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    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
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      <title><![CDATA[जसपाल राणा– अभी तो बहुत काम बाकी था]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/jaspal-rana-there-was-still-a-lot-of-work-left-to-be-done]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारतीय निशानेबाजी के महारथी और कोच जसपाल राणा के असामयिक निधन से सभी ओर शोक व्याप्त है। मात्र 49 वर्ष में चले जाना निश्चय ही ह्रदय विदारक है। देश के लिए अपूरणीय क्षति है। जसपाल निशानेबाजी के ऐसे पुरोधा थे जिन्होंने कॉमनवेल्थ खेलों में 15 पदक जीतकर भारत का मान बढ़ाया, स्वयं एशियाई खेलों और ओलपिंक में देश का प्रतिनिधित्व करने के बाद नई पीढ़ी को तैयार करने में जुट गए। इस समय वे युवा निशानेबाज मनु भाकर के गुरु थे। जसपाल राणा को अर्जुन पुरस्कार, पद्मश्री और द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। वह भारतीय खेल इतिहास के सबसे चमकदार व होनहार निशानेबाज थे। उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में जन्मे जसपाल राणा को उनके पिता नारायण सिंह राणा ने बीएसएफ अधिकारी द्वारा प्रशिक्षित करवाया था। 12 वर्षीय राणा ने अहमदाबाद में 31वीं राष्ट्रीय शूटिंग चैंपियनशिप से&nbsp; राष्ट्रीय निशानेबाजी में पदार्पण किया था। तब किसी ने यह नहीं सोचा था कि एक दिन यह छोटा बालक इतना करिश्माई निकलेगा।</div><div>&nbsp;</div><div>जसपाल ने आरम्भ में पिस्टल और राइफल दोनों से अभ्यास किया किंतु बाद में फेडरेशन ने एक इवेंट के लिए एक ही शूटर को चुनने का नियम लागू किया जिसके बाद उन्होंने पिस्टल शूटिंग को चुना। जसपाल 12 वर्ष की आयु तक आते आते राज्य और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में भाग लेने लगे थे। उन्होंने 1988 में 12 वर्ष की अवस्था में ही 31वीं नेशनल शूटिंग चैंपियनशिप में रजत पदक जीत लिया था। जसपाल राणा ने कॉमनवेल्थ खेलों और एशियाई खेलों को मिलाकर कुल 23 पदक अपने नाम किए थे। जसपाल ने एशियाई खेलों में चार स्वर्ण पदक, दो रजत और दो कांस्य पदक जीते वहीं राष्ट्रमंडल खेलों में नौ स्वर्ण, चार रजत व दो कांस्य पदक जीतकर इतिहास रच दिया। एशियाई चैंपियनशिप में एक स्वर्ण और एक कांस्य पदक जीता जबकि विश्व जूनियर चैंपियनशिप में एक स्वर्ण पदक अपने नाम किया।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/from-bollywood-to-parliament-sunil-dutt-proved-mettle-in-acting-and-politics" target="_blank">Sunil Dutt Birth Anniversary: Bollywood से Parliament तक का सफर, Sunil Dutt ने एक्टिंग और राजनीति दोनों में मनवाया था लोहा</a></h3><div>जसपाल ने कई अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में अद्भुत व शानदार प्रदर्शन कर भारत का मस्तक गर्व से ऊंचा किया। 1994 मिलान विश्व शूटिंग चैंपियनशिप में उनकी जीत यादगार रही। उन्होंने यह जीत दर्द से कराहते हुए प्राप्त की थी। प्रतियोगिता से एक दिन पहले उन्हें घुटने में फोड़ा हो गया था और डॉक्टरो ने उन्हें सर्जरी की सलाह देकर अस्पताल से छुट्टी देने से मनाकर दिया था किंतु उन्होंने राष्ट्रप्रथम की भावना को ध्यान में रखा और डॉक्टरों की सलाह को दरकिनार करते हुए प्रतियोगिता मे भाग लेने का निश्चय किया किंतु अस्पताल से निकलने के बाद उसी रात फोड़ा फूट गया और उनका दर्द बढ़ गया। वे अपनी जींस तक नहीं उतार पा रहे थे। ऐसे में उन्होंने जीन्स को फाड़कर ही हाफ पैंट बनाई और उसे पहनकर ही अगली सुबह प्रतियोगिता में उतरे। राणा ने असहनीय दर्द में मैच खेला और जूनियर कैटेगरी में विश्व रिकार्ड के साथ अपना पहला अंतरराष्ट्रीय स्वर्ण पदक जीता। इसी वर्ष उन्होंने हिरोशिमा एशियाई खेलों में भी स्वर्ण पदक जीता था। 1994 में हिरोशिमा एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतने के बाद जसपाल को इसी वर्ष मात्र 18 वर्ष की अवस्था में अर्जुन पुरस्कार मिला।</div><div><br></div><div>जसपाल राणा का जीवन खेल व राष्ट्र के प्रति समर्पित रहा। वह हर बार रेंज पर उतरते समय देश का गौरव अपने साथ लेकर चलते थे। एक खिलाड़ी के रूप में तो उनका कैरियर शानदार रहा। दूसरी पारी में वह एक अच्छे प्रशिक्षक बने। उनके मार्गदर्शन में मनु भाकर ने पेरिस ओलंपिक में दो पदक जीते। उन्होंने सौरभ चौधरी, अनीश भानवाला और चिंकी यादव सहित कई अन्य निशानेबाज़ो के कैरियर को संवारने में अहम भूमिका निभाई ।</div><div>&nbsp;</div><div>जसपाल राणा की उपलब्धियों ने देश को ख़ुशी से झुमने का अवसर दिया। अगली पीढ़ी को गढ़ा। उनकी लोकप्रियता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि उत्तराखंड के लोकप्रिय गीतकार नरेंद्र सिंह नेगी ने जसपाल के नाम से वर्ष 1999 में एक गीत बनाया था। मात्र 49 वर्ष की अवस्था में जसपाल का जाना एक शून्य उत्पन्न कर गया है। अभी तो बहुत कुछ करना था जसपाल.....इतनी जल्दी क्यों की जाने की ?</div><div><br></div><div>- मृत्युंजय दीक्षित&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 13 Jun 2026 13:28:48 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/jaspal-rana-there-was-still-a-lot-of-work-left-to-be-done</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Sunil Dutt Birth Anniversary: Bollywood से Parliament तक का सफर, Sunil Dutt ने एक्टिंग और राजनीति दोनों में मनवाया था लोहा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/from-bollywood-to-parliament-sunil-dutt-proved-mettle-in-acting-and-politics]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 06 जून को बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता सुनील दत्त का जन्म हुआ था। 50 और 60 के दशक में अभिनेता बॉलीवुड के सुपरस्टार थे। अभिनेता ने साधना, इंसान जाग उठा, मदर इंडिया, सुजाता, मुझे जीने दो, पड़ोसन जैसी कई हिट फिल्में दी हैं। सुनील दत्त एक्टिंग के साथ-साथ राजनीति में भी कामयाब रहे। सुनील दत्त ने करीब 50 फिल्मों में काम किया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर अभिनेता सुनील दत्त के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>पंजाब में 06 जून 1929 को सुनील दत्त का जन्म हुआ था। जब वह 5 साल के थे, तो उनके पिता का निधन हो गया था। पिता की मृत्यु के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति काफी खराब हो गई थी। ऐसे में सुनील दत्त को कम उम्र से जिम्मेदारियों का सामना करना पड़ा। ऐसे में बेहतर भविष्य की तलाश में उनका परिवार मुंबई आ गया। जहां पर पढ़ाई के साथ-साथ उन्होंने कई छोटे-मोटे काम किए थे। परिवार की आर्थिक मदद के लिए सुनील दत्त ने कंडक्टर की नौकरी भी की थी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/why-she-called-lady-in-white-learn-unheard-stories-about-nargis-dutt" target="_blank">Nargis Birth Anniversary: क्यों कहलाती थीं 'Lady in White'? जानिए नरगिस दत्त की अनसुनी बातें</a></h3><h2>रेडियो जॉकी की नौकरी</h2><div>कॉलेज के दिनों में सुनील दत्त सांस्कृतिक कार्यक्रमों और थिएटर में हिस्सा लिया करते थे। सुनील दत्त की प्रतिभाशाली आवाज लोगों का ध्यान आकर्षित करती थीं। एक कार्यक्रम के दौरान रेडियो के अधिकारियों ने सुनील की आवाज सुनी और उनको रेडियो जॉकी की नौकरी का प्रस्ताव दिया। इस दौरान उनको मात्र 25 रुपए महीने सैलरी मिलती थी। यह नौकरी सुनील दत्त के जीवन का अहम मोड़ साबित हुई।</div><div><br></div><div>इस दौरान रेडियो में काम करते हुए सुनील दत्त ने कई फिल्मी सितारों के इंटरव्यू लिए और उनका मनोरंजन जगत से जुड़ाव बढ़ता गया। इस दौरान सुनील दत्त की मुलाकात अभिनेत्री नरगिस से हुई, जोकि बाद में उनकी जीवनसंगिनी बनीं।</div><div><br></div><h2>फिल्मी सफर</h2><div>रेडियो में काम करने के दौरान सुनील दत्त की मुलाकात कई फिल्म निर्माताओं और कलाकारों से हुई थी। एक इंटरव्यू के दौरान निर्देशक रमेश सहगल सुनील दत्त की प्रतिभा और व्यक्तित्व से काफी प्रभावित हुए। रमेश सहगल ने सुनील दत्त को फिल्मों में आने की सलाह दी। साल 1955 में फिल्म 'रेलवे प्लेटफॉर्म' से सुनील दत्त ने बॉलीवुड में कदम रखा। लेकिन अभिनेता को असली पहचान फिल्म 'मदर इंडिया' से मिली। जिससे वह रातों-रात स्टार बन गए।</div><div><br></div><h2>फिल्मों और राजनीति में बनाई पहचान</h2><div>वहीं निर्देशक रमेश सहगल ने बलराज दत्त का नाम बदलकर सुनील दत्त रख दिया। क्योंकि उस समय अभिनेता बलराज साहनी पहसे से फेमस थे। बाद में सुनील दत्त भारतीय सिनेमा का बड़ा ब्रांड बन गया। करीब 48 वर्षों के फिल्मी करियर में अभिनेता सुनील दत्त ने कई यादगार फिल्मों में काम किया। इस दौरान उन्होंने अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कार हासिल किए। फिल्मों के अलावा सुनील दत्त ने राजनीति में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया और वह कई बार सांसद चुने गए।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 25 मई 2005 को अभिनेता सुनील दत्त ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 06 Jun 2026 15:46:26 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/from-bollywood-to-parliament-sunil-dutt-proved-mettle-in-acting-and-politics</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Madhav Sadashiv Golwalkar Death Anniversary: RSS के वो 'गुरुजी' जिनके दौर में लगा था बैन, Indira Gandhi से भी था कनेक्शन]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/rss-guruji-during-whose-time-ban-imposed-also-connection-with-indira-gandhi]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक रहे माधव सदाशिव राव गोलवलकर का 05 जून को निधन हो गया था। सरसंघचालक के रूप में गुरुजी के नेतृत्व के 33 साल काफी चुनौतीपूर्ण लेकिन उपलब्धियों से भरे रहे। माधवराव सदाशिव राव गोलवलकर के कार्यकाल में महात्मा गांधी हत्याकांड के बाद संघ ने पहले प्रतिबंध का सफलतापूर्वक सामना किया। इस दौरान उन्होंने न सिर्फ संघ को संगठित रखा बल्कि संघ का व्यापक विस्तार भी किया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर माधवराव सदाशिव गोलवलकर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>बता दें कि 19 फरवरी 1906 को माधवराव सदाशिव राव गोलवरकर का जन्म हुआ था। उन्होंने अपनी शुरूआती शिक्षा पूरी करने के बाद साल 1929 में बीएचयू से प्राणिशास्त्र में एम.एस.सी पास किया। वह विश्वविद्यालय से ही संघ के संपर्क में आए और साल 1933 में उनकी नागपुर वापसी हुई। यहां पर उनका संघ संस्थापक डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार से संपर्क बढ़ा। गोलवरकर ने कानून की पढ़ाई भी की थी।</div><div><br></div><h2>सरसंघचालक का पद</h2><div>साल 1936 में आध्यात्म की खोज के लिए गोलवरकर बंगाल के सरगाची के लिए रवाना हुए। यहां पर उन्होंने रामकृष्ण मठ के स्वामी अखंडानंद की सेवा में दो साल बिताए। फिर वापसी पर हेडगेवार ने उनको अपना जीवन संघ को समर्पित करने के लिए राजी कर लिया। साल 1940 में जब RSS प्रमुख का निधन हुआ, तो 34 साल की उम्र में गोलवलकर ने सरसंघचालक का पदभार संभाला।</div><div><br></div><h2>RSS पर प्रतिबंध</h2><div>साल 1947 में भारत विभाजन के दौर से गुजर रहा था। इस दौरान गांधी ने गोलवलकर से मुलाकात की और बताया कि इन दंगों में आरएसएस के शामिल होने की बात सुन रहे हैं। हालांकि गोलवलकर ने गांधी को आश्वस्त किया कि मुसलमानों की हत्या के पीछे RSS नहीं है। संघ सिर्फ हिंदुस्तान की रक्षा चाहता था। वहीं गांधी की हत्या नाथूराम गोडसे ने की। जोकि कट्टरपंथी हिंदू राष्ट्रवादी था। नाथूराम RSS के सदस्य थे। संघ का कहना था कि नाथूराम ने हत्या करने से पहले संघ की सदस्यता छोड़ दी थी।</div><div><br></div><div>लेकिन इस घटना के बाद गोलवलकर और आरएसएस के सदस्यों को फरवरी 1948 में गिरफ्तार कर लिया गया था। वहीं तत्कालीन गृहमंत्री पटेल ने RSS पर प्रतिबंध लगा दिया। फिर 09 दिसंबर 1948 में गोलवलकर ने दिल्ली में शुरू किए गए सत्याग्रह के साथ आरएसएस पर प्रतिबंध को चुनौती देने का फैसला किया। वहीं जुलाई 1949 में RSS के भारतीय संविधान के प्रति निष्ठा की प्रतिज्ञा लेने के बाद ही इस पर लगा प्रतिबंध हटा।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>साल 1972-73 में गोलवलकर ने आखिरी बार देश भर में एक दौरा किया था। यह दौरा बांग्लादेश लिबरेशन वॉर में पाकिस्तान पर भारत की जीत के ठीक बाद था। इसके लिए गोलवलकर तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी को बधाई दी थी। वहीं मार्च 1973 में गोलवलकर आखिरी बार नागपुर लौटे। वहीं 05 जून 1973 में माधवराव सदाशिव राव गोलवरकर का निधन हो गया।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 05 Jun 2026 15:04:56 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/rss-guruji-during-whose-time-ban-imposed-also-connection-with-indira-gandhi</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Nutan Birth Anniversary: Miss India का ताज, 70 से ज्यादा फिल्में, जानें Legend Nutan का बेमिसाल Bollywood Career]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/miss-india-crown-over-70-films-know-legend-nutan-incredible-bollywood-career]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 04 जून को बॉलीवुड की दिग्गज अभिनेत्री नूतन का जन्म हुआ था। फिल्मी परिवार से ताल्लुक रखने वाली नूतन हिंदी सिनेमा की बेहतरीन अदाकाराओं में से एक थीं। उन्होंने अपने करीब 4 दशक के लंबे करियर में 70 से ज्यादा फिल्मों में काम किया था। उन्होंने महज 14 साल की उम्र में बॉलीवुड में कदम रखा था और 16 साल की उम्र में मिस इंडिया का खिताब अपने नाम किया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर अभिनेत्री नूतन के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>मुंबई में 04 जून 1936 को नूतन का जन्म हुआ था। बचपन से ही नूतन को फिल्मी माहौल मिला था। उनके पिता डायरेक्टर और कवि कुमारसेन समर्थ थे और उनकी मां का नाम शोभना समर्थ था। नूतन की मां शोभना दिग्गज कलाकार थीं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/created-world-record-by-singing-21-songs-in-day-know-story-of-legendary-singer" target="_blank">S P Balasubrahmanyam Birth Anniversary: एक दिन में 21 गाने गाकर बनाया था World Record, जानें लेजेंड सिंगर की कहानी</a></h3><h2>फिल्मी सफर</h2><div>नूतन जब 14 साल की थीं, तभी उन्होंने अपने फिल्मी सफर की शुरूआत कर दी थी। वहीं साल 1950 में आई फिल्म 'बेटी' से नूतन ने बॉलीवुड में कदम रखा था। इस फिल्म का प्रोडक्शन उनकी मां शोभना ने किया था। जब नूतन 16 साल की थीं, तो उन्होंने मिस इंडिया का खिताब अपने नाम किया। नूतन के करियर में फिल्म 'सीमा' सबसे बड़ा माइलस्टोन साबित हुआ। इस फिल्म में नूतन के साथ बलराज साहनी और शोभा खोटे थे।</div><div><br></div><div>इस फिल्म के लिए अभिनेत्री को फिल्मफेयर का बेस्ट एक्ट्रेस अवॉर्ड मिला था। इसके बाद अभिनेत्री ने देव आनंद के साथ 'पेइंग गेस्ट', अभिनेता राज कपूर के साथ फिल्म 'अनाड़ी', अभिनेता सुनील दत्त के साथ फिल्म 'सुजाता' और अभिनेता दिलीप कुमार के साथ फिल्म 'कर्मा' जैसी कई बेहतरीन फिल्मों में काम किया था। साल 1963 में आई फिल्म 'बंदिनी' में नूतन ने युवा कैदी की भूमिका निभाई थी। यह नूतन की बेहतरीन फिल्मों में शुमार है।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>जिंदगी के आखिरी सालों में नूतन ब्रेस्ट कैंसर की चपेट में आ गई थीं। हालांकि उन्होंने इस जंग से जीतने की बहुत कोशिश की, लेकिन साल 1991 में नूतन ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 04 Jun 2026 14:21:46 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/miss-india-crown-over-70-films-know-legend-nutan-incredible-bollywood-career</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[S P Balasubrahmanyam Birth Anniversary: एक दिन में 21 गाने गाकर बनाया था World Record, जानें लेजेंड सिंगर की कहानी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/created-world-record-by-singing-21-songs-in-day-know-story-of-legendary-singer]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 04 जून को दिग्गज गायक एसपी बालासुब्रमण्यम का जन्म हुआ था। एसपी बालासुब्रमण्यम एक हरफनमौला कलाकार थे। उन्होंने करीब 5 दशकों तक लाखों लोगों को अपनी बेहतरीन आवाज से फैन बनाया था। बता दें कि 80 के दशक से लेकर नई सदी की शुरूआत तक एसपी बालासुब्रमण्यम हिंदी फिल्मों के लिए गाने गाते रहे। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर एसपी बालासुब्रमण्यम के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>आंध्र प्रदेश के नेल्लोर में 4 जून 1946 को बालासुब्रमण्यम का जन्म हुआ था। उनका परिवार कला और संस्कृति से जुड़ा था। इनके पिता का नाम एस पी सांबामूर्ति हरिकथा कलाकार थे। उनके पिता चाहते थे कि बेटा इंजीनियर बने। वहीं बालासुब्रमण्यम ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू भी की। लेकिन किसी कारणवश पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ी। इसके बाद उनका रुख संगीत की ओर हुआ और वह चेन्नई पहुंच गए।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/why-she-called-lady-in-white-learn-unheard-stories-about-nargis-dutt" target="_blank">Nargis Birth Anniversary: क्यों कहलाती थीं 'Lady in White'? जानिए नरगिस दत्त की अनसुनी बातें</a></h3><h2>सिंगिंग करियर</h2><div>साल 1981 में फिल्म 'एक दूजे के लिए' के जरिए बालासुब्रमण्यम ने हिंदी फिल्मों में कदम रखा था। फिल्म का मशहूर गीत 'तेरे मेरे बीच में' लोगों के जुबान पर चढ़ गया। इस गाने के लिए बालासुब्रमण्यम को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। वहीं 90 के दशक में एसपी बालासुब्रमण्यम बॉलीवुड में फेमस हो गए। सलमान खान की फिल्मों में उनकी आवाज को काफी पसंद किया था। इसके बाद वह सलमान खान की आवाज बन गए।</div><div><br></div><div>बालासुब्रमण्यम ने फिल्म 'मैंने प्यार किया' का गाना 'दिल दीवाना' हो या फिर फिल्म 'हम आपके हैं कौन' का गाना 'दीदी तेरा देवर दीवाना' गाने गाए हैं, जोकि आज भी लोगों की पसंदीदा प्लेलिस्ट का हिस्सा है। आप एसपी बालासुब्रमण्यम की प्रतिभा का अंदाजा इस बात से भी लगा सकते हैं कि उन्होंने 1 दिन में 21 गाने रिकॉर्ड करने का कारनामा दिखाया। उन्होंने एक दिन में 19 तमिल और 16 हिंदी गाने रिकॉर्ड कर अपनी एक अलग पहचान बनाई थी।</div><div><br></div><h2>पुरस्कार</h2><div>एसपी बालासुब्रमण्यम ने स्ट मेल प्लेबैक सिंगर के लिए 6 नेशनल फिल्म अवॉर्ड जीते थे। इसके बाद साल 2001 में उनको 'पद्मश्री' और साल 2011 में 'पद्म भूषण' से सम्मानित किया गया था।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>एसपी बालासुब्रमण्यम का 25 सितंबर 2020 को कोरोना होने की वजह से निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 04 Jun 2026 14:17:31 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/created-world-record-by-singing-21-songs-in-day-know-story-of-legendary-singer</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Nargis Birth Anniversary: क्यों कहलाती थीं 'Lady in White'? जानिए नरगिस दत्त की अनसुनी बातें]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/why-she-called-lady-in-white-learn-unheard-stories-about-nargis-dutt]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज यानी की 01 जून को हिंदी सिनेमा की दिग्गज अभिनेत्री नरगिस का जन्म हुआ था। नरगिस ने तीन दशक से भी लंबे वक्त कर फिल्मी पर्दे और लोगों के दिलों पर राज किया था। नरगिस ने अपनी एक्टिंग का पूरी दुनिया में लोहा मनवाया था। हालांकि नरगिस कभी भी फिल्मी दुनिया में नहीं आना चाहती थीं। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर अभिनेत्री नरगिस के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>पश्चिम बंगाल के कोलकाता में 01 जून 1929 को नरगिस दत्त का जन्म हुआ था। उनका असली नाम फातिमा राशिद था। इनके पिता का नाम अब्दुल राशिद था। नरगिस के पिता का नाम मोहनचंद उत्तमचंद त्यागी था, बाद में उन्होंने इस्लाम कुबूल कर लिया था। नरगिस की मां जद्दनबाई अपने समय की जानी-मानी तवायफ और हिंदुस्तानी क्लासिकल सिंगर थीं। नरगिस के पिता चाहते थे कि उनकी बेटी डॉक्टर बने, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। जब नरगिस को फिल्मों के ऑफर मिलने शुरू हुए थे, तो उस समय उनकी उम्र बेहद कम थीं।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/kapoor-family-legend-whose-legacy-still-sustains-bollywood" target="_blank">Prithviraj Kapoor Death Anniversary: Kapoor Family के वो Legend जिनकी विरासत पर आज भी टिका है Bollywood, जानें अनसुनी बातें</a></h3><h2>फिल्मी सफर</h2><div>साल 1935 में फिल्म 'तलाश-ए-हक' से बाल कलाकार के रूप में नरगिस ने अभिनय की शुरूआत की थी। इस फिल्म को नरगिस की मां जद्दनबाई ने प्रोड्यूस किया था। इस फिल्म क्रेडिट में एक्ट्रेस का नाम बेबी नरगिस रखा गया था।</div><div><br></div><div>जब अभिनेत्री सिर्फ 28 साल की थीं, तो उन्होंने अकादमी-पुरस्कार नामांकित फिल्म 'मदर इंडिया' में शानदार काम किया था। मदर इंडिया प्रतिष्ठित सम्मान के लिए नामांकित होने वाली पहली भारतीय फिल्म थी। साल 1958 में एक्ट्रेस ने सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का फिल्मफेयर पुरस्कार जीता। सुनील दत्त के साथ उनका रिश्ता फिल्म 'मदर इंडिया' के सेट पर शुरू हुआ था। फिल्म की शूटिंग के दौरान सेट पर आग लग गई थी और सुनील दत्त ने अपनी परवाह न करते हुए एक्ट्रेस को बचाया था।</div><div><br></div><h2>लेडी इन व्हाइट</h2><div>अभिनेता सुनील दत्त से शादी के बाद नरगिस ने पीक पर करियर को छोड़ दिया था। उन्होंने इस दौरान हाउस वाइफ और तीन बच्चों की मां की जिम्मेदारी निभाई। नरगिस को सफेद साड़ियां पहनने का शौक था, जिस कारण नरगिस को लेडी इन व्हाइट कहा जाता था।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>आखिरी समय में नरगिस को कैंसर का पता चला और उन्होंने न्यूयॉर्क में अपना इलाज कराया था। लेकिन भारत लौटने के बाद उनकी तबियत ज्यादा खराब हो गई और वह कोमा में चली गईं। वहीं 03 मई 1981 को एक्ट्रेस नरगिस ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 01 Jun 2026 14:49:47 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/why-she-called-lady-in-white-learn-unheard-stories-about-nargis-dutt</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Guru Arjun Dev Death Anniversary: Golden Temple बनवाने वाले Guru Arjun Dev की शहादत, जहांगीर के आदेश पर दी गई थीं क्रूर यातनाएं]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/martyrdom-of-guru-arjun-dev-who-built-golden-temple]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 30 मई को सिखों के पांचवें गुरु, गुरु अर्जुन देव का निधन हो गया था। मुगल शासक जहांगीर ने गुरु अर्जुन देव की जघन्य तरीके से यातना देकर हत्या करवा दी थी। गुरु अर्जुन देव ने अपना पूरी जीवन लोगों की सेवा करने और धर्म में लगा दिया था। वह दिन-रात सेवा और संगत में लगे रहते थे और सभी धर्मों के लोगों को एक समान दृष्टि से देखते थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर गुरु अर्जुन देव के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>गुरु अर्जुन देव का जन्म 15 अप्रैल 1563 को हुआ था। उनके पिता का नाम गुरु रामदास और मां का नाम बीवी भानी था। उनके पिता गुरु रामदास सिखों के चौथे गुरु थे। वहीं गुरु अर्जुन देव के नाना गुरु अमरदास सिखों के तीसरे गुरु थे। अर्जुन देव का बचपन गुरु अमरदास की देखरेख में बीता था। गुरु अमरदास ने गुरु अर्जुन देव को गुरुमुखी शिक्षा दी थी। साल 1579 में गुरु अर्जुन देव का विवाह माता गंगाजी के साथ हुआ था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/malhar-rao-holkar-king-maker-of-north-india-shepherd-created-golden-history" target="_blank">Malhar Rao Holkar Death Anniversary: North India के 'King Maker' मल्हार राव होलकर, जानें कैसे एक चरवाहे ने रचा था सुनहरा इतिहास</a></h3><h2>स्वर्ण मंदिर का निर्माण</h2><div>साल 1581 में गुरु अर्जुन देव जी सिखों के 5वें गुरु बने थे। इसके साथ ही उन्होंने अमृतसर में श्रीहरमंदिर साहिब गुरुद्वारे की नींव रखवाई थी। जिसको आज स्वर्ण मंदिर या गोल्डन टेंपल के नाम से भी जाना जाता है। बताया जाता है कि स्वयं अर्जुन देव जी ने श्रीहरमंदिर साहिब गुरुद्वारे का नक्शा बनाया था।</div><div><br></div><h2>कलम के सिपाही</h2><div>गुरु अर्जुन देव ने भाई गुरदास के सहयोग से श्री गुरु ग्रंथ साहिब का संपादन किया था। उन्होंने राहों के आधार पर गुरु वाणियों का वर्गीकरण भी किया था। श्री गुरु ग्रंथ साहिब में गुरु अर्जुन देव के हजारों शब्द हैं। इसके साथ ही इस पवित्र ग्रंथ में बाबा फरीद, भक्त कबीर, संत रविदास और संत नामदेव जैसे अन्य संत-महात्माओं के भी शब्द हैं।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>धर्म के लिए गुरु अर्जुन देव ने अपने प्राणों की आहुति दी थी। दरअसल, मुगल शासक जहांगीर ने गुरु अर्जुन देव को लाहौर की भीषण गर्मी में गर्म तवे पर बिठाकर यातना दी। फिर उनके ऊपर गर्म रेत डाली गई और अन्य तरीके की जघन्य यातनाएं दी गईं। इन यातनाओं के कारण गुरु अर्जुन देव का शरीर बुरी तरह से जल गया था। फिर उनको ठंडे पानी से नहाने के लिए रावी नदी ले जाया गया। वहीं 30 मई 1606 को गुरु अर्जुन देव की मृत्यु हो गई।</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 30 May 2026 17:01:28 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/martyrdom-of-guru-arjun-dev-who-built-golden-temple</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Chaudhary Charan Singh Death Anniversary: पहले गैर-कांग्रेसी CM से PM तक, ऐसा था Chaudhary Charan Singh का सियासी सफर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/from-first-non-congress-cm-to-pm-political-journey-of-chaudhary-charan-singh]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 29 मई को देश के पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह का निधन हो गया था। चौधरी चरण सिंह सादगी पसंद व्यक्ति थे और उनको किसानों का मसीहा कहा जाता था। उन्होंने भारत के 5वें प्रधानमंत्री के रूप में पद संभाला था। उन्हें मुख्य रूप से किसानों के अधिकारों और भूमि सुधारों के लिए जाना जाता है। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर चौधरी चरण सिंह के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>हापुड़ में नूरपुर गांव में जाट परिवार में 23 दिसंबर 1902 को चौधरी चरण सिंह का जन्म हुआ था। आगरा विश्वविद्यालय से कानून की पढ़ाई कर अपने करियर की शुरूआत वकालत से की थी। लेकिन बाद में उन्होंने गांधी जी के स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया और फिर राजनीति में प्रवेश लिया। चौधरी चरण सिंह आजादी से पहले दो बार जेल गए थे। वहीं साल 1937 के चुनावों में चौधरी चरण सिंह यूनाइटेड प्रोविंस की लेजिस्लेटिव एसेंबली के सदस्य भी रहे।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/from-god-of-cinema-to-chief-minister-of-andhra-pradesh-this-ntr-journey" target="_blank">NT Rama Rao Birth Anniversary: सिनेमा के 'भगवान' से लेकर आंध्र प्रदेश के CM तक, ऐसा था NTR का सफर</a></h3><h2>सियासी सफर</h2><div>जब भी चौधरी चरण सिंह के राजनीतिक सफर का जिक्र किया जाता है, तो आपातकाल के बाद के समय का होता है। लेकिन वह बहुत पहले ही किसानों की आवाज बन चुके थे। देश की आजादी से पहले भी चौधरी चरण सिंह किसानों और मजदूरों के उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाते थे। वह किसानों की समस्या सुनकर द्रवित हो उठते थे।</div><div><br></div><h2>कांग्रेस के साथ</h2><div>साल 1951 में वह यूपी कैबिनेट में न्याय एवं सूचना मंत्री बने। फिर साल 1967 तक वह राज्य कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में गिने जाते रहे। इसके साथ ही साल 1959 के नागपुर कांग्रेस अधिवेशन में उन्होंने पंडित नेहरू तक का विरोध करने से गुरेज नहीं किया। इस समय तब वह उत्तर भारत के किसानों के आवाज बन चुके।</div><div><br></div><div>साल 1967 में उन्होंने कांग्रेस से खुद को अलग कर लिया था। चौधरी चरण सिंह उत्तर प्रदेश के पहले गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने। वह जनता गठबंधन से जुड़े, जिसमें उनका दल भारतीय लोकदल सबसे बड़ा घटक था। लेकिन साल 1974 तक वह गठबंधन से अलग-थलग हो गए थे। फिर जब जयप्रकाश नारायण ने मोरारजी देसाई को पीएम चुना तो चौधरी चरण सिंह निराश हुए। हालांकि इस सरकार में वह उप-प्रधानमंत्री और गृहमंत्री रहे।&nbsp;</div><div><br></div><div>वहीं कांग्रेस के समर्थन से साल 1979 में चौधरी चरण सिंह भारत के 5वें प्रधानमंत्री बने। लेकिन कांग्रेस के समर्थन वापस लेने के कारण साल 1980 में उनको इस्तीफा देना पड़ा। माना जाता है कि कांग्रेस के समर्थन के साथ प्रधानमंत्री बनना चौधरी चरण सिंह के छवि को धूमिल कर गया था। लेकिन उन्होंने अपनी जमीन नहीं छोड़ी और वह हमेशा अपने क्षेत्र के लोकप्रिय नेता बने रहे। पीएम पद से इस्तीफा देने के बाद भी वह साल 1987 तक लोकसभा में लोकदल का प्रतिनिधित्व करते रहे और किसानों की आवाज बने रहे।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 29 मई 1987 को 84 साल की उम्र में चौधरी चरण सिंह का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 29 May 2026 13:19:18 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/from-first-non-congress-cm-to-pm-political-journey-of-chaudhary-charan-singh</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Prithviraj Kapoor Death Anniversary: Kapoor Family के वो Legend जिनकी विरासत पर आज भी टिका है Bollywood, जानें अनसुनी बातें]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/kapoor-family-legend-whose-legacy-still-sustains-bollywood]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कपूर परिवार प्रमुख और सफल फिल्मी घरानों में से एक के रूप में जाना जाता है। कपूर फैमिली के पहले सुपरस्टार रहे पृथ्वीराज कपूर का 29 मई को निधन हो गया था। पृथ्वीराज कपूर फिल्मों में सफलता पाने वाले कपूर परिवार के पहले व्यक्ति थे और सिनेमा की दुनिया में कदम रखने वाले भी पहले थे। आज की पीढ़ी पृथ्वीराज कपूर को मुगल-ए-आज़म के बादशाह अकबर के रोल के लिए जानते हैं। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर पृथ्वीराज कपूर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>पश्चिमी पंजाब के लायलपुर में 03 नवंबर 1906 को पृथ्वीराज कपूर का जन्म हुआ था। उनके पिता दीवान बशेश्वरनाथ कपूर पुलिस उपनिरीक्षक थे। वहीं 1920 के दशक में उन्होंने अविभाजित भारत में लायलपुर और पेशावर के थिएटरों में अभिनय करना शुरूकर दिया। फिर 1927 में उन्होंने बॉम्बे आने का फैसला किया। लेकिन उनके पास पैसे नहीं थे, तब पृथ्वीराज की बुआ ने उनको कुछ उधार रुपए दिए थे। जिसके बाद वह मायानगरी आए।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/how-voice-of-radio-become-bollywood-superstar-know-journey" target="_blank">Sunil Dutt Death Anniversary: रेडियो की आवाज से कैसे बने Bollywood के Superstar, जानें सफर</a></h3><h2>फिल्मी सफर</h2><div>बॉम्बे आने के बाद पृथ्वीराज कपूर ने फिल्मों में अभिनय करना शुरूकर दिया। लेकिन शुरूआत में उनको सपोर्टिंग कलाकार के रूप में छोटे रोल मिले। यह दौर साइलेंट फिल्मों का था और एक्स्ट्रा कलाकारों को दर्शक नोटिस नहीं करते थे। फिर साल 1930 में सिनेमा गर्ल में पृथ्वीराज कपूर को मुख्य भूमिका मिली।</div><div><br></div><h2>निगेटिव रोल किए</h2><div>साल 1929 से लेकर 1931 तक पृथ्वीराज कपूर ने 9 साइलेंट फिल्मों में काम किया। वहीं भारत की पहली बोलती फिल्म 'आलमआरा' में वह खलनायक की भूमिका में नजर आए थे। करियर के शुरूआती दौर में पृथ्वीराज सपोर्टिंग या निगेटिव रोल में नजर आए। क्योंकि मुख्य लीड वाली फिल्में बॉक्स ऑफिस पर कमाल नहीं दिखा सकीं।</div><div><br></div><h2>स्टारडम का स्वाद</h2><div>साल 1933 में पहली बार पृथ्वीराज कपूर ने स्टारडम का स्वाद चखा था। पृथ्वीराज कपूर ने फिल्म 'राजरानी मीरा' में सेकेंड लीड की भूमिका निभाई। इस फिल्म में एक और अभिनेता केएल सगहल भी थे। इस फिल्म से दोनों ने स्टारडम का स्वाद चखा। इसके बाद साल 1937 में उन्होंने फिल्म 'विद्यापति' और साल 1941 में 'सिकंदर' जैसी बड़ी फिल्मों में काम किया था।</div><div><br></div><h2>पृथ्वीराज कपूर लीगेसी</h2><div>पृथ्वीराज कपूर के तीन बेटे राज कपूर, शम्मी कपूर और शशि कपूर तीनों सुपरस्टार थे। वहीं उनके पोते रणधीर कपूर और ऋषि कपूर भी सफल अभिनेता थे। इसके बाद उनके परपोते रणबीर कपूर, करीना कपूर और करिश्मा कपूर बॉलीवुड में सक्रिय हैं।</div><div><br></div><h2>निधन</h2><div>पृथ्वीराज कपूर को कैंसर हो गया था। इस बीमारी से लंबी जंग लड़ने के बाद 29 मई 1972 को पृथ्वीराज कपूर का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 29 May 2026 13:15:17 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/kapoor-family-legend-whose-legacy-still-sustains-bollywood</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[NT Rama Rao Birth Anniversary: सिनेमा के 'भगवान' से लेकर आंध्र प्रदेश के CM तक, ऐसा था NTR का सफर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/from-god-of-cinema-to-chief-minister-of-andhra-pradesh-this-ntr-journey]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>साउथ जगत के दिग्गज अभिनेता, निर्माता-निर्देशक और स्क्रीन राइटर रहे एनटी रामा राव का 28 मई को जन्म हुआ था। उन्होंने न सिर्फ साउथ सिनेमा बल्कि राजनीति में भी अपनी पहचान बनाई थी। उन्होंने आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में भी अपनी सेवाएं दी थीं। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर एनटी रामा राव के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>आंध्र प्रदेश के एक छोटे से गांव निम्माकारू के किसान परिवार में 28 मई 1923 को एनटी रामा राव का जन्म हुआ था। परिवार की आर्थिक मदद के लिए पढ़ाई के दिनों में एनटी रामा राव विजयवाड़ा की गलियों में दूध बेचा करते थे। शिक्षा पूरी होने के बाद एनटी रामा राव को एक अच्छी सरकारी नौकरी मिल गई। लेकिन उनके अंदर का कलाकार उनको फिल्मों की तरफ खींच रहा था। नौकरी में मन न लगने पर उन्होंने कुछ ही समय बाद सरकारी नौकरी छोड़ दी और अभिनय की दुनिया में चल गए।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/veer-savarkar-father-of-hindutva-and-staunch-supporter-of-hindu-rashtra" target="_blank">Vinayak Damodar Savarkar Birth Anniversary: हिंदुत्व के जनक और 'Hindu Rashtra' के प्रखर समर्थक थे वीर सावरकर</a></h3><h2>फिल्मी सफर</h2><div>साल 1949 में उन्होंने फिल्म 'मना देशम' से अपने फिल्मी करियर की शुरूआत की। शुरूआत में उन्होंने हर तरह का रोल किया। लेकिन अभिनेता की किस्मत तब चमकी, जब उन्होंने पौराणिक फिल्मों की ओर रुख किया। उन्होंने अपने फिल्मी करियर में रिकॉर्ड 17 बार कृष्ण का रोल किया। इसके अलावा उन्होंने श्रीराम, शिव और भगवान विष्णु का रोल निभाया था।</div><div><br></div><div>उन्होंने यह रोल इतना शिद्दत से निभाया कि लोग उनके दीवाने हो गए। जब वह पर्दे पर श्रीकृष्ण बनकर मुस्कुराते तो दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते थे। लोग उनकी मूर्ति अपने घरों के मंदिर में रखकर उसकी पूजा करते थे।</div><div><br></div><div>पौराणिक किरदारों के अलावा एनटी रामा राव ने सोशल और एक्शन फिल्मों में भी अपनी धाक जमाई। उनकी फिल्म 'पाताल भैरवी' भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुई। इसके अलावा फिल्म 'मायाबाजार' और 'नर्तनशाला' जैसी फिल्मों ने एनटी रामा राव को न सिर्फ देश बल्कि विदेश में भी बड़ी पहचान दिलाई थी।</div><div><br></div><h2>सियासी सफर</h2><div>सिनेमा पर राज करने के बाद एनटी रामा राव ने राजनीति में कदम रखा। साल 1982 में उन्होंने 'तेलुगु देशम पार्टी' बनाई। उन्होंने अपनी पॉपुलैरिटी के दम पर कुछ ही महीनों में भारी बहुमत हासिल की और वह आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने किसानों, गरीबों और आम जनता के लिए कई बेहतरीन योजनाएं चलाईं। अपनी कल्याणकारी योजना के कारण वह राजनीति में भी 'जनता के भगवान' बन गए।</div><div><br></div><h2>सम्मान</h2><div>कला और समाज के प्रति एनटी रामा राव के अद्भुत योगदान के लिए भारत सरकार ने साल 1969 में उनको 'पद्मश्री' से सम्मानित किया। इसके अलावा उनको तीन नेशनल अवॉर्ड्स भी मिले। जब साल 2013 में भारतीय सिनेमा के 100 साल पूरे हुए, तो एक सर्वे में एनटी रामा राव को 'ग्रेटेस्ट इंडियन एक्टर ऑफ ऑल टाइम' चुना गया था।</div><div><br></div><div>वहीं 18 जनवरी 1996 को दिन का दौरा पड़ने से एनटी रामा राव का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 28 May 2026 13:46:10 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/from-god-of-cinema-to-chief-minister-of-andhra-pradesh-this-ntr-journey</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[Vinayak Damodar Savarkar Birth Anniversary: हिंदुत्व के जनक और 'Hindu Rashtra' के प्रखर समर्थक थे वीर सावरकर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/veer-savarkar-father-of-hindutva-and-staunch-supporter-of-hindu-rashtra]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास के महान क्रांतिकारी वीर सावरकर का 28 मई को जन्म हुआ था। वीर सावरकर को समाज सुधारक, स्वतंत्रता सेनानी, लेखक और राजनीतिक विचारक के रूप में जाना जाता है। उन्होंने देश की आजादी की लड़ाई में अहम योगदान दिया है। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर विनायक दामोदर सावरकर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>महाराष्ट्र के नासिक के पास भागपुर गांव में 28 मई 1883 को वीर सावरकर का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम दामोदरपंत सावरकर और मां का नाम राधाबाई था। सावरकर ने अपने माता-पिता को बचपन में ही खो दिया था। उनका पूरा नाम विनायक दामोदर सावरकर था।</div><div><br></div><div>उन्होंने अपनी शुरूआती शिक्षा नासिक के सरकारी स्कूल में हुई थी। वह एक बुद्धिमान व्यक्ति थे। उन्होंने बचपन में ही गीता का श्लोक कंठस्थ कर लिया था। उस समय महाराष्ट्र में लोकमान्य तिलक का समाचार पत्र 'केसरी' छपता था। सावरकर इसी अखबार को पढ़ते थे और उनके मन में क्रांतिकारी विचार आने लगे। बाद में वीर सावरकर ने 'मित्र मेला' नामक संगठन बनाया। जिसने भारत की पूर्ण राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए लड़ने के लिए प्रभावित किया था।</div><div><br></div><h2>मित्र मेला संगठन</h2><div>बता दें कि मित्र मेला संगठन के सदस्यों ने नासिक में प्लेग से पीड़ित लोगों की सहायता की थी। वह में मित्र मेला को 'अभिनव भारत' कहा गया और 'भारत को आजाद होना चाहिए' घोषित किया गया। हालांकि बहुत कम लोग जानते हैं कि देश में अस्पृश्यता के खिलाफ सबसे शक्तिशाली सामाजिक सुधार आंदोलन की शुरूआत वीर सावरकर ने की थी। वीर सावरकर एक बहुआयामी व्यक्ति थे।</div><div><br></div><h2>गांधी के आलोचक</h2><div>वीर सावरकर को महात्मा गांधी का आलोचक कहा जाता है। वह महात्मा गांधी को 'पाखंडी' कहते थे। साल 1948 में गांधी की हत्या के दौरान वीर सावरकर को सह-साजिशकर्ता के रूप में आरोपित किया गया। सावरकर की गिरफ्तारी हुई, लेकिन पर्याप्त सबूत न होने के कारण उनको अदालत द्वारा रिहा कर दिया गया।</div><div><br></div><div>हिंदू राष्ट्र के रूप में सावरकर ने भारत के आदर्श का समर्थन किया था। उन्होंने कई पोस्टल भी लिखीं, जिनमें 'जोसेफ माजिनी- जीवनी और राजनीति' पुस्तक काफी प्रसिद्ध हुई। उन्होंने न सिर्फ अंग्रेजों द्वारा लाई गई वस्तुओं का विरोध किया था बल्कि विदेशों से आने वाली चीजों का भी विरोध किया था।</div><div><br></div><div>वहीं साल 1911 में सावरकर को काला पानी की सबसे ज्यादा कठिन सजा सुनाई गई थी। दरअसल, सावरकर ने नासिक जिले के कलेक्टर जैक्सन की हत्याकर दी थी। नासिक षड्यंत्र कांड के तहत वीर सावरकर को 07 अप्रैल 1911 में यह सजा सुनाई गई थी। इस दौरान वह 04 अप्रैल से लेकर 21 मई 1921 तक पोर्ट ब्लेयर में रहे।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 26 फरवरी 1966 को वीर सावरकर का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 28 May 2026 13:43:12 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/veer-savarkar-father-of-hindutva-and-staunch-supporter-of-hindu-rashtra</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Jawahar Lal Nehru Death Anniversary: देश के First PM का Farmer's March से लेकर 17 साल के शासन तक का पूरा Political सफर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/entire-political-journey-of-country-first-pm-from-farmer-march-to-17-years-rule]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का 27 मई को निधन हो गया था। वह पहले ऐसे प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने करीब 17 साल तक देश की कमान संभाली थी। पंडित नेहरू को देश में औद्योगिक ढांचा खड़ा करने के लिए जाना जाता है। वहीं इस बात की जानकारी बहुत कम लोगों को है कि पंडित जवाहर लाल नेहरू ने देश में पहला किसान मार्च निकाला था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर पंडित जवाहर लाल नेहरू के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>इलाहाबाद में 14 नवंबर 1889 को जवाहर लाल नेहरू का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम मोतीलाल नेहरू और मां का नाम स्वरूपरानी था। पिता पेशे से वकील थे। उन्होंने स्कूली शिक्षा हैरो और कॉलेज की शिक्षा ट्रिनिटी कॉलेज लंदन से पूरी की थी। इसके बाद उन्होंने कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से लॉ की डिग्री ली।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/enmity-with-indira-imprisonment-during-emergency-such-gayatri-devi-royal-life" target="_blank">Gayatri Devi Birth Anniversary: Indira Gandhi से दुश्मनी, Emergency में जेल... ऐसी थी गायत्री देवी Royal Life</a></h3><h2>कांग्रेस से जुड़े</h2><div>जवाहर लाल नेहरू, गांधी जी से प्रभावित रहे और साल 1912 में कांग्रेस से जुड़े। वहीं साल 1920 के प्रतापगढ़ के पहले किसान मोर्चे को संगठित करने का श्रेय पंडित नेहरू को जाता है। साल 1928 में लखनऊ में साइमन कमीशन के विरोध में पंडित नेहरू घायल हुए और साल 1930 के नमक आंदोलन में गिरफ्तार हुए थे। इस दौरान वह करीब 6 महीने जेल में रहे। पंडित नेहरू ने कुल 9 बार जेल यात्राएं की।</div><div><br></div><div>पंडित नेहरू ने 6 बार कांग्रेस अध्यक्ष के पद को सुशोभित किया था। साल 1942 के 'भारत छोड़ो' आंदोलन में पंडित नेहरू 09 अगस्त 1942 को गिरफ्तार हुए और इस दौरान वह अहमदनगर जेल में रहे। वहां से 15 जून 1945 को वह रिहा हुए थे।</div><div><br></div><h2>देश के पहले प्रधानमंत्री</h2><div>साल 1947 में भारत की आजादी के बाद जब भावी पीएम के लिए कांग्रेस में मतदान हुआ, तो सरदार वल्लभभाई पटेल और आचार्य कृपलानी को सबसे ज्यादा वोट मिले थे। लेकिन महात्मा गांधी के कहने पर दोनों ने अपना नाम वापस ले लिया और पंडित नेहरू को देश का पहला प्रधानमंत्री बनाया गया। पंडित नेहरू के कार्यकाल में राष्ट्र और संविधान के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को स्थायी भाव प्रदान करना, लोकतांत्रिक परंपराओं को मजबूत करना और योजनाओं के माध्यम से देश की अर्थव्यवस्था को सुचारु करना आदि मुख्य उद्देश्य रहा।</div><div><br></div><div>पंडित जवाहर लाल नेहरू पाकिस्तान और चीन के साथ भारत के संबंधों में सुधार नहीं कर सके। हालांकि उन्होंने चीन की ओर मित्रता का हाथ बढ़ाया। लेकिन साल 1962 में चीन ने धोखे से आक्रमण कर दिया। जोकि पंडित नेहरू के लिए बड़ा झटका था।</div><div>&nbsp;</div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 27 मई 1964 को पंडित जवाहर लाल नेहरू का दिल का दौरा पड़ने की वजह से मौत हो गया थी।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 27 May 2026 11:14:53 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/entire-political-journey-of-country-first-pm-from-farmer-march-to-17-years-rule</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Vilasrao Deshmukh Birth Anniversary: जब हारे थे Election, फिर दमदार Comeback कर दो बार बने थे Maharashtra के CM]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/lost-election-he-made-strong-comeback-and-became-cm-of-maharashtra-twice]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>कांग्रेस के कद्दावर नेता और महाराष्ट्र के पूर्व सीएम रहे विलासराव देशमुख का 26 मई को जन्म हुआ था। वह सिर्फ महाराष्ट्र की राजनीति में नहीं बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी कांग्रेस के अहम सिपहसलार थे। राजनीति में मजबूती से अपने पैर जमाने के लिए विलासराव देशमुख ने बेहद निचले स्तर से शुरूआत की थी। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर विलासराव देशमुख के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>लातूर जिले के बाभालगांव के एक मराठा परिवार में 26 मई 1945 को विलासराव देशमुख का जन्म हुआ था। शुरूआती शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने पुणे विश्वविद्यालय से विज्ञान और ऑर्ट्स दोनों में स्नातक की पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने पुणे के ही इंडियन लॉ सोसाइटी कॉलेज से कानून की पढ़ाई की। पढ़ाई के साथ-साथ विलासराव देशमुख समाजसेवा जैसे काम भी करते थे।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/how-voice-of-radio-become-bollywood-superstar-know-journey" target="_blank">Sunil Dutt Death Anniversary: रेडियो की आवाज से कैसे बने Bollywood के Superstar, जानें सफर</a></h3><h2>राजनीतिक सफर</h2><div>विलासराव देशमुख ने राजनीति में मजबूती से पैर जमाने के लिए बेहद निचले स्तर से शुरूआत की थी। उन्होंने पंचायती चुनाव से सियासी सफर की शुरूआत की। वह पहले पंच और फिर सरपंच बने। इसके बाद विलासराव देशमुख जिल परिषद के सदस्य और लातूर तालुका पंचायत समिति के उपाध्यक्ष भी रहे थे।</div><div><br></div><div>विलासराव युवा कांग्रेस के जिला अध्यक्ष रहे। उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान युवा कांग्रेस के पंचसूत्रीय कार्यक्रम को लागू करने की दिशा में काम किया था। साल 1980 से लेकर 1995 तक लगातार 3 साल वह विधानसभा के लिए चुने गए। इस दौरान वह विभिन्न मंत्रालयों में बतौर मंत्री कार्यरत रहे। इस दौरान उन्होंने गृह, ग्रामीण विकास, उद्योग, परिवहन, कृषि, मतस्य, पर्यटन, शिक्षा, तकनीकी शिक्षा, युवा मामले, खेल समेत अनेक पदों पर मंत्री के रूप में काम किया है।</div><div><br></div><h2>महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री</h2><div>साल 1995 में विलासराव देशमुख को चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था। लेकिन साल 1999 के चुनावों में देशमुख की विधानसभा में फिर से वापसी हुई। इस साल वह महाराष्ट्र के पहली बार सीएम बने थे। लेकिन बीच में ही विलासराव देशमुख को मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ी और उनकी जगह सुशील कुमार शिंदे को सीएम बनाया गया।&nbsp;</div><div><br></div><div>हालांकि अगले चुनाव में मिली अपार सफलता के बाद कांग्रेस ने फिर विलासराव देशमुख को सीएम बनाया। बता दें कि 18 अक्तूबर 1996 से लेकर 16 जनवरी 2003 तक पहली बार मुख्यमंत्री बने थे। वहीं उनका दूसरा कार्यकाल 07 सितंबर 2004 से लेकर 05 दिसंबर 2008 तक रहा था।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>किडनी और लिवर में समस्या होने के कारण विलासराव देशमुख लंबे समय से बीमार थे। वहीं 14 अगस्त 2012 को विलासराव देशमुख का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 26 May 2026 14:48:58 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/lost-election-he-made-strong-comeback-and-became-cm-of-maharashtra-twice</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Sunil Dutt Death Anniversary: रेडियो की आवाज से कैसे बने Bollywood के Superstar, जानें सफर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/how-voice-of-radio-become-bollywood-superstar-know-journey]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदी सिनेमा के शानदार अभिनेता रहे सुनील दत्त का 25 मई को निधन हो गया था। सुनील दत्त फिल्म इंडस्ट्री में अपनी शराफत और नफासत के लिए जाने जाते थे। उन्होंने अपने फिल्मी करियर में विशुद्ध मसाला फिल्मों के अलावा सामाजिक मुद्दों पर आधारिक फिल्में की थीं। सुनील दत्त की कई फिल्में आज भी यादगार हैं। वह ऐसे कलाकारों में गिने जाते थे, जो किसी भी रोल में रम जाते थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर अभिनेता सुनील दत्त के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>ब्रिटिश भारत में पंजाब राज्य के झेलम जिला स्थित खुर्दी नामक गांव में 06 जून 1929 को सुनील दत्त का जन्म हुआ था। देश के बंटवारे के बाद सुनील दत्त का परिवार भारत आकर बस गया। वहीं कॉलेज के दिनों में सुनील दत्त ने थिएटर में दिलचस्पी दिखाई।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/master-director-of-indian-cinema-who-received-the-bharat-ratna-and-oscar" target="_blank">Satyajit Ray Birth Anniversary: भारतीय सिनेमा के वो 'Master Director', जिन्हें मिला भारत रत्न और Oscar</a></h3><div>उर्दू में अच्छी पकड़ और वजनदार आवाज होने की वजह से उनको खूब तारीफें मिलती थीं। उनको फिल्मों में आने का शौक था, लेकिन इस क्षेत्र में कोई कनेक्शन न होने की वजह से फिल्म इंडस्ट्री में आना आसान नहीं था। वह आर्थिक रूप से मजबूत भी नहीं थे। ऐसे में सुनील दत्त ने रेडियो सिलोन में काम करना अपना खर्च चलाते थे।</div><div><br></div><h2>फिल्मों में निभाया डकैत का रोल</h2><div>बताया जाता है कि एक बार सुनील दत्त अभिनेता दिलीप कुमार का इंटरव्यू लेने पहुंचे थे। इस दौरान डायरेक्टर समेश सहगल की नजर सुनील दत्त पर पड़ी थी, उन्होंने सुनील को स्क्रीन टेस्ट देने के लिए कहा। इस तरह से सुनील दत्त की फिल्म लाइन में एंट्री हुई थी। फिल्म इंडस्ट्री में सुनील दत्त ने दो दर्जन से ज्यादा फिल्मों में डकैत की भूमिका निभाई थी। वह इस रोल को बड़ी खूबसूरती के साथ पर्दे पर उतारते थे। इस तरह से सुनील दत्त फिल्म इंडस्ट्री के वह चहेते डाकू बन गए थे।</div><div><br></div><h2>इन फिल्मों में किया काम</h2><div>बता दें कि लंबा कद और पहलवानी शरीर वाले सुनील दत्त ने करीब 20 फिल्मों में इस तरह का रोल किया था। वहीं साल 1955 में सुनील दत्त की पहली फिल्म 'रेलवे प्लेटफॉर्म' थीं। वहीं साल 1957 में आई फिल्म 'मदर इंडिया' ने अभिनेता सुनील दत्त के फिल्मी जीवन को पूरी तरह से बदलकर रख दिया था।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 25 मई 2005 को अभिनेता सुनील दत्त ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 25 May 2026 13:43:42 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/how-voice-of-radio-become-bollywood-superstar-know-journey</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Rash Behari Bose Birth Anniversary: वो Freedom Fighter जिसने जापान से हिला दी थी अंग्रेजों की सल्तनत की नींव]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/freedom-fighter-who-shook-foundation-of-british-empire-from-japan]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज यानी की 25 मई को भारतीय क्रांतिकारी रास बिहारी बोस का जन्म हुआ था। भारत को आजादी दिलाने के लिए भारतीय क्रांतिकारी रास बिहारी बोस अपनी पूरी जिंदगी अंग्रेजों के हुकूमत के खिलाफ लड़ते रहे। रास बिहारी बोस ने अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध में 'गदर' एवं 'आजाद हिन्द फौज' का संगठन बनाया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर रास बिहारी बोस के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>बंगाल के बर्धमान जिले के सुबालदह गांव में 25 मई 1886 को रास बिहारी बोस का जन्म हुआ था। जब वह 3 साल के थे, तो उनकी मां की मृत्यु हो गई थी। जिसके बाद उनका पालन-पोषण मामी ने किया था। अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद वह चिकित्सा शास्त्र और इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के लिए फ्रांस और जर्मनी चले गए।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/enmity-with-indira-imprisonment-during-emergency-such-gayatri-devi-royal-life" target="_blank">Gayatri Devi Birth Anniversary: Indira Gandhi से दुश्मनी, Emergency में जेल... ऐसी थी गायत्री देवी Royal Life</a></h3><h2>विरोध प्रदर्शन</h2><div>साल 1905 में भारत के तत्कालीन वाइसराय कर्जन ने बंगाल का विभाजन किया। इस दौरान पहली बार रास बिहारी क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े। बंगाल विभाजन को रोकने के लिए उन्होंने अरबिंदो घोष और जतिन बनर्जी के साथ मिलकर बंगाल विभाजन के पीछे अंग्रेजी हुकूमत की मंशा का खुलासा करने की कोशिश की। इस दौरान रास बिहारी का परिचय बंगाल के प्रमुख क्रांतिकारियों संयुक्त प्रान्त, युगान्तर क्रान्तिकारी संगठन और आर्य समाजी क्रांतिकारियों से हुआ।</div><div><br></div><h2>बग्गी पर फेंका बम</h2><div>दिसंबर 1911 में दिल्ली के चांदनी चौक में तत्कालीन वाइसराय लॉर्ड हार्डिंग की सवारी निकाली जा रही थी। इस दौरान रास बिहारी ने उन पर बम फेंकने की योजना बनाई। युगांतर दल के सदस्य बसन्त कुमार विश्वास ने हार्डिंग की बग्गी पर बम फेंका था। लेकिन उनका निशाना चूक गया और उनको पकड़ लिया गया। हालांकि रास बिहारी इस दौरान बच निकले।</div><div><br></div><h2>प्रथम विश्व युद्ध</h2><div>साल 1913 में बंगाल में बाढ़ की वजह से रास बिहारी राहत कार्य में जुट गए। इस दौरान रास बिहारी की मुलाकात जतिन मुखर्जी से हुई। जिसके बाद फर्स्ट वर्ल्ड वॉर के दौरान भारत को आजादी दिलाने के लिए रास बिहारी बोस ने गदर की योजना बनाई। साल 1915 में उन्होंने क्रांतिकारियों को सेना से युद्ध करने की योजना बनाई। लेकिन उनकी यह योजना भी असफल साबित हुए। जिसके परिणामस्वरूप कई क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया।</div><div><br></div><h2>जापान में रहने लगे रास बिहारी</h2><div>सेना से युद्ध के बाद ब्रिटिश पुलिस रास बिहारी बोस को ढूंढने लगी। जिस कारण उनको साल 1915 में भारत छोड़ना पड़ा। वह जापान में राजा पी एन टैगोर के नाम से रहने लगे और वहीं से देश की आजादी के लिए काम करने लगे। इस दौरान उन्होंने लेखन, अंग्रेजी अध्यापन और पत्रकारिता का काम किया। उन्होंने जापानी में कुल 16 पुस्तकें लिखीं।</div><div><br></div><h2>इंडियन इंडिपेंडेंस लीग की स्थापना</h2><div>साल 1923 में प्रसिद्ध पैन एशियाई समर्थक सोमा आइजो और सोमा कोत्सुको की बेटी से रास बिहारी ने शादी कर जापान की नागरिकता हासिल कर ली। इस दौरान उन्होंने राष्ट्रवादियों के पक्ष में जापानी अधिकारियों का समर्थन पाने का प्रयास किया। वह इसमें सफल भी रहे और मार्च 1942 में टोक्यो में 'इंडियन इंडिपेंडेंस लीग' की स्थापना की।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 21 जनवरी 1945 को रास बिहारी बोस का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 25 May 2026 13:40:16 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/freedom-fighter-who-shook-foundation-of-british-empire-from-japan</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[Gayatri Devi Birth Anniversary: Indira Gandhi से दुश्मनी, Emergency में जेल... ऐसी थी गायत्री देवी Royal Life]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/enmity-with-indira-imprisonment-during-emergency-such-gayatri-devi-royal-life]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>जयपुर की पूर्व राजमाता महारानी गायत्री देवी का 23 मई को जन्म हुआ था। भारत के इतिहास में जयपुर की महारानी गायत्री देवी का नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। बताया जाता है महारानी गायत्री देवी ने सिर्फ 12 साल की उम्र में चीते का शिकार किया था। उनको लग्जरी कारों और शिकार का शौक था। इसके अलावा गायत्री देवी और इंदिरा गांधी की दुश्मनी के भी काफी चर्चे थे। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर गायत्री देवी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><h2><br>जन्म और परिवार</h2><div>लंदन में 23 मई 1919 को पूर्व राजमाता महारानी गायत्री देवी का जन्म हुआ था। गायत्री देवी रबींद्रनाथ टैगोर द्वारा स्थापित शांतिनिकेतन के स्कूल पाठ भवन पढ़ती थीं। इसी में इंदिरा गांधी भी पढ़ती थी। गायत्री देवी बेहद खूबसूरत महिला थीं। बताया जाता है कि इंदिरा गांधी अपने से ज्यादा सुंदर और दर्शनीय महिला को बर्दाश्त नहीं कर सकती थीं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/from-opium-trade-to-tata-empire-learn-story-of-father-of-industry" target="_blank">Jamshedji Tata Death Anniversary: अफीम ट्रेड से Tata Empire तक, जानें 'Father of Industry' की कहानी</a></h3><h2>16 की उम्र में की थी शादी</h2><div>महज 16 साल की उम्र में गायत्री देवी ने जयपुर के राजा सवाई मान सिंह से शादी रचाई थी। गायत्री देवी जयपुर के राजा सवाई मान सिंह की तीसरी पत्नी थी। महारानी गायत्री की खूबसूरती की चर्चा विदेशी मैगजीनों में होती थी।</div><div><br></div><h2>इंदिरा और गायत्री की लड़ाई</h2><div>गायत्री देवी और इंदिरा गांधी के बीच लड़ाई उस समय चर्चा में आई, जब साल 1962 में गायत्री देवी ने जयपुर से लोकसभा चुनाव लड़ने की ठानी और रिकॉर्ड मतों से जीत हासिल की थी। इंदिरा चाहती थी कि वह कांग्रेस में शामिल हों, लेकिन उन्होंने स्वतंत्र पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा था।</div><div><br></div><h2>इमरजेंसी के दौरान गिरफ्तारी</h2><div>देश में आपातकाल लगने के बाद 03 सितंबर 1975 को गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल में डाल दिया है। देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करने के अपराध में गायत्री देवी को बंदी बना लिया गया था। लेकिन गिरफ्तारी के बाद सरकार में इसके पीछे अन्य कारण बताए जाते थे। उस दौरान तिहाड़ जेल में विपक्ष के तमाम बड़े नेताओं समेत विजय राजे सिंधिया बंद थीं।</div><div><br></div><h2>राजनीति से सन्यास के लिए दबाव</h2><div>जब महारानी गायत्री देवी को जब तिहाड़ जेल में ले जाया जा रहा था, तो उस समय वह काफी घबराई हुई थीं। गायत्री देवी को जेल के महिला वार्ड में कैदी नंबर 2265 दिया गया था। वह कई महीनों तक तिहाड़ जेल में बंद रहीं। सेहत खराब होने की वजह से सरकार ने उनको पैरोल पर रिहा किया गया था। महारानी गायत्री देवी पर दोस्तों और करीबियों की ओर से बार-बार दबाव बनाया जा रहा था कि वह राजनीति से संन्यास ले लें। वहीं बहन के कहने के बाद गायत्री देवी ने राजनीति से सन्यास ले लिया।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 29 जुलाई 2009 को 90 साल की उम्र में गायत्री देवी का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 23 May 2026 14:59:46 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/enmity-with-indira-imprisonment-during-emergency-such-gayatri-devi-royal-life</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Gama Pehalwan Death Anniversary: 52 साल का Career, एक भी हार नहीं... जानें 'रुस्तम-ए-हिंद' की अनसुनी कहानी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/52-years-of-career-not-single-defeat-learn-untold-story-of-rustam-e-hind]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 23 मई को गामा पहलवान की मृत्यु हो गई थी। गामा पहलवान को पहलवानी का गुर अपने पिता से मिला था। गामा पहलवान जैसा रुतबा और मुकाम कम ही रेसलर को मिला था। वह अपने जीवन में एक भी कुश्ती नहीं हारे थे। उनको रुस्तम-ए-हिंद का खिताब मिला था। बता दें कि गामा पहलवान इतने बड़े पहलवान थे कि मार्शल आर्ट किंग के नाम से फेमस ब्रूसली भी उनको अपना गुरु मानते थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर गामा पहलवान के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>अमृतसर में 22 मई 1878 को गामा पहलवान का जन्म हुआ था। उनका असली नाम गुलाम मोहम्मद बख्स भट्ट था। गामा को पहलवानी का गुर उनके पिता मोहम्मद अजीज बख्श से मिला था। पिता को पहलवानी करते देश गामा ने भी पहलवान बनने का मन बना लिया था। लिहाजा उनके पिता ने गामा को पहलवानी के दांव-पेंच सिखाए थे।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/raja-ram-mohan-roy-changed-education-system-along-with-practice-of-sati" target="_blank">Ram Mohan Roy Birth Anniversary: Brahmo Samaj के संस्थापक Raja Ram Mohan Roy, जिन्होंने सती प्रथा के साथ Education System को भी बदला</a></h3><h2>रुस्तम-ए-हिंद का नाम मिला</h2><div>साल 1947 में जब देश का बंटवारा हुआ, तो गामा पहलवान भारत के नहीं बल्कि पाकिस्तान के हो गए थे। साल 1947 से पहले तक गामा पहलवान ने भारत का नाम पूरी दुनिया में रोशन किया था। गामा पहलवान ने अपने 52 साल के पहलवानी करियर में एक भी मुकाबला नहीं हारे थे। उनको पहलवानी की उपलब्धियों की वजह से गामा को 'द ग्रेट गामा' और 'रुस्तम-ए-हिंद' के नाम से भी जाना गया। ताकत और कुश्ती लड़ने के खास अंदाज की वजह से गामा पहलवान चर्चा में रहे थे।</div><div><br></div><h2>लंदन में किसी ने नहीं स्वीकार की चुनौती</h2><div>कम उम्र में ही गामा पहलवान ने देश के जाने-माने पहलवानों को धूल चटा दी थी। जिस कारण उनका नाम देश के कोने-कोने में फैलने लगा। भारत में अपनी पहलवानी की पहचान बनाने के बाद साल 1910 में उन्होंने लंदन का रुख किया था। लेकिन यहां पर उनकी हाइट की वजह से उनको लंदन इंटरनेशनल चैंपियनशिप में एंट्री नहीं मिली। इस बात पर खफा गामा ने वहां के किसी भी पहलवान को सिर्फ 30 मिनट के अंदर हराने की चुनौती दी। जिसको किसी ने स्वीकार नहीं किया था।</div><div><br></div><h2>टाइगर की उपाधि</h2><div>साल 1910 में वर्ल्ड हैवीवेट चैंपियनशिप और 1927 में वर्ल्ड कुश्ती चैंपियनशिप जीती थी। इस जीत के बाद गामा पहलवान को टाइगर की उपाधि से सम्मानित किया गया था।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 23 मई 1960 को पाकिस्तान के लाहौर में गामा पहलवान की मृत्यु हुई थी। वह लंबे समय से बीमार चल रहे थे।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 23 May 2026 14:55:56 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/52-years-of-career-not-single-defeat-learn-untold-story-of-rustam-e-hind</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Ram Mohan Roy Birth Anniversary: Brahmo Samaj के संस्थापक Raja Ram Mohan Roy, जिन्होंने सती प्रथा के साथ Education System को भी बदला]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/raja-ram-mohan-roy-changed-education-system-along-with-practice-of-sati]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारतीय समाज सुधारक और 'आधुनिक भारत के जनक' माने जाने वाले राजा राम मोहन राय का 22 मई को जन्म हुआ था। उन्होंने भारतीय समाज में फैले अंधविश्वासों और कुरीतियों के खिलाफ पुरजोर विरोध किया था। साल 1828 में उन्होंने ब्रह्म समाज की स्थापना की थी। राजा राम मोहन राय ने सती प्रथा को खत्म करने के लिए बहुत संघर्ष किया था। वह नारी उत्थान के प्रबल समर्थक थे। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर राजा राम मोहन राय के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>पश्चिम बंगाल में हुगली जिले के राधानगर गांव में 22 मई 1772 को राजा राम मोहन राय का जन्म हुआ था। उन्होंने अपनी शुरूआती शिक्षा गांव से पूरी की। इनके पिता का नाम रामकांत राय वैष्णव था। तीक्ष्ण बुद्धि के कारण राम मोहन राय ने 15 साल की उम्र तक पारसी, अरबी, बांग्ला और संस्कृत सीख ली थी।</div><div><br></div><h2>रूढ़िवादी हिंदू परंपराओं के खिलाफ</h2><div>राजा राम मोहन राय रूढ़िवादी हिंदू परंपराओं के खिलाफ थे। वह सभी तरह की सामाजिक धर्मांधता और अंधविश्वास के खिलाफ थे। लेकिन राजा राम मोहन राय के पिता रूढ़िवादी हिंदू ब्राह्मण थे। इस कारण पिता-पुत्र में मतभेद पैदा हो गया। वहीं राजा राम मोहन राय ने घर छोड़ दिया। वह वाराणसी चले गए और वहां पर उन्होंने उपनिषदों, वेदों और हिंदू दर्शन का अध्ययन किया।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/sher-shah-suri-who-chased-away-mughal-emperor-humayun-died-in-bomb-blast" target="_blank">Sher Shah Suri Death Anniversary: जिसने Mughal Emperor हुमायूं को खदेड़ा, उस Sher Shah Suri की Bomb Blast में हुई थी मौत</a></h3><div>जिसके बाद ईस्ट इंडिया कंपनी के राजस्व विभाग में नौकरी शुरू कर दी। इस दौरान वह पश्चिमी संस्कृति एवं साहित्य़ के संपर्क में आए। इस दौरान उन्होंने जैन विद्वानों से जैन धर्म का अध्ययन किया और मुस्लिमों से सूफीवाद की शिक्षा ली।</div><div><br></div><h2>सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ संघर्ष</h2><div>राजा राम मोहन राय ने समाज की कुरीतियों जैसे सती प्रथा, बाल विवाह के खिलाफ खुल कर संघर्ष किया। उन्होंने गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बेंटिक की सहायता से सती प्रथा के खिलाफ कानून बनवाया था। उनका कहना था कि वेदों में सती प्रथा का कोई स्थान नहीं था। उन्होंने घूम-घूमकर लोगों को समाज में फैली कुरीतियों के खिलाफ जागरुक किया। इसके अलावा राजा राम मोहन राय ने महिलाओं के फिर से शादी करने और संपत्ति में हक समेत महिला अधिकारों के लिए अभियान चलाए।</div><div><br></div><div>वहीं राजा राम मोहन राय ने शिक्षा खासकर स्त्री शिक्षा का पुरजोर समर्थन किया था। उन्होंने विज्ञान, पश्चिमी चिकित्सा एवं प्रौद्योगिकी और अंग्रेजी के अध्ययन पर बल दिया। राजा राम मोहन राय मानते थे कि अंग्रेजी शिक्षा पारंपरिक शिक्षा प्रणाली से बेहतर है। उन्होंने साल 1822 में अंग्रेजी शिक्षा पर आधारित स्कूल की स्थापना की थी।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं नवंबर 1830 में राजा राम मोहन राय ने ब्रिटेन की यात्रा की थी। वहीं 27 सितंबर 1833 को ब्रिस्टल के समीप स्टाप्लेटन में राजा राम मोहन राय का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 22 May 2026 15:40:32 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/raja-ram-mohan-roy-changed-education-system-along-with-practice-of-sati</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Sher Shah Suri Death Anniversary: जिसने Mughal Emperor हुमायूं को खदेड़ा, उस Sher Shah Suri की Bomb Blast में हुई थी मौत]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/sher-shah-suri-who-chased-away-mughal-emperor-humayun-died-in-bomb-blast]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत में सूरी वंश के संस्थापक शेरशाह सूरी की 22 मई को मृत्यु हो गई थी। उन्होंने कई युद्ध लड़े और जीते। शेरशाह सूरी के युद्ध कौशल और बहादुरी के आगे मुगल नहीं टिक पाते थे। बताया जाता है कि पहले शेरशाह सूरी मुगल शासक बाबर के लिए एक सैनिक के रूप में काम करते थे। लेकिन कुछ सालों बाद उन्होंने सूरी वंश की स्थापना की और बाबर के बेटे हुमायूं के परास्त किया था। जिस कारण हुमायूं को भारत छोड़ना पड़ा था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर शेरशाह सूरी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>पंजाब के होशियारपुर शहर में बजवाड़ा नामक स्थान पर 1486 को शेरशाह सूरी का जन्म हुआ था। उनका असली नाम फरीद खां था और उनके दादा इब्राहिम खान सूरी नारनौल क्षेत्र में एक जागीरदार थे। बचपन में शेरशाह को उनकी सौतेली मां बहुत सताती थी, जिस कारण उन्होंने घर छोड़कर जौनपुर से पढ़ाई की थी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/malhar-rao-holkar-king-maker-of-north-india-shepherd-created-golden-history" target="_blank">Malhar Rao Holkar Death Anniversary: North India के 'King Maker' मल्हार राव होलकर, जानें कैसे एक चरवाहे ने रचा था सुनहरा इतिहास</a></h3><h2>ऐसे बने शेरशाह सूरी</h2><div>बताया जाता है कि कम उम्र में फरीद खां ने अकेले एक शेर का शिकार किया था। जिसके बाद उनका नाम शेरशाह पड़ा और सूरी नाम उनके गृहनगर से लिया गया था। जिसके बाद उनको शेरशाह सूरी कहा जाने लगा।</div><div><br></div><h2>बाबर की सेना में सिपाही</h2><div>साल 1518 में शेरशाह सूरी, बाबर के साथ चंदेरी के अभियान में गया था। बाबर की सेना में रहने के दौरान शेरशाह ने हिंदुस्तान की गद्दी पर बैठने का सपना संजो लिया था। बाद में बिहार के एक छोटे सरगना जलाल खां के दरबार में शेरशाह को उपनेता का काम मिल गया। वहीं बाबर के निधन के बाद हुमायूं बंगाल को जीतना चाहता था। जिसके बीच में शेरशाह सूरी का क्षेत्र पड़ता था। ऐसे में हुमायूं ने शेरशाह से लड़ने का मन बना लिया और तब तक बिहार के अलावा बंगाल पर भी सूरी का नियंत्रण हो चुका था।</div><div><br></div><div>साल 1537 में हुमायूं ने बंगाल जीतने के लिए सूरी पर हमला कर दिया। दोनों ओर की सेनाएं चौसा में एक दूसरे के सामने थीं। लड़ाई शुरू होने से पहले शेरशाह ने हुमायूं के पास एक दूत भेजा और उस दूत ने दोनों के बीत समझौता करवा दिया। इस समझौते में यह सुनिश्चित हुआ कि मुगल शासन के झंडे के नीचे बिहार और बंगाल पर शेरशाह सूरी का शासन रहेगा।</div><div><br></div><h2>हुमायूं को हराया</h2><div>वहीं 17 मई 1540 को एक बार फिर हुमायूं और शेरशाह की सेनाएं आमने-सामने आ गईं। हुमायूं की सेना में 40 हजार से ज्यादा सैनिक थे और शेरशाह की सेना में 15 हजार सिपाही थे। एक महीने तक दोनों सेनाएं बिना लड़े एक-दूसरे के आमने-सामने थीं। शेरशाह की सेना पर इसका असर नहीं हुआ, लेकिन हुमायूं की सेना का राशन-पानी खत्म होने लगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>ऐसे में सैनिकों ने बिना लड़े हुमायूं का साथ छोड़ना शुरूकर दिया और देखते-देखते शेरशाह सूरी ने बिना युद्ध के जीत हासिल कर ली। इसके बाद शेरशाह ने हुमायूं को लाहौर खदेड़कर आगरा की सत्ता पर कब्जा कर लिया। आगरा से शेरशाह सूरी ने 5 सालों तक हिंदुस्तान पर शासन किया था।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 1544 में शेरशाह ने कालिंजर के किले पर हमला करने की ठानी। वहीं 22 मई 1545 को उसने किले पर हमला बोल दिया। इस दौरान हमले में एक बम दीवार से टकराया और वापस आकर रखे बमों के ऊपर फट गया। इस कारण शेरशाह लगभग आधा जल गया था। लेकिन उसके आदेश पर हमला जारी रखा गया और अपनी जीत की खबर सुनते ही शेरशाह सूरी ने हमेशा के लिए अपनी आंखें बंद कर लीं।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 22 May 2026 15:34:17 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/sher-shah-suri-who-chased-away-mughal-emperor-humayun-died-in-bomb-blast</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Rajiv Gandhi Death Anniversary: सियासत में नहीं थी दिलचस्पी, जानें कैसे Pilot से PM बने Rajiv Gandhi]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/not-interested-in-politics-know-how-rajiv-gandhi-became-pm-from-pilot]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 21 मई को देश के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या कर दी गई थी। राजीव गांधी न सिर्फ भारत के सबसे युवा प्रधानमंत्री थे, बल्कि वह एक ऐसे दूरदर्शी नेता भी थे, जिन्होंने देश को 21वीं सदी के लिए तैयार करने की नींव भी रखी थी। राजीव गांधी ने देश के विकास, शिक्षा, विज्ञान और तकनीकी क्षेत्र में अहम योगदान दिया था। वह भारतीय राजनीति के एक प्रमुख और प्रभावशाली नेता थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर पूर्व पीएम राजीव गांधी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>मुंबई में 20 अगस्त 1944 को राजीव गांधी का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम फिरोज गांधी और मां का नाम इंदिरा गांधी था। राजीव गांधी की मां इंदिरा गांधी देश के पहली महिला प्रधानमंत्री थीं। वहीं आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू राजीव गांधी के नाना थे। राजीव गांधी ने पहले दून स्कूल से शिक्षा प्राप्त की। फिर उच्च शिक्षा के लिए कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी और इंपीरियल कॉलेज लंदन गए थे।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/fought-first-election-for-rs-50-know-bhairo-singh-shekhawat-journey" target="_blank">Bhairo Singh Shekhawat Death Anniversary: 50 रुपए में लड़ा था पहला Election, जानें Bhairo Singh Shekhawat के 'बाबोसा' बनने का सफर</a></h3><h2>पायलट थे राजीव गांधी</h2><div>बता दें कि राजीव गांधी एक पायलट थे और 05 मई 1967 को उन्होंने इंडियन एयरलाइंस को अप्रैंटिस के तौर पर ज्वाइन किया था। इसके साथ ही राजीव गांधी ने HS748 टाइप एयरक्राफ्ट के कैप्टन के रूप में काम किया था। वहीं साल 1980 में उनको बोइंग कमांडर का लाइसेंस मिल गया था।</div><div><br></div><h2>राजनीति में एंट्री</h2><div>राजीव गांधी प्रोफेशन के तौर पर एक पायलट थे और उनको राजनीति में खास दिलचस्पी नहीं थी। इस कारण उनका राजनीति में आने का कोई इरादा नहीं था। लेकिन राजीव के भाई संजय गांधी की आकस्मिक मृत्यु के बाद इंदिरा गांधी और शंकराचार्य स्वामी श्री स्वरूपानंद राजीव गांधी से मिलने गए। इस मीटिंग में शंकराचार्य स्वामी ने राजीव को राजनीति में आने का सुझाव दिया था। जिसके बाद राजीव गांधी राजनीति में उतरे और उन्होंने अपना पहला चुनाव अमेठी से जीता था।</div><div><br></div><h2>देश के सबसे युवा PM</h2><div>राजीव गांधी देश के सबसे युवा प्रधानमंत्री थे। बता दें कि वह सिर्फ 40 साल की उम्र में प्रधानमंत्री बने थे। इंदिरा गांधी की हत्या के फौरन बाद राजीव गांधी को देश के अगले प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई गई थी।</div><div><br></div><h2>वोटिंग का अधिकार</h2><div>राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री रहते हुए देश के युवाओं की महत्ता को ध्यान में रखते हुए संविधान में संशोधन के तहत वोट डालने की उम्र 21 साल घटाकर 18 साल कर दिया था। इस तरह से देश में रातों-रात 5 करोड़ युवा मतदाता तैयार हो गए। जिसका असर आगे के चुनाव में देखने को मिला था।</div><div><br></div><div>राजीव गांधी देश के एक ऐसे पीएम रहे, जोकि देश में कई नई शुरूआत और बदलाव के लिए जाने जाते हैं। राजीव गांधी ने देश में टेक्नोलॉजी को आगे बढ़ाने का भी काम किया था। अगर कहा जाए कि आज का बदला भारत जो आप महसूस करते हैं, उसकी नींव राजीव गांधी ने रखी थी।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 21 मई 1991 में तमिलनाडु के श्रीपेरंबुदूर में एक चुनावी रैली के दौरान राजीव गांधी की हत्या कर दी गई थी।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 21 May 2026 15:01:51 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/not-interested-in-politics-know-how-rajiv-gandhi-became-pm-from-pilot</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Sumitranandan Pant Birth Anniversary: जिसकी Poetry में बसता है Uttarakhand का सौंदर्य, कौन थे सुमित्रानंदन पंत]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/whose-poetry-reflects-beauty-of-uttarakhand-who-sumitranandan-pant]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदी साहित्य के छायावादी युग के प्रमुख स्तंभ 'प्रकृति के सुकुमार कवि' सुमित्रानंदन पंत का 20 मई को जन्म हुआ था। सुमित्रानंदन पंत हिंदी भाषा के 20वीं सदी के सबसे प्रसिद्ध कवियों में से एक थे। पंत को अपनी कविताओं में प्रेम के लिए जाने जाते थे। उनका झुकाव हमेशा से प्रकृति सौंदर्य की ओर ज्यादा था। यही वजह है कि पंत की कविताएं पढ़कर लोग ख्यालों में ऐसा महसूस करने लगते हैं, जैसे की वह प्रकृति के बेहद करीब हों। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर कवि सुमित्रानंदन पंत के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>उत्तराखंड के कौसानी गांव में 20 मई 1900 को सुमित्रानंदन पंत का जन्म हुआ था। उनके जन्म के 6 घंटे बाद ही उनकी मां का निधन हो गया था। ऐसे में वह अपनी दादी के पास रहते थे। जब सुमित्रानंदन पंत 7 साल के थे, तो उन्होंने कविता लिखना शुरूकर दिया था। वहीं साल 1917 में वह अपने भाई के साथ काशी आ गए और क्वींस कॉलेज से शिक्षा ली। जन्मभूमि के नैसर्गिक सौंदर्य ने पंत के भीतर से कवि को बाहर लाने का काम किया था।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/when-gitanjali-won-nobel-prize-world-acknowledged-power-of-indian-literature" target="_blank">Rabindranath Tagore Birth Anniversary: जब Gitanjali के लिए मिला Nobel Prize, दुनिया ने माना भारतीय साहित्य का लोहा</a></h3><h2>रचनाएं</h2><div>सुमित्रानंदन पंत की रचनाशीलता गति पकड़ती चली गई। साल 1918 के आसपास पंत हिंदी की नवीन धारा के प्रवर्तक के रूप में पहचाने जाने लगे। वहीं साल 1926-27 में सुमित्रानंदन पंत का पहला काव्य संग्रह 'पल्लव' प्रकाशित हुआ था। फिर कुछ समय बाद वह अपने भाई के साथ अल्मोड़ा आ गए। इस दौरान पंत कार्ल मार्क्सऔर फ्रायड की विचारधारा के प्रभाव में आए। वहीं साल 1938 में पंत ने 'रूपाभ' नामक मासिक पत्रिका निकाली।</div><div><br></div><div>इसके अलावा 'पल्लव' और 'वीणा' में संकलित उनके छोटे गीत सुमित्रानंदन पंत के अनूठे सौंदर्यबोध की मिसाल है। पंत के जीवनकाल में उनकी 28 पुस्तकें प्रकाशित हुईं, जिनमें नाटक, कविताएं और निबंध आदि शामिल हैं। वहीं सुमित्रानंदन पंत की सबसे कलात्मक कविताएं 'पल्लव' में ही संकलित हैं।</div><div><br></div><h2>पुरस्कार</h2><div>हिंदी साहित्य में विशेष योगदान के लिए सुमित्रानंदन पंत को साल 1961 में 'पद्मभूषण', साल 1968 में 'ज्ञानपीठ और साहित्य अकादमी' और सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार जैसे सम्मानों से अलंकृत किया गया।</div><div>&nbsp;</div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 28 दिसंबर 1977 को इलाहाबाद में सुमित्रानंदन पंत का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 20 May 2026 14:58:34 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/whose-poetry-reflects-beauty-of-uttarakhand-who-sumitranandan-pant</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Malhar Rao Holkar Death Anniversary: North India के 'King Maker' मल्हार राव होलकर, जानें कैसे एक चरवाहे ने रचा था सुनहरा इतिहास]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/malhar-rao-holkar-king-maker-of-north-india-shepherd-created-golden-history]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>होल्कर राजवंश के संस्थापक और महान मराठा सूबेदार मल्हार राव होलकर का निधन 20 मई को निधन हो गया था। मल्हार राव होलकर ने फर्श से अर्श तक का सफर अपनी मेहनत और काबिलियत के दम पर तय किया था। होलकर गैर सैनिक परिवार से आते थे, इसके बाद भी उन्होंने अपने साहस के दम पर एक राजवंश की स्थापना की, जोकि मराठा साम्राज्य को महाराष्ट्र के बाहर ले गया।</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>पुणे के होलगांव में 16 मार्च 1693 को मल्हार राव होलकर का जन्म हुआ था। वह चरवाहों के परिवार से ताल्लुक रखते थे। वह ऐसे समय में पैदा हुए थे, जब वह अपने साहस के बल पर आगे बढ़ने के रास्तों में कोई रोक-टोक नहीं थी। जल्द ही मल्हार राव होलकर खानदेश के एक सरदार कदम बांदे के पास किराए के सैनिक के रूप में काम करने लगे। लेकिन 1721 में कदम बांदे से मोहभंग होने के बाद होलकर बाजीराव पेशवा की सेना से जुड़ गए।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/sambhaji-maharaj-not-warrior-also-scholar-of-sanskrit-he-written-budhacharitra" target="_blank">Sambhaji Birth Anniversary: योद्धा ही नहीं, संस्कृत के ज्ञाता भी थे संभाजी महाराज, रची थी 'Budhacharitra'</a></h3><h2>पेशवा के करीबी</h2><div>होलकर जल्द ही पेशवा के करीबी हो गए। उनको 500 सैनिकों का दस्ता दिया गया। वहीं 1728 में हैदराबाद के निजाम के साथ मराठों की लड़ाई में मल्हार राव होलकर की अहम भूमिका रही। उन्होंने अपनी छोटी सी टुकड़ी के दम पर निजाम को मिलने वाली मुगल की रसद को रोक दिया। जिस कारण निजाम को हराने में पेशवा को मदद मिली। इससे पेशवा, मल्हार राव से काफी प्रभावित हुए और उनको पश्चिमी मालवा का बड़ा इलाका सौंप दिया और कई हजार घुड़सवार उनके अंडर में दे दिए।</div><div><br></div><h2>कई लड़ाइयों में हिस्सेदारी</h2><div>1737 में दिल्ली में हुई जंग हो या फिर 1738 में भोपाल में निजाम को हराना। मल्हार राव का इनमें पूरा-पूरा योगदान रहा। यहां तक कि होलकर ने पुर्तगालियों से भी लड़ाइयां जीती थीं। 1748 आते-आते होलकर की स्थिति मालवा में बेहद मजबूत हो चुकी थी। उनको उत्तरी और मध्य भारत का 'किंग मेकर' कहा जाने लगा। इंदौर की रियासत होलकर के अधीन कर दी गई। वह हमेशा मराठा साम्राज्य के लिए जंग लड़ते रहे।&nbsp;</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 20 मई 1766 को मल्हार राव होलकर की आलमपुर में मृत्यु हो गई थी।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 20 May 2026 14:53:49 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/malhar-rao-holkar-king-maker-of-north-india-shepherd-created-golden-history</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Christopher Columbus Death Anniversary: खोज India की, मिला America... जानें Christopher Columbus के 'New World' की कहानी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/discovered-india-found-america-know-story-of-christopher-columbus-new-world]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 20 मई को क्रिस्टोफर कोलंबस का निधन हो गया था। क्रिस्टोफर कोलंबस ने अमेरिका की खोज की थी। वह अक्तूबर 1492 में समुद्र के रास्ते होते हुए अमेरिका पहुंचे थे। लेकिन कोलंबस के जन्म स्थान को लेकर विवाद रहा है। कई लोगों का मानना है कि कोलंबर पुर्तगाली थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर क्रिस्टोफर कोलंबस के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>क्रिस्टोफर कोलंबस का जन्म 1451 में हुआ था। कोलंबस के पिता एक जुलाहे थे, इस कारण उनको बचपन से ही समुद्री यात्राओं का शौक हो गया था। वहीं बड़े होने के बाद वह अपने पिता के काम में हाथ बंटाने लगे। उस दौरान भारत और एशिया से सुदूर यूरोप तक खूब व्यापार होता था।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/from-opium-trade-to-tata-empire-learn-story-of-father-of-industry" target="_blank">Jamshedji Tata Death Anniversary: अफीम ट्रेड से Tata Empire तक, जानें 'Father of Industry' की कहानी</a></h3><h2>अमेरिका की खोज</h2><div>वहीं 1492 में स्पेन से क्रिस्टोफर कोलंबस पूर्वी एशिया यानी भारत, चीन और जापान तक पहुंचने का आसान रास्ता खोजने के लिए जलमार्ग से रवाना हुए थे। लेकिन वह पश्चिम दिशा में यात्रा करते-करते पश्चिमी द्वीप समूह में पहुंच गए। लंबे समय तक अटलांटिक महासागर में नौकायन करने के बाद 1492 में कोलंबस ने एक नई दुनिया अमेरिका की खोज की। इससे पहले दुनिया में अमेरिका की कोई खास पहचान नहीं थी।</div><div><br></div><div>बता दें कि अपने जीवनकाल के दौरान कोलंबस ने 'नई दुनिया' के लिए 4 अभियानों का नेतृत्व किया था। जिनमें विभिन्न कैरिबियाई द्वीपों, दक्षिण और मध्य अमेरिकी मुख्य भूमि और मैक्सिको की खाड़ी की खोज की। लेकिन कोलंबस अपने मूल लक्ष्य एशिया के महान शहरों के लिए पश्चिमी महासागर मार्ग को पूरा नहीं कर सके।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>जीवन के आखिरी वर्षों में कोलंबस को राजनीतिक और प्रशासनिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। वहीं खराब सेहत के कारण 20 मई 1506 को स्पेन के वलाडोलिड में क्रिस्टोफर कोलंबस का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 20 May 2026 14:47:20 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/discovered-india-found-america-know-story-of-christopher-columbus-new-world</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Jamshedji Tata Death Anniversary: अफीम ट्रेड से Tata Empire तक, जानें 'Father of Industry' की कहानी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/from-opium-trade-to-tata-empire-learn-story-of-father-of-industry]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 19 मई को जमशेदजी टाटा का निधन हो गया था। जमशेदजी टाटा को भारतीय उद्योगों का पिता कहा जाता है। कभी जीवन के हालात उनके अनुकूल नहीं थे। ऐसे में उन्होंने परिस्थितियों से आगे जाकर सोचा और ऐसे काम करने और उपलब्धियां हासिल करने की ठानी, जोकि किसी के लिए सोचना मुश्किल होता है। जमशेदजी टाटा ने जिन भी काम में हाथ डाला, उससे सोना निकाल लिया। इसके अलावा जमशेदजी टाटा अपने जमाने के दुनिया के सबसे बड़े दानवीर माने जाते हैं। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर जमशेदजी टाटा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>गुजरात के नवासी में 03 मार्च 1839 को जमशेदजी टाटा का जन्म हुआ था। उनके पिता का नाम नौशरवांजी पारसी था, जोकि पादरियों के वंश में पहले व्यापारी थे। महज 14 साल की उम्र में ही जमशेदजी टाटा ने अपने पिता के व्यवसाय में हाथ बंटाना शुरूकर दिया था। साल 1858 में जमशेदजी ने एल्फिस्टन कॉलेज में स्नातक की पढ़ाई की। उन्होंने पढ़ाई पूरी करने के बाद वह पूरी तरह से व्यवयास से जुड़ गए।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/first-field-marshal-whose-roar-made-pakistan-tremble-know-untold-story" target="_blank">KM Cariappa Death Anniversary: पहले Field Marshal जिनकी हुंकार से कांपता था Pakistan, जानें KM Cariappa की अनसुनी कहानी</a></h3><h2>अफीम का व्यवसाय</h2><div>जमशेदजी टाटा के पिता की निर्यात कंपनी की शाखाएं चीन, यूरोप, जापान और अमेरिका में थीं। साल 1857 के विद्रोह की स्थितियों की वजह से उस समय व्यवसाय चलाना मुश्किल था। नुसेरवानजी टाटा नियमित रूप से चीन जाया करते थे और अफीम का व्यवसाय करते थे। उनके पिता ने जमशेदजी टाटा को चीन भेजा, ताकि वह अफीम के बिजनेस की बारीकियां सीख सकें। जब वह चीन गए तो देखा कि कपड़े के व्यवसाय में भविष्य है। 29 साल की उम्र तो जमशेदजी ने अपने पिता के व्यवसाय में काम किया। फिर साल 1868 में उन्होंने 21 हजार रुपए से एक व्यवसाय खोला।</div><div><br></div><h2>उम्मीद के विपरीत मिली सफलता</h2><div>जमशेदजी टाटा ने चिंचपोकली में दिवालिया तेल के कारखाने को खरीदा और इस फैक्टी को रुई की फैक्ट्री में बदल दिया। दो साल बाद इस फैक्ट्री को मुनाफे में बेच दिया। इसके बाद जमशेदजी ने नागपुर में रुई का कारखाना खोला और वहीं कपड़े का भी कारखाना खोला। लोगों को हैरानी हुई कि मुंबई जैसी जगह को छोड़कर उन्होंने नागपुर क्यों चुना। लेकिन इसमें भी उनको सफलता मिली और साल 1877 में उन्होंने नागपुर में एक मिल और खोल ली।</div><div><br></div><h2>जमशेदजी के जीवन के चार लक्ष्य</h2><div>जमशेदजी टाटा के जीवन के चार लक्ष्य थे। वह एक स्टील कंपनी खोलना चाहते थे, एक विश्वस्तरीय प्रशिक्षण संस्थान, एक खास तरह का होटल और एक हाइ़ड्रोइलेक्ट्रिक संयंत्र खोलना चाहते थे। लेकिन जमशेदजी टाटा अपने जीवन में सिर्फ होटल खोलने का सपना पूरा कर सके। 03 दिसंबर 1903 को जब मुंबई में ताज होटल खुला, तो उस समय वह भारत का एकमात्र ऐसा होटल था, जहां पर बिजली थी। बाकी के सपने उनके वंशजों ने पूरे किए थे।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 19 मई 1904 को जमशेदजी टाटा ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 19 May 2026 13:53:11 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/from-opium-trade-to-tata-empire-learn-story-of-father-of-industry</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Nathuram Godse Birth Anniversary: देश का बंटवारा बना असली वजह? Nathuram Godse ने क्यों Mahatma Gandhi के सीने में दागी थीं 3 गोलियां]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/partition-of-country-became-real-reason-why-nathuram-godse-fire-mahatma-gandhi]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पत्रकार, हिंदू राष्ट्रवादी और महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे का 19 मई को जन्म हुआ था। नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी की गोली मारकर हत्याकर दी थी। दरअसल, गोडसे महात्मा गांधी को हिंदुओं की बर्बादी का कारण मानते थे। माना जाता था कि गोडसे धर्म के आधार पर देश का बंटवारा नहीं चाहते थे। इस कारण वह गांधी जी से नफरत करने लगे थे। वहीं महात्मा गांधी की हत्या करने के बाद नाथूराम ने खुद पर गर्व होने की बात कही थी। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर नाथूराम गोडसे के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>महाराष्ट्र के बारामती के एक ब्राह्मण परिवार में 19 मई 1910 को नाथूराम गोडसे का जन्म हुआ था। नाथूराम के जन्म से पहले उनके तीन भाइयों की मृत्यु हो चुकी थी। ऐसे में परिवार ने समझा कि ऐसा किसी श्राप की वजह से हो रहा है। ऐसे में उन्होंने नाथूराम के जन्म के बाद उसकी नाक छिदवाकर उसमें नथ पहना दी और उसको लड़की की तरह कपड़े पहनाने लगे। बाद में एक और बेटे के जन्म के बाद उसका नाम नाथूराम रख दिया गया।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/fought-first-election-for-rs-50-know-bhairo-singh-shekhawat-journey" target="_blank">Bhairo Singh Shekhawat Death Anniversary: 50 रुपए में लड़ा था पहला Election, जानें Bhairo Singh Shekhawat के 'बाबोसा' बनने का सफर</a></h3><h2>कांग्रेस सभाओं में देते थे भाषण</h2><div>देश के अलग-अलग राज्यों में जाकर महात्मा गांधी छात्रों, महिलाओं और आम लोगों के बीच भाषण देते और खादी अपनाने और कांग्रेस में शामिल होने को कहते। महात्मा गांधी की इस यात्रा की वजह से लोग कांग्रेस से जुड़ने लगे। वहीं नाथूराम के पिता डाक विभाग में थे, उनको पोस्टिंग रत्नागिरी में होने से नाथूराम गोडसे कांग्रेस के नेताओं से मिलाकर सभाओं में जाने लगे। कांग्रेस की सभाओं में नाथूराम भी भाषण देने लगे।</div><div><br></div><h2>वीर सावरकर से मुलाकात</h2><div>रत्नागिरी में गोडसे की मुलाकात वीर सावरकर से हुई। इस मुलाकात के बाद गोडसे की विचारधारा में परिवर्तन आने लगा और वह हिंदुत्व की राह पर चलने लगा। वीर सावरकर इस दौरान काला पानी की सजा काटकर लौटे थे। सावरकर हिंदुत्व के सिद्धांत के अनुसार भाषण देते थे। गोडसे इन भाषणों से प्रभावित था और उन्होंने कांग्रेस की सभाओं से दूरी बनाना शुरूकर दिया।</div><div><br></div><h2>RSS से जुड़ाव</h2><div>सावरकर के विचारों से प्रभावित होकर गोडसे RSS से जुड़ा था। साल 1937 में जब सावरकर हिंदू महासभा के अध्यक्ष बने तो गोडसे भी इससे जुड़ गया। गोडसे के RSS नेताओं से जान-पहचान होने लगी। साल 1942 में विश्व युद्ध की आहट के बीच RSS पर कई तरह की पाबंदी लगी थी। इसी के चलते गोडसे ने अपना एक नया संगठन हिंदू राष्ट्र दल बना लिया। जिसको RSS और हिंदू महासभा दोनों का समर्थन मिला। इसी संगठन में नाथूराम गोडसे की मुलाकात नारायण दत्तात्रेय आप्टे से हुई, जोकि गांधी हत्या में शामिल था।</div><div><br></div><h2>बंटवारा बनी वजह</h2><div>महात्मा गांधी की हत्या के पीछे का कारण देश का बंटवारा माना जाता है। नाथूराम गोडसे नहीं चाहते थे कि धर्म के आधार पर देश को बांटा जाए। यह सब देखकर गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्या की प्लानिंग की। जिसके बाद गोडसे ने दत्तात्रेय आप्टे, विष्णु करकरे और मदन लाल पहवा के साथ मिलकर गांधी को मारने की सोचा। 20 जनवरी 1948 को पहवा ने प्रार्थना सभा में विस्फोट किया, लेकिन एक महिला ने पहवा को देख लिया और वह गिरफ्तार हो गया।</div><div><br></div><div>साथी की गिरफ्तारी के बाद भी गोडसे ने नफरत की आग को बुझाने के लिए 30 जनवरी 1948 को दिल्ली के बिड़ला भवन में महात्मा गांधी के सीने में तीन गोलियां मारी। जिसके बाद गोडसे को पकड़ लिया गया और 15 नवंबर 1949 को नाथूराम गोडसे को फांसी दी गई।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 19 May 2026 13:43:53 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/partition-of-country-became-real-reason-why-nathuram-godse-fire-mahatma-gandhi</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Bhairo Singh Shekhawat Death Anniversary: 50 रुपए में लड़ा था पहला Election, जानें Bhairo Singh Shekhawat के 'बाबोसा' बनने का सफर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/fought-first-election-for-rs-50-know-bhairo-singh-shekhawat-journey]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>राजनीति के दबंग नेता माने जाने वाले देश के पूर्व उपराष्ट्रपति और तीन बार राजस्थान के सीएम रहे भैरोसिंह शेखावत का 15 मई को निधन हो गया था। बता दें कि शेखावत का जीवन संघर्ष से सफलता की मिसाल था। उन्होंने राजनीति में 'बाबोसा' या 'ठाकर साहब' के नाम से अपनी अलग पहचान बनाई थी। भैरोसिंह शेखावत उन तमाम दिग्गज नेताओं की फेहरिस्त में शामिल हैं, जिनकी भूमिका को शायद ही नजरअंदाज किया जा सके। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर भैरोसिंह शेखावत के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>तत्कालीन जयपुर रियासत के गांव खाचरियावास में 23 अक्तूबर 1923 को भैरोंसिंह का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम देवी सिंह शेखावत था और मां का नाम बने कुंवर था। शुरूआती शिक्षा गांव से पूरी करने के बाद उन्होंने हाई स्कूल के लिए जोबनेर जाने की कठिन डगर तय की।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/first-field-marshal-whose-roar-made-pakistan-tremble-know-untold-story" target="_blank">KM Cariappa Death Anniversary: पहले Field Marshal जिनकी हुंकार से कांपता था Pakistan, जानें KM Cariappa की अनसुनी कहानी</a></h3><h2>नियति ने किया खिलवाड़</h2><div>हाईस्कूल पूरा करने के बाद उन्होंने जयपुर के महाराजा कॉलेज में प्रवेश लिया। इस दौरान उनके पिता का निधन हो गया और परिवार के 8 सदस्यों के भरण-पोषण का भार उनके कंधों पर आ गया। ऐसे में भैरोंसिंह ने खेत में हल थाम लिया। वहीं उनको पुलिस में भी नौकरी मिली, लेकिन इस नौकरी में भैरोंसिंह का मन नहीं लगा और वह फिर खेती की तरफ लौट आए।</div><div><br></div><h2>चुनाव लड़ने के लिए नहीं थे रुपए</h2><div>इसी बीच जन संघ के सक्रिय सदस्य रहने पर साल 1952 में भैरोंसिंह को दांतारामगढ़ से विधानसभा चुनाव लड़ने का मौका मिला। इस मौके को भुनाते हुए भैरोंसिंह ने पहला चुनाव जीता और इस तरह से उन्होंने राजनीति के पायदान पर पहला सफल कदम रखा। इस चुनाव को लड़ने के लिए भैरोंसिंह के पास रुपए नहीं थे। उन्होंने जब यह परेशानी तत्कालीन जनसंघ के नेताओं के सामने रखी, तो किशन सिंह हाजरिका ने चुनावी मदद के रूप में 50 रुपए दिए थे। तब भैरोंसिंह ने किशन सिंह सेठ की पदवी दी थी।</div><div><br></div><h2>राजनीति में जमाई पैठ</h2><div>इसके बाद भैरोंसिंह राजनीति की बुलंदियों की ओर जाती हुए हर सीढ़ी को पार करते चले गए। दांतारामगढ़ के अलावा श्रीमाधोपुर, जयपुर की किशनपोल, आमेर, छबड़ा, धौलपुर व बाली विधानसभा क्षेत्र से कुल 10 बार विधायक बने। वहीं साल 1977, 1990 और 1993 में तीन बार राजस्थान के मुख्यमंत्री बने। इसी बीच वह जनसंघ के प्रदेशाध्यक्ष व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, राज्यसभा सदस्य और विधानसभा नेता प्रतिपक्ष भी रहे। वहीं साल 2002 में भैरोंसिंह शेखावत देश के 11वें उपराष्ट्रपति निर्वाचित हुए।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 15 मई 2010 को भैरोंसिंह शेखावत का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 15 May 2026 13:32:33 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/fought-first-election-for-rs-50-know-bhairo-singh-shekhawat-journey</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[KM Cariappa Death Anniversary: पहले Field Marshal जिनकी हुंकार से कांपता था Pakistan, जानें KM Cariappa की अनसुनी कहानी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/first-field-marshal-whose-roar-made-pakistan-tremble-know-untold-story]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत के पहले फील्ड मार्शल केएम करियप्पा का 15 मई को निधन हो गया था। वह सेना प्रमुख होने के साथ-साथ भारतीय सेना के पहले फाइव स्टार रैंक के अधिकारी भी थी। करियप्पा ने भारतीय सेना में 30 साल रहकर देश सेवा की और साल 1953 में रिटायर हो गए थे। वहीं रिटायरमेंट के बाद भी फील्ड मार्शल करियप्पा किसी न किसी रूप में भारती सेना में अपना योगदान देते रहे हैं। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर भारत के पहले फील्ड मार्शल केएम करियप्पा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और शिक्षा</h2><div>कर्नाटक में 28 जनवरी 1899 को केएम करियप्पा का जन्म हुआ था। करियप्पा ने अपनी शुरूआती शिक्षा माडिकेरी सेंट्रल हाई स्कूल से हुई थी। पढ़ाई पूरी करने के बाद वह इंदौर स्थित आर्मी ट्रेनिंग स्कूल के लिए सेलेक्ट हो गए। आर्मी ट्रेनिंग स्कूल से अपनी ट्रेनिंग पूरी करने के बाद उनको साल 1919 में सेना में कमीशन मिला और वह भारतीय सेना में सेकेंड लेफ्टिनेंट के रूप में तैनाती मिली।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/album-exodus-made-him-global-star-learn-untold-story-of-reggae-king-struggle" target="_blank">Bob Marley Death Anniversary: 'Exodus' Album से बने थे Global Star, जानिए Reggae किंग के संघर्ष की अनसुनी कहानी</a></h3><div>&nbsp;</div><h2>भारत के सेना प्रमुख</h2><div>वहीं 15 जनवरी 1949 को केएम करियप्पा को भारत का सेना प्रमुख नियुक्त किया गया। इसी दिन भारतीय अधिकारी को कमांडर इन चीफ का पद मिला। ब्रिटिश शासन ने 15 जनवरी 1949 को पहली बार भारतीय सेना को कमान सौंपी थी। करियप्पा ने जनरल सर फ्रांसिस बुचर का स्थान लिया था। उन्होंने भारतीय सेना के कमांडर इन चीफ के रूप में पद ग्रहण किया।</div><div><br></div><h2>फील्ड मार्शल का पद</h2><div>साल 1953 में केएम करियप्पा सेना से रिटायर हो गए। जिसके बाद उनको न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया में राजदूत बनाया गया। उन्होंने अपने अनुभव की वजह से कई देशों की सेनाओं के पुनर्गठन में भी मदद की। साल 1986 में भारत सरकार ने उनको 'फील्ड मार्शल' का पद दिया। रिटायरमेंट के बाद वह कर्नाटक के कोडागू जिले के मदिकेरी में बस गए थे। वहीं केएम करियप्पा को मेन्शंड इन डिस्पैचेस, ऑर्डर ऑफ ब्रिटिश एम्पायर और लीजियन ऑफ मेरिट जैसे अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित किया गया।</div><div><br></div><h2>पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति के बॉस थे करियप्पा</h2><div>बंटवारे से पहले फील्ड मार्शल केएम करिअप्पा पाकिस्तान के पूर्व सेना प्रमुख और राष्ट्रपति जनरल अयूब खान के भी बॉस रह थे। अयूब खान ने सेना में रहते हुए जनरल करियप्पा के साथ काम किया था। साल 1965 में भारत-पाक युद्ध के दौरान जनरल करियप्पा सेना से रिटायर हो गए। थे। वहीं उनका बेटा केसी नंदा करियप्पा इस दौरान एयरफोर्स में सेवा देते हुए पाक सेना पर कहर बरपा रहे थे। तभी वह गलती से दुश्मन देश की सीमा में प्रवेश कर गए और केसी नंदा करियप्पा का विमान पाकिस्तानी सेना की गोलियों का शिकार हो गया।</div><div><br></div><div>जिसके बाद उनको पाक सेना ने कब्जे में लिया। लेकिन जब पाकिस्तानी सेना को पता चला कि वह रिटायर्ड जनरल केएम करियप्पा के बेटे हैं, तो खलबली मच गई। वहीं इस बाद की जानकारी राष्ट्रपति अयूब खान को दी गई। तो उन्होंने पाक उच्चायुक्त को पूर्व सेना प्रमुख करियप्पा से बात करने को कहा। करियप्पा से बात करने पर जब उनके बेटे को छोड़ने की पेशकश की गई, तो केएम करियप्पा ने कहा कि पाकिस्तान में बंद हर भारतीय जवान उनका बेटा है और छोड़ना है तो सबको छोड़ो। वहीं बाद में केएम करियप्पा के बेटे को छोड़ दिया गया था।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 15 मई 1993 को 94 साल की उम्र में केएम करियप्पा का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 15 May 2026 13:29:16 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/first-field-marshal-whose-roar-made-pakistan-tremble-know-untold-story</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Sambhaji Birth Anniversary: योद्धा ही नहीं, संस्कृत के ज्ञाता भी थे संभाजी महाराज, रची थी 'Budhacharitra']]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/sambhaji-maharaj-not-warrior-also-scholar-of-sanskrit-he-written-budhacharitra]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>वीर शिवाजी के ज्येष्ठ पुत्र छत्रपति संभाजी महाराज का 14 मई को जन्म हुआ था। वह अपने पिताजी जैसे ही वीर योद्धा थे और उन्होंने अपना पूरा जीवन देश को समर्पित कर दिया था। आज भी संभाजी महाराज की वीरता की कहानियां सुनी और पढ़ी जाती हैं। वह बचपन से ही राजनीति के ज्ञाता रहे और कई मौकों पर उन्होंने अपनी कुशलता का भी परिचय दिया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर संभाजी महाराज के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>महाराष्ट्र स्थित पुरन्दर के किले में 14 मई 1657 को छत्रपति संभाजी महाराज का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम छत्रपति शिवाजी महाराज और मां का नाम सईबाई था। इनके दादा शाहजी भोसले और दादी जीजाबाई था। वहीं संभाजी महाराजा की पत्नी का नाम येसूबाई था। संभाजी के जन्म के कुछ समय बाद ही उनकी मां का निधन हो गया था। जिसके बाद उनका पालन-पोषण दादी ने किया था।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/maharana-pratap-made-life-difficult-for-mughals-even-akbar-not-break-pride" target="_blank">Maharana Pratap Birth Anniversary: जब Maharana Pratap ने मुगलों की नाक में किया दम, अकबर भी नहीं तोड़ सका था गुरूर</a></h3><h2>गद्दी के लिए संघर्ष</h2><div>बताया जाता है कि संभाजी की सौतेली मां अपने बेटे राजाराम को राजा बनाना चाहती थीं। इसलिए वह संभाजी के प्रति शिवाजी के मन में घृणा जागृत करती थी। इससे शिवाजी और संभाजी के बीच अविश्वास की स्थिति बनी रही। एक बार किसी कारणवश शिवाजी ने उनको कारावास में डाल लिया था। लेकिन संभाजी वहां से भाग निकलने में कामयाब हुए। इसके बाद संभाजी मुगलों से जा मिले, लेकिन मुगलों का हिंदुओं के प्रति क्रूर स्वभाव देखते हुए वह वापस अपने राज को लौट आए। जब संभाजी औरंगजेब के कारावास से भाग रहे थे, तो उस दौरान उनकी मुलाकात ब्राह्मण कवि कलश से हुई थी, जोकि आगे जाकर संभाजी के सलाहकार बने थे।</div><div><br></div><h2>बुधाचरित्र की रचना</h2><div>संभाजी महाराज का साहित्य के प्रति भी रुझान था। इन्होंने कई साहित्यिक रचनाएं की थीं, जोकि आज भी प्रासंगिक हैं। संभाजी महाराज ने अपने पिता के सम्मान में संस्कृत भाषा में बुधाचरित्र की रचना की।</div><div><br></div><h2>पुरन्दर की संधि</h2><div>बता दें कि 1655 में मराठों और मुगलों के बीच पुरन्दर की संधि हुई थी। जिसके बाद 03 अप्रैल 1680 को शिवाजी की मृत्यु हो गई थी। उसके बाद संभाजी महाराज बने और उन्होंने अपने पिता के सहयोगियों को पद से बर्खास्त कर नए मंत्रिमंडल का गठन किया था। वहीं संभाजी ने कवि कलश को अपना सलाहकार नियुक्त किया था, जोकि मथुरा के रहने वाले थे। कवि कलश को मराठी भाषा का ज्ञान नहीं था। इसको शिवाजी के सहयोगियों ने अपमान समझकर संभाजी के खिलाफ आंतरिक विद्रोह का बिगुल फूंक दिया।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>इसी विद्रोह के कारण संभाजी मुगलों से लड़ाई में हार गए थे, जिसके बाद उनको बंदी बना लिया गया था। इस दौरान संभाजी को गंभीर मानसिक और शारीरिक यातनाएं दी गई थी। लेकिन संभाजी ने मरते दम तक हार नहीं मानी और मुगलों के सामने कभी नहीं झुके। वहीं 11 मार्च 1989 को संभाजी महाराज की मृत्यु हो गई थी।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 14 May 2026 14:47:42 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/sambhaji-maharaj-not-warrior-also-scholar-of-sanskrit-he-written-budhacharitra</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Bob Marley Death Anniversary: 'Exodus' Album से बने थे Global Star, जानिए Reggae किंग के संघर्ष की अनसुनी कहानी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/album-exodus-made-him-global-star-learn-untold-story-of-reggae-king-struggle]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 11 मई को जमैका के मशहूर गायक और संगीतकार बॉब मार्ले का निधन हो गया था। उनकी लोकप्रियता भारत में भी काफी देखने को मिलती है। बॉब मार्ले को लंबे संघर्ष के बाद सफलता मिली थी। उन्होंने अपने शांति संदेश से भरे गानों से पूरी दुनिया में नाम कमाया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर सिंगर बॉब मार्ले के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>जमैका में 06 फरवरी 1945 को बॉब मार्ले का जन्म हुआ था। इनके माता-पिता ने बॉब मार्ले का नाम नेस्टा रॉबर्ट मार्ले रखा था, लेकिन पासपोर्ट में एक गलती के कारण उनका नाम रॉबर्ट नेस्टा मार्ले हो गया था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/french-emperor-who-gave-civil-code-died-painful-death-after-defeat-at-waterloo" target="_blank">Napoleon Bonaparte Death Anniversary: France का सम्राट जिसने दिया Civil Code, Waterloo की हार के बाद हुई थी दर्दनाक मौत</a></h3><h2>सिंगिंग करियर</h2><div>बता दें कि बॉब मार्ले ने साल 1963 में अपने करियर की शुरूआत 'द वेलर्स' ग्रुप के साथ की थी। वहीं काफी लंबे संघर्ष के बाद साल 1977 में मार्ले का सोलो एल्बम 'एक्सोडस' रिलीज हुआ। इस एल्बम ने सफलता के सारे रिकॉर्ड तोड़ डाले। इसकी कुल 7.5 करोड़ प्रतियां बिक चुकी हैं।</div><div><br></div><div>बॉब मार्ले ने अपने गानों के जरिए दुनिया की समस्याओं को उजागर किया। उनके गाने सुनने वाले लोग मार्ले के रहन-सहन और बातों से जुड़ाव महसूस करते थे। फैंस का मानना था कि सिंगर के म्यूजिक में जादू है और चाह कर भी इससे दूर नहीं जाया जा सकता है।</div><div><br></div><div>सिंगर बॉब और उनके बैंड 'Wailers' के आने के बाद Reggae म्यूजिक को दुनियाभर में सुना जाने लगा। पहले सिर्फ जमैका में Reggae म्यूजिक पसंद किया जाता था। वहीं किंग्सटन में बॉब को व्हाइट बॉय के नाम से जाना जाता था।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>बॉब मार्ले एक धार्मिक व्यक्ति थे और साल 1977 में उनको फुटबॉल खेलने के दौरान चोट लग गई थी। जिसके बाद डॉक्टर ने उनको पैर कटवा लेने की सलाह दी थी। लेकिन धॉर्मिक चीजों के बारे में सोचते हुए बॉब ने ऐसा कराने से मना कर दिया। जिसके बाद ट्यूमर इतना ज्यादा फैल गया कि 11 मई 1981 को बॉब मार्ले की जान चली गई।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 11 May 2026 13:15:43 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Maharana Pratap Birth Anniversary: जब Maharana Pratap ने मुगलों की नाक में किया दम, अकबर भी नहीं तोड़ सका था गुरूर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/maharana-pratap-made-life-difficult-for-mughals-even-akbar-not-break-pride]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 09 मई को महाराणा प्रताप का जन्म हुआ था। उन्होंने राजस्थान में राजपूतों की शान को ऐसी ऊंचाई दी, जिसकी मिसाल पूरी दुनिया में नहीं मिलती है। मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप ने कभी भी गुलामी स्वीकार नहीं की थी। महाराणा प्रताप ने अपने समकालीन मुगल शासक अकबर से लोहा लेकर पूरी दुनिया को दिखा दिया था कि वह महाराणा क्यों कहे जाते हैं। उन्होंने कभी भी मुगलों के किसी भी तरह के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर महाराणा प्रताप के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>मेवाड़ के कुंभलगढ़ में 09 मई 1540 को महाराणा प्रताप का जन्म हुआ था। उनके पिता का नाम उदय सिंह द्वितीय और मां का नाम महारानी जयवंता बाई था। महाराणा प्रताप एक महावीर और युद्ध रणनीति में दक्ष थे।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/became-guru-at-age-of-73-he-launched-biggest-attack-on-sati-and-casteism" target="_blank">Guru Amardas Birth Anniversary: 73 की उम्र में बने Guru, Sati प्रथा-जातिवाद पर किया था सबसे बड़ा प्रहार</a></h3><h2>गद्दी के लिए विरोध</h2><div>महाराणा प्रताप ने मुगलों के बार बार हुए हमलों से मेवाड़ की रक्षा की और अपने आन बान के लिए कभी मुगलों से समझौता नहीं किया। उनको अपने पिता की गद्दी पाने के लिए अपनी सौतेली मां रानी धीरबाई के विरोध का सामना करना पड़ा था। रानी धीरबाई चाहती थीं कि उनके बेटे कुंवर जगमाल को मिले, लेकिन राज्य के मंत्री और दरबारी चाहते थे कि राणा प्रताप उनके राजा बनें। ऐसे में कुंवर जगमाल ने मेवाड़ छोड़ दिया और अकबर के संपर्क में आए। अकबर ने जगमाल को जहाजपुर की जागीर उपहार स्वरूप दे दी।</div><div><br></div><h2>ताकतवर योद्धा थे महाराणा प्रताप</h2><div>महाराणा प्रताप भारत के सबसे ताकतवर योद्धा थे। उनका कद 7 फुट 5 इंच था और वह अपने साथ 80 किलो का भाला और दो तलवारें रखते थे। जिनका वजन करीब 208 किलो होता था। महाराणा का कवच 72 किलो का था। बताया जाता है कि राणा प्रताप की तलवार के एक वार से घोड़े के दो टुकड़े हो जाते थे।</div><div><br></div><h2>अकबर के छह प्रस्ताव</h2><div>प्रताप की ताकत का अंदाजा लोगों और राजपूतों को 18 जून 1576 में हल्की घाटी के युद्ध में हुआ था। इससे पहले मुगल शासक अकबर ने प्रताप के पास 6 प्रस्ताव भेजे, लेकिन प्रताप ने अकबर की अधीनता में मेवाड़ के शासन को स्वीकार नहीं किया। जिसके बाद अकबर ने मानसिंह और असफ खान को प्रताप से युद्ध के लिए भेजा और साथ में एक विशाल सेना भेजी। प्रताप और अकबर की सेनाएं उदयपुर से करीब 40 किमी दूर हल्दीघाटी में मिलीं।&nbsp;</div><div><br></div><div>भले ही इस युद्ध में मुगलों की जीत हुई, लेकिन वास्तव में वह जीत किसी की नहीं मानी गई। वहीं राणा प्रताप ने मुगलों की नाक में दम कर दिया था। मुगल इस युद्ध में प्रताप और उनके परिवार को नुकसान नहीं पहुंचा सके थे। महाराणा प्रताप अपने घोड़े चेतक की मौत और खुद भी घायल होने के बाद मैदान से बचकर निकलने में सफल रहे।</div><div><br></div><div>हालांकि हल्दीघाटी के युद्ध के बाद महाराणा प्रताप का जीवन संघर्षमय रहा। उन्होंने सेना एकत्र कर छापामार रणनीति अपनाई और दुश्मनों को चैन नहीं रहने दिया। उनकी यह रणनीति सफल रही और इस दौरान उनको भामाशाह की मदद मिली। देवगढ़ के युद्ध में महाराणा प्रताप ने मेवाड़ का अधिकतर हिस्सा हासिल कर लिया, लेकिन वह चित्तौड़ नहीं हासिल कर सके। वहीं इसके बाद बादशाह अकबर ने भी मेवाड़ अभियान छोड़ दिया।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं महाराणा प्रताप की मृत्यु 19 जनवरी 1597 को 57 वर्ष की आयु में चावंड में हुई थी।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 09 May 2026 14:26:04 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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