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    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
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      <title><![CDATA[M Visvesvaraya Birth Anniversary: सिंचाई के लिए Block System बनाने वाले M Visvesvaraya कैसे बने कर्नाटक के भगीरथ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/visvesvaraya-creator-of-block-system-for-irrigation-became-bhagiratha-of-karnataka]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>देश के महान इंजीनियर रहे एम विश्वेश्वरैया का 15 सितंबर को जन्म हुआ था। वह देश के महान इंजीनियर, विद्वान और प्रशासक थे। उनको भारत के आधुनिक इंजीनियरिंग विकास के प्रमुख वास्तुकारों में गिना जाता है। उन्होंने भारतीय इंजीनियरिंग को नई दिशा देने का काम किया था। विश्वेश्वरैया ने सिंचाई के लिए ब्लॉक सिस्टम विकसित किया था, जिसको इंजीनियरिंग का अब तक का अद्भुत कारनामा माना जाता है। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर एम विश्वेश्वरैया के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</p><h2>जन्म और परिवार</h2><p><br>मैसूर राज्य के कोलार जिले के चिक्काबल्लापुर तालुक में 15 सितंबर 1860 को एम विश्वेश्वरैया का जन्म हुआ था। वह तेलुगु परिवार से ताल्लुक रखते थे। शुरूआती शिक्षा गांव से पूरी होने के बाद 1880 में उन्होंने बीए की पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने मैसूर सरकार की सहायता से पूना के साइंस कॉलेज से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और पहला स्थान हासिल किया।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/discover-journey-of-lakshman-narayan-sharma-becoming-neem-karoli-baba" target="_blank" rel="noopener">Neem Karoli Baba Death Anniversary: जानिए Lakshman Narayan Sharma के Neem Karoli Baba बनने का सफर</a></p><h2>कर्नाटक का भगीरथ</h2><p><br>टॉरर होने के कारण महाराष्ट्र सरकार ने विश्वेश्वरैया को सहायक इंजीनियर के पद के लिए चुना। विश्वेश्वरैया के नाम मैसूर और कर्नाटक के क्षेत्रो में कृष्णराजसागर बांध सहित बहुत से निर्माण कार्य किए। जिसने कर्नाटक को एक नई ऊंचाइयों पर खड़ा कर दिया और आज भी विश्वेश्वरैया को कर्नाटक का भगीरथ भी कहा जाता है।</p><h2>उपलब्धियां</h2><p><br>वहीं कर्नाटक से बाहर विश्वेश्वरैया के नाम कम उपलब्धियां नहीं रही हैं। ग्वालियर का टिगरी डैम हो, सिंधु नदी से सुक्कुर कस्बे को पानी की आपूर्ति की योजना हो या साल 1952 में पटना में गंगा नदी पर राजेंद्र सेतु के निर्माण की योजना हो। विश्वेश्वरैया ने हर जगह अपनी काबिलियत का लोहा मनवाया। उन्होंने सिर्फ देश ही नहीं बल्कि मिस्र, कनाडा, अदन, अमेरिका और रूस में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।</p><h2>नियोजन पर किताबें</h2><p><br>देश के शुरूआती विकास का आधार रही पंचवर्षीय योजनाओं को शुरू करने की प्रेरणा रूस की पंचवर्षीय योजना से ली गई थी। साल 1928 में रूस द्वारा ऐसी योजनाएं शुरू की थी। लेकिन इससे 8 साल पहले साल 1920 में उन्होंने रीकंस्ट्रक्टिंग इंडिया पर ऐसी योजनाओं का जिक्र किया था। वहीं साल 1935 प्लांड इकोनॉमी ऑफि इंडिया किताब लिखी।</p><p>विश्वेश्वरैया को लंबी और सेहतमंद उम्र के लिए भी जाना जाता है। 92 साल की उम्र में विश्वेश्वरैया ने पटना के राजेंद्र सेतु का निर्माण करवाया था। साल 1955 में उनको भारत के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से नवाया गया था। जब विश्वेश्वरैया 100 साल के लिए तो उनके सम्मान में एक डाक टिकट जारी किया गया।</p><h2>मृत्यु</h2><p><br>वहीं 14 अप्रैल 1962 को 101 साल की उम्र में एम विश्वेश्वरैया का निधन हो गया था।</p>]]></description>
      <pubDate>Tue, 15 Sep 2026 14:41:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/visvesvaraya-creator-of-block-system-for-irrigation-became-bhagiratha-of-karnataka</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Neem Karoli Baba Death Anniversary: जानिए Lakshman Narayan Sharma के Neem Karoli Baba बनने का सफर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/discover-journey-of-lakshman-narayan-sharma-becoming-neem-karoli-baba]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>नीम करौली बाबा का नाम सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी बड़ी श्रद्धा के साथ लिया जाता है। आज ही के दिन यानी की 11 सितंबर को नीम करौली बाबा का निधन हो गया था। बाबा को एक दिव्य पुरुष, महान योगीराज और हनुमान जी का भक्त माना जाता है। वहीं नीम करौली बाबा के अनुयायी मानते हैं कि वह स्वयं हनुमान जी के अवतार थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर बाबा नीम करौली के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले के अकबरपुर गांव में करीब 1900 के आसपास नीम करौली बाबा का जन्म हुआ था। इनका असली नाम लक्ष्मी नारायण शर्मा था। महज 11 साल की उम्र में लक्ष्मी नारायण शर्मा की शादी राम बेटी से हो गई थी। लेकिन इसके बाद भी उनका मन सांसारिक जीवन में नहीं लगा और आगे जाकर उन्होंने आध्यात्मिक मार्ग अपना लिया।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/638-hymns-composed-in-30-ragas-how-fourth-sikh-guru-laid-foundation-of-amritsar" target="_blank">Guru Ramdas Death Anniversary: 30 रागों में रचे 638 शब्द, सिखों के चौथे गुरु ने कैसे रखा Amritsar का आधार</a></h3><h2>कब प्राप्त हुआ ज्ञान</h2><div>मान्यता है कि नीम करौली बाबा को महज 17 साल की उम्र में ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। उन्होंने साधु जीवन अपनाने के लिए घर छोड़ दिया था। लेकिन पिता और परिवार के आग्रह पर वह वापस वैवाहिक जीवन में लौट आए थे।&nbsp;</div><div><br></div><h2>गांव के निर्विरोध प्रधान रहे बाबा</h2><div>बताया जाता है कि वह अपने गांव में करीब 40 सालों तक निर्विरोध ग्राम प्रधान रहे थे। साधारण जीवन जीने के बाद वह आध्यात्मिक गुरु के रूप में प्रसिद्ध होते चले गए। धीरे-धीरे देश के अलग-अलग हिस्सों में उनकी लोकप्रियता फैलती चली गई और उनके अनुयायियों की संख्या बढ़ती चली गई।</div><div><br></div><h2>ऐसे पड़ा 'नीम करौली' नाम</h2><div>लक्ष्मी नारायण शर्मा के नाम से जुड़ी सबसे चर्चित कहानियों में एक नीब करौरी गांव की घटना है। माना जाता है कि एक बार बाबा ट्रेन में सवार होकर जा रहे थे, लेकिन उन्होंने टिकट नहीं लिया था, जिस कारण उनको ट्रेन से उतार दिया गया था। जिसके बाद ट्रेन आगे नहीं बढ़ी। जब बाबा को वापस ट्रेन में बैठाया गया, तो ट्रेन चल पड़ी। इसी घटना के बाद उनका नाम नीब करौरी बाबा के रूप में जाना जाने लगा।</div><div><br></div><h2>कैंची धाम</h2><div>बाबा नीम करौली का सबसे प्रसिद्ध आश्रम कैंची धाम है। साल 1964 में नैनीताल जिले के भवाली के पास क्षिप्रा नदी के किनारे नीम करौली बाबा ने कैंची धाम की स्थापना की थी। देश-विदेश में कैंची धाम बाबा के भक्तों के लिए प्रमुख आस्था का केंद्र बन चुका है। हर साल 15 जून को कैंची धाम स्थापना दिवस मनाया जाता है।</div><div><br></div><h2>बाबा के दरबार पहुंची जानी-मानी हस्तियां</h2><div>कैंची धाम की प्रसिद्धि सिर्फ भारत तक ही सीमित नहीं है। बल्कि देश दुनिया की कई जानी मानी हस्तियां भी उनसे प्रभावित रहीं। मेटा के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग, एप्पल के सह-संस्थापक स्टीव जॉब्स, और भारतीय क्रिकेटर विराट कोहली का नाम बाबा नीम करौली और कैंची धाम से जुड़ी चर्चाओं में आता है।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 11 सितंबर 1973 को नीम करौली बाबा वृंदावन में ब्रह्मलीन हुए थे। आज भारत समेत कई देशों में बाबा नीम करौली के आश्रम और मंदिर हैं।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 11 Sep 2026 13:04:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/discover-journey-of-lakshman-narayan-sharma-becoming-neem-karoli-baba</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Mahadevi Verma Death Anniversary: साहित्य से समाज सेवा तक, ऐसा रहा 'हिंदी की मीरा' का Iconic Journey]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/from-literature-to-social-service-such-iconic-journey-of-meera-of-hindi]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 11 सितंबर को हिंदी साहित्य की प्रमुख कवयित्री महादेवी वर्मा का निधन हो गया था। उनको छायावादी युग के चार स्तंभों में गिना जाता है। साहित्य में महादेवी वर्मा का योगदान बेहद अहम और व्यापक रहा है। इस वजह से उनको 'हिंदी साहित्य की मीरा' भी कहा जाता है। उन्होंने अपने लेखन में नारी की इच्छाएं, पीड़ाएं और उनके संघर्षों को सजीव रूप में प्रस्तुत करने का काम किया। वह कवियत्री और निबंधकार के अलावा समाजसेवी के रूप में भी प्रसिद्ध हुईं। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर महादेवी वर्मा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले में 26 मार्च 1907 को महादेवी वर्मा का जन्म हुआ था। उनके परिवार की भारतीय संस्कृति के प्रति गहरी रुचि थी। महादेवी का बचपन से ही झुकाव कला और साहित्य की ओर रहा। उनकी शुरूआती शिक्षा उज्जैन से हुई और उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संस्कृत में एम.ए. किया। इसके अलावा वह लंबे समय तक प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्राचार्या रहीं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/how-vinayak-bhave-became-saint-vinoba-of-the-bhoodan-movement" target="_blank">Vinoba Bhave Birth Anniversary: काशी से Wardha तक, जानिए कैसे विनायक भावे बने भूदान आंदोलन के Saint Vinoba</a></h3><h2>साहित्यिक जीवन</h2><div>वह हिंदी साहित्य के छायावादी युग की प्रमुख कवियत्री थीं। महादेवी वर्मा की रचनाएं प्रेम, विरह, मानवीय संवेदनाओं और अध्यात्म की गहरी अनुभूतियों से भरी हैं। उनकी कविताओं में महिलाओं की पीड़ा, व्यथा और उनकी शक्ति का सूक्ष्म चित्रण है। महादेवी वर्मा की प्रसिद्ध काव्य कृतियों में 'सांध्यगीत', 'दीपशिखा और यामा' और 'नीरजा' आदि हैं, जिसके लिए उनको ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।</div><div><br></div><div>उन्होंने सिर्फ कविताएं ही नहीं लिखीं, बल्कि कहानियां, निबंध और संस्मरण भी लिखे। महादेवी वर्मा की प्रमुख गद्य रचनाओं में 'पथ के साथी', 'स्मृति की रेखाएं' और 'अतीत के चलचित्र' आदि शामिल हैं।</div><div><br></div><h2>उपलब्धियां</h2><div>महादेवी ने सिर्फ साहित्य के क्षेत्र में ही नहीं बल्कि समाज सेवा और शिक्षा के क्षेत्र में भी अहम योगदान दिया है।</div><div><br></div><div>उनको हिंदी साहित्य में योगदान के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजा गया था।</div><div><br></div><div>भारत सरकार द्वारा महादेवी वर्मा को पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था।</div><div><br></div><div>महादेवी वर्मा को काव्य संग्रह 'यामा' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया था।</div><div><br></div><div>साल 1979 में महादेवी वर्मा को साहित्यिक सेवाओं के लिए साहित्य अकादमी का प्रतिष्ठित फैलोशिप से सम्मानित किया गया।</div><div><br></div><h2>महिलाओं के लिए उठाई आवाज</h2><div>उन्होंने अपने लेखन के जरिए महिलाओं की स्थिति, अधिकारों और स्वतंत्रता के बारे में आवाज उठाई थी। वह समाजसेवा में भी सक्रिय थीं और महिलाओ की शिक्षा और उनके अधिकारों के लिए भी काम किया था। महादेवी वर्मा ने 'प्रयाग महिला विद्यापीठ' की स्थापना की थी। महादेवी वर्मा का मानना था कि समाज में बदलाव के लिए महिलाओं का सशक्त होना बेहद जरूरी है।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 11 सितंबर 1987 को इलाहाबाद में महादेवी वर्मा का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 11 Sep 2026 12:52:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/from-literature-to-social-service-such-iconic-journey-of-meera-of-hindi</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Vinoba Bhave Birth Anniversary: काशी से Wardha तक, जानिए कैसे विनायक भावे बने भूदान आंदोलन के Saint Vinoba]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/how-vinayak-bhave-became-saint-vinoba-of-the-bhoodan-movement]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 11 सितंबर को विनोबा भावे का जन्म हुआ था। विनोबा भावे महात्मा गांधी की विरासत को आगे ले जाने का काम करते दिखाई दिए। वह एक स्वतंत्रता सेनानी होने के अलावा प्रसिद्ध गांधीवादी समाज सुधारक नेता भी थे। विनोबा भावे को भूदान आंदोलन से पूरी दुनिया में बड़ी पहचान मिली थी। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर विनोबा भावे के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>महाराष्ट्र के कोंकण इलाके के गागोदा गांव में 11 सितंबर 1895 को विनोबा भावे का जन्म हुआ था। इनका असली नाम विनायक नरहरि भावे था। यह ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखते थे। इनकी मां रुकमणी बाई एक विदूषी महिला थीं। वहीं विनोबा भावे पर अपनी मां का गहरा प्रभाव था। विनोबा को अपनी मां से ही ईश्वर के प्रति आस्था और आध्यात्म के प्रति झुकाव मिला था। वहीं पिता से विज्ञान, गणित और अलग विलक्षण सोच और तार्किता मिली थी।</div><div><br></div><h2>आध्यात्मिक यात्रा</h2><div>विनोबा भावे परीक्षा देने के लिए मुंबई जाने वाली रेलगाड़ी में तो बैठे, लेकिन उनका मन वैराग्य में रमा हुआ था। ऐसे में वह बीच में ही दूसरी गाड़ी में बैठकर आध्यात्मिक यात्रा पर हिमालय की ओर निकल पड़े। वह ज्ञान की तलाश में बहुत भटके। वह काशी में भी लंबे समय तक रहे। वहीं समाचार पत्रों में महात्मा गांधी के बारे में पढ़कर उनको ऐसा लगा कि गांधीजी उनके लिए मार्गदर्शक हो सकते हैं। उस दौरान महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से लौटे थे। उन्होंने महात्मा गांधी को पत्र लिखा और जवाब में आमंत्रण मिलने पर वह फौरन अहमदाबाद रवाना हो लिए।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/638-hymns-composed-in-30-ragas-how-fourth-sikh-guru-laid-foundation-of-amritsar" target="_blank">Guru Ramdas Death Anniversary: 30 रागों में रचे 638 शब्द, सिखों के चौथे गुरु ने कैसे रखा Amritsar का आधार</a></h3><h2>गांधीजी से मुलाकात</h2><div>महात्मा गांधी और विनोबा भावे की पहली मुलाकात 07 जून 1916 में हुई थी। दोनों ही पहली मुलाकात के बाद एक-दूसरे के मुरीद हो गए। इसके बाद विनोबा भावे ने खुद को महात्मा गांधी के आश्रम के लिए समर्पित कर दिया। जब गांधीजी को लगा कि वह अहमदाबाद या कहीं और कितना भी बड़ा आश्रम बना लें। देशभर में अहिंसक सैनिक तैयार नहीं हो सकेंगे। ऐसे में उन्होंने विनोबा भावे को वर्धा भेजा, जहां पर महाराष्ट्र धर्म नाम से मराठी में प्रकाशित होने वाली उनकी पत्रिका काफी लोकप्रिय हुई थी।</div><div><br></div><h2>संत और आचार्य के रूप में जाने गए विनोबा भावे</h2><div>देश की आजादी तक विनोबा भावे संत और आचार्य के रूप में पहचान मिली थी। महात्मा गांधी के निधन के बाद उन्होंने गांधीजी की विरासत को कायम रखा। लेकिन वह अपने स्वभाव के मुताबिक इसको आध्यात्मिक रूप से ही आगे बढ़ाते रहे। साल 1951 में महाराष्ट्र में भूदान आंदोलन ने विनोबा भावे को दुनियाभर में मशहूर कर दिया था। यह एक स्वैच्छिक सुधार आंदोलन था, जिसमें रचनात्मक कार्यों और विचारों के प्रयोग से सामाजिक स्तर पर बदलाव की कोशिश की गई। उन्होंने सर्वोदय समाज की स्थापना की और आजादी के बाद अपना जीवन वर्धा के ब्रह्म विद्या मंदिर आश्रम में गुजारा।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 15 नवंबर 1982 को अन्न जल त्याग कर विनोबा भाने ने समाधि मरण को अपना लिया।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 11 Sep 2026 12:48:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/how-vinayak-bhave-became-saint-vinoba-of-the-bhoodan-movement</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Bhupen Hazarika Birth Anniversary: 10 साल की उम्र में पहला Song, जानिए 'ब्रह्मपुत्र के कवि' का सांस्कृतिक प्रभाव]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/first-song-at-age-of-10-discover-cultural-impact-of-poet-of-the-brahmaputra]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>एक बेहतरीन गायक, गीतकार और संगीतकार रहे भूपेन हजारिका का 08 सितंबर को जन्म हुआ था। वह बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे और देश के सबसे ऊंचे नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानिक किया गया था। हजारिका असमिया भाषा के लेखक और असम संगीत के अच्छे जानकार थे। वहीं भूपेन हजारिका ने अपने गानों के अलावा अपनी निजी जिंदगी से भी खूब सुर्खियां बटोरी हैं। उनका नाम एक समय पर दिग्गज गायिका लता मंगेशकर के साथ जुड़ा था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर भूपेन हजारिका के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>असम के सादिया में 08 सितंबर 1926 को भूपेन हजारिका का जन्म हुआ था। वह 'ब्रह्मपुत्र के कवि' के नाम से भी मशहूर थे। हजारिका को संगीत विरासत में मिला था। उन्होंने महज 10 साल की उम्र में अपना पहला गाना लिखा था और उसको गाया था। वहीं 12 साल की उम्र में उन्होंने असमिया भाषा की फिल्म 'इंद्रमालती' में काम किया।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/strained-relations-with-lata-and-partnership-with-burman-look-asha-bhosle-career" target="_blank">Asha Bhosle Birth Anniversary: Lata Mangeshkar से तल्खी और RD Burman का साथ, जानें Asha Bhosle का Iconic Career</a></h3><h2>असमिया भाषा से हिंदी तक का सफर</h2><div>उन्होंने खुद को सिर्फ असम तक ही सीमित नहीं रखा। वह इससे बाहर निकले और हिंदी में छा गए। हजारिका ने हिंदी में 'दिल हूम हूम करे' गाना गाया। इस गाने को लोगों द्वारा पसंद किया गया। इसके बाद उन्होंने 'ओ गंगा तू बहती है क्यों' गाया, जिससे हजारिका का जादू चला। फिर उन्होंने असमिया के अलावा हिंदी और बांग्ला समेत कई अन्य भाषाओं में गाने गाए। भूपेन हजारिका ने फिल्म 'गांधी टू हिटलर' में भजन 'वैष्णव जन' गाया था।</div><div><br></div><div>भूपेन हजारिका के सबसे फेमस गानों में 'ओ गंगा बहती हो क्यों', 'दिल हूम हूम करे', 'मोई एटी जाजाबर' और 'मानुहे मानुहर बाबे' सहित कई बेहतरीन गाने शामिल हैं। वह अपने गाने खुद लिखते थे और गाते थे। इसके अलावा उन्होंने फिल्मों या नाटकों के किरदारों को ध्यान में रख कर कई गीत लिखे थे।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 05 नवंबर 2011 को 85 साल की उम्र में भूपेन हजारिका ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 08 Sep 2026 13:22:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/first-song-at-age-of-10-discover-cultural-impact-of-poet-of-the-brahmaputra</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Asha Bhosle Birth Anniversary: Lata Mangeshkar से तल्खी और RD Burman का साथ, जानें Asha Bhosle का Iconic Career]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/strained-relations-with-lata-and-partnership-with-burman-look-asha-bhosle-career]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 08 सितंबर को सुरीली और शोख गायिका आशा भोसले का जन्म हुआ था। उन्होंने हजारों गीतों को अपनी आवाज से अमर बना दिया है। आशा भोसले को भारतीय सिनेमा जगत की महान गायिकाओं में गिना जाता है। उन्होंने हिंदी के अलावा गुजराती, बांग्ला, मराठी, भोजपुरी, तमिल, अंग्रेजी, मलयालम और रूसी भाषा में भी बहुत सारे गीत गाए हैं। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर सिंगर आशा भोसले के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>महाराष्ट्र के सांगली में 08 सितंबर 1933 को आशा भोसले का जन्म हुआ था। आशा के पिता का नाम दीनानाथ मंगेशकर था, जोकि एक शास्त्रीय गायक और मराठी थिएटर के फेमस अभिनेता थे। वहीं आशा की बड़ी बहन लता मंगेशकर भी गायिका थीं। ऐसे में आशा ने भी अपने पिता और बड़ी बहन के नक्शे कदम पर चलने का फैसला कर लिया।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/mother-teresa-historic-journey-from-slums-of-kolkata-to-nobel-prize" target="_blank">Mother Teresa Death Anniversary: मदर टेरेसा का कोलकाता की झुग्गियों से लेकर Nobel Prize तक का ऐतिहासिक सफर</a></h3><h2>प्लेबैक सिंगर</h2><div>सिर्फ 10 साल की छोटी उम्र में आशा भोशले ने प्लेबैक सिंगर के रूप में अपने करियर की शुरूआत की थी। आशा ने साल 1943 में अपना पहला मराठी फिल्म के लिए गाना रिकॉर्ड किया था। वहीं साल 1949 में 16 की उम्र में आशा ने हिंदी फिल्म 'रात की रानी' के लिए अपना पहला सोलो गाना रिकॉर्ड किया था।</div><div><br></div><h2>सेक्रेटरी से भागकर की शादी</h2><div>महज 16 साल की उम्र में आशा भोसले ने अपना घर बसा लिया था। कम उम्र में आशा ने अपनी बड़ी बहन लता मंगेशकर के सेक्रेटरी गणपत राव भोसले से भागकर शादी कर ली थी।&nbsp;</div><div><br></div><div>16 साल की उम्र में ही आशा भोसले ने अपना घर भी बसा लिया था. दरअसल कम उम्र में ही दिग्गज गायिका ने अपनी बड़ी बहन लता मंगेशकर के सेक्रेटरी गणपत राव भोसले से घर से भागकर शादी कर ली थी. क्योंकि उनका परिवार इस रिश्ते से खुश नहीं था. हैरानी की बात ये भी है कि गणपत राव उम्र में आशा से दोगुनी उम्र के थे. शादी के वक्त उनकी उम्र 31 साल थी. आशा के इस फैसले से नाराज होकर लता मंगेशकर और परिवार के अन्य लोगों ने उनसे बातचीत बंद कर दी थी.&nbsp;</div><div><br></div><h2>लता-आशा के रिश्ते में कड़वाहट</h2><div>जब आशा भोसले ने लता मंगेशकर के सेक्रेटरी से शादी की, तो इससे लता मंगेशकर काफी नाराज हुईं। इस घटना के बाद दोनों बहनों के बीच रिश्ते बिगड़ गए। आशा जी ने बताया था कि इस घटना के बाद आई दूरियों को भरने में सालों लग गए थे। क्योंकि लता मंगेशकर का मानना था कि गणपत राव आशा के लिए सही नहीं हैं।</div><div><br></div><h2>अलग हुए आशा और गणपत</h2><div>समय के साथ आशा और गणपत राव के रिश्ते में तल्खियां बढ़ने लगीं। आखिरकार 11 साल बाद यह शादी टूट गई और साल 1960 में आशा और गणपत अलग हो गए थे। दोनों के शादी के बाद 3 बच्चे थे।</div><div><br></div><h2>आर डी बर्मन से रचाई दूसरी शादी</h2><div>इसके बाद दिग्गज संगीतकार आर डी बर्मन से आशा भोसले ने दूसरी शादी रचाई। साल 1966 में आई फिल्म 'तीसरी मंजिल' के दौरान दोनों की मुलाकात हुई थी। धीरे-धीरे दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ीं और फिर साल 1980 में आशा भोसले और आरडी बर्मन ने शादी कर ली। हालांकि यह शादी भी इतनी आसान नहीं थी।</div><div><br></div><div>बर्मन ने खुद आशा भोसले के सामने शादी का प्रस्ताव रखा था। वहीं आशा ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया था, लेकिन आरडी बर्मन की मां इस रिश्ते से खुश नहीं थी। क्योंकि आशा तलाकशुदा होने के साथ-साथ 3 बच्चों की मां थी।</div><div><br></div><h2>आशा भोसले के पॉपुलर गाने</h2><div>प्राप्त जानकारी के मुताबिक आशा भोसले ने करीब 12 हजार से अधिक गाने गाए थे। आशा का बॉलीवुड में करियर करीब 70 साल से ज्यादा रहा था। उनके पॉपुलर गानों में 'दम मारो दम', 'आजा आजा मैं हू प्यार तेरा', 'चुरा लिया है तुमने जो दिल को', 'इन आंखों की मस्ती के', 'पिया तू अब तो आजा', 'ये मेरा दिल प्यार का दीवाना' शामिल हैं।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 12 अप्रैल 2026 को 92 साल की उम्र में आशा भोसले का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 08 Sep 2026 11:28:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/strained-relations-with-lata-and-partnership-with-burman-look-asha-bhosle-career</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Sarvepalli Radhakrishnan Birth Anniversary: Oxford Professor से Bharat Ratna तक, ऐसा था Dr Radhakrishnan का प्रेरणादायी सफर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/from-oxford-professor-to-bharat-ratna-dr-radhakrishnan-inspiring-journey]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 05 सितंबर को डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म हुआ था। वह एक फिलॉसफर, ऑथर और भारत के दूसरे राष्ट्रपति थे। स्टूडेंट्स डॉ राधाकृष्णन का बहुत सम्मान करते थे। वहीं साल 1954 में उनको भारत रत्न से सम्मानित किया गया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और शिक्षा</h2><div>तमिनलाडु के तुर्माणी नाम के गांव में 05 सितंबर 1888 को हुआ था। वह एक गरीब ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखते थे। उनके पिता गांव के ज्ञानी पंडित थे। राधाकृष्णन ने एमए साइकोलॉजी की पढ़ाई की थी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/mother-teresa-historic-journey-from-slums-of-kolkata-to-nobel-prize" target="_blank">Mother Teresa Death Anniversary: मदर टेरेसा का कोलकाता की झुग्गियों से लेकर Nobel Prize तक का ऐतिहासिक सफर</a></h3><h2>बीएचयू के चांसलर</h2><div>वहीं महज 16 साल की उम्र में उनकी शादी हो गई थी। उनके 5 बेटियां और 1 बेटा था। उन्होंने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में भी पढ़ाया। इसके अलावा उन्होंने प्रेसिडेंसी कॉलेज, मद्रास से लेकर बीएचयू तक चांसलर के पद पर काम किया था।</div><div><br></div><h2>सियासी सफर</h2><div>वहीं देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के आग्रह पर डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने राजनीति में एंट्री की। फिर साल 1962 से लेकर 1967 तक वह भारत के दूसरे राष्ट्रपति बने। वहीं इससे पहले साल 1952 से लेकर 1962 तक भारत के पहले उपराष्ट्रपति के रूप में काम किया था।</div><div><br></div><div>जब डॉ राधाकृष्णन राष्ट्रपति बने थे, तो 10,000 वेतन मिलता था। लेकिन वह सिर्फ 2500 रुपए लेते थे, बाकी राशि वह हर महीने पीएम राष्ट्रीय राहत कोष में दान कर दी थी।</div><div><br></div><h2>सम्मान</h2><div>वहीं डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन को साल 1954 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया था। फिर साल 1961 में उनको जर्मन बुक ट्रेड के शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके बाद साल 1963 में उनको ऑर्डर ऑफ मेरिट और साल 1975 को टेम्पलटन पुरस्कार दिया गया।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 17 अप्रैल 1975 को डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 05 Sep 2026 11:38:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/from-oxford-professor-to-bharat-ratna-dr-radhakrishnan-inspiring-journey</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Mother Teresa Death Anniversary: मदर टेरेसा का कोलकाता की झुग्गियों से लेकर Nobel Prize तक का ऐतिहासिक सफर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/mother-teresa-historic-journey-from-slums-of-kolkata-to-nobel-prize]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 05 सितंबर को मदर टेरेसा का निधन हो गया था। उन्होंने अपना पूरी जीवन दीन-दुखियों की सेवा में लगा दिया था। वह बीमार, अनाथ, गरीब, असहाय लोगों की मदद और सेवा किया करती थीं। वह 19 साल की उम्र में भारत आ गई थीं। वह पहले शिक्षिका बनीं और फिर बाद में गरीबों और असहायों की सेवा और मदद करने लगीं। वहीं सेवा कार्यों के लिए उनको नोबेल शांति पुरस्कार से नवाजा गया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर मदर टेरेसा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>यूगोस्लाविया में 26 अगस्त 1910 को मदर टेरेसा का जन्म हुआ था। इनका असली नाम नाम एग्नेस गोंझा बोयाजिजू था। वहीं 18 साल की उम्र में वह दीक्षा लेकर सिस्टर टेरेसा बनी थीं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/638-hymns-composed-in-30-ragas-how-fourth-sikh-guru-laid-foundation-of-amritsar" target="_blank">Guru Ramdas Death Anniversary: 30 रागों में रचे 638 शब्द, सिखों के चौथे गुरु ने कैसे रखा Amritsar का आधार</a></h3><h2>जब भारत आईं मदर टेरेसा</h2><div>साल 1929 में मदर टेरेसा भारत आईं और अध्यापन का कार्य करने लगी। वहीं कोलकाला में पढ़ाने के दौरान उन्होंने लोगों की गरीबी को देखा और कच्ची बस्तियों में जाकर सेवा कार्य करने लगीं। वहीं सेवा कार्य के लिए मदर टेरेसा ने 07 अक्तूबर 1950 को मिशनरीज ऑफ चैरिटी की स्थापना की। इसके जरिए वह लंबे समय तक बीमार, गरीब और अनाथ लोगों की सेवा में जुटी रहीं।</div><div><br></div><div>वहीं साल 1948 में मदर टेरेसा ने स्वेच्छा से भारत की नागरिकता ग्रहण की। उन्होंने अपनी मिशनरीज के जरिए उस दौरान समाज से बहिष्कृत समझे जाने वाले तपेदिक और कुष्ठ रोगियों की सेवा की।</div><div><br></div><h2>नोबेल शांति पुरस्कार</h2><div>मदर टेरेसा के सेवा कार्यों को देखते हुए साल 1979 में उनको नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। लेकिन उन्होंने प्राइज मनी लेने से इंकार कर दिया और इसको भारत के गरीब लोगों में दान करने के लिए कहा। साल 1980 में भारत सरकार द्वारा मदर टेरेसा को सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित किया। इसके अलावा रोमन कैथोलिक चर्च ने भी उनको कलकत्ता की संत टेरेसा के नाम से नवाजा।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 05 सितंबर 1997 को दिल का दौरा पड़ने से मदर टेरेसा निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 05 Sep 2026 11:36:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/mother-teresa-historic-journey-from-slums-of-kolkata-to-nobel-prize</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Guru Ramdas Death Anniversary: 30 रागों में रचे 638 शब्द, सिखों के चौथे गुरु ने कैसे रखा Amritsar का आधार]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/638-hymns-composed-in-30-ragas-how-fourth-sikh-guru-laid-foundation-of-amritsar]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सिख धर्म के चौथे गुरु, गुरु रामदास का का 01 सितंबर को निधन हो गया था। वह सिख धर्म के चौथे गुरु थे। उन्होंने चार उपमाओं की रचना करके सिख धर्म को अधिक मजबूत करने का कार्य किया था। गुरु रामदास जी सात वर्षों तक सिखों के गुरु रहे थे। वह 01 सितंबर 1574 को सिखों के चौथे गुरु बने थे। इसके अलावा गुरु रामदास ने अमृतसर शहर बसाया था। इस शहर को पहले रामदासपुर के नाम से जाना जाता था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी पर गुरु रामदास के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>चूना मंडी में 24 सितंबर 1534 को गुरु रामदास का जन्म हुआ था। यह जगह वर्तमान समय में पाकिस्तान के लाहौर में है। इनके पिता का नाम हरिदास मल सोढी और मां का नाम अनूप देवी था। इनका असली नाम जेठा जी था। जब उनको गुरु पद मिला, तो उनको रामदास नाम मिला। इनके माता-पिता की मृत्यु बचपन में ही हो गई थी। जिसके बाद इनका पालन-पोषण नानी ने किया था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/bal-gangadhar-tilak-who-shook-foundations-of-british-rule-through-journalism" target="_blank">Bal Gangadhar Tilak Death Anniversary: पत्रकारिता के जरिए ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिलाने वाले Bal Gangadhar Tilak</a></h3><h2>तीसरे सिख गुरु से मिले</h2><div>जब जेठाजी अपनी नानी के पास रहते थे, तो वह पहली बार सिखों के तीसरे नानक, गुरु अमर दास से मिले थे। इस मुलाकात के दौरान वह इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने नानक अमरदास के पास रहकर उनकी सेवा का विचार बना लिया। वहीं गुरु अमरदास ने अपनी छोटी बेटी का विवाह रामदास से कराया था।</div><div><br></div><div>इसी दौरान जब गुरु अमरदास को यह एहसास हुआ कि उनको अब सिखों के अगले गुरु का चयन करना चाहिए, तो उन्होंने गुरु रामदास की परीक्षा ली। इस परीक्षा में गुरु रामदास सफल हुए।</div><div><br></div><h2>गुरु गद्दी पर बैठे रामदास</h2><div>जिसके बाद गुरु अमरदास ने बाबा बूढ़ा जी से रामदास का तिलक कराया और गुरुगद्दी सौंपी। इसके बाद गुरु अमरदास ने जेठा जी को संगत से परिचित कराते हुए बताया कि यह सिखों के चौथे गुरु, गुरु रामदास हैं।</div><div><br></div><h2>अमृतसर शहर बसाया</h2><div>गुरु गद्दी पर बैठने के बाद रामदास ने सिख संगत की भलाई के लिए अनेकों कार्य किए थे। उन्होंने चक रामदास पुर नामक नगर बसाया। जिसको आज के समय में हम सभी अमृतसर शहर के नाम से जानते हैं। इसके अलावा उन्होंने नगर के बीचोबीच एक बड़े जल सरोवर का निर्माण कराया था। गुरु रामदास ने 'आनंद कारज' यानी की सिखों के विवाह में पढ़े जाने वाले फेरों की रचना की।</div><div><br></div><div>गुरु रामदास ने बताया कि अब से आनंद कारज की मर्यादा के तहत ही सिख विवाह किए जाएंगे। गुरु रामदास ने अपने पूरे जीवनकाल में 30 राहों में 638 शब्द लिखे। जिनमें 246 पौउड़ी, 136 श्लोक, 31 अष्टपदी और 8 वारां है। इन सभी को गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल किया गया।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 01 सितंबर 1581 को पंजाब के गोइंदवाल साहिब में सिखों के चौथे गुरु, गुरु रामदास का निधन हो गया।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 01 Sep 2026 18:59:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/638-hymns-composed-in-30-ragas-how-fourth-sikh-guru-laid-foundation-of-amritsar</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Mother Teresa Birth Anniversary: गरीबों की सांसों में बसने वाली संत थीं मदर टेरेसा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/mother-teresa-was-a-saint-who-lived-in-the-very-breath-of-the-poor]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>मदर टेरेसा का नाम सुनते ही मानवता, करुणा और सेवा का पवित्र स्वरूप आंखों के सामने उभर आता है। उनका जीवन इस तथ्य का सबसे बड़ा प्रमाण है कि निस्वार्थ भाव से दूसरों के दुःख को दूर करने का संकल्प ही मनुष्य को वास्तविक अर्थों में महान बनाता है। 26 अगस्त 1910 को अल्बानिया के स्कोप्जे में एगनेस गोंझा बोयाज्यू के रूप में जन्मी इस नन्हीं बालिका ने बचपन से ही धर्म और सेवा के प्रति गहरी आस्था प्रकट की थी। जब वे केवल 12 वर्ष की थी, तभी उनके भीतर यह संकल्प जाग उठा था कि उनका जीवन केवल दूसरों की भलाई के लिए समर्पित होगा। यही संकल्प आगे चलकर उन्हें पूरी मानवता के लिए करुणा की मूर्ति बना गया।</div><div><br></div><div>18 वर्ष की आयु में उन्होंने ‘सिस्टर्स ऑफ लोरेटो’ से जुड़कर धार्मिक जीवन की ओर कदम बढ़ाए और 1929 में भारत आईं। कलकत्ता स्थित सेंट मैरी स्कूल में उन्होंने अध्यापिका के रूप में कार्य करना शुरू किया। अध्यापन कार्य के दौरान वे छात्रों को केवल पढ़ाई ही नहीं, अनुशासन और नैतिक मूल्यों का भी पाठ पढ़ाती थी किंतु धीरे-धीरे उनका मन स्कूल की चारदीवारी से बाहर रहने वाले निर्धन, रोगग्रस्त और बेसहारा लोगों की ओर अधिक खिंचने लगा। 1946 में दार्जिलिंग की यात्रा के दौरान उन्हें अपने जीवन का वास्तविक ध्येय मिला। उन्होंने महसूस किया कि उन्हें शिक्षण कार्य से ऊपर उठकर गरीबों और असहायों की सीधी सेवा करनी चाहिए। यह क्षण उनके जीवन की दिशा बदल देने वाला साबित हुआ।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/journey-agnes-to-mother-when-mission-of-charity-began-in-response-to-call-soul" target="_blank">Mother Teresa Birth Anniversary: 'एक्नेस' से 'मदर' बनने का सफर, जब आत्मा की पुकार पर शुरू हुआ Mission of Charity</a></h3><div>कलकत्ता की झुग्गियों और गलियों में रहने वाले लोगों की असहनीय पीड़ा को देखकर उन्होंने 1950 में ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ की स्थापना की। इस संस्था का मुख्य उद्देश्य था सबसे गरीब, सबसे लाचार और सबसे उपेक्षित लोगों की निःस्वार्थ सेवा करना। संस्था का ध्येय वाक्य ही था, ‘सबसे गरीबों में भी सबसे गरीब की सेवा।’ मदर टेरेसा ने सेवा की परिभाषा केवल भोजन और दवा देने तक सीमित नहीं रखी बल्कि उनके लिए सेवा का अर्थ था पीड़ित व्यक्ति को यह अनुभव कराना कि वह अकेला नहीं है, उसे प्यार और सम्मान मिला हुआ है। यही कारण था कि वे सदैव कहा करती थी, ‘हम बड़े-बड़े कार्य नहीं कर सकते लेकिन हम छोटे-छोटे कार्य बड़े प्रेम से कर सकते हैं।’</div><div><br></div><div>उनके आश्रमों में केवल भोजन या उपचार की सुविधा ही नहीं दी जाती थी बल्कि वहां पीड़ित व्यक्तियों को जीवन की गरिमा और आत्मसम्मान भी लौटाया जाता था। उन्होंने कुष्ठ रोगियों को समाज में सम्मान दिलाने के लिए आश्रम बनाए, अनाथ और परित्यक्त बच्चों के लिए घर खोले और मृत्युशैया पर पड़े लोगों को अंतिम क्षणों में भी प्रेम और स्नेह का अहसास कराया। उनकी संस्था धीरे-धीरे भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में फैल गई, जिसके सैंकड़ों केंद्र आज विभिन्न देशों में मानव सेवा का कार्य कर रहे हैं। मदर टेरेसा की असाधारण सेवाओं को देखते हुए उन्हें अनेक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। 1962 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से अलंकृत किया और 1980 में ‘भारत रत्न’ प्रदान कर सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया। विश्व स्तर पर उन्हें 1979 में नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया। इसके अतिरिक्त अनेक देशों ने उन्हें अपने सर्वोच्च सम्मानों से विभूषित किया किंतु इन सब पुरस्कारों और मान-सम्मानों के बीच भी वे सदैव विनम्र बनी रही और स्वयं को केवल ईश्वर का साधन मानती रही।</div><div><br></div><div>उनके जीवन और कार्यों की इतनी ऊंचाई होने के बावजूद वे आलोचनाओं से अछूती नहीं रही। कई बार उन पर धर्मांतरण के आरोप लगाए गए तो कई बार उनके आश्रमों में आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं की कमी की बात उठाई गई किंतु यह निर्विवाद सत्य है कि मदर टेरेसा ने लाखों असहायों को आशा, सहारा और जीवन का सम्मान प्रदान किया। उनके कार्यों का व्यापक प्रभाव इसी से समझा जा सकता है कि वे समाज की उस परत तक पहुंची, जिसे प्रायः शासन और व्यवस्था भी अनदेखा कर देती थी। 5 सितंबर 1997 को 87 वर्ष की आयु में जब उनका निधन हुआ, तब समूचे विश्व ने उन्हें खोने का दुःख अनुभव किया। उनके अंतिम संस्कार में दुनिया के अनेक देशों के नेता उपस्थित हुए और भारत ने उन्हें राजकीय सम्मान के साथ विदाई दी। उनकी मृत्यु के बाद भी उनकी संस्था ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ उसी निष्ठा से मानवता की सेवा में कार्यरत है। 2016 में पोप फ्रांसिस ने उन्हें संत की उपाधि प्रदान की, जिससे उनका जीवन एक वैश्विक आध्यात्मिक प्रेरणा का प्रतीक बन गया।</div><div><br></div><div>मदर टेरेसा का जीवन इस तथ्य को रेखांकित करता है कि वास्तविक महानता किसी पद, संपत्ति या शक्ति में नहीं बल्कि निस्वार्थ सेवा और करुणा में निहित है। उन्होंने यह साबित किया कि जब तक हम दूसरों के दुःख को अपना नहीं मानते, तब तक जीवन का सही अर्थ अधूरा रहता है। आज जब दुनिया हिंसा, असमानता और स्वार्थ की चपेट में है, तब मदर टेरेसा का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो उठता है। उन्होंने सिखाया कि प्रेम और करुणा ही वह शक्ति है, जो मानवता को जोड़ सकती है। उन्होंने धर्म, जाति और भाषा की सीमाओं से परे जाकर यह बताया कि इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है। यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है, जिसे आगे बढ़ाना हर व्यक्ति का कर्त्तव्य है। मदर टेरेसा की जयंती का अवसर केवल स्मरण का नहीं बल्कि आत्ममंथन का अवसर है, जो हमें यह सोचने पर विवश करता है कि हम अपने जीवन में कितना समय और कितनी संवेदनशीलता समाज के जरूरतमंदों के लिए समर्पित करते हैं। यदि हर व्यक्ति अपने आसपास के जरूरतमंदों के लिए थोड़ा-सा भी प्रयास करे तो समाज में फैली असमानता और पीड़ा काफी हद तक कम हो सकती है। मदर टेरेसा का जीवन हमें यही सिखाता है कि सच्चा धर्म केवल मानव सेवा है और सच्ची पूजा केवल करुणा है।</div><div><br></div><div>- योगेश कुमार गोयल</div><div>(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं)</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 26 Aug 2026 13:47:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/mother-teresa-was-a-saint-who-lived-in-the-very-breath-of-the-poor</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Mother Teresa Birth Anniversary: 'एक्नेस' से 'मदर' बनने का सफर, जब आत्मा की पुकार पर शुरू हुआ Mission of Charity]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/journey-agnes-to-mother-when-mission-of-charity-began-in-response-to-call-soul]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>नोबेल पुरस्कार पाने वाली मदर टेरेसा का 26 अगस्त को जन्म हुआ था। उन्होंने अपना पूरा जीवन गरीबों की सेवा में लगा दिया था। वह साल 1929 में भारत आई थीं। उन्होंने जीवन के 68 साल भारत में रहकर लोगों की सेवा का काम किया था। हालांकि जहां उनको पूरी दुनिया में सम्मान मिला, तो वहीं उनके आलोचकों की भी कमी नहीं थी। लेकिन उन्होंने हमेशा खुद को मानव सेवा में लगाए रखा। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर मदर टेरेसा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>अल्बानिया के अच्छी आर्थिक स्थिति वाले परिवार में 16 अगस्त 1910 को मदर टेरेसा का जन्म हुआ था। मदर टेरेसा अपने परिवार की सबसे छोटी संतान थीं। वहीं 8 साल की उम्र में उनके सिर से पिता का साया उठ गया था। उनको बचपन से ही मिशिनरी जीवन और भारत के बंगाल की कहानियां बेहद प्रभावित करती थीं। उन्होंने सिर्फ 12 साल की उम्र में यह फैसला कर लिया था कि वह अपना पूरा जीवन धर्म को समर्पित करेंगीं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/how-neil-armstrong-who-cheated-death-in-korean-war-became-moon-hero" target="_blank">Neil Armstrong Death Anniversary: Korean War में मौत को मात देने वाले Neil Armstrong कैसे बने Moon Hero</a></h3><h2>मजबूत हुआ इरादा</h2><div>18 साल की उम्र में जब मदर टेरेसा विटिना लेटनाइस की ब्लैक मेडोना की समाधि पर प्रार्थना कर रही थीं, उसी दौरान उनका इरादा अधिक मजबूत हुआ। भारत आने के इरादे के बाद उन्होंने साल 1928 में आयरलैंड के इंस्टीट्यूट ऑफ ब्लेस्ड वर्जिन मेरी जाने का फैसला किया। यहां की सदस्यों को सिस्टर्स ऑफ लोरेटो कहा जाता है। यहां पर वह अंग्रेजी सीखने और मिशनरी बनने आई थीं।</div><div><br></div><div>आयरलैंड आने के बाद वह कभी अपने परिवार से नहीं मिलीं। साल 1929 में वह भारत आ गईं और दार्जलिंग में रहते हुए शुरूआती प्रशिक्षण कार्य किया। यहां पर उन्होंने बंगाली सीखी। साल 1931 में मदर टेरेसा ने धार्मिक प्रतिज्ञा ली। उनके बचपन का नाम एक्नेस था, लेकिन उन्होंने भारत आने के बाद टेरेसा चुना। क्योंकि वह संत थेरेस ऑस्ट्रेलिया और टेरेसा ऑफ अविला को सम्मान देना चाहती थीं।</div><div><br></div><h2>आत्मा की आवाज सुनी</h2><div>कलकत्ता में वह एनटैले में लोरेट कॉन्वेंट स्कूल में करीब 20 सालों तक पढ़ाती रहीं। साल 1944 में वह स्कूल की हेडमिस्ट्रेस बनीं। लेकिन वह कलकत्ता की गरीबी देख कर व्यथित हो जाती थीं। साल 1943 में बंगाल में आए अकाल और अगस्त 1946 में कौमी हिंसा से होने वाले हालातों को लेकर दुखी रहीं। इस दौरान जब वह दार्जलिंग जा रही थीं, तो आत्मा की आवाज ने उनको झझकोरा। इसके बाद उन्होंने गरीबों की सेवा करने का फैसला किया।</div><div><br></div><h2>गरीबों के लिए संघर्ष</h2><div>मदर टेरेसा के लिए गरीबों की सेवा करना आसान नहीं था। क्योंकि उनके पास पैसे नहीं थे, लेकिन वह दो साड़ियों में गरीबों के बीच पहुंच गईं। इसके अलावा वह झोपड़ी में रहते लगीं। लोगों का पेट भरने के लिए भीख मांगने से भी पीछे नहीं हटीं। वह खुद संघर्ष करती रहीं, लेकिन कॉन्वेंट वापस नहीं गईं।</div><div><br></div><h2>कारवां बनता गया</h2><div>लोग उनसे जुड़ते रहे और गरीबों में भी अतिगरीब लोगों की सेवा का अभियान शुरू हुआ। फिर सरकारी अधिकारी से लेकर चर्च तक का ध्यान मदर टेरेसा के ऊपर गया। उनको अपने कार्यों में मदद मिलने लगी। वहीं मदर टेरेसा को चर्च से मिशिनरीज ऑफ चैरिटी खोलने की परमिशन मिल गई। इसके बाद उन्होंने कोढ़ रोगियों के लिए सेवा केंद्र खोला, जिसको शांतिनगर नाम मिला।</div><div><br></div><h2>सम्मान</h2><div>साल 1960 में मदर टेरेसा का काम विदेशों तक पहुंचा। साल 1979 में मदर टेरेसा को नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 05 सितंबर 1997 को कोलकाता में मदर टेरेसा का निधन हो गया।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 26 Aug 2026 13:28:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/journey-agnes-to-mother-when-mission-of-charity-began-in-response-to-call-soul</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Neil Armstrong Death Anniversary: Korean War में मौत को मात देने वाले Neil Armstrong कैसे बने Moon Hero]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/how-neil-armstrong-who-cheated-death-in-korean-war-became-moon-hero]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 25 अगस्त को चंद्रमा पर कदम रखने वाले पहले इंसान नील आर्मस्ट्रॉन्ग का निधन हो गया था। अमेरिका के रियल हीरो रहे नील का यह बचपन का सपना था कि उनको स्पेस जाना है। वहीं चंद्रमा तक के सफर में उन्होंने खुद को साबित कर दिखाया। लेकिन इसके बाद उन्होंने खुद को प्रचार से दूर रखा। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर नील आर्मस्ट्रॉन्ग के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>ओहियो के वापाकाओनेटा में 05 अगस्त 1930 को नील आर्मस्ट्रॉन्ग का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम स्टीफन कोयनिंग ओहिया राज्य सरकार में ऑडिटर थे। बचपन से ही नील को हवा में उड़ने का शौक था। उनको सिर्फ 6 साल की उम्र में दुनिया के सबसे लोकप्रिय विमान में उड़ने का अनुभव हुआ था। वह 15 साल की उम्र तक इतना अनुभव प्राप्त कर चुके थे कि वह खुद विमान उड़ा सकें।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/vikram-sarabhai-father-of-indian-space-program-discover-interesting-facts" target="_blank">Vikram Sarabhai Birth Anniversary: Dr Vikram Sarabhai ने कैसे रखा भारत के Space Program का आधार, जानिए रोचक तथ्य</a></h3><h2>नेवी में एविएटर</h2><div>16 साल की उम्र में नील ने ड्राइविंग लाइसेंस प्राप्त करने से पहले स्टूडेंट फ्लाइट सर्टिफिकेट प्राप्त कर लिया था। इस दौरान उनको स्काउट में भी ईगल स्काउट की रैंक मिली और सिल्वर बफैलो अवार्ड मिला था। इसके बाद उन्होंने एरोनॉटिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू की। उन्होंने US नेवी में एविएटर के रूप में भी सेवा दी।&nbsp;</div><div><br></div><h2>कोरिया युद्ध में बची जान</h2><div>साल 1950 में वह क्वालिफाइड नेवल एविएटर बने। इसके बाद उनको अनुभव के साथ फाइटर बॉम्बर भी उड़ाने का मौका मिला। साल 1951 में नील आर्मस्ट्रॉन्ग को कोरिया युद्ध में टोही विमान उड़ाने की जिम्मेदारी मिली। उनको निचली दूरी पर उड़ान भरते हुए सेफ जगह में आकर विमान से कूदना पड़ा। वहीं इस हादसे में नील को कोई नुकसान नहीं हुआ।</div><div><br></div><h2>अंतरिक्ष यात्री बनने का सफर</h2><div>फिर आर्मस्ट्रॉन्ग यूनाइटेड स्टेट नेवी रिजर्व में एन्साइन बने। साल 1953 तक सक्रिय ड्यूटी करने के बाद वह 1960 तक रिजर्व में रहे। इस बीच उन्होंने कई तरह के विमानों को उड़ाने का अनुभव लिया। साल 1958 में नील आर्मस्ट्रॉन्ग अमेरिकी एयर फोर्स के मैन इन स्पेस सूनेस्ट कार्यक्रम में चुने गए, लेकिन बाद में वह कार्यक्रम रद्द हो गया।</div><div><br></div><h2>अयोग्य थे नील</h2><div>सिविलयम टेस्ट पायलट होने के कारण वह अंतरिक्ष यात्री होने की योग्यता नहीं रखते थे। साल 1962 में प्रोजेक्ट जेमिनी के लिए आवेदन मांगे गए। जिसके लिए सिविलयन टेस्ट पायलटों को योग्य माना गया था। सितंबर 1962 में नील को नासा ने बुलासा और वह नासा एरोनॉट्सकॉर्प के लिए सिलेक्ट हुए। नील इस ग्रुप में चुने गए दो सिविलियन पायलट में से एक थे। फिर वह जेमिनी अभियान तीन बार अंतरिक्ष गए।</div><div><br></div><h2>चंद्रयात्रा के लिए सिलेक्शन</h2><div>अपोलो-1 अभियान के बाद नील 18 अंतरिक्ष यात्रियों के दल में शामिल हुए, जिनको चंद्रमा पर जाना था। एक बार लूनार लैंडिंग की प्रैक्टिस के दौरान जब उनका विमान उतर रहा था, तो सही समय पर पैराशूट खोलने के कारण वह बच गए थे। आर्मस्ट्रॉन्ग को अपोलो-11 के क्रू के लिए कमांडर चुना गया। वहीं 20 जुलाई 1969 को नील आर्मस्ट्रॉन्ग चंद्रमा पर कदम रखने वाले पहले अंतरिक्ष यात्री बन गए। अपना मिशन पूरा करने के बाद वह 2 साल तक नासा पर रहे। फिर उन्होंने ओहियो में इंजिनियरिंग का शिक्षण कार्य किया था। लेकिन साल 1980 में नील आर्मस्ट्रॉन्ग ने शिक्षण कार्य भी छोड़ दिया।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 25 अगस्त 2012 को 82 साल की उम्र में नील आर्मस्ट्रॉन्ग ने ओहिया में आखिरी सांस ली।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 25 Aug 2026 14:13:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/how-neil-armstrong-who-cheated-death-in-korean-war-became-moon-hero</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[UP Politics के 'बाबूजी' और Good Governance के प्रतीक Kalyan Singh: जिनके सुशासन की आज भी दी जाती है मिसाल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/kalyan-singh-a-towering-figure-of-indian-politics]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारतीय राजनीति के युगपुरुष, श्रेष्ठ राजनीतिज्ञ, कोमल हृदय एवं संवेदनशील व्यक्तित्व, वज्रबाहु राष्ट्रप्रहरी, भारतमाता के सच्चे सपूत तथा भारतीय राजनीति में भगवान श्रीराम के हनुमान कहे जाने वाले हिंदू हृदय सम्राट कल्याण सिंह जी उन विरल नेताओं में थे, जिन्होंने भारतीय राजनीति में अनेक ऐतिहासिक मिसालें प्रस्तुत कीं। उनका राजनीतिक एवं व्यक्तिगत जीवन सदैव निष्कलंक, सिद्धांतनिष्ठ और प्रेरणास्पद रहा। कुशल प्रशासन, दृढ़ निर्णय क्षमता और जनहित के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता की मिसालें तब तक दी जाती रहेंगी, जब तक यह संसार रहेगा। कल्याण सिंह जी ने राजनीति को सत्ता नहीं, बल्कि सेवा का माध्यम माना और जमीन से जुड़कर ‘जनता के नेता’ के रूप में जन-जन के हृदय में अपनी अमिट छवि स्थापित की। वे बच्चों, युवाओं, महिलाओं, बुजुर्गों और सभी वर्गों में समान रूप से लोकप्रिय थे। देश का प्रत्येक हिंदू युवा और बालक उन्हें अपना आदर्श मानता था। उनका व्यक्तित्व हिमालय के समान विराट, अडिग और तेजस्वी था। भारतीय राजनीति में वे स्नेह और सम्मान के साथ ‘बाबूजी’ के नाम से विख्यात रहे। उनका संपूर्ण जीवन सादगी, राष्ट्रभक्ति और मूल्यों की राजनीति का अनुपम उदाहरण है। उन्होंने कभी भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया और हर परिस्थिति में राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखा। भारतीय राजनीति और समाज के लिए उनका योगदान युगों-युगों तक प्रेरणास्रोत बना रहेगा। हिंदू हृदय सम्राट कल्याण सिंह जी का नाम इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों पर सदैव अमर रहेगा।</div><div><br></div><div>उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का जन्म 5 जनवरी सन् 1932 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ जनपद की अतरौली तहसील के मढ़ौली ग्राम के एक सामान्य किसान परिवार में हुआ। कल्याण सिंह के पिता का नाम तेजपाल सिंह लोधी और माता का नाम सीता देवी था। कल्याण सिंह में बचपन से ही नेतृत्व करने की क्षमता थी। कल्याण सिंह बचपन में ही राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ से जुड़ गए थे और राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ की शाखाओं में भाग लेने लगे थे। कल्याण सिंह ने विपरीत परिस्थितियों में कड़ी मेहनत कर अपनी उच्च शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद कल्याण सिंह ने अध्यापक की नौकरी की। और साथ-साथ राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ से जुड़ कर राजनीति के गुण भी सीखते रहे। कल्याण सिंह राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ में रहकर गांव-गांव जाकर लोगों में जागरुकता पैदा करते रहे। कल्याण सिंह का विवाह रामवती देवी से हुआ। कल्याण सिंह के दो संतान है। एक पुत्र और एक पुत्री, पुत्र का नाम राजवीर सिंह उर्फ राजू भैया है और पुत्री का नाम प्रभा वर्मा है। कल्याण सिंह के पुत्र राजवीर सिंह उर्फ राजू भैया वर्तमान में उत्तर प्रदेश की एटा लोकसभा सीट से संसद सदस्य हैं। कल्याण सिंह ने अपना पहला विधानसभा चुनाव अतरौली से जीतकर 1967 में उत्तर प्रदेश विधानसभा पहुंचे। कल्याण सिंह 1967 से लगातार 1980 तक उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य रहे। इस बीच देश में आपातकाल के समय कल्याण सिंह 1975-76 में 21 महीने जेल में रहे। इस बीच कल्याण सिंह को अलीगढ़ और बनारस की जेलों में रखा गया। आपातकाल समाप्त होने के बाद 1977 में रामनरेश यादव को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया। जिसमें कल्याण सिंह को स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया। सन् 1980 के उत्तर प्रदेश के चुनावों में कल्याण सिंह विधानसभा का चुनाव हार गये। भाजपा के गठन के बाद कल्याण सिंह को उत्तर प्रदेश का संगठन महामंत्री बनाया गया। इस बीच कल्याण सिंह ने गाँव-गाँव, घर-घर जाकर भाजपा को उत्तर प्रदेश में पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाई।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/an-extraordinary-journey-from-grassroots-politics-to-maharashtra-cm-chair" target="_blank">Vilasrao Deshmukh Death Anniversary: जमीनी राजनीति से Maharashtra CM की कुर्सी तक का अद्भुत Journey</a></h3><div>कल्याण सिंह 1985 से लेकर 2004 तक लगातार उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य रहे। इस बीच कल्याण सिंह दो बार भाजपा के उत्तर प्रदेश से प्रदेश अध्यक्ष रहे। इस बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई में उत्तर प्रदेश में राम मंदिर आंदोलन चलाया गया। इस आंदोलन में कल्याण सिंह ने भी अहम भूमिका निभाई। राम मंदिर आंदोलन की वजह से उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश में भाजपा का उभार हुआ। और जून 1991 में भाजपा ने उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत से सरकार बनायी। जिसमे कल्याण सिंह की अहम भूमिका रही। और कल्याण सिंह को मुख्यमंत्री बनाया गया। कल्याण सिंह के मुख्यमंत्री रहते कारसेवकों द्वारा अयोध्या में विवादित बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद वहाँ श्री राम का एक अस्थायी मन्दिर निर्मित कर दिया गया। कल्याण सिंह ने बाबरी मस्जिद विध्वंस की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए 6 दिसम्बर 1992 को मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया। यहीं से भाजपा को कल्याण सिंह के रूप में हिंदुत्ववादी चेहरा मिल गया। इसके बाद उत्तर प्रदेश में भाजपा ने कल्याण सिंह के नेतृत्व में अनेक आयाम छुए। 1993 के उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में कल्याण सिंह अलीगढ के अतरौली और एटा के कासगंज से विधायक निर्वाचित हुये। इन चुनावों में भाजपा कल्याण सिंह के नेतृत्व में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। लेकिन सपा-बसपा ने मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में गठबन्धन सरकार बनायी। और उत्तर प्रदेश विधान सभा में कल्याण सिंह विपक्ष के नेता बने। इसके बाद कल्याण सिंह 1997 से 1999 तक पुनः दूसरी बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। कल्याण सिंह के मुख्यमंत्री काल में कानून व्यवस्था एकदम मजबूत थी। इसलिए आज तक उत्तर प्रदेश में लोग कल्याण सिंह के मुख्यमंत्री काल की मिसाल देते हैं। 1998 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह के नेतृत्व में 58 सीटें जीती।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>1999 में भाजपा से मतभेद के कारण कल्याण सिंह ने भाजपा छोड़ दी। कल्याण सिंह ने राष्ट्रीय क्रांति पार्टी का गठन किया। 2002 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव अपने दम पर राष्ट्रीय क्रांति पार्टी से लड़ा और राष्ट्रीय क्रांति पार्टी के चार विधायक चुने गए और कल्याण सिंह ने बड़े स्तर पर पूरे प्रदेश में भाजपा को नुकसान पहुँचाया। इसके बाद उत्तर प्रदेश की जमीन पर भाजपा कई वर्षो तक कल्याण सिंह की उथल पुथल का और भाजपा के नकारा नेताओं की साजिश का शिकार बनी रही। लेकिन इसका फायदा न कल्याण सिंह को मिल पाया न भगवा पार्टी को।&nbsp; भाजपा और कल्याण सिंह दोनों उत्तर प्रदेश&nbsp; की राजनीति में हाशिये पर चले गए। 2004 में कल्याण सिंह ने पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी के आमंत्रण पर भाजपा में वापसी तो कर ली लेकिन, उनको वो पॉवर नहीं मिली जो मंदिर आन्दोलन के समय उनके पास थी। 2004 के आम चुनावों में उन्होंने बुलन्दशहर से भाजपा के उम्मीदवार के रूप में पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ा। और कल्याण सिंह पहली बार बुलंदशहर लोकसभा सीट से संसद पहुंचे। 2007 का उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव भाजपा ने कल्याण सिंह के नेतृत्व में लड़ा। कहने को भाजपा ने 2007 में कल्याण सिंह को भाजपा की तरफ से मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार तो बना दिया लेकिन नाम का, जिसके पास ना तो उम्मीदवार तय करने की पावर थी और ना ही उनके अंडर में उत्तर प्रदेश का चुनाव प्रबंधन था। इसलिए वो चुनाव में कुछ अच्छा नहीं कर सके। इसके बाद 2009 में पुनः अपनी उपेक्षा का आरोप लगाते हुए मतभेदों के कारण भाजपा का दामन छोड़कर सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव से नजदीकियां बढ़ा लीं। 2009 के लोकसभा चुनावों में एटा लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से निर्दलीय सांसद चुने गये। फिर 2009 लोकसभा चुनाव खत्म होते ही मुलायम ने कल्याण से नाता तोड़ लिया। क्योंकि कल्याण सिंह की बजह से मुस्लिम समुदाय के लोग उनसे नाता तोड़ चुके थे। इसके बाद कल्याण सिंह ने राष्ट्रीय जनक्रान्ति पार्टी का गठन किया जो कि 2012 के विधानसभा चुनाव में कुछ विशेष नहीं कर सकी। लेकिन मुलायम के परम्परागत वोट उनके पास वापस आ गए। इसके बाद 2013 में कल्याण सिंह की भाजपा में पुनः वापसी हुई और कल्याण सिंह का परंपरागत लोधी-राजपूत वोट भी भाजपा से जुड़ गया। और 2014 के लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी के कहने पर कल्याण सिंह ने उत्तर प्रदेश में भाजपा का खूब प्रचार किया। भाजपा ने अकेले अपने दम पर 80 लोकसभा सीटों से 71 लोकसभा सीटें जीतीं। और नरेंद्र मोदी देश के यशस्वी प्रधानमंत्री बनें। इसके बाद किसी समय देश के भावी प्रधानमंत्री कहे जाने वाले कल्याण सिंह को राष्ट्रपति ने केंद्र सरकार की सिफारिश पर सितंबर 2014 में राजस्थान का राज्यपाल बनाया। इसके बाद कल्याण सिंह को जनवरी 2015 से अगस्त 2015 तक हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल का अतिरिक्त कार्यभार सौंपा गया। लेकिन राजस्थान का राज्यपाल रहते हुए भी कल्याण सिंह का दखल उत्तर प्रदेश की राजनीति में रहा। कल्याण सिंह ने राजस्थान के राज्यपाल के रूप में अपना 05 साल का कार्यकाल पूरा किया और 08 सितम्बर 2019 तक कल्याण सिंह राजस्थान के राज्यपाल रहे। इसके बाद कल्याण सिंह ने 09 सितम्बर 2019 को लखनऊ में भाजपा की पुनः सदस्यता ली और फिर से भाजपाई हो गए।</div><div>&nbsp;</div><div>उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा और 2019 के लोकसभा चुनावों में भी कल्याण सिंह जी का अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावी दखल रहा। 2017 के विधानसभा और 2019 के लोकसभा चुनावों में पार्टी के अधिकांश प्रत्याशी कल्याण सिंह जी का आशीर्वाद लेने जयपुर राजभवन जाते रहे। इससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि कल्याण सिंह जी जनमानस में कितने लोकप्रिय थे। आज भी लोग कल्याण सिंह सरकार के कार्यकाल की मिसाल देते हैं, क्योंकि जब कल्याण सिंह जी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे, तब प्रदेश में सुशासन, विकास और व्यवस्था में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिले थे। यही कारण है कि उनकी लोकप्रियता समाज के विभिन्न वर्गों में व्यापक रही। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी अपने अनेक भाषणों में कल्याण सिंह सरकार के कुशल प्रशासन और सुशासन की मिसाल देते रहे हैं। कल्याण सिंह जी अपने समय में उत्तर प्रदेश के सर्वमान्य हिंदुत्ववादी नेताओं में गिने जाते थे। अपनी सशक्त राजनीतिक शैली, कुशल प्रशासन और हिंदुत्ववादी छवि के लिए प्रसिद्ध भगवान श्रीराम के अनन्य भक्त कल्याण सिंह जी ने 21 अगस्त 2021 को 89 वर्ष की आयु में अपनी अंतिम सांस ली। उनके निधन से भारतीय राजनीति में एक युग का अवसान हुआ, लेकिन उनके विचार, आदर्श, सुशासन और राष्ट्रभक्ति की विरासत सदैव प्रेरणा देती रहेगी।</div><div><br></div><div>श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के अग्रणी योद्धा, धर्म और राष्ट्र के लिए सत्ता का त्याग करने वाले उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री तथा राजस्थान एवं हिमाचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल, श्रद्धेय श्री कल्याण सिंह जी की आज 5वीं पुण्यतिथि है। उनका जीवन भारतीय राजनीति में त्याग, साहस और सिद्धांत निष्ठा का अनुपम उदाहरण है। जब-जब धर्म, आस्था और कर्तव्य के लिए किए गए त्याग की चर्चा होगी, तब-तब श्री कल्याण सिंह जी का नाम विशेष सम्मान और गौरव के साथ स्मरण किया जाएगा। अयोध्या में आज भव्य और दिव्य रामलला के मंदिर की जो ऐतिहासिक परिकल्पना साकार हुई है, उसमें स्वर्गीय श्री कल्याण सिंह जी का योगदान सदैव अविस्मरणीय रहेगा। उन्होंने अपने पद, सत्ता और राजनीतिक भविष्य की परवाह किए बिना धर्म और जनभावनाओं की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। उनका दृढ़ संकल्प, अडिग नेतृत्व और राष्ट्रहित के प्रति निष्ठा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बना रहेगा। श्रद्धेय बाबूजी का जीवन और कृतित्व भारतीय इतिहास के स्वर्णिम अध्यायों में सदैव अंकित रहेगा।</div><div>&nbsp;</div><div>- डॉ. ब्रह्मानंद राजपूत</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 21 Aug 2026 15:10:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/kalyan-singh-a-towering-figure-of-indian-politics</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Bismillah Khan Death Anniversary: शहनाई को 'बेगम' मानने वाले Bharat Ratna की वो धुनें जो आज भी हैं अमर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/immortal-melodies-of-bharat-ratna-who-regarded-shehnai-as-his-begum]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>दुनिया को शहनाई की सुरीली तान से परिचित कराने वाले उस्ताद बिस्मिल्लाह खां का 21 अगस्त को निधन हो गया था। बिस्मिल्लाह खां ने अपना पूरा जीवन संगीत- साधना में लगा दिया था। वह शहनाई को अपना बेगम कहा करते थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर उस्ताद बिस्मिल्लाह खां के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>बिहार प्रदेश के डुमरांव के ठठेरी बाजार में 21 मार्च 1916 बिस्मिल्लाह खान का जन्म हुआ था। वहीं 8 साल की उम्र में बिस्मिल्लाह खां वाराणसी आ गए और फिर यहीं के होकर रह गए। वह संगीत घराने से ताल्लुक रखते थे। उनके चाचा अली बक्श वाराणसी के मंदिर काशी विश्वनाथ मंदिर में शहनाई बजाया करते थे। इसी दौरान उन्होंने ठान लिया कि वह अपने चाचा की तरह शहनाई बजाएंगे। फिर उन्होंने अपने चाचा को अपना गुरु बना लिया था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/vision-of-rajiv-gandhi-architect-of-modern-india-that-transformed-nation-destiny" target="_blank">Rajiv Gandhi Birth Anniversary: आधुनिक भारत के निर्माता Rajiv Gandhi का वो विजन जिसने बदली देश की तकदीर</a></h3><h2>मां सरस्वती के साधक</h2><div>बिस्मिल्लाह खां मुस्लिम थे, लेकिन वह मां सरस्वती की पूजा करते थे। संगीत साधना से पहले मां सरस्वती से अपनी कला को बेहतर बनाने की प्रार्थना करते थे। बिस्मिल्लाह खां ने कभी किसी भी धर्म में भेद नहीं करते थे। वहीं मां सरस्वती की कृपा बिस्मिल्लाह खां पर हमेशा बनी रही।</div><div><br></div><h2>बनारस के घाट पर सीखा शहनाई बजाना</h2><div>बिस्मिल्लाह खां ने अपने चाचा अली बख्श के साथ बनारस चले गए थे। यहीं पर गंगा किनारे बैठकर वह शहनाई बजाना सीखते थे। बिस्मिल्लाह खां काशी विश्वनाथ मंदिर में शहनाई बजाते थे। कुछ ही दिनों बाद उस्ताद बिस्मिल्लाह खां को ऑल इंडिया म्यूजिक कॉन्फ्रेंस कलकत्ता में संगीत के महारथियों के सामने शहनाई बजाने का मौका मिला था।</div><div><br></div><h2>आजादी के जश्न में शहनाई की तान</h2><div>उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की शहनाई का पूरा देश ही कायल था। वहीं 15 अगस्त 1947 को जब देश को आजाद हुआ था। तो जश्न-ए-आजादी में भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने बिस्मिल्लाह खां को बुलावा भेजा। बिस्मिल्लाह खां की जादुई शहनाई से जश्न-ए-आजादी की रौनक बढ़ गई थी।</div><div><br></div><h2>सम्मान</h2><div>वहीं संगीत की दुनिया में अपना योगदान देने के लिए बिस्मिल्लाह खां को भारत रत्न, पद्म भूषण, पद्म विभूषण और पद्म श्री जैसे सर्वोच्च पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।</div><div><br></div><h2>निधन</h2><div>वहीं 21 अगस्त 2006 को उस्ताद बिस्मिल्लाह खां ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 21 Aug 2026 15:07:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/immortal-melodies-of-bharat-ratna-who-regarded-shehnai-as-his-begum</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Rajiv Gandhi Birth Anniversary: आधुनिक भारत के निर्माता Rajiv Gandhi का वो विजन जिसने बदली देश की तकदीर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/vision-of-rajiv-gandhi-architect-of-modern-india-that-transformed-nation-destiny]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 20 अगस्त को देश के पूर्व पीएम रहे राजीव गांधी का जन्म हुआ था। वह भारत के सबसे युवा प्रधानमंत्री थे। राजीव गांधी भारत को 21वीं सदी में ले जाने का सपना देखते थे। हालांकि उनको राजनीति में दिलचस्पी नहीं थी। लेकिन जिस तेजी के साथ राजीव गांधी का राजनीतिक जीवन शुरू हुआ था, उतना ही दर्दनाक और भयावह स्थिति में उसका अंत भी हुआ। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर पूर्व पीएम राजीव गांधी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>मुंबई में 20 अगस्त 1944 को राजीव गांधी का जन्म हुआ था। वह एक ऐसे परिवार में पले-बढ़े थे, जहां पर राजनीति और सत्ता देश के इतिहास का हिस्सा थी। उनकी मां देश की पहली महिला पीएम इंदिरा गांधी थीं। वहीं उनके पिता का नाम फिरोज गांधी थी। राजीव गांधी के नाना पंडित जवाहरलाल नेहरू आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री थे। राजीव गांधी का बचपन दिल्ली स्थित तीन मूर्ति भवन में बीता।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/an-extraordinary-journey-from-grassroots-politics-to-maharashtra-cm-chair" target="_blank">Vilasrao Deshmukh Death Anniversary: जमीनी राजनीति से Maharashtra CM की कुर्सी तक का अद्भुत Journey</a></h3><h2>पायलट बनना चाहते थे राजीव</h2><div>राजीव की शुरूआती जिंदगी राजनीति से अलग थी। उन्होंने देहरादूर के दून स्कूल से पढ़ाई की और फिर ब्रिटेन चले गए। वहां पर ट्रिनिटी कॉलेज, कैम्ब्रिज में पढ़ाई शुरू की। इसके बाद राजीव गांधी ने लंदन के इंपीरियल कॉलेज में मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। राजीव की दिलचस्पी तकनीक और विज्ञान में थी। वह पायलट बनना चाहते थे।</div><div><br></div><div>इसके लिए राजीव गांधी ने दिल्ली फ्लाइंग क्लब की परीक्षा पास की। उन्होंने कमर्शियल पायलट का लाइसेंस प्राप्त किया। फिर वह इंडियन एयरलाइंस के पायलट बने। वह राजनीति से दूर अपना जीवन जी रहे थे। तभी साल 1980 के विमान दुर्घटना में राजीव के छोटे भाई संजय गांधी की मौत हो गई। ऐसे में राजीव को मजबूरन सियासत में आना पड़ा।</div><div><br></div><h2>राजनीति में एंट्री</h2><div>राजीव गांधी ने अमेठी से लोकसभा उपचुनाव लड़ा और जीत हासिल की। धीरे-धीरे राजीव कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय होत गए। वहीं 31 अक्तूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई और कांग्रेस नेतृत्व के सामने बड़ा संकट खड़ा हो गया। जिसके बाद राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री पद संभाला। इसके बाद उन्होंने आम चुनाव का ऐलान कर दिया। इस चुनाव में कांग्रेस को ऐतिहासिक जीत मिली और पार्टी ने 508 में से 401 लोकसभा सीटें प्राप्त कीं।</div><div><br></div><h2>आधुनिक भारत की नींव</h2><div>राजीव गांधी के सामने देश को संभालने की चुनौती थी, तो वह आधुनिक भारत की नींव मजबूत करने की महत्वाकांक्षी थे। वह तकनीक के क्षेत्र में भारत को आगे लेकर जाना चाहते थे। वह 21वीं सदी के भारत का सपना देखते थे। राजीव गांधी के कार्यकाल में भारत में सूचना प्रौद्योगिकी और दूरसंचार के विस्तार की दिशा आगे बढ़ी। वही बाद के वर्षों में राजीव गांधी को कंप्यूटर और तकनीक क्रांति को बढ़ावा देने वाले नेता के रूप में जाना गया।</div><div><br></div><h2>आखिरी सफर</h2><div>जिस तरह से राजीव गांधी के जीवन के रूख अचानक से राजनीति की ओर मुड़ा था। उस तरह एक बेहद भयावह घटना ने उसको हमेशा के लिए रोक दिया। 21 मई 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेरुम्बुदूर में चुनाव प्रचार के दौरान राजीव गांधी की हत्याकर दी गई थी।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 20 Aug 2026 13:23:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/vision-of-rajiv-gandhi-architect-of-modern-india-that-transformed-nation-destiny</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Peshwa Bajirao I Birth Anniversary: मुगलों के खिलाफ कभी नहीं हारी बाजी, 41 युद्धों के महानायक की वीरगाथा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/never-lost-battle-against-mughals-heroic-saga-of-legendary-commander-of-41-wars]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 18 अगस्त को पेशवा बाजीराव प्रथम का जन्म हुआ था। वह एक बेहतरीन घुड़सवार, कुशल तलवारबाजी और कमाल के सेनापति थे। बाजीराव प्रथम युद्ध में माहिर थे। उन्होंने मुगलों की कमर तोड़ दी थी। बाजीराव प्रथम अपनी जिंदगी में एक भी युद्ध नहीं हारे थे। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर पेशवा बाजीराव के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>18 अगस्त 1700 को पेशवा बाजीराव का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम बालाजी विश्वनाथ और मां का नाम राधाबाई था। इनके पिता छत्रपति शाहू के प्रथम पेशवा थे। बाजीराव का एक छोटा भाई चिमाजी अप्पा था। बाजीराव अपने पिता के साथ हमेशा सैन्य अभियानों में जाया करते थे।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/bal-gangadhar-tilak-who-shook-foundations-of-british-rule-through-journalism" target="_blank">Bal Gangadhar Tilak Death Anniversary: पत्रकारिता के जरिए ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिलाने वाले Bal Gangadhar Tilak</a></h3><h2>बाजीराव प्रथम</h2><div>पेशवा बाजीराव को बाजीराव प्रथम भी कहा जाता है। वह मराठा साम्राज्य के एक महान पेशवा थे। पेशवा का अर्थ प्रधानमंत्री होता है। वह मराठा छत्रपति राजा शाहू के चौथे प्रधानमंत्री थे। बाजीराव ने अपना प्रधानमंत्री पद साल 1720 से लेकर मृत्यु तक संभाला था।</div><div><br></div><div>बाजीराव घुड़सवारी करते हुए लड़ने में माहिर थे। यह माना जाता है कि उनसे अच्छा घुड़सवार सैनिक देश में आज तक नहीं देखा गया। उनके 4 घोड़े थे- गंगा, नीला, सारंगा और औलख आदि। जिनकी वह खुद देखभाल किया करते थे। बाजीराव 6 फुट ऊंचे थे और वह न्यायप्रिय सफेद या हल्के रंग के कपड़े पहनना पसंद करते थे। बाजीराव पूरी सेना को अनुशासन में रखते थे।</div><div><br></div><div>बता दें कि 20 साल की उम्र में बाजीराव पेशवा के पद पर नियोजित हुए थे। उनके पेशवा बनते ही छत्रपति शाहू नाम मात्र के शासक रह गए थे। वह एक महान योद्धा थे। मोहम्मद बंगश, निजाम से लेकर मुगलों और पुर्तगालियों तक को वह कई-कई बार शिकस्त देते। बाजीराव इतिहास के अकेले ऐसे योद्धा थे, जिन्होंने 41 लड़ाइयां लड़ी थीं और एक भी लड़ाई नहीं हारी। बाजीराव की बिजली की गति से तेज आक्रमण शैली का इस्तेमाल कर रहे थे।&nbsp;</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>बाजीराव पेशवा की 28 अप्रैल 1740 को 39 साल की उम्र में मृत्यु हो गई थी।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 18 Aug 2026 17:33:02 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/never-lost-battle-against-mughals-heroic-saga-of-legendary-commander-of-41-wars</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Vilasrao Deshmukh Death Anniversary: जमीनी राजनीति से Maharashtra CM की कुर्सी तक का अद्भुत Journey]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/an-extraordinary-journey-from-grassroots-politics-to-maharashtra-cm-chair]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 14 अगस्त को विलासराव देशमुख का निधन हो गया था। वह महाराष्ट्र के दो बार मुख्यमंत्री बने थे। वह राजनीति के मंझे हुए राजनेता थे। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत पंचायत चुनाव से की थी। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर विलासराव देशमुख के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>महाराष्ट्र के लातूर जिले के बाभालगांव में 26 मई 1945 विलासराव देशमुख का जन्म हुआ था। उन्होंने पुणे विश्वविद्यालय से विज्ञान और ऑर्ट्स दोनों में ग्रेजुएशन किया था। उन्होंने पुणे के इंडियन लॉ सोसाइटी लॉ कॉलेज से कानूनी शिक्षा ली। उन्होंने अपने सियासी सफर की शुरूआत पंचायत चुनावों से की थी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/heroine-who-hoisted-india-tricolour-in-germany-and-challenged-british-rule" target="_blank">Bhikaji Cama Death Anniversary: वो वीरांगना जिसने Germany में लहराया भारत का तिरंगा और British Rule को ललकारा</a></h3><h2>राजनीतिक सफर</h2><div>उन्होंने अपने सियासी सफर की शुरूआत&nbsp; साल 1974 से अपने पैतृक गांव से की थी। वह साल 1974 से लेकर 1979 तक सरपंच की भूमिका निभाई। फिर साल 1980 में वह पहली बार महाराष्ट्र की विधानसभा की सीढ़ियां चढ़ें। विधायक बनने से पहले विलासराव देशमुख लातूर तालुका पंचायत समिति का सभापति, उस्मानाबाद जिला परिषद सदस्य, उस्मानाबाद युवक कांग्रेस अध्यक्ष और उस्मानाबाद जिला कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में अपनी अच्छी-खासी पहचान बना चुके थे।</div><div><br></div><div>फिर साल 1985 से लेकर 1990 में वह राज्यमंत्री के रूप में उभरे। लेकिन साल 1995 के विधानसभा चुनाव में उनको हार का सामना करना पड़ा। वहीं साल 1999 में भाजपा और शिवसेना गठबंधन की सरकार में थी। वहीं भाजपा और शिवसेना को रोकने के लिए एनसीपी और कांग्रेस ने मिलकर लड़ाई लड़ी। इसमें विलासराव को उम्मीद दिखी। उन्होंने साल 1999 में कांग्रेस की ओर से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की।</div><div><br></div><h2>महाराष्ट्र के सीएम</h2><div>इसके बाद 18 अक्तूबर 1999 को विलासराव देशमुख महाराष्ट्र के सीएम बने। फिर साल 2004 में एक बार फिर वापसी करते हुए वह महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने। लेकिन दूसरी पारी ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाई।&nbsp; दरअसल, 26 नवंबर 2008 को आतंकवादी हमला हुआ। जिसके बाद देशमुख को मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा।</div><div><br></div><div>देशमुख साल 2009 में लोकसभा चुनाव लड़ना चाहते थे। लेकिन कुछ कारणों से वह लोकसभा चुनाव नहीं लड़ सके। वहीं बाद में कांग्रेस ने विलासराव देशमुख को राज्यसभा सदस्य बनाया और 28 मई 2009 को केंद्र सरकार में उद्योग मंत्री बने। फिर जनवरी 2011 से जुलाई 2011 तक केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री रहे। फिर जुलाई 2011 में उनको विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री बनाया गया।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 14 अगस्त 2012 को लिवर और किडनी की बीमारी के कारण विलासराव देशमुख का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 14 Aug 2026 12:39:56 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/an-extraordinary-journey-from-grassroots-politics-to-maharashtra-cm-chair</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Bhikaji Cama Death Anniversary: वो वीरांगना जिसने Germany में लहराया भारत का तिरंगा और British Rule को ललकारा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/heroine-who-hoisted-india-tricolour-in-germany-and-challenged-british-rule]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 13 अगस्त को स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगना भीकाजी कामा का निधन हो गया था। उन्होंने न सिर्फ भारत बल्कि विदेश में स्वतंत्रता की अलख जगाई थी। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारतीय तिरंगे को गर्व के साथ फहराया। भीकाजी कामा ने अपने साहस और बलिदान से इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज कराया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर भीकाजी कामा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>मुंबई में 24 सितंबर 1861 को भीकाजी कामा का जन्म हुआ था। वह एक समृद्ध पारसी परिवार से ताल्लुक रखती थीं। इनके पिता का नाम सोराबजी फ्रामजी पटेल था, जोकि एक प्रसिद्ध व्यापारी थे। भीकाजी कामा ने अंग्रेजी और फ्रेंच भाषा में महारत हासिल की थी। भीकाजी कामा की शादी रुस्तम कामा से हुई। लेकिन यह रिश्ता सफल नहीं रहा।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/vikram-sarabhai-father-of-indian-space-program-discover-interesting-facts" target="_blank">Vikram Sarabhai Birth Anniversary: Dr Vikram Sarabhai ने कैसे रखा भारत के Space Program का आधार, जानिए रोचक तथ्य</a></h3><h2>क्रांतिकारी जीवन</h2><div>भीकाजी कामा का क्रांतिकारी जीवन तब शुरू हुआ, जब साल 1869 में प्लेग महामारी फैली। तब भीकाजी कामा पीड़ितों की सेवा में जुट गईं। इस दौरान अंग्रेजी शासन की क्रूरता और भारतीयों के प्रति भेदभाव को देखकर भीकाजी कामा का मन विद्रोह से भर उठा। साल 1905 में वह सेहत कारणों की वजह से लंदन चली गईं। यहां पर वह दादाभाई नौरोजी और श्यामजी कृष्ण वर्मा जैसे क्रांतिकारियों से मिलीं। इसके बाद वह श्यामजी के 'इंडिया हाउस'&nbsp; में भारतीय संग्राम से जुड़ गईं।</div><div><br></div><h2>अंतरराष्ट्री मंच पर फहराया तिरंगा</h2><div>भीकाजी का ऐतिहासिक योगदान 22 अगस्त 1907 को जर्मनी के स्टटगार्ड में हुआ। यहां पर भीकाजी ने अंतरराष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन में भारत की तिरंगा फहराया। इस झंडे में लाल, हरा और केसरिया रंग था। उन्होंने अपने भाषण में ब्रिटिश शासन की बर्बरता का खुलासा किया। साथ ही उन्होंने भारत की आजादी की मांग को विश्व मंच पर रखा।</div><div><br></div><h2>ब्रिटिश सरकार के लिए खतरा</h2><div>भीकाजी 'वंदे मातरम' नामक पत्रिका की संपादक रहीं। जो भारतीय स्वतंत्रता के विचारों को फैलाने का माध्यम बनीं। भीकाजी के क्रांतिकारी लेख और भाषण ब्रिटिश सरकार के लिए खतरा बन चुके थे। जिस कारण उनकी गिरफ्तारी का आदेश जारी हुआ। लेकिन भीकाजी ने हार नहीं मानी और वह पेरिस चली गईं। वह पेरिस से क्रांतिकारी गतिविधियों को संचालित करती रहीं।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं साल 1935 में उनकी सेहत खराब रहने लगीं और वह भारत लौट आईं। वहीं 13 अगस्त 1936 को भीकाजी कामा का निधन हो गया।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 13 Aug 2026 14:28:03 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/heroine-who-hoisted-india-tricolour-in-germany-and-challenged-british-rule</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Sridevi Birth Anniversary: एक फिल्म के लिए 1 करोड़ चार्ज करने वाली Legend की Success Story और अनकहे किस्से]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/success-story-and-untold-anecdotes-of-legend-charged-1-crore-for-film]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदी सिनेमा की महिला सुपरस्टार रही अभिनेत्री श्रीदेवी का 13 अगस्त को जन्म हुआ था। आज भी एक्ट्रेस के अभिनय, खूबसूरती और व्यक्तित्व का प्रभाव सिनेमा प्रेमियों के दिलों में बसा है। अपनी बेहतरीन अदाकारी और डेडिकेशन के दम पर श्रीदेवी बॉलीवुड की 'सुपरस्टार' बन गई थीं। उन्होंने बहुत कम उम्र से ही फिल्मों में काम करना शुरू कर दिया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर एक्ट्रेस श्रीदेवी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>तमिलनाडु के मीनमपट्टी गांव में 13 अगस्त 1963 को श्रीदेवी का जन्म हुआ था। इनका असली नाम जिस उम्र में बच्चे स्कूल जाना शुरू करते हैं या अपना बचपन जीते हैं। उस छोटी सी 4 साल की उम्र से श्रीदेवी कैमरे के सामने एक्टिंग कर रही थीं। उन्होंने तमिल फिल्म 'कंधन करुणई' में एक बाल कलाकार के रूप में काम किया था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/unique-record-of-this-legend-won-8-filmfare-awards-without-any-music-training" target="_blank">Kishore Kumar Birth Anniversary: बिना किसी Music Training के 8 Filmfare Awards जीतने वाले इस Legend का अनूठा रिकॉर्ड</a></h3><h2>हिंदी फिल्मों का सफर</h2><div>तमिल फिल्मों में सफल होने के बाद श्रीदेवी ने 9 साल की उम्र में हिंदी फिल्म 'रानी मेरा नाम' से बॉलीवुड में एंट्री की। उनकी बचपन से ही एक्टिंग में पकड़ इतनी मजबूत थी कि वह किरदार में पूरी तरह से ढल जाती थीं।</div><div><br></div><h2>सुपरस्टारडम की शुरुआत</h2><div>बता दें कि साल 1979 में श्रीदेवी ने फिल्म 'सोलहवां सावन' से खुद को हिंदी सिनेमा में स्थापित कर लिया था। लेकिन एक्ट्रेस को असली पहचान फिल्म 'हिम्मतवाला' से मिली थी। इस फिल्म में दर्शकों ने उनकी एक्टिंग को खूब सराहा। इसके बाद 80 और 90 का दशक श्रीदेवी के नाम रहा। श्रीदेवी की मौजूदगी फिल्मों के हिट होने की गारंटी मानी जाती थी।</div><div><br></div><h2>हीरो से बड़ी स्टार</h2><div>अभिनेत्री को न सिर्फ दर्शकों का प्यार मिला, बल्कि इंडस्ट्री में भी उनको एक अलग दर्जा मिला। उस दौर में जब हीरो को हमेशा फिल्मों का केंद्र माना जाता था, तब श्रीदेवी ने ऐसी कई फिल्में कीं, जिसमें कहानी पूरी उनके ही इर्द-गिर्द घूमती थी।</div><div><br></div><h2>1 करोड़ रुपए की फीस पाने वाली पहली एक्ट्रेस</h2><div>80 और 90 के दशक में जब एक्ट्रेसेस को मेल एक्टर्स से कम फीस मिलती थी, तो इस मिथक को श्रीदेवी ने तोड़ा। वह बॉलीवुड की पहली एक्ट्रेस थीं, जिनको एक फिल्म के लिए 1 करोड़ रुपए तक फीस दी गई। उस समय यह बड़ी उपलब्धि थी। जो श्रीदेवी के स्टारडम और प्रभाव का प्रतीक था।</div><div><br></div><h2>फेमस फिल्में</h2><div>एक्ट्रेस श्रीदेवी ने अपने फिल्मी करियर में करीब 300 फिल्मों में काम किया है। उन्होंने 'लम्हे', 'सदमा', 'चांदनी', 'चालबाज', 'नगीना', 'खुदा गवाह', 'मिस्टर इंडिया', 'जुदाई', 'इंग्लिश विंग्लिश', 'बंजारन' और 'मॉम' जैसी फिल्मों में काम किया।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 24 फरवरी 2018 को दुबई में श्रीदेवी की मृत्यु हो गई थी।&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 13 Aug 2026 14:26:04 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/success-story-and-untold-anecdotes-of-legend-charged-1-crore-for-film</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Vikram Sarabhai Birth Anniversary: Dr Vikram Sarabhai ने कैसे रखा भारत के Space Program का आधार, जानिए रोचक तथ्य]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/vikram-sarabhai-father-of-indian-space-program-discover-interesting-facts]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 12 अगस्त को विक्रम साराभाई का जन्म हुआ था। उन्होंने भारत देश में इसरो की शुरूआत की थी। विक्रम साराभाई भौगोलिक वैज्ञानिक और खगोलशास्त्री थे। उन्होंने भारत के अंतरिक्ष अनुसंधान और परमाणु ऊर्जा को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई थी। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>गुजरात के अहमदाबाद में 12 अगस्त 1919 को विक्रम साराभाई का जन्म हुआ था। उनकी शुरूआती शिक्षा भारत में हुई। बाद में उच्च शिक्षा के लिए वह कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के सेंट जॉन्स कॉलेज गए। यहां से उन्होंने डॉक्टरेट की उपाधि ली और कास्मिक किरण अनुसंधान में महत्वपूर्ण योगदान दिया।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/discover-life-of-india-first-nobel-laureate-and-composer-of-national-anthem" target="_blank">Rabindranath Tagore Death Anniversary: जानिए भारत के पहले Nobel Laureate और राष्ट्रगान के रचयिता का महान जीवन</a></h3><h2>इसरो की नींव</h2><div>संयुक्त राज्य अमेरिका से वापसी के बाद डॉ विक्रम साराभाई ने नवंबर 1947 में उन्होंने भारत के अहमदाबाद में भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला की स्थापना की थी। हालांकि शुरूआत में PRL ने अनुसंधान पर ध्यान दिया। फिर डॉ विक्रम साराभाई के घर से ही रिट्रीट की शुरूआत की। इसने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की नींव रखने का काम किया था।</div><div><br></div><h2>अंतरिक्ष में योगदान</h2><div>विक्रम साराभाई ने अहमदाबाद में अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र की स्थापना की। यह भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए जरूरी पल था। उनकी कोशिशों के जरिए भी भारत का पहला कृत्रिम उपग्रह आर्यभट्ट को विकसित करने में महत्वपूर्ण योगदान निभाया था। साल 1962 में साराभाई की सलाह पर भारत सरकार ने इंडियन नेशनल स्पेस कमेटी फॉर स्पेस रिसर्च की स्थापना की।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 30 दिसंबर 1971 को केरल के तिरुवनंतपुरम में डॉ विक्रम साराभाई का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 12 Aug 2026 15:08:36 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/vikram-sarabhai-father-of-indian-space-program-discover-interesting-facts</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Rabindranath Tagore Death Anniversary: जानिए भारत के पहले Nobel Laureate और राष्ट्रगान के रचयिता का महान जीवन]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/discover-life-of-india-first-nobel-laureate-and-composer-of-national-anthem]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 07 अगस्त को रवींद्रनाथ टैगोर का निधन हो गया था। वह राष्ट्रगान 'जन गण मन अधिनायक' के रचयिता थे। रवींद्रनाथ टैगोर एक बहुआयामी प्रतिभा के मालिक थे। उन्होंने साहित्य, कविता, दर्शन, नाटक, संगीत और चित्रकारी समेत कई विधाओं में अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर रवींद्रनाथ टैगोर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>पश्चिम बंगाल के कोलकाता में 07 मई 1861 को रवींद्रनाथ टैगोर का जन्म हुआ था। वह 13 भाई-बहनों में सबसे छोटे थे। टैगोर का पालन-पोषण उनके पिता ने किया था। उनको बचपन से लिखने का शौक था। महज 8 साल की उम्र से ही उन्होंने कविताओं की रचनाएं शुरूकर दी थी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/bal-gangadhar-tilak-who-shook-foundations-of-british-rule-through-journalism" target="_blank">Bal Gangadhar Tilak Death Anniversary: पत्रकारिता के जरिए ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिलाने वाले Bal Gangadhar Tilak</a></h3><h2>बंगाल में हुए फेमस</h2><div>साल 1980 तक रवींद्रनाथ टैगोर ने कई कविताएं, उपन्यास और कहानियां लिखी थीं। इसको बंगाल के पब्लिशर्स ने पब्लिश किया था। इसके बाद वह बंगाल में काफी फेमस हो गए थे। टैगोर की रचनाओं के कारण से उनको हर कोई जानने लगा था। टैगोर ने अपनी रचनाओं के जरिए समाज की गलत रिवाजों और कुरीतियों के बारे में लोगों को जागरुक किया था।</div><div><br></div><h2>राष्ट्रगान के रचियता</h2><div>रवींद्रनाथ टैगोर को राष्ट्रगान के रचयिता के रूप में भी जाना जाता है। उन्होंने भारत के अलावा बांग्लादेश का राष्ट्रगान 'आमार सोनार बांग्ला' की भी रचना की थी। वहीं श्रीलंका के राष्ट्रगान को भी टैगोर की कविता से प्रेरित माना जाता है। टैगोर ने करीब 2,230 गीतों की रचना की थी।</div><div><br></div><h2>फेमस रचनाएं और सम्मान</h2><div>टैगोर की कुछ फेमस रचनाएं, 'काबुलीवाला', 'क्षुदिता पश्न', 'हैमांति' और 'मुसलमानिर गोल्पो' हैं। वहीं उनके फेमस उपन्यास 'नौकादुबी', 'चतुरंगा, गोरा', 'जोगजोग' और 'घारे बायर' है। रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा लिखी 'गीतांजलि' नामक कविता ने सबसे ज्यादा उपलब्धि हासिल की है। यह उनकी आखिरी रचना थी। वहीं साल 1913 में उनको नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। वह नोबेल पुरस्कार पाने वाले पहले गैर-यूरोपीय थे।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 07 अगस्त 1941 को रवींद्रनाथ टैगोर ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 07 Aug 2026 16:29:47 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/discover-life-of-india-first-nobel-laureate-and-composer-of-national-anthem</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Marilyn Monroe Death Anniversary: ग्लैमरस छवि के पीछे छिपा था गहरा Struggle, आज भी Mystery है एक्ट्रेस की मौत]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/deep-struggle-lay-hidden-behind-glamorous-image-actress-death-remains-mystery]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हॉलीवुड की सबसे फेमस एक्ट्रेस मर्लिन मुनरो का 05 अगस्त को निधन हो गया था। जब भी मर्लिन का जिक्र किया जाता है, तो आंखों के सामने एक्ट्रेस की उड़ती सफेद ड्रेस वाली तस्वीर आती है। वह 20वीं सदी की सबसे फेमस अमेरिकी एक्ट्रेस, मॉडल और सिंगर थीं। अपनी चमकदार और ग्लैमरस छवि के पीछे मर्लिन एक ऐसी महिला थीं, जो लगातार लोगों की नजरों में बने रहने और आलोचनाओं के बीच अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष कर रही थीं। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर एक्ट्रेस मर्लिन मुनरो के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>मर्लिन मुनरो का जन्म 01 जून 1926 को हुआ था। उनका असली नाम नॉर्मा जीन मॉर्टेनसन था। मर्लिन का बचपन अस्थिरता, संघर्षों और पालन-पोषण केंद्र में बीता। मर्लिन ने कम उम्र में ही यह महसूस कर लिया था कि महिलाओं को उनके व्यक्तित्व से ज्यादा बाहरी छवि के आधार पर जज किया जाता है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/unique-record-of-this-legend-won-8-filmfare-awards-without-any-music-training" target="_blank">Kishore Kumar Birth Anniversary: बिना किसी Music Training के 8 Filmfare Awards जीतने वाले इस Legend का अनूठा रिकॉर्ड</a></h3><h2>मॉडलिंग का सफर</h2><div>मर्लिन ने अपना करियर मॉडलिंग से शुरू किया था। वहीं जल्द ही वह हॉलीवुड की एक ग्लैमरस और मोहक एक्ट्रेस की इमेज में ढल गईं। कई फिल्मों ने एक्ट्रेस को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई थी। वह जल्द ही हॉलीवुड की सबसे बड़ी सितारों की लिस्ट में शामिल हो गईं। हालांकि एक्ट्रेस की सफलता के साथ उनके लिए एक चुनौती भी थी कि मर्लिन को अक्सर एक ही तरह की भूमिकाएं दी जाने लगीं। जिस कारण उनकी अभिनय क्षमता का पूरा प्रदर्शन नहीं हो सका।</div><div><br></div><h2>संवेदनशील महिला</h2><div>पर्दे पर ग्लैमरस और चुलबुली दिखने वाली मर्लिन मुनरो बेहद संवेदनशील और बौद्धिक सोच रखने वाली महिला थीं। वह अभिनय की गंभीरता से सीखना चाहती थीं। इसके अलावा उनको राजनीति, साहित्य, मनोविज्ञान और कला जैसे विषयों में गहरी रुचि थी।</div><div><br></div><h2>स्वतंत्र और मुखर एक्ट्रेस</h2><div>साल 1954 में एक्ट्रेस ने अपना खुद का प्रोडक्शन हाउस शुरू किया। उस समय में यह एक साहसिक कदम था। क्योंकि उस दौर में फिल्म स्टूडियो कलाकारों के करियर और फैसलों पर अपना कंट्रोल रखते थे। एक्ट्रेस ने उचित वेतन, बेहतर रोल और रचनात्मक स्वतंत्रता की मांग की। ऐसे में कई बार मर्लिन ने ऐसे रोल करने से इंकार कर दिया, जो उनको पसंद नहीं थे। एक्ट्रेस के इस कदम ने उनको हॉलीवुड की स्वतंत्र और मुखर अभिनेत्रियों में शुमार किया।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 05 अगस्त 1962 में मात्र 36 वर्ष की उम्र में मुनरो ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। वह अपने फ्लैट में रहस्यमई तरीके से मृत पाई गई थीं।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 05 Aug 2026 17:40:38 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/deep-struggle-lay-hidden-behind-glamorous-image-actress-death-remains-mystery</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[Kishore Kumar Birth Anniversary: बिना किसी Music Training के 8 Filmfare Awards जीतने वाले इस Legend का अनूठा रिकॉर्ड]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/unique-record-of-this-legend-won-8-filmfare-awards-without-any-music-training]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारतीय सिनेमा के इतिहास के फेमस गायक किशोर कुमार का 04 अगस्त को जन्म हुआ था। वह एक मल्टी टैलेंटेड कलाकार थे। वह एक बेहतरीन गायक होने के साथ-साथ एक्टर, राइटर और फिल्म प्रोड्यूसर भी थे। उन्होंने 2678 फिल्मों में गाने गाए और करीब 88 फिल्मों में बतौर अभिनेता काम किया था। किशोर कुमार ने 8 फिल्मफेयर अवॉर्ड अपने नाम किए थे। आज की फिल्मों में भी किशोर कुमार के गानों में रीमेक किया जाता है। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर सिंगर किशोर कुमार के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>मध्य प्रदेश में 04 जुलाई 1929 को किशोर कुमार का जन्म हुआ था। इनका असली नाम आभास कुमार था। जब वह फिल्म इंडस्ट्री का हिस्सा बने, तो उनका नाम किशोर पड़ा। उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में आने से पहले कोई म्यूजिक ट्रेनिंग नहीं ली थी। उनके भाई ने एक बार बताया था कि किशोर की आवाज बचपन में फंटे बांस की तरह थी, लेकिन जब उन्होंने गाना शुरू किया, तो उन्होंने अपनी आवाज से लोगों को अपना दीवाना बना लिया था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/as-successful-as-the-film-journey-of-tragedy-queen-her-real-life-equally-painful" target="_blank">Meena Kumari Birth Anniversary: 'Tragedy Queen' का फिल्मी सफर जितना सफल, असल जिंदगी उतनी दर्दनाक</a></h3><h2>बिना प्रैक्टिस गाते थे किशोर</h2><div>गायक किशोर कुमार ने अपने सिंगिंग करियर में करीब 15 सौ से ज्यादा गाने गाए थे। वह कई बार अपनी गायकी के अंदाज से म्यूजिक डायरेक्टर्स को भी हैरान कर देते थे। उनकी गायिकी पर इतनी अच्छी और बारीक पकड़ थी कि अक्सर वह बिना प्रैक्टिस के रिकॉर्डिंग करवाते थे। किशोर कुमार की काबिलियत का अंदाजा आप इस बात से भी लगा सकते हैं कि वह बिना किसी गलती के एक टेक में ओके हो जाता था।</div><div><br></div><h2>शानदार सिंगर और अभिनेता थे किशोर कुमार</h2><div>वह इतने बड़े सिंगर थे कि वह लड़की की आवाज में भी गा लेते थे। उनके फेमस गानों में से एक गाना 'एक लड़की भीगी भागी सी' में सिंगर किशोर कुमार ने लड़की की आवाज दी थी। वह एक बेहतरीन सिंगर होने के साथ-साथ अभिनेता भी थे। उन्होंने फिल्मों में अपनी शर्तों पर काम किया। साल 1946 में फिल्म 'शिकारी' से किशोर कुमार ने फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखा था। इस फिल्म में लीड अभिनेता अशोक कुमार थे।</div><div><br></div><h2>पर्सनल लाइफ</h2><div>किशोर कुमार की पर्सनल लाइफ भी सुर्खियों में रही थी। किशोर कुमार ने 4 शादियां की थीं। साल 1951 में पहली शादी रुमा गुहा से की थी। दूसरी शादी फेमस एक्ट्रेस मधुबाला से हुई। तीसरी शादी उन्होंने योगिता बाली से की थी और चौथी शादी लीना चंदावरकर से की थी।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 13 अक्टूबर 1987 को दिल का दौरा पड़ने से किशोर कुमार की मृत्यु हो गई थी।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 04 Aug 2026 14:49:39 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/unique-record-of-this-legend-won-8-filmfare-awards-without-any-music-training</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[Bal Gangadhar Tilak Death Anniversary: पत्रकारिता के जरिए ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिलाने वाले Bal Gangadhar Tilak]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/bal-gangadhar-tilak-who-shook-foundations-of-british-rule-through-journalism]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 01 अगस्त को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान सेनानी बाल गंगाधर तिलक का निधन हो गया था। वह 'लोकमान्य' के नाम से फेमस थे। तिलक सिर्फ एक स्वतंत्रता सेनानी नहीं बल्कि पत्रकार, प्रखर विचारक और समाज सुधारक भी थे। बाल गंगाधर तिलक ने 'स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा' का नारा दिया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर बाल गंगाधर तिलक के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>महाराष्ट्र के रत्नागिरी में 23 जुलाई 1856 को बाल गंगाधर तिलक का जन्म हुआ था। उनका पूरा नाम केशव गंगाधर तिलक था। उन्होंने शुरूआती शिक्षा पूरी करने के बाद साल 1877 में पुणे के डक्कन कॉलेज से बीए की पढ़ाई की और फिर बाद में कानून की पढ़ाई की।</div><div><br></div><div>बाल गंगाधर तिलक एक बेहतरीन शिक्षक थे। उन्होंने साल 1884 में अपने साथियों के साथ मिलकर 'डक्कन एजुकेशन सोसाइटी' की स्थापना की थी। इसका उद्देश्य युवाओं को राष्ट्रवाद और आधुनिक शिक्षा देना था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/udham-singh-reached-london-to-revenge-jallianwala-bagh-killed-michael-o-dwyer" target="_blank">Udham Singh Death Anniversary: Jallianwala Bagh का बदला लेने London पहुंचे उधम सिंह, Michael O'Dwyer को किया ढेर</a></h3><h2>पत्रकारिता</h2><div>बता दें कि तिलक ने मराठी पेपर 'केसरी' और 'मराठा' नामक दो अखबार शुरू किए थे। इन अखबारों के जरिए बाल गंगाधर तिलक ब्रिटिश सरकार की नीतियों की आलोचना करते और भारतीयों में राष्ट्रवाद की भावना को जगाते थे।</div><div><br></div><h2>राजनीतिक सफर</h2><div>वहीं साल 1905 के बंग-भंद आंदोलन में बाल गंगाधर तिलक ने सक्रिय भूमिका निभाई थी। वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गरम दल के नेता थे। इसके अलावा तिलक ने एनी बेसेंट के साथ मिलकर 'होम रूल लीग' की स्थापना की थी।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 01 अगस्त 1920 को 64 साल की उम्र में बाल गंगाधर तिलक की मृत्यु हो गई थी।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 01 Aug 2026 16:16:35 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/bal-gangadhar-tilak-who-shook-foundations-of-british-rule-through-journalism</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[Meena Kumari Birth Anniversary: 'Tragedy Queen' का फिल्मी सफर जितना सफल, असल जिंदगी उतनी दर्दनाक]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/as-successful-as-the-film-journey-of-tragedy-queen-her-real-life-equally-painful]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की दिग्गज एक्ट्रेस मीना कुमारी की 01 अगस्त को जन्म हुआ था। मीना कुमारी को 'ट्रैजडी क्वीन' कहा जाता था। उनका जीवन दुखों से भरा था और अंत भी दर्दनाक रहा था। एक्ट्रेस ने कम उम्र में ही फिल्मों में काम करना शुरूकर दिया था। जिम्मेदारियों के कारण मीना न तो अपना बचपन जी पाईं और न दी जवानी। वहीं जब वह सफल एक्ट्रेस बन गईं, तो उनको शराब की लत लग गई। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर एक्ट्रेस मीना कुमारी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में</div><h2><br>जन्म और परिवार</h2><div>मीना कुमारी की जन्म 10 अगस्त 1933 को हुआ था। इनके पिता का नाम अली बक्स और मां का नाम इकबाल बेगम था। मीना के पैदा होने पर उनके पिता उन्हें अनाथालय में छोड़ दिया, क्योंकि वह बेटा चाहते थे। लेकिन कुछ घंटों बाद उनके पिता उनको वापस ले गए।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/the-untold-story-of-how-fakir-became-shahenshah-e-tarannum" target="_blank">Mohammad Rafi Death Anniversary: फकीर की नकल से 'Shahenshah-e-Tarannum' बनने की अनसुनी कहानी</a></h3><h2>पहली फिल्म</h2><div>मीना को कभी फिल्मों का शौक नहीं रहा। लेकिन उनके माता-पिता काम के मौके पर उनको फिल्म स्टूडियो ले जाया करते थे। मीना कुमारी को निर्देशक विजय भट्ट ने फिल्म 'लेदरफेस' में कास्ट किया। इसके लिए उनको 25 रुपए मिले थे। जोकि मीना कुमारी की पहला फिल्मी कमाई थी। इसके बाद उन्होंने 'अधूरी कहानी', 'एक ही भूल' और 'पूजा' जैसी फिल्मों में काम किया।</div><div><br></div><div>फिल्मों में एक्टिंग के अलावा मीना कुमारी ने गाने भी गाए थे। इनमें 'पिया घर आजा', 'दुनिया एक सराय' और 'बिछड़े बालम' आदि शामिल हैं। वहीं साल 1940 के आखिरी तक एक्ट्रेस ने अपना ध्यान काल्पनिक या पौराणिक फिल्मों की ओर कर दिया था। लेकिन एक्ट्रेस को असली पहचान फिल्म 'बैजू बावरा' से मिली थी। एक्ट्रेस को 'आरती', 'पाकीजा', 'साहिब बीबी और गुलाम', 'परिणीता', 'मैं चुप रहूंगी', और 'सांझ और सवेरा' जैसी फिल्मों के लिए याद किया जाता है।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>जीवन में इतना सफल होने के बाद भी मीना कुमारी के जीवन के कीमती साल गरीबी और परेशानी में बीते। उन्होंने अपने जीवन में जिससे भी प्यार किया, अंत में सबने उनका साथ छोड़ दिया था। वहीं 31 मार्च 1972 में 38 साल की उम्र में एक्ट्रेस मीना कुमारी ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 01 Aug 2026 15:59:57 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/as-successful-as-the-film-journey-of-tragedy-queen-her-real-life-equally-painful</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Mohammad Rafi Death Anniversary: फकीर की नकल से 'Shahenshah-e-Tarannum' बनने की अनसुनी कहानी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/the-untold-story-of-how-fakir-became-shahenshah-e-tarannum]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदी सिनेमा को एवरग्रीन गाने देने वाले मोहम्मद रफी का 31 जुलाई को निधन हो गया था। आज भी लोग उनके गानों को सुनना और गुनगुनाना पसंद करते हैं। रफी के नाम करीब 26 हजार गाने गाए जाने का रिकॉर्ड है। उनको 'शहंशाह-ए-तरन्नुम' भी कहा जाता था। रफी ने अपने गांव में फकीर के गानों की नकल करके गाना गाना सीखा था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर मोहम्मद रफी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>अमृतसर के कोटला सुल्तान सिंह गांव में 24 दिसंबर 1924 को मोहम्मद रफी का जन्म हुआ था। घरवाले इनको प्यार से फिको कहते थे। फकीर को गली में गाते देख रफी नकल करके खुद भी गाना गाने लगे। वहीं जब वह 9 साल के थे, तो परिवार अमृतसर आकर बस गया। पढ़ाई में दिलचस्पी न होने की वजह से पिता ने उनको बड़े भाई के साथ खानदानी नाई की दुकान में लगा दिया।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/mehmood-once-director-driver-then-became-bollywood-most-expensive-actor" target="_blank">Mehmood Ali Death Anniversary: कभी Director के ड्राइवर थे महमूद, फिर ऐसे बने Bollywood के सबसे महंगे Actor</a></h3><div><br></div><div>9 साल के रफी नाई बन चुके थे। साल 1933 में संगीतकार पंडित जीवनलाल नाई की दुकान पहुंचे। यहां पर उन्होंने रफी को गुनगुनाते देखा और रेडियो चैनल के ऑडिशन के लिए बुला लिया। जिसके बाद जीवनलाल ने उनको गायिकी की ट्रेनिंग दी और इस तरह से वह रेडियो में गानों को अपनी आवाज देने लगे।</div><div><br></div><h2>बत्ती जाने से फेमस हुए रफी</h2><div>वहीं साल 1937 में जब स्टेज पर बिजली न होने से पॉपुलर सिंगर कुंदनलाल सहगल ने गाने से मना कर दिया। तब 13 साल के रफी ने अपनी आवाज से समां बांध दिया। दर्शकों में बैठे सहगल भी रफी से काफी प्रभावित हुए। फिर प्रोड्यूसर और नजीर ने 100 रुपए और टिकट भेजकर रफी को मुंबई बुला लिया। इसके बाद रफी ने पहली बार 'पहले आप के लिए हिदुंस्तान के हम हैं' का गाना रिकॉर्ड किया। साल बीता और मोहम्मद रफी के गाने देशभर में मशहूर होने लगे। फिल्म बैजू बावरा के फिल्म के गानों के बाद मोहम्मद रफी स्टार बन गए और फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 31 जुलाई 1980 को हार्ट अटैक से 55 साल की उम्र में मोहम्मद रफी का निधन हो गया।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 31 Jul 2026 13:18:30 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/the-untold-story-of-how-fakir-became-shahenshah-e-tarannum</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Udham Singh Death Anniversary: Jallianwala Bagh का बदला लेने London पहुंचे उधम सिंह, Michael O'Dwyer को किया ढेर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/udham-singh-reached-london-to-revenge-jallianwala-bagh-killed-michael-o-dwyer]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 31 जुलाई को क्रांतिकारी उधम सिंह को फांसी दी गई थी। उन्होंने जलियांवाला बाग नरसंहार का बदला लेने के लिए अपनी जिंदगी न्योछावर कर दी थी। उधम सिंह को जलियांवासला बाग हत्याकांड ने झझकोर कर रख दिया था। वहीं उधम सिंह की हिम्मत ने अंग्रेजों को हिलाकर रख दिया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर उधम सिंह के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>पंजाब के संगरूर में 11 मई 1899 को उधम सिंह का जन्म हुआ था। इनके बचपन का नाम शेर सिंह था। छोटी उम्र में उधम सिंह के माता-पिता और भाई की मृत्यु हो गई थी। जिसके बाद वह अमृतसर के खालसा अनाथालय में पले पढ़े थे।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/poverty-forced-to-sell-coat-untold-story-of-struggles-of-soldier-of-pen" target="_blank">Munshi Premchand Birth Anniversary: जब गरीबी में बेचना पड़ा था कोट, जानें 'कलम के सिपाही' के संघर्षों की अनसुनी Life Story</a></h3><h2>भगत सिंह के शागिर्द</h2><div>उधम सिंह भगत सिंह से काफी ज्यादा प्रभावित थे। भगत सिंह से प्रेरित होकर उन्होंने क्रांतिकारी आंदोलन में कदम रखा। साल 1927 में वहीं हथियार और देशद्रोही साहित्य के आरोप में जेल गए। जेल से रिहाई के बाद उन्होंने लंदन की राह पकड़ी। यहां पर उन्होंने जलियांवाला बाग के जिम्मेदार माइकल ओ डायर को सबक सिखाने की सोची। 13 मार्च 1940 को उधम सिंह लंदन के कैक्सटोन हॉल पहुंचे।</div><div><br></div><div>इस दौरान उन्होंने किताब में छिपाए रिवॉल्वर से ओ डायर को गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया। उधम सिंह द्वारा लिया गया यह बदला जलियांवाला बाग हत्याकांड के घाव का प्रतीक थी। जिसके बाद उधम सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया। मुकदमे में उधम सिंह ने गर्व से कहा कि उन्होंने यह अपने देश के लिए किया है।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 31 जुलाई 1940 को उधम सिंह को लंदन की पेंटनविले जेल में फांसी दी गई।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 31 Jul 2026 13:12:35 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/udham-singh-reached-london-to-revenge-jallianwala-bagh-killed-michael-o-dwyer</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Munshi Premchand Birth Anniversary: जब गरीबी में बेचना पड़ा था कोट, जानें 'कलम के सिपाही' के संघर्षों की अनसुनी Life Story]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/poverty-forced-to-sell-coat-untold-story-of-struggles-of-soldier-of-pen]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>उपन्यास और कहानियों के सम्राट मुंशी प्रेमचंद का 31 जुलाई को जन्म हुआ था। उन्होंने कई उपन्यास और कहानियों की रचना की थी। वह एक ऐसी शख्सियत थे, जिन्होंने अपने आसपास जो देखा, उसको कहानी और उपन्यास में उतारा। आज भी मुंशी प्रेमचंद की कहानियां और उपन्यास हमारे इर्दगिर्द नजर आते हैं। ऐसे में आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर मुंशी प्रेमचंद के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में लमही गांव में 31 जुलाई 1980 को प्रेमचंद का जन्म हुआ था। उनके पिता का नाम मुंशी अजायबराय था, जोकि लमही में डाक मुंशी थे और मां का नाम आंनदी देवी था। मुंशी प्रेमचंद का असली नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। जब मुंशी 7 साल के थे, तो उनकी मां की मृत्यु हो गई थी। वहीं 15 साल की उम्र में उनका विवाह हो गया और 16 की उम्र में उनके पिता का निधन हो गया था।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/airlines-to-steel-how-jrd-tata-laid-foundation-for-modern-india-economic-growth" target="_blank">JRD Tata Birth Anniversary: एयरलाइंस से स्टील तक, कैसे JRD Tata ने रखा आधुनिक भारत की Economic Growth का मजबूत आधार</a></h3><h2>संघर्ष में बीता बचपन</h2><div>प्रेमचंद के जीवन में परेशानी तब शुरू हुई, जब उनके कंधों पर पूरे परिवार की जिम्मेदारी आ गई। आर्थिक तंगी इतनी थी कि उनको अपना खर्च चलाने के लिए अपना कोट तक बेचना पड़ा था। घर का खर्च चलाने के लिए उन्होंने अपनी पुस्तकें तक बेच दी थी।</div><div><br></div><h2>नहीं छोड़ा कलम का साथ</h2><div>कठिन परिस्थितियों में भी प्रेमचंद ने कलम का दामन नहीं छोड़ा। उनको पढ़ने-लिखने का काफी शौक था। वह 10वीं तक पढ़े थे और प्रेमचंद आगे पढ़ाई पूरी करके वकील बनना चाहते थे। लेकिन गरीबी के कारण उनकी पढ़ाई छूट गई। फिर गरीबी के कारण पत्नी भी छोड़कर चली गई। वहीं साल 1905 में प्रेमचंद ने दूसरी शादी कर ली। इसके बाद वह साहित्य सेवा में लग गए।&nbsp;</div><div><br></div><div>मुंशी प्रेमचंद ने 5 कहानियों का संग्रह 'सोज़े वतन' लिखा था, जोकि साल 1907 में प्रकाशित हुआ था। यह प्रेमचंद का पहला उर्दू कहानियों का संग्रह था। जिसको उन्होंने 'नवाब राय' के नाम से छपवाया था। उन्होंने करीब 300 कहानियां और करीब आधा दर्जन उपन्यास और एक नाटक भी लिखा। उन्होंने उर्दू और हिंदी दोनों ही भाषाओं में लिखा। मुंशी प्रेमचंद ने अधिकतर मजदूर, नारीवाद, पूंजीवाद, गांधीवाद, किसान, बेमेल विवाह, पत्रकारिता, धार्मिक पाखंड और राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन आदि विषयों पर लिखा।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 31 Jul 2026 11:57:27 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[JRD Tata Birth Anniversary: एयरलाइंस से स्टील तक, कैसे JRD Tata ने रखा आधुनिक भारत की Economic Growth का मजबूत आधार]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/airlines-to-steel-how-jrd-tata-laid-foundation-for-modern-india-economic-growth]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>जेआरडी टाटा का नाम भारतीय इंडस्ट्री के इतिहास में अमर है। जेआरडी टाटा ने देश को आर्थिक रूप से संपन्न बनाने में अहम भूमिका निभाई थी। आज ही के दिन यानी की 29 जुलाई को जेआरडी टाटा का जन्म हुआ था। जेआरडी की गिनती दुनिया के सबसे महान उद्योगपतियों में की जाती है। उन्होंने भारत को पहली विमानन कंपनी दी थी। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर जेआरडी टाटा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>फ्रांस में 29 जुलाई 1904 को जेआरडी टाटा का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम रतनजी दादाभाई टाटा और मां का नाम सुजैन ब्रियर था। जेआरडी टाटा का पूरा नाम जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/when-indira-gandhi-called-queen-mother-glass-doll-feud-reached-tihar-jail" target="_blank">Gayatri Devi Death Anniversary: जब Indira Gandhi ने राजमाता को कहा 'शीशे की गुड़िया', तिहाड़ जेल तक पहुंची थी रंजिश</a></h3><h2>भारत लौटे JRD TATA</h2><div>साल 1925 में जेआरडी टाटा भारत वापस आए। इसके बाद वह बतौर इंटर्न टाटा टिस्को में काम करने लगे। पिता के निधन के फौरन बाद जेआरडी टाटा 'टाटा ग्रुप' की प्रमुख कंपनी टाटा संस के बोर्ड में शामिल हो गए। 1929 में जेआरडी टाटा ने फ्रांसीसी नागरिकता त्याग कर भारत की नागरिकता अपनाई।</div><div><br></div><h2>कमर्शियल पायलट</h2><div>वह भारत के पहले कमर्शियल पायलट थे। जिनको साल 1929 में लाइसेंस मिला था। इसके एक साल बाद उन्होंने हवाई डाक सेवा शुरू करने की सोची और यहीं से टाटा एयरलाइंस की नींव पड़ी। साल 1932 में टाटा एविशन सर्विस ने पहली उड़ान भरी। भारतीय विमानन इतिहास की पहली उड़ान कराची के ड्रिघ रोड से जेआरडी टाटा के कंट्रोल में एक पुस मॉथ के साथ शुरू हुई। साल 1935 तक JRD ने इस विमानन कंपनी को बुलंदियों तक पहुंचा दिया।</div><div><br></div><h2>टाटा ग्रुप के चेयरमैन</h2><div>साल 1938 में जेआरडी टाटा ने सर नौरोजी से टाटा समूह के अध्यक्ष पद ग्रहण किया था। वहीं साल 1938 से लेकर 1991 तक जेआरडी टाटा ने 50 सालों तक टाटा समूह का नेतृत्व किया। वह टाटा ग्रुप के सबसे लंबे समय तक चेयरमैन रहने वाले व्यक्ति थे।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 29 नवंबर 1933 को जेआरडी टाटा का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 14:00:20 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/airlines-to-steel-how-jrd-tata-laid-foundation-for-modern-india-economic-growth</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Gayatri Devi Death Anniversary: जब Indira Gandhi ने राजमाता को कहा 'शीशे की गुड़िया', तिहाड़ जेल तक पहुंची थी रंजिश]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/when-indira-gandhi-called-queen-mother-glass-doll-feud-reached-tihar-jail]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 29 जुलाई को पूर्व सांसद व जयपुर के पूर्व राजघराने की सदस्य गायत्री देवी का निधन हो गया था। उन्होंने 90 साल की उम्र में अंतिम सांस ली थी। पहले वह राजकुमारी से महारानी बनीं और फिर राजमाता। बताया जाता है कि वह किसी भी मामले में पूर्व पीएम इंदिरा गांधी से कम नहीं थी। वहीं इंदिरा गांधी के साथ गायत्री देवी का विवाद हमेशा रहा। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर गायत्री देवी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>लंदन में 23 मई 1919 को गायत्री देवी का जन्म हुआ था। उनके पिता राजकुमार जितेन्द्र नारायण कूच बिहार के युवराज के छोटे भाई थे। उनकी मां बड़ौदा की राजकुमारी इंदिरा राजे थीं। उन्होंने पहले शांतिनिकेतन और फिर लंदन और स्विट्जरलैंड में अपनी शिक्षा पूरी की। महज 12 साल की उम्र में उन्होंने जयपुर के महाराजा सवाई मानसिंह (द्वितीय) से हुआ था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/great-social-reformer-who-eradicated-evils-of-bengal-legacy-continues-to-inspire" target="_blank">Ishwar Chandra Vidyasagar Death Anniversary: बंगाल की कुरीतियों को मिटाने वाले महान Social Reformer, जिनकी विरासत आज भी है प्रेरणा</a></h3><h2>राजनीतिक सफर</h2><div>गायत्री देवी ने साल 1962 में लोकसभा चुनाव जीता था। फिर साल 1967 और 1972 का चुनाव जीता। इस दौरान वह स्वतंत्र पार्टी से जुड़ी। गायत्री देवी इंदिरा गांधी की कट्टर विरोधी थीं। साल 1975 में आपातकाल के दौरान उनको तिहाड़ जेल जाना पड़ा था। उन्होंने इंदिरा गांधी से सीधी टक्कर ली, लेकिन समझौता नहीं किया। गायत्री देवी को लालच, धमकी दोनों दी गईं। लेकिन वह झुकी नहीं।</div><div><br></div><div>बताया जाता है कि संसद में इंदिरा गांधी को गायत्री देवी की मौजूदगी रास नहीं आती थी। इंदिरा गांधी ने उनको 'शीशे की गुड़िया' कह दिया था। गायत्री देवी और इंदिरा गांधी के बीच यह रंजिश आजीवन चलती रही। हालांकि बाद में गायत्री देवी ने राजनीति छोड़ दी थी।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं गायत्री देवी का साल 2009 में 90 साल की उम्र में निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 13:47:08 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/when-indira-gandhi-called-queen-mother-glass-doll-feud-reached-tihar-jail</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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