US-Iran Tension के बीच Arab Nations के मंत्रियों ने की PM Modi से मुलाकात, Israel PM Netanyahu ने भी कटाया दिल्ली का टिकट!

प्रधानमंत्री मोदी ने अरब प्रतिनिधियों का स्वागत करते हुए भारत और अरब जगत के बीच सदियों पुराने जन संपर्क संबंधों को रेखांकित किया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यही ऐतिहासिक जुड़ाव आज व्यापार, निवेश, ऊर्जा, प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य और नवाचार के नए अध्याय खोलने की बुनियाद है।
ईरान और अमेरिका के बीच उफनते तनाव ने पश्चिम एशिया को बारूद के ढेर पर ला खड़ा किया है। इसी पृष्ठभूमि में भारत में अरब देशों के विदेश मंत्रियों का एकजुट होना शक्ति संतुलन को प्रभावित करने वाला संदेश है। भारत और अरब विदेश मंत्रियों की दूसरी बैठक के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस जयशंकर से अरब प्रतिनिधिमंडल की मुलाकात ने यह साफ कर दिया कि दिल्ली आज पश्चिम एशिया की राजनीति में एक निर्णायक केंद्र बन चुकी है।
प्रधानमंत्री मोदी ने अरब प्रतिनिधियों का स्वागत करते हुए भारत और अरब जगत के बीच सदियों पुराने जन संपर्क संबंधों को रेखांकित किया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यही ऐतिहासिक जुड़ाव आज व्यापार, निवेश, ऊर्जा, प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य और नवाचार के नए अध्याय खोलने की बुनियाद है। प्रधानमंत्री मोदी का यह बयान उस समय आया जब पश्चिम एशिया क्षेत्र में युद्ध की आशंकाएं गहराती जा रही हैं और वैश्विक शक्तियां अपनी अपनी चालें चल रही हैं।
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बैठक का सबसे संवेदनशील पक्ष फिलिस्तीन का मुद्दा रहा। प्रधानमंत्री ने फिलिस्तीनी जनता के प्रति भारत के निरंतर समर्थन को दोहराया और गाजा शांति योजना सहित चल रहे शांति प्रयासों का स्वागत किया। उन्होंने क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिए अरब लीग की भूमिका की सराहना की। अरब लीग के महासचिव और सदस्य देशों के विदेश मंत्रियों की मौजूदगी ने इस समर्थन को बहुपक्षीय स्वर दिया। वहीं विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने अरब देशों के मंत्रियों के साथ बैठक के दौरान साफ किया कि भारत किसी एक ध्रुव का अनुयायी नहीं बल्कि संवाद और संतुलन का पक्षधर है।
विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने भारत–अरब विदेश मंत्रियों की दूसरी बैठक में वैश्विक और क्षेत्रीय हालात पर भारत का दृष्टिकोण स्पष्ट करते हुए कहा कि दुनिया इस समय बड़े परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। राजनीति, अर्थव्यवस्था, तकनीक और जनसांख्यिकी, सभी शक्तियाँ एक साथ सक्रिय हैं और इसका सबसे गहरा प्रभाव पश्चिम एशिया (मध्य पूर्व) में देखा जा रहा है। डॉ. जयशंकर ने कहा कि बीते एक वर्ष में पश्चिम एशिया का परिदृश्य नाटकीय रूप से बदला है, जिसका सीधा असर भारत सहित पूरे क्षेत्र पर पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि भारत एक निकटवर्ती क्षेत्र होने के नाते इन घटनाक्रमों से गहराई से जुड़ा हुआ है और अरब देशों के साथ उसके संबंधों पर भी इसका व्यापक प्रभाव है।
विदेश मंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि हाल के वर्षों में पश्चिम एशिया में कई गंभीर घटनाएँ हुई हैं, जिनकी गूंज क्षेत्र से बाहर तक सुनाई दी है। विशेष रूप से गाज़ा की स्थिति अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। उन्होंने अक्टूबर 2025 में हुए शार्म-अल-शेख शांति शिखर सम्मेलन और इसके बाद नवंबर 2025 में पारित संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2803 का उल्लेख करते हुए कहा कि गाज़ा संघर्ष को समाप्त करने की व्यापक योजना को आगे बढ़ाना आज वैश्विक प्राथमिकता है। इसके अलावा उन्होंने सूडान में जारी संघर्ष, यमन में अस्थिरता और समुद्री सुरक्षा पर उसके प्रभाव तथा लेबनान की स्थिति (जहाँ भारत के सैनिक संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन UNIFIL में तैनात हैं), लीबिया में राष्ट्रीय संवाद प्रक्रिया और सीरिया में घटनाओं की दिशा पर भी गंभीर चिंता जताई।
डॉ. जयशंकर ने आतंकवाद को भारत और अरब, दोनों क्षेत्रों के लिए साझा खतरा बताया। उन्होंने कहा कि सीमा-पार आतंकवाद अंतरराष्ट्रीय संबंधों के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन है और इसे किसी भी रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने जोर देकर कहा कि आतंकवाद के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ एक सार्वभौमिक और अडिग मानक होना चाहिए तथा इसके लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग को और मजबूत करना आवश्यक है।
विदेश मंत्री ने कहा कि भारत के सभी अरब देशों के साथ मजबूत और कई मामलों में रणनीतिक साझेदारियाँ हैं, जिनकी जड़ें ऐतिहासिक संबंधों में हैं। उन्होंने कहा कि आज यह सहयोग ऊर्जा, व्यापार, प्रवासी भारतीय समुदाय, खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों तक विस्तृत हो चुका है। उन्होंने बताया कि भारत–अरब सहयोग मंच 2026–28 के लिए सहयोग के एजेंडे पर विचार करेगा, जिसमें ऊर्जा, पर्यावरण, कृषि, पर्यटन, शिक्षा और संस्कृति के साथ-साथ डिजिटल तकनीक, अंतरिक्ष, स्टार्ट-अप और नवाचार जैसे नए क्षेत्रों को भी शामिल करने का प्रस्ताव है।
साथ ही डॉ. जयशंकर ने हाल ही में शुरू किए गए भारत–अरब चैंबर ऑफ कॉमर्स, इंडस्ट्री और एग्रीकल्चर का उल्लेख करते हुए कहा कि ये पहलें द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत करेंगी। उन्होंने कहा कि बीते एक दशक में भारत ने तकनीक-आधारित, जन-केंद्रित क्षमताओं का विकास किया है और इन अनुभवों को साझा करना भारत और अरब देशों, दोनों के लिए लाभकारी होगा।
देखा जाये तो ईरान अमेरिका तनाव के बीच अरब देशों का दिल्ली आना यह दर्शाता है कि भारत को वह एक भरोसेमंद मध्यस्थ और रणनीतिक साझेदार के रूप में देख रहे हैं। ऊर्जा सुरक्षा से लेकर समुद्री मार्गों की सुरक्षा तक के मामले में भारत की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
साथ ही अरब देशों के विदेश मंत्रियों का यह जमावड़ा उस समय हुआ है जब अगले सप्ताह इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की संभावित भारत यात्रा की चर्चाएं तेज हैं। इससे पहले अरब विदेश मंत्रियों की मौजूदगी यह संकेत देती है कि भारत इजराइल और अरब जगत दोनों के साथ संवाद की समानांतर पटरी पर चल रहा है। साफ है कि दिल्ली किसी खेमे में बंधने की बजाय सभी से बात करने की क्षमता का प्रदर्शन कर रही है।
देखा जाये तो ईरान और अमेरिका के बीच टकराव की आंच जब पूरे क्षेत्र को झुलसा सकती है तब भारत के मंच का शांति और व्यावहारिकता का ठिकाना बनकर उभरना नई कूटनीतिक हकीकत है। यह आक्रामक संतुलन है जिसमें भारत न तो दबाव में झुकता है और न ही तटस्थता की आड़ में मौन रहता है। अरब देश जानते हैं कि भारत ऊर्जा का बड़ा उपभोक्ता है और उनका भरोसेमंद साझेदार भी। वहीं भारत यह भी जानता है कि खाड़ी क्षेत्र में अस्थिरता उसकी अर्थव्यवस्था और प्रवासी भारतीयों दोनों के लिए खतरा है। इसलिए दिल्ली का रुख साफ है संवाद, निवेश और विकास। यही कारण है कि व्यापार और निवेश से लेकर स्वास्थ्य और प्रौद्योगिकी तक सहयोग को प्राथमिकता दी जा रही है।
फिलिस्तीन के मुद्दे पर भारत का स्पष्ट रुख अरब देशों के लिए भरोसे का आधार है। गाजा में शांति प्रयासों का समर्थन करते हुए भारत ने यह भी दिखाया कि वह मानवीय सरोकारों से पीछे नहीं हटता। साथ ही इजराइल के साथ गहरे संबंध बनाए रखना यह बताता है कि भारत भावनाओं नहीं बल्कि राष्ट्रीय हितों से संचालित होता है। वहीं नेतन्याहू की संभावित यात्रा से पहले अरब मंत्रियों का दिल्ली में जुटना इस बात का संकेत है कि भारत को अब पुल के रूप में देखा जा रहा है। एक ऐसा पुल जो अरब जगत और इजराइल के बीच संवाद के लिए सुरक्षित रास्ता दे सकता है। यह भूमिका न तो आसान है और न ही जोखिम रहित लेकिन भारत ने यह जिम्मेदारी उठाने का साहस दिखाया है।
साथ ही ईरान अमेरिका तनाव के दौर में यह साहस और भी मायने रखता है। भारत किसी प्रतिबंध राजनीति का औजार नहीं बनना चाहता बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता का साझेदार बनना चाहता है। यही कारण है कि दिल्ली की कूटनीति आज धारदार है, साफ है और आक्रामक भी। यह आक्रामकता हथियारों की नहीं बल्कि संवाद और संतुलन की है। बहरहाल, अरब विदेश मंत्रियों की यह यात्रा बताती है कि पश्चिम एशिया के भविष्य की बातचीत अब केवल वाशिंगटन या तेहरान में नहीं होगी। दिल्ली अब वैश्विक राजनीति का केंद्र बन चुकी है।
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