दुर्गा अष्टमी, महा नवमी और सरस्वती विसर्जन: शक्ति, सिद्धि और ज्ञान की आराधना का महापर्व

Shardiya Navratri 2026
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शुभा दुबे । Oct 18 2026 1:48PM

दुर्गा अष्टमी को महाष्टमी या महादुर्गाष्टमी भी कहा जाता है। नवरात्रि के इस दिन देवी दुर्गा के महागौरी स्वरूप की पूजा की जाती है। यह दिन देवी की शक्ति और उनके दैवी स्वरूप की आराधना का विशेष अवसर माना जाता है। मान्यता है कि देवी ने दुष्ट शक्तियों का संहार कर संसार में धर्म और व्यवस्था की स्थापना की।

शारदीय नवरात्रि के अंतिम चरण में आने वाली दुर्गा अष्टमी, महा नवमी और सरस्वती विसर्जन भारतीय सनातन परंपरा के अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व हैं। ये तीनों अवसर शक्ति, ज्ञान, साधना, आत्मसंयम और अधर्म पर धर्म की विजय का संदेश देते हैं। वर्ष 2026 में दुर्गा अष्टमी, महा नवमी और सरस्वती विसर्जन का संयोग 19 अक्टूबर, सोमवार को पड़ रहा है। दिल्ली सहित उत्तर भारत के पंचांगों के अनुसार अष्टमी तिथि 18 अक्टूबर की सुबह से शुरू होकर 19 अक्टूबर को लगभग 10:51 बजे समाप्त होगी, जिसके बाद नवमी तिथि आरंभ होगी। इस कारण 19 अक्टूबर को ही दुर्गा अष्टमी और महा नवमी दोनों के पर्व मनाए जाएंगे।

2026 में कब हैं ये पर्व?

दुर्गा अष्टमी / महाष्टमी 19 अक्टूबर 2026 सोमवार
महा नवमी  19 अक्टूबर 2026 सोमवार
सरस्वती विसर्जन 19 अक्टूबर 2026 सोमवार
विजयादशमी / दशहरा 20 अक्टूबर 2026 मंगलवार

पंचांग के अनुसार 2026 में अष्टमी और नवमी का तिथि-संयोग ऐसा है कि दोनों पर्व 19 अक्टूबर को पड़ रहे हैं। इसी दिन सरस्वती विसर्जन भी निर्धारित है।

दुर्गा अष्टमी का धार्मिक महत्व

दुर्गा अष्टमी को महाष्टमी या महादुर्गाष्टमी भी कहा जाता है। नवरात्रि के इस दिन देवी दुर्गा के महागौरी स्वरूप की पूजा की जाती है। यह दिन देवी की शक्ति और उनके दैवी स्वरूप की आराधना का विशेष अवसर माना जाता है। मान्यता है कि देवी ने दुष्ट शक्तियों का संहार कर संसार में धर्म और व्यवस्था की स्थापना की। इसलिए महाष्टमी का संदेश है कि जब अधर्म और अत्याचार बढ़ता है, तब दैवी शक्ति धर्म की रक्षा के लिए प्रकट होती है।

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कई परंपराओं में इसी दिन संधि पूजा का विशेष महत्व होता है। अष्टमी और नवमी के संधिकाल को अत्यंत पवित्र माना जाता है। 2026 में दिल्ली के पंचांग के अनुसार संधि पूजा का समय लगभग सुबह 10:27 से 11:15 बजे के बीच बताया गया है। स्थानीय पंचांग के अनुसार समय में थोड़ा अंतर हो सकता है।

दुर्गा अष्टमी की पूजा विधि

सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थल को स्वच्छ करें। इसके बाद देवी दुर्गा का ध्यान करें। दीपक और धूप प्रज्वलित करें। देवी को लाल या पीले वस्त्र, पुष्प और अक्षत अर्पित करें। रोली, सिंदूर, फल, मिष्ठान और नैवेद्य अर्पित करें। दुर्गा सप्तशती अथवा देवी के मंत्रों का पाठ करें। देवी की आरती करें। श्रद्धानुसार कन्या पूजन करें। कन्याओं को भोजन कराकर दक्षिणा एवं उपहार दें। महाष्टमी पर कन्या पूजन विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। छोटी कन्याओं को देवी के स्वरूप के रूप में सम्मान देकर भोजन कराया जाता है।

महा नवमी : साधना की पूर्णता का दिन

नवरात्रि का नवम दिन महा नवमी कहलाता है। देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों में इस दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। वहीं दुर्गा पूजा की परंपरा में देवी को महिषासुरमर्दिनी के रूप में भी आराध्य माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी कालखंड में देवी ने महिषासुर का वध किया था। महा नवमी नवरात्रि की साधना के समापन की ओर बढ़ने का प्रतीक है। इस दिन किया जाने वाला नवमी हवन विशेष महत्व रखता है। 2026 में नवमी तिथि 19 अक्टूबर को लगभग 10:51 बजे प्रारंभ होकर 20 अक्टूबर को लगभग 12:50 बजे तक रहेगी।

महा नवमी की पूजा विधि

महा नवमी पर प्रातः स्नान करके पूजा स्थान पर देवी की स्थापना के सामने दीप जलाएं। इसके बाद देवी सिद्धिदात्री का ध्यान करें। देवी को पुष्प, अक्षत, रोली, फल और नैवेद्य अर्पित करें। दुर्गा सप्तशती अथवा नवमी से संबंधित मंत्रों का पाठ करें। श्रद्धानुसार कन्या पूजन करें। नवमी हवन करें। हवन के बाद देवी की आरती करें। परिवार की सुख-शांति और समृद्धि के लिए प्रार्थना करें। नवमी हवन को नवरात्रि साधना का महत्वपूर्ण अंग माना जाता है और पारंपरिक रूप से नवमी पूजा के अंत में हवन किया जाता है।

सरस्वती विसर्जन : ज्ञान की देवी को विदाई

शारदीय नवरात्रि में कई परंपराओं में देवी सरस्वती की भी विशेष पूजा की जाती है। विशेष रूप से दक्षिण भारत और कुछ अन्य क्षेत्रों में नवरात्रि के दौरान सरस्वती आवाहन, पूजा और विसर्जन की परंपरा है। देवी सरस्वती को विद्या, बुद्धि, वाणी, संगीत और ज्ञान की देवी माना जाता है। इसलिए सरस्वती विसर्जन केवल प्रतिमा को विदा करने की परंपरा नहीं, बल्कि देवी से प्राप्त ज्ञान को जीवन में धारण करने का प्रतीकात्मक अवसर भी है।

2026 में सरस्वती विसर्जन 19 अक्टूबर, सोमवार को है। कुछ पंचांगों में श्रवण नक्षत्र के आधार पर विसर्जन का समय निर्धारित किया जाता है। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश के सिरसी क्षेत्र के पंचांग में 19 अक्टूबर को श्रवण नक्षत्र के दौरान लगभग दोपहर 3:38 बजे से रात 10:14 बजे तक विसर्जन का समय दिया गया है। स्थानीय नगर के पंचांग के अनुसार मुहूर्त अलग हो सकता है।

सरस्वती विसर्जन की पूजा विधि

विसर्जन से पहले देवी सरस्वती की विधिवत पूजा की जाती है। फिर देवी को पुष्प अर्पित करें। अक्षत, चंदन और नैवेद्य चढ़ाएं। पुस्तकों, वाद्य यंत्रों और अध्ययन सामग्री की भी पूजा करें। सरस्वती मंत्र का जाप करें। ज्ञान और विवेक की प्राप्ति के लिए प्रार्थना करें। आरती करें। इसके बाद श्रद्धा और स्थानीय परंपरा के अनुसार देवी की प्रतिमा का विसर्जन करें। पंचांग परंपरा में सरस्वती विसर्जन को सरस्वती उद्वासन भी कहा जाता है।

दुर्गा अष्टमी और महा नवमी की व्रत कथा

दुर्गा अष्टमी और महा नवमी से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा महिषासुर वध की है। पौराणिक कथा के अनुसार महिषासुर नामक असुर ने कठोर तपस्या करके ऐसा वर प्राप्त किया कि उसका वध किसी पुरुष के हाथों न हो सके। वरदान के प्रभाव से वह अत्यंत शक्तिशाली हो गया और उसने देवताओं तथा पृथ्वी पर अत्याचार करना शुरू कर दिया। महिषासुर के अत्याचार से परेशान देवताओं ने अपनी-अपनी शक्तियों का तेज एकत्र किया। इसी दिव्य शक्ति से आदि शक्ति देवी दुर्गा का प्राकट्य हुआ। देवताओं ने देवी को अनेक दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए। देवी ने महिषासुर और उसकी विशाल सेना के विरुद्ध युद्ध किया। यह युद्ध कई दिनों तक चला। अंततः देवी ने महिषासुर का वध किया और संसार को उसके आतंक से मुक्त कराया।

इसीलिए नवरात्रि को शक्ति की उपासना और महा नवमी को अधर्म पर धर्म की विजय के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। नवरात्रि की यह कथा विभिन्न पुराणों और देवी परंपराओं में अलग-अलग विवरणों के साथ मिलती है; इसलिए इसे धार्मिक मान्यता के रूप में समझना उचित है।

कन्या पूजन का विशेष महत्व

अष्टमी और नवमी पर कन्या पूजन की परंपरा विशेष रूप से प्रचलित है। इसमें छोटी कन्याओं को देवी के स्वरूप के रूप में सम्मान दिया जाता है। कन्याओं के चरण धोकर उन्हें भोजन कराया जाता है और सामर्थ्य के अनुसार वस्त्र, फल, मिठाई या दक्षिणा दी जाती है। कई परिवारों में एक छोटे बालक को भैरव स्वरूप मानकर कन्याओं के साथ भोजन कराया जाता है। इस परंपरा का मूल संदेश यह है कि नारी शक्ति का सम्मान केवल पूजा के दिन नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक दिन होना चाहिए।

2026 में एक विशेष संयोग

वर्ष 2026 की शारदीय नवरात्रि में 19 अक्टूबर विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहेगा, क्योंकि इसी दिन दुर्गा अष्टमी, महा नवमी और सरस्वती विसर्जन का उल्लेख विभिन्न पंचांगों में मिलता है। अगले दिन 20 अक्टूबर को विजयादशमी और दुर्गा विसर्जन होगा। इस प्रकार नवरात्रि के ये अंतिम दिन तीन महत्वपूर्ण भावनाओं को एक साथ सामने रखते हैं। अष्टमी— शक्ति की आराधना। नवमी— साधना और सिद्धि की पूर्णता। सरस्वती विसर्जन— ज्ञान और विवेक को जीवन में धारण करने का संकल्प।

- शुभा दुबे

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