डॉलर के मुकाबले कमजोर पड़ा रुपया, तीन साल की सबसे बड़ी गिरावट दर्ज

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Ankit Jaiswal । Jan 1 2026 10:13PM

डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया इस साल 4.72% गिरकर तीन साल की सबसे बड़ी गिरावट पर पहुंच गया, जिसका मुख्य कारण विदेशी निवेशकों की बिकवाली और भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की अनिश्चितता है। चालू खाते का घाटा बढ़ने और पूंजी प्रवाह में कमी के चलते रुपया दबाव में रहा, भले ही अमेरिकी डॉलर इंडेक्स कमजोर हुआ।

साल के अंत में भारतीय रुपये की चाल कुछ खास राहत देने वाली नहीं रही है। हल्के तौर पर कहें तो 2025 रुपये के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हुआ है। डॉलर के मुकाबले रुपया साल के आखिरी कारोबारी दिन 89.87 पर बंद हुआ, जो सालाना आधार पर 4.72 फीसदी की गिरावट को दर्शाता है। यह गिरावट बीते तीन वर्षों में सबसे बड़ी मानी जा रही है।

बता दें कि साल के दौरान रुपया कई बार अपने रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा और एक समय 91 के पार भी चला गया था, जिससे बाजार में दबाव साफ नजर आया। जानकारों के अनुसार, यह गिरावट मुख्य रूप से विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली और अमेरिका के साथ व्यापार समझौते को लेकर बनी अनिश्चितता का नतीजा रही है।

मौजूद जानकारी के अनुसार, वित्त वर्ष 2025 में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से करीब 18 अरब डॉलर की निकासी की, जबकि कर्ज और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश भी कमजोर रहा। इसके चलते भारत का चालू खाता संतुलन अप्रैल से नवंबर के बीच लगभग 22 अरब डॉलर के घाटे में चला गया, जो अब तक के सबसे ऊंचे स्तरों में से एक है।

आईडीएफसी फर्स्ट बैंक की अर्थशास्त्री गौरा सेन गुप्ता के मुताबिक, रुपये पर दबाव का मुख्य कारण पूंजी प्रवाह में कमी रही है। उन्होंने कहा कि रिज़र्व बैंक ने अब विनिमय दर को लेकर ज्यादा लचीला रुख अपनाया है और बाजार को स्वाभाविक दिशा में चलने दिया जा रहा है।

गौरतलब है कि 2022 में रुपये की गिरावट अमेरिकी फेडरल रिजर्व की सख्त मौद्रिक नीति से जुड़ी थी, जबकि 2025 में तस्वीर अलग रही। इस साल अमेरिकी डॉलर इंडेक्स करीब 9.5 फीसदी कमजोर हुआ, इसके बावजूद रुपया एशियाई मुद्राओं की तुलना में कमजोर प्रदर्शन करता रहा।

विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका के साथ व्यापार वार्ता में देरी ने निवेशकों की धारणा को प्रभावित किया है। यदि यह समझौता होता है तो रुपया अस्थायी तौर पर 88.50 तक मजबूत हो सकता है, हालांकि इसके बाद फिर दबाव लौटने की संभावना बनी रहेगी।

रिजर्व बैंक के गवर्नर के रूप में संजय मल्होत्रा के कार्यभार संभालने के बाद केंद्रीय बैंक का रुख भी बदला है। अब आरबीआई अत्यधिक उतार-चढ़ाव रोकने तक सीमित हस्तक्षेप कर रहा है, न कि किसी तय स्तर को बचाने पर जोर दे रहा है।

केंद्रीय बैंक के आंकड़ों के मुताबिक, भारत का 40-मुद्रा व्यापार भारित वास्तविक प्रभावी विनिमय दर नवंबर में घटकर 97.5 रह गया, जो साल की शुरुआत में 104.7 था। इसका अर्थ है कि रुपया अब अधिक मूल्यांकन की स्थिति से बाहर आ चुका है।

विशेषज्ञों का मानना है कि कमजोर रुपया निर्यातकों के लिए राहत बन सकता है, क्योंकि इससे उनकी आय में सुधार होता है। हालांकि, आगे की दिशा काफी हद तक वैश्विक व्यापार माहौल और अमेरिका के साथ होने वाले समझौतों पर निर्भर करेगी।

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