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    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
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      <title><![CDATA[गुरु का उचित न्याय (बाल कहानी)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/the-guru-just-verdict]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>यह उस समय की बात है जब पढाई में कमज़ोर विद्यार्थियों को उनके शिक्षक घर बुलाकर या विद्यालय में ही समय निकाल कर अलग से पढ़ाया करते थे। उन विद्यार्थियों से कोई टयूशन फीस भी नहीं ली जाती थी। उन दिनों स्कूल में बच्चों की पिटाई भी होती थी मगर माता पिता को कोई खबर नहीं दी जाती थी। किसी तरह बात अगर घर तक पहुंच भी जाती तो कितनी ही बार अभिभावक खुद स्कूल जाकर अध्यापक का धन्यवाद करते थे। गलती करने पर विद्यार्थियों को घर पर अलग से डांट पड़ती थी।&nbsp;</div><div><br></div><div>एक दिन की घटना है उस समय गणित का पीरियड चल रहा था, गुरूजी द्वारा कई बार समझाने और बार बार खुद कोशिश करने के बावजूद भी एक विद्यार्थी सवाल हल नहीं कर पा रहा था। इत्तफाक से उस दिन अध्यापक का मूड भी कुछ ठीक नहीं था, शायद इसलिए उन्हें उस विद्यार्थी पर गुस्सा आ गया। उनकी कक्षा खत्म होने के बाद आधी छुट्टी होनी थी जिसमें सभी ने मिल बैठकर खाना खाना था। गुरूजी ने यह फैसला लेते हुए कि उस विद्यार्थी की पिटाई करनी है क्लास मानीटर से कहा, ‘मानीटर जाओ एक डंडा लेकर आओ, आज मैं इसकी खबर लेता हूं’। मानीटर डंडा लेने कक्षा से बाहर गया और जल्दी से लकड़ी का छोटा सा कमज़ोर, पतला टुकड़ा ले आया और बोला, ‘लीजिए गुरूजी ’।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/planting-trees-is-an-art" target="_blank">पौधारोपण करना एक कला है (व्यंग्य)</a></h3><div>शिक्षक को लकड़ी का टुकड़ा देखते ही गुस्सा आ गया, ‘इससे कहीं सज़ा मिलती है, देखो मैं तुमको ही लगाता हूं’ यह कहते हुए उन्होंने वह डंडा मानीटर&nbsp; को ही लगा दिया और बोले, ‘जाओ जाकर दूसरा डंडा लेकर आओ'। मानीटर फिर भागा डंडा लेने के लिए, उसे थोड़ा समय लग गया और इस बार पुराने स्टूल की टूटी हुई टांग ले आया। उसे लगा इस बार बढ़िया डंडा लाने के लिए गुरूजी उसे शाबाशी देंगे लेकिन जैसे ही मोटी लकड़ी को अध्यापक ने हाथ में पकड़ा उनका गुस्सा बढ़ गया और मानीटर की टांग पर लगभग जोर से मारने का अभिनय करते हुए बोले, ‘मानीटर, क्या तुम इसके दुश्मन हो जो इतना मोटा डंडा लाए हो’। अब मानीटर घबरा गया उसे लगा अब पिटने की उसकी बारी है।&nbsp;</div><br><div>गुरूजी ने वह लकड़ी मेज़ पर रख दी और कुछ क्षणों के लिए मौन रहने के बाद बोले, ‘बच्चो, आपने देखा जब मानीटर पतला डंडा लाया तब भी उसे डांट पड़ी और जब ज्यादा मोटा लाया तब भी, मेरा आशय किसी विद्यार्थी को पीटना नहीं था बल्कि समझाना कि गलती करने वाले को उचित सज़ा मिले, न कम न ज्यादा’।&nbsp;</div><div><br></div><div>उन्होंने उस विद्यार्थी से कहा कि वह घर जाकर अभ्यास करे और यदि उसे फिर भी समझ न आए तो रोज़ाना पढने के लिए, छुट्टी के बाद उनके घर आ जाया करे। अध्यापक ने पूरी क्लास को संबोधित करते हुए कहा कि जिस बच्चे को भी गणित विषय में कुछ समझ न आ रहा हो वह भी आ सकता है। खाना खाने की छुट्टी की घंटी बज चुकी थी, वह बच्चा जिससे सवाल हल नहीं हो रहा था वह पिटाई से बच गया लेकिन उसे और पूरी कक्षा को शिक्षा मिली।</div><div><br></div><div>खाना खाते समय सब यही बात कर रहे थे कि यदि गुरूजी चाहते तो सज़ा दे सकते थे लेकिन उन्होंने बिना ऐसा किए मानीटर समेत सभी विद्यार्थियों को अच्छे से समझा दिया।&nbsp;</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 31 Jul 2026 12:02:19 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/the-guru-just-verdict</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[पौधारोपण करना एक कला है (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/planting-trees-is-an-art]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बरसात के मौसम में ऐसे कई पुराने वृक्ष जड़ समेत उखड़ जाते हैं जिन्हें काट देने बारे शहर के वरिष्ठ जन, सोशल और प्रिंट मीडिया, सख्त कार्रवाई करने वाले प्रशासन और समाज के हक में निर्णय लेने वाले शासकों से बार बार निवेदन कर चुके होते हैं। शुभ मुहर्त न निकलने के कारण इस छोटे से मसले पर कोई बड़ा फैसला नहीं हो पाता। फैसला ले सकने वाले आश्वस्त होते हैं कि किसी न किसी बरसात में बारिश और हवा सहयोग करेंगे और बिना स्वीकृति के वृक्षों का काम तमाम हो जाएगा। इस कुदरती निर्णय का यह फायदा होता है कि सभी सरकारी कर्मचारी और अधिकारी फालतू काम से बच जाते हैं। उनके पास साल भर करने के लिए दूसरे ज़रूरी काम भी तो होते हैं।</div><div><br></div><div>सबसे ज़रूरी काम तो पौधारोपण की तैयारी करना होता है। यह आसान काम नहीं है। क्षेत्र के राजनीतिक रूप को सर्वोपरि परखा जाता है। भौतिक स्वरूप और जलवायु ध्यान में रखना होता है। मिटटी, धूप, हवा के अध्ययन के साथ साथ पौधों के बीच उचित दूरी रखने बारे सोचना पड़ता है। सही माप के गड्ढे खोदकर, खाद वगैरा मंगाने की योजना बनती है। मुख्य अतिथि का चुनाव करना होता है जिसे वन संरक्षण और पर्यावरण प्रेम बारे ज्यादा पता हो न हो लेकिन वह समय पर पहुंच जाए । पौधा लाना फिर उसे उचित जगह लगाने के लिए नियमानुसार करना मुश्किल सा लगता है। पौधा लगाना फिर आसान लगता है बाद में देखभाल करना, पानी देना वगैरा तो मेहनत भरा परेशान करने वाला काम होता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/for-the-welfare-of-society" target="_blank">समाज के भले के लिए (व्यंग्य)</a></h3><div>आजकल ऐसी जगह चुनना सुरक्षित होता है जहां पहले से ही पेड़ लगे हों नए पौधे लगाने के लिए जगह न बची हो। फिर भी जगह बनाकर कुछ पौधे लगाने ही पड़ते हैं। काम ज़िम्मेदारी का है इसलिए समारोह भी रखना पड़ता है जिसका उद्घाटन कोई उच्चाधिकारी ही कर सकता है । विपक्षी पार्टी द्वारा भी पौधा लगाने की परम्परा है लेकिन शासक और विपक्षी, दोनों पार्टियां एक समारोह में साथ साथ नहीं उपस्थित नहीं हो सकती । राष्ट्रीय परम्परा ही ऐसी है। सामाजिक संस्थाएं भी हर साल पौधारोपण करती हैं ताकि उनका एक प्रोजेक्ट संपन्न हो जाए।&nbsp;&nbsp;</div><br><div>उच्च सरकारी अधिकारी ने हुक्म जारी किया कि उस दिन ऐसी पोशाक पहनी जानी चाहिए जिससे हमारे प्रकृति प्रेम का सामाजिक प्रसार हो और दूसरों को भी प्रेरणा मिले। उन्होंने बाज़ार से अपने कर कमलों में पहनने के लिए हरे रंग के बढ़िया दस्ताने, हरे रंग की टी शर्ट और हरे रंग की कैप भी खरीदी। सफ़ेद नेकर और सफ़ेद जूते उनके पास पहले से थे। स्वाभाविक है जिन अन्य लोगों ने समारोह में आना ही था उन्होंने भी हृदय से उनका अनुकरण किया । सम्बंधित खर्चों का भुगतान जहां जहां से संभव हो सकना था शालीनता से हो गया।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>जिस दिन लगभग डेढ़ दर्जन लोगों ने पौधारोपण समारोह में भाग लिया उस दिन मौसम हलके बादलों वाला रहा। बारिश बिलकुल नहीं हुई। ऐसा मौसम फोटो खींचने के लिए उत्तम बताया जाता है। शायद इसलिए सभी के चित्र उच्चकोटि के आए। फेसबुक, व्ह्ट्सएप, इंस्टाग्राम जैसे बागों में भी पौधारोपण हो गया। समारोह का नाम पौधारोपण समारोह रहा लेकिन लगाए गए वृक्ष क्यूंकि वह आसान था । एक बार तो ऐसा लगा कि पौधारोपण भी एक कला है।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 30 Jul 2026 19:22:07 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/planting-trees-is-an-art</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[आनंद कौशल की 'हमनशीं'- दिल से निकली ग़ज़लें, इंसानी जज़्बातों का सजीव आईना]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/anand-kaushal-hamnasheen-ghazals-born-of-the-heart-a-vivid-reflection-of-human-emotions]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हमनशीं आनंद कौशल का पहला ग़ज़ल एवं शायरी संग्रह है। इसे पढ़कर पाठकों को सबसे अच्छी बात यह लगेगी कि इसमें ज़्यादातर ग़ज़ल और शायरी सीधे दिल से निकले हुए लगते हैं। भाषा बिल्कुल आसान है, इसलिए हर ग़ज़ल को आसानी से समझ सकते है। कहीं भी शब्दों में बनावटीपन नहीं दिखता, बल्कि ऐसा महसूस होता है कि शायर ने हर पढ़ने वालों के जीवन के एहसासों को ही शब्दों में ढाल दिया है।</div><div><br></div><div>किताब में मोहब्बत, जुदाई, याद, दर्द और रिश्तों की भावनाओं को बहुत सादगी से लिखा गया है। कई ग़ज़ल ऐसी हैं जो पढ़ते ही मन में उतर जाती हैं और देर तक याद रहती हैं। यह सिर्फ ग़ज़ल की किताब नहीं, बल्कि इंसानी जज़्बातों का एक खूबसूरत आईना है। शायरी तो ऐसे हैं कि हर महबूब को आशिक और आशिक को महबूब का दीदार करा दे।</div><div><br></div><div>हमनशीं में प्रस्तुत ग़ज़लें संवेदनशील मन, सच्ची मोहब्बत और गहरे मानवीय अनुभवों की बेहतरीन अभिव्यक्ति हैं। शायर ने प्रेम, विरह, इंतजार, तन्हाई और उम्मीद जैसे भावनात्मक विषयों को सहज, सरल और प्रभावशाली शब्दों में प्रस्तुत किया है। ये ग़ज़लें पाठक के मन में भावनात्मक जुड़ाव पैदा करती हैं और अंत तक अपनी छाप छोड़ती हैं। हालाँकि कई ग़ज़लें अपने आप में मिठास लिए हुए है, पर उसमे एक खास ग़ज़ल है –</div><div><br></div><div><b>अपनी उल्फत के वो नगमात मिले,</b></div><div><b>मिलना चाहा था मगर बीच में दीवार मिले.....</b></div><div><b>आ के बैठे ही थे महफिल में, के बेजार उठे,</b></div><div><b>हमसे पहले भी तो, साकी के तलबगार मिले....</b></div><div><b>माना दुनिया में है खुदगर्ज-ओ-बेवफा ही नहीं,</b></div><div><b>माना हर गाम पर इन्सां भी खुद्दार मिले</b></div><div><b>घर से निकले थे वो दामन को बचाकर अपने</b></div><div><b>उन पर ही इल्जाम के छीटें सरे बाजार मिले</b></div><div><b>बाद मुद्दत के यह “कौशल” है होश में आये</b></div><div><b>गो जिंदगानी में ठोकर ही बार-बार मिले</b></div><div><br></div><div>ग़ज़लों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी सादगी है। आशिक का अपनी महबूब को अपनी चाहत पेश करने का जो अंदाज है वह जज्बाती बना देता है। उदाहरण के तौर पर—</div><div><br></div><div><b>"ये करम मुझपर तेरी चाहतों का रहा,</b></div><div><b>कभी ओंस से बुझी प्यास तो कभी दरिया ने भी प्यासा रखा।"</b></div><div><br></div><div>यह शायरी प्रेम की विडंबना और जीवन के विरोधाभासों को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करता है। 'ओस' और 'दरिया' जैसे बिंबों का प्रयोग ग़ज़ल को सौंदर्य और गहराई प्रदान करता है।</div><div><br></div><div>इसी प्रकार—</div><div><b>"तुझे हासिल करने की ऐसी ज़िद रही,</b></div><div><b>तुझे खो कर भी पाने की उम्मीद रही।"</b></div><div><br></div><div>यहाँ शायर अपने मर्म को ऐसे पेश करता है जैसे लगता है प्रेम की दृढ़ता, समर्पण और आशा का अत्यंत मार्मिक चित्रण हो। वहीं, "तन्हाइयों" और "यादों" का उल्लेख रचना को भावनात्मक विस्तार देता है। सहज भाषा, लयपूर्ण अभिव्यक्ति आम पाठकों के लिए भी पठनीय है। कठिन शब्दों या अलंकरणों के बजाय स्वाभाविक अभिव्यक्ति को महत्व दिया गया है, जिससे ग़ज़लें सीधे हृदय तक पहुँचती हैं। शायर की संवेदनशील दृष्टि और भावों की ईमानदारी इन रचनाओं को विशेष बनाती है।</div><div><br></div><div><b>“जला रखा हूँ दीपक तेरे आने की चाहत लिए,</b></div><div><b>जलाना दिल न पड़े, तेरे न आने की सूरत में....”</b></div><div><br></div><div>आनंद कौशल का यह ग़ज़ल-शायरी-संग्रह प्रेम-विरह, इंतज़ार-मिलन, साथ-तन्हाई और वफ़ा-बेवफ़ाई जैसी मानवीय संवेदनाओं को बेहद सहज और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है। प्रस्तुति की इतनी सरल भाषा है, जो सीधे पाठक के दिल तक पहुँचती है। आम तौर पर मेरा व्यक्तिगत अनुभव के कि सरल भाषा में भावपूर्ण और जज्बाती शायरी लिखना बहुत कठिन होता है।</div><div><br></div><div><b>“अश्कों को दामन में छिपाये बैठा सारी रात,</b></div><div><b>शहरों को यूँ वीरानियों में डूबते देखा था...”</b></div><div><br></div><div>प्रत्येक शेर में अनुभवों की गहराई और भावनाओं की सच्चाई झलकती है, जिससे पाठक स्वयं को इन रचनाओं से जुड़ा हुआ महसूस करता है। यही कारण है कि यह संग्रह केवल साहित्य-प्रेमियों ही नहीं, बल्कि नए पाठकों को भी आकर्षित करने की क्षमता रखता है।</div><div>आनदं कौशल ने अपनी हमनशीं में सिर्फ मोहब्बत, जुदाई, वफ़ा का हीं जिक्र नहीं किया है. उन्होंने वर्तमान सामाजिक और राजनितिक परिस्थितयों पर भी चोट की है।</div><div><br></div><div><b>मुश्किलें हज़ार हैं दो जून रोटी की जुगाड़ में.....,</b></div><div><b>कितनी उम्मीदों को हर रोज देखता हूँ कबाड़ में....”</b></div><div>और</div><div><b>“ये राजनीति का चरित्र है.....</b></div><div><b>बोल और कृत्य विचित्र है.....”</b></div><div><br></div><div>समग्र रूप से यह संग्रह प्रेम और जीवन की भावनाओं का सुंदर दस्तावेज़ है। आनंद कौशल की लेखनी संवेदनाओं को शब्दों का ऐसा रूप देती है, जो पाठक के मन पर गहरी छाप छोड़ती है। यह संग्रह समकालीन हिंदी-उर्दू शायरी के पाठकों के लिए एक सराहनीय और पठनीय कृति कही जा सकती है।</div><div><br></div><div>अगर आप आसान भाषा में दिल को छू लेने वाली शायरी पढ़ना पसंद करते हैं, तो यह किताब आपको ज़रूर अच्छी लगेगी। उम्मीद है कि शायरी पसंद करने वाले हर पाठक को इसमें अपने मन के भाव कहीं न कहीं ज़रूर मिलेंगे। आनंद कौशल जी को उनकी मर्मस्पर्शी कृति (हमनशीं) के लिए बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं।</div><div><br></div><div>मधुप मणि “पिक्कू”</div><div>पत्रकार, लेखक सह महासचिव, डब्ल्यूजेएआई</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 18:41:21 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/anand-kaushal-hamnasheen-ghazals-born-of-the-heart-a-vivid-reflection-of-human-emotions</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[समाज के भले के लिए (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/for-the-welfare-of-society]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>समाज का भला करने के लिए अच्छी बातें करना बेहतर योजनाएं बनाना बहुत ज़रूरी होता है। अच्छी बातें करने से शरीर में कोई कमी नहीं आती। योजनाएं बनाने से दिमाग का व्यायाम हो जाता है। खूब सारी अच्छी बातें करने से जीभ की कसरत हो जाती है। अच्छी बातें करते हुए, योजनाओं की घोषणा करने से माहौल में सकारात्मकता रहती है। कुछ लोग तालियां बजा दें तो उनके हाथों का व्यायाम भी हो जाता है। अच्छे माहौल में समाज के भले के लिए बैठक बहुत बढ़िया होती है। बैठक के बाद स्वादिष्ट खाना और पीना हो जाए तो लगता है समाज का भला हो गया।&nbsp; समाज का भला चाहने वाले समाज सेवक, ख़ास पदभार संभालते हुए राष्ट्रीय राजनीतिक शैली में भाषण देते हैं । हर पद में भार अवश्य होता है जिसे संभालने के लिए आश्वासन, योजनाओं की घोषणा शक्ति प्रदान करती है। राष्ट्रीय परम्परा के अनुसार खूब सारे वायदे एक साथ करते हुए आत्मसम्मान महसूस होता है।&nbsp; &nbsp;</div><div><br></div><div>यह अच्छी बात है कि पद भार संभालने के प्रभावशाली कार्यक्रम में टीम के दूसरे सदस्य भी अपने अपने पद का भार संभालते हैं। पिछले सत्र में किए गए उत्कृष्ट कार्यों के लिए सम्मानित किया जाता है। सब मान लेते हैं कि किसी ने भी निकृष्ट कार्य नहीं किया होगा। सभी समझते हैं कि समाज सेवा ही सबसे उत्तम धर्म है। बैठक में घोषित आगामी कार्यक्रमों से पता चलता है कि हालांकि हमारे बच्चे भी नकली बुद्धि का प्रयोग करने लगे हैं लेकिन समाज से टीबी उन्मूलन नहीं हो पाया। खुद को विश्वगुरु समझते हैं लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में अनपढ़ता फैली हुई है।&nbsp; दुनिया भर से लोग इलाज करवाने आते हैं लेकिन स्थानीय लोगों के लिए स्वास्थ्य व्यवस्थाएं हमेशा बीमार रहती हैं। त्योहारों की धरती का वातावरण और पर्यावरण दोनों उदास हैं।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/recommendations-of-the-inquiry-committee" target="_blank">जांच समिति के सुझाव (व्यंग्य)</a></h3><div>उन्होंने घोषणा की कि अगले साल के लिए हमने ऐसा रोड मैप तैयार किया है कि संदर्भित क्षेत्रों में किए गए कार्यों का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंच सकेगा और स्थाई प्रभाव छोड़ेगा। उन्होंने सचमुच आनंदित कर देने वाली घोषणाएं करते हुए कहा कि वे अपने शहर को प्लास्टिक मुक्त बनाने के लिए पूरा जोर लगा देंगे, सड़क सुरक्षा जागरूक अभियान चलाएंगे। शहर के पास से होकर बह रही नदी का जल ज्यादा प्रदूषित होता जा रहा है उसे स्वच्छ करने के लिए सभी नागरिकों के सहयोग से विशेष अभियान चलाएंगे ।</div><div><br></div><div>समाज के भले के लिए हुई बैठक में लगा कुछ दिनों में क्षेत्र में अनेक सकारात्मक बदलाव आने वाले हैं लेकिन बेचारी राजनीति तो उनसे परेशान हो जाएगी। जो लोग सुबह उठते ही ईष्ट के सामने प्रणाम कर, असामाजिक कारनामों में सफलता का आशीर्वाद लेते हैं उनका क्या होगा।&nbsp;</div><div>समाज का भला चाहने वालों की सालाना बैठक बहुत मनोरंजक रही क्यूंकि खाना और सांस्कृतिक कार्यक्रम दोनों बहुत स्वादिष्ट रहे। दर्जनों व्यक्तियों को बहुत दिन बाद मिलने जुलने का मौका मिला। थकावट उतारू पेय का गिलास हाथ में थामे, व्यावसायिक गुफ्तगू करते रहे। महिलाएं, पारम्परिक और आधुनिक वस्त्रों में, साथ पहने गए&nbsp; महंगे जेवरों सहित इतराती रही। यह उल्लेखनीय है कि इस दौरान भी उन्होंने समाज के भले के लिए बहुत सी बातें की । समाज के भले के लिए कुछ भी करना भला काम है।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 27 Jul 2026 18:05:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/for-the-welfare-of-society</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[जांच समिति के सुझाव (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/recommendations-of-the-inquiry-committee]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>चोरी अब एक सफल व्यवसाय हो गई है। इस क्षेत्र में काफी कुछ नया करने की संभावनाएं विकसित हो रही हैं। राजनीति की तरह, चोरी भी थोडा जोखिम भरा पेशा तो है मगर सफलता हासिल कर लो तो ज़िंदगी खुशनुमा हो जाती है। एक बार माल इक्कठा कर लो फिर चाहे कानून के साथ खेलना पड़े । दसियों साल निकल जाते हैं ज्यादा परेशानी नहीं होती। जुगाड़ हो जाए तो बुरा समय चम्पत रहता है। इस तरह की सफलताओं से उभरते चोर भी प्रेरित होते हैं और सुविधाओं भरे अवसरों का शुद्ध लाभ कमाना सीख जाते हैं।</div><div><br></div><div>चोरी अब एक सम्मानजनक व्यवसाय भी है हालांकि कई पेशों में सम्मान, अपमानित हो चुका है। राजनीति को कभी देश और समाज की सेवा स्वीकारा जाता था लेकिन अब इसकी परिभाषा बदल कर नितांत व्यावसायिक हो गई है। चोरी के साथ साथ झूठ बोलना, मारना पीटना, जान लेना, सामान ज़मीन जेवर हथियाना सहयोगी व्यवसाय हैं। चोरी का व्यवसाय कर रहे लोग अपने कौशल से सुरक्षा उपायों को हमेशा हराते आए हैं क्यूंकि अपना कर्तव्य जो पूरी ईमानदारी से निभाते हैं।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/god-alone-decides" target="_blank">ईश्वर ही तय करते हैं (व्यंग्य)</a></h3><div>चोरी के मामले की कई साल तक चलने वाली, गहन तप्तीश के बावजूद कुछ बरामद हो या न हो उपाय ज़रूर किए जाते हैं । सुझाव भी तो कई तरह के उपाए ही होते हैं। कम भण्डारण क्षमता वाले घटिया सीसीटीवी बेहोश पड़े होते हैं और मरम्मत लायक भी नहीं रहते। यह तो जब चोरी या दूसरी गड़बड़ करने वालों के ग्रह खराब स्थिति में आते हैं तभी पता चलता है। ऐसे मामलों में सबसे पहला ज़रूरी उपाय जांच होता है। एक बंदा तो ऐसे मामलों की जांच भी नहीं कर पाता इसलिए कई बार तीन समितियां बनानी पड़ती हैं तब जांच तेज़ी से हो पाती है। कई दर्जन पृष्ठों में विस्तार से बनी रिपोर्ट पढनी आसान और समझनी मुश्किल होती है तभी उसके लिए बुद्धिमान व्यक्ति अलग से लगाए जाते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>जांच समिति उपदेश देती है कि सबसे पहले नोट गिनने वालों के लिए ड्रेस कोड लागू किया जाए। मतलब एक जैसे रंग, एक जैसे डिजाईन के कपड़े हों। कपड़ा बनाने वाली कम्पनी एक हो। एक ही दुकान से कपड़ा लिया जाए। यह ड्रेस जेब रहित हो यानी जब वर्दी में जेब नहीं होगी तो हेरा फेरी नहीं हो सकती। पहले नोट तहकर जेब में आराम से रखकर ले जाते होंगे। यह ड्रेस कर्मचारियों को ईमानदार बने रहने के लिए प्रेरित करेगी। दूसरा उपदेश यह आया कि मोबाइल और पर्स वगैरा बाहर रखा जाए। श्रद्धालु ज्यादा पुण्य कमाने के लिए नोट गणना में शामिल हो सकते हैं उन्हें भी कर्मचारियों की तरह करना होगा। बच्चे इस पुण्य कार्य में शामिल नहीं हो सकते। नामी कम्पनी, बढ़िया क्वालिटी, उच्च तकनीकी दक्षता वाले, ईमानदारी से खरीदे गए कैमरे कार्य स्थल के कोने कोने में लगा दिए जाएं। अतिरिक्त कर्मचारी भी लगाए जाएं।&nbsp;</div><div><br></div><div>नोट पात्रों को उठाकर ले जाने, पैसा निकालने, नोटों की गड्डियां बनाने और बैंक कर्मचारियों को सौंपने तक की गतिविधि को सीसीटीवी में लगातार देखकर रिकार्ड रखा जाए ताकि सनद रहे और बुरे वक़्त में काम आए।&nbsp; ज़िम्मेदार उच्च अधिकारी दक्षता से अपना मोर्चा स्थापित करेंगे और स्वाभाविक है उधर चोरी करने वाले भी अपनी नई स्किल विकसित कर रहे होंगे और नए कार्यक्षेत्र भी आजमाएंगे। यह तो समय को पता है कि जांच समिति के कौन कौन से सुझाव किस सीमा तक कितने कार्यन्वित होंगे । कुछ भी हो जी, जब जांच समिति के सुझावों का मौसम आता है तो अच्छा लगता है। ऐसा लगता है कुछ सकारात्मक होने के बेहतर दिन आ गए।&nbsp; &nbsp;</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 21 Jul 2026 18:41:41 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/recommendations-of-the-inquiry-committee</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[ईश्वर ही तय करते हैं (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/god-alone-decides]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>कोई माने या न माने मगर ईश्वर ही सब तय करते हैं। अब तो यह भी स्वीकृत है कि ईश्वर राजनीति में हिस्सा ले रहे हैं। चुनाव जीतने के बाद चारों नहीं सभी दिशाओं में खुशियां, विदेशी वस्त्र पहन कर नाच रही होती हैं। दो या तीन या चार पार्टियां मिलकर आराम से बहुमत पका लेती हैं। आपसी नैतिक सहयोग का ज़माना है। अकेले कुछ करना मुश्किल सा होता जा रहा है तभी तो थोडा बहुत इनकार, रार और तकरार के बाद मिलन उत्सव आयोजित हो जाता है जिसमें ईश्वर का सामूहिक आशीर्वाद ले लिया जाता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>ईश्वर की कृपा से घोड़े पालने और बेचने का पारम्परिक व्यवसाय अब कालजयी हो चुका है। यह एक ऐसा व्यापार है जिसमें फायदा ही फायदा है। चुनाव संपन्न होने के दौरान, घोड़ों को मालिश कर तैयार रखा जाता है। जिन्हें बहुमत मिल जाता है उनकी तरफ से घोषणा की जाती है कि ईश्वर ने तो पहले से ही तय कर रखा था। हमारा नायक ही समाज को नई दिशा देगा। जीत के बाद, गठजोड़ को गठजोड़ कहना अच्छी बात नहीं होती। रिकार्ड तोड़ जीत सबके मुंह बंद कर देती है। ऐसे में कोई क्या कहता है कोई फर्क नहीं पड़ता, क्यूंकि हुआ वही जो ईश्वर ने तय का रखा था। ज्यादा सीटें जीतने वाले तो उपरवाल की इच्छा बताकर&nbsp; धन्यवाद कर ही रहे होते हैं, कम सीटें जीतने वाले भी यही कहते हैं कि ईश्वर की यही इच्छा है। अगली बार उनका आशीर्वाद हमें ही मिलेगा और नायक हमारा ही होगा।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/clean-chit-from-the-inquiry-committee" target="_blank">जांच कमेटी की क्लीन चिट (व्यंग्य)</a></h3><div>ऊंची कुर्सी संभालते ही सार्वजनिक घोषणा की जाती है कि जल्दी ही&nbsp; ईश्वर से मिलने जाएंगे और धन्यवाद कर आशीर्वाद प्राप्त करेंगे। उनके साथ नया मिला, ताज़ा लाव लश्कर भी जाता है। घोषित कार्यक्रम के अनुसार ईश्वर से मिलकर कहेंगे आशीर्वाद लेने बहुत दिनों बाद आ पाया । उनका ही काम कर रहा था। मस्तिष्क से प्रणाम कर धन्यवाद करते हैं और एक बार फिर से ईश्वरीय आशीर्वाद प्राप्त कर लेते हैं। मीडिया से बार बार हाथ मिलाकर पुष्टि करते हैं कि ईश्वर ही सब तय करता है। सूचित करते हैं कि चुनाव से पहले किए गए वायदों को पूरा करने के लिए उचित योजनाएं बनाने के लिए, आज हम ईश्वर से आशीर्वाद लेने आए हैं । फिर दोनों बाहें खोलकर आम लोगों का आह्वान करेंगे कि समाज में बदलाव लाने वाले महापुरुषों के पदचिन्हों पर चलें। धर्म के रास्ते पर चलने का आग्रह करेंगे फिर विजेता की तरह मुस्कुराते हुए घोषणा करेंगे, ईश्वर ने आज शुभ मुहर्त में विशेष आशीर्वाद दिया है।&nbsp;</div><div><br></div><div>यह प्रशंसनीय, रहस्यात्मक और दिलचस्प है कि नेताओं को ईश्वर की तरफ से अनेक संकेत मिलते हैं। उनकी अंतरात्मा से प्रेरित शक्ति ही पूरी सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक कार्यवाही का संचालन करती है। ईश्वरीय आशीर्वाद से प्रेरित होकर अपनी आन, बान और शान बढाने के लिए योजनाएं बनाते हैं। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि सब कुछ और हर कुछ में आपसी सदभाव, प्रेम, इंसानियत, नफरत, पक्षपात, स्वार्थ और जातपात शामिल है। इत्तफाक से सामाजिक नायक इन सब मामलों में सफल रहते हैं। बेचारा आम आदमी तो हमेशा मानता ही है कि दुनिया में सब कुछ और हर कुछ ईश्वर की कृपा से होता है। ईश्वर ही सब कुछ तय करते हैं।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 14 Jul 2026 19:32:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/god-alone-decides</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[जांच कमेटी की क्लीन चिट (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/clean-chit-from-the-inquiry-committee]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>गहन जांच करने के बाद क्लीन चिट देने वाले ज़िम्मेदार लोग होते हैं। जब भी प्रसिद्ध, महान और धनवान लोगों की जांच करनी पड़ती है तो जांच करने वालों की जिम्मेवारी बहुत बढ़ जाती है। उन्हें पहले से ही पता रहता है कि किस व्यक्ति को ज़िम्मेदार ठहराया जाना है। इसको फंसाने की कोशिश करनी होगी, उसको पूरा डुबोना पड़ेगा। जांच कमेटी का एक नायक होता है। उसकी भूमिका भी गज़ब होती है। वह नायक तो होता है लेकिन उसे नायकत्व का सिर्फ अभिनय करना होता है। वह प्राकृतिक अभिनय करता है और सचाई को सार्वजनिक होने से बचाते हुए क्लीन चिट उपहार में देता है। बेचारी सचाई उसी खोल में सुरक्षित पड़ी रहती है जहां उसे व्यवस्थाजी की इच्छा के अनुसार होना होता है।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>क्लीन चिट भी एक तरह का स्पष्ट निर्णय होता है। यह उसके हक में जाता है जिसके सम्बन्ध ख़ास ख़ास लोगों के साथ क्लीन होते हैं। जांच कमेटी को उनके सम्बन्धों की कद्र करनी पड़ती है। ज़माने को पता चल जाता है कि सही समय पर उच्च कोटि के सम्बन्ध कितना काम आते हैं। चोरी, कमीशन खोरी जैसी हरकतें ज्यादा महत्त्वपूर्ण नहीं मानी जाती। रिश्तेदार और करीबी तो ज़िंदगी भर साथ निभाते हैं इसलिए उनका ख्याल रखना ही होता है। दोष, गवाह, पदाधिकारी, हेरफेर, आरोप, अंदेशा, सबूत बारे बहुत ज्यादा गहरी जांच की जाती है। जांच करने वाले विशेष लोग होते हैं जो सिर्फ खोज के लिए अधिकृत होते हैं लेकिन पहचान की बात उन्हें भी माननी पड़ती है। इसलिए ज्यादा ऊपर से हुक्म आता है कि विस्तृत जांच की जाए तो करनी ही पड़ती है। संजीदा जांच पानी का दूध कर सकती है और दूध को पानी पानी करवा सकती है। कुछ लोग कहते है दूध और पानी ही नहीं कॉकटेल भी कर सकती है। क्लीन चिट किसी को यूं ही नहीं दी जा सकती।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/god-in-changing-times" target="_blank">बदले हुए समय में भगवान (व्यंग्य)</a></h3><div>सुदृढ़ व्यवस्था ही जांच कमेटी से गहन जांच करवा सकती है और क्लीन चिट देने वाली जांच कमेटी ही शानदार व्यवस्था पर सवाल उठा सकती है। अब सब कुछ नया डिजिटल है फिर भी लोकतान्त्रिक परम्पराओं की बात होती है जैसे प्रबंधन में व्यवस्था की कमी, रिकॉर्ड में उचित रखरखाव न होना, गलत कम्पनी को ठेका देना, नालायक सीसीटीवी कैमरे, बेचारी संदिग्ध भूमिकाएं, बढ़ती भीड़। हर जांच कमेटी सिफारिश ज़रूर करती है कि संस्था का पुनर्गठन हो, प्रबंधन के लिए पेशेवर लोगों को लाएं, हर सप्ताह ईमानदार ऑडिट किया जाए, सीसीटीवी की मरम्मत करवाते रहें। इसमें कुछ काम तो असंभव ही होते हैं फिर भी करने को कहा जाता है। क्लीन चिट देनी होती है मज़ाक नहीं है।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>गड़बड़ी, हेराफेरी और बदमाशी बहुत समझदारी और चालाकी से की जाती है। इसलिए जांच करने वाले इंसानों का नैतिक कर्तव्य बहुत लम्बा चौड़ा हो जाता है तभी जांच कमेटी बार बार पंद्रह दिन का समय मांगती रहती है। नकली बुद्धि गलती कर सकती है इसलिए उसे महत्त्वपूर्ण जांच की ज़िम्मेदारी नहीं दे सकते। क्लीन चिट ऐसे ही किसी कुपात्र को नहीं दे सकते। यह तो सुपात्र को ही मिलती है इसलिए इसकी महिमा बरकरार रहती है।</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 26 Jun 2026 17:49:21 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/clean-chit-from-the-inquiry-committee</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[बदले हुए समय में भगवान (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/god-in-changing-times]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>इंसान ने समय बदल दिया है। उसकी नैसर्गिक बुद्धि ने, अपनी ही खुराफातों और गुस्ताखियों से बचने के लिए नकली बुद्धि का निर्माण किया। इधर नकली बुद्धि ने उसकी ही नाक में दम कर दिया है और उधर धार्मिक होते जा रहे इंसान से भगवान परेशान हो गए हैं। इंसान ने भगवान को बहुत पहले से ही नकदी, सोना, चांदी और ज़मीन देकर अपने जैसा कर लिया था। अब उन्हें अपनी महाबदमाशियों में शामिल करना शुरू कर दिया है। भगवान को अपने व्यवसाय में स्लीपिंग पार्टनर बना लिया है। उन्हें खुश रखने के लिए धार्मिक कार्य और आयोजन किए जाते हैं जिनमें उनका सार्वजनिक आशीर्वाद प्राप्त कर लिया जाता है।&nbsp; &nbsp;</div><div>&nbsp;&nbsp;</div><div>वास्तव में बाज़ार में खड़े इंसान ने भगवान् को अपना हेराफेरी पार्टनर बना दिया है। जब समझदार इंसान धंधा कर रहा होता है, लालच उसे लुभाने लगता है और वह दूसरों द्वारा भगवान् के नाम पर संचित की गई संपत्ति में से भी हिस्सा ऐंठने लगता है। बहुत पुरानी प्रेरक और सफल कहावत है, ‘भगवान् नाम जपना, पराया माल अपना’। इस मामले में खुद को सुरक्षित रख, हेराफेरी करने वाले ज्यादा समझदार लोग भगवान् से आग्रह करने लगे हैं कि वे अपनी संपत्ति, नकदी और जेवर का ध्यान स्वयं रखें। भगवान तो हर जगह उपस्थित हैं, सर्वशक्तिमान हैं। जिन्हें संसार का मालिक माना जाता है, जिनकी मर्जी के बिना एक पत्ता ज़रा सा भी नहीं हिल सकता तो फिर किसी डाकू या चोर इंसान की क्या औकात और हिम्मत कि उनकी दौलत में सेंध लगा ले और सफलता से चुरा भी ले। ऐसा होता है तो फिर ऐसे में आम लोगों की संपत्ति की रक्षा कैसे हो सकती है। वह बात अलग है कि उनका निवास बनवाने के लिए उनके प्रिय अनुयायी इंसान, न्यायालय में कई दशक तक कानूनी जंग लड़ते हैं, तब कहीं जाकर उनके निवास का निर्माण हो सकता है। दुनिया के अत्यंत शक्तिशाली और प्रभावशाली की स्थिति कितनी असहाय है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/the-true-outcome-of-the-war" target="_blank">युद्ध का असली हासिल (व्यंग्य)</a></h3><div>भगवान के सक्रिय न होने पर कुछ इंसान कहते हैं कि भगवान् बाहर नहीं है वह तो इंसान के मन के भीतर हैं यानी इंसान दवारा बनाई महंगी, विशाल और सुन्दर ईमारतों में भगवान् नहीं है। इंसान ने जो उनके नाम पे किया वास्तव में अपने लिए किया। ऐसी हरकतें देखकर तो उनका अपने भक्तों पर से विशवास भी डगमगा कर उठ गया होगा। सवाल यह है कि क्या इंसान नाम का प्राणी उनके विशवास लायक है। वह तो हर क्षण अपनी स्वार्थपरता, लालची और धोखा प्रवृति के प्रमाण देता रहता है। यह सब भी तो मानवीय प्रवृतियां हैं और हर युग के चरित्रों में विद्यमान रही है चाहे त्रेता हो या द्वापर। अब महाघोर कलयुग चल रहा है, जिसका आधार कार्ड बताता है कि पहले शातिर इंसान, भगवान् के नाम का धार्मिक चोगा धारण कर सामान्य दूसरों को रिझाएगा, फुसलाएगा, ठगेगा और फिर भगवान् के सहारे इक्कट्ठा किए धन दौलत को अपना माल बना लेगा। उधर ऊंचे, खूबसूरत मंच पर राजनीति अर्धनग्न नृत्य करती रहेगी। वह नाच किस किस को कैसे नचा रहा होगा यह लिखने&nbsp; की नहीं समझने की बात है।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>असली भगवान किसी भी तरह के कुकृत्यों को कदापि पसंद नहीं करेंगे। इसलिए मूर्ख इंसान को सांसारिक मामलों में समझाना भी बंद कर देंगे। अपना समय मधुर संगीत और मनपसंद पेय और स्वास्थ्य रक्षक भोजन करने में व्यतीत करेंगे।</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 20 Jun 2026 17:18:54 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/god-in-changing-times</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[युद्ध का असली हासिल (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/the-true-outcome-of-the-war]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>दुनिया में जब जब युद्ध होते हैं एक सवाल ज़रूर उभरता है कि युद्ध से क्या हासिल। फिर यह कहा जाता है कि युद्ध से कुछ हासिल नहीं होता लेकिन फिर भी दुनिया के सबसे ताक़तवर देश सालों तक युद्ध लड़ते रहते हैं। युद्ध करवाने वाले ताकतवर नेता कुछ तो हासिल करते ही होंगे। दर्जनों देशों के प्रभावशाली, प्रशासक, मंत्री अपने अपने तरीकों और चुने हुए शब्दों में समझाते रहते हैं कि युद्ध से बहुत नुकसान हो रहा है, दुनिया की आर्थिक स्थिति परेशान होकर उलझी पड़ी है, हज़ारों मौतें हो चुकी हैं लेकिन युद्ध है कि जारी रखा जाता है। रूस युक्रेन युद्ध इसकी सबसे बड़ी मिसाल है। दूसरी मिसाल है, अमरीका इजराइल ईरान की लड़ाई जिसके सौंवे दिवस के अशुभ अवसर पर अमरीका और ईरान ने एक दूसरे पर हमले किए। मानो या न मानो युद्ध से कुछ तो हासिल हो रहा है। युद्ध विराम और शांति बातचीत की राख के नीचे शोले बुझते ही नहीं, माहौल में तनाव उबलता रहता है युद्ध के ड्रोन मंडराते रहते हैं।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>युद्ध का सबसे बड़ा हासिल व्याव्सायिक फायदा है। खालिस व्यवसायी राष्ट्रपति, अपना नुक्सान ज़्यादा नहीं होने देंगे, दूसरों का बेड़ा गर्क करवा देंगे। उनके हिसाब से युद्ध भी एक सौदा है। उनकी हर चाल ऐसा दिखाती है। कुछ भी सोच सकते हैं। बड़ा सोचना, ज्यादा मांगना उनकी व्यावसायिक शैली में शामिल है। ज़्यादा मांगेंगे तो ज्यादा मिलेगा, कम मांगोगे तो कम ही मिलने वाला है। उन्हें खुद को खबर बनाना आता है। चर्चा में बनाए रखना आता है। वे व्याव्सायिक राजनीतिज्ञों की तरह परिस्थितियों के सभी दरवाज़े खुले रखते हैं। खूब शोर करते हैं और दूसरों को डराते रहते हैं। कहकर मुकर जाते हैं। जैसा बंदा वैसी डील करने को तत्पर रहते हैं। अब तो वैसे भी हर चीज़ में व्यापार और बाज़ार मिला दिया गया है। बड़ा दांव ज्यादा खतरा लेकिन फायदा भी उसी अनुपात में। आम लोग ही तो मरते हैं, घायल हो जाते हैं, विस्थापित होते हैं। ईमारतें और हथियार तबाह होते रहते हैं फिर नए बनाने के लिए मरम्मत के लिए, उद्योग क्षेत्र को काम मिलता है। कुछ भी हो जाए व्यवसाय फैलता रहता है। महंगाई का कर्तव्य तो हमेशा बढ़ते जाना है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/without-being-a-world-leader" target="_blank">विश्वगुरु न होते हुए (व्यंग्य)</a></h3><div>अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं हारकर उदास बैठी हैं। युद्ध जारी रखने वाले अंतर्राष्ट्रीय प्रबंधकों को यह संतुष्टि रहती है कि युद्ध निरंतर है। उन्हें अनिश्चितताओं से घिरी दुनिया से क्या लेना। धार्मिक कट्टरता शत्रुता बढ़े तो बढ़े। राजनीति को तो यह सब फैलाकर ही रखना होता है। कितने ही अनुभवी, यशस्वी नेताओं की सामरिक शक्ति, रुआब और प्रभाव की पोल खुलती जाती है लेकिन युद्ध से उनकी नाक ऊंची रहती है। स्वार्थ पूरा होता है और नकली इज्ज़त बनी रहती है।&nbsp; जो शांति स्थापित करने के लिए युद्ध जारी रखते हैं इतिहास उन्हें भूलता नहीं। क्या फर्क पड़ता है अगर युद्ध के कारण याद रखता है।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>अगर युद्ध से फायदा न हो तो कई तरह का नुक्सान करने वाले इस खतरनाक काम को कौन महीनों तक करता रहेगा। हर व्यवसाय में छिपे हुए फायदे होते हैं जिनका किसी को भी पता नहीं चलता सिर्फ उन्हें पता होता है जो उनके मालिक होते हैं। युद्ध एक व्यवसाय ही तो है जिसका हासिल, ख़ास लोगों को होने वाला किसी न किसी तरह का अशुभ लाभ है।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 16 Jun 2026 17:48:32 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/the-true-outcome-of-the-war</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्षों की यात्रा- ‘भाषा‘ पत्रिका का विशेषांक]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/the-two-hundred-year-journey-of-hindi-journalism-a-special-issue-of-bhasha-magazine]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>30 मई 1826 में कलकत्ता से हिंदी का पहला समाचार पत्र उदंत मार्त्तंड का प्रकाशन होता है। 8 पृष्ठों में छपने वाला यह समाचार पत्र सूर्य की वह रोशनी थी जिसके प्रकाश ने ज्ञान के पथ को आलोकित करने का ऐतिहासिक कार्य किया। पराधीन भारत में बंगाल की धरती पर हिंदी समाचार पत्र का प्रकाशन महत्त्वपूर्ण घटना थी। इस समाचार पत्र के संपादक युगल किशोर शुक्ल ने हिंदुस्तानियों के हित के हेत यह साहसिक और प्रेरणादायी पहल की। इस महत्वपूर्ण उपलब्धि को रेखांकित करते हुए केंद्रीय हिंदी निदेशालय के निदेशक प्रोफेसर हितेंद्र कुमार मिश्र के कुशल नेतृत्व और प्रधान संपादकत्व में केंद्रीय हिंदी निदेशालय ने भाषा पत्रिका के विशेषांक ''हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्ष (हिंदीतरभाषी हिंदी पत्रकारिता के विशेष संदर्भ में)“ का मई-जून 2026 अंक प्रकाशित किया है।&nbsp;</div><div><br></div><div>केंद्रीय हिंदी निदेशालय भाषा पत्रिका के माध्यम से समस्त भारतीय भाषाओं के मध्य एकसूत्रता और समरसता को दर्शाता है। केंद्रीय हिंदी निदेशालय संविधान की समस्त भाषाओं के उत्कृष्ट साहित्य को संकलित, संपादित कर पाठकों तक पहुँचाने का प्रयत्न करता है। इस क्रांतिकारी और&nbsp; राष्ट्रीय भाव के अवसर को अविस्मरणीय बनाने और मजबूती प्रदान करने के लिए केंद्रीय हिंदी निदेशालय ने अपनी स्थापना के 66वें वर्ष में इस लोकोपयोगी और विशिष्ट विशेषांक का प्रकाशन कर राष्ट्र को समर्पित किया है। जहाँ इस विशेषांक में हिंदी पत्रकारिता के पुरोधा संपादकों और पत्रकारों पर केंद्रित आलेखों को स्थान दिया गया है वहीं विशेष बल हिंदीतरभाषी हिंदी पत्रकारिता को दिया गया है। यह प्रयास अखंड भारत और भारतीयता के भाव को मजबूती प्रदान करता है। अभी हाल ही में हिंदी पत्रकारिता के बहुचर्चित व्यक्तित्व विजयदत्त श्रीधर जी का अत्यंत महत्वपूर्ण दस्तावेज़ “समग्र भारतीय पत्रकारिता“ ग्रंथ के रूप में प्रकाशित हुआ है। विशेषांक का प्रथम लेख विजयदत्त श्रीधर जी का “उदंत मार्तण्ड की द्विशताब्दी (हिंदी पत्रकारिता के दो सौ साल“ है। विजयदत्त श्रीधर की लेखनी से प्रसूत यह आलेख पाठकों के लिए अत्यंत उपादेय और जानकारियों से लैस है। संजीव भानावत के ‘गैर हिंदी कलम की ताक़त से समृद्ध हुई हिंदी पत्रकारिता’ हिंदीतरभाषी हिंदी पत्रकारिता के योगदान को रेखांकित करता है। संजय द्विवेदी के ‘स्वतंत्रता आंदोलन में भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता का योगदान’ शीर्षक लेख में स्वाधीनता आंदोलन की भयावह परिस्थितियों में सामाजिक चेतना जगाने के उत्तरदायित्व का निर्वहन करने में भारतीय भाषाओं के मुखर पक्षों को दर्शाया गया है। मणिपुर की हिंदी पत्रकारिता को आगे बढ़ाने में स्थानीय पत्र पत्रकारिता के योगदान का उल्लेख करता हुआ लोंगजम रोमी देवी का आलेख महत्वपूर्ण है। बहुचर्चित लेखक और विचारक मोहनदास नैमिशराय का महत्त्वपूर्ण लेख “सामाजिक न्याय से जुड़ी पत्रकारिता” इस अंक को समृद्ध करता है। बंगाल की धरती से सोमा बंद्योपाध्याय का आलेख ‘नवजागरणकालीन भारतीय पत्रकारिता: बांग्ला एवं हिंदी के विशेष संदर्भ में‘ नवजागरण काल की परिस्थितियों में पत्रकारिता की यात्रा और योगदान की विशेष रूप से व्याख्या प्रस्तुत करता है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/our-book-launch" target="_blank">हमारी किताब का विमोचन (व्यंग्य)</a></h3><div>संस्मरण स्तंभ में पत्रकारिता जगत का जाना-पहचाना चेहरा अरुण कुमार नैथानी का लेख “बदलते परिदृश्य में नए साँचे में ढलती पत्रकारिता“ परंपरागत पत्रकारिता के सफ़र और आधुनिक पत्रकारिता के पेशेवर स्वरूप को दर्शाता हुआ नवीन पहलुओं पर बात करता है।&nbsp; ‘भाषा‘ पत्रिका में आलेख के साथ-साथ ‘परख’ स्तंभ में पुस्तक समीक्षा प्रकाशित की जाती है।&nbsp;</div><div><br></div><div>हिंदीतरभाषी हिंदी पत्रकारिता के इस विशेषांक में यह प्रयास रहा है कि समग्र भारतीय पत्रकारिता: 3 खंडों के इस विशाल ग्रंथ में संचित ज्ञानकोश को सधे शब्दों और प्रभावी रूप में पाठकों तक पहुँचाया जाए। इस ग्रंथ की हिंदी के सशक्त हस्ताक्षर प्रोफेसर अमरनाथ द्वारा की गई समीक्षा इस अंक में प्रकाशित हुई है। यह पाठकों के विशाल वर्ग के लिए हिंदी पत्रकारिता के वृहत कालखंड को प्रथमदृष्टया जानने और समझने की दिशा में महत्वपूर्ण सिद्ध होगा। भाषा पत्रिका के इस अंक में भारत के पूर्वोत्तर की हिंदी पत्रकारिता में असम की पत्रकारिता को दर्शाते हुए अनुशब्द का लेख है। पूर्वोत्तर की हिंदी पत्रकारिता के विस्तृत कालखंड को दर्शाते हुए नूरजहाँ रहमातुल्लाह का आलेख सम्मिलित है। अखिलेश शंखधर का मणिपुर की ‘महिप‘ पत्रिका पर केंद्रित लेख मणिपुर की हिंदी पत्रकारिता के योगदान को दर्शाता है। हैदराबाद से प्रकाशित होनेवाली ‘कल्पना’ पत्रिका को केंद्र में रखकर प्रदीप त्रिपाठी का लेख ‘कविता के विकास में कल्पना पत्रिका की भूमिका’ दक्षिण की पत्रकारिता को दर्शाता है। सुधा सिंह का ‘विशाल भारत के सन् 1947 के अंक’ तत्कालीन समय का दस्तावेज प्रस्तुत करता है। खोजी पत्रकारिता, फ़ीचर पत्रकारिता, स्त्री पत्रकारिता, राष्ट्रीय चेतना का ज्वलंत पत्र ‘हिंदी केसरी', सुनील तिवारी का लेख ‘हिंदी पत्रकारिता की वृहत्रयी के महत् रत्न पं. लक्ष्मण नारायण गर्दे‘&nbsp; हिंदीतरभाषी पत्रकारों के अविस्मरणीय योगदान को पाठकों के समक्ष रखता है, अंजुम शर्मा का ‘हिंदी पत्रकारिता में सोशल मीडिया की सेंध’ वर्तमान समय में सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव पर अपना मत रखता है, भारत भूषण अरजारिया का लेख ‘भारतीय स्वातंत्र्य समर और गणेश शंकर विद्यार्थी की क्रांतिधर्मी पत्रकारिता‘ भारतीय पत्रकारिता के पुरोधा गणेश शंकर विद्यार्थी के संघर्ष और बलिदान को रेखांकित करता है। बाल पत्रकारिता, आदिवासी पत्रकारिता, कर्नाटक तथा महाराष्ट्र में हिंदी पत्रकारिता का स्वरूप और प्रदेय जैसे महत्त्वपूर्ण लेखों को इस विशेषांक में स्थान दिया गया है।&nbsp;</div><div><br></div><div>साक्षात्कार स्तंभ के अंतर्गत “अच्युतानंद मिश्र से इष्टदेव सांकृत्यायन की बातचीत: समाज में आई नैतिक गिरावट का असर पत्रकारिता पर भी” जानकारियों और घटनाओं के गवाक्ष खोलते हैं जिससे पाठक समय के उस कालखंड और घटनाओं के उस वृत्त के आसपास की परिस्थितियों से साधारणीकरण कर पाता है। वरिष्ठ हिंदी लेखक और पत्रकार त्रिलोकदीप का संस्मरणात्मक लेख साहित्यानुरागियों और शोधार्थियों के लिए जरूरी सामग्री उपलब्ध कराता है।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>केंद्रीय हिंदी निदेशालय की ‘भाषा‘ पत्रिका का मई-जून 2026 (विशेषांक) “हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्ष (हिंदीतरभाषी प्रांतों की हिंदी पत्रकारिता के विशेष संदर्भ में) ''पाठकों, शोधार्थियों, साहित्यानुरागियों के लिए समग्र भारत की तस्वीर को समेटते हुए उत्तर, दक्षिण, पूरब और पश्चिम की हिंदी पत्रकारिता के विभिन्न पहलुओं और योगदान को रेखांकित करता है। केंद्रीय हिंदी निदेशालय, उच्चतर शिक्षा विभाग, शिक्षा मंत्रालय की ‘भाषा’, द्वैमासिक पत्रिका हिंदी और भारतीय भाषा सरोकारों के प्रति समर्पित पत्रिका है। समय-समय पर भाषा पत्रिका में साहित्यिक, भाषाई तथा लोक और संस्कृति के चिंतन को समस्त भारतीय भाषाओं के कलेवर में पाठकों के हित में प्रस्तुत किया जाता है।</div><div><br></div><div>- डॉ. किरण झा&nbsp;</div><div>(संपादन मंडल, भाषा पत्रिका)&nbsp;</div><div>सहायक निदेशक&nbsp;</div><div>केंद्रीय हिंदी निदेशालय&nbsp;</div><div>उच्चतर शिक्षा विभाग&nbsp;</div><div>शिक्षा मंत्रालय</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 16 Jun 2026 13:03:40 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/the-two-hundred-year-journey-of-hindi-journalism-a-special-issue-of-bhasha-magazine</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[विश्वगुरु न होते हुए (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/without-being-a-world-leader]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>कई साल तक यह कहते रहो कि हम विश्वगुरु हैं और बाकी सब हमारे चेले हैं। हमारे जैसा दूसरा कोई नहीं। विश्व में सब कुछ, हर कुछ सबसे पहले हमने ही किया। सबसे ज़्यादा अविष्कार हमने ही किए। दुनियावालों ने हमसे सीखा यानी संसार को हमने सिखाया। फिर किसी दिन कह दो कि विश्वगुरु होने में अभी वक़्त लगेगा तो बात कुछ हजम नहीं होती। कभी यशस्वी गुरुजन कहते रहे कि विश्वगुरु&nbsp; होने के लिए, महागुरु अमेरिका को पीछे छोड़ना पड़ेगा। अब अमेरिका की ट्रम्प चालों ने दुनिया भर में तनाव, अस्थिरता, लड़ाई और झगडा फैला दिया है तो हम कह रहे हैं कि विश्व गुरु होने में समय लगेगा। ऐसे असमंजस में तैरते हालातों में विश्वगुरु होने से तो अच्छा है विश्वगुरु न होना।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div>विकास की तेज़ चाल विश्वगुरु बना देती है। राजनीति के सबसे प्रसिद्ध, आदरणीय और लोकप्रिय चरित्र यानी विकासजी की मेहरबानियों का सिलसिला थमता नहीं है। किसी ने ख्वाब भी नहीं लिया होगा कि चाहे हर घर में चुल्लू भर जल न हो, खाने के लिए दो वक़्त की रोटी न हो लेकिन कई कई मोबाइल होंगे। अब मोबाइल नहीं कहा जाता बलिक स्मार्ट फोन कहा जाता है। डाटा प्रयोग करने के मामले में तो हम विश्वगुरु हैं ही और इस सन्दर्भ में हमें विश्वगुरु के रूप में पहचाना जा चुका है। कुछ भी हो जी, इंटरनेट ने गरीब, संघर्षरत युवा वर्ग व आम जनता का कल्याण कर रखा&nbsp; है। सब सुसंस्कृत, मनोरंजन में व्यस्त, शांत हो चले हैं एक दूसरे को बुरा नहीं कहते, परेशान नहीं करते । किसी को किसी से कोई मतलब नहीं है। सब अपनी अपनी ज़िंदगी में अस्त व्यस्त और मस्त हैं। सभी ने स्वयं को अपना गुरु मान लिया है ऐसे में विश्वगुरु मानो न मानो क्या फर्क पड़ता है।&nbsp;&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/security-enhancement-plan" target="_blank">सुरक्षा में बढ़ोतरी योजना (व्यंग्य)</a></h3><div>वरिष्ठ नेता, महाजन, प्रसिद्धजन, धनवान और मनवान तो सदियों से खुद को महागुरु समझते रहे और दूसरों को बुद्धू चेलों का हुजूम। यह चेले समाज की कई तरह की ऊंची दीवारों और बंद दरवाजों में जीते रहे और खुद को आनंद विभोर समझते रहे और समझ रहे हैं। अब ख़ास लोगों ने समझाया है कि हम फिलहाल विश्वगुरु नहीं हैं तो हमारे विश्वगुरु न होने की घोषणा का फायदा दुनिया को होने वाला है। इस बहाने दुनिया वाले अपने बारे खुद सोचना शुरू कर सकेंगे। अपने समाज के वैचारिक निर्णय खुद लेंगे। हर क्षेत्र में बार बार प्रेरणा के लिए हमारी तरफ नहीं देखेंगे। कुल मिलाकर हमें भी लाभ होगा वह यह कि हमें इस गर्वीले विचार से आज़ादी मिलेगी कि दुनिया हमारे पीछे चल रही है, हमें बार बार लगातार देख रही है, हमारे बिना संसार का काम नहीं चल रहा ।&nbsp;</div><div><br></div><div>समझदार उच्च कोटि विचार गुरुओं का क्या है, जिस दिन चाहेंगे अच्छा सा मुहर्त निकलवा कर, अपने विश्व गुरु होने की घोषणा फिर से कर देंगे। दुनिया तो बुद्धू है ही, फिर से हमारा लोहा ही नहीं बहुत कुछ मानना शुरू कर देगी।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 15 Jun 2026 18:59:44 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/without-being-a-world-leader</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[सुरक्षा में बढ़ोतरी योजना (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/security-enhancement-plan]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पिछले कुछ दिनों से मानसिक सुरक्षा में बढ़ोतरी महसूस हो रही है। सुना है एक ख़ास परीक्षा की सुरक्षा बनाए रखने के मामले में सुरक्षा विभाग पास नहीं हो पाया, इसलिए अब उस ख़ास परीक्षा के प्रश्न पत्र, ख़ास विभाग के विमान से भेजे जाएंगे। यह बेहद प्रेरित करने वाला निर्णय है। अब दूसरी परीक्षाओं के आयोजकों को भी प्रेरणा मिलेगी और वे भी उनके द्वारा आयोजित होने वाली परीक्षाओं के प्रशन पत्र ही नहीं बलिक उत्तर पुस्तिकाओं को भी हवाई मार्ग से मंगाया करेंगे। स्वाभाविक नहीं निश्चित है, समुचित व्यवस्था बनाए रखने में उच्च कोटि का अनुभव रखने वाले नियंत्रक उन्हें मानव स्पर्श रहित मार्ग उपलब्ध करवाएंगे। कभी लाखों में एक बार ऐसा भी हो सकता है कि परीक्षा केंद्र के अधीक्षक का कोई निजी कार्य रह गया हो तो उसी विमान से करवा लिया जाए। वक़्त काबू में रहा तो उनके परिवार को भी आसमान का चक्कर लगवा दिया जाएगा और घर की छत पर खड़े होकर रिश्तेदार, हाथ नहीं इस अवसर के लिए सिलवाए झंडे जोर जोर से हिला सकेंगे।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>वैसे तो छोटा नहीं मोटा सामान ले जाने के लिए भी आजकल ड्रोन प्रयोग हो रहे हैं। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय युद्ध में एक शस्त्र की तरह इस्तेमाल होने के कारण ड्रोन, युद्ध क्षेत्र में यश अर्जित कर रहे हैं इसलिए शांत क्षेत्र में प्रश्न पत्र पहुंचाने के लिए उन्हें उचित नहीं समझा गया। अब विमान निर्माण कम्पनियां सर्वे करेंगी और यह पता लगाएंगी कि भविष्य में कितने युवा ख़ास परीक्षाओं में बैठने वाले हैं। उस हिसाब से अनेक आकार के विमानों का निर्माण होगा जो सीधे परीक्षा केंद्र की छत पर बाक्स उतार दिया करेंगी। एयरपोर्ट पर डिलीवरी लेकर, बख्तरबंद गाड़ी और सुरक्षा कर्मियों का खर्च भी बचेगा। छत से परीक्षार्थी के हाथों तक पहुंचाने के लिए, परीक्षा केंद्र के संचालक और अन्य पर्यवेक्षी स्टाफ को नए किस्म की सुरक्षा वर्दी दी जाएगी जो प्रश्न पत्र को हस्त स्पर्श रहित तरीके से पहुंचाएगी। इससे सुरक्षा में कोई कमी न रहेगी तो लीक होने की आशंका भी समाप्त हो जाएगी।&nbsp;&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/an-investigation-should-certainly-be-conducted" target="_blank">जांच तो होनी चाहिए (व्यंग्य)</a></h3><div>ख़ास परीक्षा के, अब ऐतिहासिक हो चुके प्रश्न पत्र के मामले में, सुरक्षा सुदृढ़ करने में सुप्रीम सुरक्षा एजेंसी को खोजबीन सौंपना भी एक तरह से सुरक्षा बारे खबरदार करना है। इस उचित निर्णय से भविष्य में यह गलत काम करने वाले डरेंगे। उनके दिमाग में यह चेतावनी चिपकी रहेगी कि अगर फंस गए तो मुकदमे में सालों साल उलझे रहेंगे और अगर फैसला हो गया तो सजा मिलेगी। अब उन्हें यह आत्म ज्ञान हो जाएगा कि शिक्षा के किसी भी मामले में सज़ा भुगतना पाप के बराबर है। शिक्षा के मामले में मानवीय दृष्टिकोण अपनाया जाता है और&nbsp; सिर्फ कुछ महत्त्वपूर्ण लोगों के तबादले कर दिए जाते हैं और अखबारों की हेड लाइन छपती है। इससे दूसरों को सबक मिलता है। वह बात अलग है कि उन दूसरों और तीसरों को पता होता है कि कुछ दिनों बाद फिर तबादले होंगे और कोई खबर नहीं छपेगी। इस तरह की घटनाएं दिखाती हैं कि विकास और सुरक्षा में हम विश्वगुरु हैं फिर भी किसी भी छोटी या बड़ी घटना से कुछ न कुछ सीखते हैं और आगे बढ़ने की प्रेरणा लेते हैं। यह सब सुरक्षा बढ़ोतरी योजना के अंतर्गत आता है।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 06 Jun 2026 18:12:51 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/security-enhancement-plan</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[जांच तो होनी चाहिए (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/an-investigation-should-certainly-be-conducted]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>गहन जांच का सख्त हुक्म होता है तो उसमें किसी तरह की राजनीति हो नहीं सकती क्यूंकि जांच के गर्भ में महत्त्वपूर्ण फैसला छिपा होता है। जांच के आदेश में जन भावना का सम्मान दिखता है। यह तो जांच होने के बाद ही पता चलता है कि जांच में क्या निकला और क्या नहीं निकला। कुछ को लगेगा जांच में यह नहीं निकला, वह तो बिलकुल नहीं निकलना चाहिए था। विद्वान व्यक्ति बता दिया करते हैं कि फलां जांच में कुछ ऐसा निकलना चाहिए था। समझदार लोगों का मत होता है कि जांच के आदेश से विपक्ष के झूठ और भ्रम पर रोक लगनी शुरू हो जाती है। उनके अनुसार राजपक्ष से सम्बंधित, मुश्किल से चुनाव जीत कर आए नेताओं को बदनाम करना शुरू हो गया था इसलिए जांच बिठानी पड़ी। बदनामी को दुर्भाग्यपूर्ण माना जाता है और जांच शुरू होने को शुभ मानते हुए कहा जाता है कि जांच जैसे पवित्र कार्य से सचाईजी, पूरी तरह सुसज्जित होकर सबके सामने खड़ी हो जाएंगी।</div><div><br></div><div>जांच किया जाना अच्छी बात है इसलिए तो जांच के निर्णय का स्वागत किया जाता है। यह बात दीगर है कि जांच होने के बाद निकलता क्या है। यह ठीक वैसा ही है कि गर्भ की जांच नहीं की जाती, डिलीवरी के बाद ही राज़ खुलता है। हालांकि अभिभावक मन्नतें मानते रहते हैं कि किसी तरह लड़का ही पैदा हो लेकिन हर तरह से लडकी ही पैदा हो जाती है। उस तरह की जांच के आदेश मात्र से एंटी सोशल मीडिया पर छाए तमाम वीडियो और दूसरे सामाजिक मंचों से फ़ैल रहे भ्रम और अराजकता का जो माहौल खड़ा किया जा रहा होता है उसका निर्माण गैर कानूनी ईमारत के निर्माण की तरह रुक जाता है। जांच उचित तरह से हो जाए तो जनता को बरगलाने वाले कुछ समय के लिए तो बेनकाब हो जाते हैं, क्या कहा करते हैं कि दूध का दूध पानी का पानी हो जाता है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/what-should-our-councilor-be-like" target="_blank">हमारा पार्षद कैसा हो (व्यंग्य)</a></h3><div>दिलचस्प यह है कि आजकल निरंतर प्रथम पुरस्कार प्राप्त करने वाले, बड़े आकार के शहरों का पानी भी महादूषित और जानलेवा होने लगा है जिसकी जांच भी करने लायक है। दूध तो इतना उपलब्ध है जितने पशु नहीं हैं। अगर ऐसे मामलों में जांच घोषित हो तो जनता अपनी जीत समझ लेगी और मस्त रहेगी । वह बात अलग है कि जांच कई साल पकाने के बाद परिणाम का हलवा उन्हें स्वादिष्ट नहीं लगेगा।&nbsp; जांच करने वालों की विश्वसनीयता, ईमानदारी, पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं लेकिन क्या फ़र्क पड़ता है सवाल उठाए जाएं या बिठा दिए जाएं। असली बात तो जवाबों में होती है। किसी ने लिखा भी है, जवाब जिनका नहीं वो सवाल होते हैं।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>आम जनता तो सवालों से ही खुश हो जाती है। कुछ ख़ास लोग जांच के परिणामों का इंतज़ार करते रहते हैं। सवालों के न दिए जा सकने वाले जवाब चाहते रहते हैं। ख़ास सवाल जब जांच में फंस जाएं तो जवाबों के रंग ढंग सब बदल जाते हैं। जांच करने वाले भी सोचते तो होंगे कि कैसे कैसे संगीन मामलों की जांच को, बेचारी कर देना पड़ता है। जांच का फैसला दर्जनों पृष्ठ का होता है लेकिन दोषी परेशान नहीं दिखते। यही तो जांच की अच्छी बात होती है।</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 28 May 2026 19:00:33 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/an-investigation-should-certainly-be-conducted</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[हमारा पार्षद कैसा हो (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/what-should-our-councilor-be-like]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हमारे शहर में स्थानीय लोकसभा यानी नगर परिषद का चुनाव घोषित हो गया है। अखबारों को नई मगर घिसी पिटी ख़बरें मिल गई हैं और वोटरों को एक और चुनाव। कॉलम छप रहे हैं, कैसा हो पार्षद, यानी उन्होंने औसत पार्षद के बारे में लोगों की राय पूछी है। राय जैसी भी हो लेकिन राय देने वालों की फ़ोटोज़ बढ़िया चमकदार छप रही हैं, जैसे आधार कार्ड या वोटर कार्ड धारक असली जीवन में नहीं पहचाना जाता कुछ ऐसा ही राय देने वाले लग रहे।</div><div>&nbsp;&nbsp;</div><div>उनकी राय पढने के बाद जो मुझे समझ में आया उसके अनुसार हमारा पार्षद कुछ ऐसा होना चाहिए। उसे पार्षद बनते ही ठेकेदार का चोगा पहन लेना चाहिए और स्वार्थ भाव से सड़क, गली, नाली, सुरक्षा दीवार सेवा का ठेका लेने के लिए पूजा शुरू कर देनी चाहिए। पार्षद बनने के लिए किसी भी वार्ड से चुनाव जैसे कैसे ऐसे वैसे कर जीत लेना चाहिए। वह राजनीति को समाजसेवा का ज़ज्बा बताए। धर्म और जाति के आधार पर भेदभाव ज़रूर करे। सबकी बातों को गंभीरता से न ले। खुद चुनाव लड़ने में कोई पेंच हो तो पत्नी को पार्षद बनवा देना चाहिए। हमारा पार्षद ऐसा होना चाहिए जो जन सुविधाओं, गलियों में गंदगी, बंद स्ट्रीट लाइटों और टूटी सड़कों पर ज़्यादा ध्यान न देकर कई तरह की राजनीति करे और अपने ख़ास बंदों के काम करवाए। मंच पर भाषण बढ़िया दे, अपना फायदा सोचे और अपनी राजनैतिक पार्टी को मज़बूत करे। उसकी छवि स्वच्छ होने की बिलकुल ज़रूरत नहीं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/this-time-our-government" target="_blank">इस बार हमारी सरकार (व्यंग्य)</a></h3><div>ऐसा कहना तो ख़्वाब में बात करना होगा कि पार्षद पद के उम्मीदवार में ईमानदारी होनी ज़रूरी है। पार्षद को बातें ज्यादा काम कम करना चाहिए। जीतने के बाद ख़ास ख़ास बंदों के फोन उठाने चाहिएं। दूसरी पार्टी के बंदों के फोन नम्बर डीलीट कर देना चाहिए। ऐसा भी कहा जाता है कि वार्ड की हर समस्या की ज़िम्मेदारी उसकी होती है। अगर ऐसा है तो वह अपने घर का काम कब करेगा। किसी ने कहा कि उसे बुद्धिजीवी होना चाहिए। बुद्धिजीवी राजनीति में आकर अबुद्धिजीवियों वाले उलटे, टेढ़े, मेढ़े भूरे और काले काम करेंगे तो पहले से जो अबुद्धिजीवी अराजनीति कर रहे हैं उनका भविष्य क्या होगा। किसी ने नहीं कहा कि संभावित पार्षद गंजा नहीं होना चाहिए। उसे सुन्दर और शाकाहारी होना चाहिए या उसे पहले से ही ठेकेदार होना चाहिए।&nbsp; &nbsp;</div><div><br></div><div>ऐसा होना मुश्किल है लेकिन लोग चाहते हैं कि वह सर्वधर्म सम्मान वाला हो। क्षेत्रवाद और धर्म जैसी संकीर्ण मानसिकता से दूर हो। पार्षद महिला हो तो उनका पति लीडर बनकर न घूमे। हर गली में नियमित रूप से जाए। लोगों के बोलने से पहले ही समस्याओं का समाधान करे। सड़कों को बिना गड्ढों के रखे। पता नहीं आम जनता, पार्षद जैसे राजनीतिज्ञ से भी इतना कुछ असंभव सा चाहती है। वह अपने घर के बाहर अभी अपने नाम का बोर्ड भी नहीं लगा पाता जनता काम बताना शुरू कर देती है। पार्षद बनने से पहले वह भी आम आदमी ही होता है। पार्षद बनने के बाद भी उसे अपने बच्चों और पत्नी के काम करने पड़ते हैं। इसलिए जैसे हम दूसरे राजनेताओं, विधायक और मंत्री से आशा रखते हैं वैसी ही उम्मीद उससे भी रखने में क्या हर्ज़ है, तो कहिए हमारा पार्षद कैसा हो, दूसरे नेताओं जैसा ही हो।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 14 May 2026 18:54:43 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/what-should-our-councilor-be-like</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[इस बार हमारी सरकार (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/this-time-our-government]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>‘इस बार आपकी सरकार’ कहना अब सिर्फ नारा नहीं रहा। अब तो हमारी पार्टी की सरकार बन चुकी है अरे नहीं आप सब की सरकार आ गई है। हमने तो पहले ही योजनाबद्ध व्यवसायिक तरीकों से कयासों के रंग बिरंगे बाग़ लगवा दिए गए थे जिनमें समझदार जनता को खूब सैर करा दी गई थी। हमने सरकार बनाने के लिए यानी चुनाव जीतने के लिए बहुत मेहनत की। विवादवार में राजनीति का निम्न&nbsp; स्तर बनाए रखा। खूब वायदे बांटे जिनपर आम आदमी हर बार की तरह इस बार भी मुग्ध रहा। गज, फुट और इंच जैसे नेताओं के वायदे हज़म करने का अनुभव तो अब देश के हर व्यक्ति को है।&nbsp;</div><div><br></div><div>दिग्गज दिमाग सरकार बना चुके हैं। मंत्रालयों से किस किस की गोद भराई होगी यह तय है। जिन अफसरान का तबादला होना है वे मानसिक व शारीरिक स्तर पर पूरी तरह तैयार हैं। उनके जाने के बाद हम अपनी टीम लाएंगे और वायदों के मुताबिक विकास करेंगे जिनमें आशा जगाऊ, ख़्वाब दिखाऊ शैली हमेशा की तरह समाहित की जाएगी। इस चुनाव में जिनकी जमानतें ज़ब्त हुई&nbsp; उनके लिए हमारी संवेदनाएं हैं। विपक्षी राजनीति की चारित्रिक विशेषता और घोर आवश्यकताएं अभी भी बदली नहीं हैं। हमने तो हमेशा पार्टी और विकास, किसान और गरीबों के किए बढ़िया स्वादिष्ट योजनाएं पकाकर पेश की हैं।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/possessions-respect-and-time" target="_blank">सामान, सम्मान और वक़्त (व्यंग्य)</a></h3><div>हमारी सरकार तो बन गई है लेकिन इस बार भी काफी लोगों ने पता नहीं हर किसी को वोट दिया। अब उन्हें मलाल रहेगा कि अच्छी आफर के बावजूद वे हमारे दल में शामिल क्यूं नहीं हुए। अभी भी कुछ नासमझ नागरिक बार बार लालच देने, आग्रह करने और उपहार देने के बावजूद वोट नहीं देते। शायद उन्हें किसी भी राजनीतिक पार्टी पर विश्वास नहीं रहा। कई हारे हुए घिसेपिटे, पुराने, धोखा खाए, पैसा लुटाए और साथसाथ शरीर तुड़वाए पूर्व राजनीतिज्ञ भी मानते हैं कि जिन नक्षत्रों में कुछ वोटरों ने जन्म लिया और जिन निम्न स्तरीय, नारकीय जीवन परिस्थितियों में जी रहे हैं, से उन्हें भगवान के सामने दिन रात की गई लाखों प्रार्थनाएं नहीं निकाल सकीं, विपक्ष में बैठे दिल के मैले व्यक्ति उनका भला कैसे सोच सकते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>अब हमारी सरकार है इसलिए हम सीना ठोककर कहते हैं कि इस बार फिर लोकतंत्र की जीत हुई क्यूंकि लोकतंत्र कभी नहीं हारता। हममें से ज़रूर कुछ लोग मिल कर लोकतंत्र को हराने में लगे रहते हैं। हम विशवास के साथ कहते हैं कि देश के हर चुनाव में आशा, विश्वास, मानवता, धर्म की भी जीत होती है। इस बारे स्वतंत्र भारत के नए स्वर्णिम इतिहास पर विश्वास किया जा सकता है। हमारी सरकार झूठ साबित कर देगी कि अधिकतर नेताओं द्वारा भाग्य तो अपना, अपना, अपना, अपने वफादारों या सरमाएदारों का ही बदला जा सकता है। हम सबकी तकदीर बदल डालेंगे और बता देंगे कि असली भाग्य विधाता हमेशा की तरह ताक़त और पैसा ही नहीं है। हमारी सरकार में वक़्त और स्थितियों से लड़ने की हिम्मत है। हमारी, माफ़ करें आपकी अपनी सरकार के निर्माता जानते हैं कि उन्होंने विपक्ष की सभी प्रकार की धारणाओं को कैसे ध्वस्त करना है।&nbsp; &nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 09 May 2026 19:03:27 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/this-time-our-government</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[सामान, सम्मान और वक़्त (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/possessions-respect-and-time]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>इंसान कभी डर कर नहीं रहा हांलाकि बुरा वक़्त बिना बताए आकर समझाता ज़रूर है। साहिर लुधियानवी ने कई दशक पहले समझाया था, ‘आदमी को चाहिए वक़्त से डर कर रहे, कौन जाने किस घडी वक़्त का बदले मिजाज़'। भुलक्कड़ आदमी ऐसी महत्त्वपूर्ण बातों को कहां याद रख पाता है। कभी कभार बातचीत के दौरान मान ज़रूर लेता है कि वक़्त बहुत कीमती है और हर इंसान के समय का महत्त्व है। एक बार मिली ज़िंदगी में सामान और सामान इकट्ठा करना ही नहीं, आपसी सहयोग, सदभाव, सम्मान करना ज्यादा ज़रूरी है। राजनीति का सम्मान करने के अभ्यस्त लोगों ने वोट के साथ साथ मेहनत, कर्मठता, समर्पण को भी सामान समझना शुरू कर दिया है।&nbsp;</div><div><br></div><div>वास्तव में अगर किसी तरह का स्वार्थ न हो किसी को कुछ भी कैसे दिया जा सकता है तभी वर्तमान में सम्मान का दर्ज किया जाना ज़रूरी हो गया है। वांछित व्यक्ति को खाने का सामान या नकद नहीं देना चाहते या नहीं दे सकते तो प्रशंसा को कागज़ पर लिखकर दे सकते हैं या फिर माला पहना सकते हैं। अब यह लेने वाले की मर्ज़ी&nbsp; है कि अखबार में सम्मान से सम्बंधित छपी फोटो को भी देखता रहे, कभी मनपसंद भूख लगे तो इसे चाट भी ले। ताली बजाना भी सम्मान देने का स्वास्थ्यवर्धक तरीका है, जितनी देर बजाते हैं व्यायाम भी होता रहता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/concealing-negligence" target="_blank">लापरवाही को छिपाना (व्यंग्य)</a></h3><div>सम्मानित हो रहे व्यक्ति के सामने ताली बजा दी जाए तो उसका उत्साह भी बढ़ जाता है। संभावना है इससे भूख भी कम लगती होगी। भविष्य में विशाल भव्य मूर्तियों को ऐसा बनाया जा सकता है कि इनके पड़ोस में काफी देर खड़े होकर भजन कीर्तन करने से कई दिन भूख न लगने का प्रभाव पैदा हो जाए। ऐसा प्रावधान भी हो कि ख़ास मूर्ति को चाटने से, एक सप्ताह तक कुछ भी खाने की ज़रूरत न पड़े।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>सम्मान या सामान सब को नहीं दिया जा सकता। कई बार सुपात्र को अनदेखा पड़ता है और आपसी संबंधों की कद्र करने वालों को सम्मान और सामान, समान रूप से देने पड़ते हैं। रिश्तों को सामान समझने वाले सम्मान पाने वालों की होड़ में भी आगे बढ़ते देखे जाते हैं। आजकल सामान से ज्यादा सम्मान देने की परम्परा है। राष्ट्रीय स्तर की बात करना तो बड़ी बात होगी नगर स्तरीय सम्मान भी सामने वाले का बढ़िया वक़्त देखने के बाद दिया जाता है। सांस्कृतिक कार्यक्रमों में आग्रह कर तालियां बजवानी पड़ती हैं लेकिन अब मेहनत, कर्मठता, समर्पण के नाम पर कहीं भी तालियां बजाने का समय है। जिनके सम्मान में तालियां बजाई जाती हैं उन्हें अच्छा लगता है लेकिन वक़्त निकल या बदल जाने के बाद भी सम्मान जारी रहेगा यह पता नहीं होता।</div><div><br></div><div>वक़्त की किताब में दर्ज है, सामान की वास्तविकता में डूबे हुए सब नंगे हैं लेकिन एक दूसरे से कह रहे हैं, देखो, हमने एकता, समानता, सदभाव के कितने रंग बिरंगे स्वच्छ, सुगन्धित भव्य वस्त्र पहन रखे हैं। भरोसा, यकीन, विशवास, वायदे, मुस्कुराहटों के सहारे वंचित वर्ग को जिलाए रखना ही उनका सम्मान हो गया है लेकिन साहिर ने कुछ और भी कहा है, ‘वक़्त है फूलों की सेज, वक़्त है कांटों का ताज'। हर लम्हा बदलते वक़्त का पता नहीं चलता किसके लिए कैसा वक़्त लेकर आए।&nbsp;</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 30 Apr 2026 18:21:05 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/possessions-respect-and-time</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[लापरवाही को छिपाना (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/concealing-negligence]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>लापरवाही के नुकसान ही माने जाते हैं। समझदार लोग भी ऐसा ही बताते हैं। बचपन के विशेषज्ञ भी अस्त व्यस्त अभिभावकों को, सलाह देते रहते हैं कि बच्चों की परवरिश में कोताही न बरतें और बच्चों को बताते रहें कि ज़िंदगी में किसी भी तरह की लापरवाही न करें। वह बात अलग है कि विशेषज्ञ और अभिभावक खुद भी कई मामलों में लापरवाही बरतते हैं और कहते रहते है कि जीवन में ऐसा हो जाता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>हमारे यहां लापरवाही एक विकसित परम्परा है। कोई दुर्घटना, नुकसान होता है तो जांच शुरू होने से पहले लापरवाही छिपाने की कोशिश शुरू हो जाती है। इसे बहुत ज़रूरी कर्तव्य की तरह निभाया जाता है। चश्मदीद गवाहों को धमकाने और अपराधी बनाने की सुगबुगाहट के साथ ही लापरवाही छिपाने का सिलसिला शुरू हो जाता है। उन्हें पूरी सजगता से धमकी देनी ज़रूरी होती है ताकि सच सामने न आ सके। अगर ऐसा न किया जाए तो आम आदमी तो क्या कोई भी संपन्न व्यक्ति फंस सकता है वह बात दीगर है कि सुरक्षा व्यवस्था द्वारा की गई लापरवाही उन्हें फंसने नहीं देती । आदमी किसी और की जान बचाने तक में लापरवाह हो सकता है लेकिन अपने मामले में गलती से भी हुई लापरवाही छिपाने की कोशिश करता है।&nbsp;&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/new-ways-of-making-history" target="_blank">इतिहास रचने के नए अंदाज़ (व्यंग्य)</a></h3><div>जांच के दौरान लापरवाही, चतुराई से छिपा देना एक कला है। इसे उचित तरीके से जांच करना भी कहते हैं। यह मेहनत भरा काम है। लापरवाही छिपी रहे सामने न आए, इस सम्बन्ध में एक पुराने गाने को चार सौ बीस बार आधार बनाया जाता है, परदे में रहने दो पर्दा न उठाओ, पर्दा जो उठ गया तो भेद खुल जाएगा और कईयों को फंसा देगा, जो सुलझे बैठे हैं उन्हें उलझा देगा। लापरवाही छिपाने के बहुत से फायदे हैं। लापरवाही छिपाते हुए हर बात उलझा सकते हैं। बयान और रिपोर्टों को अलग अलग कर सकते हैं। महत्त्वपूर्ण संकेत फाइलें बनाने से पहले ही दफ़न कर सकते हैं। रिपोर्ट्स को बार बार अधूरी बताकर फिर से लिखित जानकारियां बार बार मांग कर, उनकी लापरवाही पर शक बढ़ाया जा सकता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>सीधे सवालों के, लापरवाही में लिपटे गोल मोल जवाब देने से, ज्यादा समय और पुख्ता मदद मिलती है ताकि बेचारा नतीजा दूर कहीं झुरमुट में फंसा रहे और गलत व्यक्ति को कटघरे में खड़ा करने का प्रयास सफल हो जाए। यही लापरवाही की सजगता भरी सफलता मानी जाती है। इसका अनुभव बचाव व्यवस्था की बुनियादी खामियों के विशेषज्ञ व्यक्तियों को पहले से होता है। उन्हें लापरवाही से गढ़े आरोपों से निबटना खूब आता है तभी तो जांच एजेंसियों के बीच तालमेल नहीं हो पाता। उनमें लापरवाही संभालने का गहन चारित्रिक अनुभव होता है तभी तो लापरवाही छिपाने का महत्त्वपूर्ण काम उन्हें सौंपा जाता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>अनुभवी लोगों को ऐसे फंसा भी नहीं सकते। उन्हें भविष्य में भी पूरी ज़िम्मेदारी के साथ कर्तव्य निभाते हुए, लापरवाही करने में सक्रिय भूमिका अदा करनी होती है। किसी भी स्तर पर प्रशिक्षण देने की ज़रूरत, उन्हें नहीं होती। लापरवाही छिपाने का सबसे व्यावहारिक फायदा यह रहता है कि जांच संपन्न हो जाती है लेकिन कार्रवाई नहीं हो पाती। इधर पूरी गोपनीय सतर्कता से लापरवाही छिपाई जा रही होती है और उधर सार्वजनिक रूप से कहा जा रहा होता है कि भविष्य में किसी भी किस्म की लापरवाही बिलकुल बर्दाशत नहीं की जाएगी।&nbsp;</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 23 Apr 2026 18:54:27 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/concealing-negligence</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[इतिहास रचने के नए अंदाज़ (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/new-ways-of-making-history]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>यह भी इतिहास रचना ही है कि अधिकांश युद्ध अनुशासन और शांति स्थापित कर, शांति पुरस्कार हासिल करने के लिए लड़े जा रहे हैं। यह भी ऐतिहासिक है कि वफादारी के प्रतीक जानवर बारे, बड़ी बड़ी कुर्सियां और व्यक्तित्व लगभग लड़ते रहे और खींचतान जारी है। गरमी के मौसम में गरमा गर्म बहस चल रही है। कुछ इंसानी बयान स्थिति इतनी गंभीर कर देते हैं जितनी कुत्तों की गिनती में भी नहीं दिखती। अनेक सन्दर्भों में माफी की मांग भी हुई लेकिन माहौल इतना पारदर्शी है कि कोई किसी से आसानी से माफ़ी मांग कर या माफ़ कर किस्सा खत्म नही करना चाहता। इतने अच्छे या कद्र करने लायक सम्बन्ध नहीं रहे कि माफी मांगने के काबिल हों।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>कुत्तों का मामला भी उनकी पूंछ की तरह टेढ़ा है। कुत्ते नहीं तो वोट नहीं जैसे पोस्टर लगाए जा रहे हैं। इंसान के सबसे वफादार साथी कुत्तों की नसबंदी करवाई जा रही है। कुछ नेता ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए मतदाताओं को हांक रहे हैं। क्या हो गया अगर ज़िंदगी भर वफादार रहने वाले ने एक दो बार काट भी लिया। इतनी बढ़िया दवाइयां उपलब्ध हैं। इस बहाने शोर शराबे वाली रोज़मर्रा की ज़िंदगी से कुछ दिन आराम मिलेगा। छुट्टी आराम से मिलेगी। अखबार में फोटो सहित खबर छपेगी। हो सकता है दो चार चैनल वाले कवरेज करते हुए ज़िंदगी का पहला साक्षात्कार करें।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/a-conversation-with-a-cuckoo" target="_blank">कोयल से हुई बात (व्यंग्य)</a></h3><div>कुत्ते आम तौर पर सामान्य व्यक्तियों को ही काटते हैं। आम व्यक्ति तो आम होते हैं उन्हें सुरक्षा नहीं दी जा सकती। ख़ास व्यक्ति जिन्हें आम तौर पर कुत्ते नहीं काटते, आम लोगों के लिए योजना बना सकते हैं। वैसे कौन सा कुत्ता काटेगा कौन सा नहीं, यह पहले से अंदाज़ा हो तो अलग बात है। किसी को कटवाना हो तो अग्रिम बुकिंग भी करवा सकते हैं। कुत्ते द्वारा काटे जाने की शैली पर उसकी नस्ल के हिसाब से मुआवजा मिल सकता है। भविष्य के लिए टांगों और बाजुओं पर पहने जाने वाले सख्त कवर मिल सकता है। किसी दूसरी जगह काट ले तो ऑटो बीमा स्कीम में मेडिकल बिल का भुगतान सरकार चाहे तो करे । जिस क्षेत्र में कुत्ते ज्यादा हों वहां एंटीरेबीज़ इंजेक्शन लगवाना ज़रूरी हो। कुत्ते के गले में उसका और उसके मालिक का पूरा लेमीनेट हुआ परिचय कार्ड लटका हो ताकि सम्पर्क करने में सुविधा हो । उसमें यह भी लिखा हो कि कितनी बार काट चुका है। कुछ कुत्ता स्वामी ऐसे होंगे जिनसे आम व्यक्ति सम्पर्क करने की हिम्मत न कर पाएंगे। कुत्ता लावारिस होगा तो वैसे भी कुछ नहीं हो पाएगा। वही कुत्ता सरकारी अफसर को भी काट ले तो संयुक्त बीमा क्लेम का सुअवसर हो सकता है।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div>सुना है पिछले कुछ सालों में कुत्तों के काटने के मामले बढ़ रहे हैं। नेता काफी मुखर अशिष्टता का दामन थामे हुए हैं। इंसान ने कुत्तों से सचमुच काटना तो नहीं सीखा लेकिन ज़बान पर लाए शब्दों से तो काट ही रहा है। कहीं पढ़ने में आया कि शांति स्थापित करने वाले देश में पशु आश्रय स्थलों में कुत्ते और बिल्लियों को मार दिया जाता है। हमारे यहां तो ऐसा नहीं हो सकता। यहां आश्रय मिलना और&nbsp; मारना दोनों व्यावहारिक स्तर पर मुशकिल हैं। लोकतंत्र से वफादारी निभाना आसान नहीं, इस मामले में भी इतिहास रचा जा रहा है।</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 16 Apr 2026 17:58:51 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/new-ways-of-making-history</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[कोयल से हुई बात (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/a-conversation-with-a-cuckoo]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>इंसान का इंसान से ईमानदार संवाद मुश्किल में है। पक्षी और जानवर से संवाद हमेशा सहज रहा। कोयल से पूछा, आप हर साल आम को मीठा करने आती हैं, इतनी तन्मयता, ईमानदारी व समयबद्धता कैसे रखती हैं। कोयल ने कहा, हम कुदरत की बेटियां हैं, हमारा कर्तव्य आम के वृक्षों के साथ समन्वय बना कर रखना है।</div><div><br></div><div>सुबह सैर करते हुए विचार आया कि कोयल से बातचीत की जाए। सुंदर, प्रभावशाली, बड़बोले, ईमानदारों से ही पीछा नहीं छूटता। कौन काली कलूटी से संवाद करेगा। खूबसूरत लोगों ने खूबसीरत लोगों को हमेशा नीचा दिखाने की कोशिश की। युगों से आमों की मिठास बरकरार रखने वाली, अपना रंगढंग न बदलने वाली कोयल से संवाद साधने की सोची। एक मित्र जो दर्जनों पक्षियों की बोलियां समझने में सिद्धहस्त हैं ने मध्यस्थ्ता करते हुए कोयल से संपर्क किया। सभी कोयल ने एक जैसी ही बात करनी थी इसलिए किसी एक का चुनाव करना ज़रूरी नहीं था, हां किसी इंसान की बात होती तो सोचना पड़ता।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/sentiments-connected-to-the-soul" target="_blank">आत्मा से सम्बद्ध उदगार (व्यंग्य)</a></h3><div>इंसान का इंसान से ईमानदार संवाद मुश्किल में है। पक्षी और जानवर से संवाद हमेशा सहज रहा। कोयल से पूछा, आप हर साल आम को मीठा करने आती हैं, इतनी तन्मयता, ईमानदारी व समयबद्धता कैसे रखती हैं। कोयल ने कहा, हम कुदरत की बेटियां हैं, हमारा कर्तव्य आम के वृक्षों के साथ समन्वय बना कर रखना है। कुछ भी बदलाव लाना असंतुलन की तरफ ले जाएगा। मिठास आप घोलती हैं, हमने पूछा? बोली, मिठास तो मां प्रकृति घोलती है हमारा काम तो आवाज़ निकालना है और वह भी ठीक वैसी ही जैसा बचपन से सिखाया गया है। हमें आम के वृक्षों पर बैठकर समय और नियमबद्ध तरीके से यह पारिवारिक पारम्परिक कर्तव्य निभाना होता है।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>हमने कोयल से कहा, आपको पता है आम को फलों का राजा माना जाता है। कोयल ने कहा, हम तो साधारण कार्यकर्ता हैं, हमारे यहां सब एक जैसे होते हैं, ऊंच नीच नहीं होता सभी को एक जैसे घोंसले बनाकर रहना होता है। एक जैसा खाना पीना होता है तभी अनुशासन रहता है। इतनी समानता, समरसता, एकरूपता, एकात्मता हमारे जीवन में है कि पता नहीं कि राजा क्या होता है। अगला सवाल था, कोई बागवाला आपको पाल पोसकर, अच्छा खिला पिलाकर, आपको अपने आम के बागीचे में ज्यादा कूकने को कहे, तो कोयल ने कहा, हमें ऐसा व्यवहार करना नहीं सिखाया गया। प्रकृति के नियम पारदर्शी और न बदलने वाले हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>हमने कहा दुनिया कितनी बदल गई लेकिन आपकी तान वैसी ही है। हमें यही सिखाया गया है कि कभी अपना अच्छा चरित्र न बदलो, प्रतिस्पर्द्धा या लालच यहां तक कि मजबूरी में भी अडिग रहो। इसी गुण से आपके व्यक्तित्व की पहचान बनती है, कोयल बोली। झिझकते हुए मैंने जानना चाहा, आपको नहीं लगता आपका रंग काला न होकर, भूरा, लाल या कोई और... । जवाब आया, हमारे पूर्वजों ने हमें यही शिक्षा दी कि रंग से कुछ नहीं होता, सब आपके ढंग से होता है। हमारा रंग यदि उजला, पीला होता तो आप हमें पसंद करते मगर हमारी आवाज़ सुरीली न होती तो कितना देर तक सुन पाते। तब क्या अपने बच्चों को हमारी तरह बोलने को कहते। हमारे सवाल खत्म हो गए थे।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div>कोयल के कूकने का समय हो गया था। वह आम के अन्य वृक्षों की ओर उड़ चली। पक्षी इंसानों की तरह हो जाएं, बोली बदल लें, नए रंग का चोगा पहन लें, मुंह फेरना सीख लें तो प्रकृति का अंदरूनी संतुलन बिगड़ जाएगा। दुनिया के किसी कोने में शायद कोई तो ऐसा करवाने की कोशिश कर रहा होगा मगर कुदरत ऐसा होने तो नहीं देगी । काली कोयल ने अनेक सच उजले कर दिए।&nbsp;</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 08 Apr 2026 18:20:42 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/a-conversation-with-a-cuckoo</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[आत्मा से सम्बद्ध उदगार (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/sentiments-connected-to-the-soul]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सठियाने नहीं बलिक सत्तरियाने यानी सत्तर साल का होने के बाद मुझे विश्वास हो चला है कि आत्माएं कई प्रकार की होती हैं। साठ साल तक मैं ऐसा नहीं मानता था। अब धर्म का प्रभाव भी बढ़ रहा है, शायद इसका भी कुछ तो असर होगा ही। मैंने यह मानना शुरू कर दिया है कि आत्मा की आवाजें भी होती हैं जो अलग अलग किस्म की होने के कारण तरह तरह के प्रभाव लिए होती हैं। मिसाल के तौर पर सादी, सरल व सभ्य आत्मा की आवाज़ दबी दबी मरियल सी होती है और आम तौर पर अनसुनी की जाती है। आम आत्मा शरीर छोड़ जाए तो जान पहचान के लोग दुनिया की प्रसिद्ध किताब फेसबुक में आरआईपी यानी ‘आत्माजी, स्वर्ग में शांति से रहना’ लिखकर अपना कर्तव्य निभाते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>आत्मा में आत्मा यानी बोले तो अंतरात्मा भी होती है जिसकी मूक आवाज़ के आह्वान पर बड़े बड़े लोग अनूठे, असंभव काम कर दिया करते हैं। कृत्रिम बुद्धि युग में भी कर रहे हैं। बड़े आकार की आत्मा की आवाज़ कुछ भी करवा सकती है। उसके एक जबर्दस्त इशारे पर समाज और राजनीति में नए गुल खिलने लगते हैं। अंतरात्मा की आवाज़, स्वाभाविक है कुछ लोगों के शरीर के बाह्य, ऊपर, नीचे, दाएं या बाएं हिस्से में बसने वाली लघु आत्माओं की आवाजों में सबसे सशक्त मानी जाती है। यह ख़ास लम्हा बिना बताए आता है जब अंतरात्मा के ठीक अंदर, संभवत उसके भूखे पेट से आवाज़ निकलती है। यह जानदार आवाज़, समय, जगह व शुभ मुहर्त देखकर ही आती है लेकिन कोई औपचारिकता वगैरा नहीं मानती। ठीक भी है, अंतर की आत्मा, माफ़ करें अंतरात्मा की आवाज़ है किसी भूखे बच्चे का रोना नहीं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/love-merger-an-advanced-love-story" target="_blank">लव मर्जर...एक अडवांस प्रेम कथा (व्यंग्य)</a></h3><div>ऐसी आवाजों से यह ज्ञान भी प्राप्त होता है कि जीवित शरीर में आत्मा कभी चैन से नहीं रहती। भला जो आत्मा दुनियावी मसलों में, हाड़मांस के पुतले इंसान को ऐसे, वैसे न जाने कैसे कैसे गलत परामर्श दे रही हो, उसे निवृत होने के बाद तो नरक में ही जाना पडेगा न। उसे स्वर्ग में आसानी से अस्थायी सीट भी मिलने का सवाल पैदा नहीं होता। यह बात आम इंसान नहीं समझता तभी तो आत्मा के शरीर छोड़ने के अप्रत्याशित अवसर पर फेसबुक पर ‘लाइक’ का बटन भी दबा देता है, यह मानते हुए कि अमुक आत्मा&nbsp; इस नश्वर संसार के जंजाल से छूट गई है। वास्तव में बेचारी ज़्यादातर आत्माएं, इंसान की गलत करतूतों के कारण नरक में जाकर, निश्चित ही भांति भांति के कष्ट भोग रही होती हैं और इधर ज़्यादातर लोग यही कामना कर रहे होते हैं कि आत्मा को शांति मिले, स्वर्ग में आत्मा शांति से रहे।&nbsp;</div><div><br></div><div>कुछ आत्माओं को महान घोषित किए जाने की राष्ट्रीय परम्परा भी है। जीवित बंदे शारीरिक मोह से छूट चुकी आत्माओं को झूठे ख़्वाब दिखा रहे होते हैं जबकि आत्मा इन तुच्छ विचारों से दूर शांत ही रहती हैं। छोटे छोटे स्वार्थों की गिरफ्त में फंसा आदमी, आत्मा को किसी महंगी चीज़ का टुकडा समझता है जिसे नरक में नहीं स्वर्ग में ही रखा जाना चाहिए। जब आत्मा, नश्वर शरीर में कुलबुला रही होती है, हम उसकी आवाज़ दबाते फिरते हैं और बाद में आत्मा की अंतरात्मा की ईमानदार आवाजें सुनने और सुनाने की कोशिशें करते रहते हैं।</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 04 Apr 2026 18:20:46 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/sentiments-connected-to-the-soul</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[लव मर्जर...एक अडवांस प्रेम कथा (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/love-merger-an-advanced-love-story]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सन 2050 की उस सुनहरी और हाई-टेक सुबह में मोहल्ले के ऑक्सीजन-पार्क की आबोहवा ही कुछ और थी, जहाँ कंधे पर सिलेंडर लादे दो बुजुर्ग अपनी विंटेज यादों की फाइलें खोलकर बैठे थे। वे चर्चा कर रहे थे कि उनके जमाने में प्रेमी-प्रेमिका के घर के बाहर फिजिकल अटेंडेंस देते थे और पत्थर फेंककर खिड़कियाँ तोड़ने जैसे मैनुअल टास्क किया करते थे, पर आज का युग तो पूरी तरह रिमोट रोमांस और क्लाउड-बेस्ड अटैचमेंट का है। इसी बीच एलेक्स-पॉल अपने स्मार्ट ग्लास पर डेटा चेक करते हुए गहरी आहें भर रहा था, जिसे देखकर उसके मित्र साइबर-सिल्वेस्टर ने पूछा, क्या हुआ भाई? क्या तुम्हारी प्रेमिका किसी और के साथ लॉग-आउट कर गई या फिर तुम्हारा इमोशनल क्लाउड क्रैश हो गया? एलेक्स ने एक ऐसी दार्शनिक मुस्कान बिखेरी जिसे देखकर लगता था कि उसने अभी-अभी कोई बहुत बड़ा आध्यात्मिक घाटा सहा है। उसने कहा, नहीं यार, ट्रैजेडी तो यह है कि वह वापस आ गई! मैं अपनी पार्टनर ज़ारा-क्वांटम को तीन महीने के फ्री ट्रायल पर पड़ोसी के पास भेजकर आया था ताकि वह अपनी एक्सप्लोरेशन स्किल्स को अपग्रेड कर सके, पर वह तो कह रही है कि उसे मेरा ही सब्सक्रिप्शन रिन्यू कराना है। यह तो सरासर पिछड़ापन और बौद्धिक दिवालियापन है! उसे प्रोग्रेसिव होकर मल्टी-टास्किंग करनी चाहिए थी, किसी अजनबी के साथ अपने प्राइवेट मोमेंट्स की एचडी रील बनानी चाहिए थी, पर वह तो वापस आकर मेरे लिए चाय बनाने और लॉयल्टी निभाने जैसी दकियानूसी और सड़ी-गली बातें कर रही है। मैं तो सोच रहा हूँ कि इसकी शिकायत इमोशनल कंज्यूमर कोर्ट में कर दूँ।</div><div><br></div><div>साइबर-सिल्वेस्टर ने उसे ढांढस बँधाया कि घबराओ मत, समाज अभी ट्रांजिशन फेज में है, धीरे-धीरे वह भी दूसरों के साथ ओपन-सोर्स होना सीख जाएगी। असल में एलेक्स का दुःख केवल एकतरफा नहीं था; वह इस बात से भी आहत था कि ज़ारा उसे किसी इंटरनेशनल मार्केट में लॉन्च करने के बजाय घर में ही डंप किए हुए थी। एलेक्स चाहता था कि ज़ारा उसे किसी हाई-प्रोफाइल मेटावर्स किटी पार्टी में ऑफर करे, ताकि उसे भी अपनी मार्केटिंग वैल्यू और ग्लोबल डिमांड का अंदाजा हो सके। उसे चिढ़ इस बात की थी कि जब पूरी दुनिया शेयरिंग इकोनॉमी के सिद्धांतों पर चल रही है, तो ज़ारा उसे अपना प्राइवेट असेट और घरेलू सामान क्यों समझ रही है? वह तो उस आधुनिक पुरुषार्थ का स्वप्न देख रहा था जिसमें ज़ारा उसे किसी दूसरी महिला के साथ डेट पर भेजकर खुद बाहर से कमरा लॉक करे और उस पूरे डेटा को क्लाउड पर लाइव स्ट्रीम करके प्रोग्रेसिव पार्टनर का सर्वोच्च गोल्ड मेडल जीते। इधर शहर के स्यूडो-इंटेलेक्चुअल बुद्धिजीवी एक फाइव स्टार कन्वेंशन सेंटर में सेमिनार कर रहे थे कि पुराने जमाने के प्रेमी कितने अकुशल और अनप्रोफेशनल थे जो ईर्ष्या और पजेसिवनेस के चक्कर में हिंसक हो जाते थे। मंच पर खड़ा रिलेशनशिप एल्गोरिदम स्पेशलिस्ट चिल्ला रहा था, साथियों, असली पुरुषार्थ उसे अपनी बाहों में जकड़ने में नहीं, बल्कि उसे दूसरे की बाहों में जाते हुए लाइव स्ट्रीम करने और उस पर सोशल मीडिया लाइक्स बटोरने में है! जो प्रेमी अपनी प्रेमिका का दूसरा प्रेमी खुद शॉर्टलिस्ट नहीं करता, वह प्रेमी नहीं, लव-टेररिस्ट है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/the-sorrow-of-rent" target="_blank">किराये का दुख (व्यंग्य)</a></h3><div>एलेक्स ने अब ज़ारा-क्वांटम को आखिरी अल्टीमेटम दे दिया—ज़ारा, अगर तुम अगले हफ्ते तक किसी अजनबी के साथ इंटीमेट-डेट पर नहीं गई और मुझे उसकी बिहाइंड द सीन्स फोटोज और सेंसरी डेटा नहीं भेजा, तो मैं तुम्हें अपनी लाइफ की फ्रेंड-लिस्ट से हमेशा के लिए ब्लॉक कर दूँगा। बेचारा एलेक्स चाहता था कि उसकी प्रेमिका समाज की मेनस्ट्रीम प्रोग्रेसिविटी में आए और किसी अजनबी के साथ अपने एकांत के पलों को सोशल मीडिया पर लाइव करे ताकि उसे मोस्ट इवॉल्व्ड मेल का टैग मिले। 2050 का यह नया रिलेशनशिप मॉडल उन सभी पुरानी क्रिमिनल एक्टिविटीज का एक परमानेंट और सस्टेनेबल समाधान बनकर उभरा था। अब पजेसिवनेस एक गंभीर मानसिक बीमारी घोषित हो चुकी थी और शेयरिंग को ही सर्वोच्च वर्चुअल वर्चू माना जाता था। एलेक्स जैसे न्यू-एज लवर्स का मानना था कि हत्या करना वेस्ट ऑफ रिसोर्स और डाटा-लॉस है, जबकि प्रेमिका को शेयर करना एक दीर्घकालिक सोशल इन्वेस्टमेंट है। प्रेमिका भी अब किसी दूसरे के साथ अपने आत्मीय पलों को प्रेमी के साथ रियल-टाइम में साझा करती है, जिससे प्रेमी को घर बैठे ही वॉयुरिस्टिक किक मिलती है और उसे क्राइम पेट्रोल का हिस्सा नहीं बनना पड़ता। यह डिजिटल सतीत्व का वह महान दौर है जहाँ धोखा शब्द डिक्शनरी से पूरी तरह डिलीट कर दिया गया है और उसकी जगह को-ऑपरेटिव रोमांस ने ले ली है, जहाँ हर कोई एक ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर की तरह डाउनलोड और अपलोड के लिए उपलब्ध है।</div><div><br></div><div>एलेक्स का दिमाग इस कदर ग्लोबल हो चुका था कि उसने खुद के लिए भी नए रास्ते तलाशने शुरू कर दिए थे। उसने हॉट-स्वैप डेटिंग ऐप के अल्ट्रा-प्रो-मैक्स वर्जन पर अपनी प्रोफाइल बनाई। एलेक्स ने अपनी शक्ल पर इतने साइबर-फिल्टर्स, एआई-मास्क और एल्गोरिथम-स्किन थोप दिए थे कि अगर उसका अपना आधार कार्ड या डीएनए रिपोर्ट उसे देखती, तो वह भी उसे किसी दूसरे ग्रह का पर्यटक समझकर डॉलर मांगने लगती। वह खुद के डिजिटल मेकअप के नीचे असली पहचान भूल चुका था। उसी रात उसे एक प्रोफाइल दिखी—नियो-नाइट-राइडर। उस प्रोफाइल का अवतार इतना जादुई, चमकीला और आकर्षक था कि एलेक्स के दिल की धड़कन गीगाबाइट की रफ़्तार से दौड़ने लगी। उसे लगा यही वह परफेक्ट अजनबी है जिसे वह ज़ारा के लिए एक्वायर करना चाहता है ताकि उसकी सोशल स्टैंडिंग बढ़ सके। उसने उस अज्ञात प्रोफाइल को सुपर लाइक, मेगा लाइक और गॉड लाइक ठोक दिया। उसे रत्ती भर भी अंदाजा नहीं था कि वह जिसे अजनबी समझकर अपनी प्रेमिका का भविष्य और अपना स्वाभिमान सौंप रहा है, वह डिजिटल पर्दे के पीछे असल में कौन है। वह तो बस एक क्लाइंट और सर्वर के बीच का रिश्ता जोड़ने में मगन था, यह भूलकर कि एल्गोरिदम कभी-कभी खून के रिश्तों को भी बाइनरी कोड में बदल देते हैं और इंसान केवल एक यूजर आईडी बनकर रह जाता है।</div><div><br></div><div>आखिरकार ज़ारा-क्वांटम एक नया बॉयफ्रेंड ढूंढने के मिशन में सफल हो गई और उसने उसे सफलतापूर्वक एक्वायर कर लिया। एलेक्स खुशी के मारे अपने वर्चुअल रियलिटी सूट में नाचने लगा और पूरे मोहल्ले में डिजिटल-शुगर-फ्री-लड्डू के कूपन बांटने लगा। वह खुशी से चिल्लाया, आज मेरा विजन 2050 सफल हुआ, मेरी प्रेमिका आखिरकार किसी और की बाहों में लैंड कर गई है! अब मैं समाज में गर्व से सिर उठाकर कह सकूँगा कि मैं एक मॉडर्न और लिबरल पार्टनर हूँ। तभी ज़ारा का वीडियो कॉल आया और वह चहकते हुए बोली, एलेक्स डार्लिंग, तुम्हारी ज़िद और हॉट-स्वैप वाली रिकमेंडेशन रंग लाई! मैंने अपना सेकंडरी पार्टनर ढूंढ लिया है और ताज्जुब की बात यह है कि तुमने खुद ही उसे पिछले संडे ऐप पर सुपर लाइक करके रिकमेंड किया था। तो चलो, अब अपने नए रिश्तेदार और मेरे नए प्रोजेक्ट से मिलो! ज़ारा ने कैमरा घुमाया। एलेक्स की आँखें फटी की फटी रह गईं। सामने सोफे पर उसका अपना सगा छोटा भाई सोनू-साइबर बैठा था, जो एलेक्स का ही प्यूमा वाला टी-शर्ट पहनकर दांत चियान रहा था। एलेक्स हक्का-बक्का रह गया। उसने हकलाते हुए पूछा, सोनू? तू? पर मैंने तो नियो-नाइट-राइडर को लाइक किया था जिसकी फोटो में छह एब्स थे और चेहरा रोबोटिक सुपरमॉडल जैसा था! यह धोखाधड़ी है या मेरा चश्मा खराब हो गया है?</div><div><br></div><div>सोनू-साइबर खिलखिलाकर हँसा और बोला, बड़े भैया, 2050 में चेहरा और शरीर तो केवल डिस्प्ले एड हैं। आपने जिसे लाइक किया, वह मेरा हॉट-प्रोफाइल फिल्टर था जिसे मैंने डार्क वेब से खरीदा था। आपने खुद ही तो सिखाया था कि अपनी असली पहचान छुपाकर मल्टीपल पर्सनालिटी जीना ही असली प्रोग्रेसिविटी है। तो मैंने सोचा घर की लक्ष्मी बाहर क्यों जाए? आपकी सुपर लाइक मिली, तो मैंने इसे फैमिली-कोलेबोरेशन का दैवीय संकेत मान लिया। एलेक्स के पैरों तले ज़मीन खिसक जानी चाहिए थी, पर वह 2050 का इवॉल्व्ड पुरुष था। उसने एक पल के लिए अपना सिर खुजलाया और फिर जोर-जोर से हँसने लगा। उसने कहा, वाह! इसे कहते हैं मैक्सिमम आउटपुट और घर की संपत्ति का घर में ही संचलन! कम से कम अब मुझे उसे डेट पर ले जाने का पेट्रोल अलाउंस, वाई-फाई डेटा और भारी भरकम रेस्तरां बिल नहीं देना पड़ेगा। प्राइवेसी के नाम पर मैं खुद अपने ही कमरे की चाबी बाहर से लगाकर उसे पूरी हॉस्पिटैलिटी दे सकूँगा और इस इन-हाउस प्रोजेक्ट की निगरानी भी कर पाऊँगा। और सुनो सोनू, कल सुबह की स्मार्ट-कॉफी तुम ही बनाओगे क्योंकि अब तुम इस घर के इंटर्न प्रेमी हो और ज़ारा तुम्हारी सुपरवाइजर है।</div><div><br></div><div>तभी ज़ारा ने एक और बड़ा बम फोड़ा, "एलेक्स डार्लिंग, बात यहीं खत्म नहीं होती। सोनू ने भी तुम्हारे लिए एक 'कस्टमाइज्ड रिटर्न गिफ्ट' तैयार किया है। उसने तुम्हारी प्रोफाइल को हमारी मोहल्ले वाली उस 'मैडम-मून' के साथ मैच करा दिया है, जिनके तीन तलाक, पांच रिन्यूअल और अनगिनत 'शॉर्ट-टर्म लीज' हो चुके हैं। वे कल रात तुम्हें अपना पुराना 'इमोशनल डाटा' और विंटेज साड़ियों का कलेक्शन दिखाने के लिए कैंडल-लाइट डिनर पर बुला रही हैं। सोनू का कहना है कि घर का कोई भी सदस्य खाली नहीं बैठना चाहिए, सबको अपनी 'शेयरिंग ड्यूटी' निभानी होगी तभी हम एक 'होलिस्टिक फैमिली' कहलाएंगे।" एलेक्स की आँखें खुशी से भर आईं। उसने कहा, "गजब! अब घर के पुराने संस्कारों और नई प्रोग्रेसिविटी के बीच एक हाइब्रिड मॉडल तैयार होगा। 'मैडम-मून' के साथ मेरा डेट पर जाना समाज के लिए एक क्रांतिकारी संदेश होगा कि हम उम्र और अनुभव के बंधनों से मुक्त हो चुके हैं।" तभी एक रोबोटिक पुलिस एलेक्स के दरवाजे पर आई। पुलिस ने कहा, "एलेक्स जी, आपके भाई सोनू और प्रेमिका ज़ारा ने मिलकर आपको इस घर से 'लॉग-आउट' कर दिया है। उन्होंने आपकी प्रोफाइल को 'एग्रीमेंट' से डिलीट करके आपके कमरे को मेटावर्स पर किसी दूसरे 'विदेशी पार्टनर' को किराए पर दे दिया है। अब आप एक 'फ्रीलांस लवर' हैं, अपना नया 'सॉफ्टवेयर' और छत ढूंढें।"</div><div><br></div><div>एलेक्स ने फोन की तरफ देखा, एक लंबी साँस ली और मुस्कुराते हुए बोला, "कोई बात नहीं! कम से कम अब मैं 'अनलिमिटेड' और 'अनबाउंड' हो गया हूँ! रिजेक्शन भी तो एक तरह का 'सिस्टम अपडेट' ही है।" तभी गेट के बाहर 'मैडम-मून' अपनी इलेक्ट्रिक स्कूटी लेकर हॉर्न बजा रही थीं, और एलेक्स उनकी पिछली सीट पर बैठने के लिए दौड़ पड़ा। 2050 की उस सुबह में, एलेक्स ने साबित कर दिया कि जब तक 'शेयरिंग' का डेटा पैकेट जारी है, तब तक संसाधन और भावनाएं कभी खत्म नहीं होते, चाहे वह कमरा हो या कलेजा। पड़ोसी बुजुर्ग ने यह देखा तो उसने अपना ऑक्सीजन मास्क उतारकर फेंक दिया, उसे लगा कि इस 'प्रोग्रेसिव' हवा से बेहतर तो मौत है। लेकिन एलेक्स हवा में हाथ हिलाते हुए 'मैडम-मून' के साथ ओझल हो गया। इस कहानी का अंत पाठक को हतप्रभ छोड़ जाता है क्योंकि यहाँ कोई हारा नहीं है, बस सब 'शेयर' हो गए हैं। एलेक्स लुटा है या वह सचमुच 'ग्लोबल' होकर मुक्त हो गया है, यह फैसला अब 2050 के एल्गोरिदम ही करेंगे।</div><div><br></div><div>- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’,</div><div>(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 02 Apr 2026 17:51:07 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/love-merger-an-advanced-love-story</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[किराये का दुख (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/the-sorrow-of-rent]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>कंचनपुर गांव के चतुर सुजान 'घपलेराम' ने जब इस बार प्रधानी का चुनाव लड़ा, तो उन्होंने गांव की सबसे बड़ी और प्राकृतिक समस्या को अपना हथियार बनाया—'समय का अभाव'। घपलेराम का तर्क था कि आज का ग्रामीण इतना व्यस्त है कि उसके पास अपने रिश्तेदारों की मृत्यु पर रोने या बीमार पड़ोसी का हाल चाल पूछने तक का समय नहीं है। उन्होंने अपने घोषणापत्र में वादा किया कि जीतते ही वे गांव में 'इमोशनल आउटसोर्सिंग केंद्र' खोलेंगे। यदि आपके घर में कोई गमी हो जाए और आपको दफ्तर जाना हो, तो सरकार की ओर से 'प्रोफेशनल रोदली' भेजी जाएगी जो आपके हिस्से का विलाप ससुरारी धुन में करेगी। गांव के लोग, जो सामाजिक लोकलाज और काम के बोझ के बीच पिसे जा रहे थे, अचानक इस 'किराये की संवेदना' वाले विचार पर ऐसे रीझे कि उन्हें घपलेराम साक्षात कलयुग के श्रवण कुमार लगने लगे।</div><div><br></div><div>प्रचार के अंतिम चरण में घपलेराम ने गांव की चौपाल पर एक 'आँसू-बैंक' स्थापित किया। यह वास्तव में एक पुराना वाटर कूलर था जिस पर उन्होंने 'संवेदना संग्राहक' लिखवा दिया था। उन्होंने गांव वालों को पट्टी पढ़ाई कि जो भी व्यक्ति उन्हें वोट देने की प्रतिज्ञा करेगा, उसके जीवन के सारे 'सामाजिक कर्तव्य' यह मशीन स्वचालित रूप से निभा देगी। विपक्षी उम्मीदवार 'सीधे सादे राम' खड़ंजे और हैंडपंप की बात कर रहे थे, लेकिन जनता को तो उस भविष्य की चिंता थी जहाँ उन्हें किसी की तेहरवीं में बैठकर झूठी उदासी नहीं दिखानी पड़ेगी। घपलेराम ने कुछ भाड़े के कलाकारों को बुलाकर गांव में एक 'मॉक विलाप' करवाया, जिसे देखकर ग्रामीणों को लगा कि अब उनकी आत्मा का बोझ हल्का हो गया है। लोग अपनी मेहनत की कमाई घपलेराम के चरणों में अर्पित करने लगे ताकि उनका सामाजिक जीवन 'ऑटो-पायलट' मोड पर आ सके।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/for-heaven-hindi-satire" target="_blank">स्वर्ग के लिए (व्यंग्य)</a></h3><div>जिस दिन चुनाव का परिणाम आया और घपलेराम की प्रचंड जीत हुई, पूरा गांव अपने 'संवेदना कूपन' लेने उनके घर पहुँचा। लोग चाहते थे कि अगले हफ्ते होने वाली एक शादी और दो मुंडनों के लिए घपलेराम अपने 'प्रोफेशनल प्रतिनिधि' भेजें। घपलेराम अपनी नई सफारी गाड़ी से उतरे और सबके हाथ में एक-एक पत्थर थमाते हुए बोले— "भाइयों, संवेदनाएं आउटसोर्स नहीं होतीं, सिर्फ बेची जाती हैं!" जनता हक्की-बक्की रह गई, "हुजूर, हमारे उन प्रोफेशनल रोने वालों का क्या हुआ?" घपलेराम ने चश्मा ठीक किया और ठहाका मारकर बोले, "मूर्खों! रोने वाले तो तुम खुद हो जो अगले पांच साल तक अपनी इस बेवकूफी पर मातम मनाओगे। मैंने तो तुम्हारी भावनाओं का सौदा करके शहर में अपना 'इवेंट मैनेजमेंट' का दफ्तर खोल लिया है। अब इन पत्थरों को अपने सीने पर रखो और खुद के भाग्य पर रोना शुरू करो।" जनता सन्न खड़ी उस सूखे वाटर कूलर को देख रही थी और घपलेराम 'इमोशनल बिजनेस' की धूल उड़ाते हुए शहर की ओर उड़नछू हो गए।</div><div><br></div><div>- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’,</div><div>(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 30 Mar 2026 13:17:28 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/the-sorrow-of-rent</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[अनुशासन से आई चुस्ती (बाल कहानी)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/agility-born-of-discipline]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>शेखू को कई साल तक यह पता नहीं था कि उसका&nbsp; नाम ऐतिहासिक है। बचपन से उसे राजकुमारों की तरह एक टांग मोड़कर उस पर दूसरी टांग टिकाकर&nbsp; हाथ में दूध की बोतल पकड़कर आराम से दूध पीने की आदत रही। धीरे धीरे बड़ा हुआ तो उसकी आदतों में आलस शुमार होने लगा। स्कूल में सहपाठियों ने उसके नाम का अर्थ पूछा तो उसे पता नहीं था। उसने अपने पापा से पूछा तो बताया कि तुम्हारा नाम महान कहे जाने वाले मुगल सम्राट अकबर के बेटे सलीम के नाम पर है। सलीम को घर में प्यार से शेखू पुकारा जाता था। शेखू यह सुनकर बहुत खुश हुआ और उसके दोस्त बोले, क्या नाम है तुम्हारा वाह!&nbsp;</div><div><br></div><div>शेखू मेहनती व होशियार लड़का था। स्कूल में भाषण प्रतियोगिता होनी थी। पुरस्कारों में महंगे उपहार मिलने थे। सब विद्यार्थी उत्साहित थे। अपने अध्यापक के कहने पर शेखू ने भी प्रतियोगिता में नाम लिखवा दिया। पापा की मदद से उसने अच्छी प्रभावशाली शब्दावली वाला भाषण तैयार कर लिया। उधर दूसरे प्रतियोगी भी तैयारी में जुटे थे सबकी नज़र बढ़िया पुरस्कारों पर थी। पापा ने समझाया कि तुम अपना भाषण निश्चित समय में खत्म करने के लिए सही स्पीड से बोलना। प्रतियोगिता के दिन वह अच्छी तैयारी करकर आया था। उसके बोलने के तरीके व सही उच्चारण की सभी ने तारीफ़ की। खूब तालियाँ बटोरीं उसने पर एक गड़बड़ कर दी। भाषण धीमी रफ़्तार से दिया तभी उसे निश्चित अवधि से ज्यादा समय लग गया। मुख्य निर्णायक ने निर्णय सुनाने से पहले कहा कि शेखू की प्रस्तुति सर्वोत्तम थी उसे प्रथम पुरस्कार मिलता यदि उसने अपना बढ़िया भाषण निश्चित समय में पूरा कर लिया होता। उसे दूसरा पुरुस्कार मिला। शेखू जब घर लौटा तो उसके दिमाग में पहली बार कुछ चल रहा था। उसने मम्मी पापा को बताया तो उन्होंने अगली बार चुस्ती से प्रयास करने को प्रेरित किया।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/for-heaven-hindi-satire" target="_blank">स्वर्ग के लिए (व्यंग्य)</a></h3><div>अपने कमरे में जाकर आँखें मीचकर वह कुछ देर अकेला बैठा रहा फिर एक कागज़ पर बार बार कुछ लिखता रहा। कुछ देर बाद उसके पापा ने आकर उसे प्यार से समझाया कि यूं उदास हो जाने से कुछ नहीं होगा। घबराओ मत यह तो आपके जीवन की पहली प्रतियोगिता थी। अभी तो तुमने सैकड़ों प्रतियोगिताओं में शामिल होना है। जीवन एक प्रतियोगिता है जिसमें जीत हार तो चलती रहती है। तुम्हें अपने आप से वायदा करना है कि तुम सुस्ती छोड़ दोगे और अपने सभी प्रयास पूरी मेहनत, निश्चित समय में तत्परता से करोगे। शेखू ने नीची नज़र कर वह कागज़ पापा को थमा दिया था। जिस पर सुन्दर शब्दों में सौ बार लिखा हुआ था, पापा अब मैं सुस्ती नहीं करूंगा। उसकी आँखों में निश्चय की चमक थी वह बदल चुका था। पापा ने उसे एक घड़ी उपहार में दी और कहा यह लो कल से अलार्म लगाकर उठना और अपना वादा निभाना। अगली सुबह सचमुच अच्छी रही शेखू ने अलार्म बजते ही बिस्तर छोड़ दिया था और कुछ देर व्यायाम के बाद पढ़ने बैठ गया था। उसके जीवन में चुस्ती प्रवेश कर चुकी थी।&nbsp;</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 24 Mar 2026 18:03:05 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/agility-born-of-discipline</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[स्वर्ग के लिए (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/for-heaven-hindi-satire]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>उस अनदेखे स्वर्ग में जाने को सब लालायित हैं और जो स्वर्ग जैसी दुनिया सामने है उसे नरक बना देने की ज़िद है। बिना खुद मरे तो वहां जा नहीं सकते लेकिन कभी अपने खुद से मिलने के बाद घमंड और आत्मप्रशंसा छोड़कर ऐसे लोगों द्वारा भी स्वर्ग ही जाने की इच्छा जताई जाती है जिनके कारनामों ने पृथ्वी रुपी स्वर्ग को भी नरक बनाने में पूरा सहयोग दिया। उनके किए धरे के साथ तो नरक का वातावरण ही मेल खाता है। उनका आत्म विशवास समझाता है कि कुछ देर बात न कर, चिंतन कर, शांत रहकर ही स्वर्ग मिल सकता है। कितना आसान रास्ता है। बढ़ती उम्र के लोग तो ऐसा सोच ही सकते हैं। अनेक लोग ज़िंदगी के बाद भी संभावनाएं मानते हैं और उनके बारे अधिकार से बात करते हैं। पूजा स्थल बनवाते और मूर्तियां लगवाते हैं। पूजा पाठ, उपदेश, कथाएं और भंडारे करवाते हैं। इस माध्यम से वे दुनियावी यश अर्जित करते हैं।&nbsp; &nbsp;</div><div><br></div><div>यह कितनी बेहतर सुविधा है कि दुनिया में सभी के अपने अपने स्वर्ग और अपने अपने नरक हैं। नरक जाने से सब घबराते हैं, कोई नहीं जाना चाहता। जिन लोगों के पास ताक़त का भंडार है और जेब में पैसा वे तो दुनिया में जीते जी अमर होना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि यहीं पर स्वर्ग का अनुभव लिया जाए। वे अपनी अमरता की चाह में बंधे, स्मारक जैसी ईमारतों में खूबसूरत मेहराबें बनवाते हैं, छतों पर फानूस लटकवाते हैं। संगमरमर के ऊंचे विशाल द्वार सजाते हैं। अपने चेहरे वाले सिक्के चलवाते हैं। उन्हें लगता है मानो स्वर्ग का रास्ता तैयार करवाते हैं।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/real-pollution-and-fake-intelligence" target="_blank">असली प्रदूषण और नकली बुद्धि (व्यंग्य)</a></h3><div>इस रास्ते के अड़ोस पड़ोस में स्थित जंगल भी उनका निजी ही होता है। वहां की हरियाली पर उनका अधिकार होता है। वहां वे सदनाम के कई प्रयोग करते हैं। युद्ध करवाने के लिए शांति में डूबी योजनाएं रचवाते हैं। चरित्रहीन, भ्रष्टाचारी, असामाजिक, धोखेबाज़ सभी को माफ़ कर अपने साथ रख्रते हैं क्यूंकि वे भी स्वर्ग ही जाना चाहते हैं। उन सबको नरक शब्द से नफरत होती है हालांकि उन्होंने धरती नामक स्वर्ग में नरक ही जिया होता है। स्वर्ग को अपना भविष्य मानते हुए शायद वे पाप कहे जाने वाले अपने कृत्यों पर पछताते हैं।</div><div>&nbsp;&nbsp;</div><div>सार्वजनिक स्तर पर उनके पछताने की ज़रूरत नहीं होती क्यूंकि उनकी तो ईश्वर से सीधे डील करने की तमन्ना होती है। उन्हें पता होता है कि ईश्वर के साथ न तो झगड़ा कर सकते हैं न उन्हें धमका सकते हैं और न ही उन पर हमला करवा सकते हैं। वे सबसे मानवीय और सुरक्षित यही तरीका अपनाते हैं कि खुद को धामिक बताएं, पूजास्थल बनवाएं। पूजास्थल जाकर, पूजा पाठ करवाकर, दान देकर भगवान् से कभी माफी नहीं मांगते बलिक आशीर्वाद लेकर आते हैं। सोशल मीडिया और अखबारों में छपवाते हैं कि पूजास्थल जाकर आशीर्वाद लिया। उनके परिवार वाले भी उन्हें पूरा सहयोग करते हैं। यह उनका नैतिक कर्तव्य होता है।&nbsp; &nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>किसी दूसरे को लगे न लगे, अपने आप यह महसूस कर लें कि जीवन जीते समय, स्वर्गिक अनुभव और भविष्य में स्वर्ग प्राप्त करने के लिए अच्छा काम किया जा रहा है। कोई माने न माने, स्वर्ग के लिए कुछ करना अच्छा काम ही है।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 21 Mar 2026 16:54:28 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/for-heaven-hindi-satire</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[असली प्रदूषण और नकली बुद्धि (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/real-pollution-and-fake-intelligence]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>असली चीजों और भावनाओं के आराम के दिन आ गए हैं। ऐसे अच्छे दिन पहले आ गए होते तो कई तरह की बचत हो जाती। चलो कोई बात नहीं, देर आए दरुस्त आए। यह तो दिल और दिमाग से महसूस किए जाने वाले सम्मान की बात है कि पुराना जिद्दी प्रदूषण कम करने के लिए नई बुद्धि, नए रास्ते खोज रही है। कृत्रिम बुद्धि का भावार्थ ही नई बुद्धि लिया जा रहा है।&nbsp;</div><div><br></div><div>अब यह सवाल खिल उठा है कि जब प्राचीन बुद्धि, प्रदूषण को उचित तरीके से निबटाने में फेल हो गई तो नकली क्या करेगी। हो सकता है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, इंटेलिजेंट आर्टिस्ट की तरह महसूस करवाए और एयर क्वालिटी इंटेलिजेंस और प्रदूषण नियंत्रण के समाधानों को लागू करवा दे। बेचारी असली नैसर्गिक इंसानी बुद्धि को, अपने ही फैलाए प्रदूषण से परेशान होते ज़माना हो गया । दूसरा कोई स्वादिष्ट सामाजिक चारा नहीं बचा जिसे खाकर नया ज्ञान प्राप्त किया जाए और प्रदूषण को थाम लिया जाए।&nbsp; इसलिए इस संभावना को स्वीकार करना होगा कि कृत्रिम बुद्धि, असली प्रदूषण को अवश्य काबू में कर कर छोड़ेगी।&nbsp;&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/characteristics-of-high-level-politics" target="_blank">उच्च स्तरीय राजनीति की विशेषताएं (व्यंग्य)</a></h3><div>अधिकांश बुद्धिजीवियों, अबुद्धिजीवियों, समाज सेवियों, असमाज सेवियों, राजनीतिक नेताओं, राजनीतिक अभिनेताओं, पर्यावरण विद्वानों और पर्यावरण चर्चा और खर्चा से सामाजिक महत्त्व प्राप्त करने वाले महानुभावों को स्पष्ट रूप से पता है कि इंसानी दिमाग में पकाए तौर तरीके, सरकारी उपाय, सख्त अनुशासन, ईमानदार और पारदर्शी प्रयास वगैरा सब बुरी तरह थककर, आराम घर में घुस गए हैं। असली बुद्धि असफल हो जाए तो ज़ाहिर है नकली बुद्धि का ही सहारा लेना पड़ेगा। अब उसके परिणामों और फायदों का मज़ा लेने का मौसम आया है। असली बुद्धि की नदी से निकले जानदार, ताक़तवर, शानदार और समझदार उपायों के चमकीले पत्थर तो कब से प्रयोग हो रहे हैं।&nbsp; &nbsp;</div><div><br></div><div>ज़िंदगी में तो कब से दर्जनों नकली चीज़ों की बहार है। इसलिए भी मान सकते हैं कि नकली बुद्धि, असली से बेहतर काम करेगी। प्रदूषण का रियल टाइम डाटा उपलब्ध कराएगी। स्रोतों की सटीक पहचान करेगी जिससे उन जगहों की सूक्ष्म स्तर पर पहचान हो पाए। फिर उसके प्रभाव का वैज्ञानिक आकलन आसान हो सकेगा और लक्ष्य आधारित और समयबद्ध कार्रवाई सुझाई जा सकेगी। वास्तविक और व्यावहारिक कार्रवाई तो इंसानजी ही करेंगे या करवाएंगे जिसमें वह पूरी तरह माहिर हैं।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>इतिहास झूठ बोलता है कि सरकारी एजेंसियां कभी समन्वय आधारित कार्रवाई नहीं कर पाती। यह तो हमारी स्थापित लोकतान्त्रिक, चारित्रिक और सांस्कृतिक परम्परा है कि नए प्रयोगों को आत्मसात किया जाए। अब उसी योजना के तहत नकली बुद्धि आधारित मॉडल से पूछेंगे&nbsp; कि नगर निगम, जिला प्रशासन, प्रवर्तन एजेंसियां, तकनीकी संस्थान और इंसान ने नैसर्गिक बुद्धि का प्रयोग कर, उचित&nbsp; प्लेटफार्म पर काम का अभिनय और वास्तविक अमल कितना किया। दिलचस्प है कृत्रिम बुद्धि सभी संस्थाओं की ज़िम्मेदारी तय करेगी और सदियों से इंसानी दिमाग में रह रही अक्ल उसे आदेश मानकर संभवत कार्रवाई भी करेगी। यह कुछ अमानवीय सा कार्य होगा।&nbsp;&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div>‘संभव’ शब्द ज़िंदगी में आ ही जाता है। जब महाभारत में अनेक किंतु, परन्तु और कदाचित वगैरा आ सकते हैं तो भारत में भी आ ही सकते हैं। अलग अलग मोर्चों पर कार्रवाई करना वास्तव में मुश्किल होता है, शक्ति विभाजित हो जाती है। इसलिए अब एक साथ, बहुत ज़्यादा असली, प्रभाव पैदा करने वाली सख्त, कृत्रिम कार्रवाई की जा रही है। प्रदूषण फैलाने वाले, असली, चालाक और स्वार्थी बुद्धि वालों की नींद उड़ गई है। ऐसा अभी माना जा रहा है लेकिन सिर्फ माने जाने से क्या होता है जी । अभी तो असली बुद्धि और भावनाओं के आराम के दिन शुरू हुए हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 18 Mar 2026 10:39:04 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/real-pollution-and-fake-intelligence</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[उच्च स्तरीय राजनीति की विशेषताएं (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/characteristics-of-high-level-politics]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>कुछ क्षेत्रों, व्यक्तियों और चीजों की विशेषताएं सभी को पता होती हैं लेकिन कुछ दिन बाद फिर से कोई बता दे तो तरोताज़ा होती रहती हैं। राजनीति क्षेत्र में भी ऐसी परम्परा है। राजनीति ज़िंदगी को हर तरफ फूल सजे मतभेदों का मैदान बनाए रखती है जहां बड़े से लेकर छोटे राजनेता अलग अलग खेल खेलते रहते हैं। विरोधी के खिलाफ ज़बानी तीर चलाते समय मर्यादा तोड़ना ही असली खेल माना जाता है। इन्हीं यशस्वी खिलाड़ियों दवारा रैलियों में आपत्तिजनक वैमनस्य फैलाते अपशब्दों के जलते भूनते मसाले में पकाए नारे लगाना ज़रूरी होता है तभी शारीरिक जोश बना रहता है। दूसरे के पद की गरिमा भूलने से पहले, अपनी गरिमा भूल जानी चाहिए ताकि दूसरे के पद की गरिमा भूल जाना आसान हो जाए और शालीनता भाग जाए। इस सन्दर्भ में भाषाई मर्यादा की दीवार तोडनी पड़ती है। इसका राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक फायदा यह है कि समाज पर कई तरह का असर पड़ता है। इसे हम कुअसर या सुअसर नहीं कह सकते क्यूंकि समाज बहुत सभ्य और समझदार होता जा रहा है।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>कई बार होता है, टिप्पणी की जाती है जो काफी सख्त किस्म की होती है फिर कहा जाता है कि संवैधानिक पदों पर विराजे नेताओं के बारे बेहतर भाषा का प्रयोग करना चाहिए जिसमें शाब्दिक मर्यादा हो। इस बात का भी असर होना ही चाहिए। लेकिन चूंकि उम्दा राजनीति की चारित्रिक विशेषता के अंतर्गत किसी भी रंग और आकार के शब्दों का असर नहीं लेना चाहिए, इसलिए नहीं लिया जाता। वह बात दीगर है कि संवैधानिक पदों पर विराजे नेताओं के मुखमंडल द्वारा, सामान्य नेताओं, विपक्ष या आम आदमी बारे प्रयोग की जाने वाली भाषा बारे कोई नर्म बात तो नहीं की जाती।&nbsp; कहते तो हैं कि इस वजह से सवैंधानिक संस्थाओं का सम्मान हिलने लगता है। कई बार गिर भी जाता है लेकिन अधिकांश नेता तो सम्मान को सामान ही समझते हैं। विरोध के अधिकार को तो वैसे भी सुरक्षित माना जाता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/it-should-be-like-this-and-like-that" target="_blank">ऐसा और वैसा होना चाहिए (व्यंग्य)</a></h3><div>उच्च स्तरीय राजनीतिक परिदृश्य में हंगामे, नारेबाज़ी और हुल्लड़ के सहारे कहीं का भी नजारा बदल दिया जाता है। कहीं और का मामला कहीं दूसरी जगह लाया जाता है। दुनिया की बेहद महत्त्वपूर्ण चीज़, ‘माफी’ मांगने के लिए कहा जाता है। ऐसा लगता है माफी न होकर स्वादिष्ट चाट हो जिसके खाने से गुस्सा मानसिक संतुष्टि में बदल जाएगा। इस मनोरंजक गतिरोध के दौरान कई अहम राजनीतिक परेशानियां इक्कठी होकर कॉकटेल पार्टी करती हैं। उन्हें लगता है कहीं उनका समाधान निकाल लिया गया तो ऐसा मौका कम होता जाएगा।</div><div><br></div><div>आक्रामकता के झंडे हिलाते हुए पक्ष और विपक्ष दोनों को, बेचारा वक़्त हाथ जोड़कर समझाता रहता है। मगर उसकी कौन सुनता है। राजनेता उससे पूछते हैं, तुम कौन हो जो हमें समझाने की हिमाकत कर रहे हो। बेशर्मी बार बार ठहाका लगाकर हंसती है, जिस तरह सिर्फ पैसा कमाने के लिए बनाई कमर्शियल फिल्म में नर्तकी, आइटम डांस में फूहड़ तरीके से मुस्कुराकर शरीर प्रदर्शन करती है।</div><div><br></div><div>राजनीति का व्यवसाय तो चलता ही रहता है। बीच बीच में गधों और खच्चरों को घोड़ा बनाकर पशु व्यापार भी कर लिया जाता है जिससे दूसरे जानवर भी बहुत खुश रहते हैं। उन्हें लगता है कभी न कभी उनका नंबर भी ज़रूर आएगा। राजनीति के मोहल्ले में आशा ही जीवन होता है।&nbsp; &nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 16 Mar 2026 19:41:48 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/characteristics-of-high-level-politics</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[ऐसा और वैसा होना चाहिए (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/it-should-be-like-this-and-like-that]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>प्रसिद्ध होना सबके लिए आसान नहीं है लेकिन आजकल अनगिनत लोग इसी कोशिश में लगे रहते हैं कि कुछ न कुछ ऐसा कर सकें या उनकी ज़िंदगी में कुछ इतना बढ़िया हो जाए कि मशहूर हो जाएं। चाहे समाज में व्यावहारिक स्तर पर न सही लेकिन सोशल मीडिया पर ही ज्यादा से ज़्यादा लाइक्स मिल जाएं और प्रसिद्ध हो जाएं। प्रसिद्धि के बहाने कम या ज़्यादा पैसा भी कमा लिया जाए तो सोने पर सुहागा लेकिन इस चक्कर में कई बार, ऐसा ही नहीं वैसा भी कर बैठते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>एक बार किसी भी तरह की मेहनत कर प्रसिद्ध हो जाओ और दौलत भी कमा लो तो, समाज तो क्या असमाज में भी पूछ होने लगती है। कई तरह के पत्रकार, वीडियो पकाने और बनाने वाले आपके घने मित्र बने रहते हैं। प्रसिद्धि और दौलत के नए मालिकों बारे दूसरों को बताकर खुद भी कुछ न कुछ कमाने का जुगाड़ करते रहते हैं। एक बार मिली ज़िंदगी में, पैसे के रास्ते पर चलकर आराम और सुविधाएं आ जाएं तो पहनावे और बालों का रंग तो करवट बदलता ही है बात करने के विषय भी बदल जाते हैं। ज़बान का लहज़ा बदल जाता है। नई शैली में असंभव बातें करना भी संभव हो जाता है। चारों तरफ, आठों पहर उपदेशों के फूल खिले रहते हैं।&nbsp;&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/celebrations-on-holi" target="_blank">होली पर आयोजन (व्यंग्य)</a></h3><div>प्रसिद्ध चेहरे क्या क्या कहते और कह सकते हैं यह देखने, सुनने और और पढ़ने से पता चलता है। जिस व्यक्ति ने कभी एक पौधा न लगाया वे कहते हैं, हमेशा पर्यावरण का सम्मान करें। हमारे सभ्य और विकासशील समाज के जेन जी को गलत आदतों और भेदभाव से दूर रहना चाहिए क्यूंकि देश का भविष्य जीडीपी की ग्रोथ और समृद्धि उन पर टिकी है। डरपोक और सुस्त लेकिन अब प्रसिद्ध हुआ चेहरा जिसने कभी फुटबाल में एक किक नहीं लगाई, फ़रमाएगा कि हमें खेलों में और बेहतर करना चाहिए। खेल का स्तर उठाना चाहिए। वे सुझाव देंगे कि हमें सुरक्षा क्षेत्र में अविजित बनने के अतिरिक्त, सॉफ्ट सुपर पॉवर भी बनना चाहिए। लगे हाथ वे सामाजिक और नैतिक उपदेश भी उपहार में देंगे।&nbsp;</div><div><br></div><div>किसी समय मारधाड़ विशेषज्ञ, मोहल्ले के दादा, अब राजनीति में धाक जमाती प्रसिद्ध ज़बान बोलेगी, आशा है हम नदियों की उपयोगिता समझेंगे। हमारे देश की सभी नदियां और हवाएं शुद्ध रहनी चाहिएं। इसके लिए हमें हाथ मिलाकर काम करना चाहिए। देश और दुनिया में शांति, सहिष्णुता और इंसानियत को प्राथमिकता मिले इसलिए हम सब बेहतर इंसान बनने की कोशिश करें और दूसरों को भी प्रेरित करें। शारीरिक रूप से कमज़ोर व्यक्ति भी नाम कमा सकता है। ऐसे ही प्रसिद्ध हुए कमज़ोर से व्यक्ति ने कहा, सेहत ही असली दौलत है। हम सभी को तनाव से दूर रहना चाहिए फिट रहने के लिए जिम में घंटो पसीना बहाना ज़रूरी नहीं, माइंड सेट ताक़तवर होना चाहिए। प्रसिद्ध वनकाटू जो भविष्य में सफल राजनीतिज्ञ हो गए, ने सख्ती से कहा, पर्यावरण के लिए सचमुच गंभीर होने की ज़रूरत है। इसे संभालने कोई और नहीं आएगा।&nbsp; स्वच्छ हवा पानी की सभी को ज़रूरत है। खुद पर भरोसा करना ज़रूरी है ताकि प्रदूषण न झेलना पड़े। अपनी बात में उन्होंने यह भी जोड़ दिया कि हमारे विकसित समाज में महिला अपराधों को लेकर जीरो टॉलरेंस होना चाहिए। सभी ने समझाया कि ऐसा या वैसा होना चाहिए।&nbsp; &nbsp;</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 11 Mar 2026 19:15:58 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/it-should-be-like-this-and-like-that</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[सशक्तीकरण- धूमिल अस्तित्व का (कविता)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/poem-on-international-women-day-2026]]></guid>
      <description><![CDATA[<div><span style="font-size: 1rem;">आज फिर से आ गया है आठ मार्च -अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस बस एक दिन के लिए अपनी पहचान दर्ज कराने।</span></div><div>नारी अस्तित्व और उपलब्धियों का गुणगान करने ।</div><div>कल ये चला जाएगा और 364 दिन लंबी नींद सो जाएगा ।</div><div>आज के खास दिन महिला सशक्तीकरण पर बड़ी - बड़ी सभाओं का आयोजन किया जाएगा ।</div><div>नारी के उत्थान, विकास, सम्मान, अधिकार, आजादी और समानता दिलाने पर बल दिया जाएगा।</div><div>बातें होंगी सबको साथ लेकर चलने की।</div><div>जादुई छड़ी से अचानक सब कुछ बदलने की।</div><div>कोई नहीं पढ़ पाएगा इन सब से अनभिज्ञ सुदूर क्षेत्रों में बसी&nbsp; नारी का अंतर्मन।</div><div>जो नहीं जानती आज उसी के नाम पर मनाया जा रहा है जश्न। उसे सिखाया गया है मौन रहकर सब कुछ सहना।</div><div>घुटन,दर्द ,आंसुओं के साथ किस्मत के भरोसे रहना ।</div><div>उनकी बेड़ियों को कौन तोड़ेगा, किसका कर रहे हैं हम इंतजार?</div><div>जाना होगा उनके दिलों तक कराना होगा उनसे उनकी काबिलियत का साक्षात्कार ।</div><div>आसमान से नीचे उतर धरातल पर उन्हें साथ लेकर चलना है।</div><div>सदियों से चली आ रही&nbsp;</div><div>सड़ी- गली सोच को बदलना है</div><div>देना हैं हौंसला, भरना है मनो में उनके विश्वास।</div><div>आधी आबादी का ये धूमिल अस्तित्व समाज&nbsp; निर्माण के लिए है बहुत खास ।</div><div>ये शुभ दिन ये त्यौहार।</div><div>जो दिनों से बढ़कर महीनों ,सालों और युगों तक जाएगा ।</div><div>कैलेंडर की हर तारीख पर अपनी पहचान दर्ज कराएगा।</div><div>तभी सही मायनों में महिला सशक्तीकरण हो पाएगा ।&nbsp;</div><div>तभी सही मायनों में महिला सशक्तीकरण हो पाएगा।</div><div><br></div><div>- निर्देश त्यागी</div>]]></description>
      <pubDate>Sun, 08 Mar 2026 10:24:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/poem-on-international-women-day-2026</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[होली पर आयोजन (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/celebrations-on-holi]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>होली के अवसर पर मुझे भगवान के ऐसे कीर्तन में शामिल होना बहुत अच्छा लगता है जिसमें प्रसिद्ध हिट फिल्मी धुनों पर ठुमकते, कीर्तन मंडली के सजे धजे नायक ‘कृष्ण’ बांसुरी मुंह से छुआए क्रम से सबके पास आकर फूलों से बना रंग लगाते हैं और भेंट में नकद रुपए लेकर उठते हैं और पुनः नर्तन करने लगते हैं। ऐसे कार्यक्रम से व्यक्ति धार्मिक, आध्यात्मिक, उत्सवधर्मी&nbsp; हृदय महसूस करता है। मन बहुत अधिक भावना विभोर हो उठता है। आभास होने लगता है, होली पर अगर भगवान् कृष्ण किसी रूप में आ जाएं तो छोटा सा कार्यक्रम भी महा प्रसिद्ध आयोजन में बदल सकता है।</div><div><br></div><div>इस संभावित आयोजन की पोस्ट मैंने फेसबुक पर डाल दी तो लाईक करने वाले समझदारों ने और्गैनिक रंग अग्रिम डालने शुरू कर दिए। पिचकारियों में, हाथ से बाल्टी भर रंग फेंकना शुरू कर दिया। कल्पनाशील मित्रों ने आग्रह दिया कि होली के मौका पर रंगभरा रास भी आयोजित किया जाए। इस आयोजन के लिए साथी साथ लाने का वायदा भी किया जाने लगा। रास रचाने के लिए आतुर गोपियों के प्रस्ताव आने लगे यह प्रशंसा करते हुए कि भगवान कृष्ण के प्रिय नृत्य रास के रस के बिना होली कैसे मनाई जा सकती है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/pothole-repair" target="_blank">गड्ढों की मरम्मत (व्यंग्य)</a></h3><div>हमारे एक पुराने दोस्त बांसुरी बजाते और आजकल डीजे भी चलाते हैं उन्होंने हमें फोन कर अधिकार से कहा, प्यारे धर्म का काम कर रहा है, चिंता न करो बांसुरी भी बजा देंगे और डीजे पर भक्तों को नचा भी देंगे। हमें लगा क्या मैं ऐसा धार्मिक जुलूस जैसा कार्यक्रम आयोजित करने जा रहा हूँ जिसमें युवा विद्यार्थियों को भांग का घोटा पिलाकर, दो केले खिलाकर, डीजे की धुन पर फिल्मी धुन वाले भजनों पर सड़क पर कई घंटे नचाया जा सकता है। कुछ शुभचिंतकों&nbsp; ने सलाह दी कि किसी की व्यवसायिक सेवाएं ली जाएं तो आयोजन का रंग निखर उठेगा और भगवान अति प्रसन्न हो जाएंगे। खूब सारी आमदनी होनी भी सुनिश्चित होगी। हमारे मन और तन से टेसू के फूल, केवड़े की मादक सुगंध, कोयल की कूक, आम के बौर और पुरानी गोपियां भी बाहर आने लगे थे।&nbsp;</div><div><br></div><div>एक ख़ास बात, उस रात जब कृष्ण स्वप्न में आए तो वे आकर्षक स्वप्निल वस्त्रों में रहे लेकिन बांसुरी नहीं बजा रहे थे। उनके पांव के नीचे घास हरी मुलायम न होकर उदासी के रंग में लिपटी थी जिसमें तीखे कांटे भी थे। उनमें से कुछ कांटे उनके पांवों को घायल कर चुके थे और कुछ कांटे उनके हृदय की तरफ बढ़ रहे थे, उनकी पसंदीदा दर्जनों गाएं उनसे दूर मुंह छिपाए खड़ी थी। खास बात यह कि उनके सिर से मोर का पंख गायब था। हमने जैसे ही उनसे बात करने का निवेदन किया, ख्वाब बिखर गया।</div><div><br></div><div>सुबह होने पर इससे पहले कि पत्नी को स्वप्न बारे बताते उन्होंने खुश होकर बताया, इस बार महा सामाजिक क्लब वालों ने एआई द्वारा निर्मित गोपियों और कृष्ण का भव्य रास कार्यक्रम आयोजित किया है। टिकट ऑनलाइन मिल रहे हैं, मैंने रात को ही बुक कर लिए हैं। उसी शो में प्रसिद्ध बांसुरी वादक ‘राग चैन’ प्रस्तुत करेंगे और वास्तविक रंगों से होली भी खेली जाएगी ताकि परम्परा जारी रहे। ऐसे आध्यात्मिक आयोजन में जाने से कौन इनकार कर सकता था।&nbsp; &nbsp;</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 03 Mar 2026 18:26:53 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/celebrations-on-holi</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[गड्ढों की मरम्मत (व्यंग्य)]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/pothole-repair]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बरसात की पारम्परिक गलती के कारण सड़क पर नए गड्ढे बन गए थे, पुराने गड्ढे बड़े और&nbsp; जिन गड्ढों में रोड़े और मिटटी भरी थी निकल गई थी । गड्ढों की लम्बाई, चौड़ाई व गहराई बढ़ती ही गई । कई गड्ढे अब खड्डों की तरह दिखते थे । इतने गड्ढे हो गए, लगता सड़क के साथ भीषण दुर्घटना हुई जिससे बेचारी के शरीर पर दर्जनों जख्म हो गए हों&nbsp; । दोपहिया वाहन चालकों और पैदल चलने वालों को अब तक मुसीबतें झेलनी पड़ रही हैं ।&nbsp; अनहोनी घटना कभी भी घट सकती है।&nbsp;</div><div><br></div><div>कई जागरूक लोगों ने म्यूनिसिपल कमेटी में फोन किया, पार्षद, सचिव, प्रधान को कहा, पीडब्ल्यूडी के जेई से निवेदन किया लेकिन गड्ढों को ठीक करने के लिए संबंधित विभाग कोई माकूल कदम नहीं उठा पाया । गड्ढों के सुप्त मामले में शासन और प्रशासन के तभी जागने की परम्परा है, जब बड़ी कुर्सी पर बैठने वाला और ऊंची गाडी में सफ़र करने वाले महान व्यक्ति को जानदार गड्ढा बुरी तरह से हिला दे । इस सुघटना के बहाने उन्हें पैदल चलने वाले या आम यात्रियों की परेशानियां भी याद आ जाती हैं । फिर गड्ढों की मरम्मत का आकलन&nbsp; सोच विचार, समझकर बनाया जाता है। नेता, अफसर व ठेकेदार को इसके लाभ पता होते हैं । बरसात से पहले ही सड़क की मरम्मत करवाकर&nbsp; भुगतान करने की स्थापित सांस्कृतिक आर्थिक परम्परा भी है ।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/satire-on-minimalism" target="_blank">मिनिमलिज्म (व्यंग्य)</a></h3><div>इस बार की महत्त्वपूर्ण बैठक में सड़कों की गुणवत्ता सुधारने और पैच वर्क को अधिक टिकाऊ बनाने के लिए, सख्त नियमावली का प्रारूप बनाया गया जो राष्ट्रीय मानकों पर आधारित रहा&nbsp; । ऐसा लगा अब एक भी गड्ढा बिना उच्च कोटि की मरम्मत किए बिना नहीं छोड़ा जाएगा। मरम्मत वाले क्षेत्र को वर्गाकार या आयताकार आकार में काटना ज़रूरी होगा, जिसमें सभी किनारे नब्बे डिग्री पर होने चाहिएं।&nbsp; गड्ढे में से धूल हटाने के लिए बढ़िया एयर ब्लोअर का प्रयोग करना होगा। गड्ढे के तल और दीवारों पर बिटुमेन इमल्शन की पतली परत लगाना ज़रूरी है ताकि नई सामग्री मजबूती से चिपक सके।&nbsp;</div><div><br></div><div>यदि गड्ढा तीन या पांच इंच से ज़्यादा गहरा है तो भरने के बाद मशीन&nbsp; से दबाया जाएगा । पैच का स्तर सड़क से तीन एमएम ऊंचा रखा जाएगा ताकि वहां पानी, धूल और मिटटी प्रवेश न कर सके। अब खड्डे की मरम्मत से पहले, मरम्मत के दौरान और मरम्मत के बाद, सम्बंधित अधिकारी के साथ रंगीन फोटो ली जाएगी। इस तरह गड्ढों का नाम मरम्मत के इतिहास में सचित्र दर्ज हो जाएगा। दो वर्ष के भीतर अगर उसी स्थान पर दोबारा गड्ढा हुआ तो मरम्मत को विफल माना जाएगा । फिर समझदार लोगों की कमेटी बिठाकर, कारणों की गहन जांच की जाएगी, जिसके तहत जवाबदेही भी तय की जा सकती है।</div><div><br></div><div>इस नई योजना बनाए जाने के सुअवसर पर पत्रकारों को मौक़ा पर ही चाय पान और समोसा खान के लिए बुलाया गया। सूचित किया गया कि अब गड्ढों की किस्मत बदलने वाली है। सामने दिख रहे गड्ढे खुश दिख रहे थे। उन्हें पता था मरम्मत जल्दी हो न हो लेकिन आने वाले दिनों में अखबारों में उनकी फोटो छपेगी, सोशल मीडिया पर रीलें घूमेंगी और उन्हें भी कमेंट्स मिलेंगे।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div>यह कमाल की व्यवस्था की जा रही है। वास्तव में उच्च कोटि का प्रशासनिक इंतजाम किया जा रहा है। वहां से गुज़र रहे इंसान सोचेंगे ज़रूर, कि हम से बेहतर मरम्मत तो गड्ढों की होने जा&nbsp; रही है।&nbsp; &nbsp; &nbsp;</div><div><br></div><div>- संतोष उत्सुक</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 28 Feb 2026 19:22:15 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/literaturearticles/pothole-repair</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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