H-1B वीजा और इमीग्रेशन पॉलिसी से परेशान भारतीय वोटर्स Trump को सिखाएंगे सबक! महंगी पड़ेगी नाराजगी

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अभिनय आकाश । Nov 3 2026 1:07PM

अमेरिका में भारतीय प्रोफेशनल्स पर निर्भरता के बावजूद एच1-बी वीजा और आव्रजन नियमों को लेकर बहस तेज है। व्यापार समर्थक नीतियों और मोदी-ट्रंप दोस्ती के चलते कई भारतीय-अमेरिकी रिपब्लिकन पार्टी की ओर झुके थे। लेकिन ट्रंप सरकार द्वारा वीजा और आयात पर सख्त फैसले लेने से अब यह समुदाय असमंजस में है।

अमेरिका को भारत का टैलेंट चाहिए। उनकी टेक्नोलॉजी कंपनीज बहुत हद तक भारतीय प्रोफेशनल्स पर निर्भर करती हैं। लेकिन अब इन्हीं लोगों को लेकर अमेरिका की राजनीति में बहस छिड़ गई है कि दूसरे देशों से आने वाले लोगों को वहां काम करने की कितनी छूट मिलनी चाहिए। अक्टूबर 2026 में अमेरिका के वाइस प्रेसिडेंट जेडी वैंस ने एच1 बी के वर्कर्स को लेकर फॉरेन इंडेंचर्ड सर्वेंट्स कहा। यानी वो विदेशी कर्मचारी जो अपनी नौकरी के कारण कंपनी से बंधे रहते हैं। साथ ही अमेरिका एआई में काफी इन्वेस्टमेंट कर रहा है ताकि ज्यादा से ज्यादा काम मशीनंस कर सकें। इनमें वो काम भी है जो आज भारतीय प्रोफेशनल्स कर रहे हैं। अब सवाल तो कंपनीज़ और वीजा सिस्टम पर उठा रहे थे। लेकिन उनकी बात ने अमेरिका में काम करते भारतीयों के ज़हन में कई सवाल उठा दिए। आखिर सालों से इंडियन अमेरिकनंस अमेरिका के कामयाब लोगों में गिने जाते रहे हैं। पढ़े लिखे हैं, अच्छी तनख्वाह और अलग-अलग फील्ड्स में इनकी अपनी पकड़।  इन्हीं में से कुछ लोग पिछले कुछ सालों में डोनल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी की तरफ भी मुड़ने लगे हैं। किसी को उनके बिजनेस पॉलिसीज पसंद है तो किसी को ट्रेडिशनल वैल्यूस, पारिवारिक मूल्यों पर उनका जोर। 

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सामाजिक मुद्दों पर उनका रुख और नरेंद्र मोदी के साथ उनकी दोस्ती भी कुछ को पसंद आई है। लेकिन जब वो दूसरी बार प्रेसिडेंट बने तो उनके वीजा और इकॉनमी से जुड़े फैसलों ने उन्हीं लोगों को दुविधा में डाल दिया। तो क्या ये अब भी ट्रम्प के साथ हैं? या उनके फैसलों के कारण उनसे दूर होते जा रहे हैं। 3 नवंबर को अमेरिका में मिड टर्म सिलेक्शंस हैं। जिस कारण यह सवाल पूछना जरूरी हो जाता है। क्योंकि बात सिर्फ वोट की नहीं बल्कि अमेरिका में रहने वाले भारतीयों की पहचान की है और उनके भविष्य की है। सालों से ज्यादातर इंडियन अमेरिकनंस डेमोक्रेटिक पार्टी को सपोर्ट करते आए हैं जो ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी की विरोधी पार्टी है। लेकिन अब इस सपोर्ट में बदलाव आया है। कार्निककी के 2026 के सर्वे के मुताबिक 2020 में 52% इंडियन अमेरिकन का झुकाव डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ था जो अब 46% रह गया है। वहीं रिपब्लिकन पार्टी से जुड़ने वालों का हिस्सा 15 से बढ़कर 19% हो गया। नहीं सब रिपब्लिकन नहीं बन रहे लेकिन कईयों की सोच जरूर बदल रही है। अमेरिका में करीब 52 लाख भारतीय मूल के लोग रहते हैं। कुछ वहीं पैदा हुए तो कुछ पढ़ाई, नौकरी या बिजनेस करने के लिए गए। इनमें से कईयों को लगता था कि डेमोक्रेटिक पार्टी बाहर से आने वालों का स्वागत करती है और सबको बराबर का हक देने की बात करती है। लेकिन धीरे-धीरे कुछ लोगों को धर्म, परिवार और समाज के से जुड़े मुद्दों पर इस पार्टी की बातें परेशान करने लगी। उन्हें लगा कि उनकी मेहनत और टैलेंट को पूरी अहमियत नहीं मिल रही है। जिस कारण वो रिपब्लिकन पार्टी की तरफ मुड़ने लगे। 

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जो कम टैक्स, बिजनेस को बढ़ावा और मेहनत की सही फल की बातें करते थे। और साथ ही ट्रंप और मोदी की दोस्ती ने भी इस कहानी को एक नया रूप दिया। सितंबर 2019 में अमेरिका के हस्टन शहर में हाउडी मोदी नामक एक आयोजन हुआ। हजारों इंडियन अमेरिकनंस के सामने नरेंद्र मोदी और डॉनल्ड ट्रंप एक साथ मंच पर खड़े थे। दोनों दोनों देशों की दोस्ती का जश्न मना रहे थे। मोदी के साथ उनकी दोस्ती देखकर कुछ इंडियन अमेरिकनंस को लगा कि रिपब्लिकन पार्टी भारत के लिए कुछ अच्छा कर सकती है। लेकिन दो नेताओं की दोस्ती का मतलब यह नहीं कि उनके हर फैसले से दोनों देशों को फायदा हो। 

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ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में यह फर्क साफ दिखने लगा। जनवरी 2025 में ट्रंप दोबारा प्रेसिडेंट बने। उनके सरकार ने इमीग्रेशन और दूसरे देशों के साथ व्यापार को लेकर सख्त फैसले लिए। अब H1 वीजा को ही देख लीजिए। इस वीजा के जरिए अमेरिकन कंट्रीज दूसरे देशों के स्किल्ड प्रोफेशनल्स को नौकरी पर बुलाती है। जिसका सबसे ज्यादा इस्तेमाल भारतीय करते हैं। कार्निके के मुताबिक 2024 में एच1 बी पटीिशंस में भारतीयों की हिस्सेदारी 71% थी। यानी कोई भी नए बदले हुए फैसले या नियमों का नुकसान हजारों भारतीयों को होना था। फिर ट्रंप सरकार ने एच1 वीजा को लेकर ₹1 लाख डॉलर की फीस की घोषणा कर दी। यानी करीब 90 से 95 लाख। लेकिन भारतीयों की नाराजगी सिर्फ वीजा तक सीमित नहीं थी। उसी सर्वे में 64% इंडियन अमेरिकनंस ट्रंप की इमीग्रेशन पॉलिसी से भी सहमत नहीं थे। 

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68% लोग उनकी इकोनॉमिक पॉलिसीज से नाख थे और इंटरनेशनल ट्रेड और इकॉनमी से जुड़ी पॉलिसीज से 70% असहमत। यानी एक तरफ कुछ इंडियन अमेरिकनंस रिपब्लिकन पार्टी के करीब आ रहे थे और दूसरी तरफ वही कम्युनिटी उसी पार्टी की सरकार के फैसलों से नाख भी थी। बात सिर्फ अमेरिका में रहने वाले भारतीयों की नहीं थी। ट्रंप सरकार ने 2025 में भारत से आने वाले सामान पर टेरिफ यानी इंपोर्ट टैक्स बढ़ा दिए। इंडियन अमेरिकनंस के लिए मामला और उलझ गया। वो मोदी को पसंद कर सकते थे। भारत और अमेरिका की दोस्ती भी चाहते थे। लेकिन ट्रम्प के कई फैसलों से असहमत भी थे। 

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