जांच तो होनी चाहिए (व्यंग्य)

जांच किया जाना अच्छी बात है इसलिए तो जांच के निर्णय का स्वागत किया जाता है। यह बात दीगर है कि जांच होने के बाद निकलता क्या है। यह ठीक वैसा ही है कि गर्भ की जांच नहीं की जाती, डिलीवरी के बाद ही राज़ खुलता है। हालांकि अभिभावक मन्नतें मानते रहते हैं कि किसी तरह लड़का ही पैदा हो लेकिन हर तरह से लडकी ही पैदा हो जाती है।
गहन जांच का सख्त हुक्म होता है तो उसमें किसी तरह की राजनीति हो नहीं सकती क्यूंकि जांच के गर्भ में महत्त्वपूर्ण फैसला छिपा होता है। जांच के आदेश में जन भावना का सम्मान दिखता है। यह तो जांच होने के बाद ही पता चलता है कि जांच में क्या निकला और क्या नहीं निकला। कुछ को लगेगा जांच में यह नहीं निकला, वह तो बिलकुल नहीं निकलना चाहिए था। विद्वान व्यक्ति बता दिया करते हैं कि फलां जांच में कुछ ऐसा निकलना चाहिए था। समझदार लोगों का मत होता है कि जांच के आदेश से विपक्ष के झूठ और भ्रम पर रोक लगनी शुरू हो जाती है। उनके अनुसार राजपक्ष से सम्बंधित, मुश्किल से चुनाव जीत कर आए नेताओं को बदनाम करना शुरू हो गया था इसलिए जांच बिठानी पड़ी। बदनामी को दुर्भाग्यपूर्ण माना जाता है और जांच शुरू होने को शुभ मानते हुए कहा जाता है कि जांच जैसे पवित्र कार्य से सचाईजी, पूरी तरह सुसज्जित होकर सबके सामने खड़ी हो जाएंगी।
जांच किया जाना अच्छी बात है इसलिए तो जांच के निर्णय का स्वागत किया जाता है। यह बात दीगर है कि जांच होने के बाद निकलता क्या है। यह ठीक वैसा ही है कि गर्भ की जांच नहीं की जाती, डिलीवरी के बाद ही राज़ खुलता है। हालांकि अभिभावक मन्नतें मानते रहते हैं कि किसी तरह लड़का ही पैदा हो लेकिन हर तरह से लडकी ही पैदा हो जाती है। उस तरह की जांच के आदेश मात्र से एंटी सोशल मीडिया पर छाए तमाम वीडियो और दूसरे सामाजिक मंचों से फ़ैल रहे भ्रम और अराजकता का जो माहौल खड़ा किया जा रहा होता है उसका निर्माण गैर कानूनी ईमारत के निर्माण की तरह रुक जाता है। जांच उचित तरह से हो जाए तो जनता को बरगलाने वाले कुछ समय के लिए तो बेनकाब हो जाते हैं, क्या कहा करते हैं कि दूध का दूध पानी का पानी हो जाता है।
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दिलचस्प यह है कि आजकल निरंतर प्रथम पुरस्कार प्राप्त करने वाले, बड़े आकार के शहरों का पानी भी महादूषित और जानलेवा होने लगा है जिसकी जांच भी करने लायक है। दूध तो इतना उपलब्ध है जितने पशु नहीं हैं। अगर ऐसे मामलों में जांच घोषित हो तो जनता अपनी जीत समझ लेगी और मस्त रहेगी । वह बात अलग है कि जांच कई साल पकाने के बाद परिणाम का हलवा उन्हें स्वादिष्ट नहीं लगेगा। जांच करने वालों की विश्वसनीयता, ईमानदारी, पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं लेकिन क्या फ़र्क पड़ता है सवाल उठाए जाएं या बिठा दिए जाएं। असली बात तो जवाबों में होती है। किसी ने लिखा भी है, जवाब जिनका नहीं वो सवाल होते हैं।
आम जनता तो सवालों से ही खुश हो जाती है। कुछ ख़ास लोग जांच के परिणामों का इंतज़ार करते रहते हैं। सवालों के न दिए जा सकने वाले जवाब चाहते रहते हैं। ख़ास सवाल जब जांच में फंस जाएं तो जवाबों के रंग ढंग सब बदल जाते हैं। जांच करने वाले भी सोचते तो होंगे कि कैसे कैसे संगीन मामलों की जांच को, बेचारी कर देना पड़ता है। जांच का फैसला दर्जनों पृष्ठ का होता है लेकिन दोषी परेशान नहीं दिखते। यही तो जांच की अच्छी बात होती है।
- संतोष उत्सुक
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