PISA रिपोर्ट में छात्रों की पढ़ने की क्षमता घटी, सिर्फ AI बैन से नहीं सुधरेगा स्तर

PISA रिपोर्ट में छात्रों की पढ़ने की क्षमता घटी, सिर्फ AI बैन से नहीं सुधरेगा स्तर
प्रतिरूप फोटो
AI-Generated

पीआईएसए की हालिया रिपोर्ट में छात्रों में पढ़ने-समझने की क्षमता में आ रही गिरावट पर नीति निर्माताओं ने चिंता जताई है। अमेरिका के न्यूयॉर्क में प्री-स्कूल से आठवीं कक्षा तक चैटजीपीटी जैसे जनरेटिव एआई पर प्रतिबंध लगाया गया है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि केवल तकनीकी पाबंदियों से लिखित संस्कृति में आए बदलाव की समस्या हल नहीं होगी।

(द कन्वरसेशन) विभिन्न देशों के नीति निर्माता स्कूलों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव को लेकर लगातार खतरे की घंटी बजा रहे हैं, क्योंकि पीआईएसए की हालिया रिपोर्ट ने पुष्टि की है कि छात्रों में पढ़ने-समझने की क्षमता लगातार घट रही है। फ्रांस के शिक्षा मंत्री एडुआर्ड गेफ्रे ने इसे एक पूरी पीढ़ी का ‘‘संज्ञानात्मक विनाश’’ करार दिया, जबकि उनकी स्पेनिश समकक्ष मिलाग्रोस टोलोन ने पढ़ने की आदत को सुधारने पर विशेष ध्यान देने की सिफारिश की क्योंकि उनके अनुसार ‘‘पढ़ना ही हर चीज की बुनियाद है।’’ ब्रिटिश पत्रिका द इकोनॉमिस्ट के संपादकीय बोर्ड ने इसे ‘‘धीमी गति से आने वाली तबाही’’ बताते हुए कहा कि ‘‘जहां मशीनें अधिक स्मार्ट होती जा रही हैं, वहीं किशोर सुस्त हो रहे हैं।’’ इस बीच, अमेरिका में न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी ने पीआईएसए के नतीजे आने से ठीक पहले, प्री-स्कूल से लेकर आठवीं कक्षा (लगभग 4 से 14 वर्ष की आयु) तक के सरकारी स्कूलों में छात्रों के लिए चैटजीपीटी जैसे जनरेटिव एआई के उपयोग पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने की घोषणा की। इसके साथ ही उन्होंने हाई स्कूल के छात्रों के लिए साल में दो बार एआई क्रिटिकल थिंकिंग मॉड्यूल और स्क्रीन टाइम पर कुछ प्रतिबंध लगाने की नीति भी पेश की। ममदानी की यह नीति बेहद नेक इरादे से बनाई गई है और बच्चों के ध्यान को व्यावसायिक कंपनियों द्वारा ‘हाइजैक’ किए जाने के खिलाफ एक अच्छा प्रयास है। शक्तिशाली और अत्यधिक लत लगाने वाली एआई तकनीकों से मुक्त वातावरण में बच्चों को सीखने का अवसर देने वाले किसी भी कदम की सराहना होनी चाहिए, लेकिन यह नीतियां केवल समस्या के लक्षणों का इलाज करती हैं, न कि पढ़ने की क्षमता में गिरावट के मूल कारणों का मुकाबला करती हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि सार्वजनिक विमर्श इस बात को समझने में पूरी तरह से विफल रहा है कि हमारा समाज एक बहुत बड़े तकनीकी बदलाव से गुजर रहा है। हम एक साहित्यिक समाज (लिटरेरी सोसाइटी - जहां लिखित शब्दों का महत्व था) से इसके बाद के साहित्यिक समाज (पोस्ट-लिटरेरी सोसाइटी) की ओर बढ़ रहे हैं, जिसमें एआई तो केवल एक हालिया विकास मात्र है। इस बदलाव ने मंत्रियों से लेकर स्कूली बच्चों तक, हर किसी की सीखने की आदतों और क्षमताओं को पूरी तरह से बदल दिया है।

----- लिखित संस्कृति से मौखिक संस्कृति की ओर बदलाव----- 20वीं सदी के मीडिया सिद्धांतकारों के अनुसार, पिछले सौ वर्षों में हमारा समाज लिखित संस्कृति से हटकर तेजी से मौखिक और श्रव्य संस्कृति की ओर बढ़ा है। हम चिंतन और लिखित शिल्प को महत्व देने वाली संस्कृति से दूर होकर लाइव संचार, इंटरएक्टिविटी और तत्काल प्रामाणिकता को महत्व देने वाली संस्कृति की ओर बढ़ रहे हैं। एआई मूल रूप से लिखित पाठ की ‘स्थिरता’ को समाप्त करने वाली मशीन है। ऐसे में पीआईएसए के खराब नतीजे किशोरों के ‘सुस्त’ होने का प्रमाण नहीं हैं, बल्कि यह दर्शाते हैं कि छात्रों ने भांप लिया है कि हमारी संस्कृति में अब पढ़ने और लिखने की पारंपरिक स्थिति बदल चुकी है।

----- क्या पढ़ना ही सब कुछ की बुनियाद है? ----- यह याद रखना जरूरी है कि पश्चिमी साहित्यिक जगत की नींव माने जाने वाले महाकाव्य — इलियड और ओडिसी — उन लोगों द्वारा रचे और सुरक्षित रखे गए थे जो पढ़ना-लिखना जानते ही नहीं थे। प्राचीन यूनान में प्लेटो से पहले ज्ञान मौखिक स्मृति पर टिका था, लेकिन लिखने की तकनीक के आविष्कार ने ज्ञान के भंडारण का तरीका बदल दिया, जिससे एकांत में किए जाने वाले चिंतनशील अध्ययन का जन्म हुआ। मौखिक संस्कृतियों में लोग गुरु-शिष्य परंपरा और सुनकर सीखते थे।

----- डिजिटल तकनीक वाला नया युग ----- इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल तकनीक (रेडियो, टीवी, इंटरनेट) के आगमन ने द्वितीयक मौखिकता (सेकेंडरी ओरैलिटी) के एक नए युग की शुरुआत की है। प्रिंटिंग प्रेस के आविष्कार के बाद के 500 वर्षों में लिखित सामग्री अपनी स्थिरता के कारण एक पवित्र अधिकार रखती थी। लेकिन एआई के युग में चैटबॉट्स इतनी विशाल मात्रा में टेक्स्ट बना रहे हैं कि अब लिखित भी एक मौखिक बातचीत की तरह तरल और अविश्वसनीय हो गई है। लिखित समाज में किताबें ‘अनुत्तरदायी’ होती थीं, लेकिन एआई-डिजिटल युग में टेक्स्ट खुद को समझाता है। पीआईएसए परीक्षणों को वर्ष 2000 में उस समय डिजाइन किया गया था जब पारंपरिक लिखित युग अपने चरम पर था। अब जब पूरी व्यवस्था बदल रही है, तो केवल एआई पर प्रतिबंध लगाने से इस व्यापक सांस्कृतिक और तकनीकी बदलाव को नहीं सुधारा जा सकता।

All the updates here:

अन्य न्यूज़