Manipur में Kuki-Naga समुदायों में बढ़ी दूरी, पड़ोसी गांवों में बंद हुआ संवाद

मणिपुर में जारी जातीय तनाव का असर अब कुकी और नगा समुदायों के आपसी रिश्तों पर भी दिखने लगा है। सेनापति और कांगपोकपी सीमा पर स्थित पड़ोसी गांवों के बीच सुरक्षा अवरोधक लग चुके हैं और वर्षों पुराने दोस्तों में बातचीत बंद है। अपहरण और हत्याओं की हालिया घटनाओं ने दोनों पक्षों में अविश्वास और तनाव को और गहरा कर दिया है।
(सौरव रॉय बर्मन) सेनापति/कांगपोकपी (मणिपुर), 27 अक्टूबर मणिपुर में तीन साल से अधिक समय से जारी कुकी-मेइती जातीय संघर्ष का प्रभाव अन्य समुदायों पर भी पड़ रहा है और कभी साथ रहे पड़ोसी अब एक दूसरे से बात करने में भी कतरा रहे हैं। ताफू कुकी गांव के मुखिया लेंखोमांग चोंगलोई पडो़सियों के बीच टकराव का वर्णन करते हुए कहते हैं, ‘‘यह कारगिल जैसा है, भारत और पाकिस्तान जैसा।’’ ताफू कुकी से थोड़ी दूरी पर ताफू लियांगमाई गांव है, जहां लियांगमाई नगा जनजाति के लोग रहते हैं। इन गांवों के नाम ही अलग-अलग क्षेत्रों की पहचान बताते हैं।
चोंगलोई के घर से कुछ दूरी पर आपी पमई रहते हैं। चोंगलोई का बेटा पमई का सहपाठी था और वह अक्सर उनके घर आया-जाया करते थे। पमई (35) कहते हैं, ‘‘हम साथ बड़े हुए।
उस तरफ मेरे कई दोस्त हैं। मई से हमारी बातचीत बंद है। हम उनके व्हाट्सऐप स्टेटस देखते हैं, लेकिन जवाब नहीं देते।
हालात बदल गए हैं।’’ राजधानी इंफाल से लगभग 65 किलोमीटर दूर इन दोनों बस्तियों के बीच अब सुरक्षा अवरोधक लगा दिए गए हैं। इनके आगे हरे-भरे पहाड़ों और घाटियों में घर, खेत व ढलान एक-दूसरे के काफी करीब हैं। किसी बाहरी व्यक्ति के लिए यह पहचानना मुश्किल है कि एक गांव कहां खत्म होता है और दूसरा कहां शुरू होता है।
यहां की शांत तस्वीर भ्रामक है। कांगपोकपी और सेनापति जिलों की सीमा पर स्थित इस इलाके में मई और जून में लोगों को बंधक बनाए जाने की घटना ने कुकी-नगा टकराव को एक नए स्तर पर पहुंचा दिया। इससे मणिपुर के जातीय संघर्ष में हिंसा का एक और मोर्चा खुल गया।
सेनापति जिले में मुख्य रूप से नगा समुदाय के लोग रहते हैं, जबकि कांगपोकपी में कुकी-जो समुदाय की आबादी अधिक है। हालांकि, यहां नगा समुदाय के कई गांव भी हैं। मई 2023 से जारी हिंसा में 300 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और करीब 60,000 लोग विस्थापित हुए हैं।
राज्य सरकार के अनुसार, इस साल 31 अगस्त तक हिंसा में मारे गए लोगों की संख्या 306 थी। इसके बाद भी लोगों की हत्या की घटनाएं हुई हैं। इस साल 13 मई को कांगपोकपी जिले में घात लगाकर किए गए हमले में कुकी-जो समुदाय के चर्च के तीन नेताओं की हत्या कर दी गई।
इसके बाद कांगपोकपी और पड़ोसी सेनापति जिले में नगा और कुकी ग्रामीणों का अपहरण किया गया। नगा प्रतिनिधियों ने कुकी ग्रामीणों को अगवा किए जाने को जवाबी कार्रवाई बताया। हालांकि, कई बंधकों को दो दिन बाद रिहा कर दिया गया, लेकिन छह नगा पुरुष लापता रहे।
इस बीच, नगा संगठनों ने 14 कुकी पुरुषों को अपने कब्जे में रखा और लापता लोगों की रिहाई की मांग की। कुकी संगठनों ने इन लोगों को बंधक बनाए रखने से इनकार किया। नौ जून को करीब एक महीने तक बंधक रहने के बाद 14 कुकी पुरुषों को रिहा कर दिया गया।
अगले दिन छह लापता नगा पुरुषों के शव बरामद हुए। लियांगमाई नगा परिषद के महासचिव बेनवांग बो कहते हैं, ‘‘उन्होंने हमारे लोगों का अपहरण किया था, इसलिए हमने सेनापति से उनके लोगों को अगवा किया।’’ उन्होंने कहा, ‘‘हमने उनके लोगों का अच्छी तरह ख्याल रखा और आखिरकार उन्हें छोड़ दिया, लेकिन उन्होंने हमारे छह लोगों की हत्या कर दी।’’ मई 2023 के बाद करीब दो साल तक नगा समुदाय मुख्य रूप से मेइती-कुकी संघर्ष से दूर रहा। हालांकि, भूमि, बस्तियों और राजनीतिक आकांक्षाओं को लेकर कुकी और नगा समुदायों के बीच पुराने विवाद बने रहे।
1990 के दशक में इन विवादों ने हिंसक रूप ले लिया था। ताफू कुकी गांव में रहने वाले स्वयंसेवक मिनथांग को याद है कि नगा समुदाय के लोगों से उनकी दोस्ती थी। अब गांव के लोग अपनी बस्ती की रक्षा करने की बात करते हैं और स्वीकार करते हैं कि उनके पास स्वचालित हथियारों समेत बंदूकें हैं।
उनका कहना है कि 1990 के दशक की हिंसा के दौरान कुकी समुदाय की पिछली पीढ़ी खुद को असहाय महसूस करती थी, लेकिन इस बार वे बेहतर तैयारी के साथ हैं। दूसरी ओर, अहजापौ एमके बताते हैं कि वह 27 अगस्त को कांगपोकपी जिले में इंफाल-तामेंगलॉन्ग रोड पर घात लगाकर किए गए हमले में बच गए थे। इस हमले में चार नगा पुरुष मारे गए थे।
उनका कहना है कि वह जंगल में भाग गए और कई घंटे तक छिपे रहे। कुकी समुदाय के बारे में वह कहते हैं, ‘‘वे इस युद्ध को शुरू करने के लिए तैयार बैठे थे।’’ दोनों पक्ष अपनी तैयारियों को सुरक्षा के लिए जरूरी बताते हैं और दूसरे पक्ष की तैयारियों को सुनियोजित आक्रामकता का सबूत मानते हैं। अहजापौ के लिए सवाल केवल अपने गांव की सुरक्षा तक सीमित नहीं है।
वह इस बात पर भी सवाल उठाते हैं कि कुकी समुदाय इस इलाके में अपना मूल निवास क्षेत्र होने का दावा कैसे कर सकता है। उन्होंने कहा, ‘‘वे बाहरी लोग हैं। ताफू भी नगा नाम है, जिसमें उन्होंने कुकी जोड़ दिया है।’’
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