बीच तालमेल नहीं हो पाता। उनमें लापरवाही संभालने का गहन चारित्रिक अनुभव होता है तभी तो लापरवाही छिपाने का महत्त्वपूर्ण काम उन्हें सौंपा जाता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>अनुभवी लोगों को ऐसे फंसा भी नहीं सकते। उन्हें भविष्य में भी पूरी ज़िम्मेदारी के साथ कर्तव्य निभाते हुए, लापरवाही करने में सक्रिय भूमिका अदा करनी होती है। किसी भी स्तर पर प्रशिक्षण देने की ज़रूरत, उन्हें नहीं होती। लापरवाही छिपाने का सबसे व्यावहारिक फायदा यह रहता है कि जांच संपन्न हो जाती है लेकिन कार्रवाई नहीं हो पाती। इधर पूरी गोपनीय सतर्कता से लापरवाही छिपाई जा रही होती है और उधर सार्वजनिक रूप से कहा जा रहा होता है कि भविष्य में किसी भी किस्म की लापरवाही बिलकुल बर्दाशत नहीं की जाएगी।&nbsp;</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 23 Apr 2026 18:54:27 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/concealing-negligence</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[इतिहास रचने के नए अंदाज़ (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/new-ways-of-making-history]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>यह भी इतिहास रचना ही है कि अधिकांश युद्ध अनुशासन और शांति स्थापित कर, शांति पुरस्कार हासिल करने के लिए लड़े जा रहे हैं। यह भी ऐतिहासिक है कि वफादारी के प्रतीक जानवर बारे, बड़ी बड़ी कुर्सियां और व्यक्तित्व लगभग लड़ते रहे और खींचतान जारी है। गरमी के मौसम में गरमा गर्म बहस चल रही है। कुछ इंसानी बयान स्थिति इतनी गंभीर कर देते हैं जितनी कुत्तों की गिनती में भी नहीं दिखती। अनेक सन्दर्भों में माफी की मांग भी हुई लेकिन माहौल इतना पारदर्शी है कि कोई किसी से आसानी से माफ़ी मांग कर या माफ़ कर किस्सा खत्म नही करना चाहता। इतने अच्छे या कद्र करने लायक सम्बन्ध नहीं रहे कि माफी मांगने के काबिल हों।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>कुत्तों का मामला भी उनकी पूंछ की तरह टेढ़ा है। कुत्ते नहीं तो वोट नहीं जैसे पोस्टर लगाए जा रहे हैं। इंसान के सबसे वफादार साथी कुत्तों की नसबंदी करवाई जा रही है। कुछ नेता ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए मतदाताओं को हांक रहे हैं। क्या हो गया अगर ज़िंदगी भर वफादार रहने वाले ने एक दो बार काट भी लिया। इतनी बढ़िया दवाइयां उपलब्ध हैं। इस बहाने शोर शराबे वाली रोज़मर्रा की ज़िंदगी से कुछ दिन आराम मिलेगा। छुट्टी आराम से मिलेगी। अखबार में फोटो सहित खबर छपेगी। हो सकता है दो चार चैनल वाले कवरेज करते हुए ज़िंदगी का पहला साक्षात्कार करें।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/a-conversation-with-a-cuckoo" target="_blank">कोयल से हुई बात (व्यंग्य)</a></h3><div>कुत्ते आम तौर पर सामान्य व्यक्तियों को ही काटते हैं। आम व्यक्ति तो आम होते हैं उन्हें सुरक्षा नहीं दी जा सकती। ख़ास व्यक्ति जिन्हें आम तौर पर कुत्ते नहीं काटते, आम लोगों के लिए योजना बना सकते हैं। वैसे कौन सा कुत्ता काटेगा कौन सा नहीं, यह पहले से अंदाज़ा हो तो अलग बात है। किसी को कटवाना हो तो अग्रिम बुकिंग भी करवा सकते हैं। कुत्ते द्वारा काटे जाने की शैली पर उसकी नस्ल के हिसाब से मुआवजा मिल सकता है। भविष्य के लिए टांगों और बाजुओं पर पहने जाने वाले सख्त कवर मिल सकता है। किसी दूसरी जगह काट ले तो ऑटो बीमा स्कीम में मेडिकल बिल का भुगतान सरकार चाहे तो करे । जिस क्षेत्र में कुत्ते ज्यादा हों वहां एंटीरेबीज़ इंजेक्शन लगवाना ज़रूरी हो। कुत्ते के गले में उसका और उसके मालिक का पूरा लेमीनेट हुआ परिचय कार्ड लटका हो ताकि सम्पर्क करने में सुविधा हो । उसमें यह भी लिखा हो कि कितनी बार काट चुका है। कुछ कुत्ता स्वामी ऐसे होंगे जिनसे आम व्यक्ति सम्पर्क करने की हिम्मत न कर पाएंगे। कुत्ता लावारिस होगा तो वैसे भी कुछ नहीं हो पाएगा। वही कुत्ता सरकारी अफसर को भी काट ले तो संयुक्त बीमा क्लेम का सुअवसर हो सकता है।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div>सुना है पिछले कुछ सालों में कुत्तों के काटने के मामले बढ़ रहे हैं। नेता काफी मुखर अशिष्टता का दामन थामे हुए हैं। इंसान ने कुत्तों से सचमुच काटना तो नहीं सीखा लेकिन ज़बान पर लाए शब्दों से तो काट ही रहा है। कहीं पढ़ने में आया कि शांति स्थापित करने वाले देश में पशु आश्रय स्थलों में कुत्ते और बिल्लियों को मार दिया जाता है। हमारे यहां तो ऐसा नहीं हो सकता। यहां आश्रय मिलना और&nbsp; मारना दोनों व्यावहारिक स्तर पर मुशकिल हैं। लोकतंत्र से वफादारी निभाना आसान नहीं, इस मामले में भी इतिहास रचा जा रहा है।</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 16 Apr 2026 17:58:51 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/new-ways-of-making-history</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[कोयल से हुई बात (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/a-conversation-with-a-cuckoo]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>इंसान का इंसान से ईमानदार संवाद मुश्किल में है। पक्षी और जानवर से संवाद हमेशा सहज रहा। कोयल से पूछा, आप हर साल आम को मीठा करने आती हैं, इतनी तन्मयता, ईमानदारी व समयबद्धता कैसे रखती हैं। कोयल ने कहा, हम कुदरत की बेटियां हैं, हमारा कर्तव्य आम के वृक्षों के साथ समन्वय बना कर रखना है।</div><div><br></div><div>सुबह सैर करते हुए विचार आया कि कोयल से बातचीत की जाए। सुंदर, प्रभावशाली, बड़बोले, ईमानदारों से ही पीछा नहीं छूटता। कौन काली कलूटी से संवाद करेगा। खूबसूरत लोगों ने खूबसीरत लोगों को हमेशा नीचा दिखाने की कोशिश की। युगों से आमों की मिठास बरकरार रखने वाली, अपना रंगढंग न बदलने वाली कोयल से संवाद साधने की सोची। एक मित्र जो दर्जनों पक्षियों की बोलियां समझने में सिद्धहस्त हैं ने मध्यस्थ्ता करते हुए कोयल से संपर्क किया। सभी कोयल ने एक जैसी ही बात करनी थी इसलिए किसी एक का चुनाव करना ज़रूरी नहीं था, हां किसी इंसान की बात होती तो सोचना पड़ता।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/sentiments-connected-to-the-soul" target="_blank">आत्मा से सम्बद्ध उदगार (व्यंग्य)</a></h3><div>इंसान का इंसान से ईमानदार संवाद मुश्किल में है। पक्षी और जानवर से संवाद हमेशा सहज रहा। कोयल से पूछा, आप हर साल आम को मीठा करने आती हैं, इतनी तन्मयता, ईमानदारी व समयबद्धता कैसे रखती हैं। कोयल ने कहा, हम कुदरत की बेटियां हैं, हमारा कर्तव्य आम के वृक्षों के साथ समन्वय बना कर रखना है। कुछ भी बदलाव लाना असंतुलन की तरफ ले जाएगा। मिठास आप घोलती हैं, हमने पूछा? बोली, मिठास तो मां प्रकृति घोलती है हमारा काम तो आवाज़ निकालना है और वह भी ठीक वैसी ही जैसा बचपन से सिखाया गया है। हमें आम के वृक्षों पर बैठकर समय और नियमबद्ध तरीके से यह पारिवारिक पारम्परिक कर्तव्य निभाना होता है।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>हमने कोयल से कहा, आपको पता है आम को फलों का राजा माना जाता है। कोयल ने कहा, हम तो साधारण कार्यकर्ता हैं, हमारे यहां सब एक जैसे होते हैं, ऊंच नीच नहीं होता सभी को एक जैसे घोंसले बनाकर रहना होता है। एक जैसा खाना पीना होता है तभी अनुशासन रहता है। इतनी समानता, समरसता, एकरूपता, एकात्मता हमारे जीवन में है कि पता नहीं कि राजा क्या होता है। अगला सवाल था, कोई बागवाला आपको पाल पोसकर, अच्छा खिला पिलाकर, आपको अपने आम के बागीचे में ज्यादा कूकने को कहे, तो कोयल ने कहा, हमें ऐसा व्यवहार करना नहीं सिखाया गया। प्रकृति के नियम पारदर्शी और न बदलने वाले हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>हमने कहा दुनिया कितनी बदल गई लेकिन आपकी तान वैसी ही है। हमें यही सिखाया गया है कि कभी अपना अच्छा चरित्र न बदलो, प्रतिस्पर्द्धा या लालच यहां तक कि मजबूरी में भी अडिग रहो। इसी गुण से आपके व्यक्तित्व की पहचान बनती है, कोयल बोली। झिझकते हुए मैंने जानना चाहा, आपको नहीं लगता आपका रंग काला न होकर, भूरा, लाल या कोई और... । जवाब आया, हमारे पूर्वजों ने हमें यही शिक्षा दी कि रंग से कुछ नहीं होता, सब आपके ढंग से होता है। हमारा रंग यदि उजला, पीला होता तो आप हमें पसंद करते मगर हमारी आवाज़ सुरीली न होती तो कितना देर तक सुन पाते। तब क्या अपने बच्चों को हमारी तरह बोलने को कहते। हमारे सवाल खत्म हो गए थे।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div>कोयल के कूकने का समय हो गया था। वह आम के अन्य वृक्षों की ओर उड़ चली। पक्षी इंसानों की तरह हो जाएं, बोली बदल लें, नए रंग का चोगा पहन लें, मुंह फेरना सीख लें तो प्रकृति का अंदरूनी संतुलन बिगड़ जाएगा। दुनिया के किसी कोने में शायद कोई तो ऐसा करवाने की कोशिश कर रहा होगा मगर कुदरत ऐसा होने तो नहीं देगी । काली कोयल ने अनेक सच उजले कर दिए।&nbsp;</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 08 Apr 2026 18:20:42 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/a-conversation-with-a-cuckoo</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[आत्मा से सम्बद्ध उदगार (व्यंग्य)]]></title>
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      <description><![CDATA[<div>सठियाने नहीं बलिक सत्तरियाने यानी सत्तर साल का होने के बाद मुझे विश्वास हो चला है कि आत्माएं कई प्रकार की होती हैं। साठ साल तक मैं ऐसा नहीं मानता था। अब धर्म का प्रभाव भी बढ़ रहा है, शायद इसका भी कुछ तो असर होगा ही। मैंने यह मानना शुरू कर दिया है कि आत्मा की आवाजें भी होती हैं जो अलग अलग किस्म की होने के कारण तरह तरह के प्रभाव लिए होती हैं। मिसाल के तौर पर सादी, सरल व सभ्य आत्मा की आवाज़ दबी दबी मरियल सी होती है और आम तौर पर अनसुनी की जाती है। आम आत्मा शरीर छोड़ जाए तो जान पहचान के लोग दुनिया की प्रसिद्ध किताब फेसबुक में आरआईपी यानी ‘आत्माजी, स्वर्ग में शांति से रहना’ लिखकर अपना कर्तव्य निभाते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>आत्मा में आत्मा यानी बोले तो अंतरात्मा भी होती है जिसकी मूक आवाज़ के आह्वान पर बड़े बड़े लोग अनूठे, असंभव काम कर दिया करते हैं। कृत्रिम बुद्धि युग में भी कर रहे हैं। बड़े आकार की आत्मा की आवाज़ कुछ भी करवा सकती है। उसके एक जबर्दस्त इशारे पर समाज और राजनीति में नए गुल खिलने लगते हैं। अंतरात्मा की आवाज़, स्वाभाविक है कुछ लोगों के शरीर के बाह्य, ऊपर, नीचे, दाएं या बाएं हिस्से में बसने वाली लघु आत्माओं की आवाजों में सबसे सशक्त मानी जाती है। यह ख़ास लम्हा बिना बताए आता है जब अंतरात्मा के ठीक अंदर, संभवत उसके भूखे पेट से आवाज़ निकलती है। यह जानदार आवाज़, समय, जगह व शुभ मुहर्त देखकर ही आती है लेकिन कोई औपचारिकता वगैरा नहीं मानती। ठीक भी है, अंतर की आत्मा, माफ़ करें अंतरात्मा की आवाज़ है किसी भूखे बच्चे का रोना नहीं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/love-merger-an-advanced-love-story" target="_blank">लव मर्जर...एक अडवांस प्रेम कथा (व्यंग्य)</a></h3><div>ऐसी आवाजों से यह ज्ञान भी प्राप्त होता है कि जीवित शरीर में आत्मा कभी चैन से नहीं रहती। भला जो आत्मा दुनियावी मसलों में, हाड़मांस के पुतले इंसान को ऐसे, वैसे न जाने कैसे कैसे गलत परामर्श दे रही हो, उसे निवृत होने के बाद तो नरक में ही जाना पडेगा न। उसे स्वर्ग में आसानी से अस्थायी सीट भी मिलने का सवाल पैदा नहीं होता। यह बात आम इंसान नहीं समझता तभी तो आत्मा के शरीर छोड़ने के अप्रत्याशित अवसर पर फेसबुक पर ‘लाइक’ का बटन भी दबा देता है, यह मानते हुए कि अमुक आत्मा&nbsp; इस नश्वर संसार के जंजाल से छूट गई है। वास्तव में बेचारी ज़्यादातर आत्माएं, इंसान की गलत करतूतों के कारण नरक में जाकर, निश्चित ही भांति भांति के कष्ट भोग रही होती हैं और इधर ज़्यादातर लोग यही कामना कर रहे होते हैं कि आत्मा को शांति मिले, स्वर्ग में आत्मा शांति से रहे।&nbsp;</div><div><br></div><div>कुछ आत्माओं को महान घोषित किए जाने की राष्ट्रीय परम्परा भी है। जीवित बंदे शारीरिक मोह से छूट चुकी आत्माओं को झूठे ख़्वाब दिखा रहे होते हैं जबकि आत्मा इन तुच्छ विचारों से दूर शांत ही रहती हैं। छोटे छोटे स्वार्थों की गिरफ्त में फंसा आदमी, आत्मा को किसी महंगी चीज़ का टुकडा समझता है जिसे नरक में नहीं स्वर्ग में ही रखा जाना चाहिए। जब आत्मा, नश्वर शरीर में कुलबुला रही होती है, हम उसकी आवाज़ दबाते फिरते हैं और बाद में आत्मा की अंतरात्मा की ईमानदार आवाजें सुनने और सुनाने की कोशिशें करते रहते हैं।</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 04 Apr 2026 18:20:46 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/sentiments-connected-to-the-soul</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[लव मर्जर...एक अडवांस प्रेम कथा (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/love-merger-an-advanced-love-story]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सन 2050 की उस सुनहरी और हाई-टेक सुबह में मोहल्ले के ऑक्सीजन-पार्क की आबोहवा ही कुछ और थी, जहाँ कंधे पर सिलेंडर लादे दो बुजुर्ग अपनी विंटेज यादों की फाइलें खोलकर बैठे थे। वे चर्चा कर रहे थे कि उनके जमाने में प्रेमी-प्रेमिका के घर के बाहर फिजिकल अटेंडेंस देते थे और पत्थर फेंककर खिड़कियाँ तोड़ने जैसे मैनुअल टास्क किया करते थे, पर आज का युग तो पूरी तरह रिमोट रोमांस और क्लाउड-बेस्ड अटैचमेंट का है। इसी बीच एलेक्स-पॉल अपने स्मार्ट ग्लास पर डेटा चेक करते हुए गहरी आहें भर रहा था, जिसे देखकर उसके मित्र साइबर-सिल्वेस्टर ने पूछा, क्या हुआ भाई? क्या तुम्हारी प्रेमिका किसी और के साथ लॉग-आउट कर गई या फिर तुम्हारा इमोशनल क्लाउड क्रैश हो गया? एलेक्स ने एक ऐसी दार्शनिक मुस्कान बिखेरी जिसे देखकर लगता था कि उसने अभी-अभी कोई बहुत बड़ा आध्यात्मिक घाटा सहा है। उसने कहा, नहीं यार, ट्रैजेडी तो यह है कि वह वापस आ गई! मैं अपनी पार्टनर ज़ारा-क्वांटम को तीन महीने के फ्री ट्रायल पर पड़ोसी के पास भेजकर आया था ताकि वह अपनी एक्सप्लोरेशन स्किल्स को अपग्रेड कर सके, पर वह तो कह रही है कि उसे मेरा ही सब्सक्रिप्शन रिन्यू कराना है। यह तो सरासर पिछड़ापन और बौद्धिक दिवालियापन है! उसे प्रोग्रेसिव होकर मल्टी-टास्किंग करनी चाहिए थी, किसी अजनबी के साथ अपने प्राइवेट मोमेंट्स की एचडी रील बनानी चाहिए थी, पर वह तो वापस आकर मेरे लिए चाय बनाने और लॉयल्टी निभाने जैसी दकियानूसी और सड़ी-गली बातें कर रही है। मैं तो सोच रहा हूँ कि इसकी शिकायत इमोशनल कंज्यूमर कोर्ट में कर दूँ।</div><div><br></div><div>साइबर-सिल्वेस्टर ने उसे ढांढस बँधाया कि घबराओ मत, समाज अभी ट्रांजिशन फेज में है, धीरे-धीरे वह भी दूसरों के साथ ओपन-सोर्स होना सीख जाएगी। असल में एलेक्स का दुःख केवल एकतरफा नहीं था; वह इस बात से भी आहत था कि ज़ारा उसे किसी इंटरनेशनल मार्केट में लॉन्च करने के बजाय घर में ही डंप किए हुए थी। एलेक्स चाहता था कि ज़ारा उसे किसी हाई-प्रोफाइल मेटावर्स किटी पार्टी में ऑफर करे, ताकि उसे भी अपनी मार्केटिंग वैल्यू और ग्लोबल डिमांड का अंदाजा हो सके। उसे चिढ़ इस बात की थी कि जब पूरी दुनिया शेयरिंग इकोनॉमी के सिद्धांतों पर चल रही है, तो ज़ारा उसे अपना प्राइवेट असेट और घरेलू सामान क्यों समझ रही है? वह तो उस आधुनिक पुरुषार्थ का स्वप्न देख रहा था जिसमें ज़ारा उसे किसी दूसरी महिला के साथ डेट पर भेजकर खुद बाहर से कमरा लॉक करे और उस पूरे डेटा को क्लाउड पर लाइव स्ट्रीम करके प्रोग्रेसिव पार्टनर का सर्वोच्च गोल्ड मेडल जीते। इधर शहर के स्यूडो-इंटेलेक्चुअल बुद्धिजीवी एक फाइव स्टार कन्वेंशन सेंटर में सेमिनार कर रहे थे कि पुराने जमाने के प्रेमी कितने अकुशल और अनप्रोफेशनल थे जो ईर्ष्या और पजेसिवनेस के चक्कर में हिंसक हो जाते थे। मंच पर खड़ा रिलेशनशिप एल्गोरिदम स्पेशलिस्ट चिल्ला रहा था, साथियों, असली पुरुषार्थ उसे अपनी बाहों में जकड़ने में नहीं, बल्कि उसे दूसरे की बाहों में जाते हुए लाइव स्ट्रीम करने और उस पर सोशल मीडिया लाइक्स बटोरने में है! जो प्रेमी अपनी प्रेमिका का दूसरा प्रेमी खुद शॉर्टलिस्ट नहीं करता, वह प्रेमी नहीं, लव-टेररिस्ट है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/the-sorrow-of-rent" target="_blank">किराये का दुख (व्यंग्य)</a></h3><div>एलेक्स ने अब ज़ारा-क्वांटम को आखिरी अल्टीमेटम दे दिया—ज़ारा, अगर तुम अगले हफ्ते तक किसी अजनबी के साथ इंटीमेट-डेट पर नहीं गई और मुझे उसकी बिहाइंड द सीन्स फोटोज और सेंसरी डेटा नहीं भेजा, तो मैं तुम्हें अपनी लाइफ की फ्रेंड-लिस्ट से हमेशा के लिए ब्लॉक कर दूँगा। बेचारा एलेक्स चाहता था कि उसकी प्रेमिका समाज की मेनस्ट्रीम प्रोग्रेसिविटी में आए और किसी अजनबी के साथ अपने एकांत के पलों को सोशल मीडिया पर लाइव करे ताकि उसे मोस्ट इवॉल्व्ड मेल का टैग मिले। 2050 का यह नया रिलेशनशिप मॉडल उन सभी पुरानी क्रिमिनल एक्टिविटीज का एक परमानेंट और सस्टेनेबल समाधान बनकर उभरा था। अब पजेसिवनेस एक गंभीर मानसिक बीमारी घोषित हो चुकी थी और शेयरिंग को ही सर्वोच्च वर्चुअल वर्चू माना जाता था। एलेक्स जैसे न्यू-एज लवर्स का मानना था कि हत्या करना वेस्ट ऑफ रिसोर्स और डाटा-लॉस है, जबकि प्रेमिका को शेयर करना एक दीर्घकालिक सोशल इन्वेस्टमेंट है। प्रेमिका भी अब किसी दूसरे के साथ अपने आत्मीय पलों को प्रेमी के साथ रियल-टाइम में साझा करती है, जिससे प्रेमी को घर बैठे ही वॉयुरिस्टिक किक मिलती है और उसे क्राइम पेट्रोल का हिस्सा नहीं बनना पड़ता। यह डिजिटल सतीत्व का वह महान दौर है जहाँ धोखा शब्द डिक्शनरी से पूरी तरह डिलीट कर दिया गया है और उसकी जगह को-ऑपरेटिव रोमांस ने ले ली है, जहाँ हर कोई एक ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर की तरह डाउनलोड और अपलोड के लिए उपलब्ध है।</div><div><br></div><div>एलेक्स का दिमाग इस कदर ग्लोबल हो चुका था कि उसने खुद के लिए भी नए रास्ते तलाशने शुरू कर दिए थे। उसने हॉट-स्वैप डेटिंग ऐप के अल्ट्रा-प्रो-मैक्स वर्जन पर अपनी प्रोफाइल बनाई। एलेक्स ने अपनी शक्ल पर इतने साइबर-फिल्टर्स, एआई-मास्क और एल्गोरिथम-स्किन थोप दिए थे कि अगर उसका अपना आधार कार्ड या डीएनए रिपोर्ट उसे देखती, तो वह भी उसे किसी दूसरे ग्रह का पर्यटक समझकर डॉलर मांगने लगती। वह खुद के डिजिटल मेकअप के नीचे असली पहचान भूल चुका था। उसी रात उसे एक प्रोफाइल दिखी—नियो-नाइट-राइडर। उस प्रोफाइल का अवतार इतना जादुई, चमकीला और आकर्षक था कि एलेक्स के दिल की धड़कन गीगाबाइट की रफ़्तार से दौड़ने लगी। उसे लगा यही वह परफेक्ट अजनबी है जिसे वह ज़ारा के लिए एक्वायर करना चाहता है ताकि उसकी सोशल स्टैंडिंग बढ़ सके। उसने उस अज्ञात प्रोफाइल को सुपर लाइक, मेगा लाइक और गॉड लाइक ठोक दिया। उसे रत्ती भर भी अंदाजा नहीं था कि वह जिसे अजनबी समझकर अपनी प्रेमिका का भविष्य और अपना स्वाभिमान सौंप रहा है, वह डिजिटल पर्दे के पीछे असल में कौन है। वह तो बस एक क्लाइंट और सर्वर के बीच का रिश्ता जोड़ने में मगन था, यह भूलकर कि एल्गोरिदम कभी-कभी खून के रिश्तों को भी बाइनरी कोड में बदल देते हैं और इंसान केवल एक यूजर आईडी बनकर रह जाता है।</div><div><br></div><div>आखिरकार ज़ारा-क्वांटम एक नया बॉयफ्रेंड ढूंढने के मिशन में सफल हो गई और उसने उसे सफलतापूर्वक एक्वायर कर लिया। एलेक्स खुशी के मारे अपने वर्चुअल रियलिटी सूट में नाचने लगा और पूरे मोहल्ले में डिजिटल-शुगर-फ्री-लड्डू के कूपन बांटने लगा। वह खुशी से चिल्लाया, आज मेरा विजन 2050 सफल हुआ, मेरी प्रेमिका आखिरकार किसी और की बाहों में लैंड कर गई है! अब मैं समाज में गर्व से सिर उठाकर कह सकूँगा कि मैं एक मॉडर्न और लिबरल पार्टनर हूँ। तभी ज़ारा का वीडियो कॉल आया और वह चहकते हुए बोली, एलेक्स डार्लिंग, तुम्हारी ज़िद और हॉट-स्वैप वाली रिकमेंडेशन रंग लाई! मैंने अपना सेकंडरी पार्टनर ढूंढ लिया है और ताज्जुब की बात यह है कि तुमने खुद ही उसे पिछले संडे ऐप पर सुपर लाइक करके रिकमेंड किया था। तो चलो, अब अपने नए रिश्तेदार और मेरे नए प्रोजेक्ट से मिलो! ज़ारा ने कैमरा घुमाया। एलेक्स की आँखें फटी की फटी रह गईं। सामने सोफे पर उसका अपना सगा छोटा भाई सोनू-साइबर बैठा था, जो एलेक्स का ही प्यूमा वाला टी-शर्ट पहनकर दांत चियान रहा था। एलेक्स हक्का-बक्का रह गया। उसने हकलाते हुए पूछा, सोनू? तू? पर मैंने तो नियो-नाइट-राइडर को लाइक किया था जिसकी फोटो में छह एब्स थे और चेहरा रोबोटिक सुपरमॉडल जैसा था! यह धोखाधड़ी है या मेरा चश्मा खराब हो गया है?</div><div><br></div><div>सोनू-साइबर खिलखिलाकर हँसा और बोला, बड़े भैया, 2050 में चेहरा और शरीर तो केवल डिस्प्ले एड हैं। आपने जिसे लाइक किया, वह मेरा हॉट-प्रोफाइल फिल्टर था जिसे मैंने डार्क वेब से खरीदा था। आपने खुद ही तो सिखाया था कि अपनी असली पहचान छुपाकर मल्टीपल पर्सनालिटी जीना ही असली प्रोग्रेसिविटी है। तो मैंने सोचा घर की लक्ष्मी बाहर क्यों जाए? आपकी सुपर लाइक मिली, तो मैंने इसे फैमिली-कोलेबोरेशन का दैवीय संकेत मान लिया। एलेक्स के पैरों तले ज़मीन खिसक जानी चाहिए थी, पर वह 2050 का इवॉल्व्ड पुरुष था। उसने एक पल के लिए अपना सिर खुजलाया और फिर जोर-जोर से हँसने लगा। उसने कहा, वाह! इसे कहते हैं मैक्सिमम आउटपुट और घर की संपत्ति का घर में ही संचलन! कम से कम अब मुझे उसे डेट पर ले जाने का पेट्रोल अलाउंस, वाई-फाई डेटा और भारी भरकम रेस्तरां बिल नहीं देना पड़ेगा। प्राइवेसी के नाम पर मैं खुद अपने ही कमरे की चाबी बाहर से लगाकर उसे पूरी हॉस्पिटैलिटी दे सकूँगा और इस इन-हाउस प्रोजेक्ट की निगरानी भी कर पाऊँगा। और सुनो सोनू, कल सुबह की स्मार्ट-कॉफी तुम ही बनाओगे क्योंकि अब तुम इस घर के इंटर्न प्रेमी हो और ज़ारा तुम्हारी सुपरवाइजर है।</div><div><br></div><div>तभी ज़ारा ने एक और बड़ा बम फोड़ा, "एलेक्स डार्लिंग, बात यहीं खत्म नहीं होती। सोनू ने भी तुम्हारे लिए एक 'कस्टमाइज्ड रिटर्न गिफ्ट' तैयार किया है। उसने तुम्हारी प्रोफाइल को हमारी मोहल्ले वाली उस 'मैडम-मून' के साथ मैच करा दिया है, जिनके तीन तलाक, पांच रिन्यूअल और अनगिनत 'शॉर्ट-टर्म लीज' हो चुके हैं। वे कल रात तुम्हें अपना पुराना 'इमोशनल डाटा' और विंटेज साड़ियों का कलेक्शन दिखाने के लिए कैंडल-लाइट डिनर पर बुला रही हैं। सोनू का कहना है कि घर का कोई भी सदस्य खाली नहीं बैठना चाहिए, सबको अपनी 'शेयरिंग ड्यूटी' निभानी होगी तभी हम एक 'होलिस्टिक फैमिली' कहलाएंगे।" एलेक्स की आँखें खुशी से भर आईं। उसने कहा, "गजब! अब घर के पुराने संस्कारों और नई प्रोग्रेसिविटी के बीच एक हाइब्रिड मॉडल तैयार होगा। 'मैडम-मून' के साथ मेरा डेट पर जाना समाज के लिए एक क्रांतिकारी संदेश होगा कि हम उम्र और अनुभव के बंधनों से मुक्त हो चुके हैं।" तभी एक रोबोटिक पुलिस एलेक्स के दरवाजे पर आई। पुलिस ने कहा, "एलेक्स जी, आपके भाई सोनू और प्रेमिका ज़ारा ने मिलकर आपको इस घर से 'लॉग-आउट' कर दिया है। उन्होंने आपकी प्रोफाइल को 'एग्रीमेंट' से डिलीट करके आपके कमरे को मेटावर्स पर किसी दूसरे 'विदेशी पार्टनर' को किराए पर दे दिया है। अब आप एक 'फ्रीलांस लवर' हैं, अपना नया 'सॉफ्टवेयर' और छत ढूंढें।"</div><div><br></div><div>एलेक्स ने फोन की तरफ देखा, एक लंबी साँस ली और मुस्कुराते हुए बोला, "कोई बात नहीं! कम से कम अब मैं 'अनलिमिटेड' और 'अनबाउंड' हो गया हूँ! रिजेक्शन भी तो एक तरह का 'सिस्टम अपडेट' ही है।" तभी गेट के बाहर 'मैडम-मून' अपनी इलेक्ट्रिक स्कूटी लेकर हॉर्न बजा रही थीं, और एलेक्स उनकी पिछली सीट पर बैठने के लिए दौड़ पड़ा। 2050 की उस सुबह में, एलेक्स ने साबित कर दिया कि जब तक 'शेयरिंग' का डेटा पैकेट जारी है, तब तक संसाधन और भावनाएं कभी खत्म नहीं होते, चाहे वह कमरा हो या कलेजा। पड़ोसी बुजुर्ग ने यह देखा तो उसने अपना ऑक्सीजन मास्क उतारकर फेंक दिया, उसे लगा कि इस 'प्रोग्रेसिव' हवा से बेहतर तो मौत है। लेकिन एलेक्स हवा में हाथ हिलाते हुए 'मैडम-मून' के साथ ओझल हो गया। इस कहानी का अंत पाठक को हतप्रभ छोड़ जाता है क्योंकि यहाँ कोई हारा नहीं है, बस सब 'शेयर' हो गए हैं। एलेक्स लुटा है या वह सचमुच 'ग्लोबल' होकर मुक्त हो गया है, यह फैसला अब 2050 के एल्गोरिदम ही करेंगे।</div><div><br></div><div>- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’,</div><div>(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 02 Apr 2026 17:51:07 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/love-merger-an-advanced-love-story</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[किराये का दुख (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/the-sorrow-of-rent]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>कंचनपुर गांव के चतुर सुजान 'घपलेराम' ने जब इस बार प्रधानी का चुनाव लड़ा, तो उन्होंने गांव की सबसे बड़ी और प्राकृतिक समस्या को अपना हथियार बनाया—'समय का अभाव'। घपलेराम का तर्क था कि आज का ग्रामीण इतना व्यस्त है कि उसके पास अपने रिश्तेदारों की मृत्यु पर रोने या बीमार पड़ोसी का हाल चाल पूछने तक का समय नहीं है। उन्होंने अपने घोषणापत्र में वादा किया कि जीतते ही वे गांव में 'इमोशनल आउटसोर्सिंग केंद्र' खोलेंगे। यदि आपके घर में कोई गमी हो जाए और आपको दफ्तर जाना हो, तो सरकार की ओर से 'प्रोफेशनल रोदली' भेजी जाएगी जो आपके हिस्से का विलाप ससुरारी धुन में करेगी। गांव के लोग, जो सामाजिक लोकलाज और काम के बोझ के बीच पिसे जा रहे थे, अचानक इस 'किराये की संवेदना' वाले विचार पर ऐसे रीझे कि उन्हें घपलेराम साक्षात कलयुग के श्रवण कुमार लगने लगे।</div><div><br></div><div>प्रचार के अंतिम चरण में घपलेराम ने गांव की चौपाल पर एक 'आँसू-बैंक' स्थापित किया। यह वास्तव में एक पुराना वाटर कूलर था जिस पर उन्होंने 'संवेदना संग्राहक' लिखवा दिया था। उन्होंने गांव वालों को पट्टी पढ़ाई कि जो भी व्यक्ति उन्हें वोट देने की प्रतिज्ञा करेगा, उसके जीवन के सारे 'सामाजिक कर्तव्य' यह मशीन स्वचालित रूप से निभा देगी। विपक्षी उम्मीदवार 'सीधे सादे राम' खड़ंजे और हैंडपंप की बात कर रहे थे, लेकिन जनता को तो उस भविष्य की चिंता थी जहाँ उन्हें किसी की तेहरवीं में बैठकर झूठी उदासी नहीं दिखानी पड़ेगी। घपलेराम ने कुछ भाड़े के कलाकारों को बुलाकर गांव में एक 'मॉक विलाप' करवाया, जिसे देखकर ग्रामीणों को लगा कि अब उनकी आत्मा का बोझ हल्का हो गया है। लोग अपनी मेहनत की कमाई घपलेराम के चरणों में अर्पित करने लगे ताकि उनका सामाजिक जीवन 'ऑटो-पायलट' मोड पर आ सके।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/for-heaven-hindi-satire" target="_blank">स्वर्ग के लिए (व्यंग्य)</a></h3><div>जिस दिन चुनाव का परिणाम आया और घपलेराम की प्रचंड जीत हुई, पूरा गांव अपने 'संवेदना कूपन' लेने उनके घर पहुँचा। लोग चाहते थे कि अगले हफ्ते होने वाली एक शादी और दो मुंडनों के लिए घपलेराम अपने 'प्रोफेशनल प्रतिनिधि' भेजें। घपलेराम अपनी नई सफारी गाड़ी से उतरे और सबके हाथ में एक-एक पत्थर थमाते हुए बोले— "भाइयों, संवेदनाएं आउटसोर्स नहीं होतीं, सिर्फ बेची जाती हैं!" जनता हक्की-बक्की रह गई, "हुजूर, हमारे उन प्रोफेशनल रोने वालों का क्या हुआ?" घपलेराम ने चश्मा ठीक किया और ठहाका मारकर बोले, "मूर्खों! रोने वाले तो तुम खुद हो जो अगले पांच साल तक अपनी इस बेवकूफी पर मातम मनाओगे। मैंने तो तुम्हारी भावनाओं का सौदा करके शहर में अपना 'इवेंट मैनेजमेंट' का दफ्तर खोल लिया है। अब इन पत्थरों को अपने सीने पर रखो और खुद के भाग्य पर रोना शुरू करो।" जनता सन्न खड़ी उस सूखे वाटर कूलर को देख रही थी और घपलेराम 'इमोशनल बिजनेस' की धूल उड़ाते हुए शहर की ओर उड़नछू हो गए।</div><div><br></div><div>- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’,</div><div>(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 30 Mar 2026 13:17:28 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/the-sorrow-of-rent</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[अनुशासन से आई चुस्ती (बाल कहानी)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/agility-born-of-discipline]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>शेखू को कई साल तक यह पता नहीं था कि उसका&nbsp; नाम ऐतिहासिक है। बचपन से उसे राजकुमारों की तरह एक टांग मोड़कर उस पर दूसरी टांग टिकाकर&nbsp; हाथ में दूध की बोतल पकड़कर आराम से दूध पीने की आदत रही। धीरे धीरे बड़ा हुआ तो उसकी आदतों में आलस शुमार होने लगा। स्कूल में सहपाठियों ने उसके नाम का अर्थ पूछा तो उसे पता नहीं था। उसने अपने पापा से पूछा तो बताया कि तुम्हारा नाम महान कहे जाने वाले मुगल सम्राट अकबर के बेटे सलीम के नाम पर है। सलीम को घर में प्यार से शेखू पुकारा जाता था। शेखू यह सुनकर बहुत खुश हुआ और उसके दोस्त बोले, क्या नाम है तुम्हारा वाह!&nbsp;</div><div><br></div><div>शेखू मेहनती व होशियार लड़का था। स्कूल में भाषण प्रतियोगिता होनी थी। पुरस्कारों में महंगे उपहार मिलने थे। सब विद्यार्थी उत्साहित थे। अपने अध्यापक के कहने पर शेखू ने भी प्रतियोगिता में नाम लिखवा दिया। पापा की मदद से उसने अच्छी प्रभावशाली शब्दावली वाला भाषण तैयार कर लिया। उधर दूसरे प्रतियोगी भी तैयारी में जुटे थे सबकी नज़र बढ़िया पुरस्कारों पर थी। पापा ने समझाया कि तुम अपना भाषण निश्चित समय में खत्म करने के लिए सही स्पीड से बोलना। प्रतियोगिता के दिन वह अच्छी तैयारी करकर आया था। उसके बोलने के तरीके व सही उच्चारण की सभी ने तारीफ़ की। खूब तालियाँ बटोरीं उसने पर एक गड़बड़ कर दी। भाषण धीमी रफ़्तार से दिया तभी उसे निश्चित अवधि से ज्यादा समय लग गया। मुख्य निर्णायक ने निर्णय सुनाने से पहले कहा कि शेखू की प्रस्तुति सर्वोत्तम थी उसे प्रथम पुरस्कार मिलता यदि उसने अपना बढ़िया भाषण निश्चित समय में पूरा कर लिया होता। उसे दूसरा पुरुस्कार मिला। शेखू जब घर लौटा तो उसके दिमाग में पहली बार कुछ चल रहा था। उसने मम्मी पापा को बताया तो उन्होंने अगली बार चुस्ती से प्रयास करने को प्रेरित किया।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/for-heaven-hindi-satire" target="_blank">स्वर्ग के लिए (व्यंग्य)</a></h3><div>अपने कमरे में जाकर आँखें मीचकर वह कुछ देर अकेला बैठा रहा फिर एक कागज़ पर बार बार कुछ लिखता रहा। कुछ देर बाद उसके पापा ने आकर उसे प्यार से समझाया कि यूं उदास हो जाने से कुछ नहीं होगा। घबराओ मत यह तो आपके जीवन की पहली प्रतियोगिता थी। अभी तो तुमने सैकड़ों प्रतियोगिताओं में शामिल होना है। जीवन एक प्रतियोगिता है जिसमें जीत हार तो चलती रहती है। तुम्हें अपने आप से वायदा करना है कि तुम सुस्ती छोड़ दोगे और अपने सभी प्रयास पूरी मेहनत, निश्चित समय में तत्परता से करोगे। शेखू ने नीची नज़र कर वह कागज़ पापा को थमा दिया था। जिस पर सुन्दर शब्दों में सौ बार लिखा हुआ था, पापा अब मैं सुस्ती नहीं करूंगा। उसकी आँखों में निश्चय की चमक थी वह बदल चुका था। पापा ने उसे एक घड़ी उपहार में दी और कहा यह लो कल से अलार्म लगाकर उठना और अपना वादा निभाना। अगली सुबह सचमुच अच्छी रही शेखू ने अलार्म बजते ही बिस्तर छोड़ दिया था और कुछ देर व्यायाम के बाद पढ़ने बैठ गया था। उसके जीवन में चुस्ती प्रवेश कर चुकी थी।&nbsp;</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 24 Mar 2026 18:03:05 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/agility-born-of-discipline</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[स्वर्ग के लिए (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/for-heaven-hindi-satire]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>उस अनदेखे स्वर्ग में जाने को सब लालायित हैं और जो स्वर्ग जैसी दुनिया सामने है उसे नरक बना देने की ज़िद है। बिना खुद मरे तो वहां जा नहीं सकते लेकिन कभी अपने खुद से मिलने के बाद घमंड और आत्मप्रशंसा छोड़कर ऐसे लोगों द्वारा भी स्वर्ग ही जाने की इच्छा जताई जाती है जिनके कारनामों ने पृथ्वी रुपी स्वर्ग को भी नरक बनाने में पूरा सहयोग दिया। उनके किए धरे के साथ तो नरक का वातावरण ही मेल खाता है। उनका आत्म विशवास समझाता है कि कुछ देर बात न कर, चिंतन कर, शांत रहकर ही स्वर्ग मिल सकता है। कितना आसान रास्ता है। बढ़ती उम्र के लोग तो ऐसा सोच ही सकते हैं। अनेक लोग ज़िंदगी के बाद भी संभावनाएं मानते हैं और उनके बारे अधिकार से बात करते हैं। पूजा स्थल बनवाते और मूर्तियां लगवाते हैं। पूजा पाठ, उपदेश, कथाएं और भंडारे करवाते हैं। इस माध्यम से वे दुनियावी यश अर्जित करते हैं।&nbsp; &nbsp;</div><div><br></div><div>यह कितनी बेहतर सुविधा है कि दुनिया में सभी के अपने अपने स्वर्ग और अपने अपने नरक हैं। नरक जाने से सब घबराते हैं, कोई नहीं जाना चाहता। जिन लोगों के पास ताक़त का भंडार है और जेब में पैसा वे तो दुनिया में जीते जी अमर होना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि यहीं पर स्वर्ग का अनुभव लिया जाए। वे अपनी अमरता की चाह में बंधे, स्मारक जैसी ईमारतों में खूबसूरत मेहराबें बनवाते हैं, छतों पर फानूस लटकवाते हैं। संगमरमर के ऊंचे विशाल द्वार सजाते हैं। अपने चेहरे वाले सिक्के चलवाते हैं। उन्हें लगता है मानो स्वर्ग का रास्ता तैयार करवाते हैं।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/real-pollution-and-fake-intelligence" target="_blank">असली प्रदूषण और नकली बुद्धि (व्यंग्य)</a></h3><div>इस रास्ते के अड़ोस पड़ोस में स्थित जंगल भी उनका निजी ही होता है। वहां की हरियाली पर उनका अधिकार होता है। वहां वे सदनाम के कई प्रयोग करते हैं। युद्ध करवाने के लिए शांति में डूबी योजनाएं रचवाते हैं। चरित्रहीन, भ्रष्टाचारी, असामाजिक, धोखेबाज़ सभी को माफ़ कर अपने साथ रख्रते हैं क्यूंकि वे भी स्वर्ग ही जाना चाहते हैं। उन सबको नरक शब्द से नफरत होती है हालांकि उन्होंने धरती नामक स्वर्ग में नरक ही जिया होता है। स्वर्ग को अपना भविष्य मानते हुए शायद वे पाप कहे जाने वाले अपने कृत्यों पर पछताते हैं।</div><div>&nbsp;&nbsp;</div><div>सार्वजनिक स्तर पर उनके पछताने की ज़रूरत नहीं होती क्यूंकि उनकी तो ईश्वर से सीधे डील करने की तमन्ना होती है। उन्हें पता होता है कि ईश्वर के साथ न तो झगड़ा कर सकते हैं न उन्हें धमका सकते हैं और न ही उन पर हमला करवा सकते हैं। वे सबसे मानवीय और सुरक्षित यही तरीका अपनाते हैं कि खुद को धामिक बताएं, पूजास्थल बनवाएं। पूजास्थल जाकर, पूजा पाठ करवाकर, दान देकर भगवान् से कभी माफी नहीं मांगते बलिक आशीर्वाद लेकर आते हैं। सोशल मीडिया और अखबारों में छपवाते हैं कि पूजास्थल जाकर आशीर्वाद लिया। उनके परिवार वाले भी उन्हें पूरा सहयोग करते हैं। यह उनका नैतिक कर्तव्य होता है।&nbsp; &nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>किसी दूसरे को लगे न लगे, अपने आप यह महसूस कर लें कि जीवन जीते समय, स्वर्गिक अनुभव और भविष्य में स्वर्ग प्राप्त करने के लिए अच्छा काम किया जा रहा है। कोई माने न माने, स्वर्ग के लिए कुछ करना अच्छा काम ही है।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 21 Mar 2026 16:54:28 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/for-heaven-hindi-satire</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[असली प्रदूषण और नकली बुद्धि (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/real-pollution-and-fake-intelligence]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>असली चीजों और भावनाओं के आराम के दिन आ गए हैं। ऐसे अच्छे दिन पहले आ गए होते तो कई तरह की बचत हो जाती। चलो कोई बात नहीं, देर आए दरुस्त आए। यह तो दिल और दिमाग से महसूस किए जाने वाले सम्मान की बात है कि पुराना जिद्दी प्रदूषण कम करने के लिए नई बुद्धि, नए रास्ते खोज रही है। कृत्रिम बुद्धि का भावार्थ ही नई बुद्धि लिया जा रहा है।&nbsp;</div><div><br></div><div>अब यह सवाल खिल उठा है कि जब प्राचीन बुद्धि, प्रदूषण को उचित तरीके से निबटाने में फेल हो गई तो नकली क्या करेगी। हो सकता है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, इंटेलिजेंट आर्टिस्ट की तरह महसूस करवाए और एयर क्वालिटी इंटेलिजेंस और प्रदूषण नियंत्रण के समाधानों को लागू करवा दे। बेचारी असली नैसर्गिक इंसानी बुद्धि को, अपने ही फैलाए प्रदूषण से परेशान होते ज़माना हो गया । दूसरा कोई स्वादिष्ट सामाजिक चारा नहीं बचा जिसे खाकर नया ज्ञान प्राप्त किया जाए और प्रदूषण को थाम लिया जाए।&nbsp; इसलिए इस संभावना को स्वीकार करना होगा कि कृत्रिम बुद्धि, असली प्रदूषण को अवश्य काबू में कर कर छोड़ेगी।&nbsp;&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/characteristics-of-high-level-politics" target="_blank">उच्च स्तरीय राजनीति की विशेषताएं (व्यंग्य)</a></h3><div>अधिकांश बुद्धिजीवियों, अबुद्धिजीवियों, समाज सेवियों, असमाज सेवियों, राजनीतिक नेताओं, राजनीतिक अभिनेताओं, पर्यावरण विद्वानों और पर्यावरण चर्चा और खर्चा से सामाजिक महत्त्व प्राप्त करने वाले महानुभावों को स्पष्ट रूप से पता है कि इंसानी दिमाग में पकाए तौर तरीके, सरकारी उपाय, सख्त अनुशासन, ईमानदार और पारदर्शी प्रयास वगैरा सब बुरी तरह थककर, आराम घर में घुस गए हैं। असली बुद्धि असफल हो जाए तो ज़ाहिर है नकली बुद्धि का ही सहारा लेना पड़ेगा। अब उसके परिणामों और फायदों का मज़ा लेने का मौसम आया है। असली बुद्धि की नदी से निकले जानदार, ताक़तवर, शानदार और समझदार उपायों के चमकीले पत्थर तो कब से प्रयोग हो रहे हैं।&nbsp; &nbsp;</div><div><br></div><div>ज़िंदगी में तो कब से दर्जनों नकली चीज़ों की बहार है। इसलिए भी मान सकते हैं कि नकली बुद्धि, असली से बेहतर काम करेगी। प्रदूषण का रियल टाइम डाटा उपलब्ध कराएगी। स्रोतों की सटीक पहचान करेगी जिससे उन जगहों की सूक्ष्म स्तर पर पहचान हो पाए। फिर उसके प्रभाव का वैज्ञानिक आकलन आसान हो सकेगा और लक्ष्य आधारित और समयबद्ध कार्रवाई सुझाई जा सकेगी। वास्तविक और व्यावहारिक कार्रवाई तो इंसानजी ही करेंगे या करवाएंगे जिसमें वह पूरी तरह माहिर हैं।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>इतिहास झूठ बोलता है कि सरकारी एजेंसियां कभी समन्वय आधारित कार्रवाई नहीं कर पाती। यह तो हमारी स्थापित लोकतान्त्रिक, चारित्रिक और सांस्कृतिक परम्परा है कि नए प्रयोगों को आत्मसात किया जाए। अब उसी योजना के तहत नकली बुद्धि आधारित मॉडल से पूछेंगे&nbsp; कि नगर निगम, जिला प्रशासन, प्रवर्तन एजेंसियां, तकनीकी संस्थान और इंसान ने नैसर्गिक बुद्धि का प्रयोग कर, उचित&nbsp; प्लेटफार्म पर काम का अभिनय और वास्तविक अमल कितना किया। दिलचस्प है कृत्रिम बुद्धि सभी संस्थाओं की ज़िम्मेदारी तय करेगी और सदियों से इंसानी दिमाग में रह रही अक्ल उसे आदेश मानकर संभवत कार्रवाई भी करेगी। यह कुछ अमानवीय सा कार्य होगा।&nbsp;&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div>‘संभव’ शब्द ज़िंदगी में आ ही जाता है। जब महाभारत में अनेक किंतु, परन्तु और कदाचित वगैरा आ सकते हैं तो भारत में भी आ ही सकते हैं। अलग अलग मोर्चों पर कार्रवाई करना वास्तव में मुश्किल होता है, शक्ति विभाजित हो जाती है। इसलिए अब एक साथ, बहुत ज़्यादा असली, प्रभाव पैदा करने वाली सख्त, कृत्रिम कार्रवाई की जा रही है। प्रदूषण फैलाने वाले, असली, चालाक और स्वार्थी बुद्धि वालों की नींद उड़ गई है। ऐसा अभी माना जा रहा है लेकिन सिर्फ माने जाने से क्या होता है जी । अभी तो असली बुद्धि और भावनाओं के आराम के दिन शुरू हुए हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 18 Mar 2026 10:39:04 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/real-pollution-and-fake-intelligence</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[उच्च स्तरीय राजनीति की विशेषताएं (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/characteristics-of-high-level-politics]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>कुछ क्षेत्रों, व्यक्तियों और चीजों की विशेषताएं सभी को पता होती हैं लेकिन कुछ दिन बाद फिर से कोई बता दे तो तरोताज़ा होती रहती हैं। राजनीति क्षेत्र में भी ऐसी परम्परा है। राजनीति ज़िंदगी को हर तरफ फूल सजे मतभेदों का मैदान बनाए रखती है जहां बड़े से लेकर छोटे राजनेता अलग अलग खेल खेलते रहते हैं। विरोधी के खिलाफ ज़बानी तीर चलाते समय मर्यादा तोड़ना ही असली खेल माना जाता है। इन्हीं यशस्वी खिलाड़ियों दवारा रैलियों में आपत्तिजनक वैमनस्य फैलाते अपशब्दों के जलते भूनते मसाले में पकाए नारे लगाना ज़रूरी होता है तभी शारीरिक जोश बना रहता है। दूसरे के पद की गरिमा भूलने से पहले, अपनी गरिमा भूल जानी चाहिए ताकि दूसरे के पद की गरिमा भूल जाना आसान हो जाए और शालीनता भाग जाए। इस सन्दर्भ में भाषाई मर्यादा की दीवार तोडनी पड़ती है। इसका राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक फायदा यह है कि समाज पर कई तरह का असर पड़ता है। इसे हम कुअसर या सुअसर नहीं कह सकते क्यूंकि समाज बहुत सभ्य और समझदार होता जा रहा है।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>कई बार होता है, टिप्पणी की जाती है जो काफी सख्त किस्म की होती है फिर कहा जाता है कि संवैधानिक पदों पर विराजे नेताओं के बारे बेहतर भाषा का प्रयोग करना चाहिए जिसमें शाब्दिक मर्यादा हो। इस बात का भी असर होना ही चाहिए। लेकिन चूंकि उम्दा राजनीति की चारित्रिक विशेषता के अंतर्गत किसी भी रंग और आकार के शब्दों का असर नहीं लेना चाहिए, इसलिए नहीं लिया जाता। वह बात दीगर है कि संवैधानिक पदों पर विराजे नेताओं के मुखमंडल द्वारा, सामान्य नेताओं, विपक्ष या आम आदमी बारे प्रयोग की जाने वाली भाषा बारे कोई नर्म बात तो नहीं की जाती।&nbsp; कहते तो हैं कि इस वजह से सवैंधानिक संस्थाओं का सम्मान हिलने लगता है। कई बार गिर भी जाता है लेकिन अधिकांश नेता तो सम्मान को सामान ही समझते हैं। विरोध के अधिकार को तो वैसे भी सुरक्षित माना जाता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/it-should-be-like-this-and-like-that" target="_blank">ऐसा और वैसा होना चाहिए (व्यंग्य)</a></h3><div>उच्च स्तरीय राजनीतिक परिदृश्य में हंगामे, नारेबाज़ी और हुल्लड़ के सहारे कहीं का भी नजारा बदल दिया जाता है। कहीं और का मामला कहीं दूसरी जगह लाया जाता है। दुनिया की बेहद महत्त्वपूर्ण चीज़, ‘माफी’ मांगने के लिए कहा जाता है। ऐसा लगता है माफी न होकर स्वादिष्ट चाट हो जिसके खाने से गुस्सा मानसिक संतुष्टि में बदल जाएगा। इस मनोरंजक गतिरोध के दौरान कई अहम राजनीतिक परेशानियां इक्कठी होकर कॉकटेल पार्टी करती हैं। उन्हें लगता है कहीं उनका समाधान निकाल लिया गया तो ऐसा मौका कम होता जाएगा।</div><div><br></div><div>आक्रामकता के झंडे हिलाते हुए पक्ष और विपक्ष दोनों को, बेचारा वक़्त हाथ जोड़कर समझाता रहता है। मगर उसकी कौन सुनता है। राजनेता उससे पूछते हैं, तुम कौन हो जो हमें समझाने की हिमाकत कर रहे हो। बेशर्मी बार बार ठहाका लगाकर हंसती है, जिस तरह सिर्फ पैसा कमाने के लिए बनाई कमर्शियल फिल्म में नर्तकी, आइटम डांस में फूहड़ तरीके से मुस्कुराकर शरीर प्रदर्शन करती है।</div><div><br></div><div>राजनीति का व्यवसाय तो चलता ही रहता है। बीच बीच में गधों और खच्चरों को घोड़ा बनाकर पशु व्यापार भी कर लिया जाता है जिससे दूसरे जानवर भी बहुत खुश रहते हैं। उन्हें लगता है कभी न कभी उनका नंबर भी ज़रूर आएगा। राजनीति के मोहल्ले में आशा ही जीवन होता है।&nbsp; &nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 16 Mar 2026 19:41:48 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/characteristics-of-high-level-politics</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[ऐसा और वैसा होना चाहिए (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/it-should-be-like-this-and-like-that]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>प्रसिद्ध होना सबके लिए आसान नहीं है लेकिन आजकल अनगिनत लोग इसी कोशिश में लगे रहते हैं कि कुछ न कुछ ऐसा कर सकें या उनकी ज़िंदगी में कुछ इतना बढ़िया हो जाए कि मशहूर हो जाएं। चाहे समाज में व्यावहारिक स्तर पर न सही लेकिन सोशल मीडिया पर ही ज्यादा से ज़्यादा लाइक्स मिल जाएं और प्रसिद्ध हो जाएं। प्रसिद्धि के बहाने कम या ज़्यादा पैसा भी कमा लिया जाए तो सोने पर सुहागा लेकिन इस चक्कर में कई बार, ऐसा ही नहीं वैसा भी कर बैठते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>एक बार किसी भी तरह की मेहनत कर प्रसिद्ध हो जाओ और दौलत भी कमा लो तो, समाज तो क्या असमाज में भी पूछ होने लगती है। कई तरह के पत्रकार, वीडियो पकाने और बनाने वाले आपके घने मित्र बने रहते हैं। प्रसिद्धि और दौलत के नए मालिकों बारे दूसरों को बताकर खुद भी कुछ न कुछ कमाने का जुगाड़ करते रहते हैं। एक बार मिली ज़िंदगी में, पैसे के रास्ते पर चलकर आराम और सुविधाएं आ जाएं तो पहनावे और बालों का रंग तो करवट बदलता ही है बात करने के विषय भी बदल जाते हैं। ज़बान का लहज़ा बदल जाता है। नई शैली में असंभव बातें करना भी संभव हो जाता है। चारों तरफ, आठों पहर उपदेशों के फूल खिले रहते हैं।&nbsp;&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/celebrations-on-holi" target="_blank">होली पर आयोजन (व्यंग्य)</a></h3><div>प्रसिद्ध चेहरे क्या क्या कहते और कह सकते हैं यह देखने, सुनने और और पढ़ने से पता चलता है। जिस व्यक्ति ने कभी एक पौधा न लगाया वे कहते हैं, हमेशा पर्यावरण का सम्मान करें। हमारे सभ्य और विकासशील समाज के जेन जी को गलत आदतों और भेदभाव से दूर रहना चाहिए क्यूंकि देश का भविष्य जीडीपी की ग्रोथ और समृद्धि उन पर टिकी है। डरपोक और सुस्त लेकिन अब प्रसिद्ध हुआ चेहरा जिसने कभी फुटबाल में एक किक नहीं लगाई, फ़रमाएगा कि हमें खेलों में और बेहतर करना चाहिए। खेल का स्तर उठाना चाहिए। वे सुझाव देंगे कि हमें सुरक्षा क्षेत्र में अविजित बनने के अतिरिक्त, सॉफ्ट सुपर पॉवर भी बनना चाहिए। लगे हाथ वे सामाजिक और नैतिक उपदेश भी उपहार में देंगे।&nbsp;</div><div><br></div><div>किसी समय मारधाड़ विशेषज्ञ, मोहल्ले के दादा, अब राजनीति में धाक जमाती प्रसिद्ध ज़बान बोलेगी, आशा है हम नदियों की उपयोगिता समझेंगे। हमारे देश की सभी नदियां और हवाएं शुद्ध रहनी चाहिएं। इसके लिए हमें हाथ मिलाकर काम करना चाहिए। देश और दुनिया में शांति, सहिष्णुता और इंसानियत को प्राथमिकता मिले इसलिए हम सब बेहतर इंसान बनने की कोशिश करें और दूसरों को भी प्रेरित करें। शारीरिक रूप से कमज़ोर व्यक्ति भी नाम कमा सकता है। ऐसे ही प्रसिद्ध हुए कमज़ोर से व्यक्ति ने कहा, सेहत ही असली दौलत है। हम सभी को तनाव से दूर रहना चाहिए फिट रहने के लिए जिम में घंटो पसीना बहाना ज़रूरी नहीं, माइंड सेट ताक़तवर होना चाहिए। प्रसिद्ध वनकाटू जो भविष्य में सफल राजनीतिज्ञ हो गए, ने सख्ती से कहा, पर्यावरण के लिए सचमुच गंभीर होने की ज़रूरत है। इसे संभालने कोई और नहीं आएगा।&nbsp; स्वच्छ हवा पानी की सभी को ज़रूरत है। खुद पर भरोसा करना ज़रूरी है ताकि प्रदूषण न झेलना पड़े। अपनी बात में उन्होंने यह भी जोड़ दिया कि हमारे विकसित समाज में महिला अपराधों को लेकर जीरो टॉलरेंस होना चाहिए। सभी ने समझाया कि ऐसा या वैसा होना चाहिए।&nbsp; &nbsp;</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 11 Mar 2026 19:15:58 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/it-should-be-like-this-and-like-that</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[सशक्तीकरण- धूमिल अस्तित्व का (कविता)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/poem-on-international-women-day-2026]]></guid>
      <description><![CDATA[<div><span style="font-size: 1rem;">आज फिर से आ गया है आठ मार्च -अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस बस एक दिन के लिए अपनी पहचान दर्ज कराने।</span></div><div>नारी अस्तित्व और उपलब्धियों का गुणगान करने ।</div><div>कल ये चला जाएगा और 364 दिन लंबी नींद सो जाएगा ।</div><div>आज के खास दिन महिला सशक्तीकरण पर बड़ी - बड़ी सभाओं का आयोजन किया जाएगा ।</div><div>नारी के उत्थान, विकास, सम्मान, अधिकार, आजादी और समानता दिलाने पर बल दिया जाएगा।</div><div>बातें होंगी सबको साथ लेकर चलने की।</div><div>जादुई छड़ी से अचानक सब कुछ बदलने की।</div><div>कोई नहीं पढ़ पाएगा इन सब से अनभिज्ञ सुदूर क्षेत्रों में बसी&nbsp; नारी का अंतर्मन।</div><div>जो नहीं जानती आज उसी के नाम पर मनाया जा रहा है जश्न। उसे सिखाया गया है मौन रहकर सब कुछ सहना।</div><div>घुटन,दर्द ,आंसुओं के साथ किस्मत के भरोसे रहना ।</div><div>उनकी बेड़ियों को कौन तोड़ेगा, किसका कर रहे हैं हम इंतजार?</div><div>जाना होगा उनके दिलों तक कराना होगा उनसे उनकी काबिलियत का साक्षात्कार ।</div><div>आसमान से नीचे उतर धरातल पर उन्हें साथ लेकर चलना है।</div><div>सदियों से चली आ रही&nbsp;</div><div>सड़ी- गली सोच को बदलना है</div><div>देना हैं हौंसला, भरना है मनो में उनके विश्वास।</div><div>आधी आबादी का ये धूमिल अस्तित्व समाज&nbsp; निर्माण के लिए है बहुत खास ।</div><div>ये शुभ दिन ये त्यौहार।</div><div>जो दिनों से बढ़कर महीनों ,सालों और युगों तक जाएगा ।</div><div>कैलेंडर की हर तारीख पर अपनी पहचान दर्ज कराएगा।</div><div>तभी सही मायनों में महिला सशक्तीकरण हो पाएगा ।&nbsp;</div><div>तभी सही मायनों में महिला सशक्तीकरण हो पाएगा।</div><div><br></div><div>- निर्देश त्यागी</div>]]></description>
      <pubDate>Sun, 08 Mar 2026 10:24:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/poem-on-international-women-day-2026</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[होली पर आयोजन (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/celebrations-on-holi]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>होली के अवसर पर मुझे भगवान के ऐसे कीर्तन में शामिल होना बहुत अच्छा लगता है जिसमें प्रसिद्ध हिट फिल्मी धुनों पर ठुमकते, कीर्तन मंडली के सजे धजे नायक ‘कृष्ण’ बांसुरी मुंह से छुआए क्रम से सबके पास आकर फूलों से बना रंग लगाते हैं और भेंट में नकद रुपए लेकर उठते हैं और पुनः नर्तन करने लगते हैं। ऐसे कार्यक्रम से व्यक्ति धार्मिक, आध्यात्मिक, उत्सवधर्मी&nbsp; हृदय महसूस करता है। मन बहुत अधिक भावना विभोर हो उठता है। आभास होने लगता है, होली पर अगर भगवान् कृष्ण किसी रूप में आ जाएं तो छोटा सा कार्यक्रम भी महा प्रसिद्ध आयोजन में बदल सकता है।</div><div><br></div><div>इस संभावित आयोजन की पोस्ट मैंने फेसबुक पर डाल दी तो लाईक करने वाले समझदारों ने और्गैनिक रंग अग्रिम डालने शुरू कर दिए। पिचकारियों में, हाथ से बाल्टी भर रंग फेंकना शुरू कर दिया। कल्पनाशील मित्रों ने आग्रह दिया कि होली के मौका पर रंगभरा रास भी आयोजित किया जाए। इस आयोजन के लिए साथी साथ लाने का वायदा भी किया जाने लगा। रास रचाने के लिए आतुर गोपियों के प्रस्ताव आने लगे यह प्रशंसा करते हुए कि भगवान कृष्ण के प्रिय नृत्य रास के रस के बिना होली कैसे मनाई जा सकती है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/pothole-repair" target="_blank">गड्ढों की मरम्मत (व्यंग्य)</a></h3><div>हमारे एक पुराने दोस्त बांसुरी बजाते और आजकल डीजे भी चलाते हैं उन्होंने हमें फोन कर अधिकार से कहा, प्यारे धर्म का काम कर रहा है, चिंता न करो बांसुरी भी बजा देंगे और डीजे पर भक्तों को नचा भी देंगे। हमें लगा क्या मैं ऐसा धार्मिक जुलूस जैसा कार्यक्रम आयोजित करने जा रहा हूँ जिसमें युवा विद्यार्थियों को भांग का घोटा पिलाकर, दो केले खिलाकर, डीजे की धुन पर फिल्मी धुन वाले भजनों पर सड़क पर कई घंटे नचाया जा सकता है। कुछ शुभचिंतकों&nbsp; ने सलाह दी कि किसी की व्यवसायिक सेवाएं ली जाएं तो आयोजन का रंग निखर उठेगा और भगवान अति प्रसन्न हो जाएंगे। खूब सारी आमदनी होनी भी सुनिश्चित होगी। हमारे मन और तन से टेसू के फूल, केवड़े की मादक सुगंध, कोयल की कूक, आम के बौर और पुरानी गोपियां भी बाहर आने लगे थे।&nbsp;</div><div><br></div><div>एक ख़ास बात, उस रात जब कृष्ण स्वप्न में आए तो वे आकर्षक स्वप्निल वस्त्रों में रहे लेकिन बांसुरी नहीं बजा रहे थे। उनके पांव के नीचे घास हरी मुलायम न होकर उदासी के रंग में लिपटी थी जिसमें तीखे कांटे भी थे। उनमें से कुछ कांटे उनके पांवों को घायल कर चुके थे और कुछ कांटे उनके हृदय की तरफ बढ़ रहे थे, उनकी पसंदीदा दर्जनों गाएं उनसे दूर मुंह छिपाए खड़ी थी। खास बात यह कि उनके सिर से मोर का पंख गायब था। हमने जैसे ही उनसे बात करने का निवेदन किया, ख्वाब बिखर गया।</div><div><br></div><div>सुबह होने पर इससे पहले कि पत्नी को स्वप्न बारे बताते उन्होंने खुश होकर बताया, इस बार महा सामाजिक क्लब वालों ने एआई द्वारा निर्मित गोपियों और कृष्ण का भव्य रास कार्यक्रम आयोजित किया है। टिकट ऑनलाइन मिल रहे हैं, मैंने रात को ही बुक कर लिए हैं। उसी शो में प्रसिद्ध बांसुरी वादक ‘राग चैन’ प्रस्तुत करेंगे और वास्तविक रंगों से होली भी खेली जाएगी ताकि परम्परा जारी रहे। ऐसे आध्यात्मिक आयोजन में जाने से कौन इनकार कर सकता था।&nbsp; &nbsp;</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 03 Mar 2026 18:26:53 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/celebrations-on-holi</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[गड्ढों की मरम्मत (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/pothole-repair]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बरसात की पारम्परिक गलती के कारण सड़क पर नए गड्ढे बन गए थे, पुराने गड्ढे बड़े और&nbsp; जिन गड्ढों में रोड़े और मिटटी भरी थी निकल गई थी । गड्ढों की लम्बाई, चौड़ाई व गहराई बढ़ती ही गई । कई गड्ढे अब खड्डों की तरह दिखते थे । इतने गड्ढे हो गए, लगता सड़क के साथ भीषण दुर्घटना हुई जिससे बेचारी के शरीर पर दर्जनों जख्म हो गए हों&nbsp; । दोपहिया वाहन चालकों और पैदल चलने वालों को अब तक मुसीबतें झेलनी पड़ रही हैं ।&nbsp; अनहोनी घटना कभी भी घट सकती है।&nbsp;</div><div><br></div><div>कई जागरूक लोगों ने म्यूनिसिपल कमेटी में फोन किया, पार्षद, सचिव, प्रधान को कहा, पीडब्ल्यूडी के जेई से निवेदन किया लेकिन गड्ढों को ठीक करने के लिए संबंधित विभाग कोई माकूल कदम नहीं उठा पाया । गड्ढों के सुप्त मामले में शासन और प्रशासन के तभी जागने की परम्परा है, जब बड़ी कुर्सी पर बैठने वाला और ऊंची गाडी में सफ़र करने वाले महान व्यक्ति को जानदार गड्ढा बुरी तरह से हिला दे । इस सुघटना के बहाने उन्हें पैदल चलने वाले या आम यात्रियों की परेशानियां भी याद आ जाती हैं । फिर गड्ढों की मरम्मत का आकलन&nbsp; सोच विचार, समझकर बनाया जाता है। नेता, अफसर व ठेकेदार को इसके लाभ पता होते हैं । बरसात से पहले ही सड़क की मरम्मत करवाकर&nbsp; भुगतान करने की स्थापित सांस्कृतिक आर्थिक परम्परा भी है ।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/satire-on-minimalism" target="_blank">मिनिमलिज्म (व्यंग्य)</a></h3><div>इस बार की महत्त्वपूर्ण बैठक में सड़कों की गुणवत्ता सुधारने और पैच वर्क को अधिक टिकाऊ बनाने के लिए, सख्त नियमावली का प्रारूप बनाया गया जो राष्ट्रीय मानकों पर आधारित रहा&nbsp; । ऐसा लगा अब एक भी गड्ढा बिना उच्च कोटि की मरम्मत किए बिना नहीं छोड़ा जाएगा। मरम्मत वाले क्षेत्र को वर्गाकार या आयताकार आकार में काटना ज़रूरी होगा, जिसमें सभी किनारे नब्बे डिग्री पर होने चाहिएं।&nbsp; गड्ढे में से धूल हटाने के लिए बढ़िया एयर ब्लोअर का प्रयोग करना होगा। गड्ढे के तल और दीवारों पर बिटुमेन इमल्शन की पतली परत लगाना ज़रूरी है ताकि नई सामग्री मजबूती से चिपक सके।&nbsp;</div><div><br></div><div>यदि गड्ढा तीन या पांच इंच से ज़्यादा गहरा है तो भरने के बाद मशीन&nbsp; से दबाया जाएगा । पैच का स्तर सड़क से तीन एमएम ऊंचा रखा जाएगा ताकि वहां पानी, धूल और मिटटी प्रवेश न कर सके। अब खड्डे की मरम्मत से पहले, मरम्मत के दौरान और मरम्मत के बाद, सम्बंधित अधिकारी के साथ रंगीन फोटो ली जाएगी। इस तरह गड्ढों का नाम मरम्मत के इतिहास में सचित्र दर्ज हो जाएगा। दो वर्ष के भीतर अगर उसी स्थान पर दोबारा गड्ढा हुआ तो मरम्मत को विफल माना जाएगा । फिर समझदार लोगों की कमेटी बिठाकर, कारणों की गहन जांच की जाएगी, जिसके तहत जवाबदेही भी तय की जा सकती है।</div><div><br></div><div>इस नई योजना बनाए जाने के सुअवसर पर पत्रकारों को मौक़ा पर ही चाय पान और समोसा खान के लिए बुलाया गया। सूचित किया गया कि अब गड्ढों की किस्मत बदलने वाली है। सामने दिख रहे गड्ढे खुश दिख रहे थे। उन्हें पता था मरम्मत जल्दी हो न हो लेकिन आने वाले दिनों में अखबारों में उनकी फोटो छपेगी, सोशल मीडिया पर रीलें घूमेंगी और उन्हें भी कमेंट्स मिलेंगे।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div>यह कमाल की व्यवस्था की जा रही है। वास्तव में उच्च कोटि का प्रशासनिक इंतजाम किया जा रहा है। वहां से गुज़र रहे इंसान सोचेंगे ज़रूर, कि हम से बेहतर मरम्मत तो गड्ढों की होने जा&nbsp; रही है।&nbsp; &nbsp; &nbsp;</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 28 Feb 2026 19:22:15 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/pothole-repair</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[मिनिमलिज्म (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/satire-on-minimalism]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>यह शब्द बोलने में अजीब सा है जिसका अर्थ है सादा जीवन व्यतीत करना, केवल ज़रूरी चीज़ों के साथ जीना, गैर ज़रूरी चीज़ों का दबाव हटाना। कम चीज़ों से ज्यादा ख़ुशी मिलती है, ज़िंदगी को अर्थ देती हैं, तनाव कम होता है, ध्यान केन्द्रित रहता है। यह बात आज के विकसित, सुविधावादी युग में सार्थक नहीं लगती। आजकल ऐसा करना तो क्या सोचना भी मुश्किल है। यह तो प्रवचन ही लगता है। अब तो सपने भी ऑनलाइन शापिंग के आते हैं, नए नए स्वाद लुभाते हैं ।&nbsp;</div><div><br></div><div>कहते हैं ज़्यादा चीज़ें अव्यवस्था पैदा करती हैं। चीजों को अनुशासन में रखो, साफ़ सुथरी रखो।&nbsp; उनका नियमित प्रयोग करो। उनका बीमा करवाकर रखो। उनकी देखरेख की ज़िम्मेदारी आपस में बांट कर रखो तो कोई परेशानी नहीं होती। बेचारा बाज़ार दिन रात मेहनत करता है, मार्केटिंग के नए नए तरीके लाता है, नए महंगे चेहरों के साथ विज्ञापन बनवाता है। खूबसूरत मॉडल्स सामान ही सामान खरीदने के लिए उत्प्रेरित करते हैं । यह सब एक बार मिली ज़िंदगी में चीज़ें कम करने के लिए तो नहीं है। फिर प्रेरणा, लालच, ईर्ष्या, द्वेष और प्रतियोगिता का क्या करें।&nbsp; सफल और धन दौलत वालों की मिसाल देकर समझाया जाता है उन्हें देखो कितने कम सामान या कपड़ों में जीवन बिताते हैं यानी एक ही रंग की सात टी शर्ट्स खरीद लो।&nbsp;&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/life-and-holidays" target="_blank">ज़िंदगी और छुट्टियां (व्यंग्य)</a></h3><div>अरे यार, कुदरत से प्रेरित होकर इंसान ने ही इतने खूबसूरत रंग बनाए हैं। उन्हें कब पहनेंगे। कलाकारों, डिज़ाइनर्स और तकनीक ने आकर्षक कपड़े सजाए हैं। महिलाओं के लिए तो छोटे से छोटे, मंहगे से महंगे वस्त्र बनाए हैं उनका मज़ा कब लेंगे। अगला जन्म तो सिर्फ ख्याल है, असली ज़िंदगी तो सिर्फ एक बार ही मिलनी है। मान लो, अगला जन्म मिला, योनी बदली, गधे बने तो। वस्तुएं कम करने वाले कहते हैं कि इनसे प्राप्त होने वाली खुशी अस्थायी है। अनुभव, लम्बी व स्थाई खुशी देते हैं। शायद इन लोगों को पता नहीं कि जीवन में खुशियां&nbsp; कम हैं और दुःख ज़्यादा।&nbsp; मकान, कार, सोना हासिल करने का अनुभव किस अनुभव से कम है। चौरासी किलोमीटर जाकर स्वादिष्ट खाने का अनुभव ही बरसों नहीं भूलता।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>कम उपभोग करने वाली जीवन शैली के वकील कहते हैं कि कम चीज़ों वाले ज्यादा शांति और संतुष्टि महसूस करते हैं। घर साफ़ सुथरा शांत दिखता होता है। पूरा ध्यान आपसी रिश्तों पर जाता है। व्यक्ति भावनात्मक ऊर्जा प्राप्त करता है। लेकिन ज़्यादा चीज़ों से घर भरा भरा लगता है, सकारात्मकता आती है कि मैं इतनी चीज़ों का स्वामी हूं। ज्यादा साफ़ सफाई भी तो एक तरह का संक्रमण फैलाती है । घर से बाहर का वातावरण और पर्यावरण तो कूड़ा कचरा पूर्ण ही है न। उन लोगों को क्यूं नहीं समझाया जाता जो नए नए आविष्कार करते रहते हैं। पिछले दिनों मेरी पत्नी सेब काटने की मशीन मंगाने की इच्छा जता रही थी, जिसे मैंने सामान कम करने की शुरुआत मानकर नहीं मंगाया। उनसे वायदा किया कि सेब भी मैं ही काट दिया करूंगा लेकिन बाज़ार में किन्नू और संतरों की भरमार होते ही नया जूसर खरीदना पड़ा क्यूंकि पुराना खराब था।&nbsp; जूसर में रस फलों का निकला, तेल मेरी जेब का और असली चीज़ जो सेहत के लिए लाभदायक होती है यानी फाइबर, कचरा पेटी में गया। शिक्षा यह मिली कि खूब चीज़ों का मैक्सिमम मज़ा लो।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 24 Feb 2026 18:34:06 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/satire-on-minimalism</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[ज़िंदगी और छुट्टियां (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/life-and-holidays]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>एआई से जो मर्ज़ी पूछ लीजिए, तनमन चाही जगहों पर अपनी तस्वीरें बनवा लीजिए लेकिन घुमक्कड़ी का लुत्फ़ उठाने के लिए वहां सशरीर ही जाना पडेगा। उससे पहले माल चाहिए और छुट्टी भी। एक बार मिली ज़िंदगी में सबसे ज़्यादा छुट्टियां सरकारी नौकरी में ही हो सकती हैं। पति या पत्नी सरकारी नौकरी में हों तो किस्मत और जुगाड़ दोनों जेब में रह सकते हैं। पोस्टिंग का प्रबंधन भी हो जाता है। सरकारी नौकरी की तो वाह वाह है जी। आम समाज में उन लोगों की सामाजिक रेटिंग कम रहती है जिनके परिवार से एक भी व्यक्ति सरकारी नौकरी में नहीं होता। सरकारजी के वश में हो तो सभी को सरकारी नौकरी दे दे और अपने वोट पक्के कर ले।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>नासमझ लोग आवाज़ उठाते रहते हैं कि एक परिवार से एक ही बंदा सरकारी नौकरी में होना चाहिए। वह बात दीगर है कि ऐसी बातों को मानवाधिकारों का हनन माना जाता है। सरकारी नौकरी करने वाले तो अपने बच्चों को भी ऐसी कोचिंग देते हैं कि वे किसी तरह सरकारी नौकरी में घुस जाएं। निजीकरण के ज़माने में भी सरकारी नौकरी की चाहत कम नहीं होती जी। छुट्टियों का खज़ाना जमा</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/administration-comes-into-action" target="_blank">प्रशासनजी का हरकत में आना (व्यंग्य)</a></h3><div>आम तौर पर साल के दौरान होने वाली छुट्टियां, ज़िंदगी में बहार की तरह आती हैं लेकिन रविवार को घोषित छुट्टियां पतझड़ सी उदासी लाती हैं। अगर यही अवकाश दूसरे वार को हों तो मौसम सुहाना रहता है। कई बार वैकल्पिक अवकाश भी रविवार को आते रहे हैं जो अनचाही तेज़ बारिश वाले दिन की तरह होते हैं । कई त्योहारों या प्रसिद्ध जन्मदिन का अवकाश, शनिवार या सोमवार को रहता है तो स्थानीय मेला सा लगता है। अगर कोई छुट्टी दूसरे शनिवार को घोषित हो जाए तो इस बात की भी तारीफ़ नहीं की जाती क्योंकि उस दिन पहले ही अवकाश होता है।&nbsp; &nbsp;</div><div><br></div><div>इस साल भी राष्ट्रीय अवकाश सिर्फ तीन हैं, धार्मिक और सांस्कृतिक छुट्टियां उन्नीस होनी हैं। एक राज्य में, बावन वीकेंड यानी शनिवार रविवार मिलाकर, एक सौ सत्ताईस अवकाश हैं। दूसरे राज्य में तीन अवकाश ज्यादा हैं। इसके इलावा तीन ऐच्छिक, तेरह आकस्मिक, पंद्रह मेडिकल, तीस अर्जित यानी साल में छ महीने की शानदार छुट्टी। इतनी छुट्टियां हैं कि हर दूसरे दिन दफ्तर जाने की सुविधा&nbsp; है। किसी आम व्यक्ति ने काम से जाना हो तो उसे पहले पता कर लेना चाहिए, फलां कर्मचारीजी आज अवकाश पर तो नहीं।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div>दो तीन सप्ताह के बाद, तीन दिन का सप्ताहांत भी उपलब्ध है। कुछ छुट्टियां शुक्रवार या शनिवार को भी होती हैं जिनके साथ एक छुट्टी लेकर कई छुट्टियां एक साथ हो सकती हैं। एक छुट्टी ले लेने से चार दिन की छुट्टी हो जाती है और दो लेने से पांच या छ दिन का थका देने वाला आराम।&nbsp;</div><div><br></div><div>काफी ज़्यादा समझदार लोगों का सुझाव है कि यदि कोई त्योहार या अवकाश दूसरे शनिवार या रविवार को आ रहा हो, उसकी सरकारी छुट्टी किसी अन्य वार को कर देनी चाहिए, जिस वार को पहले से छुट्टी न हो। सरकार अपने सभी काम समझदारी से करती है, सुबह से शाम तक खूब काम करने वाले कर्मचारियों को मिलने वाली छुट्टियां ही उचित तरीके से नहीं करती।&nbsp; &nbsp;</div><div><br></div><div>कुछ छुट्टियों का दिन बदल दे तो वोट बैंक ही बढेगा। इस तरह सरकारी राजनीतिक पार्टी, काफी वोटें, आने वाले चुनाव के लिए अपने पक्ष में सुनिश्चित कर सकती है। छुट्टियों का खालिस मज़ा लेने के लिए सरकारी नौकरी में प्रवेश करने की कोशिश करते रहना बहुत ज़रूरी है।&nbsp; &nbsp; &nbsp;</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 23 Feb 2026 19:34:23 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/life-and-holidays</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[प्रशासनजी का हरकत में आना (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/administration-comes-into-action]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>प्रशासन हरकत में आ गया है । प्रशासन हरकत में आ जाए और कुछ ठोस न हो, ऐसा नहीं हो सकता। प्रशासन&nbsp; सचमुच हरकत में आ जाए तो बड़े बड़े हलकट भी हिल जाया करते हैं।&nbsp; हवा और पानी की बातें जब ठोस रूप लेने लगें तो नींद भी खुद ब खुद खुलने लगती है। प्रशासन एक बार हरकत में आ जाए, तो सबसे पहले लोकतान्त्रिक परम्परा के अनुसार, कड़क नियमों की परिधि में, अनुशासित नियम और शर्तों के विशेषज्ञों की कमेटी का गठन कर देता है। अच्छी&nbsp; तरह से गठित कमेटी बहुत ज़्यादा सख्ती से घटनाओं का निरीक्षण करती है। प्रकाशित रिपोर्टों में छपे तथ्यों को चश्मा लगाकर गंभीरता से बार बार देखती है। अब उजागर की गई, पहले भुला दी गई समस्याओं को विस्तार से पढ़ती है। प्रशासन के हरकत में आने की सभी प्रशंसा करते हैं सिवाए प्रशासन के ।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div>प्रशासन ऐसे ही हरकत में नहीं आता है। यह एक ऐतिहासिक घटना होती है। प्रशासन द्वारा संजीदा कमेटी का गठन करना भी एक ठोस घटना मानी जाती है । बहुस्तरीय तरह की, बड़े आधार वाली कमेटी एक दम से गठित नहीं हो जाया करती ।&nbsp; क्षेत्र&nbsp; के कर्मठ, ईमानदार, पारदर्शी, अनुशासित, मेहनती, उच्चस्तरीय, महंगी मनपसंद कुर्सी पर बैठकर उत्तरदायित्व निभाने वाले अधिकारी, शुद्ध विवेक से हरकत में आने का निर्णय लेते हैं तब कहीं जाकर कमेटी गठित की जाती है। कमेटी में हर किसी, छोटे मोटे व्यक्ति को शामिल नहीं किया जा सकता क्यूंकि यह एक पवित्र कार्य की तरह होता है।&nbsp; कमेटी ने ज़िम्मेदारी में गहरे डूबकर कार्य करना होता है इसलिए अतिनिष्ठा से कार्य करने वाले गोताखोर किस्म के चुनिंदा लोग शामिल किए जाते हैं।&nbsp; यही लोग तो ज़मीनी हकीकत को, जांच में शामिल करवा सकते हैं। क्षेत्र वासियों, हवा, पानी बारे महत्त्वपूर्ण राय दे सकते हैं ।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/migratory-birds-in-yamunaji" target="_blank">यमुनाजी में प्रवासी पक्षी (व्यंग्य)</a></h3><div>स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए, सभी के लिए भरपूर नींद लेना ज़रूरी बताया गया है। प्रशासन आम तौर पर इस नियम को ईमानदारी से फॉलो करता रहता है। प्रशासन के चारित्रिक गुण जैसे आम तौर पर उदास, निष्क्रिय रहना, सर्दी के मौसम में आंख मीच कर धूप सेंकना, इसमें काफी हाथ बंटाते हैं। प्रशासन को जगाने में बरसात जैसी कुदरती आपदा बेहद सक्रिय भूमिका अदा कर सकती है। निडर पत्रकारों के कारण भी कभी कभार ऐसा होता है, जो आंखे खोलकर सार्वजनिक मुद्दों के पीछे पड़े रहते हैं और तब तक प्रशासन को जगाए रखते हैं जब तक प्रशासन द्वारा हरकत में आकर उच्च स्तरीय कमेटी गठन की घोषणा नहीं होती। वह बात अलग है कि नई बनी कमेटी कब और कितना सोती है।</div><div><br></div><div>प्रशासन को शिकायत बिलकुल पसंद नहीं होती । जो लोग बार बार शिकायत करते हैं, ज्ञापन देते हैं, सोशल मीडिया को शिकायत मंच बनाते हैं उन्हें प्रशासन पसंद नहीं करता। शिकायत से पहले तो कार्रवाई&nbsp; का सवाल पैदा नहीं होता ।&nbsp; शिकायत के बाद प्रशासन नए अंदाज़ में पसर जाया करता&nbsp; है। आम लोग नहीं जानते कि शिकायत का निबटारा करना प्रशासन को बखूबी आता है।&nbsp; प्रशासन और उसके किसी भी विभाग द्वारा की गई, जांच में जारी की गई क्लीन चिट को, कोई नादान मैला करने की कोशिश करे या पुन जांच की मांग करे तो भी प्रशासन को अच्छा नहीं लगता । इस तरह उसका, वास्तव में हरकत में आना असंभव सा हो जाता है और परेशानी आम लोगों को ही होती है।&nbsp;</div><div><br></div><div>हरकत में आया प्रशासन ज़िम्मेदारी भरा बयान जारी करता है कि तथ्यों की पुष्टि की जाएगी, हर हालत में, समस्या की जड़ तक पहुंचा जाएगा। सार्वजनिक मसलों का हल ढूंढना प्रशासन की प्राथमिकताओं में शामिल कर लिया गया है। प्रशासन जब हरकत में आ जाता है तो दिल करता है, प्रशासन की जगह प्रशासनजी कहना शुरू कर दूं । अब प्रशासनजी हरकत में आ गए हैं तो लगता है कुछ ठोस होने वाला है।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 21 Feb 2026 18:35:06 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/administration-comes-into-action</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[यमुनाजी में प्रवासी पक्षी (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/migratory-birds-in-yamunaji]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सर्दी के मौसम में विदेशी पक्षी दूर दूर से, हमारी झीलों और नदियों में कुछ समय के लिए रहने, प्रेम करने और प्रजनन जैसे महत्त्वपूर्ण काम के लिए आते हैं। इस बहाने वे विदेश भ्रमण का मज़ा भी लेते हैं। शायद हमारे देश के पक्षी भी विदेश जाते होंगे। उन्हें वहां का साफ़ सुथरा स्वच्छ पर्यावरण बहुत पसंद आता होगा। इधर हमारे जागरूक मीडिया की खबरें बताती हैं कि पिछले दिनों, कुछ विदेशी पक्षियों ने यमुनाजी में प्रवास करने से इनकार कर दिया। हमारे पारदर्शी ईमानदार, संजीदा गणना&nbsp; करने वाले ऐसा कह रहे हैं। उनके अनुसार आने वाले पक्षियों की संख्या पिछले साल से कम है। यमुनाजी का अर्थ पवित्र नदी यमुनाजी से है जिसे देश के करोड़ों लोगों में से कुछ को छोड़कर मां का दर्जा देते हैं। काफी लोग नहीं भी मानते होंगे लेकिन कई रास्तों से बहकर आती सूचनाएं बताती हैं कि यमुनाजी बहुत कूड़ा कचरा वाली हालत में हैं।&nbsp; दशकों की कोशिशें, गहरी योजनाएं और जी तोड़ राजनीतिक मेहनत यमुनाजी को बेहतर हालत में नहीं ला सकी। हो सकता है विदेशी पक्षी इस बात को समझ गए हों।&nbsp; &nbsp;</div><div><br></div><div>उनके कम आने का दोष, ग्लोबल क्लाइमेट चेंज को दे सकते हैं। बाईस किलोमीटर में फैली यमुनाजी के प्रदूषित होने का दूसरा कारण, प्रदूषण को मान सकते हैं क्यूंकि बार बार बताया यही जाता है कि लगभग दो दर्जन नाले यमुनाजी के पानी को घेरे रहते हैं। सुना है वहां कूड़ा कचरा भी विसर्जित किया जा रहा है।&nbsp; यह भी सुनने में आता रहता है कि विकासजी ने वहां भी विकास करने का राष्ट्रीय ठेका लिया हुआ है जो यमुनाजी को पसंद नहीं आता। लेकिन उसके बस में कुछ नहीं है, पानी में डूबी ज़मीन का निर्जीव टुकड़ा समझदार सक्रिय इंसानों का, बूंद जितना भी बिगाड़ नहीं सकता ।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/how-are-you-budgetji" target="_blank">बजटजी कैसे हैं (व्यंग्य)</a></h3><div>यह संभव हो सकता है कि कमबख्त कोहरे के कारण, पक्षियों की गणना उचित तरीके से न हो सकी हो। पक्षियों की गिनती करना मज़ाक नहीं है। पता नहीं यह सही है या गलत, कुछ पक्षियों के भी नखरे&nbsp; होते हैं। वे प्रदूषित पानी में ज़्यादा समय तक नहीं रह पाते। मनचाहा खाना मुश्किल से मिलता है। यमुनाजी के आसपास फैले कचरे में से खाने के लिए ढूंढना पड़ता है। विदेशी पक्षी हैं, स्थानीय इंसान तो नहीं हैं जो यमुनाजी के गंदगी भरे पानी में नहा लें। पक्षी इंसान की तरह तो हो नहीं सकता, वह भी इंसान की तरह व्यवहार करने लगेगा तो कुदरत के अनुशासन का क्या होगा।&nbsp; &nbsp;</div><div><br></div><div>हमें विदेशी पक्षियों से क्या लेना वे कम आएं या ज़्यादा।&nbsp; हम तो उनका शिकार भी नहीं कर सकते। हमारे पास तो स्थानीय पशुओं की देखभाल करने का समय नहीं है पक्षियों की बात कौन करे।&nbsp; हमारे पास दूसरे ज़रूरी सामाजिक काम हैं। वैसे भी देसी या विदेशी पक्षी, प्रकृति के बच्चे हैं। प्रकृति को ही सोचना विचारना चाहिए, ध्यान रखना चाहिए कि उनके बच्चों को कहां जाना चाहिए कहां नहीं । इंसान को कोई फर्क नहीं पड़ता क्यूंकि वह पक्षी नहीं है। वह तो यमुनाजी में क्रूज और झाग दोनों का मज़ा ले सकता है। हो सकता है भविष्य में पक्षियों को यहां का नया पर्यावरण लुभा ले और यह खबर छपे कि यमुनाजी में प्रवासी पक्षियों की संख्या बढ़ती जा रही है।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Sun, 15 Feb 2026 13:35:25 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/migratory-birds-in-yamunaji</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[बजटजी कैसे हैं (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/how-are-you-budgetji]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बजट, सरकार देश और जनता के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। कहते हैं ख़ास लोगों के कारण ही देश की पहचान बनती है, आमजन के कारण तो नहीं बनती। वह बात अलग है कि इनके टैक्स देने के कारण ही सरकारी आमदनी होती है लेकिन इन पर खर्च कम किया जाता है। दुनिया को दिखाने के लिए विकास दर ज़रूरी है इसलिए हर सरकार उस पर ध्यान देती है। बजट आने के बाद विपक्षी पार्टी का यह राजनीतिक कर्तव्य है कि बजट को समाज और देश के लिए हानिकारक बताए। मंत्रियों द्वारा बजट को आत्म निर्भर और विकसित राष्ट्र के संकल्प का आधार बताना होता है।&nbsp; विपक्ष द्वारा देश के वास्तविक संकटों पर ध्यान न देने वाला कहना होता है। कोई कहेगा इस बजट में रोज़गार या नौकरी नहीं, गरीबों और गांव में रहने वालों की समझ से परे है। मंत्री कहेंगे किसानों युवाओं पर केन्द्रित भविष्य का रास्ता है।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>विपक्षी दल की तेज़तर्रार मंत्री को यही कहना चाहिए था कि बजट दिशाहीन, दृष्टिहीन, कर्म हीन, जन विरोधी, महिला विरोधी, किसान विरोधी, शिक्षा विरोधी है। इसमें हमारे प्रदेश के लिए कुछ नहीं है। सरकार के खिलाफ न जा सकने वाले उद्योगपतियों ने नई दिशा, नया रास्ता, नया रोज़गार देने वाला, प्रतिस्पर्धा बढाने वाला, उत्पादन लागत घटाने वाला, पैसों की किल्लत दूर करने वाला और पुराने उद्योगों को बढ़ावा देने वाला बताया। एक ने कहा अमीरों की आय बढाने वाला है। कई बार कहते हैं पर्यटन को लगेंगे पंख, इस बार पढ़ा, पशुपालन और मत्स्य पालन को भी लगेंगे पंख। बुद्धिजीवी माने जाने वालों ने कहा, इस बार बजट में शायरी, कविता, साहित्यिक उदाहरण और महान संतों के विचारों को प्रवेश नहीं करने दिया। भला निवेश और विकास के सामने यह सब कैसे आते। वैसे भी दोनों अलग अलग हैं कैसे साथ में टिकते।&nbsp;&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/market-during-the-festival" target="_blank">त्यौहार में बाज़ार (व्यंग्य)</a></h3><div>बजट भविष्य के लिए चाहे जितना सकारात्मक हो लेकिन मध्यम वर्ग और वेतन भोगियों को आज ही राहत चाहिए। जिनके पास&nbsp; नौकरी नहीं उनके बारे कोई नहीं सोचता। किसी ने कहा बजट तो होना ही ऐसा चाहिए जिसमें अपने लिए कुछ तलाशो या समझने की कोशिश करो तो, न तो मिले और न ही समझ में आए। बजट के आने पर कई बार बाज़ार भी निराश हो जाता है। केंद्र और राज्य में अलग अलग पार्टी की सरकारों के, दो विरोधी नेताओं के बयान पढ़कर आम आदमी सोचता है मैंने बजट से क्या लेना है यह हैं न दोनों विशेषज्ञ। एक कहेगा काला दिन, दूसरा कहेगा क्रांतिकारी दिन। बजट में उस राज्य सरकार के लिए लड्डू कैसे हो सकते हैं जो विरोधी पार्टी की हो।&nbsp; एक कहेगा न हवाई सेवा का विस्तार, पर्यटन विकास पैकेज नहीं, झुनझुना थमाया है। दूसरा फरमाएगा, महिला सशक्तिकरण और हर वर्ग के लिए विकास का वायदा किया।</div><div>&nbsp; &nbsp;</div><div>आम व्यक्ति यही पूछता है कि उसकी बीमारी की दवा कितने रूपए सस्ती हुई। महिलाएं जानना चाहेंगी, उनका पसंदीदा बैग कितने में पड़ेगा। विदेशी यात्रा कितने प्रतिशत सस्ती हुई। स्मार्ट फोन कितने हज़ार में मिलेगा। बजट की बारीकियों से बजट बनाने वालों ने भी क्या लेना उसके लिए प्रभाव पैदा करने वाले प्रबुद्ध अर्थशास्त्री हैं न। हर सरकार का बजट उच्चकोटि का होता है। सरकारजी ने चुनाव भी जीतने होते हैं। बजट बहुत आदरणीय है आइए आज से बजट की जगह बजटजी कहना शुरू करें।</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 04 Feb 2026 09:33:24 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/how-are-you-budgetji</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[त्यौहार में बाज़ार (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/market-during-the-festival]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बाज़ार जोर से हंसता है, खूब अट्टहास करता है। लोहड़ी आयोजित हो चुकी, चीनी मांझे ने पतंगे और उड़ाने वाले काटे। अब होली आ रही है, खूब बिकेगा चीनी रंग। दिवाली पर भी तो उनकी लड़ियों ने खूब रोशनी की। उनसे सस्ता कौन बेच सकता है। अब तो हमने आदत डाल ली है, इस्तेमाल करो और फेंको। हमारे यहां तो इंसान को भी इस्तेमाल किया जा रहा है। त्योहार हो और उपहार न हो, हो नहीं सकता। कई दिन पहले ही शुरू हो जाते हैं। सभी महत्त्वपूर्ण कुर्सियों पर उपहार रखना ज़रूरी होता है ताकि गुस्ताखियां माफ़ होती रहें।&nbsp; बात किसी देश के खिलाफ भी हो तो क्या फर्क पड़ता है। सबसे सुन्दर और बिकाऊ चीजें तो वही बनाते हैं। वही तो बाज़ार में विराजकर सब को प्रेम की डोर में बांधती&nbsp; हैं। बाज़ार बसाने, जमाने और चलाने वाले, प्रेम और सद्भाव फैलाकर इंसानी इच्छाएं पूरी करने में खूब मदद करते हैं।</div><div>&nbsp;&nbsp;</div><div>बाज़ार में जैसा चाहो, ज़रूरत के कद के मुताबिक़ चीज़ हाज़िर है। एक दम भुगतान नहीं कर सकते तो सप्रेम किश्तें पेश हैं। कोई ब्याज नहीं। बाज़ार में त्यौहार पहुंच जाए तो विक्रेता आपसी सदभाव, त्याग, मुस्कुराना और प्रेम सिखाता है। कितने ही घरों में एक दूसरे का स्वागत करना सिखाता है। ऊपरवाले के पदचिन्हों पर चलकर उनकी शिक्षाओं को ग्रहण करने की प्रेरणा दी जाती है, लेकिन परम्परा और संस्कृति थोड़ा परेशान हो जाती है। हालांकि सोना तो क्या चांदी खरीदना भी, बिगड़ते पर्यावरण में बारिश न होने की तरह हो गया है। एक बार मिली ज़िंदगी की इच्छाओं को किश्तें लुभाने लगती हैं। इस बदले हुए वातावरण में जेब की नहीं, बड़े दिल के खुलेपन की चलती है। दिल की सुनने में तो हम माहिर हैं ही।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/anand-troubled-in-the-snow" target="_blank">बर्फ में परेशान आनंद (व्यंग्य)</a></h3><div>बाज़ार और विज्ञापन दोनों, हाथ में हाथ डालकर काफी हद तक नंगे और फूहड़ होकर, फ़िल्मी आइटम नंबर की तरह नाचते हैं। दिमाग में घुसकर उकसाते हैं। जो नागरिक सम्मानित उपभोक्ता बनने लायक है ऑनलाइन बिक्री ने उसे बनाकर रख दिया है। गांव की गलियों में भी, कहीं भी प्रयोग किए जाने वाले नए उत्पाद आकर्षक ऑफर्स के साथ नृत्य कर रहे हैं। स्मार्ट फोन ही नहीं, दर्जनों स्मार्ट चीज़ों ने हर आंख, हाथ, शरीर, दिल और दिमाग में स्मार्टनेस भर दी है।&nbsp; फैशन, प्रवृति, नक़ल, जलन, प्रतिस्पर्धा, स्वाद और स्वतंत्रता का प्रकाश हर घर में पहुंच जाता है तो बाज़ार फिर ठहाका लगाकर हंसता है।&nbsp; उसकी यह हंसी बहुत से ग्राहकों को समझ नहीं भी आती।</div><div><br></div><div>धनतेरस, मनतेरस और तनतेरस आकर्षक कपडे पहने, खूबसूरत प्रेरणा की तरह आती और लुभाती हैं। भारतीय चिकित्सा परम्परा के जनक से सम्बद्ध होने के कारण, बाज़ार ने इसे लपककर सिर्फ धन से जोड़ दिया है जिसका मतलब ग्राहक बन पुण्य प्राप्त करना है। ग्राहक इस सन्देश को समझ गया है। चिकित्सा और स्वास्थ्य तो कब से बाज़ार की गोद में बैठे हैं। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं कि अस्पताल में गर्भवती महिलाओं के बैठने के लिए बेंच तक नहीं। बाज़ार को तो परम्परा, सभ्यता, संस्कृति, व्यव्हार और मानवीय मूल्यों का चटपटा अचार डालने से मतलब है। बाज़ार कारीगर है। उसे उत्सवधर्मिता, धार्मिक भावनाओं का स्वादिष्ट कचूमर बनाकर बेचना भी खूब आता है। जैसे त्योहारों की सदभावना को कोई हरा नहीं सकता, बाज़ार की दुर्भावनाओं से कोई जीत नहीं सकता।</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 31 Jan 2026 19:45:01 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/market-during-the-festival</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[बर्फ में परेशान आनंद (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/anand-troubled-in-the-snow]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बर्फ ऐसी सुन्दर सजीली प्रेमिका है जो इंसान को खूब इंतज़ार करवाती है। बर्फ को प्रकृति का वरदान भी माना जाता है जिसे प्राप्त करने के लिए पूजा, पाठ, हवन यज्ञ भी किए जाते हैं लेकिन उससे पहले राजनीतिक और सामाजिक स्वार्थ पूरे करने के लिए लाखों वृक्ष फना किए जाते हैं तभी तो लोकप्रिय नेताओं की आहुतियों के वावजूद बर्फ नहीं पड़ती। सरकार का मौसम विभाग अनुमान छपवाता है कि क्रिसमस पर नहीं पड़ी तो नए वर्ष पर&nbsp; पड़ सकती है। उपरवाले के यहां क्रिसमस, नया साल या मकर संक्रांति जैसे दुनियावालों के बनाए हुए पर्व नहीं होते। वहां तो जिन ऊंचे पहाड़ों पर कुदरती नमी और ठंडक का संतुलन बन जाए, वहीँ बर्फ के फाहे आसमान से उतरने शुरू हो जाते हैं ।&nbsp;</div><div><br></div><div>बर्फ जब इठलाते हुए जब धरती पर उतरती है तो कुदरत की वाह वाह शुरू हो जाती है लेकिन&nbsp; खूबसूरत प्रेमिका की तरह परेशान करना भी शुरू कर देती है। बर्फबारी के बाद छपी अखबार की ख़बरों के शीर्षक से लगता है बर्फ वरदान नहीं है, ज़बरदस्ती दिया हुआ दान है जिससे परेशानियां हो रही हैं। पढ़िए, बर्फ ने मचा दिया कोहराम, बर्फ न हुई विलेन हो गई। बर्फबारी के बीच फंसे पर्यटक, पहली बार आए थे, हाइवे छतीस घंटे से बंद। भूखे प्यासे पर्यटकों ने वाहनों में काटी रात। वाहनों को पुलिस ने निकाला। सड़कें साफ़ नहीं कर पाएंगे तो ऐसा ही होगा। बर्फ जमने से गाड़ियां फिसल रही।&nbsp; बर्फ पर फिसलन के कारण गाड़ी पीछे सरकने लगी, गिरते हुए पेड़ से टकराई। इसमें बर्फ की गलती है, उसे ऐसा होना चाहिए जम जाए पर फिसलन न हो। बर्फबारी के बीच पैदल चलकर शादी संपन्न करनी पडी, बर्फबारी न होती तो आराम से होती।&nbsp; सरकारी अफसर को बारह किलोमीटर बर्फ में पैदल चलना पड़ा, बर्फ न गिरती तो अपनी सरकारी कार में आते।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/government-officer-cook" target="_blank">सरकारी अफसर का कुक (व्यंग्य)</a></h3><div>ठंड से कांपा प्रदेश। खौफ़नाक मंज़र। भारी बारिश, तूफ़ान, बर्फ गिरने से क्षेत्र की दो सौ अडतीस सड़कें बंद हो गई।&nbsp; पांच हज़ार सात सौ पचहत्तर ट्रांसफार्मर ठप। बत्तीस घंटे का बलैक आउट। मंत्रीजी उदघाटन करने नहीं आ सके। उनकी कई साल की मेहनत पर बर्फ ने पानी फेर दिया। खंबे तोड़े, बिजली बंद, इंटरनेट बंद, आम जन परेशान।&nbsp; इंटरनेट ऐसा होना चाहिए जो किसी भी स्थिति में चलता रहे। उदघाटन ऑनलाइन हो सकता है। सड़कें दरुस्त करने के लिए जेसीबी मंगवाई, कई खराब, कम चालक, पेट्रोल पम्प दूर। सरकारी अफसर का महत्तवपूर्ण बयान, वर्षा एवं बर्फबारी के दृष्टिगत सभी स्तरों पर, समुचित प्रबंध किए जा चुके हैं। लेकिन प्रशासन बर्फ में ध्वस्त यानी बर्फ न गिरती तो प्रशासन एक बार फिर ध्वस्त होने से बच जाता।</div><div><br></div><div>जिन स्थानों पर बर्फ नहीं पड़ती वीडियो बनाने वालों ने वहां पर गिरती बर्फ के नकली फोटो और वीडियो पोस्ट किए और पर्यटकों को गुमराह किया। उन बेचारों के बस में इतना ही था। हां, बर्फ पड़ने से कारोबारियों के चेहरे खिल उठे। उन्होंने कमरों के मनमाने दाम वसूले, गर्म पानी की बाल्टी महंगी बेची। टैक्सी चालकों ने मौके का फायदा उठकर कुछ किलोमीटर के हज़ारों बनाए।&nbsp; बदइंतजामी की ज़िम्मेदारी की काली बर्फ, सरकारी विभागों ने एक दूसरे पर लगातार फेंकी। प्रशासन आने वाली तारीखें छापकर बता रहा है कि बर्फ गिरने की संभावना है, ऐसा लगता है खबरदार रहें, संभावना नहीं आशंका है।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 30 Jan 2026 19:26:47 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/anand-troubled-in-the-snow</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[सरकारी अफसर का कुक (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/government-officer-cook]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>एक बार मिली ज़िंदगी में भी इंसान काफी कुछ कर सकता है। नेता बन सकता है। सरकारी ठेकेदार भी बन सकता है। लेकिन बहुत और बड़ी कोशिशों के बिना सरकारी अफसर नहीं बन सकता। बहुत मेहनत का काम है सरकारी अफसर बनना और वो भी ऊंची कुर्सी वाला। खूब पढ़ना पड़ता है। एक बार मेहनत कर अफसर बन जाओ और मिल मिलाकर पोस्टिंग का जुगाड़ हो जाए तो ज़िंदगी वाह वाह करने लगती है। लोगों का नजरिया बदल जाता है जी। विशेषकर सुन्दर अविवाहित लड़कियों और उनके अभिभावकों का। वैसे तो आजकल लड़कियां अपना कैरियर बनाने में लगी रहती हैं, खाना पकाना सीखना तो छोड़ो, खाना खाने की सुध नहीं रहती।&nbsp;</div><div><br></div><div>जीवन में खाना बहुत ज़रूरी है। कुछ सरकारी अफसरों को कुक भी दिया जाता है। बताया जाता है कि कुक एक व्यावसायिक बंदा होता है जिसे पता होता है कि कौन सी सब्जी कैसे काटी और पकाई जाती है। साहब और साहिबा का मूड संतुलित रखने के लिए क्या पकाया जाना चाहिए। उसे कुछ भी पकाने में अपना सिर और अनुभव खपाना आता है। आजकल की गृहणियों की तरह नहीं जिनके लिए खाना पकाना सीखने के लिए दर्जनों चैनल हैं और हजारों वीडियो लेकिन उन्हें समझ नहीं आता कि शाम को क्या पकाएं। महिलाओं की आपसी बातों में ख़ास विषय होता है यार समझ नहीं आ रहा कि शाम को क्या पकाएं। आजकल तो कुछ मिनट में खाना हाज़िर करवा दिया जाता है क्यूंकि अब वह ज़माना अब जा चुका जब खाना बनाना हर घर की महिलाओं को आता था वे पेट से होकर पुरूषों के दिल तक पहुंच जाती थी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/our-book-launch" target="_blank">हमारी किताब का विमोचन (व्यंग्य)</a></h3><div>इस सच को कई सरकारें समझती हैं, उन्हें पता है घर का खाना बढ़िया होता है। अफसरों को खाना तो अच्छा मिलना ही चाहिए इसलिए घर पर कुक भी सप्लाई किया जाता है। पत्नी की अफसरी भी खुश और बरकरार रहती है। अफसर तनाव रहित रहकर सरकार चलाने में उम्दा काम करते हैं लेकिन सभी को कुक नहीं मिलता तो पंगा होने लगता है। उनके यहां है तो हमारे यहां क्यूं नहीं। बस यहीं से जुगाड़ का पकना शुरू हो जाता है। छोटा अफसर बड़े को पटाता है और कुक रखने के लिए आउट सोर्सिंग शुरू हो सकती है। बेचारे सरकारी खजाने पर कुक&nbsp; भार भी बढ़ता जाता है। सरकारी अफसर क्या नहीं कर सकते, करते भी हैं, करवा भी सकते हैं। सालों साल कुक योजना पका सकते हैं। स्वादिष्ट शैली में सब पकाया और खाया जा रहा होता है लेकिन कहीं न कहीं से कमबख्त खुशबू लीक हो जाती है जो शिकायत करती है कि नियमों का मसाला प्रयोग नहीं किया गया।&nbsp;</div><div><br></div><div>भारी भरकम प्रशासन संभालने वालों को अच्छा खाना मिलना ही चाहिए। यह भी ज़रूरी तो नहीं कि उनकी पत्नी ही उनके लिए खाना बनाए। व्यावसायिक कुक बड़ा महत्त्वपूर्ण काम करता है। घर का खर्च बचाता है। सभी घर वालों के स्वाद का ख्याल रखता है। सब्जी खुद लाता है। वह एक विश्वसनीय व्यक्ति जो पूरे परिवार के लिए करता है, घरवाले एक दूसरे के लिए नहीं कर सकते। कुछ लोग नहीं चाहते कि सरकारी पारिवारिक काम सुचारु रूप से चले। वे चाहते हैं कि कुछ अफसरों को छोड़कर बाकी खुद ही खाना पकाएं या फिर..। सरकारी अफसर का कुक होना आसान नहीं।&nbsp;</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 24 Jan 2026 19:27:42 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/government-officer-cook</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[हमारी किताब का विमोचन (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/our-book-launch]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>जनवरी के महीने में भी कई प्रसिद्ध पर्यटक स्थलों पर बर्फ नहीं पड़ी। इस बात का मुझे ज़्यादा ग़म नहीं मुझे तो इस बात की ज़्यादा खुशी है कि मुश्किल से आई मेरी किताब, पुस्तकों के मेले में एक दिन में एक बार नहीं तीन चार बार विमोचित हो रही है। बहुत आनंद आ रहा है । छोटे शहर में रहने वालों को, बढ़िया लोकार्पण की दिक्कत हमेशा रहती है। किताब का विमोचन तो यादगार अवसर होता है, तरीके से होना चाहिए। यह भी क्या विमोचन हुआ कि छुटभैया नेता आए हुए थे, लेखक गया उनके हाथ में किताब पकड़ाई और निबटा दिया । पहले तो किताब लिखना मुश्किल है,&nbsp; लिख लो तो सम्पादन करना फिर छपवाना मुश्किल और हां, लिखने और छपने से पहले तो पढ़ना भी पड़ता है जो सबसे मुश्किल है। खैर, अब यह सुविधा तो हो गई कि छपवा लो और विमोचन करने वालों की कमी नहीं।&nbsp;</div><div><br></div><div>किसी सही शुभचिंतक ने बेमिसाल राय दी कि जो कुछ यानी कविता, कहानी, लेख और टिप्पणियां लिखी हुई हैं सब को इक्कठा कर संग्रह छपवा देंगे। उन्होंने खुद ही प्रकाशक से बात की और पुस्तक छप गई। उन्होंने ही बताया कि सौ किताबें लिखकर और छपवाकर, समाज का भला करने वाले लेखक से प्रेरणा लेकर, एक किताब के आधा दर्जन विमोचन तो करवा ही सकते हैं। हमने तो अपने भले और प्रसिद्धि के लिए करना है। कुछ ऐसे भी होंगे जो सोचते रह गए होंगे। अपनी किताब का तो सब संपन्न हो गया। इस उपलक्ष्य में बहुत ज्यादा बिकने वाले भटूरे छोले भी खाए तो पता चला भटूरे छोले भी इतिहास रचने में स्वादिष्ट भूमिका निभाते हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/government-and-opposition" target="_blank">सरकार और विपक्ष (व्यंग्य)</a></h3><div>विमोचन बारे सुझाव देने वाले कहते हैं कि पुस्तक के पहले संस्करण का या एक संस्करण का एक बार ही विमोचन होना चाहिए, नैतिकता भी यही चाहती है। विमोचन बार बार हो तो अच्छा ही लगता है। हमारे पैसों से खरीदी बर्फी या गुलाब जामुन से हो रहा है तो किसी की नैतिकता को ठंड क्यूं लग रही। यह कोई संवैधानिक मामला तो है नहीं कि तर्क ढूंढा जाए। हमारे शुभ चिन्तक और लोकार्पण करने वाले सहर्ष तैयार हैं तो ग्यारह क्या&nbsp; इक्कीस बार भी करवा सकते हैं। एक दो बार तो बिना मुंह मीठा करवाए ही हो गया क्यूंकि दो मुख्य अतिथि ऐसे मिले जो निजी&nbsp; चीनी की मिठास से कड़वाहट में थे ।&nbsp;</div><div><br></div><div>हमने नकली बुद्धि से असली सहयोग लिया, पत्नी की पुरानी फोटो नए अवतरण में किताब के कवर पर लगा दी, जिससे घर के कोने कोने में खुशी का कालीन बिछ गया। आशा बंधी कुछ किताबें अपनी सखियों को ज़रूर देंगी,&nbsp; जिसमें से शर्म के मारे दो चार भुगतान भी कर देंगी। इस तरह दूसरे भी प्रेरित होंगे, क्यूंकि यह भी छपता रहता है कि किताब खरीदकर पढनी चाहिए। कई लेखक मेले में जा नहीं पाते लेकिन विमोचन तो हो ही जाता है।&nbsp; हम तो किताब के बहाने वहां गए भी और विमोचन भी कई बार हो गया । ज़िंदगी में पहली बार साहित्यकारों का मेला और रेला दोनों देखे। विशाल आकर्षक कट आउट्स, लाईटें, कलात्मक अंदाज़ में सजाई किताबें, इतनी शानदार जगह पर मुझ जैसे सामान्य व्यक्ति की किताब का विमोचन हुआ।&nbsp; सच मानिए अगले साल तक दूसरी किताब लिख देने और उसका विमोचन ज़्यादा विशाल स्तर पर करवाने की प्रेरणा मिल गई। एक साल बीतने में क्या देर लगती है।&nbsp; &nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 20 Jan 2026 19:31:12 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/our-book-launch</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[सरकार और विपक्ष (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/government-and-opposition]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अपनी पार्टी की सरकार दोबारा न बने तो पक्ष के नेताओं को विपक्ष में बैठना पड़ता है। उनका तो वर्ग ही बदल कर&nbsp; शासक वर्ग से विपक्ष वर्ग हो जाता है। पता नहीं होता, पांच साल के बाद दोबारा पॉवर में आएंगे या नहीं इसलिए विपक्ष के नेताओं को राजनीतिक बीमारियां होती रहती हैं। कई नेताओं को कुछ दिन तक चक्कर आते रहते हैं, कई महीने तक गुस्सा आता रहता है कि हमारी सरकार कैसे चली गई।&nbsp; फिर जब एहसास हो जाता&nbsp; है कि अब हमारी सरकार नहीं है तो असली दुःख होने लगता है ।</div><div><br></div><div>विपक्ष वालों को पांच साल का शासन कम लगता है।&nbsp; कुछ नेताओं को लगता है कि एक मुश्त दस साल तक राज करने को मिलता तो वह अपनी और अपनी पार्टी की निजी कल्याण, पारिवारिक कल्याण, पार्टी कल्याण, राज्य कल्याण और&nbsp; लोक कल्याण योजनाओं को अच्छे से लागू कर पाते। नेता, अफसर और ठेकेदारों की तिकड़ी अपने ज़रूरी प्रोजेक्ट पूरे कर पाती । कोई नाली, गली, सड़क, पार्क, पुल, सुरंग वगैरा अधूरा न छोड़ते।&nbsp; इससे समाज के साथ उन तीनों का फायदा होता लेकिन&nbsp; सिस्टम ही ऐसा है कि चुनाव पांच साल के बाद होते हैं। फिर&nbsp; ऐसे ऐसे लोगों से वोट मांगने जाना पड़ता है जिनकी शक्ल पसंद नहीं होती ।&nbsp; सभी की तारीफ़ करनी पड़ती है । हंसने, मुस्कुराने, सादा और सरल होने का दिखावा करना पड़ता है।&nbsp;&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/the-chair-was-placed-there-in-the-name-of-public-interest" target="_blank">जनहित के नाम पर रखी गई कुर्सी (व्यंग्य)</a></h3><div>अक्सर लोक लुभावनी स्थापित योजनाओं के कारण सरकार दोबारा चुन ली जाती है।&nbsp; मुख्यमंत्री भी वही पुराना घिसा पिटा नेता रहता है लेकिन कई बार राजनीतिक तिकड़म, जाति असंतुलन, क्षेत्र असंतुलन पटाने&nbsp; या अमुक तरह के सामंजस्य बिठाने के लिए नए चेहरे को बिना मेकअप के मुखिया बनाना पड़ता है। राजनीतिक घोड़ों का पारम्परिक व्यवसाय पुन जान पकड़ते पकड़ते रह जाता है लेकिन सिर्फ अपनी पार्टी की सरकार बनाने के लिए घोड़ों का व्यापार कई बार राजनीतिक बाज़ार की शान हो जाता है। चाहे चार छ दिन के लिए राजनीतिक स्टॉक एक्सचेंज दसवें आसमान को छूता है।&nbsp; &nbsp;</div><div><br></div><div>इस दौरान नए अंदाज़ दिखते हैं। राजनीति नए शब्द पकाती है। दिलचस्प आकर्षक जुमले उगते हैं। ठहाके लगते हैं। हैरानी मचती है, फिर कुछ दिन बाद सब शांत हो जाता है। सरकार चल रही होती है।&nbsp; बीच बीच में विपक्ष के नेता कहते रहते हैं वर्तमान सरकार की नीतियों की वजह से विकास तीस साल पीछे चला गया है।&nbsp; सरकार की कई तरकीबें साज़िश की तरह हैं।&nbsp; बड़ी लकीर नहीं खींच सकते तो हमारी खींची हुई लकीरों को छोटा न करें।&nbsp; इन लोगों ने वितीय स्थिति को वेंटीलेटर तक पहुंचाने में कोई कमी नहीं रखी । कर्मचारियों को धोखा दिया जा रहा है।&nbsp; सरकार हर मोर्चे पर फिसड्डी है।&nbsp; जन सरोकारों के प्रति असंवेदनशील है।&nbsp; अपने ही जुमलों के पीछे छिपती है। कर्ज लेकर काम चला रही है।&nbsp; खर्चों पर लगाम नहीं लगा पा रही।&nbsp; सरकार फर्जी आंकड़े पेश करती है।&nbsp; इनके शासन में समान काम समान वेतन सपना है।&nbsp; न्यायालय के फैसलों पर अमल नहीं करती।&nbsp;</div><div><br></div><div>सरकार के खिलाफ आंदोलन करने वालों, जुलूस निकालने वालों का साथ देने के लिए विपक्ष हमेशा तैयार रहता है।&nbsp; उन्हें उग्र आंदोलन, आर पार की कड़ाई के लिए उकसाता है। विपक्ष के नेता मानते हैं कि उनकी सरकार होती तो बेहतर काम करती लेकिन उन्हें सरकार बनाने के लिए चुनाव का इंतज़ार करना पड़ता है ।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 17 Jan 2026 19:30:49 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/government-and-opposition</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[जनहित के नाम पर रखी गई कुर्सी (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/the-chair-was-placed-there-in-the-name-of-public-interest]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बृजमोहन लाल की कुर्सी बहुत पुरानी थी। इतनी पुरानी कि उस पर बैठते ही आदमी इतिहास में चला जाता था। कुर्सी जानती थी कि उस पर कौन क्यों बैठा है। बृजमोहन लाल कहते थे—“मैं जनहित में बैठा हूँ।”</div><div><br></div><div>जनहित को कभी बैठने का मौका नहीं मिला।</div><div><br></div><div>वे जब भी उठते, कुर्सी को देखकर कहते—“बस पाँच मिनट।”</div><div><br></div><div>पाँच मिनट वर्षों में बदल जाते। कुर्सी उनके शरीर की तरह थी—अगर अलग कर दी जाए तो पहचान खत्म हो जाए। लोग उन्हें आदमी नहीं, पद के नाम से जानते थे।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/new-year-2026-resolutions" target="_blank">नए साल में संकल्प (व्यंग्य)</a></h3><div>एक दिन सरकार ने आदेश निकाला—</div><div><br></div><div>“अब कुर्सियाँ बदली जाएँगी।”</div><div><br></div><div>बृजमोहन लाल परेशान हो गए। उन्होंने जनहित का हवाला दिया। बोले—</div><div><br></div><div>“अचानक बदलाव से व्यवस्था चरमरा जाएगी।”</div><div><br></div><div>व्यवस्था ने सिर हिलाया—वह पहले से चरमराई हुई थी।</div><div><br></div><div>बृजमोहन लाल ने तुरंत एक जनहित याचिका दायर की—</div><div><br></div><div>“जनहित बनाम कुर्सी परिवर्तन”</div><div><br></div><div>अदालत गंभीर हो गई। मामला बड़ा था। कुर्सी बीच में थी।</div><div><br></div><div>सुनवाई के दौरान बृजमोहन लाल बोले—</div><div><br></div><div>“मैं इस कुर्सी पर नहीं, इस कुर्सी के लिए बैठा हूँ।”</div><div><br></div><div>कुर्सी भावुक हो गई।</div><div><br></div><div>जनता भ्रमित।</div><div><br></div><div>मीडिया ने हेडलाइन चलाई—</div><div><br></div><div>“ईमानदार अफ़सर का संघर्ष”</div><div><br></div><div>संघर्ष किससे था, यह स्पष्ट नहीं किया गया।</div><div><br></div><div>कुछ महीने बीत गए। आदेश ठंडे बस्ते में चला गया।</div><div><br></div><div>बृजमोहन लाल की कुर्सी और चमकने लगी। अब उस पर गद्दी लग गई थी—जनहित की।</div><div><br></div><div>एक दिन अचानक बृजमोहन लाल रिटायर हो गए।</div><div><br></div><div>कुर्सी खाली रह गई—पहली बार।</div><div><br></div><div>कमरे में सन्नाटा था।</div><div><br></div><div>नया आदमी आया।</div><div><br></div><div>वह भी कुर्सी पर बैठा।</div><div><br></div><div>कुर्सी मुस्कुराई।</div><div><br></div><div>क्योंकि जनहित कभी कुर्सी पर नहीं बैठता—</div><div><br></div><div>वह सिर्फ़ बैठाया जाता है।</div><div><br></div><div>- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’,</div><div>(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 06 Jan 2026 13:11:10 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/the-chair-was-placed-there-in-the-name-of-public-interest</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[नए साल में संकल्प (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/new-year-2026-resolutions]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हमारे पास अभी काफी समय बाकी है। नए साल के लिए ज़रूरी संकल्प लेने में कई घंटे बाक़ी हैं। संकल्प लेने में दो चार मिनट ही लगते हैं और यह भी ज़रूरी नहीं कि संकल्प नया साल शुरू होने से पहले यानी इक्कतीस दिसंबर की रात बारह बजे से पहले लेना ही है। नए साल की पन्द्रह जनवरी तक ले सकते हैं मनचाहा संकल्प। हम तो लेट लतीफ़ हैं। क्या फर्क पड़ता है अगर दो चार दिन या सप्ताह देर हो गई। सब कहते हैं कि संकल्प ऐसा लेना चाहिए जो टूटे नहीं लेकिन लचीले वक़्त की नजाकत को देखते हुए, ऐसा संकल्प लेना चाहिए जो टूट सके, तोडा मरोड़ा जा सके।&nbsp;</div><div><br></div><div>नए साल के लक्ष्य ज़रूरी नहीं कि हमारे विचार या शौक से सम्बद्ध हो या जिन्हें पूरा करना आसान हो। संकल्प अपने लिए तो होता नहीं, फेसबुक पर डालने या दूसरों को दिखाने, जताने और जलाने के लिए होता है। संकल्प हमेशा घुमा फिर कर लेना चाहिए, मन ही मन सोचें वक़्त मिला तो कर लेंगे। महीने में सिर्फ एक बार करेंगे। सिर्फ रात को करेंगे या फिर जब संसार सो रहा होगा तब करेंगे। सोते हुए करेंगे।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/the-words-of-great-people" target="_blank">बड़े लोगों की बातें (व्यंग्य)</a></h3><div>संभावित लक्ष्य के प्रति ज़्यादा संजीदगी दिखाने की ज़रूरत नहीं। ऐसा करने से ज़िंदगी के दूसरे काम छूट जाते हैं। संकल्प समाज के लिए लेने चाहिए। उससे अन्य लोगों का जुड़ना आसान हो जाता है। संकल्प कभी एक नहीं लेना चाहिए, कम से कम छ तो लेने ही चाहिएं ताकि बाद में चुनकर एक रख लें और बाक़ी छोड़ सकें। बड़ा संकल्प लेने से सोच को भी फैलाव मिलता है। बड़ा सोचना अच्छा लगता है। लिया गया संकल्प पूरा हो सके इसके लिए एक समूह बना लें। अपने यार दोस्तों को साथ जोड़ें। सबसे पहले बैठक का स्थान निश्चित करें । बातचीत के दौरान खानपान का खर्च बारी बारी करें ताकि किसी एक को आर्थिक बोझ महसूस न हो। कोई यह कहे कि आपने बड़ा ज़बर्दस्त संकल्प लिया है तो वह संकल्प उसे उपहार में दे दें। इस बहाने नए साल के दौरान संकल्प संस्कृति को बढ़ावा मिलेगा। आपको भी अच्छा लगेगा कि कोई दूसरा आपका संकल्प पूरा करने को तैयार है। समय समय पर उन मित्र से जान सकते हैं कि उस संकल्प की प्रगति का क्या रहा।&nbsp;</div><div>&nbsp;&nbsp;</div><div>अगर संकल्प का आधार काफी बैठकों के बाद भी स्पष्ट नहीं हो रहा तो परेशान महसूस न करें। किसी और से माफी न मांग कर खुद से चुपचाप माफी मांग लें और दूसरा संकल्प ले लें। फिर से संकल्प लेकर मज़ा न आ रहा हो, रोज़मर्रा यानी निजी, पारिवारिक, व्यावसायिक, राजनीतिक, धार्मिक या आर्थिक कामों में रूकावट महसूस हो रही हो तो एक संकल्प मन ही मन लें कि पहले लिया गया संकल्प निरस्त करता हूं। अपने आप से कहें, एक संकल्प हमेशा के लिए लेता हूं कि ज़िंदगी भर कोई संकल्प नहीं लूंगा। ऐसा करने के बाद भी सार्वजनिक रूप से कहते रहें कि मैंने इस साल ख़ास संकल्प लिए हैं जो मैं सार्वजनिक रूप से बता नहीं सकता। समय आने पर उनका असर दिखेगा। इससे दूसरों को आपके संकल्पों बारे उत्सुकता बनी रहेगी । आपको भी अहसास होगा कि संकल्प लेने से कहीं अच्छा है संकल्प न लेना।</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 05 Jan 2026 11:46:54 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/new-year-2026-resolutions</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[बड़े लोगों की बातें (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/the-words-of-great-people]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हमारी प्यारी दुनिया में रहने वाले समझदार लोग, अजब अध्ययन और सर्वे करते और करवाते हैं। ऐसा लगता है सर्वे करने वाले हमारे राजनेताओं की तरह हर विषय के विशेषज्ञ होते हैं। इन्हें ख़ास तरह के सर्वे करने होते हैं क्यूंकि इन्हें ऐसे सर्वे करने ही आते हैं। ख़बरें देने वालों का भी ऐसा ही बढ़िया हाल है। ऐसी ऐसी खबरें परोसते हैं, लगता है किसी ख़ास रंग और ढंग के बर्तन में पकाते हैं। बर्तन अपनी ही किस्म के होते होंगे जिनमें दूसरी किस्म की ख़बरें पक नहीं सकती। वैसे सब्जी के मामले में नहीं दाल के मामले में ऐसा कहा जाता है कि दाल नहीं गलती। शायद भाप के दबाव का फर्क पड़ता होगा।&nbsp; दाल के पूर्वजों ने बर्तनों से वायदा किया होगा कि हमारा साथ हमेशा बना रहे। लोग हमारे बारे चर्चा करें, तारीफ़ करें और स्वाद का ज़िक्र हो। इसलिए ख़ास किस्म की दाल उसी ख़ास बर्तन में पकेगी और अच्छी तरह से गलकर स्वाद भी बनेगी। तारीफ़ होना तो उसकी किस्मत में है।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div>दुनियावालों ने ख़ास दुनिया वालों से अध्ययन करवाया और बताया कि इस भूख भरी दुनिया में भोजन से सम्बंधित जितना भी उत्सर्जन होता है, उसमें से सत्तर प्रतिशत के लिए सबसे अमीर लोगों में से, तीस प्रतिशत लोग ज़िम्मेदार हैं। दुनिया भर की दौलत भी तो कुछ प्रतिशत लोगों के पास है और ज्यादा उत्सर्जन भी वही कर रहे हैं। भोजन और प्रदूषण के आपसी संबंधों पर अध्ययन करने वाले यशस्वी विशेषज्ञ ऐसा बताते हैं कि अमीर लोग खाना बर्बाद कर रहे हैं इसलिए धरती ज़्यादा गर्म हो रही है। ज़्यादा पैसा भी क्या क्या गुस्ताखियां करवाता है। उन्होंने बहुत स्वादिष्ट समाधान बताए, जैसे रेड मीट का उत्पादन कम हो, सब्जी, मेवे और शाकाहार बढ़े। गाय और बकरियां ज्यादा न हों। अब कौन सा अमीर इन्हें खाएगा और कौन सा छोड़ देगा, कोई सर्वे करने वाला बता सकता है। बड़े लोगों की बातें ज़्यादा होती हैं।&nbsp;&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/healthy-childhood-campaign-for-the-wise" target="_blank">समझदारों का निरोगी बचपन अभियान (व्यंग्य)</a></h3><div>ज्यादा बड़े लोगों की बातों का आकार ज्यादा बड़ा होता है। मारे देश के बुद्धिमान लेखक राजनेता ने अमेरिका के सबसे बड़े आदमी से मुलाक़ात की तो बात भी होनी थी। सुना है उन्हें सहायक बुलाना पडा जो हमारे राजनेता की अंग्रेज़ी को अंग्रेज़ी में ट्रांसलेट कर उन्हें समझा सके। वैसे अमेरिका वाले जनाब अपने आप को ज़्यादा अंग्रेज़ समझते हैं। बात तो वही है जो एकदम पल्ले पड़ जाए या कभी पल्ले न पड़ सके। बड़े लोगों की बातें वास्तव में कितनी बड़ी होती हैं कह नहीं सकते। कुछ समय पहले प्रसिद्ध वरिष्ठ अभिनेता रजनीकांत, सादे सफ़ेद पारम्परिक कपड़ों में एक आध्यात्मिक&nbsp; यात्रा के दौरान अपने मित्रों के साथ सड़क किनारे पत्तल में खाते दिखे। कोई नखरा, अंदाज़ या दिखावा नहीं। क्या इस बात का अर्थ यह भी है कि आम आदमी चाहे थोड़ा सा ही सही, प्रसिद्ध होना चाहता है। उसके लिए काफी कुछ करता है। सुपर प्रसिद्ध होने के बाद इंसान, कभी कभी आम आदमी की तरह रहना चाहता है। ऐसे अवसर सृजन भी करता है लेकिन सभी ऐसा नहीं कर सकते।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>बड़े लोगों की बातों को समझना बड़ी बात है। आम आदमी तो यही कर सकता है कि स्वादिष्ट दाल और भात खाने जाए और सीमित शगुन में पूरे परिवार को असीमित खिला दे।</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 27 Dec 2025 18:39:18 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/the-words-of-great-people</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[समझदारों का निरोगी बचपन अभियान (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/healthy-childhood-campaign-for-the-wise]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>यह बात बहुत ज़्यादा तारीफ़ के काबिल है कि पिछले कई दशकों से, बेचारे बचपन को निरोगी रखने के संजीदा प्रयास निरंतर किए जाते रहे हैं। यह कार्य एक अभियान की तरह लिया जाता रहा है ठीक उसी तरह जैसे कुछ महीने के बच्चे, बड़े होते बच्चे, मोबाइल फोन को अपनाने के अभियान में लगे होते हैं। इस सन्दर्भ में उनके अभिभावक सरकारी योजनाओं की तरह, उनकी संजीदा मदद कर खुश हो रहे होते हैं। बचपन निरोगी अभियान के अंतर्गत महिलाओं को स्वस्थ रखने, बेहतर पोषित करने, उनके परिवार को सशक्त बनाने के लिए ईमानदार कोशिश की जाती है। वह बात अलग है कि सामान्य हस्पताल में, चिकित्सक के कमरे के बाहर लगी कतार में गर्भवती महिलाओं के बैठने के लिए स्टूल तक नहीं होता ।&nbsp;</div><div><br></div><div>स्वास्थ्य जैसे अस्वस्थ विषय पर बातचीत हमेशा होती रहती है। यह विषय पर्यावरण की तरह बहुत महत्त्वपूर्ण है। नियमित सेमीनार और शिविर होते हैं जिनमें प्रेरक भाषण होते हैं। सम्बंधित विभाग के कर्मचारियों को सघन प्रशिक्षण दिया जाता है। वह बात अलग है कि इस दौरान समझदार कर्मचारी अपने निजी, पारिवारिक, सामाजिक कार्य भी सम्पन्न कर लेते हैं। कई बार उन्हें आवश्यक राजनीतिक दायित्त्व निभाने के लिए, प्रशिक्षण अवधि से ही समय चुराना पड़ता है। इसका प्रशिक्षण उन्हें पहले से होता है। ज़िम्मेदार विभागों के सदभाव, सहयोग, समन्वय और जागरूकता की मिसालें कायम हैं। हमारे यशस्वी इतिहास का हिस्सा हैं। इतिहास साक्षी है कि समझदार लोग अपना कर्तव्य भली भांति निष्पादित करने का, त्रुटि रहित पक्का रिकार्ड तैयार रखते हैं। इसे तैयार करने के लिए माहिर लोग प्रयोग किए जाते हैं जो यह जानते हैं कि शिशु के संसार में आते ही उसकी स्वास्थ्य जंग शुरू हो जाती है। प्रसव के लिए आर्थिक स्थिति के अनुसार ही प्रबंध हो पाता है। परिस्थितियां ही उनकी देखभाल करती हैं। जीवन शैली के कारण ही हर आम या ख़ास महिला के शरीर में कोई न कोई कमी, परेशानी या बीमारी रहती है। शायद इस सब का असर बच्चे पर भी पड़ता होगा। इस दौरान समझदारों का निरोगी बचपन अभियान जारी रहता है। साफ़ सुथरे और स्वस्थ आंकड़ों का हलवा भी पकाया जा रहा होता है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/magnificent-lively-majestic-and-powerful" target="_blank">शानदार, जानदार, रोबदार और ज़ोरदार (व्यंग्य)</a></h3><div>दूसरे किस्म के माहिर लोग विज्ञापन तैयार कर रहे होते हैं। अभियान की योजनाएं बचपन पर आकर्षक, सुविधाजनक और लाभदायक रौशनी डालती है। जिनसे पता चलता है कि पैदा होने के बाद बच्चों के लिए उचित अंतराल पर लगने वाली वैक्सीन भी कतार में खड़ी होती हैं। उनसे यह भी पता चलता है कि कौन कौन सी बीमारी से बचाव होगा लेकिन यह तो भाग्य और आर्थिक परिस्थिति ही बताती है कि अमुक वैक्सीन किन किन नक्षत्रों में पैदा हुए शिशुओं को मिलने वाली है या किसी भी हालत में नहीं मिलने वाली है। उधर भूख और स्वास्थ्य की ज़रूरत, परेशान हालात में किसी अंधेरे कोने में पड़ी होती है जिसे वास्तव में नीति और राजनीति नहीं देखना चाहती।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div>हम यहां पर माताओं के कुपोषण बारे ज्यादा बात नहीं कर सकते क्यूंकि उनके लिए भी समझदार लोग हमेशा जागरूक रहते हैं। पुराने अभियान बेस्वाद होने पर नए अभियान स्वादिष्ट बना सकने की खिचड़ी पका रहे होते हैं।</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 26 Dec 2025 10:23:25 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/healthy-childhood-campaign-for-the-wise</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[शानदार, जानदार, रोबदार और ज़ोरदार (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/magnificent-lively-majestic-and-powerful]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हम बात करते हैं शानदार, जानदार, रोबदार और ज़ोरदार यानी भले काम करने वालों की मोहल्ले में एक अस्सी बरस के अंकल हैं। पिछले दिनों उन्होंने घोषणा की, कि उन्होंने राम और श्याम की बचपन से चल रही लड़ाई बंद करवा दी है लेकिन न राम ने माना न श्याम ने । अंकल ने इस बार ज़ोरदार अंग्रेज़ी में कहा कि उन्होंने राम और श्याम का सौ साल पुराना झगड़ा सेटल करा दिया है लेकिन वे दोनों लड़ते हुए उनके पास आए बोले, झूठ मत बोलो अंकल। अंकल ने कहा हमने सबसे ज़रूरी चीज़, यानी शुभ कामनाएं और खूब दुआएं प्रयोग की और तुम्हारी लड़ाई बंद कराई, अब लड़ने का नाटक मत करो।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>यह तो माना ही जाता है कि दुआएं काम करती हैं, ठीक वैसे, जैसे बददुआएं भी करती हैं। बंदा शानदार, जानदार, रोबदार और ज़ोरदार चाहिए, कोशिश कैसे सफल न होगी। अंकल ने मन ही मन सार्वजनिक मंच पर पूरा शरीर हिलाकर, ज़ोर से ठहाका लगाकर कहा, कोई नहीं मानेगा कि इनकी लड़ाई कभी मैंने बढ़वाई थी, दोनों को उकसाया, स्वचालित गालियां भिजवाई, स्थानीय डंडे पत्थर, ईंटों और पत्थरों का प्रयोग भी करवाया। हाथापाई भी करवाई। समझदार बंदे इसे मज़ाक ही समझेंगे। यह तो बचपन से ही एक दूसरे के साथ लड़ते थे, सब यही मानते हैं ।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/conference-of-the-honest" target="_blank">ईमानदारों का सम्मेलन (व्यंग्य)</a></h3><div>अब इतने सुगठित, सुलभ, सुसंस्कृत, अनुभवी और निडर विचारों के मालिक कह रहे हैं कि युद्ध बंद करवाया और लोग मज़ाक समझ रहे हैं। उच्च विचार, सुलझी हुई मानसिकता के लोग ऐसी बातों की कभी परवाह नहीं करते कि दूसरे लोग क्या कह रहे हैं।&nbsp; वे मस्त हाथी की तरह चलते रहते हैं, जो करना नहीं होता करते रहते हैं जो खाना होता है छीन कर खा लेते हैं।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>राम और श्याम वाली बात को अब काफी समय हो गया है तो अंकल ने कहना शुरू कर दिया है कि उन्होंने एक नहीं डेढ़ दर्जन छोटे बड़े मुहल्लों के नए और पुराने झगड़ों का समापन करवाया है लेकिन नासमझ लोग उनके नेक काम की तारीफ़ नहीं कर रहे। इतना बड़ा और महान काम करने की घोषणा हो रही है और लोगों को परवाह नहीं। सब अपने अपने फोन में, मन और तन पसंद यूटयूब, फेसबुक और इन्स्टाग्राम नामक बाथटब में पसरे हुए हैं। वहीँ से अपनी अपनी तारीफ़ हांक रहे हैं। कोई उनसे पूछे, क्या दूसरों की तारीफ़ करने और सुनने का ज़माना गुज़र गया।&nbsp; &nbsp;</div><div><br></div><div>अंकल की यशस्वी बात के मद्देनज़र, खुशहाल ज़िंदगी जीने का उचित फार्मूला यही है कि अपनी तारीफ़ आप करते रहो। इंतज़ार मत करो कि कोई और तारीफ़ करेगा। सब जानते हैं लड़ना, झगड़ना, युद्ध करना अच्छी बात तो नहीं है। लड़ाई झगड़ा रुकवाना, खत्म करवाना अच्छी बात है, मानवता की ओर सकारत्मक कदम है। ऐसा करने वाला व्यक्ति शांति का मसीहा हो सकता है। पता नहीं पुरस्कार देने वाले समझदार लोग, उचित चयन क्यूं नहीं करते। अब उनकी गलतियां सुधारने का समय आ गया है।&nbsp;</div><div><br></div><div>सबसे शानदार, जानदार, रोबदार और ज़ोरदार व्यक्ति तो अंकल ही हैं। उन्हें न चुनकर बहुत बड़ी गलती की गई है। अब गलती का सुधार करना होगा। यह मानना ही होगा कि वक़्त बहुत खराब चल रहा है। देखा देखी में अच्छे लोग भी बिगड़ते जा रहे हैं क्यूंकि कोई अच्छा काम करे उसकी तारीफ़ नहीं की जाती, सम्मान देना तो दूर की बात है। कोई बात नहीं, इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। अच्छा, नेक, मानवीय काम करने वाला व्यक्ति तो काम करता रहेगा क्यूंकि वो महान है। छोटी मोटी घटनाओं से महानता कम नहीं हुआ करती।</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 12 Dec 2025 15:08:27 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/magnificent-lively-majestic-and-powerful</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[ईमानदारों का सम्मेलन (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/conference-of-the-honest]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पहली बार जिला मुख्यालय में “ईमानदारों का राष्ट्रीय सम्मेलन” आयोजित हुआ। स्वागत द्वार पर बड़े अक्षरों में लिखा था—“सच्चाई ही हमारी पहचान है।” नीचे छोटा अक्षर में लिखा था—“प्रायोजक: यूनिवर्सल कंस्ट्रक्शन कंपनी (जिस पर सीबीआई की जांच जारी है)।” मुख्य अतिथि, माननीय मंत्री जी, जिन्होंने हाल ही में अपनी तीसरी पत्नी के नाम पर पाँच एकड़ ज़मीन रजिस्टर कराई थी, मंच पर पहुँचे तो तालियाँ गूँज उठीं। भीड़ में से किसी ने कहा—“यही सच्चे ईमानदार हैं, सब कुछ खुलेआम करते हैं!” मंत्री जी मुस्कुराए। उन्होंने भाषण में कहा—“देश को अब ईमानदारी की कमी नहीं, बस पहचानने की ताकत चाहिए।” भाषण समाप्त होते ही मंच संचालक ने घोषणा की—“अब ईमानदारी सम्मान समारोह होगा।” पुरस्कार स्वरूप मंत्री जी ने हर प्रतिनिधि को घड़ी भेंट की, जिस पर उनका चुनाव चिन्ह खुदा था। पत्रकारों ने पूछा—“घड़ी असली है या नकली?” आयोजक बोला—“घड़ी असली है, बस समय नकली बताती है।”</div><div><br></div><div>दूसरा सत्र ‘नैतिकता के नए मानदंड’ पर था। एक वक्ता, सरकारी बाबू, बोले—“पहले रिश्वत को अपराध माना जाता था, अब यह सहयोग शुल्क कहलाने लगी है। समाज विकासशील है, शब्दावली भी होनी चाहिए।” दूसरे वक्ता, प्राइवेट स्कूल के संचालक, बोले—“हम बच्चों में नैतिकता लाने के लिए जीना कठिन बना देते हैं। फिर जब बच्चा नियम तोड़ने लगे, तो वही असली नागरिक कहलाता है।” सभागार तालियों से गूंज उठा। तभी मंच के पीछे से आवाज़ आई—“कृपया चोरी गई कुर्सियाँ वापस करें।” प्रतिनिधि मुस्कुराए—“ईमानदारी का सम्मेलन है, कुर्सियाँ कहाँ जाएँगी?” कुछ देर बाद पाया गया कि दर्जनभर कुर्सियाँ पार्किंग में बिक्रय हेतु रखी थीं। आयोजक ने घोषणा की—“यह व्यवस्था शुल्क है।” बाबू जी बोले—“वाह, देश आगे बढ़ रहा है!”</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/advantages-of-plastic" target="_blank">फायदे का प्लास्टिक (व्यंग्य)</a></h3><div>तीसरे सत्र में “डिजिटल ईमानदारी” पर चर्चा हुई। एक युवा अफ़सर ने कहा—“अब सब ऑनलाइन है। भ्रष्टाचार भी पारदर्शी हो गया है। ट्रांजैक्शन सीधे खाते में आती है, दलालों की ज़रूरत नहीं रही। यह डिजिटल इंडिया की सफलता है।” एक और विद्वान बोले—“ईमानदारी अब ऐप में मिलती है, वेरिफाई करके डाउनलोड करनी पड़ती है।” तभी मंच के सामने एक गरीब व्यक्ति अपनी फ़ाइल लेकर आया—“बाबू जी, दो महीने से आवेदन लंबित है।” बाबू ने मुस्कुरा कर कहा—“भाई, यह ईमानदारी का सम्मेलन है, सुविधा केंद्र नहीं। यहाँ सिर्फ भाषणों की अनुमति है, काम की नहीं।” वह आदमी चुप हो गया, लेकिन पौधे के पास खड़ा एक बच्चा बोला—“अगर यह ईमानदार हैं, तो हमारे गाँव में झूठे कौन रहते हैं?” सभा मौन हो गई। पंखे की आवाज़ में ईमानदारी की झिल्ली सी फड़फड़ाने लगी।</div><div><br></div><div>सम्मेलन के अंत में अध्यक्षीय वक्तव्य हुआ। अध्यक्ष महोदय बोले—“हम सब अपने-अपने क्षेत्र के ईमानदार लोग हैं। मैं डॉक्टर के नाम पर दवा बेचता हूँ, शिक्षक नकली प्रमाणपत्र देता है, अफ़सर काम न करके फ़ाइल दबाता है, नेता जनता को भरोसा देता है—और यही राष्ट्रीय एकता का आधार है।” सभागार ठहाकों से भर गया। उन्होंने कहा—“अगले वर्ष हम ‘सच्चाई दिवस’ मनाएँगे, बशर्ते प्रायोजक मिल जाए।” बाहर निकलते हुए किसी ने पूछा—“क्या सम्मेलन सफल रहा?” आयोजक हँसा—“पूरा बजट खर्च हो गया, अब तो ईमानदारी साबित है!” रात को शहर लौटने वाले प्रतिनिधियों की बसें चलीं। सड़क किनारे एक ठेला वाला बैठा था, धीरे से बुदबुदाया—“साहब लोग ईमानदार हैं, इसलिए गरीब अब भी ज़िंदा है।” सड़क की बत्तियाँ झिलमिलाईं—शायद वे भी इस नई ईमानदारी पर मुस्कुरा रही थीं।</div><div><br></div><div>- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’,</div><div>(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 04 Dec 2025 11:46:20 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/conference-of-the-honest</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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