तेल के खेल में मोदी के आगे कोई नहीं टिक सकता, भारत-वेनेजुएला वार्ता के बाद दुनिया में मची हलचल

सूत्रों के अनुसार अमेरिका ने भारत को संकेत दिया है कि वह शीघ्र ही वेनेजुएला से तेल खरीद दोबारा शुरू कर सकता है ताकि रूसी कच्चे तेल पर निर्भरता घटे। यह पहल भारत अमेरिका ऊर्जा संबंधों को नए सांचे में ढालने की अमेरिकी कोशिश का हिस्सा है।
भारत और वेनेजुएला के बीच कूटनीति ने अचानक तेज रफ्तार पकड़ ली है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वेनेजुएला की कार्यवाहक राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज के बीच हुई टेलीफोन वार्ता ने वैश्विक ऊर्जा राजनीति में जबरदस्त हलचल पैदा कर दी है। माना जा रहा है कि दोनों नेताओं के बीच हुई इस वार्ता का सीधा संबंध तेल से है और इसका परोक्ष असर भारत रूस निर्भरता घटाने, अमेरिका से व्यापारिक दबाव कम करने और ग्लोबल साउथ में भारत की रणनीतिक स्थिति मजबूत करने से जुड़ा है।
सूत्रों के अनुसार अमेरिका ने भारत को संकेत दिया है कि वह शीघ्र ही वेनेजुएला से तेल खरीद दोबारा शुरू कर सकता है ताकि रूसी कच्चे तेल पर निर्भरता घटे। यह पहल भारत अमेरिका ऊर्जा संबंधों को नए सांचे में ढालने की अमेरिकी कोशिश का हिस्सा है। रिपोर्टों के मुताबिक आने वाले महीनों में भारत रूसी तेल आयात में प्रतिदिन कई लाख बैरल की कटौती कर सकता है। इस कूटनीतिक पृष्ठभूमि में डेल्सी रोड्रिगेज ने प्रधानमंत्री मोदी से वार्ता के बाद ऊर्जा सहयोग पर सहमति की पुष्टि की। प्रधानमंत्री ने भी सार्वजनिक संदेश में कहा कि दोनों देश द्विपक्षीय साझेदारी को सभी क्षेत्रों में नई ऊंचाइयों तक ले जाने की साझा दृष्टि रखते हैं। हम आपको बता दें कि यह वार्ता ऐसे समय हुई है जब वेनेजुएला ने अपने हाइड्रोकार्बन क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोलने का ऐतिहासिक फैसला लिया है।
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वेनेजुएला दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडारों वाला देश है। दशकों तक कठोर सरकारी नियंत्रण के बाद अब कानूनों में व्यापक सुधार किए गए हैं। खोज, उत्पादन, वितरण और विपणन में निजी भागीदारी को अनुमति दी गई है। कर और रॉयल्टी घटाई गई हैं, बड़े प्रोजेक्ट के लिए शुल्क और कम किए जा सकते हैं और विवादों में अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता का रास्ता खोला गया है। इस तरह यह बदलाव कर पूर्व राष्ट्रपति ह्यूगो चावेज के दौर की राष्ट्रीयकरण नीति को पलट दिया गया है।
अमेरिका ने भी जवाबी कदम उठाते हुए वेनेजुएला को प्रतिबंधों में ढील दी है। नया सामान्य लाइसेंस अमेरिकी कंपनियों को वेनेजुएला के तेल के निर्यात, भंडारण, परिवहन और परिशोधन की अनुमति देता है, हालांकि भुगतान और कुछ देशों से जुड़े लेन-देन पर सख्त शर्तें रखी गई हैं। हम आपको याद दिला दें कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले साल मार्च में वेनेजुएला से तेल खरीदने वाले देशों पर भारी शुल्क लगाया था, जिसमें भारत भी शामिल था। अब दिशा बदली है।
देखा जाये तो रूस यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने अवसर का लाभ उठाते हुए सस्ता रूसी तेल बड़ी मात्रा में खरीदा। इससे देश की ऊर्जा जरूरतें भी पूरी हुईं और कीमतों पर भी नियंत्रण रहा। लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। अमेरिका का दबाव बढ़ा है, व्यापार शुल्क भारी हुए हैं और प्रतिबंधों के कारण आपूर्ति व्यवस्था जटिल हो गई है। इसी वजह से भारत अब तेल आयात के नए विकल्प तलाश रहा है। आयात के ताजा आंकड़े बताते हैं कि दिसंबर में रूस से तेल खरीद दो साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई। इसके साथ ही ओपेक देशों से आने वाले तेल की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ी है। कई भारतीय रिफाइनरियों ने रूसी कच्चे तेल से दूरी बना ली है और आपूर्ति स्रोत बदलने शुरू कर दिए हैं।
इसी बीच, वेनेजुएला के नए कानून ने एक नई संभावना खोली है। उत्पादन और निर्यात में तेज बढ़ोतरी की उम्मीद जताई जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रतिबंधों के चलते जो तेल पहले मजबूरी में सस्ते दाम पर बेचना पड़ता था, अब वह बेहतर कीमत और कम लागत के साथ खुले बाजार में उपलब्ध होगा। सरकारी आकलन के अनुसार, वेनेजुएला में इस साल उत्पादन में 18 प्रतिशत तक बढ़ोतरी संभव है, जबकि निजी अनुमान इससे भी तेज उछाल की ओर संकेत कर रहे हैं।
देखा जाये तो मोदी और रोड्रिगेज की बातचीत सिर्फ एक शिष्टाचार नहीं, बल्कि सामरिक संकेत है। भारत साफ तौर पर संदेश दे रहा है कि वह किसी एक स्रोत या किसी एक धड़े के साथ नहीं रहेगा। ऊर्जा सुरक्षा भारत की आर्थिक संप्रभुता की रीढ़ है और इस रीढ़ को मजबूत करने के लिए बहुध्रुवीय नीति अनिवार्य है। वेनेजुएला के दरवाजे खुलना भारत के लिए अवसर की तरह है क्योंकि दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार तक पहुंच सस्ती और स्थिर आपूर्ति का रास्ता खोल सकती है। हालांकि भारत को अमेरिकी शर्तों, भुगतान नियमों और भू-राजनीति की रस्साकशी में संतुलन भी साधना होगा।
सामरिक रूप से यह कदम रूस पर निर्भरता घटाकर भारत की सौदेबाजी की शक्ति को और बढ़ाता है। यदि भारत वेनेजुएला से तेल खरीद फिर शुरू करता है तो अमेरिका के साथ व्यापारिक तनाव कम हो सकता है, साथ ही लैटिन अमेरिका में भारत की मौजूदगी मजबूत होगी। ग्लोबल साउथ के मंच पर भी यह संकेत जाएगा कि भारत ठोस साझेदारी करता है। वहीं वेनेजुएला ने नियम सरल कर यह दिखा दिया है कि आर्थिक यथार्थ विचारधारात्मक जिद से बड़ा होता है। निजी निवेश, कम कर, अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता और पारदर्शिता से ही उत्पादन बढ़ेगा और आम नागरिक तक लाभ पहुंचेगा। भारत यदि यहां निवेश और दीर्घकालिक खरीद समझौते करता है तो यह दोनों देशों के लिए लाभकारी होगा।
बहरहाल, इस पूरी तस्वीर के केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कुशल और दूरदर्शी विदेश नीति साफ दिखाई देती है। कच्चे तेल की खरीद और आपूर्ति के मोर्चे पर उन्होंने खुद को एक मास्टर रणनीतिकार के रूप में स्थापित किया है। जब दुनिया रूस यूक्रेन युद्ध के बाद तेल संकट से जूझ रही थी, तब भारत पर भी हर तरफ से दबाव था कि वह सस्ते रूसी तेल से दूरी बनाए। इसके बावजूद प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखते हुए बहुस्तरीय कूटनीति अपनाई। रूस से तेल खरीद जारी रखी, पश्चिम एशिया और अफ्रीका से आपूर्ति संतुलित की और अब लैटिन अमेरिका की ओर रणनीतिक कदम बढ़ा दिये हैं। इसी संतुलित नीति का नतीजा रहा कि जहां यूरोप और अमेरिका में ईंधन के दाम आसमान छू रहे थे, वहीं भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें काबू में रहीं। यह केवल आर्थिक प्रबंधन नहीं था, बल्कि वैश्विक दबावों के बीच भारत की सामरिक स्वायत्तता और नेतृत्व क्षमता का स्पष्ट प्रदर्शन था। देखा जाये तो मौजूदा संकेत साफ बता रहे हैं कि नई दिल्ली लगातार कुशल रणनीति के साथ फैसले कर रही है। यही आक्रामक यथार्थवाद आज के दौर की मांग है।
-नीरज कुमार दुबे
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