त्यौहार में बाज़ार (व्यंग्य)

बाज़ार में जैसा चाहो, ज़रूरत के कद के मुताबिक़ चीज़ हाज़िर है। एक दम भुगतान नहीं कर सकते तो सप्रेम किश्तें पेश हैं। कोई ब्याज नहीं। बाज़ार में त्यौहार पहुंच जाए तो विक्रेता आपसी सदभाव, त्याग, मुस्कुराना और प्रेम सिखाता है। कितने ही घरों में एक दूसरे का स्वागत करना सिखाता है।
बाज़ार जोर से हंसता है, खूब अट्टहास करता है। लोहड़ी आयोजित हो चुकी, चीनी मांझे ने पतंगे और उड़ाने वाले काटे। अब होली आ रही है, खूब बिकेगा चीनी रंग। दिवाली पर भी तो उनकी लड़ियों ने खूब रोशनी की। उनसे सस्ता कौन बेच सकता है। अब तो हमने आदत डाल ली है, इस्तेमाल करो और फेंको। हमारे यहां तो इंसान को भी इस्तेमाल किया जा रहा है। त्योहार हो और उपहार न हो, हो नहीं सकता। कई दिन पहले ही शुरू हो जाते हैं। सभी महत्त्वपूर्ण कुर्सियों पर उपहार रखना ज़रूरी होता है ताकि गुस्ताखियां माफ़ होती रहें। बात किसी देश के खिलाफ भी हो तो क्या फर्क पड़ता है। सबसे सुन्दर और बिकाऊ चीजें तो वही बनाते हैं। वही तो बाज़ार में विराजकर सब को प्रेम की डोर में बांधती हैं। बाज़ार बसाने, जमाने और चलाने वाले, प्रेम और सद्भाव फैलाकर इंसानी इच्छाएं पूरी करने में खूब मदद करते हैं।
बाज़ार में जैसा चाहो, ज़रूरत के कद के मुताबिक़ चीज़ हाज़िर है। एक दम भुगतान नहीं कर सकते तो सप्रेम किश्तें पेश हैं। कोई ब्याज नहीं। बाज़ार में त्यौहार पहुंच जाए तो विक्रेता आपसी सदभाव, त्याग, मुस्कुराना और प्रेम सिखाता है। कितने ही घरों में एक दूसरे का स्वागत करना सिखाता है। ऊपरवाले के पदचिन्हों पर चलकर उनकी शिक्षाओं को ग्रहण करने की प्रेरणा दी जाती है, लेकिन परम्परा और संस्कृति थोड़ा परेशान हो जाती है। हालांकि सोना तो क्या चांदी खरीदना भी, बिगड़ते पर्यावरण में बारिश न होने की तरह हो गया है। एक बार मिली ज़िंदगी की इच्छाओं को किश्तें लुभाने लगती हैं। इस बदले हुए वातावरण में जेब की नहीं, बड़े दिल के खुलेपन की चलती है। दिल की सुनने में तो हम माहिर हैं ही।
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बाज़ार और विज्ञापन दोनों, हाथ में हाथ डालकर काफी हद तक नंगे और फूहड़ होकर, फ़िल्मी आइटम नंबर की तरह नाचते हैं। दिमाग में घुसकर उकसाते हैं। जो नागरिक सम्मानित उपभोक्ता बनने लायक है ऑनलाइन बिक्री ने उसे बनाकर रख दिया है। गांव की गलियों में भी, कहीं भी प्रयोग किए जाने वाले नए उत्पाद आकर्षक ऑफर्स के साथ नृत्य कर रहे हैं। स्मार्ट फोन ही नहीं, दर्जनों स्मार्ट चीज़ों ने हर आंख, हाथ, शरीर, दिल और दिमाग में स्मार्टनेस भर दी है। फैशन, प्रवृति, नक़ल, जलन, प्रतिस्पर्धा, स्वाद और स्वतंत्रता का प्रकाश हर घर में पहुंच जाता है तो बाज़ार फिर ठहाका लगाकर हंसता है। उसकी यह हंसी बहुत से ग्राहकों को समझ नहीं भी आती।
धनतेरस, मनतेरस और तनतेरस आकर्षक कपडे पहने, खूबसूरत प्रेरणा की तरह आती और लुभाती हैं। भारतीय चिकित्सा परम्परा के जनक से सम्बद्ध होने के कारण, बाज़ार ने इसे लपककर सिर्फ धन से जोड़ दिया है जिसका मतलब ग्राहक बन पुण्य प्राप्त करना है। ग्राहक इस सन्देश को समझ गया है। चिकित्सा और स्वास्थ्य तो कब से बाज़ार की गोद में बैठे हैं। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं कि अस्पताल में गर्भवती महिलाओं के बैठने के लिए बेंच तक नहीं। बाज़ार को तो परम्परा, सभ्यता, संस्कृति, व्यव्हार और मानवीय मूल्यों का चटपटा अचार डालने से मतलब है। बाज़ार कारीगर है। उसे उत्सवधर्मिता, धार्मिक भावनाओं का स्वादिष्ट कचूमर बनाकर बेचना भी खूब आता है। जैसे त्योहारों की सदभावना को कोई हरा नहीं सकता, बाज़ार की दुर्भावनाओं से कोई जीत नहीं सकता।
- संतोष उत्सुक
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