Emotional Intelligence में महिलाएं पुरुषों से आगे, 76 देशों के अध्ययन में सामने आया सच

यूनिवर्सिटी ऑफ लिमरिक और यूनिवर्सिटी ऑफ ज्यूरिख के शोधकर्ताओं ने 76 देशों के छह लाख से अधिक लोगों से जुड़े आंकड़ों का विश्लेषण किया। इस अध्ययन के अनुसार महिलाएं दूसरों की भावनाओं को समझने में औसतन अधिक कुशल हैं। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि यह कोई स्थायी जैविक गुण नहीं बल्कि अभ्यास से विकसित होने वाला कौशल है।
(मैरी एम. हॉसफेल्ड, यूनिवर्सिटी ऑफ लिमरिक और जे मेंगेस, यूनिवर्सिटी ऑफ ज्यूरिख) ज्यूरिख, 11 अक्टूबर (द कन्वरसेशन) जब आप किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में सोचते हैं, जो भावनात्मक रूप से समझदार हो, तो आपके मन में किसकी छवि उभरती है? कोई ऐसा व्यक्ति जो माहौल को समझ सके, किसी बहस को शांत कर सके और यह अच्छी तरह जानता हो कि मुश्किल दौर से गुजर रहे किसी दोस्त से क्या कहना चाहिए। बहुत से लोगों के मन में ऐसे व्यक्ति की छवि एक महिला की होती है।
यह धारणा इतनी व्यापक रूप से प्रचलित है कि मनोविज्ञान भी इसे एक तथ्य के रूप में प्रस्तुत करता है। हमने इस धारणा को परखने का फैसला किया। हमारे नये अध्ययन में 1995 से 2023 तक, लगभग तीन दशकों के शोध की समीक्षा की गई।
इस अध्ययन में 76 देशों के छह लाख से अधिक लोगों से जुड़े शोध शामिल थे। हम एक सरल सवाल का जवाब जानना चाहते थे: क्या महिलाएं वास्तव में पुरुषों की तुलना में अधिक भावनात्मक रूप से बुद्धिमान होती हैं? इसका छोटा सा जवाब है—हां, औसतन महिलाएं इस मामले में अधिक अंक प्राप्त करती हैं।
लेकिन इससे भी अधिक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि महिलाएं भावनात्मक बुद्धिमत्ता के किस प्रकार में बेहतर प्रदर्शन करती दिखाई देती हैं और इस क्षमता को रखने वाले लोगों को इसकी संभावित कीमत क्या चुकानी पड़ती है। भावनात्मक समझ वह क्षमता है, जिसके जरिए व्यक्ति अपनी और दूसरों की भावनाओं को पहचानता है, समझता है और उन्हें नियंत्रित करता है। जब हमने भावनात्मक समझ के प्रत्येक पहलू का अध्ययन किया, तो पता चला कि महिलाओं की बढ़त मुख्य रूप से इसके उस हिस्से में केंद्रित थी, जो दूसरों की भावनाओं को समझने से संबंधित है।
इसका अर्थ है यह पहचानना कि कोई दूसरा व्यक्ति क्या महसूस कर रहा है, यह समझना कि वह ऐसा क्यों महसूस कर रहा है और उसकी भावनाओं को समझने में उसकी मदद करना। उदाहरण के लिए, कोई बच्चा अचानक अपना आपा खो देता है, किसी बैठक में अपने विचार को खारिज किए जाने के बाद कोई सहकर्मी चुप हो जाता है या बातचीत के दौरान किसी समझौते को लेकर तनाव बढ़ जाता है। बहुत-से पुरुष भी इस मामले में बेहद कुशल होते हैं, और बहुत-सी महिलाएं ऐसी नहीं होतीं।
क्या यह अंतर केवल जैविक कारणों से है? हम जैविक या हार्मोन संबंधी कारकों की भूमिका को पूरी तरह खारिज नहीं कर सकते। लेकिन हमारे आंकड़ों में दो ऐसी प्रवृत्तियां सामने आईं, जो किसी दूसरी दिशा की ओर संकेत करती हैं।
पहला, बच्चों में महिलाओं की बढ़त, वयस्कों की तुलना में बहुत कम है। दूसरा, हमारे आंकड़ों में शामिल तीन दशकों के दौरान यह अंतर लगातार कम होता गया है। यदि यह अंतर जन्म से ही निर्धारित किसी स्थायी विशेषता के कारण होता, तो हम इस तरह के बदलाव की उम्मीद नहीं करते।
हमारे अध्ययन के आंकड़े यह नहीं बता सकते कि ये अंतर किन सटीक कारणों से उत्पन्न होते हैं, लेकिन यह प्रवृत्ति उस स्थिति से मेल खाती है, जिसकी हम किसी ऐसी क्षमता के मामले में अपेक्षा करते हैं, जो कवायद के माध्यम से विकसित होती है। इस कवायद का एक संभावित स्रोत भी है। अन्य शोधों में पाया गया है कि माता-पिता बेटों की तुलना में बेटियों के साथ भावनाओं को व्यक्त करने वाले शब्दों की अधिक विविधता का इस्तेमाल करते हैं।
इसके अलावा, वे लड़कों की तुलना में लड़कियों को अपनी भावनाओं पर विचार करने और उन्हें शब्दों में व्यक्त करने के लिए अधिक प्रोत्साहित करते हैं। वहीं, लड़कों को अक्सर अपनी भावनाओं को दबाकर उन्हें नियंत्रित करना सिखाया जाता है। इसके विपरीत, उनकी बहनों को दूसरों के साथ बातचीत करके और अपनी भावनाओं को साझा करके उनसे निपटने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
यह ठीक उसी तरह का सामाजिक और भावनात्मक कौशल है, जिसमें हमारे आंकड़ों के अनुसार महिलाएं बेहतर प्रदर्शन करती हैं। सरल शब्दों में कहें तो, ऐसा लगता है कि लड़कियों को जीवन के शुरुआती दौर से ही दूसरों की भावनाओं को समझने और उनके प्रति उचित प्रतिक्रिया देने की अधिक सीख मिलती है। किसी भी ऐसे कौशल की तरह, जिसे बार-बार अभ्यास करके विकसित किया जाता है—चाहे वह कोई नयी सीखना हो या कोई नया वाद्ययंत्र बजाना—जितना अधिक आप अभ्यास करते हैं, वह कौशल उतना ही सहज और स्वाभाविक होता जाता है।
वास्तव में, 2019 में किये गये 58 अध्ययनों के एक मेटा-विश्लेषण में पाया गया कि भावनात्मक समझ को प्रशिक्षण के माध्यम से विकसित किया जा सकता है। यह अच्छी खबर है। यदि भावनात्मक समझ कोई स्थायी विशेषता होने के बजाय एक ऐसा कौशल है, जिसे प्रशिक्षण के माध्यम से विकसित किया जा सकता है, तो महिलाओं और पुरुषों के बीच का यह अंतर कोई नियति नहीं है।
इसका मतलब है कि पुरुष भी इन कौशलों को सीखकर लाभ उठा सकते हैं। लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है, जो थोड़ा असहज करने वाला है। यदि इस क्षेत्र में महिलाओं की बढ़त को एक कौशल के रूप में पहचानने के बजाय इसे “महिलाओं का स्वभाव” मान लिया जाता है, तो इस कौशल को महिलाओं की स्वाभाविक विशेषता समझकर इसे हल्के में लेना और इसकी अहमियत को नजरअंदाज करना बहुत आसान हो जाता है।
तनावपूर्ण स्थिति को शांत करने में कुशल सहकर्मी से ही हर बार ऐसा करने की अपेक्षा की जाने लगती है। हमारे अध्ययन के निष्कर्षों के आधार पर दो व्यावहारिक बदलाव किए जाने चाहिए। पहला, नियोक्ताओं को इस तरह के काम को स्पष्ट रूप से पहचानना चाहिए और कर्मचारियों के प्रदर्शन के मूल्यांकन तथा पदोन्नति संबंधी निर्णयों में इसके लिए उचित मान्यता और पुरस्कार देना चाहिए।
दूसरा, सभी कर्मचारियों में इन क्षमताओं को विकसित करने के लिए निवेश करना चाहिए। हमने जो काम नहीं किया है, वह है बाकी सभी लोगों को भी इस कौशल का अभ्यास करने का समान अवसर या प्रोत्साहन देना। साथ ही, हमने यह भी स्पष्ट नहीं किया है कि भावनात्मक समझ एक ऐसा कौशल है, जिसे विकसित करना वास्तव में महत्वपूर्ण और लाभदायक है।
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