Ultra Processed Foods पर विशेषज्ञों में मतभेद, शोध में सामने आए मिले-जुले नतीजे

अति-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के सेहत पर पड़ने वाले असर को लेकर वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों के बीच राय बंटी हुई है। अध्ययनों में सोडा और प्रसंस्कृत मांस को गंभीर बीमारियों से जुड़ा पाया गया, जबकि कुछ अन्य प्रसंस्कृत उत्पादों का सेवन कम जोखिम दिखाता है। पोषण विशेषज्ञ जहां घटकों के असंतुलन पर सवाल उठा रहे हैं, वहीं नीति निर्माता सख्त नियमों की मांग कर रहे हैं।
(गैरेट एम. ब्रॉड, रोवन विश्वविद्यालय) ग्लासबोरो (अमेरिका), 20 अक्टूबर (द कन्वरसेशन) अति-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ को लोग ज्यादा अच्छा नहीं मानते हैं। कई अध्ययनों में इन्हें कई तरह की दीर्घकालिक बीमारियों से जोड़ा गया है। पत्रकार और स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों कवर करने वाले कई सोशल मीडिया इन्फुलएंशर इन्हें जहर तक बताते हैं। जनस्वास्थ्य के कुछ विशेषज्ञ इनके उत्पादन और उपभोग पर दुनिया भर में पूरी तरह रोक लगाने की मांग करते हैं। लेकिन अति-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ को लेकर जारी बहस उतनी सुलझी हुई नहीं है, जितनी पहली नजर में दिखाई देती है। एक शोधकर्ता के तौर पर मैं स्वस्थ और टिकाऊ खाद्य व्यवस्था के लिए होने वाले सामाजिक आंदोलनों का अध्ययन करता हूं। इस दौरान मैं प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के इतिहास का दस्तावेजीकरण करने के साथ-साथ अति-प्रसंस्कृत के विज्ञान और राजनीति से जुड़े विभिन्न मतों की भी पड़ताल करता रहा हूं। साधारण शब्दों में कहें तो अति-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ बड़े पैमाने पर औद्योगिक तरीके से तैयार किए जाने वाले खाद्य उत्पाद हैं। इन्हें बनाने में ऐसे घटकों का इस्तेमाल होता है, जो आमतौर पर घरों की रसोई में नहीं मिलते। इनमें अपने मूल स्वरूप में मौजूद साबुत खाद्य पदार्थ बहुत कम मात्रा में होते हैं या बिल्कुल नहीं होते।
खाद्य प्रसंस्करण का संक्षिप्त इतिहास इंसान अपने पूरे इतिहास में खाद्य पदार्थों का प्रसंस्करण करता आया है। यानी फसलों और जानवरों से प्राप्त चीजों को खाद्य सामग्री और उत्पादों में बदलता रहा है। इतिहासकार आमतौर पर खाना पकाने को खाद्य प्रसंस्करण का सबसे शुरुआती रूप मानते हैं। इसकी शुरुआत करीब 20 लाख साल पहले तक मानी जाती है। इसके बाद हजारों वर्षों के दौरान इंसानों ने खाद्य पदार्थों को पीसने, सेंकने, किण्वित करने, सुखाने और दबाकर उनका रस या तेल निकालने जैसी पारंपरिक विधियां विकसित कीं और उन्हें बेहतर बनाया। 18वीं सदी के मध्य से शुरू हुए औद्योगिक युग में खाद्य प्रसंस्करण के नए तरीके सामने आए। डिब्बाबंद खाद्य पदार्थ तैयार करना, पाश्चुरीकरण और प्रशीतन यानी ठंडा करके सुरक्षित रखने की तकनीकें ऐसे प्रमुख नवाचार थे, जिन्होंने न केवल लोगों के खानपान, बल्कि पूरे समाज को बदल दिया। उस दौर से पहले लगभग सभी खाद्य पदार्थ स्थानीय स्तर पर ही पैदा होते थे। यानी वे लोगों के घरों से कुछ मील के दायरे में उगाए या तैयार किए जाते थे। खराब होने से बचाने के लिए लोग ताजा खाद्य पदार्थों का जल्द इस्तेमाल कर लेते थे। खाद्य प्रसंस्करण से खाद्य पदार्थों को अधिक सुरक्षित बनाने, उन्हें लंबे समय तक इस्तेमाल योग्य रखने, गुणवत्ता सुधारने और स्वाद बढ़ाने की उम्मीद जगी। इसके साथ ही खाद्य पदार्थों को इस्तेमाल करना अधिक सुविधाजनक हुआ और उनकी पौष्टिकता में सुधार की संभावनाएं भी पैदा हुईं। क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति शृंखलाओं के विस्तार के साथ दुनिया में शहरीकरण बढ़ा। आधुनिक खाद्य व्यवस्था के विकास ने दूर-दराज के इलाकों में खेती करने वाले किसानों को खुदरा विक्रेताओं और उपभोक्ताओं से जोड़ दिया। 20वीं सदी के मध्य से लेकर 21वीं सदी तक खाद्य निर्माताओं ने प्रसंस्करण की पुरानी विधियों में कई जटिल तकनीकी नवाचार जोड़े। इससे बड़े पैमाने पर बाजार के लिए खाद्य पदार्थों को एक समान गुणवत्ता में तैयार करना संभव हुआ और उपभोक्ताओं के लिए उनका इस्तेमाल अधिक सुविधाजनक बन गया।
खाद्य प्रसंस्करण और एनओवीए वर्गीकरण स्वस्थ खानपान की वकालत करने वाले कुछ लोगों ने 2000 के दशक के मध्य तक यह तर्क देना शुरू कर दिया कि खानपान से जुड़ी दीर्घकालिक बीमारियों की वजह केवल खाद्य पदार्थों में मौजूद कुछ नुकसानदेह तत्व नहीं हैं। उनके मुताबिक, खाद्य पदार्थों को किस तरह और किस हद तक प्रसंस्कृत किया जाता है, यह भी इन बीमारियों की एक अहम वजह हो सकती है। ब्राजील के महामारी विज्ञानी कार्लोस मोंटेइरो ने 2009 में अपने शोध के दौरान ‘अति-प्रसंस्कृरण’ शब्द गढ़ा। यह शोध उनके और उनके सहयोगियों द्वारा विकसित ‘एनओवीए’ वर्गीकरण से जुड़ा था। एनओवीए प्रणाली खाद्य पदार्थों को उनके प्रसंस्करण के स्तर के आधार पर चार श्रेणियों में बांटती है। एनओवीए की पहली श्रेणी में ऐसे असंसाधित या बहुत कम प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ आते हैं, जो पौधों या जानवरों से प्राप्त होते हैं और अपने प्राकृतिक स्वरूप के करीब होते हैं। इनमें कोई अतिरिक्त पदार्थ नहीं मिलाया जाता। दूसरी श्रेणी में खाना पकाने में इस्तेमाल होने वाली प्रसंस्कृत सामग्री शामिल है। ये ऐसे उत्पाद होते हैं, जो पहली श्रेणी के खाद्य पदार्थों से दबाने, पीसने या इसी तरह की प्रक्रियाओं के जरिये तैयार किए जाते हैं। तीसरी श्रेणी में ऐसे प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ आते हैं, जिन्हें पहली और दूसरी श्रेणी की चीजों को मिलाकर पारंपरिक तरीकों से बनाया जाता है। इनमें सेंकना, उबालना और डिब्बाबंद करना जैसी विधियां शामिल हैं। चौथी श्रेणी में अति-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ आते हैं। इन्हें अक्सर ऐसे औद्योगिक खाद्य उत्पादों के रूप में परिभाषित किया जाता है, जिन्हें घर पर तैयार नहीं किया जा सकता। अति-प्रंसस्करण के उदाहरणों में साबुत खाद्य पदार्थों को अलग-अलग घटकों में बांटना, रासायनिक प्रक्रियाओं से खाद्य उत्पाद तैयार करना और खाद्य पदार्थों का रंग-रूप आकर्षक बनाने के लिए कृत्रिम रंग जैसे पदार्थ मिलाना शामिल है।
विज्ञान के कई सवाल अब भी अनसुलझे एनओवीए वर्गीकरण सामने आने के बाद से शोधकर्ता यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या खाद्य प्रसंस्करण का स्तर यह समझने में मदद कर सकता है कि कुछ खाद्य पदार्थ लोगों के स्वास्थ्य को किस तरह प्रभावित करते हैं। इस विषय पर हुए ज्यादातर शोध में अति-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के सेवन और स्वास्थ्य समस्याओं के बीच संबंधों का अध्ययन किया गया है। इन अध्ययनों से एक नतीजा लगातार सामने आया है-जो लोग ज्यादा अति-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ खाते हैं, उनमें कई दीर्घकालिक बीमारियों और समय से पहले मृत्यु का खतरा अधिक होता है। हालांकि, यह निष्कर्ष भी उतना सीधा नहीं है, जितना दिखाई देता है। अध्ययनों से पता चलता है कि अति-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की कुछ श्रेणियां, जैसे सोडा व मीठे पेय और ‘डेली मीट’ जैसे प्रसंस्कृत मांस उत्पाद, हृदय रोग और स्ट्रोक सहित स्वास्थ्य संबंधी प्रतिकूल नतीजों से लगातार जुड़े पाए गए हैं। लेकिन दूसरी ओर, कुछ अन्य अति-प्रंसस्कृत उत्पादों, जैसे ब्रेड, पुराना अनाज, योगर्ट और यहां तक कि नमकीन स्नैक्स जैसे कुछ अति-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का सेवन इन स्वास्थ्य समस्याओं के कम जोखिम से जुड़ा पाया गया है।
परिभाषा तय करना भी आसान नहीं खाद्य विज्ञान के कुछ शोधकर्ताओं को इन अध्ययनों के मिले-जुले नतीजों पर हैरानी नहीं होती। उनका तर्क है कि ‘अति-प्रसंस्कृत’ की परिभाषा अस्पष्ट है और इसे तय करने में अक्सर व्यक्तिगत राय की भूमिका होती है। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति घर पर केक बनाता है तो एनएवीओ वर्गीकरण के तहत उसे तीसरी श्रेणी का प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ माना जाएगा। लेकिन यदि बिल्कुल वैसा ही केक किसी कारखाने में प्रिजर्वटिव का इस्तेमाल करके बनाया जाए, फिर उसकी पैकेजिंग करके उसे किराना दुकान में बेचा जाए, तो वह नोवा की चौथी श्रेणी यानी अति-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ बन जाएगा। ऐसा तब भी होगा, जब दोनों केक के पोषण संबंधी गुण बिल्कुल एक जैसे हों। बुनियादी तौर पर, पोषण विज्ञान के कई विशेषज्ञ अब भी इस बात से सहमत नहीं हैं कि केवल प्रसंस्करण के स्तर से यह समझाया जा सकता है कि कुछ खाद्य पदार्थ खराब स्वास्थ्य से क्यों जुड़े होते हैं। इसके बजाय, उनका जोर इस बात पर है कि नुकसानदेह माने जाने वाले अति-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों में अक्सर पोषक तत्वों का संतुलन ठीक नहीं होता। उनमें ऐसी दूसरी विशेषताएं भी होती हैं, जिनके कारण लोग जरूरत से ज्यादा खा लेते हैं।
खाद्य प्रसंस्करण बनाम पोषक तत्व दूसरी ओर, खाद्य नीति और जनस्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने वाले कई शोधकर्ताओं का मानना है कि अति-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की प्रचलित परिभाषा पर्याप्त रूप से स्पष्ट है। खासकर तब, जब सेहतमंद अति-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों को इसके दायरे से बाहर रखने की गुंजाइश हो। वे यह भी ध्यान दिलाते हैं कि अति-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के कई समर्थकों के खाद्य उद्योग से संबंध हैं। उनका कहना है कि अब तक उपलब्ध साक्ष्य इतने मजबूत हैं कि इस दिशा में तत्काल नीतिगत कदम उठाए जाने चाहिए। इसमें अति-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के उत्पादन, खरीद और विपणन के तरीकों में बदलाव करना भी शामिल है। इन खाद्य पदार्थों को नियंत्रित करने के समर्थकों का तर्क है कि इससे केवल जनस्वास्थ्य को ही लाभ नहीं होगा। खाद्य संस्कृति, कारोबार और पर्यावरण को होने वाले नुकसान पर अंकुश लगाने में भी मदद मिल सकती है।
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