आखिर हुतियों को नियंत्रित करने में सऊदी अरब, अमेरिका और ‘इस्लामिक नाटो’ क्यों विफल प्रतीत हो रहे हैं?

Saudi Arabia
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कमलेश पांडे । Oct 15 2026 12:53PM

सऊदी अरब के पास सैन्य कार्रवाई के अलावा कौन-कौन से विकल्प हैं? चूंकि अमेरिका व इजरायल सऊदी अरब का साथ छोड़ चुके हैं, इसलिए अब वह रूस को माध्यम बनाकर ईरान के शरणागत हो जाए। साथ ही तमाम अमेरिका सैन्य अड्डों को खाली करवा ले। इससे ईरान खुद को सुरक्षित महसूस करेगा।

खाड़ी देशों में ईरान पर जोरदार हमला करके अमेरिका-इजरायल ने जो आग भड़काई, उसकी भारी कीमत आज उसके समर्थक चुका रहे हैं। जब ईरान ने अपनी सधी हुई रणनीति से और रूस व चीन के बल पर अमेरिका-इजरायल को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया, तो उन्होंने अपनी सैन्य कार्रवाई रोक ली। इधर ईरान समर्थित यमन के हूती विद्रोहियों ने जब सऊदी को निशाने पर लिया और ताबड़तोड़ हमले शुरू किए, तो उनके विरुद्ध अमेरिका, सऊदी अरब और इस्लामिक नाटो की सैन्य क्षमता पर सवाल उठने लगे हैं। आधुनिक हथियारों, उन्नत वायु रक्षा प्रणालियों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के बावजूद हूती विद्रोही सऊदी अरब के लिए सुरक्षा चुनौती बने हुए हैं।

जिस तरह से अक्टूबर 2026 में रियाद के किंग खालिद अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर हमले हुए और लाल सागर के समुद्री मार्गों को लेकर  तनाव बढ़ा, उसने इस संकट को और गंभीर बना दिया है। आइए हम आपको इसके पीछे के दस अहम सवाल समझाएंगे, जो आगे दिए हुए हैं। इससे पहले एक मीडिया की 12–13 अक्टूबर की रिपोर्टों में सऊदी हवाई सुरक्षा की कमजोरियों और हूतियों की बढ़ती क्षमताओं का उल्लेख किया गया है, उसकी चर्चा करते हैं। यही वजह है कि इस संकट को समझने के लिए तीन सवाल महत्त्वपूर्ण हैं:-

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एक, अमेरिका जैसी महाशक्ति हूतियों को निर्णायक रूप से नियंत्रित क्यों नहीं कर पा रही है? शायद इसलिए कि उनके ऊपर ईरान और ईरान के ऊपर रूस व चीन का हाथ है। सभी मिलकर खाड़ी देशों से अमेरिकी पांव उखाड़ना चाहते हैं। इसलिए अमेरिका बेबस है।

दो, सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच बने नए रक्षा समझौते की वास्तविक उपयोगिता क्या है? दरअसल, यह अमेरिकी इशारे पर भारत के विरुद्ध बनवाया गया संगठन है। लेकिन इनकी आर्थिक और सैन्य क्षमता ईरान से सीधा टकराने की नहीं है। अब जान चुके हैं कि जो देश अमेरिका को पीछे हटने पर मजबूर कर सकता है, वह देश इन अमेरिकी पिल्लों को पल भर में दबोच कर शिया शासन के अधीन मिला लेगा। किसी भी लड़ाई में सारे मोर्चे एक साथ नहीं खोले जाते, बल्कि एक एक कर दुर्लभ लक्ष्य साधा जाता है। ईरान और उसके प्रॉक्सी शिया संगठनों की रणनीति यही है।

तीन, सऊदी अरब के पास सैन्य कार्रवाई के अलावा कौन-कौन से विकल्प हैं? चूंकि अमेरिका व इजरायल सऊदी अरब का साथ छोड़ चुके हैं, इसलिए अब वह रूस को माध्यम बनाकर ईरान के शरणागत हो जाए। साथ ही तमाम अमेरिका सैन्य अड्डों को खाली करवा ले। इससे ईरान खुद को सुरक्षित महसूस करेगा। यदि वह सुन्नी मुल्कों पाकिस्तान व तुर्कीये के भ्रमजाल में फंसेगा तो बर्बादी भी होगी और सत्ता पलट भी होगा।

अब आइए दस मौलिक सवालों से इस वैश्विक समस्या के समाधान को ढूंढने की कोशिश करते हैं, जहां पर हर पक्ष के संतुलन को दर्शाने की कोशिश की गई है।

पहला सवाल यह है कि हूतियों को नियंत्रित करना इतना कठिन क्यों है? तो जवाब होगा कि सैन्य शक्ति और युद्ध के परिणाम में अंतर होता है। अमेरिका और सऊदी अरब के पास आधुनिक सैन्य संसाधन हैं, लेकिन किसी सशस्त्र संगठन को पराजित करना केवल हथियारों की श्रेष्ठता का प्रश्न नहीं है, बल्कि सैनिकों में मजबूत राष्ट्रीय जज्बा भी होना चाहिए जो अबतक दिखा नहीं। हूती आंदोलन ने यमन के गृहयुद्ध के दौरान सैन्य अनुभव हासिल किया है। वह देश के बड़े हिस्से में अपना प्रभाव बनाए हुए है और उसके पास मिसाइल तथा ड्रोन जैसी क्षमताएँ हैं। एक ताजा विश्लेषण के अनुसार, हूतियों की चुनौती के पीछे अपेक्षाकृत कम लागत वाली सैन्य तकनीक, ईरान से मिली तकनीकी सहायता, स्थानीय समर्थन और विरोधी पक्षों के बीच मतभेद जैसे कारक हैं। दरअसल किसी देश की सैन्य श्रेष्ठता अपने आप यह सुनिश्चित नहीं करती कि वह अपने राजनीतिक उद्देश्यों को भी प्राप्त कर लेगा।

दूसरा सवाल है कि कम लागत वाले हमले और महँगी सुरक्षा व्यवस्था के बीच भी सऊदी अरब पर हुती क्यों भारी पड़ रहा है? शायद इसलिए कि हूती संकट का एक महत्त्वपूर्ण पहलू आर्थिक है। ड्रोन और अन्य अपेक्षाकृत सस्ते साधनों से खतरा उत्पन्न किया जा सकता है। हमलों को रोकने के लिए अत्याधुनिक निगरानी और वायु रक्षा व्यवस्था की आवश्यकता पड़ती है। लगातार हमलों की आशंका के कारण नागरिक विमानन, ऊर्जा प्रतिष्ठानों और व्यापारिक गतिविधियों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि सऊदी अरब की रक्षा व्यवस्था पूरी तरह विफल हो गई है, बल्कि हालिया घटनाएँ यह सवाल उठाती हैं कि क्या उसकी मौजूदा व्यवस्था सभी प्रकार के हमलों से पर्याप्त सुरक्षा दे पा रही है। मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार, सऊदी अधिकारी रियाद हवाई अड्डे पर हुए हमले के दौरान सुरक्षा व्यवस्था में आई कमियों की जाँच कर रहे हैं।

तीसरा सवाल यह है कि यमन का भूगोल और राजनीतिक परिस्थितियाँ हुतियों की मदद कर रही हैं। यमन की भौगोलिक परिस्थितियाँ और लंबे समय से जारी राजनीतिक अस्थिरता इस समस्या को जटिल बनाती हैं।
हूती आंदोलन को केवल बाहरी सैन्य शक्ति से नियंत्रित करने की कोशिश में स्थानीय राजनीतिक समीकरणों की अनदेखी नहीं की जा सकती। यमन में एक ओर हूतियों का प्रभाव है, तो दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार और दूसरे स्थानीय राजनीतिक तथा सैन्य समूह हैं। इन सभी के हित हमेशा एक जैसे नहीं होते। इसलिए हूतियों के विरुद्ध कार्रवाई और यमन में स्थायी राजनीतिक व्यवस्था स्थापित करना दो अलग-अलग चुनौतियाँ हैं।

चौथा सवाल है कि आखिर इसके पीछे ईरान की भूमिका क्या है? तो जवाब होगा कि हूती आंदोलन को ईरान से समर्थन और तकनीकी सहायता मिलने की बात लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय विश्लेषणों में सामने आती रही है। लेकिन हूतियों को केवल ईरान का निर्देश मानकर चलना भी अधूरा विश्लेषण होगा। एक अध्ययन के अनुसार, ईरान और हूतियों के हित कई मामलों में एक-दूसरे से मेल खाते हैं, लेकिन हूतियों के अपने स्थानीय राजनीतिक उद्देश्य भी हैं। इसका कूटनीतिक अर्थ यह है कि ईरान के साथ बातचीत उपयोगी हो सकती है, लेकिन उससे हूतियों के सभी निर्णय स्वतः नियंत्रित हो जाएँगे, इसकी गारंटी नहीं है।

पांचवां सवाल यह है कि आखिर अमेरिका हूतियों को निर्णायक रूप से नियंत्रित क्यों नहीं कर पा रहा? तो जवाब होगा कि अमेरिका की स्थिति में एक महत्त्वपूर्ण विरोधाभास है: वह सऊदी अरब की सुरक्षा में सहयोग करना चाहता है, लेकिन यमन में एक और व्यापक युद्ध में उलझने से भी बचना चाहता है। इसके पीछे कुछ कारण हैं:-

एक, सैन्य कार्रवाई की सीमाएँ: हूती ठिकानों पर हवाई हमले उनकी क्षमताओं को प्रभावित कर सकते हैं। लेकिन हवाई कार्रवाई अपने आप किसी संगठन का राजनीतिक नियंत्रण समाप्त नहीं करती। अतीत के अनुभवों से भी स्पष्ट है कि लंबे सैन्य अभियान के बावजूद हूती आंदोलन को समाप्त नहीं किया जा सका। इसलिए अमेरिका के सामने केवल हमले करने का प्रश्न नहीं, बल्कि यह भी है कि सैन्य कार्रवाई के बाद स्थायी सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए?

दो, अमेरिका की प्राथमिकताएँ: एक नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी अरब ने हूतियों के विरुद्ध प्रस्तावित अभियान में अमेरिकी हवाई हमलों का समर्थन माँगा था, लेकिन उस समय वाशिंगटन ने प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई में शामिल होने से इनकार किया। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका खुफिया जानकारी और अन्य सहायता देता रहा। इससे संकेत मिलता है कि अमेरिका की सहायता और उसकी प्रत्यक्ष युद्ध में भागीदारी अलग-अलग विषय हैं। वाशिंगटन के लिए व्यापक क्षेत्रीय संघर्ष का जोखिम, सैन्य संसाधनों पर दबाव और दूसरे मोर्चों पर उसकी प्राथमिकताएँ महत्त्वपूर्ण कारक हैं।

तीन, लाल सागर का सामरिक महत्त्व: लाल सागर और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य अंतरराष्ट्रीय व्यापार के महत्त्वपूर्ण मार्ग हैं। यदि इन मार्गों पर जहाजों की आवाजाही बाधित होती है, तो उसका असर केवल सऊदी अरब पर नहीं, बल्कि वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं, माल ढुलाई की लागत और ऊर्जा व्यापार पर भी पड़ता है। एक रिपोर्ट में चेतावनी दी गई थी कि लाल सागर की सुरक्षा को लेकर बढ़ता संकट अंतरराष्ट्रीय समुद्री सहयोग को कमजोर कर सकता है। अमेरिका की दुविधा यह है कि उसे समुद्री व्यापार और अपने सहयोगियों की सुरक्षा करनी है, लेकिन ऐसी कार्रवाई से बचना भी है जो संघर्ष को और व्यापक बना दे।

छठा सवाल है कि क्या ‘इस्लामिक नाटो’ हूतियों को रोक सकता है? तो यहाँ पर एक महत्त्वपूर्ण तथ्यात्मक अंतर समझना आवश्यक है। वह यह कि अगस्त 2026 में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये ने मक्का में एक संयुक्त रक्षा समझौता किया, जिसे भारत विरोधी माना गया। इस समझौते में एक हस्ताक्षरकर्ता पर सशस्त्र हमला अन्य हस्ताक्षरकर्ताओं पर हमले के रूप में देखने का प्रावधान है। मीडिया और राजनीतिक चर्चाओं में इस व्यवस्था को कभी-कभी ‘इस्लामिक नाटो’ कहा जा रहा है। लेकिन इसे नाटो के समान संस्थागत, सैन्य और परिचालन क्षमता वाला संगठन मान लेना अभी उचित नहीं होगा। क्योंकि इस गठबंधन की अपनी संभावनाएँ हैं:-

एक, सामूहिक प्रतिरोध का संदेश: यदि सदस्य देशों की प्रतिबद्धता विश्वसनीय होती है, तो किसी एक सदस्य पर हमले की राजनीतिक कीमत बढ़ सकती है।

दो, सुरक्षा सहयोग: सदस्य देशों के बीच खुफिया जानकारी, प्रशिक्षण और सुरक्षा समन्वय में सहयोग बढ़ सकता है। हालांकि इन क्षेत्रों में वास्तविक सहयोग कितना विकसित हुआ है, इसका आकलन उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर करना होगा।

तीन, सऊदी अरब के लिए अतिरिक्त कूटनीतिक विकल्प: रियाद को अमेरिका पर अपनी सुरक्षा संबंधी निर्भरता कम करने की दिशा में नए साझेदार मिल सकते हैं। फिर भी तीन बड़ी चुनौतियाँ हैं:- एक, अलग-अलग राष्ट्रीय हित: प्रत्येक देश यह तय कर सकता है कि किसी संकट में उसकी भागीदारी कितनी और किस प्रकार की होगी। दो, समझौते का व्यावहारिक क्रियान्वयन: पारस्परिक रक्षा की घोषणा अपने आप संयुक्त सैन्य कार्रवाई सुनिश्चित नहीं करती। तीन, क्षेत्रीय संघर्ष का जोखिम    किसी सैन्य कार्रवाई से ईरान और अन्य क्षेत्रीय पक्षों के साथ तनाव बढ़ सकता है। एक मीडिया विश्लेषण ने भी इस गठबंधन की वास्तविक प्रभावशीलता और उसके सामने मौजूद चुनौतियों पर प्रश्न उठाए थे। वास्तव में यह समझौता सऊदी अरब की सुरक्षा कूटनीति में एक नया आयाम है, लेकिन इसे हूती समस्या का स्वतः समाधान नहीं माना जा सकता।

सातवां सवाल है कि सऊदी अरब के सामने अब क्या विकल्प हैं? तो जवाब होगा कि सऊदी अरब के सामने मुख्य चुनौती यह है कि वह अपनी जनता, ऊर्जा प्रतिष्ठानों और व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित करे, जबकि एक और लंबा युद्ध शुरू करने के जोखिम को भी ध्यान में रखे। लिहाजा उसके सामने पाँच प्रमुख विकल्प हैं:-

एक, सैन्य दबाव बढ़ाना: सऊदी अरब यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार के साथ मिलकर हूतियों पर सैन्य दबाव बढ़ा सकता है। इस विकल्प का उद्देश्य हूतियों की हमले करने की क्षमता को सीमित करना और विवादित क्षेत्रों पर नियंत्रण से संबंधित परिस्थितियों को बदलना होगा। इससे संभावित लाभ यह होगा कि हूतियों की सैन्य गतिविधियों पर दबाव बढ़ सकता है। जबकि जोखिम यह है कि संघर्ष लंबा खिंच सकता है, नागरिकों को नुकसान पहुँच सकता है और सऊदी अरब के भीतर हमलों का खतरा बढ़ सकता है।मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरब नेतृत्व यमन की सरकारी सेनाओं के साथ अभियान की योजना बना रहा था। उस समय अमेरिकी सेना की प्रत्यक्ष भागीदारी सुनिश्चित नहीं थी। इसलिए केवल सैन्य अभियान की घोषणा को सफलता का प्रमाण नहीं माना जा सकता है।

दो, अमेरिका पर निर्भरता के साथ-साथ अन्य साझेदारों से सहयोग: सऊदी अरब अमेरिका के साथ अपने सुरक्षा संबंध बनाए रखते हुए पाकिस्तान, तुर्किये और दूसरे सहयोगियों के साथ सहयोग बढ़ा सकता है। लेकिन नए रक्षा समझौतों की वास्तविक उपयोगिता इस बात पर निर्भर करेगी कि सदस्य देश किस प्रकार की सहायता देने को तैयार हैं और उनके बीच व्यावहारिक समन्वय कितना है। यहाँ उद्देश्य केवल गठबंधन का विस्तार करना नहीं, बल्कि सऊदी अरब की सुरक्षा व्यवस्था को अधिक विश्वसनीय बनाना होगा।

तीन, ईरान के साथ कूटनीतिक संवाद बनाना: हूती संकट का एक महत्त्वपूर्ण आयाम ईरान-सऊदी अरब संबंध भी हैं। यदि दोनों देश क्षेत्रीय तनाव कम करने, यमन में राजनीतिक समाधान और हमलों को रोकने के लिए संवाद आगे बढ़ाते हैं, तो इससे संघर्ष के विस्तार का जोखिम घट सकता है।

हालाँकि, ईरान से बातचीत की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह कितना प्रभाव डाल सकता है और हूती नेतृत्व किन शर्तों को स्वीकार करता है। यहां पर कूटनीतिक चुनौती यह है कि ऐसा समझौता खोजना जो सऊदी अरब की सुरक्षा चिंताओं को संबोधित करे, लेकिन यमन के भीतर राजनीतिक समाधान की संभावना भी बनाए रखे।

चार, समुद्री सुरक्षा को अंतरराष्ट्रीय सहयोग से मजबूत करना: लाल सागर की सुरक्षा केवल सऊदी अरब की समस्या नहीं है। इसलिए वह अन्य देशों के साथ समुद्री निगरानी, वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षा, सूचना साझा करने और संकट के समय समन्वित प्रतिक्रिया पर काम कर सकता है। चैथम हाउस ने मौजूदा बहुराष्ट्रीय समुद्री अभियानों और सहयोग को मजबूत करने की संभावनाओं का उल्लेख किया है। इस विकल्प का महत्त्व इसलिए है क्योंकि समुद्री व्यापार की सुरक्षा के लिए हूती आंदोलन के साथ पूरे संघर्ष का सैन्य समाधान निकालना अनिवार्य नहीं है।

पांच, यमन में राजनीतिक समाधान की दिशा में प्रयास: यह विकल्प तत्काल राजनीतिक रूप से कठिन हो सकता है, लेकिन स्थायी शांति के लिए इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। संयुक्त राष्ट्र ने सितंबर 2026 में हूतियों के हमलों की निंदा करते हुए सभी पक्षों से अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का पालन करने और यमन के नेतृत्व में समावेशी राजनीतिक समाधान की दिशा में काम करने का आग्रह किया था। राजनीतिक समाधान में युद्धविराम, नागरिकों की सुरक्षा, मानवीय सहायता, बंदियों के प्रश्न और यमन की भविष्य की शासन-व्यवस्था जैसे विषय शामिल हो सकते हैं। इस प्रक्रिया में कठिन बातचीत और आपसी समझौते की आवश्यकता होगी।

आठवां सवाल है कि सऊदी अरब के विकल्पों की तुलना किससे और कैसे की जा सकती है? इस विकल्प के संभावित लाभ, प्रमुख जोखिम या सीमा स्पष्ट हैं। जहां तक सैन्य दबाव    की बात है तो हूतियों की क्षमताओं पर दबाव लंबा युद्ध और नागरिक नुकसान पहुंचा सकता है। अमेरिका के साथ सहयोग, मौजूदा सुरक्षा साझेदारी का लाभ, अमेरिकी प्रत्यक्ष भागीदारी की अनिश्चितता, पाकिस्तान-तुर्किये सहित नए साझेदार सुरक्षा सहयोग का विस्तार और समझौते की वास्तविक क्षमता अभी परखी जानी है। लिहाजा ईरान के साथ संवाद क्षेत्रीय तनाव कम करने की संभावना बढ़ा सकता है। ईरान का प्रभाव सीमित हो सकता है, लेकिन बहुराष्ट्रीय समुद्री सुरक्षा व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा में सहयोग व्यापक राजनीतिक संघर्ष का समाधान नहीं हो सकता। इसलिए यमन में राजनीतिक समझौता और स्थायी शांति की संभावना, कठिन वार्ता और परस्पर अविश्वास को दूर करके ही हासिल की जा सकती है। यह तुलना किसी एक विकल्प को सर्वश्रेष्ठ घोषित नहीं करती, बल्कि प्रत्येक विकल्प अलग समस्या का समाधान करने का प्रयास करता है और उसके परिणाम परिस्थितियों पर निर्भर होंगे।

नौवां सवाल है कि भारत के लिए इस संकट के क्या मायने हैं? तो जवाब होगा कि भारत के लिए यह संकट तीन प्रमुख कारणों से महत्त्वपूर्ण है:-

एक, ऊर्जा सुरक्षा: सऊदी अरब भारत के लिए एक महत्त्वपूर्ण ऊर्जा साझेदार है। क्षेत्रीय संघर्ष से तेल की आपूर्ति और कीमतों पर दबाव पड़ सकता है।

दो, समुद्री व्यापार: लाल सागर और बाब-अल-मंदेब में अस्थिरता से भारत और यूरोप के बीच व्यापारिक जहाजों के मार्ग, परिवहन लागत और माल पहुँचने के समय पर प्रभाव पड़ सकता है।

तीन, भारतीय नागरिकों की सुरक्षा: पश्चिम एशिया में बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक काम करते हैं। क्षेत्रीय तनाव बढ़ने पर उनकी सुरक्षा और आवश्यकता पड़ने पर निकासी की तैयारी महत्त्वपूर्ण हो जाती है। इसलिए भारत के हित में समुद्री मार्गों की सुरक्षा, क्षेत्रीय तनाव में कमी और सभी संबंधित पक्षों के साथ संवाद बनाए रखना है।

दसवां सवाल है कि क्या सऊदी अरब को सैन्य रणनीति बदलनी होगी? तो जवाब होगा कि हूतियों के साथ जारी संघर्ष यह दिखाता है कि सैन्य संसाधनों की प्रचुरता और राजनीतिक उद्देश्यों की प्राप्ति के बीच सीधा संबंध नहीं है। अमेरिका की प्रत्यक्ष सैन्य भागीदारी की सीमाएँ, हूतियों की अपनी राजनीतिक और सैन्य संरचना, ईरान का समर्थन तथा यमन की जटिल आंतरिक परिस्थितियाँ इस संकट को लगातार कठिन बना रही हैं। दूसरी ओर, पाकिस्तान और तुर्किये के साथ सऊदी अरब का नया रक्षा समझौता सुरक्षा सहयोग के नए अवसर प्रस्तुत करता है, लेकिन उसकी वास्तविक प्रभावशीलता समय और परिस्थितियों के साथ ही स्पष्ट होगी।

सऊदी अरब के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न केवल यह नहीं है कि हूतियों पर सैन्य दबाव कैसे बढ़ाया जाए, बल्कि यह भी है कि अपने नागरिकों, ऊर्जा प्रतिष्ठानों और समुद्री व्यापार की सुरक्षा करते हुए यमन में ऐसा राजनीतिक समाधान कैसे खोजा जाए जो बार-बार युद्ध की स्थिति पैदा होने से रोके। वस्तुतः इस संकट का आकलन तीन कसौटियों पर करना उपयोगी होगा: सऊदी अरब की सुरक्षा, लाल सागर में अंतरराष्ट्रीय व्यापार की निर्बाध आवाजाही और यमन में स्थायी शांति की संभावनाएँ। इसको साधे बिना हर सैन्य कार्रवाई व वैश्विक कूटनीतिक  अधूरी रहेगी।

- कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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