पहलवान नरसिंह यादव को अभी पूरा इंसाफ नहीं मिला

राजेश कश्यप । Aug 04, 2016 12:52PM
नाडा की क्लीन चिट के बाद नरसिंह का रियो ओलंपिक में भाग लेने का रास्ता भले ही साफ हो गया हो, लेकिन ‘इंसाफ’ अभी नहीं हुआ है। अब सवाल यह भी है कि क्या सच में ‘इंसाफ’ होगा या हो भी पायेगा?

आखिरकार, नरसिंह डोपिंग प्रकरण का सुखद पटाक्षेप हो गया है। तीन दिन की मैराथन सुनवाई के बाद नेशनल एंटी डोपिंग एजेंसी (नाडा) ने यह स्पष्ट तौर पर मान लिया है कि रेसलर नरसिंह की ओर से न कोई गलती हुई है और न ही कोई लापरवाही हुई है, उसके साथ साजिश हुई है। नाडा की क्लीन चिट के बाद नरसिंह का रियो ओलंपिक में भाग लेने का रास्ता भले ही साफ हो गया हो, लेकिन ‘इंसाफ’ अभी नहीं हुआ है। अब सवाल यह भी है कि क्या सच में ‘इंसाफ’ होगा या हो भी पायेगा? यदि नरसिंह के साथ साजिश हुई है तो साजिशकर्ता कौन है? इस साजिश के पीछे असली मकसद क्या था? क्या यह साजिश सामान्य अपराध समझी जानी चाहिए? यदि नहीं तो फिर क्यों न इस मामले को ‘राष्ट्रद्रोह’ की श्रेणी में शामिल कर दिया जाये? अभी तक साजिशकर्ता को बेनकाब क्यों नहीं किया जा सका? क्या साजिश के पीछे मात्र संकीर्ण मानसिक प्रतिस्पर्धा ही मूल वजह है या कोई और भी कारण हो सकता है?

क्या इस डोपिंग प्रकरण की दोषी देश की सबसे बड़ी खेल संस्था साई, सोनीपत (हरियाणा) भी नहीं है? जहां ओलम्पिक में क्वालीफाई करने वाले खिलाड़ियों के लिए कैम्प चल रहा हो, क्या वहां की सुरक्षा व्यवस्था को राम भरोसे छोड़ा जा सकता है? ओलम्पिक पदक विजेता योगेश्वर दत्त का यह कहना कि साई सेन्टर में कुछ भी हो सकता है, मैं यहां का पानी तक नहीं पीता, क्या यह साई सेन्टर की पोल नहीं खोल रहा? यदि साई की साख इस कदर अविश्वसनीय है तो फिर क्यों यहां देश के प्रतिभावान खिलाड़ियों के कैरियर से खिलवाड़ किया जाता है? साई की अव्यवस्था, गैर-जिम्मेदारी और शर्मनाक लापरवाही का जिम्मेदार कौन है?

सर्वविदित है कि नरसिंह को रियो ओलम्पिक में जाने से रोकने के लिए मामले को सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचाया गया। जब सुप्रीम कोर्ट ने नरसिंह की दावेदारी को सही ठहराया तो उम्मीद थी कि इसके बाद मामला समाप्त हो जाएगा। लेकिन, जिस तरह से नरसिंह की जाँच के नमूने में प्रतिबंधित एनाबोलिक स्टेरॉयड मिथेडायनोन की मात्रा पाई गई और उसे डोपिंग का दोषी ठहराकर रियो जाने के लिए अयोग्य ठहराया गया तो हर किसी को गहरी साजिश की बू आने लगी। शक की सुई उन लोगों की तरफ घूमनी स्वभाविक थी, जिन्होंने नरसिंह के रियो भेजे जाने के निर्णय पर आपत्ति जताते हुए मामले को सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचाया था। डोपिंग का दोषी करार दिया जाना देश के लिए अप्रत्याशित और नरसिंह के लिए गहरा वज्रपात था। ऐसा स्वाभाविक भी था। देश को नरसिंह से एक ओलम्पिक पदक की अटूट आस थी और दुनिया की सबसे बड़ी प्रतिस्पर्धा में देश का प्रतिनिधित्व करने का गौरव हासिल करने के बाद नरसिंह अपने भाग्य पर गर्व कर रहे थे। परिजनों की खुशियों का तो कोई अंत ही नहीं था। ऐसे में जब साजिशन सुनहरे सपने एक ही झटके में चकनाचूर हो जायें, कई वर्षों का प्रतिबन्ध झेलने की नौबत आ जाए और एकाएक हीरो से जीरो की छवि बन जाये तो सहज समझा जा सकता है कि साजिश का शिकार होने वाले व्यक्ति की क्या मनोदशा होगी?

डोपिंग प्रकरण से पहले नरसिंह में देश को पदक दिलाने का जो जोश व उत्साह भरा हुआ था, क्या उसकी अक्षुण्णता की उम्मीद रखना अब बेमानी नहीं हो गया है? जो समय उसे जीत सुनिश्चित करने वाली तैयारियों में लगाना था, वह समय उसे बदनामी, हताशा, निराशा और रोष भरे माहौल में कानूनी लड़ाई जीतने के लिए थाने व नाडा कार्यालय के चक्कर लगाने में खर्च करना पड़ा। नाडा की मैराथन सुनवाई तीन दिनों तक लगातार चली, इस बीच नरसिंह कितनी बार और किस हद तक मानसिक रूप से टूटे होंगे, क्या कोई इसकी कल्पना तक भी कर सकता है? यदि मामला उलट पड़ जाता और नरसिंह को सजा के तौर पर कुछ वर्षों के लिए प्रतिबन्ध का दंश झेलना पड़ जाता तो क्या उसकी भरपाई कभी हो सकती थी? क्या कोई ऐसा कानून है जो नरसिंह को हुई इस हानि की भरपाई कर सके? बिल्कुल नहीं। अब जबकि उसे डोपिंग के दोष से मुक्ति मिल चुकी है और रियो जाने का रास्ता साफ हो चुका है तो क्या यह मान लिया जाना चाहिए कि अब उसके सामने कोई अड़चन नहीं आयेगी? ऐसा सहज दिखाई नहीं दे रहा। कम से कम एक मीडिया रिपोर्ट से तो यही संकेत मिल रहे हैं कि अब भी नरसिंह को रियो में खेलने से रोकने की बराबर कोशिशें हो रही हैं। एक तरफ जहां भारतीय ओलम्पिक एसोसिएशन (आईओए) का दावा है कि नाडा से बरी होने के बाद नरसिंह के लिए रियो ओलम्पिक में भाग लेने के बीच कोई प्रक्रियागत बाधा नहीं होगी, क्योंकि नरसिंह को वाडा कोड या वर्ल्ड फेडरेशन द्वारा दण्डित नहीं किया गया है और स्थानीय निकाय द्वारा किया गया फैसला सही समय पर नरसिंह के पक्ष में गया है। जबकि, एक मीडिया रिपोर्ट में नाडा के निर्णय पर ही सवालिया निशान लगाते हुए दावा किया गया है कि सुनवाई के दौरान कुछ ऐसी असावधानियां बरती गई हैं जिसका पता अगर वाडा को लगा तो नाडा मुश्किल में घिर सकती है।

निःसन्देह देश के लिए इससे बड़ी विडम्बना कोई नहीं हो सकती है। कुछ लोगों ने अपनी संकीर्ण मानसिकता के कारण नरसिंह की ओलम्पिक में भागीदारी को नाक का सवाल बना लिया है। इस बीच संकीर्ण सियासत भी शुरू हो चुकी है। मामले को जातीय रंग दिए जाने की हरसंभव कोशिशें होने लगी हैं। नरसिंह के माध्यम से अगड़ी बनाम पिछड़ी जाति की सियासी लड़ाई उजागर होती दिखाई दे रही है। कोई भी यह सोचने व समझने की जरा सी भी कोशिश नहीं कर रहा है कि नरसिंह बनने या फिर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देश की भागीदारी करने की जिम्मेदारी हासिल करने का गौरव पाने के लिए कितनी मेहनत, तप, त्याग, समर्पण और संघर्ष की आवश्यकता होती है। इस गौरव को हासिल करने के लिए सिर्फ खिलाड़ी ही नहीं, उसके परिवार, कोच और समस्त सहयोगियों को अपना तन-मन-धन एवं सम्पूर्ण जीवन देश के लिए बलिदान करना पड़ता है। यदि, ऐसे मुकाम पर पहुंचे खिलाड़ी को संकीर्ण मानसिकता के तहत साजिश का शिकार बनाया जाता है तो संभवतः इससे बढ़कर अन्य कोई पाप, अन्याय व अपराध नहीं होगा। इस अपराध के लिए चाहे कितनी बड़ी सजा तय कर ली जाए, वह कम ही होगी। इसलिए, सरकार को ऐसे पुख्ता प्रबन्ध करने होंगे, जिससे भविष्य में किसी निर्दोष खिलाड़ी को नरसिंह की तरह साजिश का शिकार न होना पड़े। इसके साथ ही साजिशकर्ताओं को बेनकाब करके कठोर से कठोर सजा दी जानी चाहिए, ताकि भविष्य में कोई ऐसी नापाक कोशिश करने की हिम्मत भी न करे।

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