PM Modi ने Bishkek में Putin, Masoud Pezeshkian, Nikol Pashinyan और Sadyr Zhaparov से मुलाकात कर पलटे सारे समीकरण

SCO Summit 2026
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प्रधानमंत्री की द्विपक्षीय मुलाकातों पर चर्चा करें तो आपको बता दें कि रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ मोदी की द्विपक्षीय मुलाकात विशेष रूप से महत्वपूर्ण रही। यह बैठक ऐसे समय हुई, जब दुनिया की भू-राजनीति युद्ध, प्रतिबंधों, आर्थिक प्रतिस्पर्धा और नए शक्ति समीकरणों के दौर से गुजर रही है।

बिश्केक में आयोजित हो रहे 26वें शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन के मंच पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वैश्विक कूटनीति के सबसे चर्चित और आकर्षक केंद्र के रूप में उभरे। यह भारत की बढ़ती वैश्विक हैसियत और मोदी की उस बहुपक्षीय कूटनीति का परिणाम है, जिसमें नई दिल्ली किसी एक खेमे की परछाईं बनने की बजाय हर शक्ति केंद्र के साथ अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर संबंधों की नई इबारत लिख रही है। SCO के मंच से मोदी ने एक बार फिर संदेश दिया कि बदलती विश्व व्यवस्था में भारत अब समीकरण तय करने वाली ताकत बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

प्रधानमंत्री की द्विपक्षीय मुलाकातों पर चर्चा करें तो आपको बता दें कि रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ मोदी की द्विपक्षीय मुलाकात विशेष रूप से महत्वपूर्ण रही। यह बैठक ऐसे समय हुई, जब दुनिया की भू-राजनीति युद्ध, प्रतिबंधों, आर्थिक प्रतिस्पर्धा और नए शक्ति समीकरणों के दौर से गुजर रही है। ऐसे माहौल में भारत और रूस के शीर्ष नेतृत्व का संवाद इस बात का स्पष्ट संकेत है कि दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी बाहरी दबावों से प्रभावित होने वाली नहीं है। मोदी की कूटनीतिक ताकत यही है कि वह एक तरफ रूस के साथ भारत के ऐतिहासिक और सामरिक संबंधों को मजबूती देते हैं, तो दूसरी तरफ पश्चिमी देशों, मध्य एशिया और पश्चिम एशिया के साथ भी भारत के हितों को समान दृढ़ता से आगे बढ़ाते हैं। यही संतुलन आज मोदी की विदेश नीति की सबसे बड़ी ताकत है। यानि संवाद सबसे करो, साझेदारी अपने हितों के आधार पर करो और फैसले पूरी तरह भारत की रणनीतिक प्राथमिकताओं के मुताबिक करो।

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इसके अलावा, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के साथ मोदी की मुलाकात सबसे अधिक सामरिक महत्व वाली बैठकों में शामिल रही। पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच नए सैन्य तनाव के बीच यह बैठक ऐसे समय हुई, जब पूरा क्षेत्र अस्थिरता के खतरनाक दौर से गुजर रहा है। दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय संबंधों के साथ-साथ पश्चिम एशिया की तेजी से बदलती स्थिति पर विस्तार से चर्चा की। प्रधानमंत्री मोदी ने तनाव बढ़ने पर चिंता जताई और भारत का पुराना लेकिन बेहद स्पष्ट संदेश दोहराया कि विवादों का समाधान युद्ध से नहीं, संवाद और कूटनीति से होना चाहिए।

लेकिन भारत का रुख केवल शांति की अपील तक सीमित नहीं रहा। मोदी ने समुद्री नौवहन और वाणिज्य की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने की जरूरत पर विशेष जोर दिया। उन्होंने साफ कहा कि नागरिकों, नागरिक प्रतिष्ठानों, वाणिज्यिक जहाजों और नाविकों को किसी भी परिस्थिति में निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए। यह बयान सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। फारस की खाड़ी और उसके आसपास बढ़ती अस्थिरता सीधे भारत की ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार और हिंद महासागर क्षेत्र के हितों को प्रभावित कर सकती है। भारत ने ईरान के साथ BRICS और SCO जैसे बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग बढ़ाने की प्रतिबद्धता भी दोहराई। मोदी ने राष्ट्रपति पेजेशकियन को भारत में होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन के लिए आमंत्रित किया। साफ है कि नई दिल्ली तेहरान से संवाद का दरवाजा खुला रखकर पश्चिम एशिया में अपने रणनीतिक हितों की सुरक्षा कर रही है।

इसके अलावा, प्रधानमंत्री मोदी ने आर्मेनिया के प्रधानमंत्री निकोल पाशिनयान से भी अलग द्विपक्षीय मुलाकात की। यह बैठक केवल औपचारिक कूटनीतिक बातचीत नहीं थी, बल्कि दक्षिण काकेशस में भारत की बढ़ती रणनीतिक मौजूदगी का संकेत भी थी। दोनों नेताओं ने रक्षा, आर्थिक सहयोग, फार्मास्यूटिकल्स, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, संस्कृति और शिक्षा समेत कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में साझेदारी को मजबूत करने पर चर्चा की। क्षेत्रीय और वैश्विक घटनाक्रमों, विशेष रूप से पश्चिम एशिया की स्थिति पर भी विचारों का आदान-प्रदान हुआ। रक्षा सहयोग पर विशेष जोर बेहद महत्वपूर्ण है। आर्मेनिया के साथ बढ़ती साझेदारी भारत को काकेशस क्षेत्र में अपनी रणनीतिक पहुंच मजबूत करने का अवसर देती है। यह क्षेत्र यूरोप, रूस, पश्चिम एशिया और मध्य एशिया के बीच एक महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक गलियारा है।

मोदी ने पाशिनयान को आश्वस्त किया कि भारत आर्मेनिया के साथ संबंधों को और गहरा करने के लिए तैयार है। दोनों देशों के बीच विश्वास का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी रहा कि हालिया पश्चिम एशियाई घटनाक्रम के दौरान ईरान में फंसे भारतीय नागरिकों की निकासी में आर्मेनिया ने सहयोग किया था। इससे स्पष्ट है कि भारत-आर्मेनिया संबंध अब केवल कागजी समझौतों तक सीमित नहीं हैं।

इसके अलावा, SCO सम्मेलन के मेजबान देश किर्गिज़ गणराज्य के राष्ट्रपति सदिर झापारोव के साथ मोदी की मुलाकात ने भारत-मध्य एशिया संबंधों को नई मजबूती दी। प्रधानमंत्री ने किर्गिज़स्तान के स्वतंत्रता दिवस की बधाई दी और उसी दिन SCO सम्मेलन के उद्घाटन को विशेष महत्व वाला अवसर बताया। उन्होंने झापारोव को 26वें SCO शिखर सम्मेलन के सफल आयोजन के लिए भी बधाई दी। दोनों नेताओं ने भारत और किर्गिज़ गणराज्य के बीच रणनीतिक साझेदारी की समीक्षा की और इसे और मजबूत करने की प्रतिबद्धता जताई। आर्थिक और वाणिज्यिक सहयोग बढ़ाने पर विशेष जोर दिया गया। दोनों अर्थव्यवस्थाओं की परस्पर पूरक क्षमताओं को ध्यान में रखते हुए नए अवसर तलाशने पर सहमति बनी। छात्र आदान-प्रदान, सांस्कृतिक सहयोग और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने पर भी चर्चा हुई। मोदी ने किर्गिज़ अध्यक्षता में आयोजित SCO बैठकों में भारत की मजबूत भागीदारी का उल्लेख करते हुए कहा कि यह दोनों देशों के बीच मौजूद आपसी सम्मान, विश्वास और सहयोग का प्रमाण है।

हम आपको यह भी बता दें कि बिश्केक पहुंचने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने विभिन्न किर्गिज़ समुदायों के लोगों से भी मुलाकात की। सांस्कृतिक और योग गतिविधियों से जुड़े लोगों के साथ संवाद करते हुए उन्होंने भारत और किर्गिज़स्तान की पुरानी मित्रता को रेखांकित किया। इससे पहले, प्रधानमंत्री का स्वागत पारंपरिक किर्गिज़ नृत्य के साथ किया गया। यह सांस्कृतिक कूटनीति का वह पक्ष है जिसे भारत लगातार अपनी विदेश नीति के हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहा है। सरकारों के बीच समझौते महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन दीर्घकालिक साझेदारी के लिए जनता के बीच विश्वास और सांस्कृतिक जुड़ाव उससे भी ज्यादा जरूरी है।

बहरहाल, बिश्केक में मोदी की इन द्विपक्षीय मुलाकातों का बड़ा संदेश साफ है कि भारत एक साथ कई मोर्चों पर खेल रहा है। रूस के साथ द्विपक्षीय संबंधों के विभिन्न आयामों को और विस्तार देने की बात हो, ईरान के साथ पश्चिम एशिया की सुरक्षा मुद्दे पर चर्चा हो, आर्मेनिया के साथ दक्षिण काकेशस में रणनीतिक सहयोग बढ़ाना हो और किर्गिज़स्तान के साथ मध्य एशिया में साझेदारी को नई ऊँचाई देनी हो, नई दिल्ली ने SCO के मंच को केवल सम्मेलन तक सीमित नहीं रहने दिया बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने में भी इस अवसर का उपयोग किया। कुल मिलाकर, भारत ने बिश्केक में अपने हितों की ऐसी कूटनीतिक बिसात बिछाई, जिसका असर पश्चिम एशिया से लेकर मध्य एशिया और दक्षिण काकेशस तक दिखाई देगा।

-नीरज कुमार दुबे

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