चीन के साथ मिलकर भारत विरोधी चाल चल रहे बांग्लादेश को ट्रंप ने लगाया डंडा

अमेरिकी दूतावास ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि कोई भी आवेदक साक्षात्कार से पहले एक भी डॉलर जमा न करे। पहले भुगतान करने से वीजा मिलने की कोई गारंटी नहीं है और तीसरे पक्ष की वेबसाइटें ठगी का जरिया हो सकती हैं।
दक्षिण एशिया की राजनीति इस समय दो परतों में खदबदा रही है। एक परत में बांग्लादेश की नीतियां हैं जो धीरे धीरे चीन को भारत की सबसे संवेदनशील भौगोलिक नस के पास लाने की कोशिश करती दिख रही हैं। दूसरी परत में अमेरिका का वह सख्त फैसला है जिसने एक झटके में ढाका को उसकी वास्तविक हैसियत का आईना दिखा दिया है। हम आपको बता दें कि अमेरिकी विदेश विभाग के अनुसार बांग्लादेश उन 38 देशों की सूची में डाल दिया गया है जिनके नागरिकों को अमेरिका जाने के लिए अब B1B2 वीजा पर भारी वीजा बॉन्ड देना पड़ सकता है। यह नियम 21 जनवरी 2026 से लागू होगा। बांग्लादेशी नागरिकों को व्यापार और पर्यटन के लिए अमेरिका जाने से पहले वीजा स्वीकृत होने के बाद पांच हजार, दस हजार या पंद्रह हजार डॉलर तक का बॉन्ड जमा करना पड़ सकता है। यह राशि किसी स्वचालित नियम से नहीं बल्कि दूतावास के कांसुलर अधिकारी के विवेक से तय होगी।
अमेरिकी दूतावास ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि कोई भी आवेदक साक्षात्कार से पहले एक भी डॉलर जमा न करे। पहले भुगतान करने से वीजा मिलने की कोई गारंटी नहीं है और तीसरे पक्ष की वेबसाइटें ठगी का जरिया हो सकती हैं। बॉन्ड केवल तभी जमा होगा जब वीजा स्वीकृत हो जाएगा और वह भी अमेरिका सरकार की आधिकारिक भुगतान प्रणाली के जरिये। नियम तोड़ने पर बॉन्ड जब्त हो जाएगा जबकि समय पर अमेरिका छोड़ने या यात्रा ही न करने की स्थिति में यह राशि वापस मिल सकती है।
इसे भी पढ़ें: डोनाल्ड ट्रंप की कूटनीतिक ब्लैकमेलिंग का वैश्विक फलाफल
देखा जाये तो यह फैसला केवल तकनीकी वीजा सुधार नहीं है। यह एक सख्त राजनीतिक संकेत है। अमेरिका साफ कर रहा है कि जिन देशों से अवैध प्रवास या नियम उल्लंघन का खतरा अधिक है उन्हें अब आसान पहुंच नहीं मिलेगी। बांग्लादेश को इस सूची में डालना उसके अंतरराष्ट्रीय व्यवहार पर सीधी टिप्पणी है।
इसी समय दूसरी तस्वीर और भी चिंताजनक है। भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में खटास के बीच चीन के राजदूत ने तीस्ता नदी परियोजना क्षेत्र का दौरा किया जो भारत के चिकन नेक के बेहद करीब है। यह वही संकरा भूभाग है जो भारत के मुख्य भूभाग को उसके पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ता है। तीस्ता नदी प्रबंधन और पुनर्स्थापन परियोजना के नाम पर चीनी मौजूदगी इस क्षेत्र में केवल विकास सहयोग नहीं कही जा सकती।
बांग्लादेश की अंतरिम सरकार और उसके प्रमुख सलाहकार पहले ही चीन के साथ गहरी साझेदारी के संकेत दे चुके हैं। बीते वर्षों में चीन ने बंदरगाह, सड़क, ऊर्जा और अब जल प्रबंधन तक अपनी पहुंच बढ़ाने की रणनीति अपनाई है। तीस्ता परियोजना में चीनी तकनीकी आकलन भारत के लिए एक सामरिक चेतावनी है क्योंकि जल संसाधन और सीमावर्ती बुनियादी ढांचा सीधे सुरक्षा से जुड़े होते हैं। इस प्रकार एक ओर ढाका बीजिंग को भारत की सबसे संवेदनशील नस के पास लाने की कोशिश करता दिख रहा है तो दूसरी ओर वाशिंगटन उसके लिए दरवाजे सख्त करता जा रहा है।
वैसे देखा जाये तो बांग्लादेश इस समय एक खतरनाक भ्रम में जी रहा है। उसे लग रहा है कि वह चीन की गोद में बैठकर क्षेत्रीय ताकत बन जाएगा और भारत पर दबाव बना सकेगा। चिकन नेक के पास चीनी गतिविधियों को न्यूनतम बताना या केवल तकनीकी सहयोग कहना अपने आप को धोखा देना है। यह वही इलाका है जहां एक छोटी-सी अस्थिरता भारत के पूर्वोत्तर को शेष देश से काट सकती है। ऐसे में चीन की मौजूदगी केवल बांग्लादेश की विकास जरूरत नहीं बल्कि एक सुनियोजित भू रणनीतिक चाल है।
लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति भावनाओं से नहीं चलती। यहां हिसाब किताब ताकत और भरोसे का होता है। बांग्लादेश ने यह मान लिया था कि पश्चिम खासकर अमेरिका उसकी हर हरकत को नजरअंदाज करता रहेगा। यहीं सबसे बड़ी भूल हुई। डोनाल्ड ट्रंप की नीति शैली में न तो कूटनीतिक मुलायमियत है और न ही दिखावटी सहानुभूति। वीजा बॉन्ड का फैसला सीधे शब्दों में यह बताता है कि बांग्लादेश अब भरोसेमंद श्रेणी में नहीं रहा।
यह फैसला प्रतीकात्मक से कहीं अधिक है। यह बांग्लादेशी मध्यम वर्ग, उच्च वर्ग और व्यापारिक तबके को सीधा आर्थिक झटका है। अमेरिका जाना अब केवल इच्छा नहीं बल्कि क्षमता का प्रश्न बन गया है। यह एक तरह का अनुशासनात्मक कदम है जो बताता है कि नियम तोड़ने की कीमत चुकानी होगी। सामरिक दृष्टि से यह घटनाक्रम भारत के लिए भी महत्वपूर्ण संकेत देता है। अमेरिका का यह रुख बताता है कि वह क्षेत्र में गैर जिम्मेदार व्यवहार को लेकर आंख मूंदे नहीं बैठा है। चीन के साथ जरूरत से ज्यादा नजदीकी और आंतरिक अस्थिरता का मिश्रण किसी भी देश को वैश्विक संदेह के घेरे में ला सकता है। बांग्लादेश इसका ताजा उदाहरण है।
ढाका को यह समझना होगा कि भारत के साथ टकराव और चीन पर अत्यधिक निर्भरता उसे किसी सुरक्षित भविष्य की ओर नहीं ले जाएगी। उलटे वह ऐसी स्थिति में फंस सकता है जहां न तो पश्चिम भरोसा करेगा और न ही चीन किसी संकट में वास्तविक सहारा बनेगा। इतिहास गवाह है कि बीजिंग अपने हित साधता है स्थायी दोस्ती नहीं निभाता।
बहरहाल, वीजा बॉन्ड का यह फैसला केवल कागजी नियम नहीं बल्कि एक चेतावनी है। यह चेतावनी है कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में शरारतपूर्ण संतुलन साधने की कोशिशें अंततः भारी पड़ती हैं। बांग्लादेश को अपनी औकात और विकल्प दोनों पर गंभीर पुनर्विचार करना होगा। वरना चिकन नेक के पास खेली गई चालें और वाशिंगटन से मिला झटका मिलकर उसे ऐसे मोड़ पर ले जा सकते हैं जहां से वापसी आसान नहीं होगी।
अन्य न्यूज़











