भारत मिडिल पावर नहीं, बल्कि 'पावर इन द मिडिल', जयशंकर की दो-टूक- अपने हितों के हिसाब से बनाएंगे नीतियां

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि भारत को केवल मिडिल पावर कहना उसे सीमित करना होगा, क्योंकि भारत बीच में स्थित शक्ति है। उन्होंने कहा कि आज की दुनिया में वित्त और प्रतिबंध जैसे चोक पॉइंट्स भी अहम हो गए हैं। साथ ही उन्होंने वैश्विक बदलावों और प्रतिस्पर्धा को लेकर निराशावादी नजरिया न रखने की सलाह दी।
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने बुधवार को एक कार्यक्रम में कहा कि भारत को मिडल पावर (मध्यम शक्ति) कहना, उस परिभाषा के हिसाब से खुद को सीमित करना होगा। ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फ़ोरम में एक पैनल चर्चा के दौरान, जयशंकर से पूछा गया कि भारत को मिडल पावर (मध्यम शक्ति) कहलाना क्यों पसंद नहीं है। इस पर उन्होंने कहा कि इससे कहीं ज़्यादा, भारत बीच में स्थित शक्ति (पावर इन द मिडल) है। उन्होंने मिडिल पावर (मध्यम शक्ति) के बारे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की परिभाषा का भी ज़िक्र किया, जिसमें इसे "दूसरों को सशक्त बनाने की क्षमता रखने वाले देश" के तौर पर बताया गया है; साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि भारत के लिए यह परिभाषा आरामदायक नहीं होगी। एक तरह से हम सिर्फ़ मिडल पावर (मध्यम शक्ति) से कहीं ज़्यादा हैं, हम बीच की ताक़त हैं। असल में मिडल पावर किसे कहेंगे? प्रधानमंत्री के शब्दों में कहें तो, वे देश जिनमें दूसरों को सशक्त बनाने की क्षमता हो... क्या भारत एक मिडल पावर है? यह परिभाषा बहुत सहज नहीं लगती।
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‘चोक पॉइंट्स’ की दुनिया
विदेश मंत्री ने इस बारे में भी बात की कि कैसे ‘चोक पॉइंट्स’ (अहम रुकावट वाले बिंदु) ने दुनिया पर कब्ज़ा कर लिया है, यहाँ तक कि फाइनेंस और प्रतिबंधों जैसे क्षेत्रों में भी। उन्होंने कहा यह सिर्फ़ मध्यम शक्तियों (मिडल पावर्स) की दुनिया नहीं है। आज यह ‘चोक पॉइंट्स’ की दुनिया भी है। चीज़ों को हथियार बनाने की प्रवृत्ति की बात करें तो हम अक्सर ‘रेयर अर्थ्स’ (दुर्लभ खनिजों) का उदाहरण सोचते हैं। लेकिन असल बात यह है कि फाइनेंस और प्रतिबंध भी ‘चोक पॉइंट्स’ ही हैं। इसके बाद उन्होंने इस बारे में बात की कि हालात किस तरह उस मोड़ की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ मुकाबला इस बात पर होगा कि कौन क्या योगदान देता है, और इसे लेकर कोई निराशावादी नज़रिया नहीं होना चाहिए।
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जयशंकर ने कहा कि हम ऐसी दुनिया की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ मुकाबला इस बात का होगा कि किसके पास क्या है और फिर उनके बीच समझौते होंगे - जैसे 'तुम यह करो, मैं वह करता हूँ, चलो इसे मिलकर डेवलप करते हैं, चलो इसका आपस में व्यापार करते हैं'... वह मंच तो होगा ही। लोग अलग-अलग तरीकों से और अलग-अलग चीज़ों के साथ उस मंच पर आएँगे। उस मंच पर लोगों का व्यवहार बदलेगा। कौन कितनी ज़ोर से बात करेगा और कौन किसके बगल में बैठेगा, यह भी बदलेगा। हमें बदलाव की इस प्रक्रिया को लेकर निराशावादी नज़रिया नहीं रखना चाहिए। बदलाव की यह प्रक्रिया तो चल ही रही थी। बस इसने ऐसे मोड़ लिए हैं जिनकी शायद हमने उम्मीद नहीं की थी।
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