Kashmir राग अलापने वाले Erdogan पहले Greece और Cyprus के साथ Turkey के टकराव को बंद करने पर ध्यान दें

इस बार भी नई दिल्ली ने एर्दोगन की टिप्पणी को स्वीकार नहीं किया है। भारत का संदेश साफ है कि कश्मीर पर बातचीत भारत और पाकिस्तान के बीच ही हो सकती है और आतंकवाद तथा हिंसा के माहौल में संवाद की शर्तें भी भारत पहले ही स्पष्ट कर चुका है।
न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच से तुर्किये के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोगन ने एक बार फिर कश्मीर का राग छेड़कर भारत के आंतरिक और द्विपक्षीय विषय में दखल देने की कोशिश की है। एर्दोगन ने कहा कि दक्षिण एशिया में कश्मीर सहित सभी विवादों का समाधान संयुक्त राष्ट्र घोषणापत्र और संबंधित प्रस्तावों के दायरे में बातचीत के जरिए होना चाहिए। यह बयान ऐसे समय आया है जब तुर्किये, पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच अगस्त में मक्का संयुक्त रक्षा समझौता हो चुका है।
लेकिन सवाल यह है कि कश्मीर पर नसीहत देने वाले एर्दोगन क्या पहले अपने पड़ोस में शांति और सीमा विवादों का समाधान करेंगे? उल्लेखनीय है कि तुर्किये के अपने पड़ोसियों के साथ कई पुराने और गंभीर क्षेत्रीय विवाद हैं। यूनान के साथ एजियन सागर और पूर्वी भूमध्यसागर में समुद्री सीमाओं, महाद्वीपीय पट्टी और विशेष आर्थिक क्षेत्र को लेकर लंबे समय से टकराव चला आ रहा है। तुर्किये और साइप्रस के बीच विवाद तो 1974 के बाद से आज तक कायम है और संयुक्त राष्ट्र शांति व्यवस्था के बावजूद द्वीप विभाजित है। यही नहीं, पूर्वी भूमध्यसागर में ऊर्जा संसाधनों को लेकर भी अंकारा का यूनान और साइप्रस के साथ टकराव रहा है। साथ ही तुर्किये ने उन समुद्री क्षेत्रों में ऊर्जा खोज गतिविधियां की हैं, जिन पर यूनान और साइप्रस अधिकार का दावा करते हैं। इन गतिविधियों के कारण क्षेत्र में सैन्य तनाव तक पैदा हुआ है।
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साइप्रस का सवाल इससे भी ज्यादा संवेदनशील है। तुर्की सेना ने 1974 में साइप्रस के उत्तरी हिस्से पर कब्जा किया था और आज भी द्वीप का विभाजन कायम है। संयुक्त राष्ट्र के स्तर पर इस विवाद के समाधान की कोशिशें दशकों से चल रही हैं। ऐसे में एर्दोगन अगर दुनिया को सीमा विवादों और संवाद का पाठ पढ़ाते हैं, तो स्वाभाविक सवाल उठता है कि क्या वही सिद्धांत तुर्किये अपने पड़ोस में भी उतनी ही गंभीरता से लागू करेगा?
यही वजह है कि एर्दोगन की कश्मीर पर टिप्पणी भारत के लिए केवल एक बयान नहीं, बल्कि कूटनीतिक दखल के रूप में देखी जा रही है। जबकि भारत का रुख बिल्कुल स्पष्ट है। जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा था, है और रहेगा। साथ ही भारत-पाकिस्तान से जुड़े विषयों पर किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता की आवश्यकता नहीं है। पिछले वर्ष भी एर्दोगन की ऐसी टिप्पणी पर भारत ने स्पष्ट किया था कि कश्मीर पर उसका रुख नहीं बदला है और तीसरे पक्ष की मध्यस्थता की कोई जरूरत नहीं है।
इस बार भी नई दिल्ली ने एर्दोगन की टिप्पणी को स्वीकार नहीं किया है। भारत का संदेश साफ है कि कश्मीर पर बातचीत भारत और पाकिस्तान के बीच ही हो सकती है और आतंकवाद तथा हिंसा के माहौल में संवाद की शर्तें भी भारत पहले ही स्पष्ट कर चुका है।
दूसरी ओर, एर्दोगन की यह सक्रियता तुर्किये और पाकिस्तान की बढ़ती रणनीतिक नजदीकी की पृष्ठभूमि में भी देखी जा रही है। अगस्त में तुर्किये, पाकिस्तान और सऊदी अरब ने मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसके साथ ही 2025 के भारत-पाकिस्तान सैन्य टकराव के दौरान अंकारा का पाकिस्तान के प्रति समर्थन भी भारत-तुर्किये संबंधों में तनाव का बड़ा कारण बना। भारत ने उस दौरान तुर्किये की ओर से पाकिस्तान को मिले समर्थन और सैन्य सहायता पर अपनी चिंता स्पष्ट रूप से दर्ज कराई थी। इसका असर सिर्फ कूटनीतिक रिश्तों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आर्थिक मोर्चे पर भी दिखाई दिया। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान को तुर्किये की ओर से मिले समर्थन को देखते हुए भारत में तुर्किये के सामान के बहिष्कार की व्यापक मुहिम चली। दिल्ली की आजादपुर मंडी ने तुर्किये से सेब और अन्य फल-सब्जियों के आयात रोक दिये। साथ ही अन्य राज्यों के बाजारों में भी तुर्किये के सेब का बहिष्कार हुआ। महाराष्ट्र के पुणे में भी कारोबारियों ने तुर्किये के सेब खरीदना बंद कर दिया और स्थानीय तथा दूसरे देशों के विकल्पों की ओर रुख किया। उस समय रिपोर्टों में सिर्फ पुणे के बाजार में ही तुर्किये के सेब के कारोबार का मौसमी मूल्य लगभग 1,000 से 1,200 करोड़ रुपये तक बताया गया था। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि तुर्किये के मात्र सेब खरीदना बंद कर ही उसे कितना नुकसान पहुँचाया गया था। यही नहीं, व्यापक व्यापार के स्तर पर भी दोनों देशों के बीच कारोबार में काफी गिरावट दर्ज की गयी है। इस तरह अंकारा के पाकिस्तान-समर्थक रुख की भारत में केवल राजनीतिक आलोचना नहीं हुई, बल्कि उसका असर व्यापार, पर्यटन और तुर्किये के उत्पादों की भारतीय मांग पर भी पड़ा।
उधर, भारत की ओर से तुर्किये की नापाक नीतियों का जवाब केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं दिखता। नई दिल्ली ने तुर्किये के क्षेत्रीय रुख को देखते हुए यूनान और साइप्रस के साथ अपने रणनीतिक तथा समुद्री सहयोग को भी महत्व दिया है। संदेश साफ है। अगर अंकारा पाकिस्तान के साथ खड़े होकर भारत के खिलाफ कूटनीतिक मोर्चा खोलता है, तो भारत भी अपने राष्ट्रीय हितों और क्षेत्रीय साझेदारियों के आधार पर जवाब देगा।
बहरहाल, एर्दोगन को कश्मीर पर उपदेश देने से पहले अपने आसपास के विवादों की ओर देखना चाहिए। दुनिया के किसी भी देश को संवाद, संप्रभुता और शांतिपूर्ण समाधान की सीख देने का नैतिक आधार तभी मजबूत होता है, जब वही कसौटी अपने व्यवहार पर भी लागू की जाए। भारत ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है कि कश्मीर पर बाहरी हस्तक्षेप स्वीकार नहीं होगा और तुर्किये की ऐसी हिमाकत का जवाब कूटनीतिक स्तर पर भी दिया जाएगा और रणनीतिक स्तर पर भी।
-नीरज कुमार दुबे
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