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    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
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      <title><![CDATA[Ramdhari Singh Dinkar Death Anniversary: कलम से क्रांति की आग, जानिए 'राष्ट्रकवि' के Freedom Fighter बनने की कहानी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/fire-of-revolution-from-pen-know-story-of-national-poet-becoming-freedom-fighter]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 24 अप्रैल को राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की मृत्यु हो गई थी। रामधारी सिंह दिनकर ने हिंदी साहित्य में न सिर्फ वीर रस के काव्य को नई ऊंचाई दी, बल्कि उन्होंने अपनी रचनाओं के जरिए राष्ट्रीय चेतना का भी सृजन करने का काम किया था। उन्होंने अपनी कविताओं के जरिए आजादी की लड़ाई से लेकर आजादी मिलने तक के सफर को व्यक्त किया। उन्होंने अपनी कविताओं के जरिए देश को आजादी दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>बिहार के बेगुसराय में 23 सितंबर 1908 को रामधारी सिंह का जन्म हुआ था। वह छात्र जीवन में राजनीतिक शास्त्र, इतिहास और दर्शन शास्त्र जैसे विषयों को पसंद करते थे। बाद में रामधारी का झुकाव साहित्य की ओर हुआ था। दिनकर रवींद्रनाथ टैगोर और अल्लामा इकबाल को अपनी प्रेरणा मानते थे।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/director-who-gave-recognition-to-indian-cinema-whose-name-reached-oscars" target="_blank">Satyajit Ray Death Anniversary: वो निर्देशक जिसने Indian Cinema को दिलाई पहचान, ऑस्कर तक पहुंचा जिसका नाम</a></h3><h2>पहला काव्यसंग्रह</h2><div>बता दें कि रामधारी सिंह दिनकर का पहला काव्य संग्रह साल 1928 में 'विजय संदेश' प्रकाशित हुआ था। इसके बाद दिनकर ने कई रचनाएं की थीं। दिनकर की कुछ प्रमुख रचनाओं में 'हुंकार', 'परशुराम की प्रतीक्षा' और 'उर्वशी' है। फिर साल 1959 को रामधारी को साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया था।</div><div><br></div><h2>राज्यसभा के सदस्य</h2><div>दिनकर राज्यसभा के सदस्य भी रहे। वहीं साल 1972 में उनको ज्ञानपीठ सम्मान दिया गया है। रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी अधिकतर रचनाएं 'वीर रस' में की थी। वह एक ऐसी कवि रहे, जिन्होंने खूब वीर रस का इस्तेमाल किया था। वह एक ऐसा दौर था, जब लोगों के अंदर राष्ट्रभक्ति की भावना जोरों पर थीं। उसी भावना को दिनकर ने अपनी कविता के जरिए आगे बढ़ाया। दिनकर जनकवि थे, इसलिए उनको राष्ट्रकवि भी कहा गया था।</div><div><br></div><div>देश की आजादी की लड़ाई में रामधारी सिंह दिनकर ने भी अपना योगदान दिया था। दिनकर महात्मा गांधी के बड़े मुरीद थे। इसके अलावा वह संस्कृत, मैथिली, उर्दू और अंग्रेजी भाषा के भी जानकार थे। वहीं साल 1999 में भारत सरकार ने दिनकर के नाम से डाक टिकट भी जारी किया था।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 24 अप्रैल 1974 को रामधारी सिंह दिनकर का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 24 Apr 2026 12:21:47 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/fire-of-revolution-from-pen-know-story-of-national-poet-becoming-freedom-fighter</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Satyajit Ray Death Anniversary: वो निर्देशक जिसने Indian Cinema को दिलाई पहचान, ऑस्कर तक पहुंचा जिसका नाम]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/director-who-gave-recognition-to-indian-cinema-whose-name-reached-oscars]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 23 अप्रैल को सत्यजीत रे ने इस दुनिया को अलविदा कहा था। सत्यजीत रे द्वारा किए गए काम आज भी फिल्ममेकर्स के लिए मिसाल हैं। उन्होंने अपने करियर में कई हिट फिल्में दी थीं। बता दें कि सत्यजीत रे को उनके काम के लिए ऑस्कर से भी नवाजा गया था। वहीं यह सत्यजीत रे की फिल्मों का जादू है, जो आज सिनेमा इतना आगे पहुंच गया है। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर सत्यजीत रे के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>पश्चिम बंगाल के कोलकाता में 02 मई 1921 को सत्यजीत रे का जन्म हुआ था। उनका बचपन गरीबी में बीता, क्योंकि उनके पिता का निधन हो चुका था। ऐसे में परिवार की जिम्मेदारी उनकी मां के कंधों पर आ गई थी। सत्य़जीत ने ग्राफिक्स डिजाइनर की नौकरी करनी शुरू की। लेकिन फ्रांसीसी निर्देशक जां रेनोआ से सत्यजीत रे की मुलाकात ने सब बदल दिया था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/film-critic-turned-bollywood-showman-bhootnath-his-last-hit-film" target="_blank">BR Chopra Birth Anniversary: Film Critic से बने Bollywood के 'शोमैन', 'Bhootnath' थी आखिरी हिट फिल्म</a></h3><h2>फिल्म बनाने का आइडिया</h2><div>इस मुलाकात के बाद सत्यजीत रे के मन में फिल्म बनाने का विचार आया। वहीं साल 1950 में वह अपने ऑफिस के काम से लंदन गए और इस दौरान उन्होंने वहां कई फिल्में देखीं। लेकिन फिल्म 'बाइसिकल थीव्स' को देखकर सत्यजीत रे का आइडिया पक्का हो गया।</div><div><br></div><h2>पहली फिल्म</h2><div>भारत लौटने के बाद सत्यजीत रे ने पहली फिल्म बनाने पर काम शुरू किया। साल 1952 में सत्यजीत ने नौसिखिया टीम के साथ अपनी पहली फिल्म 'पाथेर पंचोली' की शूटिंग शुरूकर दी थी। लेकिन कोई फाइनेंसर नहीं होने के कारण फिल्म की शूटिंग बीच में ही रुक गई थी। तब बंगाल सरकार उनकी मदद के लिए आगे आई और फिल्म की शूटिंग पूरी हुई। यह फिल्म सुपरहिट साबित हुई और इस फिल्म के लिए उनको कई अवॉर्ड भी मिले। इसके बाद सत्यजीत रे ने फिल्म 'महापुरुष', 'चारूलता' और 'कंजनजंघा' जैसी कई हिट फिल्में बनाईं।</div><div><br></div><h2>पुरस्कार</h2><div>सत्यजीत रे को भारत सरकार की ओर से 32 राष्ट्रीय पुरस्कार दिए गए थे। वहीं साल 1985 में उनको दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया था। इसके बाद साल 1992 में सत्यजीत रे को 'भारत रत्न' और ऑस्कर 'ऑनरेरी अवॉर्ड फॉर लाइफटाइम अचीवमेंट' भी दिया गया था। लेकिन तबियत ठीक न होने की वजह से सत्यजीत रे ऑस्कर लेने नहीं जा सके। ऐसे में पदाधिकारी खुद उनको सम्मान देने के लिए कोलकाता आए थे।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 23 अप्रैल 1992 को सत्यजीत रे का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 23 Apr 2026 17:27:12 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/director-who-gave-recognition-to-indian-cinema-whose-name-reached-oscars</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[William Shakespeare Death Anniversary: 'Hamlet' से 'Romeo-Juliet' तक, 400 साल बाद भी अमर हैं विलियम शेक्सपियर के ये Masterpiece]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/from-hamlet-to-romeo-juliet-masterpieces-by-william-shakespeare-remain-immortal]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अंग्रेजी कवि, नाटककार और लेखक रहे विलियम शेक्सपियर का 23 अप्रैल को निधन हो गया था। विलियम ने अपनी रचनाओं से पूरी दुनिया को अपना दीवाना बना लिया था। उनके काम का अंदाज सबसे अलग था। विलियम शेक्सपियर हमेशा अपने काम में प्रयोग करते रहते थे। शेक्सपियर के नाटकों में आपको कॉमेडी और रोमांस मिलेगा। जिस कारण उनकी रचनाएं हमेशा लोगों को पसंद आती थीं। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर विलियम शेक्सपियर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>इंग्लैंड के स्ट्रैटफोर्ड के आन एवन में 23 अप्रैल 1564 को विलियम शेक्सपियर का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम जॉन शेक्सपियर था, जोकि चमड़े से संबंधित कारोबार करते थे। वहीं उनकी मां मैरी अर्डन एक घरेलू महिला थीं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/film-critic-turned-bollywood-showman-bhootnath-his-last-hit-film" target="_blank">BR Chopra Birth Anniversary: Film Critic से बने Bollywood के 'शोमैन', 'Bhootnath' थी आखिरी हिट फिल्म</a></h3><h2>नाटक और कविताएं</h2><div>बता दें कि 1590 में शेक्सपियर की कविताएं और नाटकों की प्रथम रचनाएं हुई थीं। उन्होंने कई प्रसिद्ध नाटक लिखे, जैसे- 'हैमलेट', 'ओथेलो', 'रोमियो और जूलिएट', 'मैकबेथ' और 'विंटर्स टेल' आदि शामिल हैं। शेक्सपियर के नाटकों का विषय संगीत, लोगों की लाइफस्टाइल, प्रेम और विवाह आदि पर आधारित था। शेक्सपियर ने 'वीनस एंड एडोनिस' और 'द रैप ऑफ ल्यूक्रेस' इन दो कविताओं को हेनरी व्रियोथस्ले को समर्पित किया था। यह दोनों की कविताएं काफी लोकप्रिय हुई थीं।</div><div><br></div><div>विलियम शेक्सपियर ने अपने शुरूआती करियर के करीब 7 साल बाद तक 15 से ज्यादा नाटक लिखे और उनको प्रकाशित करवाया। फिर 1599 में उन्होंने अपना एक खुद का थिएटर बनाया, जिसका नाम उन्होंने 'ग्लोब' रखा था। शेक्सपियर ने इस थिएटर को दोस्तों की मदद से बनाया था।</div><div><br></div><h2>शेक्सपियर की रचनाएं</h2><div>साल 1590 से लेकर 1613 से विलियम शेक्सपियर ने करीब 37 नाटक लिखे थे। शेक्सपियर के ज्यादातर नाटक हास्य, त्रासदी और इतिहास जैसे विषयों पर आधारित हैं। उन्होंने एक फेमस नाटक 'जूलियस सीजर' लिखा, जोकि राजनीति पर आधारित था। इस नाटक में शेक्सपियर ने बताया था कि कैसे अहंकार के घातक परिणाम हो सकते हैं।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>सन 1613 तक विलियम शेक्सपियर स्ट्रेटफोर्ड से रिटायर हो गए चुके थे। वहीं 23 अप्रैल 1616 को विलियम शेक्सपियर का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 23 Apr 2026 17:23:57 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/from-hamlet-to-romeo-juliet-masterpieces-by-william-shakespeare-remain-immortal</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[BR Chopra Birth Anniversary: Film Critic से बने Bollywood के 'शोमैन', 'Bhootnath' थी आखिरी हिट फिल्म]]></title>
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      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 22 अप्रैल को बलदेव राज चोपड़ा का जन्म हुआ था। बलदेव राज चोपड़ा को बी.आर चोपड़ा के नाम से भी जाना जाता है। बी.आर चोपड़ा बॉलीवुड फिल्मों और टेलीविजन धारावाहिकों के निर्माता और निर्देशक थे। उन्होंने हिंदी सिनेमा को एक से बढ़कर एक फिल्में दी थीं। बलदेव राज चोपड़ा ने फिल्म क्रिटिक के तौर पर अपना करियर शुरू किया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर बी. आर चोपड़ा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...&nbsp;</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>पंजाब के शहीद भगत सिंह नगर जिले के राहोन में 22 अप्रैल 1914 को बलदेव राज चोपड़ा का जन्म हुआ था। उनके पिता का नाम विलायती राज चोपड़ा था। उन्होंने लाहौर में पंजाब विश्वविद्यालय से अपनी पढ़ाई पूरी की और अंग्रेजी साहित्य में एम.ए की डिग्री हासिल की। बी.आर चोपड़ा की पहली नौकरी साल 1944 में लाहौर से निकलने वाली फिल्म-मासिक पत्रिका सिने हेराल्ड के लिए फिल्म पत्रकार के रूप में थी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/the-passing-of-asha-tai-the-end-of-a-golden-era-of-playback-singing" target="_blank">Legendary Bollywood singer Asha Bhosle: पार्श्व गायन के एक स्वर्णिम युग का अंत</a></h3><h2>फिल्मी दुनिया</h2><div>साल 1947 में बी.आर चोपड़ा ने अपनी पहली फिल्म 'चांदनी चौक' रिलीज हुई थी। जिसको आई.एस जौहर ने लिखा था। इस फिल्म में एरिका रुख्शी और नईम हाशमी ने अभिनय किया था। बी.आर ने सिनेमा जगत में अपना करियर बनाने के लिए मुंबई चले गए। ब्लैक एंड व्हाइट के इस जमाने में उन्होंने लोगों को धार्मिक और पारिवारिक मूल्यों वाली फिल्में दीं। जिनको ऐतिहासिक फिल्मों के अलावा महाभारत के लिए भी याद किया जाता है।</div><div><br></div><div>'महाभारत' की कहानी को बी आर चोपड़ा ने छोटे पर्दे पर कुछ इस तरह दिखाया कि कभी ऐसी पौराणिक कहानियां देखने को नहीं मिलीं। जब कोरोना लॉकडाउन लगा तो टीवी चैनल पर रामायण और महाभारत सीरियल का प्रसारण फिर से शुरू हुआ। दोनों सीरियल ने इस दौरान टीआरपी के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे।</div><div><br></div><h2>आखिरी फिल्म</h2><div>बी आर चोपड़ा के साथ उनके भाई यश चोपड़ा सहायक निर्देशक के तौर पर काम करते थे। वहीं बी.आर चोपड़ा की आखिरी फिल्म 'भूतनाथ' थी। इस फिल्म में अमिताभ बच्चन थे, यह फिल्म सुपरहिट थी।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 05 नवंबर 2008 को 94 साल की उम्र में बी.आर चोपड़ा का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 22 Apr 2026 11:31:29 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/film-critic-turned-bollywood-showman-bhootnath-his-last-hit-film</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Albert Einstein Death Anniversary: राष्ट्रपति का पद ठुकराया, दिमाग पर हुई Research, जानें रोचक बातें]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/rejected-post-of-president-research-done-on-brain-learn-interesting-things]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 18 अप्रैल को महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन का निधन हो गया था। पूरी दुनिया अल्बर्ट आइंस्टीन के दिमाग का लोहा मानती थी। लेकिन आइंस्टीन का बचपन उनकी बाद की छवि से मेल नहीं खाता था। उनको बहुत बुद्धिमान वैज्ञानिक माना जाता था। बताया जाता है कि आइंस्टीन का मस्तिष्क सामान्य इंसानों से हटकर था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर अल्बर्ट आइंस्टीन के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>जर्मनी में एक यहूदी इंजीनियर के घर में 14 मार्च 1879 में अल्बर्ट आइंस्टीन का जन्म हुआ था। बताया जाता है कि जन्म के करीब 4 सालों तक उन्होंने एक भी शब्द नहीं कहा था। तब परिवार ने आइंस्टीन की खूब जांच कराई। सबने एक ही बात कही कि बच्चा बिल्कुल ठीक है। एक रात डिनर के समय गर्म सूप पीते हुए अल्बर्ट का मुंह जल गया। तब परिवार ने बच्चे के मुंह से एक पूरा वाक्य सुना- सूप कितना गर्म है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/benjamin-franklin-became-founding-father-of-america-story-of-benjamin-franklin" target="_blank">Benjamin Franklin Death Anniversary: 10 साल में स्कूल छोड़ा, America के बने Founding Father, जानें Benjamin Franklin की कहानी</a></h3><h2>प्रसिद्ध समीकरण</h2><div>आइंस्टीन ने सबसे प्रसिद्ध और शानदार समीकरण 'ई ईक्वल्स एमसी स्क्वैयर' दिया था। उन्होंने साल 1905 में इस समीकरण को दुनिया के सामने ऱखा। साथ ही यह भी समझाया कि तारों और परमाणु विस्फोट में किस तरह से ऊर्जा बाहर निकलती है। इस समीकरण के जरिए ही एटम बम बना था। लेकिन हर सिक्के के दो पहलु होते हैं। एटम बम से इंसानियत को तबाह भी किया जा सकता है और बिजली का उत्पादन भी हो सकता है। आइंस्टीन शांत स्वभाव के थे और उनको हिंसा नहीं पसंद थी। इस कारण उन्होंने जर्मनी युद्ध के दौरान शांति का प्रस्ताव रखा था। आइंस्टीन को जर्मनी कभी भी रास नहीं आया। इस कारण 1880 में उन्होंने म्यूनिख जाने का फैसला किया। ऐसे में उनका पूरा परिवार भी म्यूनिख शिफ्ट हो गया।</div><div><br></div><h2>नोबेल पुरस्कार</h2><div>वहीं 09 नवंबर 1922 को 'सैद्धांतिक भौतिकी' में आइंस्टीन को उनकी सेवाओं के लिए खासकर फोटोइलेक्ट्रिक इफेक्‍ट की खोज के लिए 'फिजिक्‍स में 1921 का 'नोबेल पुरस्कार' दिया गया था। वहीं आइंस्टीन को उनके 70वें जन्मदिन पर उनके सम्मान में 'सैद्धांतिक भौतिकी में एक पुरस्कार' का वितरण शुरू किया गया था।</div><div><br></div><h2>ठुकराया था राष्ट्रपति का पद</h2><div>अपनी शर्तों पर जिंदगी जीने वाले आइंस्टीन को इजरायल का राष्ट्रपति बनने का निमंत्रण मिला था। क्योंकि यहूदी चाहते थे कि अल्बर्ट आइंस्टीन इस जिम्मेदारी को संभालें। लेकिन उन्होंने यह कहकर राष्ट्रपति पद को ठुकरा दिया कि उनके अंदर राजनीति और देश संभालने का क्षमता नहीं है।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 18 अप्रैल 1955 को अल्बर्ट आइंस्टीन का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 18 Apr 2026 15:08:13 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/rejected-post-of-president-research-done-on-brain-learn-interesting-things</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[Sarvepalli Radhakrishnan Death Anniversary: Nehru ने Radhakrishnan को क्यों भेजा था Soviet Union? जानें President बनने तक का पूरा सफर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/nehru-send-radhakrishnan-to-soviet-union-entire-journey-leading-his-presidency]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>महान दार्शनिक और शिक्षक सर्वपल्ली राधाकृष्णन का 17 अप्रैल को निधन हो गया था। डॉ राधाकृष्णन ने पूरी दुनिया को भारत के दर्शन शास्त्र से परिचय कराया था। वह देश के पहले उपराष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति थे। वह 10 सालों तक बतौर उपराष्ट्रपति जिम्मेदारी निभाने के बाद 13 मई 1962 को डॉ राधाकृष्णन को देश का दूसरा राष्ट्रपति बनाया गया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर डॉ राधाकृष्णन के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी के चित्तूर जिले के तिरुत्तनी गांव में 05 सितंबर 1888 को राधाकृष्णन का जन्म हुआ था। राधाकृष्णन के पिता का नाम सर्वपल्ली वीरास्वामी और मां का नाम सीताम्मा था। शिक्षा पूरी करने के बाद साल 1918 में उनको मैसूर महाविद्यालय में दर्शन शास्त्र का सहायक प्रध्यापक नियुक्त किया गया। फिर बाद में वह उसी कॉलेज में प्राध्यापक भी बने।</div><div><br></div><h2>राजनीति में आए</h2><div>साल 1947 में देश की आजादी के बाद पंडित नेहरू भारत के पहले प्रधानमंत्री बने। तब पंडित नेहरू ने डॉ. राधाकृष्णन से सोवियत संघ में राजदूत के रूप में काम करने का आग्रह किया। उन्होंने नेहरू की बात मानी और साल 1947 से 1949 तक संविधान सभा के सदस्य के रूप में काम किया। फिर साल 1952 तक वह रूस में भारत के राजदूत बनकर रहे। वहीं 13 मई 1952 को डॉ राधाकृष्णन को देश का पहला उपराष्ट्रपति बने थे। साल 1952 से लेकर 1962 तक दिल्ली यूनिवर्सिटी के कुलपति रहे।</div><div><br></div><h2>लेखन</h2><div>भारतीय दर्शनशास्त्र और धर्म पर डॉ. राधाकृष्णन ने कई किताबें लिखी। जिनमें 'धर्म और समाज', 'गौतम बुद्ध : जीवन और दर्शन', और 'भारत और विश्व' प्रमुख है। वह एक आदर्श शिक्षक और दार्शनिक के रूप में आज भी डॉ राधाकृष्णन सभी के लिए प्रेरणादायक हैं। मरणोपरांत साल 1975 में अमेरिकी सरकार ने उनको 'टेम्पल्टन पुरस्कार' से सम्मानित किया गया।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/started-political-journey-through-padyatra-story-of-young-turk-chandrashekhar" target="_blank">Chandrashekhar Birth Anniversary: वो PM जिसने Padyatra से नापी Politics की राह, जानें 'युवा तुर्क' Chandrashekhar की कहानी</a></h3><h2>पुरस्कार</h2><div>साल 1954 में डॉ राधाकृष्णन को 'भारत रत्न' पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। इसके अलावा उनको पीस प्राइज आफ द जर्मन बुक ट्रेड से भी सम्मानित किया गया। ब्रिटिश शासनकाल में राधाकृष्णन को 'सर' की उपाधि दी गई थी। वहीं इंग्लैंड सरकार ने उनको 'ऑर्डर ऑफ मेरिट' सम्मान से भी सम्मानित किया था। जर्मनी के पुस्तक प्रकाशन के द्वारा साल 1961 में उनको 'विश्व शांति पुरस्कार' से सम्मानित किया गया था।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>डॉ राधाकृष्णन का 17 अप्रैल 1975 को निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 18:13:52 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/nehru-send-radhakrishnan-to-soviet-union-entire-journey-leading-his-presidency</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Chandrashekhar Birth Anniversary: वो PM जिसने Padyatra से नापी Politics की राह, जानें 'युवा तुर्क' Chandrashekhar की कहानी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/started-political-journey-through-padyatra-story-of-young-turk-chandrashekhar]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत के पूर्व प्रधानमंत्री और 'युवा तुर्क' के नाम से प्रसिद्ध चंद्रशेखर का 17 अप्रैल को जन्म हुआ था। चंद्रशेखर भारत के 8वें प्रधानमंत्री थे और उन्होंने अपनी सादगी, समाजवादी विचारधारा और निर्भीक भाषण के लिए जाने जाते थे। उन्होंने देश में 'पदयात्रा' के जरिए लोगों की समस्याओं को समझा था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर चंद्रशेखर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के इब्राहिमपट्टी गाँव में 17 अप्रैल 1927 को चंद्रशेखर का जन्म हुआ था। अपने कॉलेज टाइम से ही चंद्रशेखर सामाजिक आंदोलनों में शामिल होते थे। वहीं बाद में साल 1951 में वह सोशलिस्ट पार्टी के फुल टाइम वर्कर बन गए थे।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/sahitya-samrat-who-ignited-the-flame-of-freedom-with-his-pen" target="_blank">Bankim Chandra Chattopadhyay Death Anniversary: वो 'साहित्य सम्राट' जिसने कलम से जगाई थी Freedom की ज्वाला</a></h3><h2>सियासी सफर</h2><div>जब सोशलिस्ट पार्टी टूटी तो वह कांग्रेस में चले गए। फिर साल 1977 में जब आपातकाल लगा, तो उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी। फिर उनकी पहचान इंदिरा गांधी के 'मुखर विरोधी' के रूप में बनी। राजनीति में चंद्रशेखर की पारी सोशलिस्ट पार्टी से शुरू हुई थी। जोकि संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी व प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के जरिए कांग्रेस, जनता पार्टी, जनता दल, समाजवादी जनता दल और फिर समाजवादी जनता पार्टी तक पहुंची।</div><div><br></div><div>फिर साल 1962 में वह उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए चुने गए। वहीं सला 1984 से लेकर 1989 तक का समय छोड़कर वह अपनी आखिरी सांस तक लोकसभा के सदस्य रहे। साल 1989 के लोकसभा चुनाव में चंद्रशेखर अपने गृहक्षेत्र बलिया के अलावा बिहार के महाराजगंज लोकसभा क्षेत्र से चुने गए। बाद में चंद्रशेखर ने महाराजगंज सीट से इस्तीफा दे दिया।</div><div><br></div><h2>भारत के प्रधानमंत्री</h2><div>तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने लोकसभा में 400 से ज्यादा सीटें जीती थीं। लेकिन साल 1989 के चुनावों में राजीव गांधी सरकार पर लगे बोफोर्स घोटाले के बाद कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई। जिसके बाद जनता दल की सरकार बनी। लेकिन एक साल के अंतराल में ही बीजेपी द्वारा समर्थन वापस लेने की वजह से वीपी सिंह की सरकार अल्पमत में आ गई। वहीं उनकी पार्टी के 64 सांसद अलग हो गए।</div><div><br></div><div>कांग्रेस के समर्थन पर चंद्रशेखर देश के अगले प्रधानमंत्री रहे। लकिन 3 महीने बाद ही कांग्रेस पार्टी ने राजीव गांधी की जासूसी कराने के आरोप में चंद्रशेखर की पार्टी से अपना समर्थन वापस ले लिया। ऐसे में आदर्शवादी नेता के रूप में पहचाने जाने वाले चंद्रशेखर को 21 जून 1991 को इस्तीफा देना पड़ा।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 08 जुलाई 2007 को चंद्रशेखर का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 18:09:54 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/started-political-journey-through-padyatra-story-of-young-turk-chandrashekhar</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Benjamin Franklin Death Anniversary: 10 साल में स्कूल छोड़ा, America के बने Founding Father, जानें Benjamin Franklin की कहानी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/benjamin-franklin-became-founding-father-of-america-story-of-benjamin-franklin]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अमेरिकी राजनेता, प्रिंटर, वैज्ञानिक और लेखक बैंजामिन फ्रैंकलिन का आज ही के दिन यानी की 17 जनवरी को निधन हो गया था। उन्होंने अपनी पतंगबाजी के प्रयोग के जरिए ऐसी जानकारी दी, जिससे आज हम करंट और उससे बचाव की सावधानी के बारे में जानते हैं। बैंजामिन फ्रैंकलिन ने तमाम खोज और आविष्कार किए, लेकिन उन्होंने मानवता की सेवा के लिहाज से कभी उनका पेटेंट नहीं कराया। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर बैंजामिन फ्रैंकलिन के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>अमेरिका में मेसाचुसेट्स राज्य के बोस्टन शहर में 17 जनवरी 1706 को बैंजामिन फ्रैंकलिन का जन्म हुआ था। इनके पिता मोमबत्ती बनाते थे और वह अपने पिता की 15वीं संतान थे। वहीं फ्रैंकलिन ने 10 साल की उम्र से स्कूल जाना छोड़ दिया था। वह अपने बड़े भाई के साथ प्रिंटिंग प्रेस में काम करने लगे और खुद पढ़ाई करके शिक्षा हासिल की थी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/us-president-who-abolished-slavery-shot-dead-know-abraham-lincoln-last-day" target="_blank">Abraham Lincoln Death Anniversary: जिसने खत्म की Slavery, उसी US President की गोली मारकर हत्या, जानें Abraham Lincoln का आखिरी दिन</a></h3><h2>आविष्कार</h2><div>वहीं 1748 में 41 साल की आयु में फ्रैंकलिन इतने ज्यादा धनी हो गए थे कि वह व्यवसाय से सेवानिवृत्त होकर एक सज्जन व्यक्ति की तरह अपना जीवन बिता सकते हैं। लेकिन वह वैज्ञानिक प्रयोग और आविष्कार पर केंद्रित करना और उसमें महारत हासिल करना चाहते थे। विशेष रूप से बिजली गिरने की विद्युतीय प्रकृति को सिद्ध करने वाले अपने पतंग प्रयोग के लिए उन्होंने यूरोप में अपार ख्याति प्राप्त की थी। वह अमेरिका के अग्रणी विचारकों में से एक बन गए थे। वहीं साल 1753 में रॉयल सोसाइटी ने उनको अपना सर्वोच्च सम्मान 'कॉपले मेडल' दिया था।</div><div><br></div><h2>अमेरिका वापसी</h2><div>साल 1785 में युद्धग्रस्त और उबर रहे संयुक्त राज्य अमेरिका में लौटने पर बैंजामिन फ्रैंकलिन एक नायक के रूप में स्वागत किया गया। कांग्रेस फ्रांस की भूमिका को कम करके आंकना चाहती थी। इसलिए गठबंधन को सुरक्षित करने के बैंजामिन के प्रयासों के लिए उनको कोई ठोस पुरस्कार नहीं दिया गया। लेकिन इसके बाद तीन वर्षों तक उन्होंने पेंसिल्वेनिया के वास्तविक गवर्नर के रूप में कार्य किया। वहीं 1787 में संवैधानिक सम्मेलन में बैंजामिन सबसे उम्रदराज प्रतिनिधि के रूप में शामिल हुए थे।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वॉशिंगटन के पहले अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के एक साल बाद यानी की 17 अप्रैल 1790 को 84 साल की उम्र में बैंजामिन फ्रैंकलिन का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 13:38:52 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/benjamin-franklin-became-founding-father-of-america-story-of-benjamin-franklin</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Abraham Lincoln Death Anniversary: जिसने खत्म की Slavery, उसी US President की गोली मारकर हत्या, जानें Abraham Lincoln का आखिरी दिन]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/us-president-who-abolished-slavery-shot-dead-know-abraham-lincoln-last-day]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 15 अप्रैल को अमेरिका के 16वें राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। अमेरिका के इतिहास में आज का दिन काफी अहम है। अमेरिका के 16वें राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने देश को गृहयुद्ध से बाहर निकाला था और दास प्रथा खत्म करने में अहम भूमिका निभाई थी। लेकिन उनकी हत्या आज भी रहस्यों से घिरी है। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर अब्राहम लिंकन के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>एक गरीब परिवार में 12 फरवरी 1809 को अब्राहम लिंकन का जन्म हुआ था। शुरूआती जीवन से ही कई उतार-चढ़ाव भरा रहा है। इनके पिता का नाम थॉमस लिंकन था और मां का नाम नैन्सी हैंक्स था। जब लिंकन 10 साल के थे, तो उनकी मां की मौत हो गई थी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/first-field-marshal-sam-manekshaw-not-accept-defeat-even-after-shot-7-times" target="_blank">Sam Manekshaw Birth Anniversary: World War II में 7 गोलियां खाकर भी नहीं मानी हार, ऐसे थे भारत के पहले Field Marshal सैम मानेकशॉ</a></h3><h2>राष्ट्रपति बने लिंकन</h2><div>शुरूआती संघर्षों के बाद अब्राहम लिंकन ने एक वकील के रूप में काम किया। बाद में उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया। साल 1858 में लिंकन सीनेटर के लिए स्टीफन ए डगलस के खिलाफ चुनाव लड़ा था। लेकिन उनको हार का सामना करना पड़ा था। लेकिन इस चुनाव के कारण अब्राहम लिंकन पूरे देश में मशहूर हो गए। इसी के चलते लिंकन ने साल 1860 में राष्ट्रपति पद के लिए रिपब्लिकन नामांकन जीता था।</div><div><br></div><div>साल 1860 में अब्राहम लिंकन वह पहले रिपब्लिकन थे, जो अमेरिका के 16वें राष्ट्रपति बने थे। उन्होंने राष्ट्रपति के रूप में रिपब्लिकन पार्टी को एक मजबूत राष्ट्रीय संगठन बनाया। वहीं 01 जनवरी 1863 को राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने मुक्ति की उद्घोषणा जारी की। जिसने गुलामों को हमेशा के लिए आजाद कराने का ऐलान किया था। वहीं 04 मार्च 1864 को अब्राहम लिंकन को दोबारा से अमेरिका का राष्ट्रपति चुना गया था।</div><div><br></div><h2>लिंकन की हत्या</h2><div>वहीं 14 अप्रैल 1865 को गृह युद्ध खत्म होने पर गुड फ्राइडे को एक समारोह रखा गया था। इसमें अमेरिका के राष्ट्रपति लिंकन वाशिंगटन डीसी के फोर्ड थिएटर में पहुंचे थे। इस दौरान अभिनेता जॉन विल्कीस बूथ ने अब्राहम लिंकन को गोली मार दी। वहीं गोली लगने के अगले दिन 15 अप्रैल 1865 को अब्राहम लिंकन का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 15 Apr 2026 17:50:02 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/us-president-who-abolished-slavery-shot-dead-know-abraham-lincoln-last-day</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Guru Arjun Dev Birth Anniversary: Golden Temple की रखी नींव, Guru Granth Sahib का किया था संपादन]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/laid-foundation-of-golden-temple-edited-the-guru-granth-sahib]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 15 अप्रैल को सिखों के 5वें गुरु, गुरु अर्जुन देव जी का जन्म हुआ था। उनका पूरा जीवन मानव सेवा को समर्पित रहा। गुरु अर्जुन देव दया और करुणा के सागर थे। वह समाज के हर वर्ग और समुदाय को समान भाव से देखते थे। वह मानवता के सच्चे सेवक, धर्म के रक्षक, शांत और गंभीर स्वभाव के मालिक थे। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर गुरु अर्जुन देव जी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>पंजाब के अमृतसर में 15 अप्रैल 1563 को गुरु अर्जुन देव का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम गुरु रामदासजी था, जोकि सिख धर्म के चौथे गुरु थे और इनकी मां का नाम भानीजी था। अर्जुन देव जी को हिंदी, फारसी और संस्कृत भाषाओं की शिक्षा दी गई थी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/picked-up-sword-age-of-13-know-entire-journey-of-becoming-hind-ki-chadar" target="_blank">Guru Tegh Bahadur Birth Anniversary: 13 साल में उठाई तलवार, जानें 'हिंद की चादर' बनने का पूरा सफर</a></h3><h2>गुरु ग्रंथ साहिब का संपादन</h2><div>संपादन कला के गुणी गुरु अर्जुन देव जी ने श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का संपादन किया था। उन्होंने रागों के आधार पर श्रीगुरु ग्रंथ साहिब जी में संकलित वाणियों का जो वर्गीकरण किया है, उसकी मिसाल दुर्लभ है। श्रीगुरु ग्रंथ साहिब में कुल 5894 शब्द हैं, जिनमें से 2216 शब्द गुरु अर्जुन देव जी के हैं।</div><div><br></div><h2>पांचवे गुरु</h2><div>वहीं 1582 में गुरु अर्जुन देव जी सिखों के पांचवे गुरु बने थे। उन्होंने अमृतसर में श्रीहरमंदिर साहिब गुरुद्वारे की नींव रखी थी। जिसको आज हम स्वर्ण मंदिर के नाम से जाना जाता है। बताया जाता है कि इस गुरुद्वारे का नक्शा स्वयं अर्जुन देव जी ने बनाया था।</div><div><br></div><h2>बलिदान</h2><div>1605 में जब जहांगीर मुगल साम्राज्य का बादशाह बना, तो शहजादा खुसरों ने जहांगीर के खिलाफ बगावत कर दी। फिर खुसरो भागकर पंजाब चला गया और गुरु अर्जुन देव ने उसको पनाह दी। जब इसकी जानकारी जहांगीर को हुई, तो वह अर्जुन देव पर भड़क गया। जहांगीर ने गुरु अर्जुन देव को गिरफ्तार करने का आदेश दिया। वहीं अर्जुन देव स्वयं लाहौर पहुंच गए और जहांगीर ने उनको जान से मारने का आदेश दिया।</div><div><br></div><div>जिसके बाद गुरु अर्जुन देव को 5 दिनों तक भीषण यातनाएं दी गईं। फिर 30 मई 1606 को लाहौर की भीषण गर्मी में गुरु अर्जुन देव को गर्म तवे पर बिठाया गया। उनके ऊपर गर्म रेत और तेल डाला गया। यातना की वजह से वह मूर्छित हो गए और उनके शरीर को रावी नदी में बहा दिया गया।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 15 Apr 2026 17:43:22 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/laid-foundation-of-golden-temple-edited-the-guru-granth-sahib</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[Legendary Bollywood singer Asha Bhosle: पार्श्व गायन के एक स्वर्णिम युग का अंत]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/the-passing-of-asha-tai-the-end-of-a-golden-era-of-playback-singing]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>देश की महान पार्श्व गायिका आशा भोंसले जी का निधन भारतीय सिनेमा के लिए एक अपूरणीय क्षति है। 8 सितंबर 1933 को महाराष्ट्र के सांगली में जन्मी, स्वर साधिका आशा भोंसले जी अपनी आवाज़ के जादू से संगीत प्रेमियों के दिलों पर राज करती थीं। पिता दीनानाथ मंगेशकर ने ही अपनी पुत्री आशा को संगीत की आरंभिक शिक्षा दी किन्तु जब आशा की आयु मात्र 9 वर्ष की थी तभी दीनानाथ जी का निधन हो गया और पूरा परिवार मुंबई आ गया। परिवार की आर्थिक सहायता के लिए आशा और इनकी बड़़ी बहन लता मंगेशकर जी ने फिल्मों में गीत गाना और अभिनय करना आरम्भ किया।</div><div><br></div><div>आशा जी ने प्रथम गीत 1943 में मराठी फिल्म माझा बाल में गाया था। 1948 में हिंदी फिल्म चुनरिया का गीत “सावन आया“ हंसराज बहल के लिए गाया। आशा भोंसले ने 20 भाषाओं में 12 हजार से अधिक गीत गाए हैं। आशा जी ने मराठी, असमिया, हिंदी, तेलुगू, मराठी, बंगाली, गुजराती, पंजाबी, भोजपुरी, तमिल, और मलयालम भाषा में गीत तो गाये ही वहीं विदेशी अंग्रेजी, रशियन, नेपाली, मलय आदि भाषाओं में भी गीत गाकर इतिहास रचा।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/asha-ji-sweet-and-melodious-voice-will-forever-remain-immortal-in-our-hearts" target="_blank">आशा जी की मधुर और सुरमयी आवाज सदा दिलों में अमर रहेगी</a></h3><div>एक समय ऐसा था जब आशा जी को नायिकाओं पर फिल्माए जाने वाले प्रमुख गीत नहीं मिलते थे। 1950 के दशक में आशा जी ने दूसरी-तीसरी श्रेणी की फिल्मों या फिर खलनायिकाओं वाले गीत गाए।आशा जी की लोकप्रियता फिल्म बूट पॉलिश के गीत “नन्हें मुन्ने बच्चों“ के साथ हुई। आशा जी को सबसे बड़ा अवसर 1956 में ओ.पी. नैयर की फिल्म सीआईडी में मिला, इस फिल्म के गीत बेहद लोकप्रिय हुए। 1957 मे बी. आर. चोपड़ा की फिल्म नया दौर के गीतों&nbsp; से कमाल हो गया और इन फिल्म के गीत जनमानस में छा गये थे।1966 में संगीतकार आर.डी. बर्मन की सबसे सफल फिल्म तीसरी मंजिल से आशा जी की आवाज़ का जादू श्रोताओं के सर चढ़कर बोलने लगा। 1970 तक आशा जी एक प्रमुख आवाज़ बन गयीं। उस समय के गीत आज भी अत्यंत लोकप्रिय हैं। 1981से 1987 तक आशा जी ने अपने गीतों का लोहा मनवा लिया।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div>आशा जी ने कई संगीत निर्देशकों के साथ काम किया, जिनमें संगीतकार ओ. पी, नैयर, खैय्याम, रवि, सचिन देव बर्मन के साथ उनकी साझीदारी बहुत प्रभावशाली रही। संगीत निर्देशक जयदेव ने आशा जी के साथ कई फिल्मों के लिए गीत रिकॉर्ड किए। 1987 में जयदेव जी के निधन के बाद उनके कम प्रसिद्ध गीतों का संकलन जो जयदेव के द्वारा संगीतबद्ध था सुरांजलि नाम से निकाला गया इसमें आशा जी की प्रमुख भूमिका थी। संगीतकार शंकर जयकिशन के साथ आशा जी ने जो गीत गाए वे काफी लोकप्रिय हुए। आशा जी ने ही 1970 में मेरा नाम जोकर प्रसिद्ध फिल्म के गीत गाए और लोकप्रियता बटोरी।आशा जी ने इलैया राजा से लेकर इस पीढ़ी के ए आर रहमान तक के साथ किया। फिल्मी दुनिया में शायद ही ऐसा कोई संगीताकर हो जिसके लिए आशा जी ने गीत न गाया हो। आशा जी ने कई निजी एलबम भी निकाले इनमें&nbsp; “कभी तो नजर मिलाओ“ और “बरसे बादल“ काफी लोकप्रिय हुए। गायन की विविधता से आशा जी ने अपनी गायकी में अभूतपूर्व ऊंचाई प्राप्त की</div><div><br></div><div>आशा भोंसले जी को सात बार फिल्म फेयर पुरस्कार, 1995 में फिल्म रंगीला के लिए विशेष पुरस्कार, 2001 में फिल्मफेयर लाइफ टाइम अचीवमेंट, 1981 में उमराव जान और 1986 में इजाजत के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिले। 1997 में आशा जी को उस्ताद अली अकबर खान के साथ विशेष एलबम के लिए ग्रैमी अवार्ड हेतु नामांकित किया गया । वर्ष 2000 में उन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वर्ष 2008 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। आशा जी का नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में भी अंकित है।&nbsp;</div><div><br></div><div>- मृत्युंजय दीक्षित</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 13 Apr 2026 14:47:05 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/the-passing-of-asha-tai-the-end-of-a-golden-era-of-playback-singing</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[आशा जी की मधुर और सुरमयी आवाज सदा दिलों में अमर रहेगी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/asha-ji-sweet-and-melodious-voice-will-forever-remain-immortal-in-our-hearts]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आशा भोंसले जी का नाम भारतीय संगीत इतिहास में अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने अपने करियर में आठ दशकों से भी अधिक समय तक संगीत जगत में अमूल्य योगदान दिया है और लगभग 12 हजार से अधिक गीतों को अपनी मधुर आवाज से सजाया है। आशा भोंसले जी, जो भारत की महानतम और दिग्गज गायिकाओं में से एक थीं। आशा जी का नाम संगीत जगत में सदैव एक सिरमौर के रूप में लिया जाएगा। दिनांक 12 अप्रैल 2026 को मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में 92 साल की उम्र में उनका दुखद निधन हो गया। उनके दुखद निधन का समाचार पूरे विश्व के संगीत प्रेमियों के लिए अत्यंत पीड़ादायक है। यह क्षति न केवल भारतीय संगीत जगत के लिए, बल्कि वैश्विक सांस्कृतिक धरोहर के लिए भी अपूरणीय है। आशा भोंसले जी के जीवन के बारे में बात की जाये तो उनका जन्म 8 सितम्बर 1933 को महाराष्ट्र के सांगली में एक समृद्ध संगीत परंपरा वाले परिवार में हुआ था। उनके पिता दीनानाथ मंगेशकर एक प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक एवं रंगमंच कलाकार थे, जिनसे उन्हें संगीत की प्रारंभिक शिक्षा मिली। बचपन से ही संगीत के वातावरण में पली-बढ़ीं आशा जी ने बहुत कम उम्र में ही गायन प्रारंभ कर दिया। पिता के निधन के बाद परिवार की जिम्मेदारियों को निभाने के लिए उन्होंने किशोरावस्था में ही फिल्मों में गाना शुरू कर दिया और कठिन परिस्थितियों और संघर्षों के बावजूद अपने करियर की मजबूत नींव रखी। उनकी बड़ी बहन सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर विश्वप्रसिद्ध गायिका रहीं, जबकि उनकी अन्य बहनें मीना मंगेशकर और उषा मंगेशकर ने भी संगीत जगत में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। उनके भाई हृदयनाथ मंगेशकर एक प्रसिद्ध संगीतकार के रूप में जाने जाते हैं। इस प्रकार मंगेशकर परिवार ने सामूहिक रूप से भारतीय संगीत को समृद्ध किया और एक अमूल्य सांगीतिक विरासत स्थापित की, जिसका प्रभाव आज भी भारतीय सांस्कृतिक परिदृश्य में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।</div><div><br></div><div>अपने शुरुआती दौर में उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन अपनी अदम्य इच्छाशक्ति, मेहनत और प्रतिभा के बल पर उन्होंने धीरे-धीरे संगीत जगत में एक विशिष्ट स्थान बना लिया। उन्होंने ओ. पी. नैयर, आर. डी. बर्मन और खय्याम जैसे महान संगीतकारों के साथ काम करते हुए अनेक अमर गीतों को जन्म दिया। विशेष रूप से आर. डी. बर्मन के साथ उनकी जोड़ी ने हिंदी फिल्म संगीत को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया और कई सदाबहार गीत दिए। आशा जी ने अपने दीर्घ और गौरवशाली संगीत जीवन में भारतीय शास्त्रीय संगीत से लेकर फिल्मी गीतों, गजलों, भजनों और लोकगीतों तक हर शैली में अपनी अद्वितीय छाप छोड़ी। उनकी आवाज की मधुरता, लचीलापन और भावनात्मक अभिव्यक्ति ने उन्हें अन्य गायिकाओं से अलग पहचान दिलाई। उन्होंने हिंदी, मराठी, बांग्ला, तमिल, गुजराती सहित अनेक भाषाओं में हजारों गीत गाकर विश्वभर में भारतीय संगीत का परचम लहराया। आशा भोंसले जी की असाधारण उपलब्धियों के लिए उन्हें अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित किया गया। उन्हें पद्म विभूषण, दादासाहेब फाल्के पुरस्कार, तथा कई बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और फिल्मफेयर पुरस्कार प्राप्त हुए। इसके अतिरिक्त, उनका नाम गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में भी दर्ज किया गया, जहाँ उन्हें विश्व की सर्वाधिक रिकॉर्डिंग करने वाली गायिकाओं में शामिल किया गया, जो उनके अद्वितीय और विशाल संगीत योगदान का प्रमाण है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/sahitya-samrat-who-ignited-the-flame-of-freedom-with-his-pen" target="_blank">Bankim Chandra Chattopadhyay Death Anniversary: वो 'साहित्य सम्राट' जिसने कलम से जगाई थी Freedom की ज्वाला</a></h3><div>आशा जी और उनकी बड़ी बहन लता मंगेशकर जी का संबंध भारतीय संगीत इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक रहा है। दोनों बहनों ने अपने-अपने विशिष्ट अंदाज और आवाज के माध्यम से संगीत जगत में अलग-अलग पहचान बनाई, फिर भी उनके बीच गहरा पारिवारिक और सांगीतिक जुड़ाव बना रहा। जहाँ लता जी को उनकी मधुर और शुद्ध आवाज के लिए जाना जाता था, वहीं आशा जी अपनी बहुआयामी और प्रयोगधर्मी शैली के लिए प्रसिद्ध रहीं। इन दोनों बहनों ने मिलकर भारतीय फिल्म संगीत को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अमूल्य विरासत छोड़ी। आशा जी के व्यक्तिगत जीवन की बात करें, तो उनका जीवन भी अनेक उतार-चढ़ाव से भरा रहा। 16 साल की उम्र में उन्होंने गणपतराव भोसले से विवाह किया, जो अधिक समय तक सफल नहीं रहा। इसके बाद उन्होंने अपने साहस और आत्मविश्वास के बल पर अपने बच्चों का पालन-पोषण किया। बाद में उनका विवाह महान संगीतकार आर. डी. बर्मन से हुआ, जिनके साथ उनका संबंध न केवल वैवाहिक बल्कि सांगीतिक रूप से भी अत्यंत सफल और प्रेरणादायक रहा। उनके परिवार में उनके बच्चे और पोते-पोतियाँ शामिल हैं, जिनके साथ उनका गहरा स्नेहपूर्ण संबंध रहा।</div><div><br></div><div>उनकी आवाज केवल गीत नहीं थी, बल्कि भावनाओं का अथाह सागर थी- खुशी, दर्द, प्रेम और जीवन के हर रंग को उन्होंने अपने सुरों में अद्भुत संवेदनशीलता के साथ पिरोया। दशकों तक उन्होंने संगीत जगत पर अपनी अमिट छाप बनाए रखी और हमें अनगिनत यादगार गीतों की अमूल्य धरोहर दी, जो सदैव हमारे दिलों में गूंजती रहेगी। उन्होंने अपनी मधुर और भावपूर्ण आवाज से कई पीढ़ियों के हृदय को स्पर्श किया तथा भारतीय संगीत को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। उनके गीत न केवल मनोरंजन का माध्यम रहे, बल्कि भावनाओं की अभिव्यक्ति का सशक्त स्वर भी बने, जो उन्हें सदैव हमारे बीच जीवित रखेंगे। आज का दिन हर भारतीय, विशेषकर संगीत प्रेमियों के लिए अत्यंत दुखद है। आशा जी ने न केवल अपनी सुरमयी आवाज से एक विशिष्ट पहचान बनाई, बल्कि अपने सुरों के माध्यम से भारतीय संगीत को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। हर तरह के संगीत में ढल जाने की उनकी अनोखी प्रतिभा ने उन्हें युगों-युगों तक अमर बना दिया है। उनके गाए हुए गीत आज भी हर दिल में जीवित हैं और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देते रहेंगे। आशा जी भले ही आज हमारे बीच नहीं रहीं, लेकिन उनका संगीत सदैव अमर रहेगा और उनके सुर हमेशा हमारे दिलों में गूंजते रहेंगे।</div><div><br></div><div>- डॉ. ब्रह्मानंद राजपूत</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 13 Apr 2026 14:35:40 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/asha-ji-sweet-and-melodious-voice-will-forever-remain-immortal-in-our-hearts</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Lalji Tandon Birth Anniversary: UP Politics के 'चाणक्य' थे लालजी टंडन, Mayawati बांधती थीं राखी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/lalji-tandon-chanakya-of-up-politics-mayawati-used-to-tie-rakhi-to-him]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>मध्य प्रदेश के राज्यपाल और लखनऊ के पूर्व सांसद लालजी टंडन का जन्म 12 अप्रैल को हुआ था। वह पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के बेहद करीबी थे। यही कारण था कि जब बाजपेयी राजनीति से दूर हुए, तो उनकी विरासत लखनऊ लोकसभा सीट लालजी टंडन को दी गई थी। वह भाजपा-बसपा की गठबंधन सरकार में नगर विकास मंत्री रहे थे। उन्होंने बसपा सुप्रीमो मायावती को बहन माना था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर लालजी टंडन के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में 12 अप्रैल 1935 को लालजी टंडन का जन्म हुआ था। वहीं महज 12 साल की उम्र में वह संघ से जुड़ गए थे। वह संघ की शाखाओं में जाया करते थे, संघ से जुड़ाव के कारण ही लालजी टंडन की मुलाकाल अटल बिहारी वाजपेयी से हुई थी।</div><div><br></div><h2>यूपी की राजनीति में कई प्रयोग</h2><div>उत्तर प्रदेश की राजनीति में लालजी टंडन को अलग-अलग प्रयोगों के लिए जाना जाता है। 90 के दशक में यूपी में बनी भाजपा और बसपा की सरकार के गठजोड़ के पीछे लालजी टंडन की बड़ी भूमिका मानी जाती है। बसपा प्रमुख मायावती लालजी टंडन को राखी बांधती थीं।</div><div><br></div><h2>संभाली लखनऊ की कमान</h2><div>साल 1996 से लेकर 2009 तक लालजी टंडन लगातार तीन बार विधायक का चुनाव जीते थे। वहीं साल 1997 में वह नगर विकास मंत्री भी रहे। पूर्व पीएम अटल बिहारी के राजनीति से दूर होने के बाद साल 2009 में भारतीय जनता पार्टी ने लखनऊ लोकसभा सीट लालजी टंडन को सौंपी थी। उन्होंने यहां से चुनाव भी लड़ा था। इससे पहले साल 1978 से 1984 तक और फिर 1990 से 1996 तक वह दो बार यूपी विधानपरिषद के सदस्य रहे। फिर साल 1991 में वह उत्तर प्रदेश के मंत्री पद पर भी रहे थे।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 21 जुलाई 2020 को 85 वर्ष की आयु में लखनऊ के मेदांता अस्पताल में लालजी टंडन का निधन हो गया।</div>]]></description>
      <pubDate>Sun, 12 Apr 2026 11:50:14 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/lalji-tandon-chanakya-of-up-politics-mayawati-used-to-tie-rakhi-to-him</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Rana Sanga Birth Anniversary: वो Rajput योद्धा जिसने Babur को दी कड़ी टक्कर, जानें Khanwa युद्ध की पूरी Story]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/rajput-warrior-who-gave-tough-fight-to-babur-know-full-story-of-battle-of-khanwa]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>महान राजपूत शासक राणा सांगा का 12 अप्रैल को जन्म हुआ था। राणा सांगा अपने दुश्मनों पर काल बनकर टूटते थे और उनका नाम सुनकर दुश्मन भी डर के मारे कांपते थे। वह एक अत्यंत पराक्रमी राजा थे। राणा सांगा का एक हाथ, एक आंख और एक पैर कट जाने के बाद भी उन्होंने अपने राज्य की लड़ाई लड़ने का जज्बा नहीं छोड़ा था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर राणा सांगा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>मेवाड़ के चित्तौड़ वर्तमान राजस्थान में 12 अप्रैल 1482 को राणा सांगा का जन्म हुआ था। वह राजपूत वंश से ताल्लुक रखते थे। उनके पिता का नाम राणा रायमल था और रानी रतन कुंवरी उनकी मां थीं। पिता की मृत्यु के बाद मेवाड़ के पुत्रों के बीच सिंहासन के लिए एक भयंकर संघर्ष का सामना करना पड़ा था।</div><div><br></div><div>अपने भाइयों के साथ संघर्ष में पृथ्वीराज ने राणा सांगा की एक आंख फोड़ दी थी। ऐसे में उनको चित्तौड़ से भागकर अजमेर में शरण लेना पड़ा। पृथ्वीराज की मृत्यु के बाद 1508 में राणा सांगा मेवाड़ के सिंहासन पर बैठे थे।</div><div><br></div><h2>सैन्य उपलब्धियां</h2><div>मेवाड़ के इतिहास में 1508 से 1528 तक का समय राणा सांगा के शासनकाल के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दौरान राणा सांगा ने अपने सैन्य कमान, अदम्य साहस और कूटनीतिक रणनीतियों के जरिए मेवाड़ के वर्चस्व और समृद्धि को बहाल किया था।</div><div><br></div><div>राणा सांगा ने करीब 18 भीषण लड़ाइयों में दिल्ली के लोदी वंश, मालवा और गुजरात के सुल्तानों सहित कई पड़ोसी मुस्लिम शासकों के खिलाफ जीत हासिल की थी। वहीं उन्होंने वर्तमान राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और सिंध के कुछ हिस्सों सहित मेवाड़ के क्षेत्र का काफी ज्यादा विस्तार किया था।</div><div><br></div><h2>मुगलों के साथ संघर्ष</h2><div>बाबर के अधीन बढ़ते मुगल साम्राज्य के खिलाफ राणा सांगा अपने विरोध के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने बाबर की सेना को चुनौती देने के लिए एक महान राजपूत परिसंघ का गठन किया था। वहीं 1527 में खानवा का युद्ध राणा सांगा के लिए एक निर्णायक लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण युद्ध साबित हुआ। यहां पर राणा सांगा की सेना अपनी बहादुरी के बाद भी बाबर की बेहतर रणनीति और तोपखाने से हार गई। इस युद्ध में राणा सांगा भी बुरी तरह से जख्मी हो गए थे।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 30 जनवरी 1528 को राणा सांगा की कालपी में मृत्यु हो गई थी।</div>]]></description>
      <pubDate>Sun, 12 Apr 2026 11:17:51 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/rajput-warrior-who-gave-tough-fight-to-babur-know-full-story-of-battle-of-khanwa</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Ravindra Kaushik Birth Anniversary: जानें RAW के जासूस रवींद्र कौशिक की कहानी, जिसे Pakistan में मिला था मेजर का पद]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/learn-story-of-raw-spy-ravindra-kaushik-who-promoted-to-major-in-pakistan]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>रवींद्र कौशिक एक जबांज देशभक्त थे। आज ही के दिन यानी की 11 अप्रैल को रवींद्र कौशिक का जन्म हुआ था। वह एक भारतीय अभिनेता थे, जिनको RAW ने जासूस बनाकर पाकिस्तान भेजा था। उन्होंने पाकिस्तान में रहकर वहां की सेना में मेजर के पद तक का सफर तय किया था। 8 सालों तक वह कई अहम जानकारियां भारत भेजते रहे थे। हालांकि एक ऑपरेशन के दौरान उनका भेद खुल गया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर रवींद्र कौशिक के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>राजस्थान के श्रीगंगानगर में 11 अप्रैल 1952 को रवींद्र कौशिक का जन्म हुआ था। वह एक मध्यमवर्गीय ब्राह्मण परिवार से आते थे। रवींद्र पढ़ाई में तेज और कला के प्रति जुनूनी थे। वह कॉलेज के दिनों में कई स्टेज नाटक में हिस्सा लेते थे। अभिनय की गहराई और संवाद की अदायगी लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती थी। उनकी किस्मत ने यहीं से मोड़ लिया। एक नाटक में रवींद्र को भारतीय खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग अधिकारियों ने देखा। यहां से तय हुआ कि यह कलाकार एक दिन जासूस बनेगा।&nbsp;</div><div><br></div><h2>ऐसे हुई ट्रेनिंग</h2><div>बता दें कि 23 साल की उम्र में रवींद्र कौशिक को RAW ने सीक्रेटली रिक्रूट किया। फिर उनको दो सालों तक ट्रेनिंग दी गई। जिसमें उनको इस्लामी रीति-रिवाज, उर्दू, पाकिस्तान की राजनीति और मिलिट्री स्ट्रक्चर आदि के बारे में जानकारी दी गई। रवींद्र का नाम, धर्म और पहचान सब बदल दी गई। अब वह रवींद्र से 'नबी अहमद शाकिर' बन चुके थे। साल 1975 में उनको पाकिस्तान भेज दिया गया था। यहां पर उन्होंने लॉ की पढ़ाई की और सेना में कमीशन लिया और मेजर बन गए। रवींद्र ने RAW को कई अहम जानकारियां भेजीं, जोकि भारत की सुरक्षा के लिए अहम साबित हुईं।</div><div><br></div><h2>रॉ तक पहुंचाई कई जानकारी</h2><div>पाकिस्तान में रवींद्र पूरी तरह से अपनी नई पहचान में रह चुके थे। रवींद्र ने एक पाकिस्तानी महिला से शादी की और उनका एक बेटा भी था। वह पूरी तरह से पाकिस्तानी नागरिक की तरह जीते रहे। लेकिन अंदर से वह एक सच्चे भारतीय थे। पाकिस्तानी सेना में रहते हुए वह सामरिक दस्तावेज, गुप्त मिशन और सेना की गतिविधियों की जानकारी RAW तक पहुंचाते रहे। करीब 8 साल तक वह पाकिस्तान में देश के लिए काम करते रहे। लेकिन बिना किसी शक के उनकी जिंदगी हमेशा के लिए ऐसी नहीं चल सकी।</div><div><br></div><h2>पकड़े गए रवींद्र</h2><div>साल 1983 में रवींद्र का नाम उजागर हो गया और इसके बाद उनको फौरन गिरफ्तार कर लिया गया। जिसके बाद पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI ने उनको पकड़कर भारी यातनाएं दीं। रवींद्र कौशिक कई सालों तक जेल की काल कोठरी में अमानवीय परिस्थितियों में रहकर सब कुछ सहा। लेकिन उन्होंने देश के खिलाफ एक शब्द नहीं कहा। वहीं साल 1985 में रवींद्र को फांसी की सजा सुनाई थी, जोकि बाद में उम्र कैद में बदल गई।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>पाकिस्तानी जेल में रवींद्र ने 16 साल बिताए थे। टीबी और दिल की बीमारे ने धीरे-धीरे रवींद्र की हालत बिगाड़ दी थी। वहीं 2001 में रवींद्र कौशिक का मुल्तान जेल में निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 11 Apr 2026 11:13:05 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/learn-story-of-raw-spy-ravindra-kaushik-who-promoted-to-major-in-pakistan</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Kasturba Gandhi Birth Anniversary: सिर्फ Mahatma Gandhi की पत्नी नहीं, एक प्रखर स्वतंत्रता सेनानी थीं 'बा', Freedom Struggle में कई बार गईं जेल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/fierce-freedom-fighter-and-imprisoned-several-times-during-freedom-struggle]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>महान स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक कस्तूरबा गांधी का 11 अप्रैल को जन्म हुआ था। वह महात्मा गांधी की पत्नी थीं। लोग कस्तूरबा गांधी को 'बा' भी कहते थे। कस्तूरबा गांधी ने ब्रिटिश भारत के दौरान भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। कस्तूरबा गांधी ने हर कदम पर महात्मा गांधी का साथ दिया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर कस्तूरबा गांधी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>गुजरात के पोरबंदर में 11 अप्रैल 1869 को कस्तूरबा गांधी का जन्म हुआ था। वहीं महज 13 साल की उम्र में कस्तूरबा गांधी का विवाह महात्मा गांधी से कर दिया गया था। औपचारित रूप से कस्तूरबा गांधी पढ़ी-लिखी नहीं थी। शादी के बाद महात्मा गांधी ने अपनी पत्नी को पढ़ाने का काम किया था।</div><div><br></div><h2>शिक्षा के प्रति जागरुकता</h2><div>कस्तूरबा मोहनदास करमचंद गांधी को 'बा' के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने अपने जीवन में कई सारी भूमिकाएं निभाईं। सीमित संसाधनों के बाद भी कस्तूरबा ने असाधारण साहस दिखाया। उन्होंने महिलाओं को सशक्त बनाने का बीड़ा उठाया। उन्होंने तमाम कठिनाइयों को पार करते हुए यह साबित कर दिखाया था कि असली ताकत ज्ञान की डिग्री नहीं बल्कि इरादों और हिम्मत में होती है।</div><div><br></div><h2>आजादी में योगदान</h2><div>कस्तूरबा गांधी ने हमेशा अन्याय और नस्लभेद के खिलाफ आवाज उठाई। हालांकि वह गांधीजी की सभी बातों से सहमत नहीं रहती थीं। लेकिन जब महात्मा गांधी ने अपने सिद्धांतों को घर पर लागू करना शुरू किया तो कस्तूरबा ने इसका विरोध किया। कस्तूरबा गांधी ने हमेशा आत्मसम्मान और अधिकारों के लिए आवाज उठाई। साल 1977 में उन्होंने साउथ अफ्रीका में चंपारण सत्याग्रह आंदोलनों में हिस्सा लिया। कस्तूरबा ने स्वतंत्रता आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई और आजादी की लड़ाई में हिस्सा लेने के कारण वह कई बार जेल भी गईं।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>महाराष्ट्र स्थित आगा खान महल में 22 फरवरी 1944 को कस्तूरबा गांधी की मृत्यु हो गई थी।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 11 Apr 2026 10:39:11 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/fierce-freedom-fighter-and-imprisoned-several-times-during-freedom-struggle</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Jyotiba Phule Birth Anniversary: 19वीं सदी के वो नायक, जिनकी Social Justice की लड़ाई आज भी प्रासंगिक है]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/19th-century-heroes-whose-fight-for-social-justice-remains-relevant-today]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत के महान समाज सुधारक महात्मा ज्योतिबा फुले का नाम सबसे ऊपर आता है। आज ही के दिन यानी की 11 अप्रैल को ज्योतिबा फुले का जन्म हुआ था। जब 19वीं सदी में समाज में ऊंच-नीच और जातिवाद का बोलबाला था। तब फुले के साहस ने दिखाया और हर व्यक्ति के लिए समान अधिकार के लिए आवाज उठाई थी। उनका मानना था कि शिक्षा सबसे शक्तिशाली हथियार है, जिससे हम समाज में बदलाव ला सकते हैं। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर ज्योतिबा फुले के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>महाराष्ट्र में 11 अप्रैल 1827 को ज्योतिबा फुले का जन्म हुआ था। वह नीची जाति के माली परिवार में पैदा हुए थे। उनको जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ा था। इसके बाद उनके अंदर समाज की जड़ें छुड़ाने का संकल्प जगाया। ज्योतिबा फुले का मानना था कि हर व्यक्ति चाहे किसी भी जाति या लिंग का हो, वह समान अवसर का हकदार है।</div><div><br></div><h2>शिक्षा को बनाया हथियार</h2><div>ज्योतिबा फुले और उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले ने दलित बच्चों और लड़कियों के लिए स्कूल खोले। उस दौर में जब महिलाओं का पढ़ना-लिखना असंभव था, तब उन्होंने विधवाओं के अधिकारों की रक्षा की और अनाथ बच्चों और विधवाओं के लिए आश्रम खोले। ज्योतिबा फुले का यह कदम साहसिक और विवादास्पद माना गया था।</div><div><br></div><h2>महात्मा की उपाधि</h2><div>शोषित वर्ग और दलितों को न्याय दिलाने के लिए ज्योतिबा फुले ने 1873 में सत्यशोधक समाज की स्थापना की थी। ज्योतिबा फुले की समाजसेवा देखकर साल 1888 में मुंबई में एक विशाल सभा में उनको महात्मा की उपाधि दी गई। ज्योतिबा ने ही पहली बार दलित शब्द का प्रयोग किया था।</div><div><br></div><div>ज्योतिबा फुले बाल विवाह विरोधी और विधवा विवाह के समर्थक थे। उन्होंने साल 1863 में उच्च वर्ग गर्भवती विधवाओं के लिए एक घर शुरू किया था, जहां पर गर्भवती महिलाएं अपने बच्चे को सुरक्षित रूप से जन्म दे सकें। ज्योतिबा फुल ने भ्रूण हत्या और शिशु हत्या रोकने के लिए एक अभियान चलाया और अनाथालय खोला।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 28 नवंबर 1890 को ज्योतिबा फुले का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 11 Apr 2026 10:32:48 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/19th-century-heroes-whose-fight-for-social-justice-remains-relevant-today</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Morarji Desai Death Anniversary: पहले Non-Congress PM जिन्हें मिला Bharat Ratna, जानें क्यों Pakistan ने भी दिया सर्वोच्च सम्मान]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/first-non-congress-pm-to-receive-bharat-ratna-why-pakistan-gave-highest-honour]]></guid>
      <description><![CDATA[<div><span style="font-size: 1rem;">भारतीय राजनीति में बहुत कम ऐसे राजनेता हुए, जिन्होंने पूरा जीवन अपने सिद्धांतों का पालन किया। ऐसे ही एक राजनेता मोरारजी देसाई थे। वह अपने सिद्धांतों के लिए किसी से भी लड़ जाते थे। मोरारजी देसाई भारत के चौथे प्रधानमंत्री थे। आज ही के दिन यानी की 10 अप्रैल को मोरारजी देसाई का निधन हो गया था। वह प्रशासनिक नौकरी छोड़कर राजनीति में शामिल हुए थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर मोरारजी देसाई के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</span></div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>गुजरात के भदेली गांव में 29 फरवरी 1896 को मोरारजी देसाई का जन्म हुआ था। देसाई के पिता एक स्कूल शिक्षक थे और बेहद अनुशासन प्रिय थे। बचपन से ही उन्होंने अपने पिता से सभी परिस्थितियों में कड़ी मेहनत करने और सच्चाई के मार्ग पर चलने की सीख ली थी।</div><div><br></div><h2>PM पद के सबसे मजबूत दावेदार</h2><div>मोरारजी देसाई बहुत काबिल नेता थे। साल 1964 में तत्कालीन पीएम नेहरू के निधन के बाद वह पीएम पद के सबसे मजदूर दावेदार थे। लेकिन कांग्रेस के अंदर चल रही गुटबाजी के कारण वह अपने साथ अधिक सदस्यों को नहीं जोड़ पाए। ऐसे में लाल बहादुर शास्त्री अगले पीएम बने। लेकिन साल 1966 में शास्त्री के निधन के बाद एक बार फिर पीएम पद खाली हो गया। मोरारजी और इंदिरा गांधी में प्रधानमंत्री बनने को लेकर टक्कर थी।</div><div><br></div><div>मोरारजी देसाई खुद को कांग्रेस का बड़ा नेता समझते थे। वह इंदिरा को गूंगी गुड़िया कहते थे। वहीं अन्य कई नेता भी इंदिरा का विरोध कर रहे थे। लेकिन इसके बाद भी इंदिरा गांधी देश की अगली प्रधानमंत्री बनीं और मोरारजी का विरोध दरकिनार रह गए।</div><div><br></div><h2>जयप्रकाश के समर्थन से बने PM</h2><div>वहीं नवंबर 1969 में कांग्रेस का विभाजन हुआ और इंदिरा ने नई कांग्रेस बनाई। तो मोरारजी देसाई इंदिरा के खिलाफ वाले खेमे कांग्रेस ओ में थे। साल 1975 में देसाई जनता पार्टी में शामिल हो गए। वहीं मार्च 1977 में जब लोकसभा चुनाव हुए, तो जनता पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिला। लेकिन देसाई के लिए पीएम बनना इतना आसान नहीं था। क्योंकि चौधरी चरण सिंह और जगजीवन राम भी पीएम पद के दावेदार थे।&nbsp;</div><div><br></div><div>ऐसे में जेपी नारायण का समर्थन काम आया और मोरारजी पीएम बने। बता दें कि साल 1977 से लेकर 1979 तक मोरारजी देसाई का कार्यकाल बतौर प्रधानमंत्री रहे। लेकिन चौधरी चरण सिंह के साथ हुए मतभेदों की वजह से उनको प्रधानमंत्री का पद छोड़ना पड़ा।</div><div><br></div><h2>सम्मान</h2><div>मोरारजी देसाई देश के इकलौते प्रधानमंत्री थे, जिनको भारत और पाकिस्तान दोनों ने ही अपने सर्वोच्च सम्मान से नवाजा है। उनको भारत रत्न और पाकिस्तान के सर्वोच्च सम्मान 'निशान-ए-पाकिस्तान' मिल चुका है।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 28 जुलाई 1979 को मोरारजी देसाई ने भारत के पीएम पद से इस्तीफा दे दिया। इस्तीफा देने के बाद उन्होंने 83 साल की उम्र में राजनीति से संन्यास ले लिया और वह दिल्ली छोड़कर मुंबई में रहने लगे। फिर 10 अप्रैल 1995 को 99 साल की उम्र में मोरारजी देसाई का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 10 Apr 2026 12:58:16 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/first-non-congress-pm-to-receive-bharat-ratna-why-pakistan-gave-highest-honour</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Bankim Chandra Chattopadhyay Death Anniversary: वो 'साहित्य सम्राट' जिसने कलम से जगाई थी Freedom की ज्वाला]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/sahitya-samrat-who-ignited-the-flame-of-freedom-with-his-pen]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत के प्रसिद्ध लेखक, पत्रकार और कवि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय का 08 अप्रैल को निधन हो गया था। उनको बंगाली भाषा का साहित्य का सम्राट कहा जाता है। वह भारतीय राष्ट्रवाद के शुरूआती समर्थकों में से एक थे। वहीं उनकी रचनाएं स्वतंत्रता संग्राम को प्रेरणा देती थीं। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की सबसे फेमस रचना 'वंदे मातरम्' है, जो आजादी की लड़ाई का नारा बन गया। तो आइए जानते हैं उनके डेथ एनिवर्सरी के मौके पर बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और शिक्षा</h2><div>पश्चिम बंगाल में 27 जून 1838 को बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय का जन्म हुआ था। उन्होंने बंगाली और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में शिक्षा ली थी। बंकिम चट्टोपाध्याय ने कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से पढ़ाई की थी। फिर उन्होंने ब्रिटिश शासन के दौरान सरकारी नौकरी भी की। उन्होंने अपने साहित्य से लोगों को जागरुक किया और आदाजीस की भावना को मजबूत किया।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/from-banaras-to-america-story-of-maestro-who-conquered-world-with-tunes-of-sitar" target="_blank">Pandit Ravi Shankar Birth Anniversary: बनारस से America तक, सितार के सुरों से दुनिया जीतने वाले 'Maestro' की कहानी</a></h3><h2>बंगाली साहित्य के लेखक</h2><div>बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय को बंगाली साहित्य के सबसे महान लेखकों में एक माना जाता है। उनके उपन्यासों और कहानियों ने भारतीय साहित्य को नई दिशा दी है। अंग्रेजों के शासन में लोगों के दिलों में देशभक्ति की भावना जगाई थी। उनका नाम आज भी राष्ट्र प्रेम और भारतीय प्रतीक की पहचान है।</div><div><br></div><h2>किसने लिखा 'वंदे मातरम्'</h2><div>किम चंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास आनंदमठ का एक गीत 'वंदे मातरम्' है। बाद में यह भारत के स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीय गौरव के परिदृश्यों के उपयोग के लिए एक राष्ट्रगान बन गया। साल 1870 में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 'वंदे मातरम' लिखा था।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 08 अप्रैल 1894 को बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 08 Apr 2026 16:23:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/sahitya-samrat-who-ignited-the-flame-of-freedom-with-his-pen</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Pandit Ravi Shankar Birth Anniversary: बनारस से America तक, सितार के सुरों से दुनिया जीतने वाले 'Maestro' की कहानी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/from-banaras-to-america-story-of-maestro-who-conquered-world-with-tunes-of-sitar]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारतीय संगीत को दुनियाभर में लोकप्रिय बनाने वाले मशहूर सितार वादक पंडित रवि शंकर 07 अप्रैल को जन्म हुआ था। पंडित रविशंकर का संगीत आज भी संगीत प्रेमियों के बीच सुना जाता है। हालांकि शुरूआत में उनका झुकाव नृत्य की ओर था, लेकिन महज 18 साल की उम्र में उन्होंने सितार सीखना शुरू कर दिया था। फिर अपनी इस विधा में पंडित रविशंकर ने देश-विदेश में भारत का नाम रोशन किया था। वह संगीत की दुनिया के एक लीजेंड के रूप में जाने जाते हैं। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पंडित रविशंकर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>बनारस में 07 अप्रैल 1920 को पंडित रविशंकर का जन्म हुआ था। वह 7 भाइयों में सबसे छोटे थे। उनके भाई एक अच्छे डांसर हुआ करते थे। वहीं पंडित रविशंकर अपने भाई उदय शंकर के डांस ग्रुप के मेंबर थे। जिसके कारण वह अक्सर भारत से यूएस डांस मेंबर के रूप में जाने जाते थे। इस दौरान उन्होंने कई वाद्ययंत्रों को बजाना सीख लिया था। वहीं पंडित रविशंकर ने विदेशी संगीत जैसे जैज आदि की जानकारी भी हासिल की थी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/first-field-marshal-sam-manekshaw-not-accept-defeat-even-after-shot-7-times" target="_blank">Sam Manekshaw Birth Anniversary: World War II में 7 गोलियां खाकर भी नहीं मानी हार, ऐसे थे भारत के पहले Field Marshal सैम मानेकशॉ</a></h3><h2>संगीत शिक्षा</h2><div>साल 1938 में पंडित रविशंकर ने डांस छोड़कर उस्ताद अलाउद्दीन खान से सितार वादन की शिक्षा लेनी शुरू की। उन्होंने मैहर घराने में 7 साल तक उस्ताद अलाउद्दीन खां से सितार की शिक्षा हासिल की। फिर वह सितार वादन में पारंगत हो गए।</div><div><br></div><h2>ऑल इंडिया रेडियो के म्यूजिक डायरेक्टर</h2><div>साल 1944 में रविशंकर मुंबई चले गए। यहां वह इंडियन पीपल्स थिएटर एसोसिएशन में शामिल हो गए। इसके लिए साल 1945 में बैलेट्स और 1946 में धरती के लाल के लिए संगीत तैयार किया। वहीं 25 साल की उम्र में पंडित रविशंकर उन्होंने 'सारे जहां से अच्छा' की धुन को फिर से तैयार किया। इसके अलावा वह साल 1949 से 1956 तक ऑल इंडिया रेडियो के संगीत निर्देशक रहे। उन्होंने एआईआर में इंडियन नेशनल ऑर्केस्ट्रा की स्थापना की।</div><div><br></div><h2>विश्व में गूंजी सितार की धुन</h2><div>बता दें कि 1960 का दशक आते-आते वह विश्व विख्यात हो गए थे। उनके संगीत की पूरी दुनिया दीवानी होने लगी थी। भारत से लेकर विदेशों तक में पंडित रविशंकर के सितार की धुन गूंज रही थी। वह लगातार पेरिस, लंदन, न्यूयॉर्क समेत दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में जाकर अपने शो करने लगे। यहां तक उस दौर का फेमस बीटल्स बैंड भी उनके संगीत का दीवाना था।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 11 दिसंबर 2012 को 92 वर्ष की आयु में पंडित रविशंकर का अमेरिका के सैन डिएगो में निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 07 Apr 2026 12:36:28 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/from-banaras-to-america-story-of-maestro-who-conquered-world-with-tunes-of-sitar</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Sam Manekshaw Birth Anniversary: World War II में 7 गोलियां खाकर भी नहीं मानी हार, ऐसे थे भारत के पहले Field Marshal सैम मानेकशॉ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/first-field-marshal-sam-manekshaw-not-accept-defeat-even-after-shot-7-times]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 03 अप्रैल को भारत के प्रथम फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ का जन्म हुआ था। उन्होंने साल 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध में भारतीय सेना का नेतृत्व किया था। जिससे बांग्लादेश का निर्माण हुआ था। बता दें कि वह असाधारण साहस, तीक्ष्ण बुद्धि और अद्वितीय नेतृत्व क्षमता वाले सैनिक थे। सैम मानेकशॉ का नाम भारतीय सैन्य इतिहास में अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर सैम मानेकशॉ के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>पंजाब के अमृतसर में 03 अप्रैल 1914 को सैम मानेकशॉ का जन्म हुआ था। उन्होंने अपनी शुरूआती शिक्षा नैनीताल के शेरवुड कॉलेज से की थी। फिर बाद में भारतीय सैन्य अकादमी देहरादूर से प्रशिक्षण लिया था। मानेकशॉ इंग्लैंड जाकर पढ़ाई करना चाहते थे। लेकिन पिता से अनुमति न मिलने पर उन्होंने सेना में भर्ती होने का निर्णय लिया।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/freedom-fighter-of-congress-then-why-he-form-rss-know-full-story" target="_blank">KB Hedgewar Birth Anniversary: कांग्रेस के Freedom Fighter, फिर क्यों बनाई RSS? जानिए पूरी कहानी</a></h3><h2>ब्रिटिश इंडियन आर्मी में हुए शामिल</h2><div>साल 1934 में सैम मानेकशॉ ब्रिटिश इंडियन आर्मी में शामिल हुए। सेकेंड वर्ल्ड वॉर के दौरान वह बर्मा मोर्चे पर तैनात थे। इस दौरान उनको लड़ते हुए जापानी सेना का सात गोलियां लगीं। मानेकशॉ की गंभीर हालत देखते हुए डॉक्टरों ने इलाज करने से इंकार कर दिया। लेकिन इलाज के बाद वह पूरी तरह से ठीक हो गए।</div><div><br></div><div>फिर साल 1971 में देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सैम मानेकशॉ से पाकिस्तान पर हमले की सलाह ली। लेकिन उन्होंने हमला करने से इंकार कर दिया और 6 महीने का समय मांगा। इस दौरान सैम मानेकशॉ ने भारतीय सेना को पूरी तरह से तैयार किया। जिसके परिणामस्वरूप दिसंबर 1971 में युद्ध हुआ और पाकिस्तान को करारी हार का सामना करना पड़ा। इस जीत के साथ बांग्लादेश का गठन हुआ था।</div><div><br></div><div>सम्मान</div><div>साल 1972 में सैम मानेकशॉ की बहादुरी और सैन्य नेतृत्व के लिए उनको फील्ड मार्शल की उपाधि दी गई। जोकि भारतीय सेना की सर्वोच्च सैन्य रैंक है। इस पद को पाने वाले मानेकशॉ भारत के पहले सैन्य अधिकारी थे। फिर साल 1968 में उनको 'पद्म भूषण' और 1972 में 'पद्म विभूषण' से सम्मानित किया गया।</div><div><br></div><div>मृत्यु</div><div>साल 1973 में सेना प्रमुख के पद से रिटायर होने के बाद सैम मानेकशॉ ने तमिलनाडु के कन्नूर में जीवन बिताया। वहीं 27 जून 2008 को 94 साल की उम्र में सैम मानेकशॉ का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 03 Apr 2026 12:03:41 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/first-field-marshal-sam-manekshaw-not-accept-defeat-even-after-shot-7-times</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Shivaji Maharaj Death Anniversary: 15 साल की उम्र में Shivaji Maharaj ने कैसे रखी थी Hindu Swaraj की नींव]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/how-did-shivaji-maharaj-lay-foundation-of-hindu-swaraj-at-age-of-15]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>छत्रपति शिवाजी महाराज भारतीय इतिहास के एक ऐसे महानायक हैं, जो वीरता और स्वाभिमान के प्रतीक माने जाते हैं। आज ही के दिन यानी की 03 अप्रैल को शिवाजी महाराज की मृत्यु हुई थी। उस दौरान उनकी उम्र सिर्फ 50 साल थी। माना जाता है कि शिवाजी महाराज की मृत्यु रहस्यमयी थी। शिवाजी की एक हुंकार से उनके समकालीन मुगल शासक औरंगजेब थर-थर कांपता था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>बता दें कि 19 फरवरी 1630 को छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्म हुआ था। उनके पिता का नाम शाहजी भोंसले और मां का नाम जीजाबाई थी। इस दौरान न सिर्फ महाराष्ट्र बल्कि पूरा भारत मुगल आक्रमणकारियों के सामने बेबस था। मुगलों ने दिल्ली सहित पूरे भारत पर कब्जा कर लिया था। ऐसे में छत्रपति शिवाजी महाराज ने महज 15 साल की उम्र में हिंदू हुकूमत को एक बार फिर से स्थापित करने की प्रतिज्ञा ली थी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/picked-up-sword-age-of-13-know-entire-journey-of-becoming-hind-ki-chadar" target="_blank">Guru Tegh Bahadur Birth Anniversary: 13 साल में उठाई तलवार, जानें 'हिंद की चादर' बनने का पूरा सफर</a></h3><h2>सनातन धर्म की रक्षा</h2><div>शिवाजी महाराज ने न सिर्फ मराठा साम्राज्य की नींव रखी, बल्कि सनातन धर्म की रक्षा के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया था। उन्होंने 15 साल की उम्र में मुगल सल्तनत को धूल चटाने के लिए बीजापुर पर हमला कर दिया। शिवाजी जी ने गोरिल्ला युद्ध नीति के जरिए बीजापुर के शासक आदिलशाह को घुटने पर मजबूर कर दिया था।&nbsp;</div><div><br></div><h2>शिवाजी को बना लिया बंदी</h2><div>साल 1966 में आदिलशाह को मौत के घाट उतारने के बाद शिवाजी ने बीजापुर के चार किलों पर कब्जा जमा लिया था। जिसके बाद शिवाजी को बंदी बनाने के लिए औरंगजेब ने संधि का हाथ आगे बढ़ाया। जब शिवाजी संधि प्रस्ताव के तहत आगरा पहुंचे, तो उनको बंदी बना लिया गया। लेकिन मुगलिया सल्तनत उनको अधिक समय तक बंदी नहीं बना सकी। शिवाजी एक फल की टोकरी में बैठकर जेल से फरार हो गए। इस घटना के बाद शिवाजी ने तय कर लिया कि वह मुगलिया सल्तनत को जड़ से खत्म कर देंगे।</div><div><br></div><h2>सभी धर्मों का करते थे सम्मान</h2><div>शिवाजी सभी धर्मों का सम्मान करते थे। उन्होंने कभी किसी धार्मिक स्थल पर हमला नहीं किया। वह जबरन धर्म परिवर्तन के भी खिलाफ थे। शिवाजी महाराज ने अपने राजकाज में संस्कृत और फारसी को ज्यादा वरीयता दी थी।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 03 अप्रैल 1680 को छत्रपति शिवाजी महाराज का पहाड़ी दुर्ग राजगढ़ निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 03 Apr 2026 11:48:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/how-did-shivaji-maharaj-lay-foundation-of-hindu-swaraj-at-age-of-15</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[KB Hedgewar Birth Anniversary: कांग्रेस के Freedom Fighter, फिर क्यों बनाई RSS? जानिए पूरी कहानी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/freedom-fighter-of-congress-then-why-he-form-rss-know-full-story]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 01 अप्रैल को केशव बलिराम हेडगेवार का जन्म हुआ था। के.बी हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की नींव रखी थी। वह संघ के पहले सरसंघचालक बने। उन्होंने शुरूआत से ही संघ को सक्रिय राजनीति से दूर सिर्फ धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों तक सीमित रखा। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर केशव बलिराम हेडगेवार के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>नागपुर के एक संभ्रांत परिवार में 01 अप्रैल 1889 को केशव बलिराम हेडगेवार का जन्म हुआ था। वहीं साल 1902 में प्लेग महामारी में उनके माता-पिता की मृत्यु हो गई थी। इस समय के बी हेडगेवार की उम्र 13 साल थी। जब वह हाई स्कूल में थे तो 'वंदे मातरम' का नारा लगाने पर हेडगेवार को स्कूल से निकाल दिया गया था। 1910 में वह मेडिकल की पढ़ाई के लिए कोलकाता गए। वह जब डॉक्टर बनकर नागपुर वापस आए, तो उन्होंने एक भी दिन प्रैक्टिस नहीं की।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/picked-up-sword-age-of-13-know-entire-journey-of-becoming-hind-ki-chadar" target="_blank">Guru Tegh Bahadur Birth Anniversary: 13 साल में उठाई तलवार, जानें 'हिंद की चादर' बनने का पूरा सफर</a></h3><h2>आजादी की लड़ाई से जुड़े</h2><div>हेडगेवार कांग्रेस से जुड़ गए और साल 1921 के असहयोग आंदोलन में उग्र भाषण देने के आरोप में हेडगेवार को एक साल की सजा सुनाई गई। जेल से छूटने के बाद देश भर में भड़के भीषण सांप्रदायिक दंगों ने उनको झझकोर कर रख दिया। उनको समझ आ गया कि तत्कालिक राजनीतिक उत्तेजना नहीं बल्कि दीर्घकालिक 'चरित्र निर्माण' की जरूरत महसूस हुई।</div><div><br></div><h2>आरएसएस की स्थापना</h2><div>इस वैचारिक मंथन से ही 27 सितंबर 1925 को नागपुर के एक मैदान में कुछ बच्चों के साथ आरएसएस यानी की राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना हुई। उन्होंने शाखा को सिर्फ शारीरिक व्यायाम का अखाड़ा नहीं बल्कि सामाजिक समानता की माइक्रोलैब भी बनाई। उन्होंने संघ की रोजमर्रा की दलगत राजनीति से दूऱ रखी। लेकिन कभी स्वतंत्रता संग्राम से कभी पीठ नहीं दिखाई। साल 1930 महात्मा गांधी ने सविनय आंदोलन शुरू किया। तब हेडगेवार ने सरसंघचालक का पद छोड़ दिया और हजारों स्वयंसेवकों के साथ 'जंगल सत्याग्रह' किया। इस दौरान उन्होंने 9 महीने की जेल की सजा काटी।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 21 जून 1940 को 51 साल की उम्र में केशव बलिराम हेडगेवार का निधन हो गया था।&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 01 Apr 2026 16:50:06 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/freedom-fighter-of-congress-then-why-he-form-rss-know-full-story</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Guru Tegh Bahadur Birth Anniversary: 13 साल में उठाई तलवार, जानें 'हिंद की चादर' बनने का पूरा सफर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/picked-up-sword-age-of-13-know-entire-journey-of-becoming-hind-ki-chadar]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सिख धर्म में गुरु तेग बहादुर का नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। आज ही के दिन यानी की 01 अप्रैल को गुरु तेग बहादुर का जन्म हुआ था। गुरु तेग बहादुर ने मुगलों के अत्याचार से पीड़ित हिंदू समाज को बचाने के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया था। गुरु तेग बहादुर को 'हिंद की चादर' भी कहा जाता था। उन्होंने अपना सिर कलम कराना मंजूर कर लिया, लेकिन इस्लाम स्वीकार नहीं किया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर गुरु तेग बहादुर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>पंजाब के अमृतसर में 01 अप्रैल 1621 को गुरु तेग बहादुर का जन्म हुआ था। इनके बचपन का नाम त्यागमल था। उनके पिता का नाम गुरु हरगोबिंद साहिब और मां का नाम नानकी था। गुरु हरगोविंद सिंह सिखों के छठे गुरु थे। माना जाता है कि त्यागमल ने महज 13 साल की उम्र में मुगलों के खिलाफ लड़ने के लिए तलवार उठा ली थी। जिसके चलते उनके पिता ने इनका नाम बदलकर तेग बहादुर रख दिया था। लंबे समय तक गुरु तेग बहादुर ने बकाला में आध्यात्मिक साधना की और बाद में सिखों के 9वें गुरु बने।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/challenged-british-rule-by-sending-bangles-discover-the-saga-of-valor-of-the-warrior-avantibai" target="_blank">Avantibai Lodhi Death Anniversary: चूड़ियां भेजकर British Rule को दी चुनौती, जानें वीरांगना महारानी अवंतीबाई की शौर्यगाथा</a></h3><h2>हिंद की चादर</h2><div>बता दें कि गुरु तेग बहादुर 'हिंद की चादर' कहा जाता है। क्योंकि उन्होंने मुगलों के अत्याचार के आगे कभी घुटने नहीं टेके और अपने सिद्धांत पर अडिग रहते हुए भारत के आत्मसम्मान को बनाए रखने का काम किया। उन्होंने मुगलों से पीड़ित कश्मीरी पंडितों को यह भरोसा दिलाया था कि उनके बलिदान के बाद मुगल शासक औरंगजेब के सैनिकों का अत्याचार खत्म हो जाएगा। फिर उन्होंने कश्मीरी पंडितों के अधिकारों और विश्वास की रक्षा के लिए जो बलिदान किया, उसके सम्मान में गुरु तेग बहादुर को 'हिंद की चादर' के सम्मान से नवाजा गया।&nbsp;</div><div><br></div><div>दिल्ली के लाल किले के पास गुरु तेग बहादुर ने औरंगजेब द्वारा कश्मीरी पंडितों पर जबरन धर्म परिवर्तन करवाने का विरोध किया था। जिसके बाद औरंगजेब ने गुरु तेग बहादुर पर इस्लाम स्वीकार करने का दबाव करने लगा। जिस पर गुरु तेग बहादुर ने इस्लाम स्वीकार करने से इंकार कर दिया। जिस पर मुगल शासक औरंगजेब ने उनका सिर काटने का आदेश दे दिया था।&nbsp;</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>माना जाता है कि औरंगजेब की तमाम कठोर यातनाओं को गुरु तेग बहादुर सकते रहे, लेकिन उन्होंने झुकने से इंकार कर दिया। इस बात से बौखलाए औरंगजेब ने गुरु तेग बहादुर और उनके साथियों को कठोर मौत दी थी।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 01 Apr 2026 15:52:06 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/picked-up-sword-age-of-13-know-entire-journey-of-becoming-hind-ki-chadar</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Isaac Newton Death Anniversary: Isaac Newton सिर्फ वैज्ञानिक नहीं, एक रहस्यमयी Alchemist भी थे, जानें अनसुनी बातें]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/isaac-newton-not-only-scientist-but-also-mysterious-alchemist]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>दुनिया के महानतम वैज्ञानिक रहे आइजैक न्यूटक का 31 मार्च को निधन हो गया था। उनके दिए तमाम सिद्धांत आज भी विज्ञान और गणित के मूल सिद्धांतों के रूप में पढ़ाए जाते हैं। वह भौतिकविद, लेखक विचारक, खगोलविद और एक अल्केमिस्ट के रूप में मशहूर थे। हालांकि न्यूटन की मृत्यु के बारे में कई तरह की बातें होती हैं। उनका व्यक्तित्व और रुचियां उनको रहस्यमयी बनाती हैं। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर वैज्ञानिक इसाक न्यूटन के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>इंग्लैंड में वूल्सथोर्पे के मैनोर हाउस में 04 जनवरी 1643 को न्यूटन का जन्म हुआ था। उनके जन्म के तीन महीने पहले न्यूटन के पिता का निधन हो गया था। जब न्यूटन 3 साल के थे, तो उनकी मां ने दूसरी शादी कर ली। वहीं न्यूटन अपनी नानी के पास रहे, क्योंकि वह अपने सौतेले पिता को पसंद नहीं करते थे।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/india-first-female-astronaut-who-stunned-the-world-by-going-into-space" target="_blank">Kalpana Chawla Birth Anniversary: भारत की पहली महिला Astronaut, जिसने Space में जाकर दुनिया को चौंका दिया था</a></h3><h2>विज्ञान में योगदान</h2><div>न्यूटन ने सबसे बड़ा योगदान भौतिकी में दिया था। न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण और गुरुत्व का सिद्धांत देते हुए भौतिकी के शास्त्रीय सिद्धांत की नींव रखी थी। खगोलशास्त्र में न्यूटन ने ग्रहों की चाल की बेहतर तरीके से व्याख्या की और पृथ्वी का सही आकार बताया। उन्होंने प्रतिबिम्ब आधारित पहला टेलीस्कोप बनाया। वहीं प्रिज्म के माध्यम से प्रकाशीय रंगों का अध्ययन किया। इसके अलावा न्यूटन ने कूलिंग का नियम, ध्वनि की गति की गणना और न्यूटन का द्रव्य की अवधारणा जैसे कई अहम योगदान दिए।</div><div><br></div><h2>विज्ञान के अलावा रुचि</h2><div>इतने ऊंचे कद के साथ न्यूटन अन्य कई विषयों से जुड़े थे। न्यूटन की थियोलॉजी यानी की ब्रह्मविज्ञान जिसको आध्यात्म या धर्म विज्ञान भी कहा जाता है, उसमें भी गहरी रुचि थी। लेकिन इसके बाद भी न्यूटन चर्च से पवित्र आदेश लेना पसंद नहीं करते थे। उन्होंने बाइबल का भी अध्ययन किया था। उनको अलमेकी में भी काफी दिलचस्पी थी। लेकिन इन दोनों ही विषयों में उनका अधिकतर कार्य मृ्त्यु के बाद ही प्रकाशित हो सका।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 31 मार्च 1727 को न्यूटन की मृत्यु हो गई थी। न्यूटन की मृत्यु सोते समय हुई थी और मृत्यु के बाद न्यूटन के शरीर में बहुत सारा पारा मिला था।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 31 Mar 2026 10:55:37 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/isaac-newton-not-only-scientist-but-also-mysterious-alchemist</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Meena Kumari Death Anniversary: Bollywood में स्टारडम, असल जिंदगी में तन्हाई... Meena Kumari की वो कहानी जो 'Tragedy Queen' बना गई]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/stardom-in-bollywood-loneliness-in-real-life-meena-kumari-became-tragedy-queen]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बॉलीवुड की दिग्गज अभिनेत्री मीना कुमारी ने 31 मार्च को इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। उन्होंने अपने शानदार अभिनय के कारण हिंदी सिनेमा में एक खास मुकाम हासिल किया। फिल्म इंडस्ट्री में मीना कुमारी को 'ट्रेजडी क्वीन' कहा जाता था। अभिनेत्री मीना कुमारी का फिल्मी करियर जितना ज्यादा शानदार था, उनकी पर्सनल लाइफ उतनी ज्यादा दुख भरी रही थी। उन्होंने बाल कलाकार के रूप में अपना सफर शुरू किया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर अभिनेत्री मीना कुमारी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>मुंबई में 01 अगस्त 1933 को मीना कुमारी का जन्म हुआ था। इनका असली नाम महजबीं बानों था। उन्होंने महज 4 साल की उम्र में फिल्म 'लेदरफेस' में बतौर बाल कलाकार काम किया था। इस दौरान उनके परिवार की आर्थिक हालत ठीक नहीं थी। ऐसे में मीना को कम उम्र से काम करना पड़ा था। एक्ट्रेस की मासूमियत और अभिनय की काबिलियत ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा। फिर वह धीरे-धीरे बड़ी फिल्मों का हिस्सा बनने लगीं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/leaving-gun-and-picking-up-pen-army-soldier-became-a-bollywood-legend" target="_blank">Anand Bakshi Death Anniversary: बंदूक छोड़ थामी कलम, Army का जवान ऐसे बना Bollywood का Legend</a></h3><h2>फिल्मफेयर अवॉर्ड</h2><div>बता दें कि 50-60 के दशक में मीना कुमारी हिंदी सिनेमा को सबसे बड़ी एक्ट्रेस बन गई थीं। साल 1952 में फिल्म 'बैजू बावरा' से मीना को पहली बड़ी कामयाबी मिली थी। इसके बाद अभिनेत्री ने फिल्म 'परिणीता', 'साहिब बीबी और गुलाम', 'काजल' और 'दिल अपना और प्रीत पराई' जैसी फिल्मों से लोगों के दिलों में खास जगह बनाई। मीना की आंखों और आवाज दर्द बयां करके की कला बेमिसाल थी। साल 1972 में आई फिल्म 'पाकीजा' मीना कुमारी की सबसे यादगार फिल्म मानी जाती है। अपनी दमदार एक्टिंग के चलते मीना कुमारी ने तीन बार फिल्मफेयर अवॉर्ड अपने नाम किया था।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>मीना कुमारी की पर्सनल लाइफ ज्यादा सुखद नहीं थी। पति कमाल अमरोही से अलगाव और पर्सनल लाइफ की परेशानियों ने उनको शराब की लत की ओर धकेल दिया था। एक्ट्रेस की यह लत सेहत के लिए काफी खतरनाक साबित हुई। वहीं 31 मार्च 1972 को महज 38 साल की उम्र में मीना कुमारी ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 31 Mar 2026 10:49:36 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/stardom-in-bollywood-loneliness-in-real-life-meena-kumari-became-tragedy-queen</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Sheila Dikshit Birth Anniversary: क्यों कहलाती हैं 'Modern Delhi' की शिल्पकार, जानें CM Sheila Dikshit के अनसुने किस्से]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/why-called-architect-of-modern-delhi-learn-unheard-stories-of-cm-sheila-dikshit]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज यानी की 31 मार्च को दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का जन्म हुआ था। शीला दीक्षित भारतीय राजनीति की एक ऐसी नेता थीं, जिन्होंने दिल्ली के विकास में अहम भूमिका निभाई थी। यहां तक कहा जाता है कि अगर दिल्ली ने विकास देखा है, तो वह शीला दीक्षित के कार्यकाल में देखा गया है। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर शीला दीक्षित के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>पंजाब के कपूरथला में 31 मार्च 1938 को शीला दीक्षित का जन्म हुआ था। उन्होंने अपनी शुरूआती पढ़ाई दिल्ली में हुई। शीला दीक्षित ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के मिरांडा हाउस कॉलेज से इतिहास में स्नातक और फिर मास्टर्स किया। पढ़ाई के दौरान शीला दीक्षित को राजनीति से जुड़े मामलों में गहरी दिलचस्पी पैदा होने लगी। उन्होंने अपनी पढ़ाई के अलावा राजनीतिक मुद्दों पर भी चर्चा करने लगीं और उनको अपनी राय व्यक्त करने में भी खूब आनंद आता था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/leaving-gun-and-picking-up-pen-army-soldier-became-a-bollywood-legend" target="_blank">Anand Bakshi Death Anniversary: बंदूक छोड़ थामी कलम, Army का जवान ऐसे बना Bollywood का Legend</a></h3><h2>सियासी सफर</h2><div>बता दें कि शीला दीक्षित का सियासी सफर काफी लंबा और सफल रहा है। शीला दीक्षित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़ी थीं। साल 1938 से 2019 तक वह कांग्रेस की कद्दावर नेता और दिल्ली की सबसे लंबे समय तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहने वाली महिला थीं। शीला दीक्षित ने 15 साल के कार्यकाल के समय CNG, दिल्ली मेट्रो और फ्लाईओवर जैसे बुनियादी ढांचे का विकास हुआ। साल 1998 में दिल्ली की जनता ने शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री चुना गया था। आज भी शीला दीक्षित की गिनती दिल्ली के सबसे सफल मुख्यमंत्रियों में होती है।</div><div><br></div><h2>विवाद</h2><div>शीला दीक्षित पर राजनीति में रहते हुए कुछ विवादों का भी सामना करना पड़ा था। उन पर कुछ आरोप लगे, जिसके कारण उनको काफी आलोचना का सामना करना पड़ा था। वहीं साल 2013 के चुनाव के समय शीला दीक्षित के खिलाफ बिजली कंपनियों और सरकारी खर्चों को लेकर FIR दर्ज की गई थी। लेकिन बाद में कई मामलों में उनको राहत भी मिली थी।</div><div>&nbsp;</div><h2>राज्यपाल की भूमिका</h2><div>सीएम पद छोड़ने के बाद साल 2014 में शीला दीक्षित को केरल का राज्यपाल बनाया गया था। लेकिन कुछ महीनों बाद ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया था। शीला दीक्षित ऐसी नेता थीं, जिन्होंने दिल्ली को आधुनिक शहर बनाने में अहम योगदान दिया था।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं कांग्रेस की अनुभवी और दूरदर्शी नेता रहीं शीला दीक्षित का 20 जुलाई 2019 को 81 साल की उम्र में निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 31 Mar 2026 10:41:25 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/why-called-architect-of-modern-delhi-learn-unheard-stories-of-cm-sheila-dikshit</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Anand Bakshi Death Anniversary: बंदूक छोड़ थामी कलम, Army का जवान ऐसे बना Bollywood का Legend]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/leaving-gun-and-picking-up-pen-army-soldier-became-a-bollywood-legend]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अपने सदाबहार गीतों से लोगों को अपना दीवाना बनाने वाले बॉलीवुड के फेमस गीतकार आनंद बख्शी का 30 मार्च को निधन हो गया था। उन्होंने करीब चार दशकों तक सभी के दिलों पर राज किया था। फिल्म गीतकार आनंद बख्शी का साल 2002 में 72 साल की उम्र में निधन हो गया था। शायद ही कोई ऐसा होगा, जिसने गीतकार आनंद बख्शी के लिखे मैजिकल गानों को नहीं सुना होगा। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर आनंद बख्शी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>ब्रिटिश भारत के पंजाब प्रांत के रावलपिंडी में 21 जुलाई 1930 में आनंद बख्शी का जन्म हुआ था। इनके पिता रावलपिंडी में बैंक मैनेजर थे। किशोरावस्था में वह टेलीफोन ऑपरेटर बनकर सेना में शामिल हो गए। लेकिन बम्बई और सिनेमा दुनिया में आने की ख्वाहिश हमेशा जिंदा रही। देश का बंटवारा हुआ तो इनका परिवार हिंदुस्तान आ गया। जब मायानगरी में कुछ नहीं हुआ, तो आनंद बख्श ने फिर से सेना ज्वॉइन कर ली।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/not-only-famous-in-bollywood-but-also-in-hollywood-know-journey-of-this-legend" target="_blank">Shashi Kapoor Birth Anniversary: बॉलीवुड ही नहीं Hollywood में भी था जलवा, जानें लेजेंड का सफर</a></h3><h2>फिल्मी सफर</h2><div>तीन साल तक सेना में नौकरी करने के बाद आनंद बख्शी ने तय किया कि उनकी जिंदगी का मकसद बंदूक चलाना नहीं बल्कि गीत लिखना है। अपने फिल्मी करियर में आनंद बख्शी ने करीब 4000 से ज्यादा गीत लिखे थे। उनका साल 1957 में पहली बार गीत लिखने का मौका मिला। लेकिन सफलता उनसे दामन चुराती रही। साल 1963 में निर्देशक और अभिनेता राज कपूर ने आनंद बख्शी को अपनी फिल्म में गीत लिखने का मौका दिया। इसके बाद सफलता ने कभी आनंद बख्शी का साथ नहीं छोड़ा।</div><div><br></div><div>उनके करियर का शुरूआती माइलस्टोन बनी 'आराधना', 'कटी पतंग' और 'अमर प्रेम' जैसी फिल्में बनीं। इन्हीं फिल्मों की बदौलत अभिनेता राजेश खन्ना भारतीय सिनेमा के पहले सुपरस्टार बने थे। आनंद ने फिल्मकारों की कई पीढ़ियों के साथ काम किया था। आनंद बख्शी की सबसे बड़ी खासियत थी कि समय के साथ उनके गीतों का लहजा बदलता रहा था।</div><div><br></div><h2>गीत</h2><div>साल 1965 में 'जब जब फूल खिले' फिल्म आई, तो इसके गाने 'समां... समां है ये प्यार का', 'एक था गुल और एक थी बुलबुल' और 'परदेसियों से न अंखियां मिलाना' सुपरहिट साबित हुए। वहीं आनंद बख्शी की गीतकार के रूप में पहचान भी बन गई।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 30 मार्च 2002 को 71 साल की उम्र में गीतकार आनंद बख्शी ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 30 Mar 2026 13:10:23 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/leaving-gun-and-picking-up-pen-army-soldier-became-a-bollywood-legend</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Bhagat Singh Death Anniversary: सिर्फ 23 की उम्र में फांसी, जानिए इस Legendary Freedom Fighter की कहानी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/hanged-at-age-of-just-23-know-story-of-this-legendary-freedom-fighter]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भगत सिंह भारत के उन महान सपूतों में से एक हैं। जिन्होंने सिर्फ 23 साल की उम्र में देश की आजादी के लिए अपने प्राणों को न्योछावर कर दिया था। भगत सिंह का नाम सुनते ही युवाओं के दिल में जोश भर जाता है। भगत सिंह न सिर्फ स्वतंत्रता सेनानी थे, बल्कि लेखक, विचारक और समाज सुधारक भी थे। भले ही भगत सिंह का जीवन छोटा रहा, लेकिन उनका इतना गहरा प्रभाव रहा है कि आज भी लाखों लोग उनको याद करते हैं। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर भगत सिंह के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>पंजाब के लायलपुर जिले के बंगा गांव में 28 सितंबर 1907 को भगत सिंह का जन्म हुआ था। भगत सिंह का पैतृक गांव खटकर कलां है, जोकि भारत के पंजाब में है। इनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह और मां का नाम विद्यावती कौर था। भगत सिंह के जन्म के समय उनके पिता और चाचा जेल में थे, क्योंकि वह अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाते। भगत सिंह के जन्म पर उनके चाचा और पिता की रिहाई हुई थी। जिससे घर में खुशी दोगुनी हो गई थी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/those-socialist-thinkers-of-country-whose-political-honesty-still-an-example" target="_blank">Ram Manohar Lohia Birth Anniversary: देश के वो 'Socialist' चिंतक, जिनकी Political ईमानदारी आज भी मिसाल है</a></h3><h2>जलियांवाला बाग हत्याकांड</h2><div>साल 1919 में जलियांवाला बाग हत्याकांड ने 12 साल के भगत सिंह को गहरा झटका दिया था। वह घटनास्थल गए और खून से सनी मिट्टी को घर लाकर पूजते थे। यह भगत सिंह के बलिदान का पहला अनुभव था। साल 1923 में उन्होंने लिखा कि वह शादी के बजाय भारत माताु और उसके 33 करोड़ बच्चों के लिए जीवन समर्पित करेंगे। वह राष्ट्र को मां मानते थे और सेवा को अपना उद्देश्य। साल 1930 में जब भगत सिंह के पिता ने दया याचिका दी, तो उन्होंने सख्ती के साथ मना कर दिया। क्योंकि वह अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करना चाहते थे।</div><div><br></div><h2>ऐसे बने क्रांतिकारी</h2><div>दरअसल, भगत सिंह स्कूल छोड़कर नेशनल कॉलेज, लाहौर में पढ़े थे। यहीं से लाला लाजपत राय ने स्वदेशी शिक्षा दी और वह नौजवान भारत सभा से जुड़े। साल 1926 में वह हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन में शामिल हुए। जहां पर उनको सुखदेव, चंद्रशेखर आजाद और राजगुरु जैसे साथी मिले।</div><div><br></div><div>साल 1928 में लाला लाजपत राय की मौत पुलिस लाठीचार्ज से हुई। लाला लाजपत राय का बदला लेने के लिए भगत सिंह और राजगुरु ने लाहौर में पुलिस अधिकारी जेपी सांडर्स को गोली मारी और फिर दिल्ली की सेंट्रल असेंबली में बम फेंका। उन्होंने नारे लगाए - 'इंकलाब जिंदाबाद'। इसके बाद वह पकड़े गए। मुकदमे के दौरान उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी और जेल में भूख हड़ताल की। जिससे कैदियों के अधिकार सुधरे।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 23 मार्च 1931 को भगत सिंह को लाहौर जेल में फांसी दी गई।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 23 Mar 2026 11:46:29 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/hanged-at-age-of-just-23-know-story-of-this-legendary-freedom-fighter</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[Ram Manohar Lohia Birth Anniversary: देश के वो 'Socialist' चिंतक, जिनकी Political ईमानदारी आज भी मिसाल है]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/those-socialist-thinkers-of-country-whose-political-honesty-still-an-example]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>डॉ राम मनोहर लोहिया एक ऐसे चिंतक और नेता थे, जिन्होंने अपने जन्मदिन को शहादत दिवस को समर्पित कर दिया था। आज ही के दिन यानी की 23 मार्च को राम मनोहर लोहिया का जन्म हुआ था। लोहिया भारतीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। राम मनोहर लोहिया ने अपना अधिकांश जीवन भारतीय समाजवाद के विकास और अन्याय के खिलाफ लड़ने के लिए समर्पित कर दिया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर राम मनोहर लोहिया के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>फैजाबाद में 23 मार्च 1910 को राम मनोहर लोहिया का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम हीरालाल था। जोकि यूपी के फैजाबाद में एक व्यापारी और सच्चे राष्ट्रभक्त थे। राम मनोहर लोहिया ने मुंबई के मारवाड़ी स्कूल से पढ़ाई की थी। फिर मैट्रिक की परीक्षा में फर्स्ट आकर इंटर की 2 सला की पढ़ाई बनारस के काशी विश्वविद्यालय में की थी। फिर वह उच्च शिक्षा के लिए लंदन की जगह बर्लिन गए। यहां पर उन्होंने अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/love-with-delhi-writing-and-women-know-unheard-stories-of-this-legend" target="_blank">Khushwant Singh Death Anniversary: दिल्ली, लेखन और महिलाओं से था इश्क, जानिए 'Legend' की अनसुनी बातें</a></h3><h2>स्वदेश वापसी</h2><div>जर्मनी से वापस लौटने के बाद राम मनोहर लोहिया ने अपना जीवन सुविधापूर्ण तरीके से बिताने की बजाय जंग-ए-आजादी के लिए समर्पित कर दिया था। साल 1918 में वह अहमदाबाद अधिवेशन में पहली बार अपने पिता के साथ शामिल हुए थे। लोहिया ने देश की राजनीति में भावी बदलाव की बयार आजादी से पहले ला दी थी। लोहिया के पिता महात्मा गांधी के अनुयायी थे। जिस कारण गांधी जी के विराट व्यक्तित्व का लोहिया पर गहरा असर हुआ था।</div><div><br></div><h2>समाजवादी के पक्षधर</h2><div>डॉ लोहिया मानवता की स्थापना के पक्षधर और समाजवादी थे। समाजवादी का अर्थ था, 'समाज ही उनका कार्यक्षेत्र था और वह अपने कार्यक्षेत्र को जनमंगल की अनुभूतियों से महकाना चाहते थे।' लोहिया हमेशा ही विश्व-नागरिकता का सपना देखा था। लोहिया मानव मात्र को किसी देश का नहीं बल्कि विश्व का नागरिक मानते थे। वहीं वह जनता को जनतंत्र का निर्णायक मानते थे।</div><div><br></div><h2>राजनीतिक सफर</h2><div>साल 1935 में कांग्रेस के अध्यक्ष रहे पं. नेहरू ने लोहिया को कांग्रेस का महासचिव नियुक्त किया गया था। अगस्त 1942 को गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन में लोहिया ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और संघर्ष के नए शिखरों को छुआ था। साल 1946-47 लोहिया की जिंदगी के अत्यंत निर्णायक साल रहे। उन्होंने अपनी प्रखर देशभक्ति और तेजस्वी समाजवादी विचारों की वजह से अपने समर्थकों के अलावा विरोधियों के मध्य भी अपार सम्मान हासिल किया।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 12 अक्तूबर 1967 को 57 साल की उम्र में राम मनोहर लोहिया का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 23 Mar 2026 11:42:43 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/those-socialist-thinkers-of-country-whose-political-honesty-still-an-example</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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