चुनी हुई सरकारें असहयोग करेंगी तो संघीय व्यवस्था कैसे मजबूत होगी ?

By अरुण जेटली | Publish Date: Mar 23 2019 4:03PM
चुनी हुई सरकारें असहयोग करेंगी तो संघीय व्यवस्था कैसे मजबूत होगी ?
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क्या चुनी हुई सरकारें एक दूसरे के साथ असहयोग करने का इरादा रखती हैं या उन्हें "बहुजन हिताय बहुजन सुखाय" के सिद्धांत पर काम करना चाहिए। पश्चिम बंगाल, दिल्ली, ओडिशा उन राज्यों में से हैं, जिन्होंने आयुष्मान भारत को लागू करने से इनकार कर दिया है।

19 मार्च, 2019 को जीएसटी परिषद ने अपनी 34वीं बैठक की।
 
जीएसटी को एक संविधान संशोधन द्वारा सक्षम किया गया था जिसे संसद के दोनों सदनों द्वारा सर्वसम्मति से मंजूर किया गया था। जीएसटी को लागू करने के लिए कई कानून संसद द्वारा पारित किए गए थे। राज्य जीएसटी (एसजीएसटी) से संबंधित कानून को सभी राज्यों की विधानसभाओं द्वारा मंजूरी दी गई थी।
जीएसटी ने पूरे देश में एकल अप्रत्यक्ष कर को सक्षम बनाया है। दुनिया के कई अन्य देशों की तुलना में इसे लागू करना बेहद आसान साबित हुआ है। कुछ शुरुआती परेशानियां तो हर नई चीज में आती ही हैं, हर कोई अनुभव से ही सीखता है। न केवल जीएसटी ने कई करों और कई उपकरों को समाहित किया, बल्कि इसने रातों रात देश में माल के आवागमन की बाधाओं को भी समाप्त कर दिया। पूरे देश में एक ही तरह का बाजार बन गया। निरीक्षकों को समाप्त कर दिया गया, करों को कम कर दिया गया था और निर्धारिती और विभाग के बीच निजी तौर पर मिलने का सिलसिला कम हो गया था। रिटर्न और मूल्यांकन की ऑनलाइन फाइलिंग पूरे दिन का सिलसिला था। इनपुट टैक्स क्रेडिट ने कर कैस्केडिंग प्रभाव पर रोक लगाई और सुनिश्चित किया कि निर्माण और सेवा क्षेत्र में अधिकृत रूप से बैक चेन हो। इस कुशल प्रणाली ने कमियोँ का पता लगाया और राजस्व जुटाने में सुधार किया। पहले पांच वर्षों के लिए राज्यों को राजस्व में सालाना 14 प्रतिशत की वृद्धि होने की गारंटी दी गई है। आजादी के बाद पहली बार उपभोक्ताओं ने करों में लगातार कटौती देखी है।
 
परिषद की निर्णय प्रक्रिया:


 
अपने शुरुआती वर्षों में परिषद की अध्यक्षता करना मेरे सबसे संतोषजनक अनुभवों में से एक रहा है। राज्य के वित्त मंत्रियों और उनके सहायक सिविल सेवकों की हिस्सेदारी बेहद अच्छी रही। परिषद में होने वाली बहस राजस्व के मुद्दों पर थी। कोई लोकलुभावन मुद्दा नहीं था। राजस्व, उपभोक्ताओं, उद्योग और व्यापार की चिंता बहस पर हावी थी। उन्होंने प्रक्रियाओं को सरल बनाने पर ध्यान केंद्रित किया। सदस्यों ने बैठक के बाहर अपने राजनीतिक रंग बिखेरे। अपने राजनीतिक निर्वाचन क्षेत्रों को संतुष्ट करने के लिए, कुछ ने बैठकों के दौरा से बाहर जाकर निजी तौर पर बात की, पर अंदर लगातार सकारात्मक सुझावों का माहौल बना रहा। कई बार परस्पर विरोधी विचार भी सामने आए, लेकिन उसके बाद फिर से इस पर सर्व सहमति बन गई।
 
परिषद में हजारों तरह के फैसले लिए गए, जिनमें नए नियम, सरकुर्लस, अधिसूचनाएं और टैरिफ निर्धारण समेत अन्य कई बड़े फैसले शामिल थे। बाजार की रिपोर्टों के आधार पर काउंसिल हमेशा बदलाव के लिए तैयार रहती थी।


राज्यों को प्रभावी रूप से दो-तिहाई मतदान का अधिकार था, जबकि केंद्र सरकार के पास एक-तिहाई मतदान का अधिकार था। सभी फैसलों को कम से कम तीन-चौथाई बहुमत से मंजूरी आवश्यक है परंतु सारे निर्णय सर्वसम्मति से तय हुए। यह इसलिए भी जरूरी था क्योंकि केंद्र और राज्यों को एक साथ मिलकर काम करना था। फिर भी परिषद ने एक अतुलनीय मिसाल कायम की जो भारत के संघीय ढाँचे के बीच के नाज़ुक संतुलन को सम्मान प्रदान करती है। मुझे उम्मीद है कि सही फैसले लेने, उन पर विचार-विमर्श करने और उन्हे सर्वसम्मति के साथ लागू करने का ये सिलसिला भविष्य में भी जारी रहेगा। जहां सर्वसम्मति की संभावना बनती दिखाई नहीं देती थी, वहाँ इस मुद्दे पर ज्यादा जोर नहीँ दिया गय़ा।

जीएसटी परिषद से सबक:
 
GST परिषद भारत का पहला संघीय संस्थान बन गया है। अन्य क्षेत्रों में हमारा ये फैसला एक आदर्श के तौर पर साबित हो रहा है। यह भारत के लोकतंत्र और राजनीति की परिपक्वता को प्रदर्शित करता है। जब बड़े स्तर पर राष्ट्रीय हित की आवश्यकता होती है, तो निर्णय लेने वाले लोग इस मौके पर अपना बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं। ये उस धारणा को बदलने का काम करता है, जिसमें अब तक ये कहा जाता रहा है कि अलग तरह के विचारों वाले नेताओं को हमेशा पार्टी लाइन पर ही काम करने को कहा जाता है। इसने उद्योग, व्यापार, उपभोक्ताओं के लाभ के लिए काम किया है और स्वतंत्र भारत में ये एकल कर सबसे महत्वपूर्ण कर सुधार बन गया है। सवाल ये है कि इस प्रयोग को कहीं और दोहराया क्यों नहीं जा सकता है ?
 
कृषि, ग्रामीण विकास और स्वास्थ्य सेवा:
 
कृषि, ग्रामीण विकास और स्वास्थ्य सेवा कुछ ऐसे क्षेत्र हैं, जहां जीएसटी परिषद जैसी संस्था को दोहराकर बेहतर प्रदर्शन किया जा सकता है। केंद्र और राज्य दोनों सरकारों के पास किसानों की भलाई के लिए कई योजनाएँ हैं। कृषि क्षेत्र को एक बड़े समर्थन की जरूरत है। केंद्र और राज्य दोनों अपने बजट का एक बड़ा हिस्सा इस सेक्टर पर खर्च करते हैं। इसी तरह, ग्रामीण बुनियादी ढाँचे को विकसित करने और गाँवों में जीवन की गुणवत्ता में सुधार की प्रक्रिया अब शुरू हो गई है। कृषि और ग्रामीण विकास दोनों में बहुत कुछ किया जाना चाहिए।
 
क्या केंद्र और राज्य सरकारों को प्रतिस्पर्धी ना होकर सिर्फ एक-दूसरे की कोशिशों के पूरक नहीँ होना चाहिए ? क्या उन्हें अपने संसाधनों को जमा नहीं करना चाहिए और यह सुनिश्चित नहीं करना चाहिए कि कोई ओवरलैप या दोहराव न हो और देश मे बड़ी संख्या में लोगों का हित संरक्षित और संवर्द्धित हो ? यही फार्मूला स्वास्थ्य सेवाओं पर भी लागू होता है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, अस्पताल, गरीब मरीजों के इलाज के लिए लागू स्वास्थ्य योजनाएं, सस्ती कीमत पर दवाइयों की आपूर्ति, सभी केंद्र और राज्य सरकारों को ये सुनिश्चित करना होगा कि लोगों को सस्ती स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध हो सके। जो लोग अपनी बीमारी का खर्च नहीँ उठा सकते, उनके लिए केंद्र और राज्य सरकारें सस्ता इलाज मुहैया करवा रही हैं। क्या खर्च का ओवरलैप आवश्यक है या इसे एक बेहतर तरीके से खर्च किया जाना चाहिए ?
 
क्या चुनी हुई सरकारें एक दूसरे के साथ असहयोग करने का इरादा रखती हैं या उन्हें "बहुजन हिताय बहुजन सुखाय" के सिद्धांत पर काम करना चाहिए। पश्चिम बंगाल, दिल्ली, ओडिशा उन राज्यों में से हैं, जिन्होंने आयुष्मान भारत को लागू करने से इनकार कर दिया है, जहां हर गरीब परिवार को अस्पताल में भर्ती होने पर सालाना पांच लाख रुपये तक की मदद मिलती है। राजस्थान, मध्य प्रदेश, दिल्ली, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल पीएम किसान योजना में बिल्कुल भी सहयोग नहीँ कर रहे हैं। जिसके चलते छोटे और सीमांत किसानों को सालाना रु. 6,000/ - की वित्तीय मदद से वंचित रहना पड़ रहा है। क्या इन सरकारों का ये फैसला राष्ट्रीय हित में है ? क्या गरीबों की मदद ना करना और सिर्फ सियासत करना इन सरकारों का सही फैसला है ? समाज को देश के लोगों की समझ पर भरोसा है और उम्मीद है कि लोगों में जागरुकता आएगी और वो देशहित में सोचेंगे। 
 
-अरुण जेटली
(लेखक केंद्रीय वित्त मंत्री है।)

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