अस्पतालों में प्रवेश पर बने राष्ट्रीय नीति, ऑक्सीजन का बफर स्टॉक तैयार करें केंद्र सरकार: सुप्रीम कोर्ट

अस्पतालों में प्रवेश पर बने राष्ट्रीय नीति, ऑक्सीजन का बफर स्टॉक तैयार करें केंद्र सरकार: सुप्रीम कोर्ट

कोर्ट ने यह भी कहा कि इस आपातकालीन स्टॉक को इस हिसाब से वितरित किया जाना चाहिए कि यह आसानी से हर क्षेत्रों में बिना देरी के पहुंच सके। अस्पतालों में प्रवेश के बारे में शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया कि केंद्र सरकार 2 सप्ताह के भीतर अस्पतालों में प्रवेश पर एक राष्ट्रीय नीति तैयार करें जिसका सभी राज्य सरकारों को पालन करना होगा।

देश में बढ़ते कोरोना वायरस महामारी और इससे फैली अव्यवस्थाओं को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट एक्शन में आ गया है। सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश जारी कर केंद्र सरकार से कहा है कि वह राज्यों के साथ ऑक्सीजन का बफर स्टॉक तैयार करें ताकि किसी भी कारण से नियमित आपूर्ति श्रृंखला बाधित होने पर उस स्टॉक का इस्तेमाल किया जा सके। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को यह निर्देश ऐसे वक्त में दिया है जब देश में कोरोना वायरस महामारी अपने चरम पर है और ऑक्सीजन को लेकर लोगों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। ऑक्सीजन के अभाव में कई जिंदगी अब तक खत्म हो चुकी है। कोर्ट ने सख्त रुख अख्तियार करते हुए कहा कि अगले 4 दिनों के भीतर आप ऐसा करें। अपने आदेश में कोर्ट ने कहा कि राज्यों के साथ मिलकर केंद्र सरकार आपूर्ति के लिए ऑक्सीजन का बफर स्टॉक तैयार किया करे ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि आपूर्ति लाइनें अप्रत्याशित परिस्थितियों में भी काम करती रहे। कोर्ट ने यह भी कहा कि आपातकालीन स्टॉक की समय-समय पर निगरानी होनी चाहिए और इसके लिए एक नियंत्रण कक्ष भी होना चाहिए।

इसे भी पढ़ें: केंद्र ने अदालत से कहा- राज्यों से सभी सभाओं में कोविड प्रोटोकॉल का पालन सुनिश्चित करने को कहा था

 न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति एस रवीन्द्र भट की तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि यह आदेश कोरोना वायरस की दूसरी लहर के मद्देनजर आवश्यक दवाओं, ऑक्सीजन और टिकों की आपूर्ति सहित अन्य मुद्दों को दुरुस्त करने के लिए दिया गया है। आपको बता दें कि केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय संकट के दौरान ऑक्सीजन की आपूर्ति कैसे बढ़ाई जाए इस पर विस्तृत प्रस्तुति देने के बाद  कोर्ट ने 30 अप्रैल को सू मोटो मामले में आदेश को सुरक्षित रखा गया था। शीर्ष न्यायालय ने कहा कि जब केंद्र और राज्य सरकारें ऑक्सीजन की आपूर्ति के प्रबंधन की प्रक्रिया में शामिल है, उसी समय यह भी महत्वपूर्ण है कि ऑक्सीजन का एक आपातकालीन बफर स्टॉक बनाया जाए ताकि आपूर्ति श्रृंखला में किसी भी कारण से उत्पन्न बाधा के दौरान इस बफर स्टॉक का इस्तेमाल किया जा सके और मानव जीवन को बचाया जा सके। 

इसे भी पढ़ें: उच्च न्यायालयों का मनोबल नहीं गिरा सकते, वे लोकतंत्र के महत्त्वपूर्ण स्तंभ हैं: सुप्रीम कोर्ट

कोर्ट ने यह भी कहा कि इस आपातकालीन स्टॉक को इस हिसाब से वितरित किया जाना चाहिए कि यह आसानी से हर क्षेत्रों में बिना देरी के पहुंच सके। अस्पतालों में प्रवेश के बारे में शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया कि केंद्र सरकार 2 सप्ताह के भीतर अस्पतालों में प्रवेश पर एक राष्ट्रीय नीति तैयार करें जिसका सभी राज्य सरकारों को पालन करना होगा। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि जब तक यह राष्ट्रीय नीति केंद्र सरकार तैयार करेगी, तब तक किसी भी मरीज को किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में स्थानीय आवासीय प्रमाण की कमी या पहचान प्रमाण के अभाव में अस्पताल में भर्ती या आवश्यक दवाओं से वंचित नहीं रखा जा सकता। 

न्यायालय ने केंद्र को मौजूदा टीका नीति पर गौर करने का निर्देश दिया, कहा- इससे असमानता पैदा हो सकती है

उच्चतम न्यायालय ने केंद्र को कोविड-19 मूल्य नीति पर फिर से गौर करने का निर्देश देते हुए कहा है कि पहली नजर में इससे लोक स्वास्थ्य के अधिकार के लिए हानिकारक नतीजे होंगे। न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति एस रवीन्द्र भट की तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि आज की तारीख में निर्माताओं ने दो अलग कीमतों का सुझाव दिया है। इसके तहत, केंद्र के लिए कम कीमत और राज्य सरकारों को टीके की खरीद पर अधिक कीमत चुकानी होगी। शीर्ष अदालत ने कहा कि राज्य सरकारों को प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने और नए निर्माताओं को आकर्षित करने के नाम पर निर्माताओं के साथ बातचीत के लिए बाध्य करने से टीकाकरण वाले 18 से 44 साल के उम्र समूह के लोगों के लिए गंभीर नतीजे होंगे। पीठ ने कहा कि आबादी के अन्य समूहों की तरह इस उम्र समूह में वे लोग भी शामिल हैं जो बहुजन हैं या दलित और हाशिए के समूहों से संबंधित हैं। हो सकता है कि उनके पास भुगतान करने की क्षमता नहीं हो। पीठ ने कहा, ‘‘जरूरी टीके उनके लिए उपलब्ध होंगे या नहीं यह हरेक राज्य सरकार के इस फैसले पर टिका होगा कि वह अपने वित्त पर निर्भर करता है या नहीं, यह टीका मुफ्त में उपलब्ध कराया जाना चाहिए या नहीं और सब्सिडी दी जानी चाहिए या नहीं और दी जाए तो किस सीमा तक। इससे देश में असमानता पैदा होगी। नागरिकों का किया जा रहा टीकाकरण जनता की भलाई के लिए है।’’ 

इसे भी पढ़ें: कांग्रेस ने नेता आनंद शर्मा का फूटा गुस्सा, कहा- निर्वाचन आयोग को तुरंत भंग किया जाए

शीर्ष अदालत ने कहा कि विभिन्न वर्गों के नागरिकों के बीच भेदभाव नहीं किया जा सकता है, जो समान हालात का सामना कर रहे हैं। केंद्र सरकार 45 साल और उससे अधिक उम्र की आबादी के लिए मुफ्त टीके प्रदान करने का भार वहन करेगी, राज्य सरकारें 18 से 44 आयु वर्ग की जिम्मेदारी का निर्वहन करेंगी, ऐसी वाणिज्यिक शर्तों परवे बातचीत कर सकते हैं। पीठ ने अपने आदेश में कहा, ‘‘मौजूदा नीति की संवैधानिकता पर हम कोई निर्णायक फैसला नहीं दे रहे हैं लेकिन जिस तरह से मौजूदा नीति तैयार की गयी है उससे संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित जन स्वास्थ्य के अधिकार के लिए हानिकारक परिणाम होंगे। ’’ पीठ ने कहा, ‘‘इसलिए हमारा मानना है कि संविधान के अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष बराबरी) और अनुच्छेद 21 (जीवन की सुरक्षा और निजी स्वतंत्रता) के पालन के साथ केंद्र सरकार को अपनी मौजूदा टीका नीति पर फिर से गौर करना चाहिए।’’ वर्तमान में लोगों को ‘कोविशील्ड’ और ‘कोवैक्सीन’ टीके की खुराकें दी जा रही है। कोविड-19 महामारी के दौरान आवश्यक सेवा और आपूर्ति बनाए रखने के लिए स्वत: संज्ञान लिए गए मामले में ये निर्देश दिये हैं।





नोट:कोरोना वायरस से भारत की लड़ाई में हम पूर्ण रूप से सहभागी हैं। इस कठिन समय में अपनी जिम्मेदारी का पूर्णतः पालन करते हुए हमारा हरसंभव प्रयास है कि तथ्यों पर आधारित खबरें ही प्रकाशित हों। हम स्व-अनुशासन में भी हैं और सरकार की ओर से जारी सभी नियमों का पालन भी हमारी पहली प्राथमिकता है।


Prabhasakshi logoखबरें और भी हैं...

राष्ट्रीय

झरोखे से...

This website uses cookie or similar technologies, to enhance your browsing experience and provide personalised recommendations. By continuing to use our website, you agree to our Privacy Policy and Cookie Policy.Accept