पासवान ने सदन में चांदनी चौक या CP में फरियाने की दी चुनौती, प्लेन क्रैश वाली साइट पर दोबारा क्यों गईं इंदिरा? जानें संजय गांधी से जुड़े अनसुने किस्से

पासवान ने सदन में चांदनी चौक या CP में फरियाने की दी चुनौती, प्लेन क्रैश वाली साइट पर दोबारा क्यों गईं इंदिरा? जानें संजय गांधी से जुड़े अनसुने किस्से

सभी अपने-अपने ढंग से संजय को याद करते हैं। विरोधी दलों के लिए वह इमरजेंसी के खलनायक हैं लेकिन संजय अकेले शख़्स थे जो इंदिरा के साथ 1977 की हार के बाद भी मजबूती के साथ खड़े थे। कहा तो ये भी जाता है कि अगर संजय नहीं होते तो 1980 में उनकी राजनीतिक वापसी कभी नहीं हो सकती थी।

एक लड़का जब 23 साल का था तो अपनी मां से एक आइडिया शेयर करते हुए कहा कि मैं पहली जनता कार बनाउंगा। मां ने उसके लिए कार निर्माण के लिए सरकारी कंपनी के गठन का प्रस्ताव रख दिया और मारुति मोटर्स लिमिटेड कंपनी अस्तित्व में आई। जब 28 का हुआ तो अपनी मां से कहा मैं इस देश की सारी समस्याओं का हल निकाल दूंगा। तमाम मंत्री और मुख्यमंत्री उसके सामने हाथ बांधे खड़े नजर आए। देखते ही देखते वह लड़का महज 33 साल की उम्र में ही सत्ता और सियासत की वो धुरी बन गया, जहां कहते हैं कि कैबिनेट भी बौना पड़ जाता था। उस नेता के बारे में कहा जाता था कि उसे उड़ना बहुत पसंद था। सियासत ही नहीं, हवा में भी। उसे जोखिम का इतना शौक था कि चप्पल पहनकर ही प्लेन उड़ाने लग जाया करता था। लेकिन 1980 में भरी एक उड़ान उसकी आखिरी उड़ान साबित होती है। इस हादसे को गुजरे 41 बरस हो गए हैं। लेकिन अब भी उस शख्स, उसकी सियासत और यहां तक की उसकी मौत के सैकड़ों किस्से और कहानियां कहे जाते हैं। हम बात कर रहे हैं इंदिरा गांधी के छोटे बेटे और सत्तर के दशक में गांधी परिवार के राजनीतिक वारिश संजय गांधी की। कई विवादों के बाद भी लोकप्रिय नेताओं में से एक संजय गांधी की पुण्यतिथि है। वरुण गांधी ने आज सुबह शान्ति वन पहुंचकर संजय गांधी को श्रद्धांजलि अर्पित की।  जिसकी तस्वीर ट्विटर के माध्यम से वरुण ने पोस्ट की।

शुरुआती जीवन, जनता कार और पीएन हक्सर पर इस तरह फूटा आक्रोश

संजय गांधी का जन्म 14 दिसम्बर 1946 को दिल्ली (भारत) में हुआ था। इनका जन्म देश के सबसे बड़े राजनीतिक घराने नेहरू गाँधी परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम फिरोज गांधी और माता का नाम इंदिरा गांधी था। ये अपने माता पिता की संतानो में से सबसे छोटे थे इनके बड़े भाई का नाम राजीव गांधी था। अपने बड़े भाई राजीव गांधी की तरह, संजय की शिक्षा भी सेंट कोलंबा , दिल्ली, और फिर वेल्हम बॉयज़ स्कूल, देहरादून में हुई थी। और इससे आगे की शिक्षा भी इकोले डी"हुमनीटे,स्विट्जरलैंड के एक अंतर्राष्ट्रीय बोर्डिंग स्कूल में हुई थी। संजय ने विश्वविद्यालय में भाग नहीं लिया, लेकिन मोटर वाहन इंजीनियरिंग को एक कैरियर के रूप में लिया। संजय लंदन के पास क्रू स्थित रोल्स रॉयस फैक्टरी में चार साल की एप्रेंटिसशिप कर रहे थे। पीएन हक्सर 1965 में बतौर राजनयिक लंदन में थे। वो उस समय में ब्रिटेन में भारत के डिप्टी कमिश्नर हुआ करते थे। इंदिरा ने उन्हें 21 फरवरी 1966 को एक खत लिखा। उस खत का मजमूव कुछ इस प्रकार से था- संजय क्रू की रॉल्स फैक्ट्री में काम कर रहा है औऱ वहां खुश है। उसने लिखा है कि फैक्ट्री में जो कुछ भी सीखना था वो सब उसने सीख लिया। उसे नहीं लगता कि वो अब कुछ नया उसे सिखाएंगे। इसलिए कोर्स पूरा किया बिना वो साल के आखिर में कोर्स छोड़ खुद का काम जमाने भारत आने के बारे में सोच रहा है। इस वक़्त फैक्ट्री छोड़ने का मतलब होगा कि उसके पास कोई डिग्री नहीं होगी, सिवाय इसके कि उसके पास व्यवहारिक तजुर्बा है। इंदिरा ने कोई रास्ते तलाशने के लिए हक्सर की मदद मांगी।

कांग्रेस नेता जयराम रमेश की किताब 'इंटरवाइंड लाइव्ज पीएन हक्सर एंड इंदिरा गांधी' के मुताबिक इंदिरा के कहने पर पीएन हक्सर ने संजय गांधी से बात की और उन्हें सीधे शब्दों में कोर्स पूरा करने की हिदायत दी। लेकिन मां इंदिरा दोनों की सलाह को नज़रअंदाज़ कर दिया और पढ़ाई बीच में ही छोड़कर भारत लौट आए। इसके बाद 1966 में भारत आने के बाद उन्होंने देश में आम लोगों के लिए कार बनाने का सपना देखना शुरू किया था। यहां तक कि उन्होंने दिल्ली के गुलाबी बाग में एक वर्कशॉप तैयार की थी और यहां उन्होंने कार का बेस फ्रेम भी खुद ही तैयार किया था। इसके बाद अगले दो साल में उन्होंने तीन और प्रोटोटाइप तैयार किए थे। 4 जून 1971 को ‘मारुति मोटर्स लिमिटेड’ नामक एक कंपनी का गठन किया गया था और इसके एमडी के तौर पर संजय गांधी को जिम्मेदारी दी गई थी। हालांकि ‘1971 में पाकिस्तान से युद्ध में जीत और बांग्लादेश की आजादी के बाद सब सरकार के मारूति को कार बनाने के लाइसेंस देने की बात को भूल गए।’ पढ़ाई जारी रखने के लिए लंदन में दी गई हक्सर की सलाह को मन में लगाए संजय अपनी मां को कानूनी परेशानियों में डालने वाली गवाही से पैदा हुए आक्रोश को लिए हक्सर को ठीक वहां चोट करने का मौका ढूढं रहे थे जहां उन्हें सबसे ज्यादा ठेस लगे। 1967 से 1973 तक प्रधानमंत्री के प्रिंसिपल सेक्रेटरी रहे पी एन अक्षर 15 जून 1975 को योजना आयोग के दफ्तर में बैठे अपने काम में व्यस्त थे। उन्हें खबर मिलती है कि उनके चाचा को संजय गांधी के इशारे पर दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। उन पर वित्तीय अनियमितताओं का इल्जाम था। इंदर भाई की कनॉट प्लेस में पंडित ब्रदर्स के नाम से दुकान थी। पी अक्षर ने इस मामले में उनकी मदद करने से इंकार कर दिया। ऐसे में उनकी मदद करने के लिए सामने आए बिहार के नेता डीपी सिंह। इंदर भाई पर इल्जाम था कि उन्होंने अपनी दुकान में चीजों का रेट का ठीक से नहीं दर्शाया है। इस बिनाह पर अक्सर के रिश्तेदारों की गिरफ्तारी हुई थी

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संजय का 5 सूत्री कार्यक्रम और डेढ़ करोड़ लोगों की करा दी नसबंदी

इसके अधिकारिक आंकड़े तो नहीं हैं कि इमरजेंसी के दौरान कितने लोगों की नसबंदी करवाई गई। लेकिन इस मुद्दे पर आस्ट्रेलिया की एक प्रोफेसर मैरिका विरजियानी की किताब में ये कहा गया कि 25 जून 1975 से मार्च 1977 तक भारत में करीब 1 करोड़ 10 लाख पुरूषों और करीब 10 लाख महिलाओं की नसबंदी करवाई गई। संजय गांधी ने इस कार्यक्रम का प्रयोग सबसे पहले दिल्ली में  किया था। जहां इसकी जिम्मेदारी दिल्ली के त्तकालीन उपराज्यपाल किष्ण चंद, उनके सचिव नवीन चावला को मिली। नवीन चावला बाद में यूपीए सरकार के दौरान मुख्य निर्वाचन आयुक्त भी रहे। इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए उस वक्त की एनडीएमसी की अध्यक्ष विद्याबेन शाह के अलावा संजय गांधी की करीबी रही रुकसाना सुल्ताना को भी इस काम के लिए चुना गया। उस वक्त 31 वर्ष की रुकसाना सुल्ताना को संजय गांधी का राईट हैंड कहा जाता था।

रुकसाना की एक पहचान ये भी है कि वो अभिनेत्री अमृता सिंह की मां और सारा अली खान की नानी हैं। सुल्ताना ने दिल्ली में जामा मस्जिद के आसपास संवेदनशील मुस्लिम इलाकों में एक साल में करीब 13 हजार नसबंदियां करवाईं। जगह-जगह पर कैंप लगाए गए। नसबंदी कराने वाले लोगों को 75 रूपए, काम से एक दिन की छुट्टी और एक डब्बा घी दिया जाता था। कहीं-कहीं पर सायकिल भी दी जाती थी। सफाई कर्माचारियों, रिक्शा चलाने वालों और मजदूर वर्ग के लोगों का जबरदस्ती नसबंदी करवाया गया। अप्रैल 1976 में दिल्ली में सभी सरकारी दफ्तरों, स्कूल, कालेज और प्रशासनिक दफ्तरों में एक सर्कुलर भेजा गया और कहा गया कि जिनके दो से ज्यादा बच्चें हैं सभी को नसबंदी करवानी पड़ेगी। अध्यापकों और सरकारी कर्मचारियों को एक टारगेट दे दिया गया था कि एक निर्धारित संख्या के लोगों को कैंप में लेकर आना ही है। यहां तक की नसबंदी के सर्टिफिकेट नहीं दिखाने पर ड्राइविंग लाइसेंस का रिन्यूअल रोक दिया जाता था। इसके अलावा अस्पताल में मुफ्त मेडिकल ट्रिटमेंट से भी इंकार कर दिया जाता था। 

किशोर कुमार को कराया चुप

विद्याचरण शुक्ल ने हुक्म दिया कि पूरी फिल्म इंडस्ट्री इमरजेंसी के पक्ष में कोरस गाएगी। लेकिन यूथ कांग्रेस की रैली में परफॉर्म करने से किशोर कुमार ने इंकार कर दिया। संजय गांधी के खासम-खास शुक्ल ने आदेश दिया कि आकाशवाणी और दूरदर्शन पर किशोर कुमार का कोई भी गाना या कोई भी फिल्म नहीं चलाया जाएगा।

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जलवा दिए फिल्म के प्रिंट 

फ़िल्म 'किस्सा कुर्सी का' जनता पार्टी सांसद अमृत नाहटा ने बनाई थी। फिल्म पर आरोप लगा था कि इसमें इंदिरा गांधी और संजय गांधी के साथ-साथ सरकारी की नीतियों पर भी तंज कसे गए थे। सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने फिल्म के प्रोड्यूसर्स भगवंत देशपांडे, विजय कश्मीरी और बाबा मजगांवकर को 51 आपत्तियों के साथ एक कारण बताओ नोटिस भेजा था। संजय गांधी ने फिल्म के सारे प्रिंट्स सेंसर बोर्ड ऑफिस से मंगवाया और गुड़गांव स्थित मारुति फैक्ट्री में उसके निगेटिव जलाकर नष्ट कर दिया था। बाद में इस मामले की जांच के लिए 1977 में शाह कमीशन गठित किया गया, जिसने संजय गांधी और तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री वीसी शुक्ला को फिल्म के नेगेटिव नष्ट करने का दोषी पाया था। फिल्म के प्रिंट जलाने के आरोप के बाद संजय गांधी और वीसी शुक्ला पर 11 महीने तक केस चला। 27 फरवरी 1979 को कोर्ट का फैसला आया। दोनों को 25 महीने की जेल की सजा सुनाई गई। संजय गांधी को जमानत देने से मना कर दिया गया। हालांकि बाद में यह फैसला बदल दिया गया। इमरजेंसी हटने के बाद डायरेक्टर ने 1977 में दोबारा फिल्म बनाई।

संजय से बोले पासवान- कहां फ़रियाओगे चलो चलते हैं

यह 1980 का साल था और संसद का बजट सत्र चल रहा था। नए-नए सांसद बनकर आए संजय गांधी ने संसद में एकमुद्दे पर रामविलास पासवान को कुछ कह दिया। जवाब में पासवान के बोल नहीं सभी को हैरान कर दिया। पासवान बोले ए संजय गांधी हम 1969 में विधायक बने, दूसरी बार लोकसभा में पहुंचे बहुत जूनियर हैं आप। मुझे कुछ कहना होगा तो आपकी मां कहेंगी। जनतंत्र में यह रंगबाजी नहीं चलेगी, अगर रंगबाज़ी ही करनी है तो तय कर लो कहां पर फ़रियान है चांदनी चौक या कनॉट प्लेस, हम तैयार हैं। । बात को बिगड़ता देख तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बीच बचाव करते हुए कहा पासवान जी आप इतने सीनियर मेंबर हैं अब संजय गांधी को छोटा भाई समझिये। उसे संसदीय परंपरा अभी सीखनी है साथ ही उन्होंने कहा छमा बड़न को चाहिए छोटन को उत्पात, फिर दोनों को मिलाया लेकिन पासवान फिर भी नहीं माने और बोल उठे मैं बेलछी में नहीं भारत की संसद में बोल रहा हूं।

संजय गांधी पर 3 बार जानलेवा हमले हुए?

विकिलीक्स ने खुलासा किया था संजय गांधी पर तीन बार जानलेवा हमले किए गए थे। यूएस एंबेसी के हवाले से कहा गया था कि इमरजेंसी के दौरान उत्तर प्रदेश में संजय गांधी को सुनियोजित तरीके से मारने की कोशिश हुई लेकिन वह बाल-बाल बच गए। हमलावर का कोई पता नहीं चला। संजय गांधी पर एक और हमला 30 से 31 अगस्त 1976 को हुआ। विकी लिस्ट में भारतीय खुफिया एजेंसी का हवाला दिया। विकिलीक्स के मुताबिक हमलावर ने संजय गांधी पर 3 गोलियां चलाई लेकिन वह बच गए। यह साफ नहीं है कि वह जख्मी हुए थे या नहीं। विकिलीक्स के मुताबिक संजय गांधी को इमरजेंसी के दौरान ही निशाना बनाया गया। हालांकि 1977 में जनता पार्टी की सरकार आई और किसी भी तक 30 में संजय गांधी पर जानलेवा हमले का जिक्र नहीं हुआ।

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संजय गांधी विमान हादसा

23 जून 1980 की एक घटना भारत के इतिहास की एक ऐसी घटना है, जिसने देश की राजनीति के सारे समीकरण बदल डाले। 1976 में संजय को हल्के विमान उड़ाने का लाइसेंस मिला था, लेकिन इंदिरा गांधी के सत्ता से हटते ही जनता सरकार ने उनका लाइसेंस छीन लिया था। इंदिरा गांधी के सत्ता में दोबारा वापस आते ही उनका लाइसेंस भी उन्हें वापस मिल गया था। बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार 1977 से ही इंदिरा परिवार के नज़दीकी धीरेंद्र ब्रह्मचारी एक ऐसा टू सीटर विमान 'पिट्स एस 2ए' आयात करवाना चाह रहे थे, जिसे ख़ासतौर पर हवा में कलाबाज़ियां खाने के लिए बनाया गया हो। मई 1980 में जाकर भारत के कस्टम विभाग ने उसे भारत लाने की मंज़ूरी दी। जय ने पहली बार 21 जून 1980 को नए पिट्स पर अपना हाथ आज़माया। दूसरे दिन यानी 22 जून को अपनी पत्नी मेनका गाँधी, इंदिरा गांधी के विशेष सहायक आर के धवन और धीरेंद्र ब्रह्मचारी को लेकर उन्होंने उड़ान भरी और 40 मिनट तक दिल्ली के आसमान पर विमान उड़ाते रहे। फिर आती है 23 जून 1980 की वो तारीख सुबह का वक्त था और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के घर से हरे रंग की मेटाडोर गाड़ी बाहर निकली, जिसमें सवार थे संजय गांधी। संजय गांधी एक किलोमीटर का सफर तय करते हुए सफदरजंग एयरपोर्ट पर पहुंचते हैं जहां दिल्ली फ्लाइंग क्लब के चीफ इन्स्ट्रक्टर सुभाष सक्सेना और "पिट्स एस 2 ए" उनका इंतजार कर रहे थे। सुबह 7.15 बजे के करीब कैप्टन सक्सेना पिट्स के अगले हिस्से में बैठे और संजय ने पिछले हिस्से में बैठकर कंट्रोल संभाला। संजय ने सुरक्षा नियमों को दरकिनार करते हुए रिहायशी इलाके के ऊपर ही तीन लूप लगाए। उसके भी कुछ मिनटों के बाद उनका नियंत्रण खत्म हो गया और फिर घर्र घर्र की आवाज करता हुआ डिप्लोमैटिक एनक्लेव में संजय गांधी के घर से कुछ ही मिनटों की एरियल दूरी पर पिट्स क्रैश कर गया।

कहा जाता है कि उस दिन यूपी के मुख्यमंत्री राजा साहब यानी विश्वनाथ प्रताप सिंह इंदिरा गांधी से मुलाकात के लिए उनके एक अकबर रोड के निवास स्थान पर आए हुए थे। तभी इंदिरा के सहायक आरके धवन को ये बोलते हुए सुनते हैं कि बहुत बड़ा हादसा हो गया। बस इतना सुनते ही बिखरे हुए बालों में ही इंदिरा गांधा बाहर निकलीं और घटनास्थल की ओर रवाना हो गईं। मौके पर एंबुलैंस और एयरक्राफ्ट पहुंचे और डालियां काटी गईं व विमान के मलबे के बीच से संजय और सुभाष के शरीर को निकाला गया। फिर इंदिरा गांधी खुद एंबुलेंस में चढ़ गईं और राम मनोहर लोहिया अस्पताल पहुंचीं। जहां डॉक्टरों ने दोनों को मृत घोषित कर दिया। संजय के शव को ठीक करने में डॉक्टरों को तीन घंटे लग गए। एक थ्योरी यह भी आई कि जब डाक्टर संजय के पार्थिव शरीर को पैच कर रहे थे, तो वो एक बार फिर उस जगह गईं जहां संजय का विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ था। कहा गया वह संजय की घड़ी और चाबियों का गुच्छा ढ़ूढ़ने गई थीं। उस घड़ी में स्विस बैंक का अकाउंट नंबर था। बाद में इन्हें केवल अफवाह बताया गया और कहा गया कि उनको संजय के निजी सामान में कोई रुचि नहीं थी।

संजय गांधी प्लेन हादसे से इस तरह बचे राजेश पायलट

22 जून 1980 की बात है संजय गांधी कहते हैं राजेश, हम कल सुबह उड़ेंगे। एक नई मशीन आई है पिट्स एस2 ए बहुत हल्की है। रंग भी चमकदार लाल। सुबह मिलते हैं सफदरदंग (एयरस्ट्रिप) पर। जवाब में राजेश पायलट बोलते हैं कल सुबह तो मेरठ से कुछ किसान मिलने आने वाले हैं। मुश्किल होगी। संजय गांधी ने दो टूक कहा वो सब मैं नहीं जानता, तुम्हें सुबह मिलना है। अगली सुबह राजेश पायलट किसानों से मुलाकात निपटा चुके होते हैं। पायलट जल्दी से निकलने के लिए खड़े होते हैं लेकिन ड्राइवर मौके से नदारद होता है।  सड़क पर कोई टैक्सी भी नजर नहीं आई। मजबूरन नहीं चाहते हुए भी पायलट संजय गांधी के कहे की अनदेखी कर गए। लेकिन ये अनदेखी कुछ बड़ी अनहोनी का संदेश लेकर आने वाली थी। फोन की घंटी बजी और दूसरी तरफ संजय गांधी के बारे में सूचना थी। उनका प्लेन कुछ ही मिनट पहले क्रैश हो चुका था।

बहरहाल, सभी अपने-अपने ढंग से संजय को याद करते हैं। विरोधी दलों के लिए वह इमरजेंसी के खलनायक हैं,सेंसरशिप के नाम पर पत्रकारों को जेल भेजने वाले नेता लेकिन संजय अकेले शख़्स थे जो इंदिरा के साथ 1977 की हार के बाद भी मजबूती के साथ खड़े थे। कहा तो ये भी जाता है कि अगर संजय नहीं होते तो 1980 में उनकी राजनीतिक वापसी कभी नहीं हो सकती थी। संजय की मौत के बाद कई दिनों तक इंदिरा बीच रात में उठकर संजय को ढ़ूढ़ने लगतीं।- अभिनय आकाश






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