जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्ति मिलती हैं ज्योतिर्लिंगों के दर्शन से

जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्ति मिलती हैं ज्योतिर्लिंगों के दर्शन से

उत्तराखंड उत्तराखंड में हिमालय की पहाड़ी पर स्थित श्री केदारनाथ द्वादश ज्योतिर्लिगों में से एक माना जाता है। यहां मन्दिर के गर्भ गृह के मध्य में भगवान श्री केदारेश्वर जी का स्वयंभू ज्योतिर्लिंग स्थित है जिसके अग्र भाग पर गणेश जी की आकृति और साथ ही माँ पार्वती का श्री यंत्र विद्यमान है।

हिंदुओं में भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों की पूजा का विशेषता महत्व है। शिव पुराण के अनुसार शिवजी जहाँ-जहाँ स्वयं प्रगट हुए उन बारह स्थानों पर स्थित शिवलिंगों को ज्योतिर्लिंगों के रूप में पूजा जाता है। प्रत्येक ज्योतिर्लिङ्ग का एक एक उपलिंग भी है जिनका वर्णन शिव महापुराण की कोटिरुद्र संहिता के प्रथम अध्याय में किया गया है। ज्योतिर्लिंग, सर्वशक्तिमान का दीप्तिमान चिन्ह है। श्ज्योतिश् शब्द का अर्थ है प्रकाश और श्लिंगश् का अर्थ है हस्ताक्षर अर्थात ज्योतिर्लिंग भगवान शिव का प्रकाश है। प्रत्येक ज्योतिर्लिंग की अलग-अलग कथा है। मान्यता है कि इन ज्योतिर्लिंग के दर्शन, पूजन, आराधना से भक्तों के जन्म-जन्मातर के सारे पाप समाप्त हो जाते हैं। वे भगवान शिव की कृपा के पात्र बनते हैं। ऐसे कल्याणकारी ज्योतिर्लिंग इस प्रकार हैं।

केदारनाथ

उत्तराखंड उत्तराखंड में हिमालय की पहाड़ी पर स्थित श्री केदारनाथ द्वादश ज्योतिर्लिगों में से एक माना जाता है। यहां मन्दिर के गर्भ गृह के मध्य में भगवान श्री केदारेश्वर जी का स्वयंभू ज्योतिर्लिंग स्थित है जिसके अग्र भाग पर गणेश जी की आकृति और साथ ही माँ पार्वती का श्री यंत्र विद्यमान है। ज्योतिर्लिंग पर प्राकृतिक यगयोपवित और ज्योतिर्लिंग के पृष्ठ भाग पर प्राकृतिक स्फटिक माला को आसानी से देखा जा सकता है। श्री केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग में नव लिंगाकार विग्रह विधमान है इस कारण इस ज्योतिर्लिंग को नव लिंग केदार भी कहा जाता है स्थानीय लोक गीतों से इसकी पुष्टि होती है। मन्दिर में मुख्य भाग मण्डप और गर्भगृह के चारों ओर प्रदक्षिणा पथ है। बाहर प्रांगण में नन्दी बैल वाहन के रूप में विराजमान हैं। प्रातः काल में शिव-पिण्ड को प्राकृतिक रूप से स्नान कराकर उस पर घी-लेपन किया जाता है। तत्पश्चात धूप-दीप जलाकर आरती उतारी जाती है। इस समय यात्री-गण मंदिर में प्रवेश कर पूजन कर सकते हैं, लेकिन संध्या के समय भगवान का श्रृंगार किया जाता है। उन्हें विविध प्रकार के चित्ताकर्षक ढंग से सजाया जाता है। भक्तगण दूर से केवल इसका दर्शन ही कर सकते हैं।ज्योतिर्लिंग के पश्चिमी ओर एक अखंड दीपक है जो हजारों सालों से निरंतर जलता रहता है।

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काशी विश्वनाथ

उत्तरप्रदेश काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग हजारों वर्षों से वाराणसी में स्थित मंदिर हिन्दुओं में एक विशेष स्थान रखता है। माना जाता है कि मंदिर में दर्शन और गंगा में स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। मंदिर में दर्शन करने के लिए बड़े-बड़े महान संत भी आते हैं। वर्तमान मंदिर का निर्माण महारानी अहिल्या बाई होल्कर द्वारा 17 ई. में करवाया था। बाद में पंजाब के महाराजा रंजीत सिंह द्वारा 1889 ई. में एक हजार किलो ग्राम सोने से 15.5 मीटर ऊँचे मंदिर को स्वर्ण पत्रों से मण्डित करवाया था। सोने का होने के कारण इसे स्वर्ण मंदिर भी कहा जाता है। मुख्य मंदिर के साथ-साथ परिसर में अन्य देवताओं के स्थान भी दर्शनीय है। यहां विदेशी सैलानी भी बड़ी संख्या में आते हैं और भगवान शिव को शीष नवाते हैं। सायं काल गंगा की आरती दर्शनीय है।

सोमनाथ

गुजरात श्री सोमनाथ सौराष्ट्र (गुजरात) के प्रभास क्षेत्र में स्थित है। यह चन्द्रमा के दुख का विनाश करने वाला है। कहा जाता है कि प्रभास क्षेत्र में श्रीकृष्ण ने यदुवंश का संहार कराने के बाद अपनी नर लीला समाप्त कर ली थी। सोमनाथ मंदिर में स्थित सोमेश्वर शिव लिंग भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों में एक है। ज्योतिर्लिंग होने के कारण हिन्दुओं में इस मंदिर का विशेष महत्व हैं। मंदिर ने निर्माण एवं पुनः निर्माण के अनेकों के दौर देखे तथा जितनी बार इस मंदिर को विध्वंस किया गया शायद ही किसी ओर मंदिर को किया गया हो। देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने सोमनाथ मंदिर का भव्य निर्माण कराया तथा भारत के प्रथम गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने भी इस मंदिर के भव्य निर्माण में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। सोमनाथ के मूल मंदिर से कुछ दूरी पर ही स्थित है अहल्या बाई द्वारा बनवाया गया सोमनाथ का मंदिर। सोमनाथ मंदिर का शिखर दूर से नजर आता है। मंदिर के चारों ओर परकोटा बनाया गया है। मंदिर के गुम्बद और मेहराब पत्थरों को काटकर बनाये गये हैं, जिनपर सुन्दर कारीगरी देखने को मिलती है। भू-गर्भ में सोमनाथ लिंग की स्थापना की गई है। यहां रोशनी का अभाव रहता है। मंदिर में पार्वती, सरस्वती, लक्ष्मी, गंगा एवं नन्दी की मूर्तियां स्थापित हैं। भूमि के ऊपरी भाग में शिवलिंग से ऊपर अहल्येश्वर की मूर्ति है। मंदिर परिसर में गणेश जी का मंदिर भी बना है और उत्तर द्वार के बाहर अघोरलिंग की मूर्ति स्थापित की गई है। मंदिर में सायं 7.30 से 8.30 बजे तक एक घण्टे का ”ध्वनी एवं प्रकाश“ के कार्यक्रम के माध्यम से मंदिर के इतिहास का प्रदर्शन किया जाता है। प्रभास क्षेत्र में अहल्याबाई मंदिर के पास ही महाकाली का मंदिर भी बना है। नगर के द्वार के पास गौरी कुण्ड नामक सरोवर एवं यहां बना प्राचीन शिवलिंग दर्शनीय है। मंदिर के समीप नारायण एवं सरस्वती नदियों का संगम स्थल है, जहां प्रतिवर्ष मेला आयोजित होता है। मंदिर से टकरा कर बिखरती समुद्र की लहर आन्दित करती है।

नागेश्वर

दारुक वन में नागेश्वर, गुजरात गुजरात में द्वारकापुरी से करीब 25 किलोमीटर दूर गोमती द्वारका से बेट द्वारका जाते समय रास्ते में स्थित है नागेश्वर ज्योतिर्लिंग। रूद्रसंहिता में नागेश को दारूकावने नागेश कहा गया है। इस पवित्र ज्योतिर्लिंग के दर्शन की शास्त्रों में अपार महिमा बताई गई है। मंदिर के सभाग्रह में पूजन सामग्री की दुकाने लगी हैं तथा इसके बाद सभा मण्डप आता है और सभा मण्डप से नीचे स्तर पर तलघर गर्भगृह बना है जहां ज्योतिर्लिंग स्थापित है। मध्यम आकार के शिवलिंग पर चांदी के पतरे का आवरण चढ़ाया गया है। लिंग पर ही चांदी के नाग की आकृति बनाई गई है। शिवलिंग के पीछे माता पार्वती की मूर्ति स्थापित की गई है। यहां पर केवल गंगा जल से अभिषेक होता है। अभिषेक के लिए पुरूषों को धोती पहनना आवश्यक है। धोती एवं गंगाजल मंदिर की ओर से निःशुल्क उपलब्ध कराया जाता है। नागेश्वर मंदिर का पुनः निर्माण सुपर कैसेट इंण्डस्ट्रीज के मालिक गुलशन कुमार के परिवार द्वारा किया गया। मंदिर के परिसर में एक भव्य ध्यान एवं पद्मासन मुद्रा में शिव प्रतिमा लगाई गई है। यह प्रतिमा 125 फीट ऊँची और 25 फीट चौड़ी है। प्रवेश द्वार साधारण परन्तु आकर्षक है। यह प्रतिमा मंदिर परिसर को भव्यता प्रदान करती है। इसके कारण ही मंदिर का परिसर करीब 2 कि.मी. दूर से नजर आने लगता है। मंदिर की देख-रेख एक प्रबन्धन समिति द्वारा की जाती है। कार्तिक पूर्णिमा पर यहां भव्य मेला लगता है। महाशिवरात्रि का पर्व पूरे उत्साह एवं श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। यह मंदिर वीराने में होने से यहां ठहरने की व्यवस्था नहीं हैं। ठहरने के लिए द्वारिका अथवा समीपस्थ ओखा में ही व्यवस्था करनी होती है।

महाकालेश्वर

उज्जयिनी में महाकालेश्वर, मध्यप्रदेश मध्यप्रदेश में उज्जैन को महाकाल की नगरी के रूप में विश्व में जाना जाता है। शिप्रा नदी के किनारे श्री महाकालेश्वर भारत में बारह प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंगों में से एक हैं। महाकालेश्वर मंदिर की महिमा का पुराणों, महाभारत और कालिदास जैसे महाकवियों की रचनाओं में मनोहर वर्णन मिलता है जिसे उज्जैन का विशिष्ट पीठासीन देवता माना जाता था।  महाकाल में लिंगम (स्वयं से पैदा हुआ), स्वयं के भीतर से शक्ति (शक्ति) को प्राप्त करने के लिए माना जाता हैं। महाकालेश्वर की मूर्ति दक्षिणमुखी है। मंदिर के ऊपर गर्भगृह में ओंकारेश्वर शिव की मूर्ति प्रतिष्ठित है। गर्भगृह के पश्चिम, उत्तर और पूर्व में गणेश, पार्वती और कार्तिकेय के चित्र स्थापित हैं। दक्षिण में नंदी की प्रतिमा है। तीसरी मंजिल पर नागचंद्रेश्वर की मूर्ति केवल नागपंचमी के दिन दर्शन के लिए खुली होती है। महाशिवरात्रि के दिन, मंदिर के पास एक विशाल मेला लगता है, और रात में पूजा होती है और महाकाल की शोभा यात्रा निकाली जाती है। प्रतिवर्ष और सिंहस्थ के पूर्व इस मंदिर को सुसज्जित किया जाता है। मंदिर एक परकोटे के भीतर स्थित है। गर्भगृह तक पहुँचने के लिए एक सीढ़ीदार रास्ता है। सावन के महीने का विशेष महत्व होने से देश के कौने - कौने से श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं।  महाकाल के दर्शन के लिए वायुमार्ग, रेलमार्ग या सड़कमार्ग से पहुंचा जा सकता है। अगर आप वायुमार्ग से जाना चाहते हैं तो आपको इंदौर एयरपोर्ट उतरना होगा और वहां से बस अथवा टैक्सी से जा सकते हैं।

ओंकारेश्वर

मध्यप्रदेश मध्यप्रदेश में देश के प्रसिद्ध 12 ज्योतिर्लिंगों में से 2 ज्योतिर्लिंग विराजमान हैं। एक उज्जैन में महाकाल के रूप में और दूसरा ओंकारेश्वर में ओम्कारेश्वर- ममलेश्वर के रूप में विराजमान हैं। ये एक लिंग के दो स्वरूप हैं। ओम्कारेश्वर लिंग को स्वयंभू समझा जाता है। ओम्कारेश्वर खंडवा जिले में नर्मदा नदी के बीच हिन्दू पवित्र चिन्ह ॐ के आकार में बने मन्धाता या शिवपुरी नामक द्वीप पर स्थित है। इस भव्य क्षेत्र में 33 कोटि देवता परिवार सहित निवास करते हैं तथा ज्योतिस्वरूप लिंग सहित 108 प्रभावशाली शिवलिंग हैं। ओंकारेश्वर तीर्थ क्षेत्र में चौबीस अवतार, माता घाट (सेलानी), सीता वाटिका, धावड़ी कुंड, मार्कण्डेय शिला, मार्कण्डेय संन्यास आश्रम, अन्नपूर्णाश्रम, विज्ञान शाला, बड़े हनुमान, खेड़ापति हनुमान, ओंकार मठ, माता आनंदमयी आश्रम, ऋणमुक्तेश्वर महादेव, गायत्री माता मंदिर, सिद्धनाथ गौरी सोमनाथ, आड़े हनुमान, माता वैष्णोदेवी मंदिर, चाँद-सूरज दरवाजे, वीरखला, विष्णु मंदिर, ब्रह्मेश्वर मंदिर, सेगाँव के गजानन महाराज का मंदिर, काशी विश्वनाथ, नरसिंह टेकरी, कुबेरेश्वर महादेव, चन्द्रमोलेश्वर महादेव के मंदिर भी दर्शनीय हैं। ओंकारेश्वर तीर्थ के साथ नर्मदाजी का भी विशेष महत्व है। मान्यता के अनुसार यमुनाजी में 15 दिन का स्नान तथा गंगाजी में 7 दिन का स्नान जो फल प्रदान करता है, उतना पुण्यफल नर्मदाजी के दर्शन मात्र से प्राप्त हो जाता है। ओंकारेश्वर पर लंबे समय तक ओंकारेश्वर भील राजाओं के शासन का क्षेत्र रहा । देवी अहिल्याबाई होलकर की ओर से यहाँ नित्य मृत्तिका के 18 सहस्र शिवलिंग तैयार कर उनका पूजन करने के पश्चात उन्हें नर्मदा में विसर्जित कर दिया जाता है। ओंकारेश्वर नगरी का मूल नाम श्मान्धाताश् है। ओंकारेश्वर मंदिर में शिव भक्त कुबेर ने तपस्या की थी तथा शिवलिंग की स्थापना की थी। नर्मदाजी में कोटितीर्थ पर स्नान करके यात्री सीढ़ियों से ऊपर चढ़कर ओंकारेश्वर मन्दिर में दर्शन करने जाते हैं।

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भीमा शंकर

डाकनी में भीमा शंकर, महाराष्ट्र में पुणे से करीब 100 किलोमीटर दूर सह्याद्रि नामक पर्वत पर स्थित है भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग मन्दिर। करीब 3,250 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस मंदिर का शिवलिंग मोटा होने से इसे मोटेश्वर महादेव के नाम से भी जाना जाता है। शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव ने राक्षस तानाशाह भीम से युद्ध करने की ठानी। लड़ाई में भगवान शिव ने दुष्ट राक्षस को राख कर दिया और इस तरह अत्याचार की कहानी का अंत हुआ। भगवान शिव से सभी देवों ने आग्रह किया कि वे इसी स्थान पर शिवलिंग रूप में विराजित हो़। उनकी इस प्रार्थना को भगवान शिव ने स्वीकार किया और वे भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग के रूप में आज भी यहां विराजित हैं। मान्यता है कि जो भक्त श्रद्धा से इस मंदिर के प्रतिदिन सुबह सूर्य निकलने के बाद 12 ज्योतिर्लिगों का नाम जापते हुए इस मंदिर के दर्शन करता है, उसके सात जन्मों के पाप दूर होते हैं तथा उसके लिए स्वर्ग के मार्ग खुल जाते हैं। नागर शैली में बने मंदिर का शिखर नाना फड़नवीस द्वारा 18वीं सदी में बनाया गया था। मराठा शासक शिवाजी ने इस मंदिर की पूजा के लिए कई तरह की सुविधाएं प्रदान की। समीप पार्वती जी का अवतार कमलजा मंदिर है। यहां हनुमान झील, गुप्त भीमशंकर, भीमा नदी की उत्पत्ति, नागफनी, बॉम्बे प्वाइंट, साक्षी विनायक आदि दर्शनीय स्थल हैं। भीमाशंकर लाल वन क्षेत्र और वन्यजीव अभयारण्य द्वारा संरक्षित है। यह जगह श्रद्धालुओं के साथ-साथ ट्रैकर्स प्रेमियों के लिए भी आकर्षण का केंद्र है। पुणे से बस यहां तक के करीब चर घंटे का समय लेती हैं।

त्रयंबकेश्वर

गोमती तट पर त्रयंबकेश्वर, महाराष्ट्र नासिक जिले में ब्रह्मगिरी पर्वत के निकट गोमती के किनारे स्थित है। यहीं से गोदावरी नदी का उद्गम होता है। स्थित त्रयम्बकेश्वर महादेव की बड़ी महिमा है। यहाँ गौतम ऋषि की प्रार्थना पर भगवान शिव इस स्थान पर अवस्थित हुए और त्रयम्बकेश्वर के नाम से विख्यात हुए। मंदिर के अन्दर एक छोटे गड्डे में तीन छोटे-छोटे लिंग हैं जो ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों शक्ति के प्रतीक माने जाते हैं, इसी कारण त्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग की बड़ी महत्ता है। गर्भगृह में इन लिंगों की केवल अर्धा ही दिखाई देती है। प्रातः काल में होने वाली पूजा के बाद इस अर्धा पर चाँदी का पंचमुखी मुकुट चढ़ा दिया जाता है। त्रयम्बकेश्वर का मंदिर काले पत्थरों से बना स्थापत्य कला का सिन्धु-आर्य शैली का सुन्दर नमूना है। यहां कालसर्प शांति, त्रिपिंडी विधि और नारायण नागबलि की पूजा कराई जाती है। यहां शिवरात्रि और सावन के सोमवार के दिनों में भक्तों का ताँता लगा रहता है। मंदिर के पर्वत से शिखर तक पहुँचने के लिए सीढ़ियों का रास्ता बना है, जिन पर चढ़ने पर रामकुण्ड एवं लक्ष्मण कुण्ड आते हैं तथा शिखर पर गौमुख से निकली हुई भगवती गोदावरी के दर्शन होते हैं।

वैद्यनाथ

चिताभूमि में वैद्यनाथ, महाराष्ट्र झारखण्ड के देवधर ग्राम में स्थित वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर पवित्र तीर्थ होने के कारण इसे वैद्यनाथ धाम भी कहा जाता है। देवधर का अर्थ देवताओं के घर से लिया गया है। यहां स्थित ज्योतिर्लिंग सिद्धपीठ है। इस कारण लिंग को कामना लिंग कहा जाता है। मुख्य मंदिर के परिसर में चारों ओर अनेक देवी-देवताओं के मंदिर बनाये गये हैं। यहां छठ के अवसर पर दर्शनार्थियों की विशेष भीड़ रहती है। लोग बड़ी संख्या में कावड़ लेकर भजन-कीर्तन करते हुए तथा भोले के जयकारे लगाते हुए सुल्तानगंज से पवित्र गंगा का जल लेकर यहां आते हैं और बाबा को चढ़ाते हैं। देवधर में ज्योतिर्लिंग स्थापित होने के पीछे प्रचलित कथानक के अनुसार रावण ने हिमालय पर जाकर शिव जी को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या की ओर अपने सिर काट-काट कर शिवलिंग पर चढ़ाने शुरू कर दिये। जब वह नौ सिर चढ़ाने के बाद 10 वां सिर काटने को था तब ही शिव जी प्रकट हो गये और प्रसन्न होकर उससे वरदान मांगने को कहा। रावण ने इस शिवलिंग को लंका में ले जाकर स्थापित करने का वरदान मांगा। शिव ने इस शर्त के साथ कि रास्ते में शिवलिंग को कहींे भी धरा पर नहीं रखोगे, ले जाने की अनुमति दे दी। रास्ते में रावण को लघु शंका निवारण की आवश्यकता हुई तो वह इसे एक अहीर को देकर लघुशंका निवृत्ति के लिए चला गया। इधर अहीर को जब इसका वजन महसूस हुआ तो उसने इसे पृथ्वी पर रख दिया। लौटने पर रावण जब इसे उठा नहीं सका तो निराश होकर मूर्ति पर अपना अपना अंगूठा गड़ाकर लंका चला गया। अब यहां ब्रह्मा एवं विष्णु आदि देवों ने आकर शिवलिंग की पूजा की तथा शिव जी के दर्शन होते ही सभी देवताओं ने शिवलिंग की यहां शिव स्तुति के साथ स्थापना की और स्वर्ग को लौट गये। तब से आज तक यह स्थान शिव के ज्योतिर्लिंगों में शामिल होकर पूजा जाता है।

धृष्णेश्वर

महाराष्ट्र यह ज्योतिर्लिंग औरंगाबाद से 35 किलोमीटर दूर तथा दौलताबाद से 11 किलोमीटर दूर वेरूल गांव के पास स्थित है जिसे घुष्मेश्वर भी कहा जाता है। मंदिर के गर्भगृह में पूर्वाभिमुख एक बड़े आकार का शिव लिंग स्थापित है। भव्य नन्दीकेश्वर सभा मण्डप में स्थापित है। गर्भगृह सभा मण्डप से कुछ नीचे स्तर पर बना है। मंदिर की दीवारों पर देवी-देवताओं की मूर्तियां खुदी हुई हैं। सभा मण्डप सुन्दर नक्काशीदार 24 खम्भों पर बना है। वास्तुकला की दृष्टि से मंदिर दर्शनीय है। मुख्य त्रिकाल पूजा एवं आरती प्रातः 6 बजे एवं रात 8 बजे होती है। महाशिवरात्री के अवसर पर भगवान शिव की पालकी में शोभा यात्रा बनाकर समीप के शवालय तीर्थ कुण्ड तक ले जाई जाती है। मंदिर का प्रबन्धन देवस्थान द्वारा किया जाता है।

मल्लिकार्जुन

श्रीशैल पर्वत पर मलिकार्जुन, आंध्रप्रदेश आन्ध्रप्रदेश के कुर्नूल जिले में सर्वव्यापी भगवान शंकर के द्वारा ज्योतिर्लिंग के दर्शन एवं स्पर्श करने से सब प्रकार आनंद की प्राप्ती होती है जो विष्णु पुराण में वर्णित हैं। हैदराबाद से 232 किलोमीटर दूर कृष्णा नदी के किनारे स्थित भगवान मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग स्थित है। पुत्र प्राप्ति के लिए इनकी स्तुति की जाती है। इसे ”दक्षिण का कैलाश“ कहा जाता है। ज्योतिर्लिंग से जुड़ी अनेक कथाएं हैं और कहा जाता है कि यहां दर्शन करने पर सारे पाप धुल जाते हैं और मनुष्य जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है। मंदिर परिसर में माँ दुर्गा का मंदिर भी बना है जिसे भ्रामरंबा देवी के नाम से जाना जाता है। मंदिर के पीछे पार्वती देवी का अलग से मंदिर बना है जिसे मल्लिका देवी कहा जाता है। मुख्य मंदिर में गर्भगृह में ज्योतिर्लिंग स्थापित है तथा इसके सामने सभा मण्डप में नन्दी की विशाल प्रतिमा बनी है। यहां सोने के शिखर वाला सुन्दर मण्डप दूर से नजर आता है। विजय नगर के महाराजा कृष्ण राय तथा शिवाजी ने इस मंदिर का विस्तार कराया। अहिल्या देवी होल्कर ने पातालगंगा के तट पर 852 सीढ़ियों वाले घाट का निर्माण कराया। पाताल गंगा मंदिर से करीब 3 किलोमीटर कठिन मार्ग है। पर्वत के नीचे कृष्णा नदी बनी है जो पर्यटन के लिए एक अच्छा स्थल है। झील में सैलानी नौकायन का आनन्द भी उठा सकते हैं।

रामेश्वरम

सेतुबन्द पर रामेश्वरम, तमिलनाडु द्वादश ज्योतिर्लिंगों में दक्षिण भारत के तमिलनाडु में स्थित रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग का प्रसंग रामायण काल से जुड़ा है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार इस मंदिर में जो शिवलिंग हैं, उसके पीछे मान्यता यह है कि जब मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम सीताजी को रावण से छुड़ाने के लिए लंका जा रहे थे, तब उन्हें रास्ते में प्यास लगी। जब वे पानी पीने लगे तभी उनको याद आया कि उन्होंने भगवान शंकर के दर्शन नहीं किए हैं, ऐसे में वे कैसे जल ग्रहण कर सकते हैं। तब श्री राम ने विजय प्राप्ति के लिए रेत का शिवलिंग स्थापित करके शिव पूजन किया था, क्योंकि भगवान राम जानते थे कि रावण भी शिव का परम भक्त है और युद्ध में हरा पाना कठिन कार्य है, इसलिए भगवान राम ने लक्ष्मण सहित शिवजी की आराधना की और भगवान शिव प्रसन्न होकर माता पार्वती के साथ प्रकट होकर श्री राम को विजय का आशीर्वाद दिया। भगवान राम ने शिवजी से लोक कल्याण के लिए उसी स्थान पर शिवलिंग के रूप में सदा के लिए निवास करने को कहा जिसे भगवान शिव ने स्वीकार कर लिया। रामेश्वर मन्दिर में ज्योतिर्लिंग के दर्शन दूर से किए जाते हैं। मन्दिर के मध्य शिवलिंग के आसपास हलका सा अंधेरा रहता है अतः बहुत ध्यानपूर्वक दर्शन करने होते हैं। दर्शनार्थियों की लंबी कतार लगी रहती है। पुजारी अपने स्थान पर ही अभिषेक भी कराते हैं। भक्तगण ज्योतिर्लिंग के दर्शन कर शिव भक्त पुण्य कमाते हैं। प्रातः काल शिवलिंग के मणी दर्शन भी कराए जाते हैं।

- डॉ. प्रभात कुमार सिंघल