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    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
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      <title><![CDATA[Marilyn Monroe Death Anniversary: ग्लैमरस छवि के पीछे छिपा था गहरा Struggle, आज भी Mystery है एक्ट्रेस की मौत]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/deep-struggle-lay-hidden-behind-glamorous-image-actress-death-remains-mystery]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हॉलीवुड की सबसे फेमस एक्ट्रेस मर्लिन मुनरो का 05 अगस्त को निधन हो गया था। जब भी मर्लिन का जिक्र किया जाता है, तो आंखों के सामने एक्ट्रेस की उड़ती सफेद ड्रेस वाली तस्वीर आती है। वह 20वीं सदी की सबसे फेमस अमेरिकी एक्ट्रेस, मॉडल और सिंगर थीं। अपनी चमकदार और ग्लैमरस छवि के पीछे मर्लिन एक ऐसी महिला थीं, जो लगातार लोगों की नजरों में बने रहने और आलोचनाओं के बीच अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष कर रही थीं। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर एक्ट्रेस मर्लिन मुनरो के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>मर्लिन मुनरो का जन्म 01 जून 1926 को हुआ था। उनका असली नाम नॉर्मा जीन मॉर्टेनसन था। मर्लिन का बचपन अस्थिरता, संघर्षों और पालन-पोषण केंद्र में बीता। मर्लिन ने कम उम्र में ही यह महसूस कर लिया था कि महिलाओं को उनके व्यक्तित्व से ज्यादा बाहरी छवि के आधार पर जज किया जाता है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/unique-record-of-this-legend-won-8-filmfare-awards-without-any-music-training" target="_blank">Kishore Kumar Birth Anniversary: बिना किसी Music Training के 8 Filmfare Awards जीतने वाले इस Legend का अनूठा रिकॉर्ड</a></h3><h2>मॉडलिंग का सफर</h2><div>मर्लिन ने अपना करियर मॉडलिंग से शुरू किया था। वहीं जल्द ही वह हॉलीवुड की एक ग्लैमरस और मोहक एक्ट्रेस की इमेज में ढल गईं। कई फिल्मों ने एक्ट्रेस को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई थी। वह जल्द ही हॉलीवुड की सबसे बड़ी सितारों की लिस्ट में शामिल हो गईं। हालांकि एक्ट्रेस की सफलता के साथ उनके लिए एक चुनौती भी थी कि मर्लिन को अक्सर एक ही तरह की भूमिकाएं दी जाने लगीं। जिस कारण उनकी अभिनय क्षमता का पूरा प्रदर्शन नहीं हो सका।</div><div><br></div><h2>संवेदनशील महिला</h2><div>पर्दे पर ग्लैमरस और चुलबुली दिखने वाली मर्लिन मुनरो बेहद संवेदनशील और बौद्धिक सोच रखने वाली महिला थीं। वह अभिनय की गंभीरता से सीखना चाहती थीं। इसके अलावा उनको राजनीति, साहित्य, मनोविज्ञान और कला जैसे विषयों में गहरी रुचि थी।</div><div><br></div><h2>स्वतंत्र और मुखर एक्ट्रेस</h2><div>साल 1954 में एक्ट्रेस ने अपना खुद का प्रोडक्शन हाउस शुरू किया। उस समय में यह एक साहसिक कदम था। क्योंकि उस दौर में फिल्म स्टूडियो कलाकारों के करियर और फैसलों पर अपना कंट्रोल रखते थे। एक्ट्रेस ने उचित वेतन, बेहतर रोल और रचनात्मक स्वतंत्रता की मांग की। ऐसे में कई बार मर्लिन ने ऐसे रोल करने से इंकार कर दिया, जो उनको पसंद नहीं थे। एक्ट्रेस के इस कदम ने उनको हॉलीवुड की स्वतंत्र और मुखर अभिनेत्रियों में शुमार किया।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 05 अगस्त 1962 में मात्र 36 वर्ष की उम्र में मुनरो ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। वह अपने फ्लैट में रहस्यमई तरीके से मृत पाई गई थीं।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 05 Aug 2026 17:40:38 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/deep-struggle-lay-hidden-behind-glamorous-image-actress-death-remains-mystery</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Kishore Kumar Birth Anniversary: बिना किसी Music Training के 8 Filmfare Awards जीतने वाले इस Legend का अनूठा रिकॉर्ड]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/unique-record-of-this-legend-won-8-filmfare-awards-without-any-music-training]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारतीय सिनेमा के इतिहास के फेमस गायक किशोर कुमार का 04 अगस्त को जन्म हुआ था। वह एक मल्टी टैलेंटेड कलाकार थे। वह एक बेहतरीन गायक होने के साथ-साथ एक्टर, राइटर और फिल्म प्रोड्यूसर भी थे। उन्होंने 2678 फिल्मों में गाने गाए और करीब 88 फिल्मों में बतौर अभिनेता काम किया था। किशोर कुमार ने 8 फिल्मफेयर अवॉर्ड अपने नाम किए थे। आज की फिल्मों में भी किशोर कुमार के गानों में रीमेक किया जाता है। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर सिंगर किशोर कुमार के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>मध्य प्रदेश में 04 जुलाई 1929 को किशोर कुमार का जन्म हुआ था। इनका असली नाम आभास कुमार था। जब वह फिल्म इंडस्ट्री का हिस्सा बने, तो उनका नाम किशोर पड़ा। उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में आने से पहले कोई म्यूजिक ट्रेनिंग नहीं ली थी। उनके भाई ने एक बार बताया था कि किशोर की आवाज बचपन में फंटे बांस की तरह थी, लेकिन जब उन्होंने गाना शुरू किया, तो उन्होंने अपनी आवाज से लोगों को अपना दीवाना बना लिया था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/as-successful-as-the-film-journey-of-tragedy-queen-her-real-life-equally-painful" target="_blank">Meena Kumari Birth Anniversary: 'Tragedy Queen' का फिल्मी सफर जितना सफल, असल जिंदगी उतनी दर्दनाक</a></h3><h2>बिना प्रैक्टिस गाते थे किशोर</h2><div>गायक किशोर कुमार ने अपने सिंगिंग करियर में करीब 15 सौ से ज्यादा गाने गाए थे। वह कई बार अपनी गायकी के अंदाज से म्यूजिक डायरेक्टर्स को भी हैरान कर देते थे। उनकी गायिकी पर इतनी अच्छी और बारीक पकड़ थी कि अक्सर वह बिना प्रैक्टिस के रिकॉर्डिंग करवाते थे। किशोर कुमार की काबिलियत का अंदाजा आप इस बात से भी लगा सकते हैं कि वह बिना किसी गलती के एक टेक में ओके हो जाता था।</div><div><br></div><h2>शानदार सिंगर और अभिनेता थे किशोर कुमार</h2><div>वह इतने बड़े सिंगर थे कि वह लड़की की आवाज में भी गा लेते थे। उनके फेमस गानों में से एक गाना 'एक लड़की भीगी भागी सी' में सिंगर किशोर कुमार ने लड़की की आवाज दी थी। वह एक बेहतरीन सिंगर होने के साथ-साथ अभिनेता भी थे। उन्होंने फिल्मों में अपनी शर्तों पर काम किया। साल 1946 में फिल्म 'शिकारी' से किशोर कुमार ने फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखा था। इस फिल्म में लीड अभिनेता अशोक कुमार थे।</div><div><br></div><h2>पर्सनल लाइफ</h2><div>किशोर कुमार की पर्सनल लाइफ भी सुर्खियों में रही थी। किशोर कुमार ने 4 शादियां की थीं। साल 1951 में पहली शादी रुमा गुहा से की थी। दूसरी शादी फेमस एक्ट्रेस मधुबाला से हुई। तीसरी शादी उन्होंने योगिता बाली से की थी और चौथी शादी लीना चंदावरकर से की थी।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 13 अक्टूबर 1987 को दिल का दौरा पड़ने से किशोर कुमार की मृत्यु हो गई थी।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 04 Aug 2026 14:49:39 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/unique-record-of-this-legend-won-8-filmfare-awards-without-any-music-training</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Bal Gangadhar Tilak Death Anniversary: पत्रकारिता के जरिए ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिलाने वाले Bal Gangadhar Tilak]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/bal-gangadhar-tilak-who-shook-foundations-of-british-rule-through-journalism]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 01 अगस्त को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान सेनानी बाल गंगाधर तिलक का निधन हो गया था। वह 'लोकमान्य' के नाम से फेमस थे। तिलक सिर्फ एक स्वतंत्रता सेनानी नहीं बल्कि पत्रकार, प्रखर विचारक और समाज सुधारक भी थे। बाल गंगाधर तिलक ने 'स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा' का नारा दिया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर बाल गंगाधर तिलक के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>महाराष्ट्र के रत्नागिरी में 23 जुलाई 1856 को बाल गंगाधर तिलक का जन्म हुआ था। उनका पूरा नाम केशव गंगाधर तिलक था। उन्होंने शुरूआती शिक्षा पूरी करने के बाद साल 1877 में पुणे के डक्कन कॉलेज से बीए की पढ़ाई की और फिर बाद में कानून की पढ़ाई की।</div><div><br></div><div>बाल गंगाधर तिलक एक बेहतरीन शिक्षक थे। उन्होंने साल 1884 में अपने साथियों के साथ मिलकर 'डक्कन एजुकेशन सोसाइटी' की स्थापना की थी। इसका उद्देश्य युवाओं को राष्ट्रवाद और आधुनिक शिक्षा देना था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/udham-singh-reached-london-to-revenge-jallianwala-bagh-killed-michael-o-dwyer" target="_blank">Udham Singh Death Anniversary: Jallianwala Bagh का बदला लेने London पहुंचे उधम सिंह, Michael O'Dwyer को किया ढेर</a></h3><h2>पत्रकारिता</h2><div>बता दें कि तिलक ने मराठी पेपर 'केसरी' और 'मराठा' नामक दो अखबार शुरू किए थे। इन अखबारों के जरिए बाल गंगाधर तिलक ब्रिटिश सरकार की नीतियों की आलोचना करते और भारतीयों में राष्ट्रवाद की भावना को जगाते थे।</div><div><br></div><h2>राजनीतिक सफर</h2><div>वहीं साल 1905 के बंग-भंद आंदोलन में बाल गंगाधर तिलक ने सक्रिय भूमिका निभाई थी। वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गरम दल के नेता थे। इसके अलावा तिलक ने एनी बेसेंट के साथ मिलकर 'होम रूल लीग' की स्थापना की थी।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 01 अगस्त 1920 को 64 साल की उम्र में बाल गंगाधर तिलक की मृत्यु हो गई थी।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 01 Aug 2026 16:16:35 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/bal-gangadhar-tilak-who-shook-foundations-of-british-rule-through-journalism</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Meena Kumari Birth Anniversary: 'Tragedy Queen' का फिल्मी सफर जितना सफल, असल जिंदगी उतनी दर्दनाक]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/as-successful-as-the-film-journey-of-tragedy-queen-her-real-life-equally-painful]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की दिग्गज एक्ट्रेस मीना कुमारी की 01 अगस्त को जन्म हुआ था। मीना कुमारी को 'ट्रैजडी क्वीन' कहा जाता था। उनका जीवन दुखों से भरा था और अंत भी दर्दनाक रहा था। एक्ट्रेस ने कम उम्र में ही फिल्मों में काम करना शुरूकर दिया था। जिम्मेदारियों के कारण मीना न तो अपना बचपन जी पाईं और न दी जवानी। वहीं जब वह सफल एक्ट्रेस बन गईं, तो उनको शराब की लत लग गई। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर एक्ट्रेस मीना कुमारी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में</div><h2><br>जन्म और परिवार</h2><div>मीना कुमारी की जन्म 10 अगस्त 1933 को हुआ था। इनके पिता का नाम अली बक्स और मां का नाम इकबाल बेगम था। मीना के पैदा होने पर उनके पिता उन्हें अनाथालय में छोड़ दिया, क्योंकि वह बेटा चाहते थे। लेकिन कुछ घंटों बाद उनके पिता उनको वापस ले गए।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/the-untold-story-of-how-fakir-became-shahenshah-e-tarannum" target="_blank">Mohammad Rafi Death Anniversary: फकीर की नकल से 'Shahenshah-e-Tarannum' बनने की अनसुनी कहानी</a></h3><h2>पहली फिल्म</h2><div>मीना को कभी फिल्मों का शौक नहीं रहा। लेकिन उनके माता-पिता काम के मौके पर उनको फिल्म स्टूडियो ले जाया करते थे। मीना कुमारी को निर्देशक विजय भट्ट ने फिल्म 'लेदरफेस' में कास्ट किया। इसके लिए उनको 25 रुपए मिले थे। जोकि मीना कुमारी की पहला फिल्मी कमाई थी। इसके बाद उन्होंने 'अधूरी कहानी', 'एक ही भूल' और 'पूजा' जैसी फिल्मों में काम किया।</div><div><br></div><div>फिल्मों में एक्टिंग के अलावा मीना कुमारी ने गाने भी गाए थे। इनमें 'पिया घर आजा', 'दुनिया एक सराय' और 'बिछड़े बालम' आदि शामिल हैं। वहीं साल 1940 के आखिरी तक एक्ट्रेस ने अपना ध्यान काल्पनिक या पौराणिक फिल्मों की ओर कर दिया था। लेकिन एक्ट्रेस को असली पहचान फिल्म 'बैजू बावरा' से मिली थी। एक्ट्रेस को 'आरती', 'पाकीजा', 'साहिब बीबी और गुलाम', 'परिणीता', 'मैं चुप रहूंगी', और 'सांझ और सवेरा' जैसी फिल्मों के लिए याद किया जाता है।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>जीवन में इतना सफल होने के बाद भी मीना कुमारी के जीवन के कीमती साल गरीबी और परेशानी में बीते। उन्होंने अपने जीवन में जिससे भी प्यार किया, अंत में सबने उनका साथ छोड़ दिया था। वहीं 31 मार्च 1972 में 38 साल की उम्र में एक्ट्रेस मीना कुमारी ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 01 Aug 2026 15:59:57 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/as-successful-as-the-film-journey-of-tragedy-queen-her-real-life-equally-painful</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Mohammad Rafi Death Anniversary: फकीर की नकल से 'Shahenshah-e-Tarannum' बनने की अनसुनी कहानी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/the-untold-story-of-how-fakir-became-shahenshah-e-tarannum]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदी सिनेमा को एवरग्रीन गाने देने वाले मोहम्मद रफी का 31 जुलाई को निधन हो गया था। आज भी लोग उनके गानों को सुनना और गुनगुनाना पसंद करते हैं। रफी के नाम करीब 26 हजार गाने गाए जाने का रिकॉर्ड है। उनको 'शहंशाह-ए-तरन्नुम' भी कहा जाता था। रफी ने अपने गांव में फकीर के गानों की नकल करके गाना गाना सीखा था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर मोहम्मद रफी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>अमृतसर के कोटला सुल्तान सिंह गांव में 24 दिसंबर 1924 को मोहम्मद रफी का जन्म हुआ था। घरवाले इनको प्यार से फिको कहते थे। फकीर को गली में गाते देख रफी नकल करके खुद भी गाना गाने लगे। वहीं जब वह 9 साल के थे, तो परिवार अमृतसर आकर बस गया। पढ़ाई में दिलचस्पी न होने की वजह से पिता ने उनको बड़े भाई के साथ खानदानी नाई की दुकान में लगा दिया।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/mehmood-once-director-driver-then-became-bollywood-most-expensive-actor" target="_blank">Mehmood Ali Death Anniversary: कभी Director के ड्राइवर थे महमूद, फिर ऐसे बने Bollywood के सबसे महंगे Actor</a></h3><div><br></div><div>9 साल के रफी नाई बन चुके थे। साल 1933 में संगीतकार पंडित जीवनलाल नाई की दुकान पहुंचे। यहां पर उन्होंने रफी को गुनगुनाते देखा और रेडियो चैनल के ऑडिशन के लिए बुला लिया। जिसके बाद जीवनलाल ने उनको गायिकी की ट्रेनिंग दी और इस तरह से वह रेडियो में गानों को अपनी आवाज देने लगे।</div><div><br></div><h2>बत्ती जाने से फेमस हुए रफी</h2><div>वहीं साल 1937 में जब स्टेज पर बिजली न होने से पॉपुलर सिंगर कुंदनलाल सहगल ने गाने से मना कर दिया। तब 13 साल के रफी ने अपनी आवाज से समां बांध दिया। दर्शकों में बैठे सहगल भी रफी से काफी प्रभावित हुए। फिर प्रोड्यूसर और नजीर ने 100 रुपए और टिकट भेजकर रफी को मुंबई बुला लिया। इसके बाद रफी ने पहली बार 'पहले आप के लिए हिदुंस्तान के हम हैं' का गाना रिकॉर्ड किया। साल बीता और मोहम्मद रफी के गाने देशभर में मशहूर होने लगे। फिल्म बैजू बावरा के फिल्म के गानों के बाद मोहम्मद रफी स्टार बन गए और फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 31 जुलाई 1980 को हार्ट अटैक से 55 साल की उम्र में मोहम्मद रफी का निधन हो गया।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 31 Jul 2026 13:18:30 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/the-untold-story-of-how-fakir-became-shahenshah-e-tarannum</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Udham Singh Death Anniversary: Jallianwala Bagh का बदला लेने London पहुंचे उधम सिंह, Michael O'Dwyer को किया ढेर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/udham-singh-reached-london-to-revenge-jallianwala-bagh-killed-michael-o-dwyer]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 31 जुलाई को क्रांतिकारी उधम सिंह को फांसी दी गई थी। उन्होंने जलियांवाला बाग नरसंहार का बदला लेने के लिए अपनी जिंदगी न्योछावर कर दी थी। उधम सिंह को जलियांवासला बाग हत्याकांड ने झझकोर कर रख दिया था। वहीं उधम सिंह की हिम्मत ने अंग्रेजों को हिलाकर रख दिया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर उधम सिंह के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>पंजाब के संगरूर में 11 मई 1899 को उधम सिंह का जन्म हुआ था। इनके बचपन का नाम शेर सिंह था। छोटी उम्र में उधम सिंह के माता-पिता और भाई की मृत्यु हो गई थी। जिसके बाद वह अमृतसर के खालसा अनाथालय में पले पढ़े थे।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/poverty-forced-to-sell-coat-untold-story-of-struggles-of-soldier-of-pen" target="_blank">Munshi Premchand Birth Anniversary: जब गरीबी में बेचना पड़ा था कोट, जानें 'कलम के सिपाही' के संघर्षों की अनसुनी Life Story</a></h3><h2>भगत सिंह के शागिर्द</h2><div>उधम सिंह भगत सिंह से काफी ज्यादा प्रभावित थे। भगत सिंह से प्रेरित होकर उन्होंने क्रांतिकारी आंदोलन में कदम रखा। साल 1927 में वहीं हथियार और देशद्रोही साहित्य के आरोप में जेल गए। जेल से रिहाई के बाद उन्होंने लंदन की राह पकड़ी। यहां पर उन्होंने जलियांवाला बाग के जिम्मेदार माइकल ओ डायर को सबक सिखाने की सोची। 13 मार्च 1940 को उधम सिंह लंदन के कैक्सटोन हॉल पहुंचे।</div><div><br></div><div>इस दौरान उन्होंने किताब में छिपाए रिवॉल्वर से ओ डायर को गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया। उधम सिंह द्वारा लिया गया यह बदला जलियांवाला बाग हत्याकांड के घाव का प्रतीक थी। जिसके बाद उधम सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया। मुकदमे में उधम सिंह ने गर्व से कहा कि उन्होंने यह अपने देश के लिए किया है।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 31 जुलाई 1940 को उधम सिंह को लंदन की पेंटनविले जेल में फांसी दी गई।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 31 Jul 2026 13:12:35 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/udham-singh-reached-london-to-revenge-jallianwala-bagh-killed-michael-o-dwyer</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Munshi Premchand Birth Anniversary: जब गरीबी में बेचना पड़ा था कोट, जानें 'कलम के सिपाही' के संघर्षों की अनसुनी Life Story]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/poverty-forced-to-sell-coat-untold-story-of-struggles-of-soldier-of-pen]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>उपन्यास और कहानियों के सम्राट मुंशी प्रेमचंद का 31 जुलाई को जन्म हुआ था। उन्होंने कई उपन्यास और कहानियों की रचना की थी। वह एक ऐसी शख्सियत थे, जिन्होंने अपने आसपास जो देखा, उसको कहानी और उपन्यास में उतारा। आज भी मुंशी प्रेमचंद की कहानियां और उपन्यास हमारे इर्दगिर्द नजर आते हैं। ऐसे में आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर मुंशी प्रेमचंद के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में लमही गांव में 31 जुलाई 1980 को प्रेमचंद का जन्म हुआ था। उनके पिता का नाम मुंशी अजायबराय था, जोकि लमही में डाक मुंशी थे और मां का नाम आंनदी देवी था। मुंशी प्रेमचंद का असली नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। जब मुंशी 7 साल के थे, तो उनकी मां की मृत्यु हो गई थी। वहीं 15 साल की उम्र में उनका विवाह हो गया और 16 की उम्र में उनके पिता का निधन हो गया था।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/airlines-to-steel-how-jrd-tata-laid-foundation-for-modern-india-economic-growth" target="_blank">JRD Tata Birth Anniversary: एयरलाइंस से स्टील तक, कैसे JRD Tata ने रखा आधुनिक भारत की Economic Growth का मजबूत आधार</a></h3><h2>संघर्ष में बीता बचपन</h2><div>प्रेमचंद के जीवन में परेशानी तब शुरू हुई, जब उनके कंधों पर पूरे परिवार की जिम्मेदारी आ गई। आर्थिक तंगी इतनी थी कि उनको अपना खर्च चलाने के लिए अपना कोट तक बेचना पड़ा था। घर का खर्च चलाने के लिए उन्होंने अपनी पुस्तकें तक बेच दी थी।</div><div><br></div><h2>नहीं छोड़ा कलम का साथ</h2><div>कठिन परिस्थितियों में भी प्रेमचंद ने कलम का दामन नहीं छोड़ा। उनको पढ़ने-लिखने का काफी शौक था। वह 10वीं तक पढ़े थे और प्रेमचंद आगे पढ़ाई पूरी करके वकील बनना चाहते थे। लेकिन गरीबी के कारण उनकी पढ़ाई छूट गई। फिर गरीबी के कारण पत्नी भी छोड़कर चली गई। वहीं साल 1905 में प्रेमचंद ने दूसरी शादी कर ली। इसके बाद वह साहित्य सेवा में लग गए।&nbsp;</div><div><br></div><div>मुंशी प्रेमचंद ने 5 कहानियों का संग्रह 'सोज़े वतन' लिखा था, जोकि साल 1907 में प्रकाशित हुआ था। यह प्रेमचंद का पहला उर्दू कहानियों का संग्रह था। जिसको उन्होंने 'नवाब राय' के नाम से छपवाया था। उन्होंने करीब 300 कहानियां और करीब आधा दर्जन उपन्यास और एक नाटक भी लिखा। उन्होंने उर्दू और हिंदी दोनों ही भाषाओं में लिखा। मुंशी प्रेमचंद ने अधिकतर मजदूर, नारीवाद, पूंजीवाद, गांधीवाद, किसान, बेमेल विवाह, पत्रकारिता, धार्मिक पाखंड और राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन आदि विषयों पर लिखा।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 31 Jul 2026 11:57:27 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/poverty-forced-to-sell-coat-untold-story-of-struggles-of-soldier-of-pen</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[JRD Tata Birth Anniversary: एयरलाइंस से स्टील तक, कैसे JRD Tata ने रखा आधुनिक भारत की Economic Growth का मजबूत आधार]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/airlines-to-steel-how-jrd-tata-laid-foundation-for-modern-india-economic-growth]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>जेआरडी टाटा का नाम भारतीय इंडस्ट्री के इतिहास में अमर है। जेआरडी टाटा ने देश को आर्थिक रूप से संपन्न बनाने में अहम भूमिका निभाई थी। आज ही के दिन यानी की 29 जुलाई को जेआरडी टाटा का जन्म हुआ था। जेआरडी की गिनती दुनिया के सबसे महान उद्योगपतियों में की जाती है। उन्होंने भारत को पहली विमानन कंपनी दी थी। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर जेआरडी टाटा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>फ्रांस में 29 जुलाई 1904 को जेआरडी टाटा का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम रतनजी दादाभाई टाटा और मां का नाम सुजैन ब्रियर था। जेआरडी टाटा का पूरा नाम जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/when-indira-gandhi-called-queen-mother-glass-doll-feud-reached-tihar-jail" target="_blank">Gayatri Devi Death Anniversary: जब Indira Gandhi ने राजमाता को कहा 'शीशे की गुड़िया', तिहाड़ जेल तक पहुंची थी रंजिश</a></h3><h2>भारत लौटे JRD TATA</h2><div>साल 1925 में जेआरडी टाटा भारत वापस आए। इसके बाद वह बतौर इंटर्न टाटा टिस्को में काम करने लगे। पिता के निधन के फौरन बाद जेआरडी टाटा 'टाटा ग्रुप' की प्रमुख कंपनी टाटा संस के बोर्ड में शामिल हो गए। 1929 में जेआरडी टाटा ने फ्रांसीसी नागरिकता त्याग कर भारत की नागरिकता अपनाई।</div><div><br></div><h2>कमर्शियल पायलट</h2><div>वह भारत के पहले कमर्शियल पायलट थे। जिनको साल 1929 में लाइसेंस मिला था। इसके एक साल बाद उन्होंने हवाई डाक सेवा शुरू करने की सोची और यहीं से टाटा एयरलाइंस की नींव पड़ी। साल 1932 में टाटा एविशन सर्विस ने पहली उड़ान भरी। भारतीय विमानन इतिहास की पहली उड़ान कराची के ड्रिघ रोड से जेआरडी टाटा के कंट्रोल में एक पुस मॉथ के साथ शुरू हुई। साल 1935 तक JRD ने इस विमानन कंपनी को बुलंदियों तक पहुंचा दिया।</div><div><br></div><h2>टाटा ग्रुप के चेयरमैन</h2><div>साल 1938 में जेआरडी टाटा ने सर नौरोजी से टाटा समूह के अध्यक्ष पद ग्रहण किया था। वहीं साल 1938 से लेकर 1991 तक जेआरडी टाटा ने 50 सालों तक टाटा समूह का नेतृत्व किया। वह टाटा ग्रुप के सबसे लंबे समय तक चेयरमैन रहने वाले व्यक्ति थे।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 29 नवंबर 1933 को जेआरडी टाटा का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 14:00:20 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/airlines-to-steel-how-jrd-tata-laid-foundation-for-modern-india-economic-growth</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Gayatri Devi Death Anniversary: जब Indira Gandhi ने राजमाता को कहा 'शीशे की गुड़िया', तिहाड़ जेल तक पहुंची थी रंजिश]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/when-indira-gandhi-called-queen-mother-glass-doll-feud-reached-tihar-jail]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 29 जुलाई को पूर्व सांसद व जयपुर के पूर्व राजघराने की सदस्य गायत्री देवी का निधन हो गया था। उन्होंने 90 साल की उम्र में अंतिम सांस ली थी। पहले वह राजकुमारी से महारानी बनीं और फिर राजमाता। बताया जाता है कि वह किसी भी मामले में पूर्व पीएम इंदिरा गांधी से कम नहीं थी। वहीं इंदिरा गांधी के साथ गायत्री देवी का विवाद हमेशा रहा। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर गायत्री देवी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>लंदन में 23 मई 1919 को गायत्री देवी का जन्म हुआ था। उनके पिता राजकुमार जितेन्द्र नारायण कूच बिहार के युवराज के छोटे भाई थे। उनकी मां बड़ौदा की राजकुमारी इंदिरा राजे थीं। उन्होंने पहले शांतिनिकेतन और फिर लंदन और स्विट्जरलैंड में अपनी शिक्षा पूरी की। महज 12 साल की उम्र में उन्होंने जयपुर के महाराजा सवाई मानसिंह (द्वितीय) से हुआ था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/great-social-reformer-who-eradicated-evils-of-bengal-legacy-continues-to-inspire" target="_blank">Ishwar Chandra Vidyasagar Death Anniversary: बंगाल की कुरीतियों को मिटाने वाले महान Social Reformer, जिनकी विरासत आज भी है प्रेरणा</a></h3><h2>राजनीतिक सफर</h2><div>गायत्री देवी ने साल 1962 में लोकसभा चुनाव जीता था। फिर साल 1967 और 1972 का चुनाव जीता। इस दौरान वह स्वतंत्र पार्टी से जुड़ी। गायत्री देवी इंदिरा गांधी की कट्टर विरोधी थीं। साल 1975 में आपातकाल के दौरान उनको तिहाड़ जेल जाना पड़ा था। उन्होंने इंदिरा गांधी से सीधी टक्कर ली, लेकिन समझौता नहीं किया। गायत्री देवी को लालच, धमकी दोनों दी गईं। लेकिन वह झुकी नहीं।</div><div><br></div><div>बताया जाता है कि संसद में इंदिरा गांधी को गायत्री देवी की मौजूदगी रास नहीं आती थी। इंदिरा गांधी ने उनको 'शीशे की गुड़िया' कह दिया था। गायत्री देवी और इंदिरा गांधी के बीच यह रंजिश आजीवन चलती रही। हालांकि बाद में गायत्री देवी ने राजनीति छोड़ दी थी।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं गायत्री देवी का साल 2009 में 90 साल की उम्र में निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 13:47:08 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/when-indira-gandhi-called-queen-mother-glass-doll-feud-reached-tihar-jail</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Ishwar Chandra Vidyasagar Death Anniversary: बंगाल की कुरीतियों को मिटाने वाले महान Social Reformer, जिनकी विरासत आज भी है प्रेरणा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/great-social-reformer-who-eradicated-evils-of-bengal-legacy-continues-to-inspire]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>19वीं सदी के महान दार्शनिक, समाज सुधारक, शिक्षाविद और लेखक ईश्वर चंद्र विद्यासागर का 29 जुलाई को निधन हो गया था। उन्होंने भारत में विधवा विवाह कानून बनवाने में अहम योगदान दिया था। उनको सामाजिक योगदान के लिए भारत के महान समाज सुधारकों में गिना जाता है। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर ईश्वर चंद्र विद्यासागर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...&nbsp;</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>बंगाल के मेदिनीपुर में 26 सितंबर 1820 को विद्यासागर का जन्म हुआ था। उनके बचपन का नाम ईश्वरचंद्र बन्दोपाध्याय था। दर्शऩ और संस्कृत में उनके विशारद होने की वजह से उनको छात्र जीवन में विद्यासागर कहा जाने लगा। साल 1839 में उन्होंने कानून की पढ़ाई की। फिर साल 1841 में वह फोर्ट लयम कॉलेज में संस्कृत विभाग के प्रमुख के रूप में काम करने लगे। फिर वह कलकत्ता के संस्कृत कॉलेज में संस्कृत के प्रोफेसर बने। इसके बाद उसी कॉलेज के प्रिंसिपल बन गए।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/he-lived-free-and-died-free-brave-man-whom-no-one-capture-while-he-alive" target="_blank">Chandrashekhar Azad Birth Anniversary: 'आजाद' रहे और 'आजाद' ही मरे, वो वीर जिसे जीते जी कोई नहीं पकड़ सका</a></h3><h2>कुरीतियों के खिलाफ उठाई आवाज</h2><div>वैसे तो पूरे भारत में 19वीं सदी में महिलाओं की स्थिति बेहद बुरी थी। लेकिन बंगाल में हालात काफी ज्यादा खराब थे। यहां पर काफी धार्मिक कुरीतियां थीं, जो हिंदू समाज में कलंक की तरह थीं। सती प्रथा पर कानून बन चुका था, लेकिन बाल विवाह और विधवाओं पर होने वाले अत्याचार बदस्तूर जारी थी।</div><div><br></div><h2>विधवा विवाह के लिए प्रस्ताव</h2><div>विधवा विवाह के लिए किए गए विद्यासागर के प्रयासों को आज भी सराहा जाता है। उन्होंने तत्कालीन सरकार को एक याचिका दी, जिसमें विधवाओं के पुनर्विवाह के लिए कानून बनाने की मांग की। साल 1856 में उनकी कोशिशें रंग लाईं और विधवा पुनर्विवाह कानून पारित हुआ। लेकिन इसके बाद भी लोगों में इस कानून के प्रति जागरुकता नहीं दिखी, तो उन्होंने दोस्त की शादी 10 साल की विधवा से कराई। इसके बाद अपने बेटे की शादी भी विधवा से करा दी।</div><div><br></div><h2>नारी उत्थान के लिए प्रयास</h2><div>ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने महिलाओं और लड़कियों की शिक्षा और समाज में स्थान दिलाने के लिए लगातार कोशिशें की। नारी शिक्षा के लिए की गई उनकी कोशिशों को आज भी याद किया जाता है।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 29 जुलाई 1891 को ईश्वर चंद्र विद्यासागर का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 13:45:12 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/great-social-reformer-who-eradicated-evils-of-bengal-legacy-continues-to-inspire</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Mehmood Ali Death Anniversary: कभी Director के ड्राइवर थे महमूद, फिर ऐसे बने Bollywood के सबसे महंगे Actor]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/mehmood-once-director-driver-then-became-bollywood-most-expensive-actor]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>जब भी बॉलीवुड के सबसे बेहतरीन और सफल कॉमेडियन का जिक्र होता है। तो महमूद अली का नाम सबसे पहले आता है। बड़े पर्दे पर करोड़ों लोगों को हंसाने वाले महमूद अली की पर्सनल लाइफ चुनौतियों और कठिन परिस्थितियों से भरी हुई थी। उन्होंने अपने करियर के शुरूआती दिनों में गुजारा करने के लिए न जाने कितने छोटे-मोटे काम किए। आज ही के दिन यानी की 23 जुलाई को महमूद अली का निधन हो गया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर महमूद अली के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>वहीं 29 सितंबर 1932 को महमूद अली का जन्म हुआ था। फिल्मों में आने से पहले वह एक्ट्रेस मीना कुमारी के टेनिस कोच थे। वह डायरेक्टर पीएल संतोषी के ड्राइवर भी रहे। उन्होंने दिग्गज एक्ट्रेस मीन कुमारी की बहन मधु से शादी की।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/mukesh-magic-continued-to-dominate-bollywood-music-for-40-years" target="_blank">Mukesh Birth Anniversary: 10वीं के बाद छोड़ी पढ़ाई, फिर 40 साल तक Bollywood Music पर चला मुकेश का जादू</a></h3><h2>एक्टिंग में रखा कदम</h2><div>उनकी कॉमेडी की सबसे खास बात यह है कि उनका हैदराबादी उर्दू लहजा था। जिसको दर्शकों ने काफी पसंद किया। उन्होंने अपने 'सीआईडी' से अपने फिल्मी सफर की शुरूआत की थी। महमदू ने 4 दशकों से ज्यादा लंबे करियर में 300 से ज्यादा फिल्मों में अपनी एक्टिंग का जादू बिखेरा है। महमूद की शानदार एक्टिंग का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि उनको 25 बार फिल्मफेयर में नामांकित किया गया।</div><div><br></div><div>उस समय कॉमेडी में पुरस्कार बाद में शुरू हुए थे। फिर भी उन्होंने कई बार इस ट्ऱॉफी को अपने नाम किया था। महमूद अली ने अपनी पॉपुलैरिटी के चरम पर हिंदी फिल्मों के मुख्य अभिनेताओं से ज्यादा फीस लेते थे।&nbsp;</div><div><br></div><h2>आखिरी अलविदा</h2><div>80 के दशक में जब फिल्म इंडस्ट्री में नए कॉमेडियन आए। तो महमूद की फिल्मों की संख्या काफी कम होती चली गई। अंदाज अपना-अपना में उनका जॉनी की रोल एक्टर के रूप में उनकी आखिरी और सबसे हिट भूमिका साबित हुई। जीवन के आखिरी समय में महमूद लगातार दिल की बीमारियों से जूझते रहे। वहीं बेहतर इलाज की उम्मीद में महमूद अमेरिका गए थे। वहीं 23 जुलाई 2004 को पेंसिल्वेनिया में नींद के दौरान महमूद अली ने दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 23 Jul 2026 12:14:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/mehmood-once-director-driver-then-became-bollywood-most-expensive-actor</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Chandrashekhar Azad Birth Anniversary: 'आजाद' रहे और 'आजाद' ही मरे, वो वीर जिसे जीते जी कोई नहीं पकड़ सका]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/he-lived-free-and-died-free-brave-man-whom-no-one-capture-while-he-alive]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 23 जुलाई को चंद्रशेखर आजाद का जन्म हुआ था। चंद्रशेखर आजादी के ऐसे दीवाने थे कि नाम के आगे भी आजाद लगा लिया। चंद्रशेखर आजाद से अंग्रेज थर-थर कांपते थे। वह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे चर्चित क्रांतिकारियों में थे। वह साहसी और तेज निर्णय लेते थे। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर चंद्रशेखर आजाद के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>मध्य प्रदेश के अलीराजपुर जिले के भाबरा गांव में 23 जुलाई 1906 को चंद्रशेखर का जन्म हुआ था। वह एक ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखते थे। उन्होंने कम उम्र में अपने देश प्रेम के बारे में परिवार को बता दिया था। आजाद का निशाना काफी सटीक था। इसके पीछे बचपन का अभ्यास, धैर्य, मजबूत शरीर, सतर्कता और कठिन परिस्थितियों में शांत रहने की क्षमता थी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/sanskrit-scholar-who-raised-slogan-of-purna-swaraj-through-kesari-newspaper" target="_blank">Bal Gangadhar Tilak Birth Anniversary: संस्कृत के विद्वान जिन्होंने Kesari अखबार के जरिए जगाई 'पूर्ण स्वराज' की अलख</a></h3><h2>पास रखते थे पिस्तौल और गोलियां</h2><div>जब आजाद क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़े, तो परिस्थितियां बदल गईं। अंग्रेजी शासन के खिलाफ उनका संघर्ष बेहद कठिन था। पुलिस, खुफिया तंत्र और सरकारी बल लगातार क्रांतिकारियों की खोज में रहते थे। इस स्थिति में क्रांतिकारियों को अपनी रक्षा करनी होती थी। इसलिए आजाद ने अपने साथ तीर-कमान और पिस्तौल और गोलियां रखना शुरू किया।</div><div><br></div><h2>आजाद की दो ख्वाहिश</h2><div>देश को आजाद कराने के लिए चंद्रशेखर आजाद रूस जाकर स्टालिन से मिलना चाहते थे। लेकिन रूस की यात्रा के लिए उनके पास पर्याप्त रुपए नहीं थे। वहीं उनकी दूसरी ख्वाहिश थी कि अपने साथी क्रांतिकारी भगत सिंह को फांसी से बचाना चाहते थे।&nbsp;</div><div><br></div><h2>वाराणसी में बने 'आजाद'</h2><div>साल 1921 में जब जलियांवाला बाग की घटना ने देशवासियों के अंदर आक्रोश भर दिया था। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ गांधी जी ने असहयोग आंदोलन छेड़ दिया था। क्रांतिकारियों के गढ़ बनारस में छात्रों का एक गुट विदेशी कपड़ों की दुकान के बाहर प्रदर्शन कर रहा था। तभी वहां पर पुलिस ने छात्रों पर लाठीचार्ज कर दिया। तभी आजाद ने एक दरोगा के सिर पर पत्थर मार दिया।</div><div><br></div><div>आजाद पकड़े गए और मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। इस दौरान उन्होंने अपनी मां का नाम धरती, पिता का नाम स्वतंत्रता और जेल को अपना घर बताया। मजिस्ट्रेट ने उनको 15 कोड़े मारने की सजा सुनाई। जेल से बाहर आने के बाद उनकी बहादुरी की चर्चा पूरे बनारस में थी। इसके बाद एक सभा में चंद्रशेखर तिवारी का नाम चंद्रशेखर आजाद किया गया।</div><div><br></div><h2>नहीं आऊंगा जिंदा हाथ</h2><div>एक बार स्वतंत्रता सेनानियों की बैठक में आजाद ने कहा था कि अंग्रेज मुझे कभी जिंदा नहीं पकड़ सकते हैं। वहीं प्रयागराज के अल्फ्रेड पार्क में 27 फरवरी 1931 को अंग्रेजों ने आजाद को घेर लिया। तब उन्होंने अंग्रेजों का जमकर सामना किया। लेकिन जब चंद्रशेखर आजाद के पास आखिरी गोली बची, तो उन्होंने अपनी कनपटी पर पिस्तौल से गोली चलाकर स्वयं को खत्म कर लिया।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 23 Jul 2026 12:11:31 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/he-lived-free-and-died-free-brave-man-whom-no-one-capture-while-he-alive</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Bal Gangadhar Tilak Birth Anniversary: संस्कृत के विद्वान जिन्होंने Kesari अखबार के जरिए जगाई 'पूर्ण स्वराज' की अलख]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/sanskrit-scholar-who-raised-slogan-of-purna-swaraj-through-kesari-newspaper]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 23 जुलाई को बाल गंगाधर तिलक का जन्म हुआ था। वह भारत के प्रमुख नेता, स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक और लोकप्रिय नेता थे। उनके नाम के आगे 'लोकमान्य' लगाया जाता था। उन्होंने सबसे पहले ब्रिटिश राज के दौरान पूर्ण स्वराज की मांग उठाई थी। इस कारण बाल गंगाधर तिलक को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का जनक कहा जाता है। उन्होंने 'स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है' का नारा दिया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर बाल गंगाधर तिलक के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>महाराष्ट्र के रत्नागिरी में 13 जुलाई 1856 को बाल गंगाधर तिलक का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम गंगाधर रामचंद्र तिलक था, वह संस्कृत के विद्वान और शिक्षक थे। मां का नाम पार्वती बाई था। साल 1877 में तिलक ने पुणे के डेक्कन कॉलेज से संस्कृत और गणित विषय की डिग्री हासिल की। इसके बाद मुंबई के सरकार लॉ कॉलेज से LLB पास किया।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/why-swami-vivekananda-attain-mahasamadhi-at-age-of-39-know-secret-of-belur-math" target="_blank">Swami Vivekananda Death Anniversary: स्वामी विवेकानंद ने 39 साल में क्यों ली थी महासमाधि, जानें Belur Math का वो रहस्य</a></h3><h2>शिक्षकों से मतभेद</h2><div>पढ़ाई पूरी करने के बाद बाल गंगाधर तिलक ने पुणे के एक निजी स्कूल में गणित और अंग्रेजी के शिक्षक बन गए। स्कूल के अन्य शिक्षकों से उनके मतभेद हो गए। ऐसे में 1880 में उन्होंने पढ़ाना छोड़ दिया था। दरअसल, बाल गंगाधर तिलक अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली के आलोचक थे। तिलक स्कूलों में ब्रिटिश स्टूडेंट्स की तुलना में भारतीय स्टूडेंट्स के साथ हो रहे दोगले व्यवहार का विरोध करते थे।</div><div><br></div><div>बाल गंगाधर तिलक ने समाज में फैली छुआछूत के खिलाफ भी आवाज उठाई थी। तिलक ने दक्खन शिक्षा सोसायटी की स्थापना की। इसकी स्थापना का उद्देश्य भारत में शिक्षा के स्तर को सुधारना है। वहीं तिलक ने मराठी भाषा में मराठा दर्पण और केसरी नामक दो अखबार शुरू किए, जो उस समय काफी ज्यादा लोकप्रिय हुए थे। स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा बनकर तिलक ने ब्रिटिश हुकूमत का विरोध किया और पूर्ण स्वराज की मांग की। केसरी अखबार में छपने वाले लेखों के कारण वह कई बार जेल भी गए।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 01 अगस्त 1920 को लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 23 Jul 2026 12:08:04 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/sanskrit-scholar-who-raised-slogan-of-purna-swaraj-through-kesari-newspaper</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Mukesh Birth Anniversary: 10वीं के बाद छोड़ी पढ़ाई, फिर 40 साल तक Bollywood Music पर चला मुकेश का जादू]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/mukesh-magic-continued-to-dominate-bollywood-music-for-40-years]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदी सिनेमा के महान गायकों में शामिल मुकेश का 22 जुलाई को जन्म हुआ था। आज भी लोग मुकेश के गाने सुनना पसंद करते हैं। उन्होंने अपने दर्द भरे गीतों से भारतीय संगीत को एक नई पहचान दी थी। अपने चार दशक लंबे सिंगिंग करियर में मुकेश ने कई ऐसे गीत गाए, जो आज भी सदाबहार माने जाते हैं। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर मुकेश के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>मुकेश का जन्म 22 जुलाई 1923 को हुआ था। इनका असली नाम मुकेश चंद माथुर था। वह एक मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखते थे। इनके पिता का नाम जोरावर चंद माथुर था, जोकि पेशे से इंजीनियर थे। मुकेश को बचपन से ही संगीत से लगाव था। 10वीं के बाद उन्होंने पढ़ाई करना छोड़ दी थी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/geeta-dutt-passed-away-at-age-of-42-having-endured-pain-of-stardom" target="_blank">Geeta Dutt Death Anniversary: महज 42 की उम्र में दुनिया छोड़ गई गीता दत्त, झेला Stardom का दर्द</a></h3><h2>फिल्मी करियर</h2><div>मुकेश की जिंदगी में सबसे बड़ा और अहम मोड़ तब आया। जब उन्होंने अपने रिश्तेदार और अभिनेता मोतीलाल की बहन की शादी में गाना गाया। मुकेश की आवाज से प्रभावित होकर मोतीलाल उनको मुंबई ले आए। यहां पर मुकेश ने संगीत की ट्रेनिंग ली। यहीं से मुकेश के फिल्मी सफर की शुरूआत हुई थी।</div><div><br></div><h2>पहला गाना और अभिनय</h2><div>मुकेश ने अपना पहला गीत 'दिल ही बुझा हुआ हो तो' गाया था। अपने पहले गाने से उन्होंने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया था। सिंगिंग के अलावा उन्होंने एक्टिंग में भी हाथ आजमाया था। उन्होंने माशूका, आह, अनुराग और दुल्हन जैसी फिल्मों में एक्टिंग की थी। लेकिन मुकेश को सबसे ज्यादा सफलता पार्श्व गायन में मिली थी। उन्होंने 'मेरा जूता है जापानी', 'आवारा हूं', 'जीना यहां मरना यहां', 'दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई', 'दोस्त-दोस्त न रहा' और 'कहता है जोकर' जैसे कई सदाबहार गीत गाए।</div><div><br></div><div>मुकेश की आवाज राज कपूर की फिल्मों की पहचान बन गई। मुकेश और राज कपूर की जोड़ी ने हिंदी सिनेमा को कई यादगार गीत दिए। मुकेश ने अपने 40 साल के लंबे करियर में 200 से ज्यादा गाने गाए। उन्होंने सिर्फ देश ही नहीं बल्कि विदेश में भी अपनी सिंगिंग का जादू बिखेरा।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 27 अगस्त 1976 को अमेरिका में एक स्टेज शो के दौरान दिल का दौरा पड़ने से मुकेश की मृत्यु हो गई।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 22 Jul 2026 18:15:57 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/mukesh-magic-continued-to-dominate-bollywood-music-for-40-years</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Bruce Lee Death Anniversary: महज 32 की उम्र में दुनिया छोड़ गया Martial Arts का यह सबसे बड़ा Superstar]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/this-biggest-martial-arts-superstar-passed-away-at-age-of-32]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>मार्शल आर्ट के बेहतरीन योद्धा ब्रूस ली का 20 जुलाई को निधन हो गया था। उनको मार्शल आर्ट में माहिर माना जाता था। मार्शल आर्ट के अलावा ब्रूस ली फिल्मों में भी सक्रिय रहे। वह रोजाना इसकी प्रैक्टिस किया करते थे। इस कारण ब्रूस ली मार्शल आर्ट में पूरी तरह से माहिर हो चुके थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर ब्रूस ली के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>सैन फ्रांसिस्को में 27 नवंबर 1940 को ब्रूस ली का जन्म हुआ था। उनके बचपन का नाम ली जुन-फैन था। वह बचपन से ही मार्शल आर्ट की ओर आकर्षित थे और इसमें कुछ बड़ा करना चाहते थे। 18 साल की उम्र में उन्होंने वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी में एडमिशन ले लिया। यूनिवर्सिटी की फीस भरने के लिए उन्होंने लोगों को कुंग फू सिखाना शुरू कर दिया। इसी बीच साल 1962 को ब्रूस ली ने एक फाइट की, जिसमें उन्होंने 11 सेकेंड के अंदर अपने विरोधी को 15 पंच मार दिए।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/geeta-dutt-passed-away-at-age-of-42-having-endured-pain-of-stardom" target="_blank">Geeta Dutt Death Anniversary: महज 42 की उम्र में दुनिया छोड़ गई गीता दत्त, झेला Stardom का दर्द</a></h3><div><br></div><h2>ब्रूस ली का करियर</h2><div>वहीं ब्रूस ली अपनी दो उंगलियों से पुश अप लगा लेते थे। ब्रूस ली की किक की रफ्तार इतनी तेज होती थी कि शूटिंग के दौरान एक शूट को 34 फ्रेम स्लो करना पड़ता था। वह 18 की उम्र में 20 फिल्मों में एक्टिंग कर चुके थे। अपनी फिल्मों में ब्रूस ली के कई मार्शल कलाकारों के साथ काम किया, जो बाद में बड़े सितारे बने।</div><div><br></div><div>बता दें कि वह गामा पहलवान और बॉक्सर मोहम्मद अली के बड़े फैन थे। ब्रूस ली मोहम्मद अली के साथ एक फाइट लड़ना चाहते थे। वहीं ब्रूस ली ने अपने करियर में सिर्फ 7 हॉलीवुड फिल्मों में काम किया था।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>बताया जाता है कि ब्रूस ली को पानी से नफरत थी और उनको तैराकी भी नहीं आती थी। वहीं 20 जुलाई 1972 को महज 32 साल की उम्र में ब्रूस ली ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 20 Jul 2026 16:08:36 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/this-biggest-martial-arts-superstar-passed-away-at-age-of-32</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Geeta Dutt Death Anniversary: महज 42 की उम्र में दुनिया छोड़ गई गीता दत्त, झेला Stardom का दर्द]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/geeta-dutt-passed-away-at-age-of-42-having-endured-pain-of-stardom]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के कई फेमस गानों को अपनी सुरीली आवाज से सजाने वाली गीता दत्त का 20 जुलाई को निधन हो गया था। आज भी गीता दत्त की आवाज संगीत जगत में महका करती है। गीता दत्त की गायिकी में वह जादू था कि उनके संगीत में प्यार, दर्द और तकलीफ जैसे जज्बात उभरकर आते थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर गीता दत्त के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>फरीदपुर में 23 नवंबर 1930 को गीता दत्त का जन्म हुआ था। वह जमींदार के परिवार से ताल्लुक रखती थीं। गीता दत्त का पूरा परिवार 40 के दशक में कोलकाता आ गया और फिर मुंबई चला गया। गीता दत्त का संगीत से रिश्ता बचपन से जुड़ गया था। उनकी मां एक कवियत्री थीं और पिता मुकुल रॉय संगीतकार थे।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/bollywood-superstar-craze-when-crowd-yearned-for-glimpse-of-kaka" target="_blank">Rajesh Khanna Death Anniversary: Bollywood सुपरस्टार की वो दीवानगी, जब 'Kaka' की एक झलक को तरसती थी भीड़</a></h3><h2>पहला ब्रेक</h2><div>गीता दत्त को साल 1946 में पहला ब्रेक मिला था, तब वह 16 साल की थीं। फिल्म 'भक्त प्रह्लाद' के एक गाने में गीता ने दो लाइनें गाई थीं। इसके बाद फिल्म 'दो भाई' के गाने में अपनी आवाज दी। उन्होंने अपने सिंगिंग करियर में 'आंखों ही आंखों', 'चिन चिन चू', 'जाने कहां मेरा जिगर गया जी', 'बाबू जी धीरे चलना', 'पिया ऐसो जिया में समाय गयो रे', 'मुझे जान न कहो मेरी जान', 'वक्त ने किया क्या हसीं सितम' और 'ये लो मैं हारी पिया' जैसे तमाम हिट गाने दिए। लोग आज भी इन गानों को सुनना पसंद करते थे। गीता दत्त ने अपने सिंगिंग करियर में ओ.पी. नैय्यर, स.डी. बर्मन और हेमंत कुमार जैसे बड़े संगीतकारों के साथ काम किया।&nbsp;</div><div><br></div><h2>पर्सनल लाइफ</h2><div>गीता दत्त की शादी मशहूर फिल्म निर्माता गुरुदत्त से हुई थी। गुरु और गीता की पहली मुलाकात फिल्म 'बाजी' के सेट पर हुई थी। दोनों का प्यार परवान चढ़ा और दोनों ने शादी का फैसला किया। लेकिन गीता का परिवार इस रिश्ते के खिलाफ था। लेकिन 26 जुलाई 1953 को गीता और गुरु ने शादी कर ली। शादी के बाद उनके बच्चे अरुण दत्त, तरुण दत्त और नीना दत्त हुए।</div><div><br></div><div>शादी के बाद गुरु दत्त ने गीता पर बंदिशें लगा दीं कि वह सिर्फ उनकी फिल्मों में गाना गाएंगी। शादी के बाद गुरु दत्त और वहीदा रहमान के अफेयर की खबर आने लगी। ऐसे में गीता दत्त अपने बच्चों के साथ माता-पिता के घर चली गईं। इस दौरान गीता दत्त को नशे की लत लग गई और वह शराब की आदी हो गईं।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं लिवर की बीमारी के कारण 20 जुलाई 1972 में 42 साल की उम्र में गीता दत्त ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 20 Jul 2026 16:03:28 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/geeta-dutt-passed-away-at-age-of-42-having-endured-pain-of-stardom</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Nelson Mandela Birth Anniversary: दक्षिण अफ्रीका से दुनिया तक गूंजती इंसाफ की आवाज थे नेल्सन मंडेला]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/nelson-mandela-was-a-voice-for-justice-that-resonated-from-south-africa-to-the-entire-world]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>नेल्सन मंडेला, एक ऐसा नाम, जो समस्त विश्व समुदाय के लिए मानवता, साहस, सहिष्णुता और संघर्ष का प्रतीक बन गया है। प्रतिवर्ष 18 जुलाई को ‘नेल्सन मंडेला अंतर्राष्ट्रीय दिवस’ मनाया जाता है, जो न केवल इस महान नेता को श्रद्धांजलि देने का दिन है बल्कि यह पूरी दुनिया को यह संदेश भी देता है कि परिवर्तन लाने के लिए केवल शब्द नहीं बल्कि कर्म आवश्यक हैं। यह दिन हमें स्मरण करााता है कि समाज में बदलाव लाने के लिए हम सभी की भूमिका होती है और प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में दूसरों के लिए कुछ कर सकता है। नेल्सन मंडेला का जन्म 18 जुलाई 1918 को दक्षिण अफ्रीका के म्वेजो नामक गांव में हुआ था। वे थेम्बू कुल की एक शाखा ‘मदिवा’ जनजाति से थे और उनका मूल नाम ‘रोहिलाहला मंडेला’ था, जिसका अर्थ होता है ‘शरारती’। उन्हें ‘नेल्सन’ नाम उनके स्कूल शिक्षक ने अंग्रेजी नामों की परंपरा के तहत दिया था। उनका जीवन एक सामान्य अफ्रीकी बच्चे की तरह शुरू हुआ लेकिन उनके भीतर असाधारण नेतृत्व क्षमता और अन्याय के प्रति गहरी संवेदना थी, जिसने उन्हें बाद में एक क्रांतिकारी नेता बना दिया।</div><div><br></div><div>नेल्सन मंडेला की शिक्षा की शुरुआत क्लार्कबरी मिशनरी स्कूल से हुई। आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने फोर्ट हेयर यूनिवर्सिटी और जोहान्सबर्ग स्थित विटवाटरस्रैंड विश्वविद्यालय में दाखिला लिया, जहां उन्होंने कानून की पढ़ाई की। पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने रंगभेद नीति और सामाजिक असमानताओं के विरुद्ध आवाज उठानी शुरू कर दी थी। दक्षिण अफ्रीका में उस समय श्वेत अल्पसंख्यक सरकार द्वारा ‘अपरथाइड’ नामक नस्लीय भेदभाव की क्रूर नीति लागू थी, जिसके अंतर्गत अश्वेतों को बुनियादी अधिकारों से वंचित रखा गया था। उन्हें वोट देने, जमीन रखने, शिक्षा प्राप्त करने, अस्पतालों में इलाज करवाने और बसों-रेस्तरां जैसी सार्वजनिक सेवाओं का समान उपयोग करने का अधिकार नहीं था। मंडेला ने इन्हीं अन्यायपूर्ण नीतियों के खिलाफ संघर्ष का बिगुल बजाया। वे 1944 में अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस से जुड़ गए और जल्द ही संगठन के युवा विंग के संस्थापक बन गए। अहिंसा और शांतिपूर्ण आंदोलनों के जरिये उन्होंने सरकार पर दबाव बनाना शुरू किया लेकिन जब उन्हें लगा कि सरकार की दमनकारी नीति अहिंसात्मक विरोध को कुचलने पर आमादा है तो उन्होंने ‘उमखोंतो वे सिजवे’ नामक एक सशस्त्र संगठन की स्थापना की, जो दक्षिण अफ्रीका में क्रांति का आरंभ था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/bollywood-superstar-craze-when-crowd-yearned-for-glimpse-of-kaka" target="_blank">Rajesh Khanna Death Anniversary: Bollywood सुपरस्टार की वो दीवानगी, जब 'Kaka' की एक झलक को तरसती थी भीड़</a></h3><div>1962 में मंडेला को गिरफ्तार कर लिया गया और उन पर देशद्रोह, हिंसा भड़काने और विदेशी सहायता प्राप्त करने के आरोप लगाए गए। उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई और उन्होंने अपना अधिकांश समय कुख्यात रोबेन द्वीप की जेल में बिताया। यह सजा कुल 27 वर्षों की लंबी यातना बन गई परंतु जेल की कोठरी में रहते हुए भी मंडेला की आत्मा आजाद रही। वे न टूटे, न झुके और न डरे। जेल में उन्होंने पढ़ाई की, दूसरे कैदियों को शिक्षित किया और अपना संघर्ष जारी रखा। इस दौरान दक्षिण अफ्रीका और दुनियाभर में मंडेला की रिहाई की मांग उठने लगी। अंततः सरकार झुकी और 11 फरवरी 1990 को नेल्सन मंडेला को जेल से रिहा किया गया। यह क्षण इतिहास में आज भी जीवंत है, जब एक अश्वेत नेता, जिसे वर्षों तक आतंकवादी करार दिया गया था, अब स्वतंत्रता और न्याय का प्रतीक बन चुका था। रिहाई के बाद मंडेला ने अपने सभी विरोधियों को माफ कर दिया। उन्होंने न केवल अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस को फिर से संगठित किया बल्कि देश को भी एकजुट किया। उन्होंने विभाजन नहीं बल्कि मेल-मिलाप की राजनीति की। उनकी इसी दूरदृष्टि और अहिंसा के पथ पर अडिग रहने की प्रेरणा ने दक्षिण अफ्रीका को नस्लीय संघर्ष से निकालकर लोकतंत्र की ओर अग्रसर किया।</div><div><br></div><div>दक्षिण अफ्रीका में 1994 में पहली बार बहुजातीय आम चुनाव आयोजित हुए, जिसमें हर नागरिक को मतदान का अधिकार मिला और परिणामस्वरूप नेल्सन मंडेला देश के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बने। यह महज एक राजनीतिक जीत नहीं थी, यह एक युग परिवर्तन था। मंडेला ने अपने राष्ट्रपति काल में सुलह, सामाजिक समरसता और आर्थिक पुनर्निर्माण की नीति को अपनाया। उन्होंने जातीय द्वेष के बजाय सहयोग को बढ़ावा दिया। उन्होंने ‘सत्य और मेलमिलाप आयोग’ की स्थापना की, जहां पीड़ित और अपराधियों दोनों को एक साथ लाया गया ताकि सच्चाई सामने आ सके और समाज नई शुरुआत कर सके। नेल्सन मंडेला की सोच ‘उबुन्टु’ दर्शन से प्रभावित थी, जो अफ्रीकी संस्कृति में मानवीय संबंधों और सह-अस्तित्व की भावना को महत्व देती है। मंडेला ने यह दिखा दिया कि बदले की भावना से कोई देश नहीं बनता बल्कि माफी और मेल-मिलाप की भावना से स्थायी शांति संभव है।</div><div><br></div><div>उनके जीवन के योगदान को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिला। 1993 में उन्हें शांति का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। 1990 में उन्हें भारत सरकार ने ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया और वे यह सम्मान पाने वाले पहले विदेशी व्यक्ति बने। इसके अलावा उन्हें संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका, रूस, फ्रांस जैसे अनेक देशों और संस्थाओं ने सर्वोच्च नागरिक सम्मान प्रदान किया। 2009 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 18 जुलाई को ‘नेल्सन मंडेला अंतर्राष्ट्रीय दिवस’ घोषित किया ताकि लोग उनके जीवन से प्रेरणा लेकर समाज के लिए स्वयं को समर्पित कर सकें। इस दिन दुनियाभर में सामाजिक सेवा, मानवाधिकार, शिक्षा, स्वास्थ्य और समानता से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। संयुक्त राष्ट्र का संदेश है कि हर व्यक्ति इस दिन कम से कम 67 मिनट समाजसेवा को समर्पित करे, जो मंडेला के सार्वजनिक जीवन के 67 वर्षों के प्रतीक हैं।</div><div><br></div><div>नेल्सन मंडेला का जीवन केवल दक्षिण अफ्रीका तक सीमित नहीं था। उन्होंने दुनिया को यह सिखाया कि सच्चे नेता वह होते हैं, जो अपने कष्टों को व्यक्तिगत नहीं मानते बल्कि उसे जनकल्याण की प्रेरणा बना देते हैं। उन्होंने यह भी दिखाया कि नेतृत्व का अर्थ अधिकार नहीं, जिम्मेदारी है। वे जब राष्ट्रपति बने तो केवल एक कार्यकाल तक सत्ता में रहे जबकि वे चाहते तो आजीवन शासन कर सकते थे पर उन्होंने सत्ता को साध्य नहीं, साधन माना। 5 दिसंबर 2013 को 95 वर्ष की आयु में नेल्सन मंडेला ने अंतिम सांस ली। उनके निधन पर पूरी दुनिया ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। लाखों लोगों ने उन्हें ‘दक्षिण अफ्रीका का गांधी’ कहा तो कई लोगों ने उन्हें ‘मानवता का प्रकाश स्तंभ’ बताया। उनके सम्मान में कई देशों में राष्ट्रीय शोक घोषित किया गया। आज उनकी मूर्तियां, नाम पर बने संस्थान और उनके विचारों पर आधारित योजनाएं दुनियाभर में उनकी विरासत को जीवित रखे हुए हैं।</div><div><br></div><div>नेल्सन मंडेला का जीवन उन लोगों के लिए आदर्श है, जो दुनिया को बेहतर बनाना चाहते हैं। उनका जीवन संघर्षों का था लेकिन उन्होंने कभी भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। उन्होंने दिखाया कि किसी भी अन्याय के खिलाफ लड़ाई अहिंसा और नैतिक साहस से भी लड़ी जा सकती है। नेल्सन मंडेला ने कहा था, ‘मैंने पाया कि साहस डर की अनुपस्थिति नहीं है बल्कि उस पर विजय पाना है। बहादुर वह नहीं होता, जो डरता नहीं है बल्कि वह होता है, जो डर को हराता है।’ यह कथन आज के विश्व पर भी उतना ही लागू होता है, जितना उनके समय पर था। आज जब दुनिया असहिष्णुता, नस्लवाद, असमानता और युद्ध की चपेट में है, तब मंडेला जैसे नेताओं की सोच, दृष्टि और प्रेरणा पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गई है। वे हमारे समय के ऐसे प्रेरणास्तंभ हैं, जो आने वाली पीढ़ियों को यह सिखाते रहेंगे कि अंधकार चाहे जितना भी गहरा क्यों न हो, एक मोमबत्ती उसे चीर सकती है। उनकी यह बात हमारे लिए मार्गदर्शक हो सकती है, ‘एक अच्छा दिमाग और एक अच्छा दिल हमेशा एक विजयी संयोजन होता है।’ इसलिए यदि हम आज भी दुनिया को बदलना चाहते हैं तो हमें अपने भीतर की मानवता, संवेदना और साहस को जगाना होगा, यही नेल्सन मंडेला को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।</div><div><br></div><div>- योगेश कुमार गोयल</div><div>(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई चर्चित पुस्तकों के लेखक हैं)</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 18 Jul 2026 12:32:35 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/nelson-mandela-was-a-voice-for-justice-that-resonated-from-south-africa-to-the-entire-world</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Rajesh Khanna Death Anniversary: Bollywood सुपरस्टार की वो दीवानगी, जब 'Kaka' की एक झलक को तरसती थी भीड़]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/bollywood-superstar-craze-when-crowd-yearned-for-glimpse-of-kaka]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बॉलीवुड के पहले सुपरस्टार राजेश खन्ना की 18 जुलाई को मृत्यु हो गई थी। राजेश खन्ना कैंसर जैसी घातक बीमारी से जूझ रहे थे। जीवन के आखिरी पड़ाव में दवाइयों ने भी अपना असर करना बंद कर दिया था। अभिनेता के स्टारडम का वह आलम था कि वह जिस भी गली से निकलते थे, वहां पर लड़कियों की भीड़ लग जाया करती थी। उनकी हर फिल्म सुपरहिट होती थी। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर सुपरस्टार राजेश खन्ना के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>पंजाब के अमृतसर में 29 दिसंबर 1942 को राजेश खन्ना का जन्म हुआ था। इनका असली नाम जतिन खन्ना था। जतिन को बचपन से ही थिएटर में रुचि थी। उन्होंने एक टैलेंट कॉन्टेस्ट जीतकर मुंबई में कदम रखा। वहीं फिल्मों में आने के बाद उन्होंने अपना नाम राजेश खन्ना रख लिया था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/why-swami-vivekananda-attain-mahasamadhi-at-age-of-39-know-secret-of-belur-math" target="_blank">Swami Vivekananda Death Anniversary: स्वामी विवेकानंद ने 39 साल में क्यों ली थी महासमाधि, जानें Belur Math का वो रहस्य</a></h3><h2>फिल्मी सफर</h2><div>बता दें कि राजेश खन्ना ने कुल 180 फिल्मों और 163 फीचर फिल्मों में काम किया था। उन्होंने 128 फिल्मों में मुख्य रोल किया था। साल 1969 में आई फिल्म 'आराधना' ने अभिनेता के फिल्मी करियर की दिशा बदल दी। 3 सालों में राजेश खन्ना ने लगातार 15 हिट फिल्में दी थीं। जोकि अपने आप में एक रिकॉर्ड है।</div><div><br></div><div>जब राजेश खन्ना से उनका स्टारडम संभाले नहीं संभला तो वह यह सोचने लगे थे कि उनकी कुछ फिल्में फ्लॉप हो जाएं। अभिनेता ने 'अपना देश', 'मेरे जीवन साथी', 'कटी पतंग', 'अमर प्रेम', 'नमक हराम' और 'आप की कसम' जैसी कई सुपरहिट फिल्में दी थीं।</div><div><br></div><div>1970 के दशक में राजेश खन्ना के बंगले पर लड़कियों के इतने खत आते थे कि काका को खतों को पढ़ने के लिए अलग से एक शख्स रखना पड़ा था। जिनमें कई खत तो खून से लिखे होते थे। लड़कियां काका की फिल्में देखने से पहले सजने-संवरने के लिए ब्यूटी पार्लर जाया करती थीं।</div><div><br></div><h2>पर्सनल लाइफ</h2><div>अभिनेता की पर्सनल लाइफ काफी उतार-चढ़ाव भरी रही। साल 1973 में उन्होंने एक्ट्रेस डिंपल कपाड़िया से शादी की थी। उनकी दो बेटी ट्विंकल और रिंकी हुई। लेकिन 80 के दशक की शुरूआत में दोनों अलग रहने लगे थे। हालांकि उन्होंने कभी कानूनी तौर पर डिवोर्स नहीं लिया।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 18 जुलाई 2012 को सुपरस्टार राजेश खन्ना ने 69 साल की उम्र में इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 18 Jul 2026 12:27:35 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/bollywood-superstar-craze-when-crowd-yearned-for-glimpse-of-kaka</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Swami Vivekananda Death Anniversary: स्वामी विवेकानंद ने 39 साल में क्यों ली थी महासमाधि, जानें Belur Math का वो रहस्य]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/why-swami-vivekananda-attain-mahasamadhi-at-age-of-39-know-secret-of-belur-math]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत के महान आध्यात्मिक चिंतक, राष्ट्रनिर्माता और युवाओं के प्रेरणास्रोत स्वामी विवेकानंद का 04 जुलाई को निधन हो गया था। उन्होंने विश्व मंच पर वेदांत, भारतीय संस्कृति और सनातन दर्शन को नई पहचान दिलाई थी। स्वामी विवेकानंद का मानना था कि किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति उसके युवा होते हैं। स्वामी विवेकानंद ने अपने जीवन में जो भी कार्य किए, उसका प्रभाव आज भी पूरी दुनिया महसूस करती है। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर स्वामी विवेकानंद के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>कोलकाता में 12 जनवरी 1863 को स्वामी विवेकानंद का जन्म हुआ था। उनका असली नाम नरेंद्र नाथ दत्त था। वह एक संपन्न बंगाली परिवार से ताल्लुक रखते थे। उनके पिता का नाम विश्वनाथ दत्त था, जोकि एक फेमस वकील थे। वहीं उनकी मां का नाम भुवनेश्वरी देवी था। जो एक धार्मिक विचारों वाली महिला थीं। नरेंद्रनाथ बचपन से ही जिज्ञासु और बुद्धिमान थे। वह शास्त्र, वेद और भारतीय संस्कृति के बारे में रुचि रखते थे।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/from-mathematics-professor-to-british-parliament-know-dadabhai-naoroji-journey" target="_blank">Dadabhai Naoroji Death Anniversary: गणित के Professor से British Parliament तक, Dadabhai Naoroji का प्रेरक सफर</a></h3><h2>रामकृष्ण परमहंस से मुलाकात</h2><div>साल 1881 में पहली बार स्वामी विवेकानंद की रामकृष्ण परमहंस की मुलाकात हुई और वह उनके शिष्य बन गए। रामकृष्ण परमहंस की शिक्षाओं ने स्वामी विवेकानंद के जीवन को पूरी तरह से बदल दिया था। परमहंस ने विवेकानंद को भारतीय संस्कृति, आत्मज्ञान और जीवन के उद्देश्य को समझने में मार्गदर्शन किया था। रामकृष्ण परमहंस की शिक्षा के आधार पर स्वामी विवेकानंद ने आत्मा की शक्ति, समाज सुधार और धार्मिक सहिष्णुता के विषय में गहरे विचार किए।</div><div><br></div><h2>शिकागो विश्व धर्म महासभा</h2><div>साल 1893 में स्वामी विवेकानंद की पहचान पूरी दुनिया में शिकागो विश्व धर्म महासभा में उनके प्रसिद्ध भाषण से हुई। उन्होंने अपने भाषण में धार्मिक सहिष्णुता, भारतीय संस्कृति और मानवता के महत्व पर जोर दिया था। स्वामी विवेकानंद का यह भाषण आज भी धार्मिक एकता और सामाजिक एकता के रूप में याद किया जाता है।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं पश्चिम बंगाल के बेलूर मठ में 04 जुलाई 1902 को 39 साल की उम्र में स्वामी विवेकानंद का निधन हो गया था। स्वामी विवेकानंद के अनुयायियों का मानना था कि जीवन के अंतिम समय में बेलूर मठ में ध्यान लगाते लिए उन्होंने अपनी इच्छा से महासमाधि प्राप्त की थी।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 04 Jul 2026 14:31:22 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/why-swami-vivekananda-attain-mahasamadhi-at-age-of-39-know-secret-of-belur-math</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Dadabhai Naoroji Death Anniversary: गणित के Professor से British Parliament तक, Dadabhai Naoroji का प्रेरक सफर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/from-mathematics-professor-to-british-parliament-know-dadabhai-naoroji-journey]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 30 जून को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापकों में से एक दादाभाई नौरोजी का निधन हो गया था। वह ब्रिटेन के हाउस ऑफ कॉमन्स में चुने जाने वाले पहले भारतीय थे। भारतीय स्वतंत्रता में दादाभाई नौरोजी ने महत्वपूर्ण योगदान दिया था। दादाभाई नौरोजी न सिर्फ स्वतंत्रता आंदोलन के कई नेताओं के आदर्श रहे, बल्कि उनको ब्रिटेन तक में सम्मान मिला। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर दादाभाई नौरोजी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>मुंबई में एक पारसी परिवार में 04 सितंबर 1825 को दादा भाई नौरोजी का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम नौरोजी पलांजी डोरडी था और मां का नाम मनेखबाई था। जब दादाभाई सिर्फ 4 साल के थे, तो उनके पिता का निधन हो गया था। ऐसे में दादाभाई का पालन पोषण उनकी मां ने किया था। अनपढ़ होने के बाद भी उनकी मां ने उनकी पढ़ाई का विशेष ध्यान रखा। पढ़ाई पूरी करने के बाद दादा भाई नौरोजी 27 साल की उम्र में गणित और भौतिक शास्त्र के प्राध्यापक बन गए थे।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/chanakya-of-politics-who-became-pm-of-country-after-leaving-politics" target="_blank">PV Narasimha Rao Birth Anniversary: सियासत के वो 'चाणक्य' जो राजनीति छोड़ते-छोड़ते बन गए देश के Prime Minister</a></h3><h2>इंडियन नेशनल कांग्रेस के अध्यक्ष</h2><div>साल 1851 में दादा भाई नौरोजी ने गुजराती भाषा में रस्त गफ्तार साप्ताहिक शुरू किया। साल 1885 में बंबई विधान परिषद के सदस्य बने और साल 1886 में फिन्सबरी क्षेत्र से पार्लियामेंट के लिए निर्वाचित हुए थे। दादाभाई लंदन के विश्वविद्यालय में गुजराती के प्रोफेसर भी बने और फिर साल 1869 में वह भारत वापस आ गए। जिसके बाद साल 1886 और 1906 में दादाभाई नौरोजी इंडियन नेशनल कांग्रेस के अध्यक्ष बने।</div><div><br></div><div>उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इस दौरान कांग्रेस में विचारधारा के आधार को दो गुट बन गए। जिनको 'नरम दल' और 'गरम दल' कहा जाता था। दोनों दलों की कार्यशैली उनके नाम के अनुरूप थी। साल 1906 में कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन की तैयारियां जोरों पर चल रही थीं। दोनों दल अध्यक्ष पद को हथियाने के लिए रणनीति बना रहे थे, जिससे कि पार्टी में उनके पक्ष का दबदबा बढ़ सके। इस वजह से यह पूरी आशंका बन गई कि इस बार का अधिवेशन बिना झगड़े के खत्म नहीं होगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>इस जिम्मेदारी को निभाने के लिए दो बार कांग्रेस अध्यक्ष रह चुके दादाभाई को चुना गया। स्थितियों को देखते हुए वह तैयार हो गए और 71 साल की उम्र में वह तीसरी बार कांग्रेस के अध्यक्ष बने। इस दौरान उनकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी दोनों दलों को एक साथ रखने की थी। वहीं दादाभाई नौरोजी दोनों दलों को समझाने में सफल रहे और दोनों दल दादाभाई का सम्मान करते थे, इसलिए दोनों दलों ने उनकी बात को सुना और समझा।</div><div><br></div><div>दोनों ही दलों को एक-दूसरे की विचारधारा को समझने की जरूरत महसूस हुई। इस तरह से टूटने की कगार पर पहुंची कांग्रेस में दादाभाई नौरोजी ने एकता स्थापित की। उनको 'ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया' भी कहा जाता था। साल 1906 में दादाभाई नौरोजी ने स्व-शासन की मांग सार्वजनिक रूप से व्यक्त की थी। उन्होंने देश को सबसे पहले 'स्वराज' का नारा दिया था।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 30 जून 1917 को दादाभाई नौरोजी का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 30 Jun 2026 14:11:57 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/from-mathematics-professor-to-british-parliament-know-dadabhai-naoroji-journey</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[संत कबीर: भारतीय चेतना के महासूर्य और अमर गायक]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/saint-kabir-the-great-sun-of-indian-consciousness-and-an-immortal-singer]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारतीय संत परंपरा में यदि किसी एक संत ने धर्म, समाज, अध्यात्म और मानवीय चेतना को सबसे अधिक झकझोरा, तो वह नाम है-संत कबीर। वे केवल एक कवि, संत या समाज-सुधारक नहीं थे, बल्कि भारतीय आत्मा की उस जागृत चेतना के प्रतीक थे, जिसने मनुष्य को मनुष्य के रूप में देखने की दृष्टि दी। कबीर भारतीय अध्यात्म के ऐसे महासूर्य हैं, जिनकी वाणी आज भी उतनी ही प्रासंगिक, प्रेरक और क्रांतिकारी है, जितनी छह सौ वर्ष पूर्व थी। आज जब संसार हिंसा, युद्ध, आतंकवाद, धार्मिक कट्टरता, सामाजिक विभाजन, उपभोक्तावाद, मानसिक तनाव और नैतिक पतन जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है, तब कबीर की वाणी मानवता के लिए आशा की किरण बनकर सामने आती है। कबीर का समूचा चिंतन मनुष्य को स्वयं से जोड़ने, समाज को समरस बनाने और धर्म को आडंबरों से मुक्त कर उसके मूल स्वरूप तक पहुंचाने का प्रयत्न है।</div><div><br></div><div>कबीर का अवतरण ऐसे समय में हुआ, जब भारतीय समाज अनेक प्रकार की रूढ़ियों, कर्मकांडों, जातीय विभाजनों और धार्मिक पाखंडों में उलझा हुआ था। एक ओर मुस्लिम शासकों की धर्मांधता थी, दूसरी ओर हिंदू समाज कर्मकांड और बाह्याचार के बोझ तले दबा हुआ था। धर्म का वास्तविक स्वरूप कहीं खो गया था। ऐसे संक्रमणकाल में कबीर ने निर्भीक स्वर में उद्घोष किया- ‘पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।’ कबीर ने स्पष्ट किया कि धर्म का सार ज्ञान, प्रेम, करुणा और आत्मानुभूति में है, न कि बाहरी कर्मकांडों में। उन्होंने मंदिर और मस्जिद दोनों की सीमाओं को पार करते हुए मनुष्य के भीतर स्थित परमात्मा की खोज का संदेश दिया। कबीर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे अनुभव के संत थे। उन्होंने स्वयं कहा- ‘मैं कहता आंखन की देखी, तू कहता कागद की लेखी।’ उनकी वाणी किसी ग्रंथ, शास्त्र या परंपरा की दास नहीं थी। उन्होंने जो कहा, अपने अनुभव के आधार पर कहा। यही कारण है कि उनकी वाणी में अद्भुत प्रामाणिकता और जीवन-सत्य का तेज दिखाई देता है। कबीर निरंतर आत्म-परीक्षण के पक्षधर थे। उनका प्रसिद्ध दोहा-’बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय। जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।’ आज के समय में भी उतना ही सार्थक है। वर्तमान समाज में दूसरों की आलोचना, निंदा और दोषारोपण की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। कबीर हमें आत्मनिरीक्षण और आत्मशोधन का मार्ग दिखाते हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/saint-kabir-biggest-symbol-of-hindu-muslim-unity-know-interesting-facts" target="_blank">Kabirdas Jayanti 2026: हिंदू-मुस्लिम एकता के सबसे बड़े Symbol थे संत कबीर, जानिए रोचक बातें</a></h3><div>संत कबीर सर्वधर्म समभाव के सशक्त प्रवक्ता थे। उन्होंने हिंदू और मुसलमान दोनों समुदायों की संकीर्णताओं की आलोचना की, लेकिन किसी धर्म का विरोध नहीं किया। उनका विरोध केवल अंधविश्वास, पाखंड और कट्टरता से था। उन्होंने कहा-’कंकर-पत्थर जोड़ि के मस्जिद लई बनाय। ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, बहरा हुआ खुदाय।’ और दूसरी ओर-’पाहन पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूं पहार। ताते तो चाकी भली, पीस खाय संसार।’ इन दोहों का उद्देश्य किसी धर्म विशेष की आलोचना नहीं, बल्कि मनुष्य को बाहरी आडंबरों से ऊपर उठाकर आंतरिक साधना की ओर ले जाना था। आज जब धार्मिक असहिष्णुता और सांप्रदायिक तनाव विश्व के अनेक देशों में संकट का कारण बने हुए हैं, तब कबीर का संदेश-’अव्वल अल्लाह नूर उपाया, कुदरत के सब बंदे’ मानवता के लिए अत्यंत प्रासंगिक है।</div><div><br></div><div>कबीर ने जाति-पांति की संकीर्णता को भारतीय समाज की बड़ी कमजोरी माना। उन्होंने सामाजिक समानता और मानवीय गरिमा की स्थापना का प्रयत्न किया। उनका प्रसिद्ध दोहा-’जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान। मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान।’ आज भी सामाजिक समरसता का आधार बन सकता है। कबीर ने मनुष्य की पहचान उसके कर्म, ज्ञान और चरित्र से करने की बात कही। उन्होंने यह सिद्ध किया कि आध्यात्मिक ऊंचाई किसी जाति या वर्ग की बपौती नहीं है। एक सामान्य जुलाहा होकर भी वे भारतीय संत परंपरा के शिखर पुरुष बने। कबीर का जीवन इस बात का प्रमाण है कि आध्यात्मिकता केवल जंगलों, आश्रमों और मठों तक सीमित नहीं है। उन्होंने गृहस्थ जीवन जीते हुए उच्चतम आध्यात्मिक उपलब्धियां प्राप्त कीं। उन्होंने संसार से पलायन नहीं किया, बल्कि संसार में रहकर सत्य, सादगी, श्रम, ईमानदारी और संतत्व को साधा। आज जब जीवन में तनाव, प्रतिस्पर्धा और भौतिकता बढ़ती जा रही है, तब कबीर का जीवन-संदेश अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है कि परिवार और समाज के बीच रहते हुए भी आध्यात्मिक जीवन जिया जा सकता है।</div><div><br></div><div>इक्कीसवीं सदी का मनुष्य तकनीकी रूप से समृद्ध होने के बावजूद भीतर से असुरक्षित, अकेला और तनावग्रस्त है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल क्रांति और उपभोक्तावाद के इस युग में मनुष्य अपने भीतर की शांति खोता जा रहा है। ऐसे समय में कबीर का यह संदेश नई दिशा देता है-’माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर। कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।’ कबीर हमें बाहरी उपलब्धियों से अधिक आंतरिक परिवर्तन का महत्व समझाते हैं। वे बताते हैं कि वास्तविक क्रांति मनुष्य के भीतर घटित होती है। पर्यावरण संकट, हिंसा, असहिष्णुता और नैतिक पतन के इस दौर में कबीर की करुणा, सह-अस्तित्व और सादगी की जीवन-दृष्टि मानव सभ्यता को नई राह दिखा सकती है। कबीर की वाणी किसी एक युग की नहीं, बल्कि समस्त मानवता की धरोहर है। उनकी साखियां, सबद, रमैनी, बीजक और उलटबांसियां आज भी करोड़ों लोगों को प्रेरणा देती हैं। उनकी भाषा सहज, लोकजीवन से जुड़ी और अत्यंत प्रभावशाली है। कबीर स्वयं अशिक्षित माने जाते हैं, किंतु उनकी वाणी में जीवन का ऐसा गहन दर्शन है, जो बड़े-बड़े विद्वानों को भी विस्मित कर देता है। इसीलिए उन्हें ‘ज्ञान का सूरज’ कहा गया है। उनकी वाणी केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि जीने के लिए है। वह मनुष्य को भीतर तक झकझोरती है, उसके अहंकार को तोड़ती है और उसे सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।</div><div><br></div><div>कबीर के देहावसान के समय उनके पार्थिव शरीर को लेकर हिंदू और मुसलमानों में विवाद हुआ। किंवदंती है कि जब चादर हटाई गई तो वहां शरीर के स्थान पर फूल मिले। यह घटना प्रतीक है कि कबीर किसी एक धर्म, संप्रदाय या समुदाय के नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के संत थे। संत कबीर ने अपने जीवन और वाणी से यह सिद्ध किया कि मनुष्य का वास्तविक धर्म प्रेम, सत्य, करुणा और आत्मबोध है। उन्होंने समाज को नई दृष्टि, धर्म को नई दिशा और अध्यात्म को नया आयाम दिया। आज, संत कबीर जयंती के अवसर पर आवश्यकता इस बात की है कि हम केवल उनके दोहों का पाठ न करें, बल्कि उनके विचारों को अपने जीवन में उतारें। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। सचमुच, कबीर भारतीय अध्यात्म के महासूर्य हैं, जिनकी ज्ञान-किरणें युगों-युगों तक मानवता का मार्ग आलोकित करती रहेंगी।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार एवं स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 29 Jun 2026 12:25:19 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/saint-kabir-the-great-sun-of-indian-consciousness-and-an-immortal-singer</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Kabirdas Jayanti 2026: हिंदू-मुस्लिम एकता के सबसे बड़े Symbol थे संत कबीर, जानिए रोचक बातें]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/saint-kabir-biggest-symbol-of-hindu-muslim-unity-know-interesting-facts]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हर साल ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा तिथि को कबीरदास की जयंती मनाई जाती है। वह एक ऐसे संत रहे, जिनके अनुयायी सिर्फ हिंदू ही नहीं बल्कि मुस्लिम भी रहे हैं। कबीरदास जी ने धर्म के नाम पर समाज में फैली बुराइयों और अंधविश्वास के प्रति लोगों को जागरुक किया। हर साल कबीरदास जी की जयंती बेहद धूमधाम के साथ मनाई जाती है। इस बार 29 जून 2026 को कबीरदास जयंती मनाई जा रही है।</div><div><br></div><h2>कबीरदास जयंती</h2><div>हर साल ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा तिथि को कबीरदास जयंती मनाई जाती है। इस दिन 29 जून 2026 को कबीरदास जयंती मनाई जा रही है। हालांकि उनके जन्म को लेकर काफी मतभेद हैं। कुछ लोगों का मत है कि कबीरदास जी का जन्म 1398 ई. को काशी में हुआ था, तो कुछ लोगों का मानना है कि उनका जन्म 1518 में महगर में हुआ था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/chanakya-of-politics-who-became-pm-of-country-after-leaving-politics" target="_blank">PV Narasimha Rao Birth Anniversary: सियासत के वो 'चाणक्य' जो राजनीति छोड़ते-छोड़ते बन गए देश के Prime Minister</a></h3><div>उनका जीवन कई किंवदंतियों से घिरा हुआ है। कबीरदास जी का पालन-पोषण एक जुलाहा दंपति ने किया था। वह औपराचिक रूप से शिक्षित नहीं थे। लेकिन कबीरदास जी की वाणी में जो सच्चाई और गहराई थी, वह किसी विद्वान से कम नहीं थी।</div><div><br></div><h2>निर्गुण ब्रह्म के उपासक</h2><div>बता दें कि कबीरदास जी निर्मुण ब्रह्म के उपासक थे और वह एक ही ईश्वर को मानते थे। वह धर्म, अंधविश्वास और पूजा के नाम पर होने वाले आडंबरों के खिलाफ थे। उन्होंने अपने दोहों में जीवन को सुखी और सफल बनाने के सूत्र बताए हैं।</div><div><br></div><h2>अंधविश्वास के विरोधी</h2><div>एक अंधविश्वास था कि जिसकी मृत्यु काशी में होगी वह स्वर्ग जाएगा और जिसकी मृत्यु मगहर में होगी वह नर्क में जाएगा। इस अंधविश्वास को तोड़ने के लिए कबीरदास जी ने अपना जीवन काशी में गुजारा और उन्होंने महगर में अपने प्राण त्यागे थे।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 29 Jun 2026 12:03:35 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/saint-kabir-biggest-symbol-of-hindu-muslim-unity-know-interesting-facts</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[PV Narasimha Rao Birth Anniversary: सियासत के वो 'चाणक्य' जो राजनीति छोड़ते-छोड़ते बन गए देश के Prime Minister]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/chanakya-of-politics-who-became-pm-of-country-after-leaving-politics]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 28 जून को देश के 9वें प्रधानमंत्री रहे पीवी नरसिम्हा राव का जन्म हुआ था। वह एक ऐसे प्रधानमंत्री हैं, जो अचानक की प्रधानमंत्री बन गए। उन्होंने कभी खुद भी यह चाहत नहीं रखी थी कि वह देश के प्रधानमंत्री बनें। नरसिम्हा राव स्वतंत्रता सेनानी के अलावा वकील, 17 भाषाओं के ज्ञाता, विदेश नीति में दक्ष, अर्थशास्त्री और कुशल राजनेता थे। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर पीवी नरसिम्हा राव के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>आंध्र प्रदेश के करीमनगर में 28 जून 1921 को पीवी नरसिम्हा राव का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम पी रंगा राव था। पीवी नरसिम्हा राव ने हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय, मुंबई विश्वविद्यालय व नागपुर विश्वविद्यालय से शिक्षा पूरी की। वह पेशे से कृषि विशेषज्ञ और वकील रहे।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/how-did-sam-manekshaw-get-name-sam-bahadur-know-gorkha-connection" target="_blank">Sam Manekshaw Death Anniversary: Sam Manekshaw को कैसे मिला 'सैम बहादुर' नाम, जानें गोरखा कनेक्शन</a></h3><h2>सियासी सफर</h2><div>कांग्रेस से जुड़कर पीवी नरसिम्हा राव राजनीति में आए और उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण विभागों का कार्यभार संभाला। साल 1962 से लेकर 64 तक आंध्र प्रदेश तक कानून व सूचना मंत्री, फिर 1964 से 67 तक कानून व विधि मंत्री, साल 1967 में स्वास्थ्य व चिकित्सा मंत्री और 1968 से लेकर 1971 तक शिक्षामंत्री रहे।</div><div><br></div><div>वहीं साल 1971 से लेकर 1973 तक नरसिम्हा राव आंध्र प्रदेश के सीएम बने। इसके बाद वह इंदिरा गांधी और फिर राजीव गांधी के मंत्रिमंडल में विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री और गृह मंत्री रहे। साल 1991 में वह देश के पहले दक्षिण भारतीय प्रधानमंत्री बनने का गौरव प्राप्त करने वाले राजनेता बने।</div><div><br></div><h2>गांव जाने की तैयारी</h2><div>साल 1991 के चुनाव के पहले तक नरसिम्हा राव 69 साल के हो चुके थे। वहीं राजीव गांधी भी कांग्रेस के लिए युवाओं को मौका देने लगे थे। ऐसे में नरसिम्हा राव ने राजनीति से दूर जाने का फैसला किया। नरसिम्हा राव की प्रधानमंत्री बनने की कोई महत्वकांक्षा नहीं दिखाई दी।</div><div><br></div><h2>ऐसे बने प्रधानमंत्री</h2><div>साल 1991 में देश में आम चुनाव चल रहे थे। भाजपा और कांग्रेस के बीच कड़ा मुकाबला था। वहीं 21 मई को राजीव गांधी चेन्नई के पास श्रीपेराम्बदूर में एक आम सभा को संबोधित करने गए। लेकिन मंच पर पहुंचने से पहले ही एक आत्मघाती हमले में राजीव गांधी की मौत हो गई। इस घटना से देश और चुनाव दोनों की तस्वीर बदल गई। पूर्व अनुमानों में कांग्रेस पिछड़ रही थी, लेकिन इस हादसे के बाद कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। हालांकि पार्टी को बहुमत नहीं मिला, लेकिन सरकार बनाने में सफल रही।</div><div><br></div><div>वहीं इस हादसे के बाद कांग्रेस के सामने नेतृत्व का संकट खड़ा हो गया। राहुल और प्रियंका गांधी छोटे थे और पत्नी सोनिया गांधी राजनीति के लिए तैयार नहीं थी। ऐसे में वरिष्ठता के आधार पर नरसिम्हा राव के नाम पर सर्वानुमति बनी। इस तरह से वह देश के 9वें प्रधानमंत्री बने। पीएम रहते हुए उन्होंने अल्पमत के साथ पार्टी के अंदर चलने वाले गतिरोधों को भी संभाला। शरद पवार और अर्जुन सिंह जैसे नेताओं ने पार्टी छोड़ दी, लेकिन फिर भी नरसिम्हा राव ने अल्पमत सरकार के 5 साल पूरे किए।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 23 दिसंबर 2004 को पीवी नरसिम्हा राव का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Sun, 28 Jun 2026 13:59:57 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/chanakya-of-politics-who-became-pm-of-country-after-leaving-politics</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Sam Manekshaw Death Anniversary: Sam Manekshaw को कैसे मिला 'सैम बहादुर' नाम, जानें गोरखा कनेक्शन]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/how-did-sam-manekshaw-get-name-sam-bahadur-know-gorkha-connection]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ का 27 जून को निधन हो गया था। वह गोरखा रेजीमेंट के अफसर थे। मानेकशॉ आजादी से पहले सेना में शामिल हुए थे। वह ब्रिटिश रॉयस इंडियन आर्मी में फ्रंटियर रेजीमेंट में शामिल हुए थे। लेकिन देश के बंटवारे के बाद यह रेजीमेंट पाकिस्तान चला गया था और मानेकशॉ गोरखा रेजीमेंट में आ गए। यहीं पर गोरखा सैनिक उनको सैम बहादुर के नाम से पुकारने लगे थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर सैम मानेकशॉ के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>ब्रिटिश भारत के पंजाब प्रांत के अमृतसर में 03 अप्रैल 1914 को सैम मानेकशॉ का जन्म हुआ था। उनका पूरा नाम सैम होरमूजजी फ्रामजी जमशेदजी मानेकशॉ था। उनके पिता डॉ होर्मसजी मानेकशॉ था। शुरूआती पढ़ाई करने के लिए बाद उन्होंने हिंदू सभा कॉलेज से मेडिकल की पढ़ाई की। मानेकशॉ ने अपने पिता के खिलाफ जाकर जुलाई 1932 में भारतीय सैन्य अकादमी में दाखिला लिया। फिर दो साल बाद 4/12 फ्रंटियर फोर्स रेजीमेंट में भर्ती हुए।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/passion-for-aerobatics-indira-successor-and-unfulfilled-dream-of-post-of-pm" target="_blank">Sanjay Gandhi Death Anniversary: Aerobatics का शौक, इंदिरा के उत्तराधिकारी और PM पद का अधूरा सपना</a></h3><h2>साल 1971 की जीत</h2><div>जब भारत ने साल 1971 के युद्ध में सैन्य ताकत के बल पर पाकिस्तान को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था। तो आर्मी चीफ सैम मानेकशॉ इसके हीरो के रूप में उभरे थे। उन्होंने रणनीति बनाने के साथ सेना की अगुवाई की थी। सिर्फ 14 दिनों में पाकिस्तान की हार तय कर दी थी। साल 1973 में रिटायर होने के एक दिन पहले सैम मानेकशॉ को फील्ड मार्शल की उपाधि दी गई थी।</div><div><br></div><h2>बेबाक थे मानेकशॉ</h2><div>सैम मानेकशॉ ने साल 1971 में देश की तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी से कहा था कि अभी सेना युद्ध के लिए तैयार नहीं है। उन्होंने इंदिरा गांधी से आग्रह किया कि उनको कुछ महीनों का समय दिया जाए। जिसके बाद इंदिरा गांधी ने उनकी बात मान ली और दिसंबर 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध शुरू हुआ और भारत को जीत मिली।</div><div><br></div><h2>लगी थीं 7 गोलियां</h2><div>दूसरे विश्व युद्ध के दौरान बर्मा मौर्चे पर मानेकशॉ को जापानी सैनिकों के खिलाफ मशीन गन की 7 गोलियां लगी थी। यह गोलियां मानेकशॉ के जिगर, आंतों और गुर्दे पर लगी थी। लेकिन इसके बाद भी मौत उनको छू भी नहीं सकी और खुद डॉक्टर भी उनकी हालत देखकर उनके बचने की उम्मीद छोड़ चुके थे। लेकिन सैम मानेकशॉ ने मौत को भी हरा दिया था।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>शानदार मिलिट्री करियर के बाद 27 जून 2008 को सैम मानेकशॉ का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 27 Jun 2026 12:32:03 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/how-did-sam-manekshaw-get-name-sam-bahadur-know-gorkha-connection</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[RD Burman Birth Anniversary: R.D. Burman के Classic Songs आज भी दिलों पर करते हैं राज, जानें दिलचस्प किस्से]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/rd-burman-classic-songs-still-rule-hearts-learn-interesting-stories]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 27 जून को आरडी बर्मन का जन्म हुआ था। 60 के दशक में आरडी बर्मन ने म्यूजिक को कायाकल्प कर दिया था। आरडी बर्मन एक ऐसे म्यूजिक डायरेक्टर थे, जोकि गिलास के टनटन की आवाज, बारिश की बूंदों और हर चीज की आवाज से म्यूजिक बना लिया करते थे। आरडी बर्मन के गाने सुपरहिट रहे और उन्होंने आखिरी समय तक गाने बनाए। लेकिन अपनी जिंदगी के आखिरी समय में वह अकेलेपन का शिकार हो गए थे। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर आरडी बर्मन के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>कोलकाता के एक बंगाली परिवार में 27 जून 1939 को आरडी बर्मन का जन्म हुआ था। इनका पूरा नाम राहुल देव बर्मन था। इनके पिता का नाम सचिन देव बर्मन यानी की एसडी बर्मन था। वह हिंदी और बंगाली फिल्मों के दिग्गज म्यूजिक डायरेक्टर थे। वहीं आरडी बर्मन की मां मीरा देव बर्मन बंगाली फिल्मों की गीतकार थीं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/from-bollywood-to-parliament-sunil-dutt-proved-mettle-in-acting-and-politics" target="_blank">Sunil Dutt Birth Anniversary: Bollywood से Parliament तक का सफर, Sunil Dutt ने एक्टिंग और राजनीति दोनों में मनवाया था लोहा</a></h3><h2>पहली हिट फिल्म</h2><div>आरडी बर्मन को म्यूजिक का सेंस अपने पिता और मां से मिला था। उन्होंने साल 1996 में आई फिल्म 'तीसरी मंजिल' से बतौर म्यूजिक डायरेक्टर अपने करियर की शुरूआत की थी। इस फिल्म के गाने हिट रहे थे। करियर की शुरूआत में आरडी बर्मन ने बैक टू बैक फिल्मों में म्यूजिक देना शुरू किया। इसमें 'यादों की बारात', 'प्यार का मौसम', 'शोले', 'बहारों के सपने', 'जेवेल थीफ' और 'प्रेम पुजारी' जैसी फिल्में शामिल हैं।</div><div><br></div><h2>सुपरहिट गाने</h2><div>आरडी बर्मन के गाने बनाने का स्टाइल अलग था। वह हर एक चीज से म्यूजिक निकाल देते थे। 'चुरा लिया है तुमने जो दिल को' गाने की शुरूआत में जो धुन है, वह आरडी बर्मन को ड्रिंक करते हुए ख्याल आया था। आरडी बर्मन फिल्म यादों की बारात के इस गाने का म्यूजिक बनाने के बारे में सोच रहे थे और साथ में ड्रिंक भी कर रहे थे। तभी कांच के गिलासों से आवाज आई और उसी का उन्होंने धुन बना दिया था।</div><div><br></div><div>आरडी बर्मन ने ऐसे न जाने कई म्यूजिक बनाई, जिसमें लोगों की आवाजों से, बारिश की बूंदों से और भी कई चीजों से म्यूजिक बनाया जो हिट रहा। उन्होंने अपने करियर में 331 से अधिक फिल्मों में म्यूजिक दिया और सभी सुपरहिट रहे।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>अपने आखिरी समय में आरडी बर्मन बीमार रहने लगे थे। उन्होंने म्यूजिक बनाना बंद कर दिया था। साल 1994 में आई फिल्म '1942: अ लव स्टोरी' में आरडी बर्मन के म्यूजिक में बनी उनकी लास्ट फिल्म थी। इसके लिए आरडी बर्मन को फिल्म के मेकर्स ने काफी मनाया था। वहीं 04 जनवरी 1994 को आरडी बर्मन ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 27 Jun 2026 11:53:31 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/rd-burman-classic-songs-still-rule-hearts-learn-interesting-stories</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Bankim Chandra Chatterjee Birth Anniversary: Vande Mataram के रचयिता Bankim Chandra Chatterjee, जिनकी कलम ने फूंकी थी क्रांति की मशाल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/bankim-chandra-chatterjee-author-of-vande-mataram-whose-pen-lit-torch-revolution]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 26 जून को वन्दे मातरम् गीत के रचयिता बंकिम चंद्र चटर्जी का जन्म हुआ था। वह एक प्रख्यात कवि, उपन्यासकार, गद्यकार और पत्रकार के रूप में जाने जाते हैं। उनको भारत का एलेक्जेंडर ड्यूमा भी कहा जाता है। बंगला साहित्य को जनमानस तक पहुंचाने वाले वह पहले साहित्यकार माने जाते हैं। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर बंकिम चंद्र चटर्जी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>पश्चिम बंगाल के 24 परगना जिले के कांठलपाड़ा गांव में 26 जून 1838 को बंकिम चंद्र चटर्जी का जन्म हुआ था। उनका महज 11 साल की उम्र में विवाह हो गया था। लेकिन कुछ समय बाद ही उनकी पत्नी का निधन हो गया था। जिसके बाद उन्होंने दूसरा विवाह किया था।</div><div><br></div><h2>रचनाएं</h2><div>बंकिम चंद्र चटर्जी ने अपना पहला उपन्यास 'रायमोहन्स वाइफ' लिखा था। जोकि अंग्रेजी में था। फिर साल 1865 में उनकी पहली बांग्ला कृति दुर्गेशनंदिनी प्रकाशित हुई थी। इसके साथ ही उन्होंने 'विषवृक्ष', 'मृणालिनी', 'सीताराम', 'राजसिंह', 'कपालकुंडला', 'विज्ञान रहस्य', 'कृष्ण कांतेर विल', 'रजनी', 'कमला कांतेर दप्तर', 'लोकरहस्य', 'देवी चौधुरानी आईं' और 'धर्मतत्व' जैसी कई रचनाएं लिखीं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/resignation-nehru-cabinet-opposition-to-article-370-untold-story-of-dr-mukherjee" target="_blank">Shyama Prasad Mukherjee Death Anniversary: Nehru Cabinet से इस्तीफा, Article 370 का विरोध, Dr. Mukherjee की अनकही कहानी</a></h3><h2>आंदोलन में ऐसे लिया भाग</h2><div>सरकारी नौकरी के कारण बंकिम चंद्र चटर्जी किसी सार्वजनिक आंदोलन में हिस्सा नहीं ले पाते थे। जिसका उनको काफी मलाल रहता था। बाद में उन्होंने साहित्य के जरिए स्वतंत्रता आंदोलन के लिए जागृति का संकल्प लेकर इस पर काम करना शुरूकर दिया।</div><div><br></div><h2>वंदे मातरम् गीत</h2><div>बंकिमचंद्र चटर्जी ने अपने उपन्यास आनंदमठ में राष्ट्रीय गीत वन्देमातरम् की रचना की थी। साल 1882 में यह उपन्यास प्रकाशित हुआ था। आनंदमठ में ईस्ट इंडिया कंपनी से वेतन के लिए लड़ने वाले भारतीय मुसलमानों और संन्यासी ब्राह्मण सेना का वर्णन किया गया। वंदे मातरम् इतना लोकप्रिय गीत था कि खुद गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने इसका संगीत तैयार किया था। दुनिया की कई भाषाओं में बंकिमचंद्र चटर्जी की रचनाओं के अनुवाद हुए। वहीं उनकी रचनाओं पर फिल्में भी बनी हैं।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 08 अप्रैल 1894 को बंकिम चंद्र चटर्जी का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 26 Jun 2026 13:35:35 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/bankim-chandra-chatterjee-author-of-vande-mataram-whose-pen-lit-torch-revolution</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Michael Jackson Death Anniversary: 150 साल जीने का था सपना, 12 Doctors की फौज भी नहीं बचा सकी 'King of Pop' की जान]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/king-of-pop-dream-to-live-150-years-even-an-army-of-doctors-not-save-his-life]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>किंग ऑफ पॉप के नाम से फेमस माइकल जैक्सन का 25 जून को निधन हो गया था। माइकल जैक्सन ने न सिर्फ अपने गानों से तहलका मचाया, बल्कि अपने डांस मूव्स से पूरी दुनिया को थिरकने पर मजबूर कर दिया। आज भी हर कोई माइकल जैक्सन के मून वॉक स्टेप्स को फॉलो करता है। वहीं माइकल जैक्सन 150 साल जीना चाहते थे। लेकिन वह अपनी जिंदगी के 51 बसंत भी नहीं देख सके। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर माइकल जैक्सन के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>अमेरिका के इंडियाना प्रांत में 29 अगस्त 1958 को माइकल जैक्सन का जन्म हुआ था। उनको बचपन से ही संगीत से लगाव था। इसी वजह से माइकल जैक्सन ने अपने करियर की शुरूआत भाई के पॉप ग्रुप से कर दी थी। उन्होंने बेहद कम उम्र से ही टैम्बोरिन और बौंगा बजाने लगे थे। फिर वह अपने भाई के म्यूजिकल ग्रुप से जुड़ गए और शोहरत की बुलंदी हासिल करने के लिए वह धीरे-धीरे अपने कदम बढ़ाने लगे।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/passion-for-aerobatics-indira-successor-and-unfulfilled-dream-of-post-of-pm" target="_blank">Sanjay Gandhi Death Anniversary: Aerobatics का शौक, इंदिरा के उत्तराधिकारी और PM पद का अधूरा सपना</a></h3><h2>निजी जिंदगी में रहा संघर्ष</h2><div>माइकल जैक्सन को म्यूजिक इंडस्ट्री में पहचान बनाने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा था। साल 1971 में माइकल जैक्सन ने बतौर सिंगर अपने करियर की शुरूआत की थी। जिसके बाद वह कामयाबी के सफर पर चल निकले। हालांकि उनकी निजी जिंदगी काफी उतार-चढ़ाव भरी रही थी। साल 1994 में उन्होंने लिसा मेरी प्रिसले से शादी की थी। लेकिन यह रिश्ता अधिक दिनों तक नहीं चल सका। फिर उन्होंने अपनी नर्स डेबी रोव से शादी की थी। लेकिन यह शादी भी लंबी नहीं चली और उनकी शादी दो साल बाद टूट गई।</div><div><br></div><h2>अधूरी रह गई यह ख्वाहिश</h2><div>माइकल जैक्सन 150 साल जीना चाहते थे। यही कारण रहा कि 12 डॉक्टरों की टीम हर समय उनके घर में रहती थी। वह हमेशा ऑक्सीजन बेड पर सोते थे। वहीं लोगों से हाथ मिलाने से पहले माइकल दस्ताने पहन लेते थे। लेकिन इतनी कवायद और डॉक्टरों की टीम रखने के बाद भी 25 जून 2009 को माइकल जैक्सन ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 25 Jun 2026 13:27:37 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/king-of-pop-dream-to-live-150-years-even-an-army-of-doctors-not-save-his-life</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Shyama Prasad Mukherjee Death Anniversary: Nehru Cabinet से इस्तीफा, Article 370 का विरोध, Dr. Mukherjee की अनकही कहानी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/resignation-nehru-cabinet-opposition-to-article-370-untold-story-of-dr-mukherjee]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 23 जून को रहस्यमयी तरीके से मृत्यु हो गई थी। श्याम प्रसाद मुखर्जी जनसंघ के संस्थापक थे। वह देश की आजादी के बाद पहली नेहरू सरकार में केंद्रीय मंत्री थे। बाद में आर्टिकल 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को स्वायत्ता देने को लेकर मुखर्जी और नेहरू में मतभेद हो गए और वह सरकार से अलग हो गए। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>पश्चिम बंगाल के कोलकात में 12 जून 1901 को श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम आशुतोष मुखर्जी थे, जोकि राज्य में शिक्षाविद् थे। महज 33 साल की उम्र में मुखर्जी कोलकाता यूनिवर्सिटी के कुलपति बन गए थे। जहां से वह कोलकाता विधानसभा पहुंचे और यहीं से उनका राजनीतिक सफर शुरू हुआ था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/passion-for-aerobatics-indira-successor-and-unfulfilled-dream-of-post-of-pm" target="_blank">Sanjay Gandhi Death Anniversary: Aerobatics का शौक, इंदिरा के उत्तराधिकारी और PM पद का अधूरा सपना</a></h3><h2>अखंड भारत का सपना</h2><div>बता दें कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी आर्टिकल 370 का विरोध करते रहे। वह चाहते थे कश्मीर भी अन्य राज्यों की तरह देश के अखंड हिस्से में देखा जाए। वहां भी एक समान कानून रहे। यही वजह है कि जब नेहरू ने उनको अंतरिम सरकार में मंत्री का पद दिया, तो मुखर्जी ने कुछ समय बाद ही इस्तीफा दे दिया। कश्मीर मामले को लेकर श्यामा प्रसाद ने नेहरू पर तुष्टिकरण का आरोप लगाया। उन्होंने कहा था कि एक देश में दो निशान, दो विधान और दो प्रधान नहीं चलेंगे।</div><div><br></div><h2>कश्मीर जाने पर गिरफ्तारी</h2><div>इस्तीफा देने के बाद श्यामा प्रसाद मुखर्जी कश्मीर के लिए निकल पड़े। वह चाहते थे कि देश के इस हिस्से में जाने के लिए किसी की इजाजत लेने की जरूरत न हो। नेहरू की नीतियों के विरोध के कारण वह कश्मीर पहुंचकर अपनी बात कहना चाहते थे। लेकिन 11 मई 1953 को उनको श्रीनगर में गिरफ्तार कर लिया गया। तब वहां पर शेख अब्दुल्ला की सरकार थी। दो सहयोगियों समेत गिरफ्तार श्यामा प्रसाद मुखर्जी को पहले श्रीनगर की सेंट्रल जेल में रखा गया और फिर शहर के बाद एक कॉटेज में ट्रांसफर कर दिया गया।</div><div><br></div><h2>बिगड़ती गई सेहत</h2><div>एक महीने से अधिक कैद में रखे गए श्यामा प्रसाद मुखर्जी की सेहत लगातार बिगड़ती चली जा रही थी। उनको बुखार और पीठ में दर्द की लगातार शिकायत थी। वहीं 19-20 जून की रात उनमें प्लूराइटिस पाया गया। जोकि उनका साल 1937 और 1944 में भी हो चुका था। जिसके बाद उनको स्ट्रेप्टोमाइसिन का इंजेक्शन दिया था। लेकिन श्यामा प्रसाद मुखर्जी के डॉक्टर का कहना था कि यह दवा उनके शरीर को सूट नहीं करती थी, जिसके बाद भी उनको यह इंजेक्शन दिया गया।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 22 जून को उनको सांस लेने में तकलीफ महसूस हुई। हॉस्पिटल में शिफ्ट करने पर हार्ट अटैक होना पाया गया। वहीं 23 जून 1953 को दिल का दौरा पड़ने से श्यामा प्रसाद मुखर्जी का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 23 Jun 2026 14:09:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/resignation-nehru-cabinet-opposition-to-article-370-untold-story-of-dr-mukherjee</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Sanjay Gandhi Death Anniversary: Aerobatics का शौक, इंदिरा के उत्तराधिकारी और PM पद का अधूरा सपना]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/passion-for-aerobatics-indira-successor-and-unfulfilled-dream-of-post-of-pm]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 23 जून को भारत के इतिहास की एक ऐसी घटना घटी थी, जिसके देश की सियासत के सारे समीकरण बदल डाले थे। 23 जून 1980 को देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के छोटे पुत्र संजय गांधी की विमान दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। संजय गांधी को पूर्व पीएम इंदिरा गांधी के राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में देखा जाता था। लेकिन उनकी मृत्यु से देश में राजनीतिक हवा बदल गई थी। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर संजय गांधी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>नई दिल्ली में 14 दिसंबर 1946 को संजय गांधी का जन्म हुआ था। उनकी मां का नाम इंदिरा गांधी और पिता का नाम फिरोज गांधी था। संजय भारत के पूर्व पीएम राजीव गांधी के छोटे भाई थे। स्कूली शिक्षा पूरी होने के बाद संजय ने ऑटोमोटिव इंजीनियरिंग को अपना करियर चुना। इंग्लैंड को क्रू में रॉल्स रॉयस में 3 साल की एप्रेंटिसशिप की थी। संजय गांधी को स्पोर्ट्स कारों में अच्छी-खासी रुचि थी। साल 1976 में संजय ने पायलट का लाइसेंस ले लिया था और हवाई जहाज की कलाबाजियों का भी काफी शौक था। इसमें संजय गांधी ने कई ईनाम भी जीते थे।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/not-just-shivaji-mother-jijabai-real-architect-of-maratha-empire" target="_blank">Jijabai Death Anniversary: सिर्फ Shivaji की मां नहीं, Maratha Empire की 'असली वास्तुकार' थीं जीजाबाई</a></h3><h2>देश वापस आए</h2><div>साल 1966 में जब तत्कालीन पीएम लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु हो गई, तो इंदिरा गांधी देश की पीएम बनीं। ऐसे में संजय गांधी को अपनी इंटर्नशिप छोड़कर देश वापस आ गए। इस दौरान इंदिरा ने भी कांग्रेस पार्टी में अपनी पकड़ मजबूत करने का काम शुरूकर दिया। वहीं 1970 तक पार्टी पर एक तरह से इंदिरा गांधी का नियंत्रण हो गया था।</div><div><br></div><h2>मैनेजिंग डायरेक्टर</h2><div>साल 1971 में इंदिरा गांधी सरकार ने देश के मीडियम वर्ग के लोगों को कार बनाने के लिए मारुति उद्योग लिमिटेड नाम की कंपनी बनाकर संजय गांधी को इसका मैनेजिंग डायरेक्टर बनाया। संजय को कार उत्पादन का कॉन्ट्रैक्स और उत्पादन का लाइसेंस भी दिया था। इससे पहले कुछ हो पाता कि बांग्लादेश की आजादी के लिए भारत पाकिस्तान से युद्ध में उलझ गया।</div><div><br></div><h2>राजनीतिक सक्रियता</h2><div>आपातकाल के दौरान संजय गांधी राजनीतिक तौर पर सक्रिय हुए थे। वह इंदिरा के सलाहकार के रूप में जाने गए। माना जाता था कि लगभग हर मामले में संजय गांधी का सीधा दखल हुआ करता था। वह अक्सर विभागों और मंत्रालयों को सीधे आदेश देते थे। वहीं संजय गांधी को आपातकाल की कई सख्तियों के लिए अकेला जिम्मेदार माना जाता है।</div><div><br></div><div>जब आपातकाल खत्म हुआ तो साल 1977 में देश में विपक्ष की सरकार बनी। वहीं आपातकाल के आरोपों की वजह से इंदिरा को गिरफ्तार कर लिया गया। लेकिन इससे इंदिरा गांधी के प्रति सहानुभूति पैदा हुई और सियासी हलचल कुछ ऐसी हुई कि साल 1980 में आम चुनाव कराने की नौबत आ गई। वहीं संजय गांधी ने सभी को चौंकाते हुए पार्टी में ऐसी जान फूंकी कि साल 1980 में उनकी रणनीति की वजह से इंदिरा गांधी ने प्रचंड जीत हासिल की और सरकार बनाई। इसके बाद संजय को कांग्रेस का महासचिव बना दिया गया।</div><div><br></div><h2>मौत</h2><div>वहीं 23 जून 2980 को नई दिल्ली के सफदरजंग विमानतल के पास संजय दिल्ली फ्लाइंग क्लब के नए विमान को उड़ा रहे थे। इस दौरान संजय गांधी ने एरोबैटिक कलाबाजी की कोशिश की और विमान कंट्रोल से बाहर होकर क्रैश हो गया। इस हादसे में संजय गांधी की मौके पर मृत्यु हो गई।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 23 Jun 2026 14:05:40 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/passion-for-aerobatics-indira-successor-and-unfulfilled-dream-of-post-of-pm</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Jijabai Death Anniversary: सिर्फ Shivaji की मां नहीं, Maratha Empire की 'असली वास्तुकार' थीं जीजाबाई]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/not-just-shivaji-mother-jijabai-real-architect-of-maratha-empire]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>स्वराज्य की जननी कही जाने वाली जीजाबाई का 17 जून को निधन हो गया था। जीजाबाई सिर्फ शिवाजी महाराज की मां नहीं बल्कि एक कुशल योद्धा, प्रशासक और राष्ट्र निर्मात्री थीं। उन्होंने अपने त्याग, वीरता और दूरदृष्टि से न सिर्फ मराठा साम्राज्य की नींव रखी, बल्कि पूरे भारत को मुगल आधिपत्य के खिलाफ संघर्ष का संदेश दिया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर जीजाबाई के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>महाराष्ट्र में 12 जनवरी 1598 को जीजाबाई का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम लखुजीराव जाधव एक प्रतिष्ठित मराठा सरदार थे। जोकि देवगिरि के यादव वंश से संबंधित थे। जीजाबाई की मां का नाम मालासाबाई था। बचपन से ही जीजाबाई में स्वाभिमान, वीरता और धर्मनिष्ठा के संस्कार थे। उस दौर में बाल विवाह प्रचलित था, इसलिए कम उम्र में ही जीजाबाई का विवाह शाहजी भोंसले के साथ हुआ। शाहजी विजापुर के आदिलशाह सुल्तानों के अधीन एक सेनापति थे।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/rss-guruji-during-whose-time-ban-imposed-also-connection-with-indira-gandhi" target="_blank">Madhav Sadashiv Golwalkar Death Anniversary: RSS के वो 'गुरुजी' जिनके दौर में लगा था बैन, Indira Gandhi से भी था कनेक्शन</a></h3><h2>जीजाबाई ने दी शिवाजी को शिक्षा</h2><div>जीजाबाई ने 8 संतानों को जन्म दिया, जिनमें शिवाजी समेत दो पुत्र जीवित रहे। पिता अक्सर राजकीय कार्यों और युद्धों में व्यस्त रहते थे। ऐसे में शिवाजी का पालन-पोषण जीजाबाई ने किया था। जीजाबाई उनको महाभारत, रामायण और भगवद्गीता की शिक्षा देती और संस्कृति, हिंदू धर्म और स्वतंत्रता के महत्व के बारे में समझाती। जीजाबाई ने शिवाजी को सिखाया था कि मराठा कैसे अपनी मातृभूमि की रक्षा करते थे। वह स्वयं भी तलवारबाजी और घुड़सवारी में निपुण थीं। जीजाबाई न सिर्फ घर संभालती थीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में भी अपना साहस दिखाती थीं।</div><div><br></div><div>जब शिवाजी छोटे थे, तो जीजाबाई उनको पहाड़ी किलों की यात्रा कराती थीं और स्वराज्य की कल्पना से परिचित कराती थीं। उन्होंने शिवाजी के अंदर मुगलों और सल्तनतों के खिलाफ विद्रोह की भावना जगाई थी। साल 1964 में शाहजी के निधन के बाद जीजाबाई ने शिवाजी को मजबूती थी। जीजाबाई उनकी प्रेरक, राजनीतिक सलाहकार और संरक्षक की भूमिका में रहीं। शिवाजी की हर विजय में जीजाबाई की अमिट छाप थी।</div><div><br></div><h2>शिवाजी का राज्याभिषेक</h2><div>साल 1674 में शिवाजी का राज्याभिषेक हुआ। उस दौरान रायगढ़ के सोने के सिंहासन पर शिवाजी को बैठा देखकर जीजाबाई गर्व से भर गईं। क्योंकि जीजाबाई आजीवन हिंदवी स्वराज्य का सपना देखती थीं, जोकि साकार हो चुका था।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>हालांकि शिवाजी के राज्याभिषेक के कुछ दिनों बाद ही जीजाबाई का 17 जून को निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 17 Jun 2026 11:39:44 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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