काव्य रूप में पढ़ें श्रीरामचरितमानस: भाग-2

काव्य रूप में पढ़ें श्रीरामचरितमानस: भाग-2

विभिन्न हिन्दू धर्मग्रंथों में कहा गया है कि श्रीराम का जन्म नवरात्र के अवसर पर नवदुर्गा के पाठ के समापन के पश्चात् हुआ था और उनके शरीर में मां दुर्गा की नवीं शक्ति जागृत थी। मान्यता है कि त्रेता युग में इसी दिन अयोध्या के महाराजा दशरथ की पटरानी महारानी कौशल्या ने मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम को जन्म दिया था।

यह जल करता नाश है, क्रोध-मोह मद-काम

पाप-ताप से मुक्त हो, पाते सब विश्राम।

पाते सब विश्राम, अनोखी इसकी महिमा

विनय दीनता आर्तभाव से बढ़ती गरिमा।

कह ‘प्रशांत’ जिसने इससे निज हृदय न धोया

उसने कलियुग के हाथों है जीवन खोया।।21।।

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चरण कमल रघुनाथ के, दिल में धार प्रसाद

दो मुनियों का अब सुनें, सुंदर प्रिय संवाद।

सुंदर प्रिय संवाद, बसे जो तीर्थ प्रयागा

वे हैं भरद्वाज मुनि ज्ञानधनी बड़भागा।

है ‘प्रशांत’ श्रीराम चरण में प्रेम महाना

परमारथ के राही तापस दया निधाना।।22।।

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देव-दैत्य किन्नर-मनुज, इनके सकल समाज

माघ मकर गत सूर्य जब, आते तीरथराज।

आते तीरथराज, त्रिवेणी सभी नहाते

छूकर पावन अक्षयवट पुलकित हो जाते।

कह ‘प्रशांत’ भगवद् चर्चा ऋषि करते मिलकर

भरद्वाज आश्रम में रहते, फिर जाते घर।।23।।

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याज्ञवल्क्य से यों कहें, मुनिवर भारद्वाज

मेरी शंका को सुनें, सर्वप्रथम महाराज।

सर्वप्रथम महाराज, राम नाम को जपते

अविनाशी भगवान शम्भु भी उनको भजते।

कह ‘प्रशांत’ हैं कौन राम, कुछ तो समझाओ

कृपा करो गुरुदेव, चरित उनका बतलाओ।।24।।

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याज्ञवल्क्य बोले बिहंस, तुम हो चतुर सुजान

ऐसे भोले बन रहे, जैसे हो नादान।

जैसे हो नादान, राम की कथा मनोहर

रामभक्त मुनिराज, सुनाऊंगा अति सुंदर।

कह ‘प्रशांत’ है महिषासुर विशाल अज्ञाना

ले काली का रूप, कथा करती निष्प्राणा।।25।।

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उमा सहित शिव का हुआ, था जो भी संवाद

उसे सुनो मुनिराज तुम, मेटे सभी विषाद।

मेटे सभी विषाद, समय त्रेतायुग जानी

पहुंचे ऋषि अगस्त्य के आश्रम शंभु भवानी।

कह ‘प्रशांत’ मुनिवर ने राघव-कथा सुनाई

शिवजी ने शुभ हरिभक्ती उनको बतलाई।।26।।

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ऐसे बीते दिन कई, करत-करत सत्संग

दशरथनंदन राम के, पावन मधुर प्रसंग।

पावन मधुर प्रसंग, एक प्रभु गाथा कहते

दूजे पूरी श्रद्धा से थे उसको सुनते।

कह ‘प्रशांत’ दोनों फिर ऋषि से विदा मांगकर

चले धाम कैलास प्रफुल्लित प्रमुदित होकर।।27।।

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शिवजी की इच्छा बड़ी, दर्शन करें अनूप

अवतारे प्रभु हैं स्वयं, ले मानव का रूप।

ले मानव का रूप, सती यह भेद न जाने

श्री रघुनाथ चरित को बस ज्ञानी पहचानें।

कह ‘प्रशांत’ शंकरजी ने बोला जयकारा

पार्वती के मन जागा संदेह अपारा।।28।।

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शंकरजी बोले सुनो, पार्वती यह बात

वे ही मेरे इष्ट हैं, रघुनंदन रघुनाथ।

रघुनंदन रघुनाथ, सभी मुनि योगी ध्याते

वेद पुराण शास्त्र सब उनकी कीर्ति सुनाते।

कह ‘प्रशांत’ ब्रह्मांडों के स्वामी अवतारे

भक्तों के हित रघुकुल में हैं राम पधारे।।29।।

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शंका बाकी है अभी, तो फिर कर लो जांच

ज्ञानी-ध्यानी कह गये, नहीं सांच को आंच।

नहीं सांच को आंच, शंभु की आज्ञा पाकर

बनकर सीता पहुंची उसी मार्ग पर जाकर।

कह ‘प्रशांत’ हो गये चकित लक्ष्मण गंभीरा

जान गये पर राम सती का कपट-अधीरा।।30।।

- विजय कुमार







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