Prabhasakshi NewsRoom: इधर Saudi Arabia ने वॉर्निंग बंद की, उधर Houthis ने रियाद पर Missile ठोक दी! अब Iran बोला— हम सुलझवाएंगे लड़ाई

Saudi Arabia
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एक तरफ हूतियों के हमलों ने सऊदी अरब की सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती दी है, तो दूसरी तरफ ब्रिटेन में ईरान की कथित गुप्त गतिविधियों को लेकर तनाव बढ़ रहा है। पश्चिम एशिया अब ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां एक चूक का असर पूरे क्षेत्र की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

सऊदी अरब की राजधानी रियाद में हवाई अड्डे को निशाना बनाकर किए गए लगातार हमलों ने खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता पैदा कर दी है। जिस सऊदी अरब को अपनी आर्थिक ताकत, आधुनिक बुनियादी ढांचे और बड़े निवेश अभियानों के जरिए स्थिरता का प्रतीक बनाकर पेश किया जाता रहा है, उसी की राजधानी में मिसाइल और ड्रोन हमलों ने सामान्य जनजीवन को प्रभावित कर दिया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब हमलों का खतरा बढ़ रहा था, तब नागरिकों को समय रहते चेतावनी क्यों नहीं दी गई? देखा जाये तो यह मामला अब केवल हवाई सुरक्षा का नहीं, बल्कि सरकारी तैयारी, जनता के भरोसे और सऊदी अरब की क्षेत्रीय रणनीति की भी परीक्षा बन गया है।

चेतावनी प्रणाली पर सवाल, सुरक्षा के दावों को चुनौती

हम आपको याद दिला दें कि सऊदी अरब ने मई महीने में ऐसी व्यवस्था शुरू की थी, जिसके जरिए मोबाइल फोन और सोशल मीडिया पर लोगों को संभावित मिसाइल और ड्रोन हमलों की चेतावनी दी जा सकती थी। लेकिन हैरानी की बात यह है कि 29 सितंबर के बाद अक्टूबर में सोमवार तक हमलों को लेकर जनता के लिए कोई चेतावनी जारी नहीं की गई, जबकि इस दौरान रियाद और सऊदी अरब के दूसरे ठिकानों पर हमलों की खबरें सामने आती रहीं। ऐसे में सवाल उठता है कि जब हमलों का खतरा लगातार बढ़ रहा था, तो लोगों को समय रहते सतर्क क्यों नहीं किया गया?

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देखा जाये तो इस चुप्पी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल उठ रहा है कि क्या सरकार हमलों की गंभीरता को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करने से बच रही थी? क्या बार-बार अलर्ट जारी होने से नागरिकों में डर और आर्थिक गतिविधियों में बाधा बढ़ने की आशंका थी? या फिर खतरे का आकलन करने और जनता तक सही समय पर सूचना पहुंचाने की व्यवस्था में कोई बड़ी कमजोरी थी?

बताया जा रहा है कि सऊदी अरब के सहयोगी पश्चिमी देश की ओर से भी चेतावनियां बंद होने पर सवाल उठाए गए थे और जवाब में नागरिकों की शिकायतों का हवाला दिया गया था कि रात में अलर्ट से उनकी नींद टूटती है। हालांकि, सऊदी सरकार ने इस दावे की पुष्टि नहीं की है। लेकिन यह स्पष्ट नजर आ रहा है कि सुरक्षा के मामले में असुविधा से बचने की कोशिश उलटा नुकसान पहुंचा सकती है। समय पर चेतावनी नहीं मिलने का अर्थ है कि नागरिकों के पास सुरक्षित स्थान पर पहुंचने या अपनी रक्षा करने के लिए जरूरी समय कम हो सकता है।

रियाद एयरपोर्ट बंद, वैश्विक विमानन पर असर

दूसरी ओर, रियाद का किंग खालिद अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा सुरक्षा कारणों से बंद कर दिया गया है। इसे 17 अक्टूबर तक बंद रखने की जानकारी दी गई थी। हूतियों ने दावा किया कि उन्होंने एयरपोर्ट पर बैलिस्टिक मिसाइल से हमला किया, जबकि सऊदी अरब ने कहा कि रियाद की ओर दागी गई एक मिसाइल को हवा में ही नष्ट कर दिया गया। इसके अलावा, एयरपोर्ट के टर्मिनल-4 पर भी एक प्रक्षेप्य गिरने और आग लगने की खबर सामने आई।

उधर, इस संकट का असर सऊदी अरब की सीमाओं से बाहर तक पहुंच गया है। विमानन विश्लेषण संस्था Cirium के अनुसार, देश के हवाई अड्डों पर उड़ान रद्द होने की दर 46.4 प्रतिशत तक पहुंच गई है। लुफ्थांसा, एयर फ्रांस-KLM, एतिहाद और कतर एयरवेज जैसी विमानन कंपनियों ने अपनी सेवाएं रद्द या सीमित कर दी हैं। अमेरिकी विमानन प्रशासन ने भी अमेरिकी कंपनियों को सऊदी हवाई क्षेत्र में उड़ान भरते समय सावधानी बरतने की सलाह दी है, जबकि यूरोपीय विमानन सुरक्षा एजेंसी ने हवाई क्षेत्र संबंधी चेतावनी का दायरा बढ़ाया है। यह घटनाक्रम बताता है कि आधुनिक युद्ध में नागरिक विमानन भी कितना संवेदनशील हो चुका है। किसी बड़े एयरपोर्ट का बंद होना केवल यात्रियों की परेशानी नहीं, बल्कि व्यापार, पर्यटन, निवेश और अंतरराष्ट्रीय संपर्क पर सीधा प्रहार है।

महंगी वायु रक्षा बनाम सस्ते ड्रोन का दबाव

देखा जाये तो सऊदी अरब के सामने एक बड़ी सामरिक चुनौती उसका विशाल भूभाग है। देश को हवाई अड्डों, तेल प्रतिष्ठानों, पाइपलाइनों और अन्य महत्वपूर्ण ठिकानों की एक साथ सुरक्षा करनी पड़ती है। इन सभी स्थानों को हर समय पर्याप्त सुरक्षा देना आसान नहीं है। ड्रोन और मिसाइलों के लगातार हमले विरोधी पक्ष को एक कठिन स्थिति में डाल सकते हैं। हमलावर अपेक्षाकृत कम लागत वाले हथियारों से हमला कर सकता है, जबकि उन्हें रोकने के लिए महंगी इंटरसेप्टर मिसाइलों और उन्नत रक्षा प्रणालियों का इस्तेमाल करना पड़ता है। यदि ऐसे हमले बार-बार होते हैं, तो रक्षा संसाधनों, सैन्य तैयारी और आर्थिक खर्च पर दबाव बढ़ता है। यही वजह है कि रियाद के लिए चुनौती सिर्फ मिसाइलों को हवा में नष्ट करना नहीं है। उसे खुफिया जानकारी, शुरुआती चेतावनी, नागरिक सुरक्षा और महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की बहुस्तरीय रक्षा को भी मजबूत करना होगा।

ईरान की बातचीत की पेशकश: समाधान या रणनीतिक संदेश?

उधर, तनाव के बीच ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने सऊदी विदेश मंत्री फैसल बिन फरहान से बातचीत में सऊदी अरब और यमन के बीच संवाद शुरू कराने में मदद की पेशकश की है। उन्होंने चेतावनी दी कि केवल सैन्य कार्रवाई पर निर्भर रहने से क्षेत्रीय संकट और जटिल हो सकता है। सऊदी पक्ष ने बातचीत के विवरण सीमित रखे हैं। इस पेशकश को क्षेत्रीय तनाव कम करने की कूटनीतिक कोशिश के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन इसकी वास्तविक उपयोगिता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या संबंधित पक्ष हमलों को रोकने, नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और राजनीतिक बातचीत आगे बढ़ाने के लिए ठोस कदम उठाते हैं।

आर्थिक महत्वाकांक्षा और सुरक्षा की असली परीक्षा

दूसरी ओर, सऊदी अरब रियाद में अंतरराष्ट्रीय निवेश और ऊर्जा से जुड़े बड़े आयोजनों के जरिए दुनिया को यह भरोसा देना चाहता है कि क्षेत्रीय तनाव के बावजूद उसकी आर्थिक योजनाएं पटरी पर रहेंगी। लेकिन एयरपोर्ट बंद होने, उड़ानें रद्द होने और सुरक्षा संबंधी चिंताओं के बीच यह संदेश देना आसान नहीं है। निवेशक केवल आर्थिक अवसर नहीं देखते; वे यह भी देखते हैं कि उनका कारोबार, कर्मचारी और संपत्ति कितने सुरक्षित हैं। बहरहाल, पश्चिम एशिया में असली ताकत का पैमाना अब केवल हथियारों की संख्या नहीं, बल्कि नागरिकों को सुरक्षित रखने, हमलों की पूर्व सूचना देने और संकट को व्यापक युद्ध में बदलने से रोकने की क्षमता भी है। रियाद के लिए यही सबसे बड़ी परीक्षा है।

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