वृद्धावस्था में बीमारी के साथ क्यों जीना? इच्छा मृत्यु का हक़ होना चाहिए

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पिछले दिनों मैं अपने एक बीमार रिश्तेदार से मिलने गया। वे आईसीयू में दाखिल थे। आईसीयू कक्ष में मरीज पास पास रखे गए थे ठीक उसी तरह से जैसे कई बीमारियाँ हमारे शरीर में पास पास होती हैं और हम जीते रहते हैं।

पिछले दिनों मैं अपने एक बीमार रिश्तेदार से मिलने गया। वे आईसीयू में दाखिल थे। आईसीयू कक्ष में मरीज पास पास रखे गए थे ठीक उसी तरह से जैसे कई बीमारियाँ हमारे शरीर में पास पास होती हैं और हम जीते रहते हैं। बहुत कम समय में मुझे एहसास हो गया कि ज़िंदगी अगर बीमारी के कारण अभिशाप बन जाए तो इच्छा मृत्यु वरण करने की आसान सुविधा उपलब्ध होनी चाहिए। क्यूंकि यहां जीना कौन सा आसान है। मुझे एक रिटायर्ड दोस्त का ध्यान आ गया। उनका अपना मकान है जिसमें पत्नी के साथ रहते हैं। दो बच्चे दूसरे शहरों में अपने अपने परिवार के साथ खुश हैं। ऐसा नहीं है कि उनकी बच्चों के साथ नहीं बनती मगर वे चाहते हैं कि उन्हें व उनके बच्चों को जीवन में पूरा स्पेस मिले इसलिए वे स्थायी रूप से उनके साथ नहीं रहते। पहले नियमित मिलते जुलते थे मगर संप्रेषण के साधन बढ़ जाने के कारण निरंतर मिलना कम हो रहा है। रिटायरमेंट के बाद मिली जमापूंजी कई सालों से परेशान कर रही बीमारी के कारण धीरे धीरे कम हो रही है। उन्हें लगता है कि मेडिकल बीमा कंपनियां आराम से क्लेम नहीं देतीं तभी वे बीमा नहीं करवाते। हालांकि सामाजिक संस्कृति के आधार पर अब उन्हें पालना उनके बच्चों की ज़िम्मेदारी है मगर व्यवहारिक रूप से उनके बच्चों के पास समय नहीं है। उनका बेटा और बेटी दोनों जॉब करते हैं और उनके जीवन साथी भी, ताकि जीवनयापन ठीक प्रकार से हो सके।

डॉक्टर ने उन्हें कहा है कि बीमारी के साथ ही जीना होगा। वे ज़्यादा सफर नहीं कर सकते। उनके परिचित समझाते हैं कि अमुक डॉक्टर उनकी बीमारी ठीक कर देगा, ठीक नहीं तो कम से कम, कम तो कर देगा मगर इस पर काफी खर्च आएगा। वे समझते हैं कि उनके ठीक होने में उनकी काफी पूंजी प्रयोग हो जाएगी और कहीं उन्हें मृत्यु ने गिरफ्त में ले लिया तो उनकी पत्नी के लिए ज़्यादा पैसा नहीं बचेगा। वे निराश नहीं हैं बल्कि व्यावहारिक आधार पर सोच रहे हैं। उन्होंने अपनी जिम्मेदारियाँ बहुत अच्छे से निभाई हैं। कई बार उनकी पत्नी कहती है कि हम अपना सब कुछ बेच कर विदेश में इलाज करवाएंगे और आपकी बीमारी ठीक करवाएंगे।

उन्हें पता है कि जन्म और मरण का रहस्य अभी तक सृष्टि रचयिता के क़ब्ज़े में है, हाँ धन की बैसाखियाँ कब तक सहारा दिए रख सकती हैं यह तो न धन को, न बैसाखियों को और न डॉक्टर को ही पता है।  उन्हें लगता है कि वे समय काट रहे हैं। उनकी बीमारी ने उनकी दिनचर्या को कुव्यवस्थित कर दिया है। वे जानते हैं कि आजकल लोग किसी के मरने के बाद शोक प्रकट करने भी मजबूर होकर जाते हैं क्योंकि अभी समाज पूरी तरह से असमाज नहीं हो सका। हां हम सब सहयोगी शैली में असामाजिक रास्तों पर तो आगे बढ़ ही रहे हैं। वे और उनकी पत्नी जानते हैं कि जब तक पति पत्नी जीवित हैं इकट्ठे रहेंगे ही, किसी दुर्घटना में एक साथ मारे तो सौभाग्य वरना अकेले रहने के बाद तो बच्चों में से कोई तो ले ही जाएगा। यह चाहे सामाजिक मजबूरी होगी या अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास। दोनों पक्षों को कैसे समझौता वादी दृष्टिकोण अपनाकर चलना होगा, चल पाएँगे या नहीं ये बात यशस्वी ज्योतिषी तो नहीं बता सकता हां भविष्य की कोख में ज़रूर होगी।

वे मानते हैं कि ऐसी स्थिति में बीमारी पर पैसा नष्ट न करके उन्हें इच्छा मृत्यु का वरण करना चाहिए। यहाँ वे एटेचमेंट में डिटेचमेंट को मानते हुए कहते हैं कि जो पैसा इससे बच जाएगा उससे उनकी पत्नी कई शहरों में पनप रहे अच्छे ओल्ड एज होम में जब तक चाहे, अपनी इच्छानुसार आराम से रह सकती है। चाहे तो अपने बच्चों में से किसी के साथ जो उसे रख सकें, उनका डिजर्विंग स्पेस दे सकें, भी रह सकती है। उनकी सोच निजी, सामाजिक, आर्थिक, पारिवारिक कोण से देखी जाए तो ग़लत नहीं मानी जानी चाहिए। जो व्यक्ति अपने जीवन के क्रियाकलापों से संतुष्ट रहा है और बीमारी या अन्य विषम परिस्थितियों के कारण इच्छा मृत्यु चाहता है उसे यह अधिकार देने के बारे में सोचा जाना चाहिए।

   

हमारे देश में ही नहीं पूरी दुनिया में इच्छा मृत्यु के बारे में बहस जारी है। आज के समय में यह एक बेहद जीवित मुद्दा है। जीवन में संघर्ष बढ़ता जा रहा है। हमारे समाज में तो दुख, भाग्य का प्रसाद माना जाता रहा है जिसमें वर्तमान जीवन की विषमताएं नकारात्मकता बढ़ा रही है। यह स्थिति ‘राइट टू लिव विद डिगनिटी में समाहित राइट टू डाई विद डिगनिटी’ को नुकसान पहुंचा रही है। यह निर्णय आपका या फिर आपके निकटस्थ परिजनों का ही होना चाहिए। कई पश्चिमी देशों में कानूनी प्रावधान के तहत होशोहवास में रहते हुए किसी भी व्यस्क को डीएनआर (डू नाट रीसेसिटेट) के अनुरोध का लेख करने का हक है। डीएनआर का अर्थ है कि जीवन के अंत की स्थिति में यदि प्राकृतिक तरीके से यानी बिना लाइफ सपोर्ट जीवन संभव न हो तो किसी कृत्रिम तरीके का प्रयोग न किया जाए। मृत्यु को स्वीकार करना ज़रूरी है न कि आईसीयू में लाखों खर्च कर शरीर बचाने की ज़िद उगाए रखना। चिकित्सक इस बारे में निर्णय नहीं ले सकते हां हस्पताल लाश रखकर ज़रूर कमाते रहे हैं। आज जहां हम पुरातन भारतीय संस्कृति को जीवन में पुनः रोपित करने की बातें कर रहे हैं तो जीवन के अंतिम या कष्टदायक पहर में मृत्यु को सहजता से वरण करने के बारे में पुराने बुज़ुर्गों से सीखना चाहिए। बढ़ते मेडिकल संसाधनों के जमाने में हम दूसरों को मारना चाहते हैं लेकिन खुद कोई मरना नहीं चाहता। जीवन के अंत का सामना देर से करने के लिए हस्पताल में हड़कंप मचा दिया जाता है। इच्छा मृत्यु का फैसला परिस्थिति अनुसार, उपयुक्त समय व आर्थिक स्थिति के आधार पर होना चाहिए। क्या कभी आत्महत्या, दया मृत्यु, इच्छा मृत्यु व मृत्यु को सही या गलत मानने के बारे में संवैधानिक फैसला हो पाएगा। मिर्ज़ा ग़ालिब ने क्या खूब लिखा है, ‘मरते हैं आरज़ू में मरने की, मौत आती है पर नहीं आती’

-संतोष उत्सुक

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