मंडियों में डिग्रियां खूब बंट रही हैं पर शिक्षकों के पास पक्की नौकरी है ही नहीं

By कौशलेंद्र प्रपन्न | Publish Date: Jan 28 2019 1:14PM
मंडियों में डिग्रियां खूब बंट रही हैं पर शिक्षकों के पास पक्की नौकरी है ही नहीं
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डिग्रियों की मंडी रोज दिन हर साल लगा करती हैं। बल्कि साल में एक बार इन मंडियों में डिग्रियां बांटी जाती हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो दीक्षांत समारोह के नाम से जानते हैं। इन समारोहों में क्या होता है ? कभी सोच कर देखिएगा।

नब्बे के दशक में जो लोग दिल्ली विश्वविद्यालय में एमए छात्र के तौर पर दाखिल हुए थे। उन्होंने एम फिल भी की और पीएचडी भी कर ली। तब नेट की प्रतिबद्धता और अनिवार्यता नहीं थी। पीएचडी ही काफी था। सो वो लोग अध्यापन करने लगे। धीरे धीरे मंज़र बदले और नियम कानून भी। नेट और जीआरएफ अनिवार्य कर दिया गया। जो भी एम फिल और पीएचडी कर रहे थे उनका सपना था यहीं पढ़ाएं भी। सो उनके सपने पूरे हुए। लेकिन जैसे जैसे वैश्विक स्तर पर शैक्षिक परिदृश्य में तब्दीली आई वैसे वैसे उच्च और विश्वविद्यालयी शिक्षा और नीति में बदलाव घटित हुए। विश्वविद्यालय में शिक्षण कर्म कठिन से कठिनतम होता गया। सिर्फ पीएचडी और जीआरएफ ही काफी नहीं रहा। बल्कि उसके साथ ही अन्य दक्षताओं की अपेक्षा भी होने लगी। एक नब्बे का दशक था और दो हज़ार के बाद विश्वविद्यालयों में भर्ती की प्रक्रिया में तेजी से बदलाव दर्ज़ किए गए। आज की हक़ीकत यह है कि विश्वविद्यालयों में पढ़ाने वाले शिद्दत से पीएचडी कर रहे हैं लेकिन यह डिग्री भी हासिल कर लेने भर से विश्वविद्यालय में अध्यापनकर्म मयस्सर नहीं हो पाता।



 
जो छात्र पिछले एक दशक से पीएचडी में दाखिल हैं वो चार पांच साल लगा कर अपनी डिग्री पूरी करने में लगे हैं। उन्हें शायद इस बात की खबर जब लगेगी कि उन्हें तो तदर्थ व अनुबंध पर रखने की प्रक्रिया पर विचार विमर्श जारी है। इस पर विमर्श में दिल्ली विश्वविद्यालय सबसे आगे की पंक्ति में शामिल होने वाला है। दिल्ली विश्वविद्यालय के एकेडमिक कॉन्सिल में यह प्रस्ताव व योजना आने वाली है कि आगामी सत्र से शिक्षकों की नियुक्ति अनुबंध पर की जाएगी। हालांकि इस किस्म के प्रस्ताव का विरोध शिक्षक−समुदाय और विद्वत परिषद् पहले भी दर्ज़ करा चुकी है। लेकिन संभावना बनती है कि अब न केवल दिल्ली विश्वविद्यालय बल्कि अन्य शिक्षा संस्थानों में इस तरह के शैक्षिक विकल्पों पर विमर्श शुरू हो जाएं। मालूम हो कि अकेले इस विश्वविद्यालय में हज़ारों शिक्षक तदर्थ पर पिछले पंद्रह बीस वर्षों से काम कर रहे हैं। जो अपनी नौकरी की स्थायी होने की उम्मीद पाले हुए हैं। हर साल उनकी नौकरी पर खतरे मंडराते हैं। इसके साथ ही अनुबंध पर भी शिक्षक अपनी सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। अब यह खबर विश्वविद्यालय के प्रांगण से आ रही है। यदि शिक्षा जगत् में ज़रा भी दिलचस्पी रखते हों तो मालूम होगा कि हमने प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा में अनुबंध एवं तदर्थ की शुरुआत कर दी है। दिल्ली में ही विभिन्न प्राथमिक स्कूलों में हर साल अनुबंध पर हज़ारों शिक्षक नौकरी हासिल करते हैं। और अगले साल उनकी सेवा ली जाएगी या नहीं यह निर्भर करता है वहां की प्रधानाचार्य और शिक्षा विभाग में यदि कोई संपर्क है तो। इस प्रकार से सिर्फ दिल्ली अकेला राज्य नहीं है जहां अनुबंध पर शिक्षक प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में पिछले दस और पंद्रह सालों से सेवारत् हैं।
 
प्रसिद्ध शिक्षाविद् प्रो. अनिल सद्गोपाल ने अस्सी के दशक के जाते जाते और नब्बे की शुरुआत में ताकीद की थी कि जिस प्रकार से विश्वविद्यालयों की शिक्षा को निजी हाथों में सौंपने का मन बनाया जा रहा है और नीतिगत स्तर पर बदलाव की प्रक्रिया शुरू की गई है वह आगामी दस बीस साल बाद उच्च शिक्षा के लिए हानिकारक साबित होने वाला है। लेकिन तब शिक्षाविद् धड़ा चुप्पी की संस्कृति को मान बैठे। जबकि वही लोग थे जो पावलो फ्रेरे के शिक्षा दर्शन और चुप्पी की संस्कृति को तोड़ने का पाठ अपनी कक्षाओं में छात्रों को पढ़ा रहे थे। विरोधाभास देखें कि वहीं अकादमिक लोग विरोध करेन की बजाए खामोश बैठ गए। कुछ आवाज़ें उठीं भीं तो उनमें वह ऊष्मा और तीखेपन की कमी थी। यही वजह रहा कि उन चंद लोगों के विरोध के स्वर को या तो चुप कर दिया गया या फिर उन्हें शांत करा दिया गया। वही चुप्पी आज विकराल रूप में हमारे सामने है। विश्वविद्यालयों में दिल्ली विश्वविद्यालय को उम्मीद से देखने वाले अन्य शिक्षण संस्थान भी अभी भी आशा भरी निगाह से देख रहे हैं कि वहां जो होगा हम भी वह पालन करेंगे।
 


 
दिल्ली विश्वविद्यालय में अनुबंध को वैकल्पिक राह के रूप में अपनाने पर जो भी विचार हो रहा है वह कम से कम दूरगामी परिणाम देने वाला है। खासकर जो छात्र दिल्ली विश्वविद्यालय या फिर अन्य केंद्रीय विश्वविद्यालयों में या फिर कॉलेजों में जॉब हासिल करने की उम्मीद में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में आए थे। जिन्होंने अपना बेहद सृजनशील और ऊर्जावान वक़्त पीएचडी करने में लगाया है। उन्हें जानकर घोर निराशा ही हाथ लगने वाली है कि जब वो डॉक्टर बन कर या फिर जीआरएफ कर के कॉलेज की ओर बढ़ेंगे तो उन्हें या तो तदर्थ पर खटना होगा जिसकी समय सीमा तय नहीं है। कब तक तदर्थ पर या फिर हर साल सेवा मिलने की उम्मीद में जि़ंदा रहेंगे। उन्हें कितना बड़ा झटका लगेगा। जब वो प्रोफेशनल के तौर पर विश्वविद्यालयों में आवेदन किया करेंगे। जब उन्हें मालूम चलेगा कि अब एक वर्षीय या सेमेस्टर के आधार पर उन्हें सेवा में रखा जाएगा। इतना ही बल्कि पूरे सत्र के दौरान उनका परफॉर्मेंस कैसा रहा इसका भी मूल्यांकन किया जाएगा। यही तय करेगा कि अगले अकादमिक सत्र में उनकी सेवा जारी रहेगी या उन्हें नमस्ते कर दिया जाएगा। 
 


डिग्रियों की मंडी रोज दिन हर साल लगा करती हैं। बल्कि साल में एक बार इन मंडियों में डिग्रियां बांटी जाती हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो दीक्षांत समारोह के नाम से जानते हैं। इन समारोहों में क्या होता है ? कभी सोच कर देखिएगा। इन समारोहों में विश्वविद्यालयों से डिग्री हासिल कर समाज में आते हैं। रातों रात या फिर दिन बदलते ही नाम के आगे डॉ. लग जाता है। पांच पांच साल तो कभी कभी तो छह साल भी लगा कर पीएचडी की डिग्री मिला करती हैं। इन सालों में छात्र कितनी ही दफा सोचता है कि क्यों पीएचडी में दाखिल हुआ। क्यों शोध के प्रति प्रेरित हुआ। क्योंकर नौकरी को ताक पर रखकर रिसर्च करने में जुड़ गया। बहुत किस्म की चिरौरियां करनी पड़ती हैं। एक नहीं कई बार लिखना और लिखकर काटना यह सिलसिला लगातार चलता रहता है। कोई डायन की नजर न पड़े तो शायद समय पर पीएचडी मिल जाएगी वरना काटते रहिए चक्कर कभी गाइड के घर तो कभी विभाग में। न तो रात में नींद आती है और न दिन में चैप्टर लिखे जाते हैं। जो लिखे जाते हैं उसमें कई करेक्शन मिल जाते हैं। जब दुबारा दिखाने जाते हैं तब वो कुछ और ही सुझाव सरका दिया करते हैं।
 
हर साल विभिन्न विश्वविद्यालयों से हजारों में एम फिल और पीएचडी की डिग्रियां पा कर लोग बाजार में आते हैं। जिस ओर उप राष्ट्रपति जी ने इशारा किया कि यह बेहद गंभीर मसला है कि उनमें से बहुत कम के अंदर व दक्षता भी होती है कि वो अपनी डिग्री को जस्टीफाई भी कर सकें। दरअसल डिग्री हासिल करना और दक्षता भी प्राप्त करना दोनों ही दो चीजें हैं। पीएचडी तो पूरी हो जाती है। नाम के आगे डॉ. लगाने का लाइसेंस भी मिल जाता है लेकिन क्या हम अकादमिक क्षेत्र को कुछ दे पाने की स्थिति में होते हैं। यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए। पिछले दिनों भाषा और गणित आदि विषय के लिए विेशेषज्ञों की तलाश में कई साक्षात्कार किए। उनमें पीएचडी किए हुए भी शामिल थे। उनसे बातचीत कर घोर निराशा हुई कि हमारी उच्च शिक्षा और शोध की स्थिति इतनी खराब क्यों है। यह हाल न केवल पीएचडी के साथ है बल्कि कॉलेज और स्कूली स्तर पर भी समान देखे जा सकते हैं। बीए किया हुआ छात्र भी एक आवेदन पत्र या एक पेज मुकम्मल नहीं लिख पाता। यह तो भाषायी कौशल की बात हुई जिसमें हमारे बच्चे पिछड़ रहे हैं।
 
 
डिग्रियां बांटने, बेचने, खरीदने की मंडी लगी हुई है। एक ओर सरकारी कॉलेज, विश्वविद्यालय में सामान्य स्नातक करने के सालाना खर्च शायद हजार में आते हैं वहीं निजी कॉलेज या विश्वविद्यालय से करने जाएं तो वह लाखों में बैठता है। ऐसे में साधारण घर के बच्चे कहां और कैसी शिक्षा हासिल करेंगे। आज की तारीख में बड़े-बड़े उद्योगपतियों, कंपनी के मालिकों, मीडिया घरानों के अपने कॉलेज, विश्वविद्यालय और प्रशिक्षण संस्थान खुल चुके हैं जहां दक्षता से ज्यादा पीआर बनाने, बच्चों को कुछ खास दक्षता प्रदान कर उन्हें कहीं खपाने के खेल सरेआम चल रहे हैं। जैसी आपकी ज़ेब वैसी आपकी शिक्षा की स्थिति बन चुकी है। यह सिलसिला स्कूल से लेकर कॉलेज और विश्वविद्यालयों तक बतौर जारी है। स्कूल आप अपनी जेब के अनुसार, कॉलेज और शिक्षण संस्थान भी अपनी जे़ब के अनुसार चुनने के लिए आप स्वतंत्र हैं। सच तो यह भी है कि आज जिस किस्म की तालीम हम बच्चों को मुहैया करा रहे हैं उससे बच्चे मजूर और हजूर ही पैदा हो रहे हैं। या तो वे आदेश पालक बनते हैं या फिर आदेशक होते हैं। बीच का कोई रास्ता दिखाई नहीं देता। तमाम संस्थानों, कंपनियों पर आईआईटी, आईआईएम, जेएनयू आदि का कब्जा है। वो जैसे चाहते हैं वैसी शिक्षा की दिशा तय होती है।
 
-कौशलेंद्र प्रपन्न
(शिक्षा एवं भाषा शास्त्र विशेषज्ञ)

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