क्या है देवस्थानम बोर्ड की कहानी, कैसे शुरू हुआ था विवाद और सरकार को क्यों भंग करना पड़ा?

क्या है देवस्थानम बोर्ड की कहानी, कैसे शुरू हुआ था विवाद और सरकार को क्यों भंग करना पड़ा?

जिस दिन देवस्थानम बोर्ड का गठन किया गया था उस दिन ही कांग्रेस ने विधानसभा में और नेताओं ने बाहर इसका विरोध किया और कहा कि ये हमारी परंपरा और संस्कृति के खिलाफ़ है। जबकि नई नवेली आम आदमी पार्टी उत्तराखंड को अध्यात्मिक राजधानी बनाने का वादा कर साधु-संतों को अपनी तरफ रिझाने के प्रयास में है।

चुनावी बिगुल बजते ही उत्तराखंड में साधु-संतों की घंटी की गूंज सरकार के कानों तक पहुंच चुकी है। क्योंकि सरकार अपने दो साल पुराने फैसले को पलटने को मजबूर हो गई है। साधु संतों के भारी विरोध के बाद धामी सरकार ने देवस्थानम बोर्ड को भंग करने का ऐलान किया है। चुनाव से पहले देवस्थानम बोर्ड चुनावी मुद्दा बनता जा रहा था। चुनावी समय में साधु-संतों की नाराजगी विरोधी दलों के लिए वोट वाला आशीर्वाद न बन जाए इसलिए बीजेपी की धामी सरकार ने देवस्थानम बोर्ड को ठंडे बस्ते में डालने का निर्णय लिया। वहीं कांग्रेस  तो पहले से ही इस बोर्ड का विरोध करती रही है। फैसले के बाद कांग्रेस नेता हरीश रावत ने कहा कि ये फैसला आने वाले चुनाव में हार से भयभीत सरकार का फैसला है। जिस दिन देवस्थानम बोर्ड का गठन किया गया था उस दिन ही कांग्रेस ने विधानसभा में और नेताओं ने बाहर इसका विरोध किया और कहा कि ये हमारी परंपरा और संस्कृति के खिलाफ़ है। जबकि नई नवेली आम आदमी पार्टी उत्तराखंड को अध्यात्मिक राजधानी बनाने का वादा कर साधु-संतों को अपनी तरफ रिझाने के प्रयास में है। नवंबर 2019 में उत्तराखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के द्वारा लाए उस कानून की जिसे 80 साल पुरानी व्यवस्था पर एक प्रहार के रूप में बताया गया था। आज बात करेंगे देवस्थानम बोर्ड की जिसके तहत उत्तराखंड के चार धामों सहित 51 मंदिरों के रख-रखाव पर संचालन की जिम्मेदारी मुख्यमंत्री के बोर्ड के हाथ में आ गई थी। आज हम बात करेंगे कि क्या है देवस्थानम बोर्ड, इसका पूरा विवाद क्या है और सरकार को क्यों इसे भंग करने की नौबत का आ गई। 

अब बताते हैं कि देवस्थानम बोर्ड क्या है?

कहानी की शुरुआत नवंबर 2019 से होती है। उत्तराखंड विधानसभा द्वारा चारो धामों और अन्य महत्वपूर्ण मंदिरों के संचालन के लिए एक विधेयक विधानसभा में पास किया गया था। इसका पूरा नाम चार धाम देवस्थानम प्रबंधन बोर्ड है। चार धाम यात्रा की व्यवस्था को दुरुस्त करने के मकसद से इसके लाए जाने की बात राज्य सरकार की ओर से कही गई। श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधा मिले। इस लक्ष्य के साथ इसका गठन किया गया। साल 2020 में ये पूरी तरह से अस्तित्व में आया था। ये देवस्थानम एक्ट था जिसके दायरे में चारधाम बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री व इनसे जुड़े 43 मंदिरों समेत कुल 51 प्रमुख मंदिरों को बोर्ड के अंदर रखा गया। जिसके तहत मंदिरों के चढावे पर पूर्ण हक-हकूक इस बोर्ड का होगा। सामाजिक कार्य, चारधाम विकास यात्रा और यात्रियों को दी जाने वाली हर सुविधा पर पूर्ण नियंत्रण इस बोर्ड का होगा। जिसका मुखिया स्वयं मुख्यमंत्री होगा। 27 नवंबर 2019 को त्रिवेंद्र सरकार ने कैबिनेट से उत्तराखंड चारधाम देवस्थानम प्रबंधन अधिनियम 2019 बोर्ड को मंजूरी दी। 5 दिसंबर 2019 में विदानसभा से विधेयक पास हो गया और सरकार की तरफ से देवस्थानम बोर्ड को 14 जनवरी 2020 को राजभवन से मंजूरी भी मिल गई। 

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राज्य सरकार ने अपने हाथ में लिया पूरा कंट्रोल 

24 फरवरी 2020 को देवस्थानम बोर्ड के सीईओ की नियुक्ति कर राज्य सरकार ने सभी प्रमुख मंदिरों का पूरा कंट्रोल अपने हाथ में ले लिया। बोर्ड के अध्यक्ष मुख्यमंत्री और धर्मस्व व संस्कृति मंत्री इसके उपाध्यक्ष बनाए गए। गढ़वाल मंडलायुक्त रविनाथ रमन को बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी का पद सौंपा गया। मुख्य सचिव समेत कई नौकरशाह इसके सदस्य बनाए गए। टिहरी रियासत के राजपरिवार का एक सदस्य, हिंदू धर्म मानने वाले तीन सांसद और छह विधायक इसमें बतौर सदस्य नामित करने का प्रविधान किया गया। इसके अतिरिक्त चार दानदाता, हिंदू धर्म के धार्मिक मामलों का अनुभव रखने वाले व्यक्तियों, पुजारी और वंशानुगत पुजारियों के तीन प्रतिनिधियों को भी बोर्ड में जगह दी गई। 

साधु-सतों की नाराजगी 

उत्तराखंड देवस्थानम बोर्ड के गठन के बाद से ही साधु संतों में भारी नाराजगी देखने को मिली।  अब आप सोच रहे होंगे सबकुछ तो ठीक-ठाक है इसमें दिक्कत कहां है, तो बता दें कि दिक्कत मंदिरों के पुराने मालिक यानी समितियों को आई। जिनका इस एक्ट के माध्यम से मंदिर पर चढ़ावे का हक समाप्त हो गया। मंदिर का पक्ष था कि ये सभी विकास कार्य जो सरकार करने की बात कह रही है वही समितिय़ां भी करती थी। बस इसमें थोड़ा सुधार की गुंजाइश थी जिसे दूर करने का प्रयास किया जा रहा था। तीर्थ पुरोहितों ने दिल्ली में बीजेपी के अनिल बलूनी से मुलाकात की थी। केदारनाथ धाम के पुरोहितों ने पीएम मोदी को पत्र लिखा। विवाद बढ़ने पर सीएम की पुरोहितों से मुलाकात हुई 30 तारीख तक का समय भी दिया गया। 

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तीर्थ पुरोहितों की 30 नवंबर थी डेडलाइन

सरकार से 30 नवंबर तक देवस्थानम बोर्ड को भंग करने की डेडलाइन तय की थी। तीर्थ पुरोहितों ने 30 नवम्बर तक फैसला न होने पर मोदी की रैली और शीतकालीन सत्र के विरोध का निर्णय लिया गया है। चारधाम तीर्थ पुरोहित महापंचायत ने 30 नवंबर के बाद आंदोलन तेज करने का ऐलना किया था। तीन दिसंबर को रुद्रप्रयाग में विरोध प्रदर्शन किया जाएगा। चार दिसंबर को देहरादून में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की होने वाली रैली का विरोध किया जाएगा। इसके लिए विरोध रैली निकाली जाएगी। महापंचायत ने देवस्थानम बोर्ड के खिलाफ सरकार की घेरेबंदी तेज कर दी है।

भारी विरोध के कारण केदारनाथ धाम में दर्शन नहीं कर पाए रावत

श्री केदारनाथ धाम में दर्शन को पहुंचे पूर्व सीएम त्रिवेंद्र रावत का तीर्थ पुरोहितों ने भारी विरोध किया। भारी विरोध के कारण वे दर्शन नहीं कर पाए। त्रिवेंद्र बिना दर्शन के ही वापस लौट गए। जबकि भाजपा अध्यक्ष मदन कौशिक और कैबिनेट मंत्री धन सिंह रावत ने विरोध के बीच दर्शन किए। श्री केदारनाथ धाम में मंगलवार को दर्शन को पहुंचे पूर्व सीएम त्रिवेंद्र रावत का तीर्थ पुरोहितों ने करीब दो घंटे विरोध किया। काले झंडे दिखाए गए। जमकर नारेबाजी की गई। इस दौरान कुछ समय बाद पूर्व सीएम के साथ भाजपा अध्यक्ष मदन कौशिक और कैबिनेट मंत्री धन सिंह रावत का भी विरोध किया गया। भारी विरोध को देखते हुए त्रिवेंद्र रावत बिना दर्शन कर ही लौट गए। दूसरी ओर भाजपा अध्यक्ष मदन कौशिक और कैबिनेट मंत्री धन सिंह रावत ने तीर्थ पुरोहितों को आश्वस्त किया कि सरकार उनके साथ है। उनकी मांगों का निस्तारण किया जा रहा है। सरकार इस दिशा में प्रयासरत है। इसके बाद ही दोनों लोग बाबा केदारनाथ के दर्शन कर पाए।

सुब्रमण्यम स्वामी ने सुप्रीम कोर्ट में दायर की याचिका  

सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा है कि क्या वजह है कि हमारे सेक्युलर देश में केवल मंदिर ही सरकार के नियंत्रण में हैं, जबकि मस्जिद और अन्य धार्मिक स्थान नहीं। स्वामी ने इसी साल 21 जुलाई को उत्तराखंड हाईकोर्ट में याचिका दायर कर प्रदेश सरकार के चार धाम देवस्थानम मैनेजमेंट बोर्ड बनाने के फैसले को चुनौती दी थी। हालांकि सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका उत्तराखंड हाईकोर्ट ने खारिज कर दी थी। स्वामी ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए अक्टूबर महीने में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।  

सरकार ने गठित की कमेटी 

उत्तराखंड में देवस्थानम बोर्ड को लेकर तीर्थ पुरोहितों के चल रहे विरोध को दूर किए जाने के लिए अगस्त के महीने में हाईपॉवर कमेटी का गठन किया गया। इस कमेटी का अध्यक्ष भाजपा के वरिष्ठ नेता मनोहर कांत ध्यानी के बनाया गया। इस कमेटी को तीर्थ पुरोहितों की आपत्तियों की सुनवाई कर अपनी रिपोर्ट देनी थी। समिति की ओर से पंडा, पुरोहितों और हक हकूकधारियों से देवस्थानम बोर्ड को लेकर रिपोर्ट बनाई गई है। जिसके बाद देवस्थानम बोर्ड को लेकर प्रदेश सरकार की ओर से पूर्व राज्य सभा सांसद मनोहरकांत ध्यानी की अध्यक्षता में बनाई गई उच्चस्तरीय समिति ने 28 नवंबर को ऋषिकेश में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज को 89 पेजों की रिपोर्ट बनाकर सौंप दी। मनोहरकांत ध्यानी कमेटी की रिपोर्ट के अध्ययन के लिए मुख्यमंत्री धामी ने महाराज की अध्यक्षता में सब कमेटी बनाई गई थी। कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल और यतीश्वरानंद को भी कमेटी का सदस्य बनाया गया। सब कमेटी ने कुछ ही घंटों में सिफारिश सीएम को सौंप दी थी । मंत्री सतपाल महाराज ने बताया कि पंडा, पुरोहितों और पुजारियों के हितों का पूरा ख्याल रखा है। उधर, सीएम ने कहा कि एक-दो दिन में इस संदर्भ में निर्णय ले लिया जाएगा।

यह होगा अगला कदम

उत्तराखंड चार धाम देवस्थानम अधिनियम को वापस लेने के लिए सरकार विधानसभा में विधेयक पेश करेगी। आगामी विधानसभा सत्र नौ और 10 दिसंबर को होना है। माना जा रहा है विधानसभा के शीत सत्र में देवस्थानम अधिनियम को वापस लिया जाएगा। वर्ष विजयादशमी पर संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अपने वार्षिक संबोधन में यह मुद्दा प्रमुखता से उठाते हुए कुछ ऐसे उदाहरण भी देश के समक्ष रखे थे जहां मंदिर प्रबंधन ही सुचारू रूप से उस धर्मस्थल का संचालन कर रहे हैं। यही नहीं हाल ही में कर्नाटक के धारावाड़ में संपन्न संघ की अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक में राष्ट्रीय स्तर पर एक रणनीति बनाने की बजाय राज्यों की स्थिति के अनुसार स्थानीय स्तर पर मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कराने की रणनीति बनायी गयी। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि हर राज्य की परिस्थितियां अलग-अलग हैं जैसे दक्षिण के राज्यों में मंदिर पूर्णतः सरकारी नियंत्रण में हैं तो किसी राज्य में मंदिरों का प्रबंधन ट्रस्ट कर रहे हैं तो कहीं पर मंदिरों का प्रबंधन निजी क्षेत्र कर रहा है। 

-अभिनय आकाश 






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