नई National Steel Policy पर काम तेज, एक हफ्ते में जारी होगा 2047 का ड्राफ्ट

सरकार इस्पात उद्योग की प्रतिस्पर्धा बढ़ाने और सस्ते आयात से निपटने के लिए नयी राष्ट्रीय इस्पात नीति ला रही है, जो 2047 तक का खाका तय करेगी। इसका मसौदा करीब एक सप्ताह में सार्वजनिक कर सुझाव मांगे जाएंगे। साथ ही, छोटे इस्पात उत्पादकों को बढ़ावा देने और कार्बन उत्सर्जन घटाने के लिए 5,000 करोड़ रुपये की योजना भी प्रस्तावित है।
इस्पात सचिव संदीप पौंड्रिक ने मंगलवार को कहा कि सरकार उद्योग की प्रतिस्पर्धा क्षमता बढ़ाने और आयात संबंधी चुनौतियों से निपटने के लिए नयी राष्ट्रीय इस्पात नीति पर काम कर रही है। इस नीति का मसौदा करीब एक सप्ताह में सार्वजनिक किया जाएगा और हितधारकों से इस पर सुझाव मांगे जाएंगे। उन्होंने कहा कि नयी नीति में भारतीय इस्पात उद्योग के लिए 2047 तक का खाका तय किया जाएगा। इस्पात मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी ने साथ ही बताया कि इससे जुड़ी एक योजना तैयार की जा रही है, जिसके तहत इस्पात क्षेत्र में उत्सर्जन कम करने को प्रोत्साहित करने के लिए 5,000 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे।
उद्योग संगठन भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) द्वारा आयोजित ‘मैन्युफैक्चरिंग कॉन्फ्लुएंस 2026’ कार्यक्रम से इतर पत्रकारों से बातचीत में पौंड्रिक ने कहा कि राष्ट्रीय इस्पात नीति को करीब एक सप्ताह में सार्वजनिक किया जाएगा और हितधारकों से इस पर सुझाव मांगे जाएंगे। उन्होंने कहा, ‘‘यह नीति 2047 तक भारत को विकसित भारत के लक्ष्य तक पहुंचाने के दृष्टिकोण के साथ तैयार की जा रही है।’’ सचिव ने कहा कि आयात के मामले में नीति में सस्ते व घटिया आयात को हतोत्साहित करने के उपाय किए जाएंगे। इसमें सुरक्षा उपायों के तौर पर सुरक्षा शुल्क, डंपिंग रोधी शुल्क आदि शामिल हैं।
इसके साथ ही भारतीय इस्पात उद्योग, खासकर छोटे इस्पात उत्पादकों को प्रौद्योगिकी और कीमत के मामले में प्रतिस्पर्धी बनाने पर भी जोर दिया जाएगा। सरकार ने 2017 में राष्ट्रीय इस्पात नीति पेश की थी, जिसका लक्ष्य अन्य पहलुओं के साथ-साथ 2030 तक भारत की इस्पात विनिर्माण क्षमता बढ़ाकर 30 करोड़ टन करना, खपत बढ़ाना और कच्चे माल की उपलब्धता सुनिश्चित करना था। अधिकारी ने हालांकि बताया कि मौजूदा चुनौतियों और जरूरतों को देखते हुए 2017 की नीति की ‘‘फिर से समीक्षा किए जाने की जरूरत थी।’’
इस्पात सचिव ने कहा कि 2017 के बाद कृत्रिम मेधा (एआई), मशीन लर्निंग (एमएल) और तकनीकी उन्नयन जैसी उभरती प्राथमिकताओं पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है। इसके अलावा, बढ़ती खपत और क्षमता के साथ वैश्विक इस्पात क्षेत्र में भारत की स्थिति भी मजबूत हुई है। उन्होंने कहा कि भारत दुनिया का एकमात्र प्रमुख देश है, जहां इस्पात उत्पादन क्षमता और खपत इतनी तेजी से बढ़ रही है। इसके साथ ही कार्बन उत्सर्जन में कमी और टिकाऊपन जैसी चुनौतियां भी हैं।
पौंड्रिक ने कहा, ‘‘इसीलिए हम नयी नीति ला रहे हैं ताकि 2047 तक अगले दो दशकों के लिए एक खाका तैयार हो।’’ कार्यक्रम में अधिकारी द्वारा दिए गए प्रस्तुतीकरण के अनुसार, नयी नीति में सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यमों (एमएसएमई) के लिए विभिन्न उपायों का प्रस्ताव है। उन्होंने कहा, ‘‘हम ‘विकसित भारत इस्पात’ नाम से एक योजना प्रस्तावित कर रहे हैं, जो केवल छोटे इस्पात उत्पादकों के लिए होगी।
इसमें उन्हें उनके उत्पादन के आधार पर प्रोत्साहन दिया जाएगा, जो कार्बन उत्सर्जन में कमी पर निर्भर करेगा। कार्बन उत्सर्जन में कमी बेहतर प्रौद्योगिकी, बेहतर कच्चे माल और नवीकरणीय ऊर्जा के अधिक इस्तेमाल से ही की जा सकती है।’’ उन्होंने कहा कि 5,000 करोड़ रुपये के परिव्यय वाली इस योजना को निकट भविष्य में अधिकृत अधिकारी से मंजूरी मिलने की संभावना है।
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