Prahaar Movie Review: 26/11 के बाद की सबसे बड़ी कानूनी जंग, जहाँ बंदूकों से नहीं दलीलों से जीती गई जंग

Prahaar Movie Review
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फिल्म प्रहार 26/11 हमले के बाद सरकारी वकील उज्ज्वल निकम की ऐतिहासिक कानूनी जंग और उनके निजी संघर्ष को दर्शाती है। अविनाश अरुण के निर्देशन में बनी यह कहानी आतंकी कसाब को सजा दिलाने के तनावपूर्ण घटनाक्रम को बखूबी उजागर करती है। राजकुमार राव का दमदार और सहज अभिनय इस सस्पेंस से भरे कोर्टरूम ड्रामे को बेहद प्रभावशाली बनाता है।

कुछ फिल्में अपने जॉनर की सीमाओं को पार कर जाती हैं और दर्शकों को ऐसा अनुभव देती हैं, जो लंबे समय तक याद रहता है। कोर्टरूम ड्रामा भी ऐसा ही जॉनर है, जहां रोमांच सिर्फ अदालत में होने वाली बहसों से नहीं, बल्कि इंसाफ की लड़ाई लड़ने वाले इंसान के संघर्ष से पैदा होता है। ‘प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्ज्वल निकम’ इसी पहलू को सामने लाती है। यह फिल्म 26/11 के बाद उज्ज्वल निकम के सामने आई कानूनी चुनौतियों के साथ उनकी निजी जिंदगी में मची उथल-पुथल को भी दिखाती है। यही वजह है कि फिल्म का फोकस सिर्फ केस और उसके फैसले पर नहीं, बल्कि उस इंसान पर भी रहता है जिसकी जिंदगी इस लड़ाई के बीच लगातार बदल रही है।

26/11 के खौफनाक हमले के बाद जब पूरा देश सदमे में था, तब असली लड़ाई अदालत के दरवाजों के पीछे शुरू हुई। यह कहानी है उस ऐतिहासिक कानूनी जंग की, जहाँ एक तरफ खूंखार आतंकी कसाब का केस था, तो दूसरी तरफ पूरे देश को इंसाफ दिलाने की जिम्मेदारी। सरकारी वकील उज्ज्वल निकम ने किस तरह कड़े सबूतों और मजबूत दलीलों के दम पर इस नामुमकिन सी दिखने वाली लड़ाई को लड़ा और आतंक के सबसे बड़े गुनहगार को उसके अंजाम तक पहुँचाया, 'प्रहार' इसी सच्चाई और न्याय के संघर्ष को बेहद आसान और सीधे शब्दों में बयां करती है।

यह कोर्ट में तब शुरू हुआ एक ऐसा अदालती महा-संग्राम, जिसने पूरे देश की सांसें थाम दीं। 'प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्ज्वल निकम' कोई साधारण कोर्टरूम ड्रामा नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा माइंड-गेम है जहाँ हर एक शब्द मौत और जिंदगी का फैसला तय करता है।

​इस हाई-वोल्टेज खेल के केंद्र में खड़े हैं राजकुमार राव, जिनकी ठंडी और सधी हुई निगाहें ही कोर्टरूम में ऐसा खौफनाक सन्नाटा पैदा कर देती हैं, जो किसी भी बड़े हंगामे से ज्यादा भारी पड़ता है। उनके सामने जब कठघरे में खड़े चेहरे (ललित प्रभाकर) की बेचैनी और वकील के रूप में सिकंदर व जयदीप अहलावत के पैंतरे आमने-सामने आते हैं, तो स्क्रीन पर तनाव अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाता है।

​अविनाश अरुण का निर्देशन और दिनेश विजन (मैडॉक फिल्म्स) का विज़न आपको कहानी के इस चक्रव्यूह में ऐसे उलझाता है कि आप हर अगले पल यह अंदाज़ा लगाने को मजबूर हो जाते हैं कि अगली चाल किसकी होगी। कैमरे की खामोशी, दिल की धड़कनें बढ़ा देने वाला बैकग्राउंड स्कोर और रिश्तों के बीच सुलगती अनकही आग के साथ यह फिल्म आपको अंत तक अपनी सीट से हिलने नहीं देगी।

यह फिल्म सिर्फ इसलिए नहीं देखी जानी चाहिए कि यह 26/11 के हमले के बाद की ऐतिहासिक कानूनी लड़ाई को दिखाती है, बल्कि इसलिए भी कि यह एक सच्चे नायक के त्याग और संघर्ष को बेहद खूबसूरती से सामने लाती है। राजकुमार राव का बिना किसी एकस्ट्रा ड्रामे का, सहज और रोंगटे खड़े कर देने वाला अभिनय इस कहानी की असली जान है। कोर्टरूम के सस्पेंस के साथ-साथ यह फिल्म एक इंसान की निजी ज़िंदगी और पारिवारिक रिश्तों के उस अनकहे दर्द को भी छूती है, जिसे अक्सर देश सेवा के पीछे अनदेखा कर दिया जाता है। अगर आप बेहतरीन अभिनय, मजबूत कंटेंट और देश को हिला देने वाली असली कहानी पर बनी फिल्में पसंद करते हैं, तो 'प्रहार' एक ऐसा सिनेमाई अनुभव है जिसे आपको बिल्कुल मिस नहीं करना चाहिए।

डायरेक्टर: अविनाश अरुण
कास्ट: राजकुमार राव, वामिका गब्बी, ललित प्रभाकर, जयदीप अहलावत, सिकंदर खेर, आशीष विद्यार्थी
ड्यूरेशन: 140 मिनट
रेटिंग: 4

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