Supreme Court ने Justice Yashwant Varma की याचिका खारिज की, महाभियोग जांच को हरी झंडी दिखाई

Justice Yashwant Verma
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हम आपको याद दिला दें कि यह विवाद उस समय शुरू हुआ था जब मार्च 2025 में दिल्ली के अपने आधिकारिक आवास में लगी आग के दौरान बड़ी मात्रा में जली हुई नकदी मिलने के बाद उनके खिलाफ आरोप लगाए गए थे।

सुप्रीम कोर्ट ने आज इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश यशवंत वर्मा की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष द्वारा उनके महाभियोग के लिए गठित जांच समिति के फैसले को चुनौती दी थी। जस्टिस वर्मा ने अपनी याचिका में तर्क दिया था कि लोकसभा स्पीकर द्वारा गठित तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन असंवैधानिक है क्योंकि Judges Inquiry Act, 1968 की धारा 3(2) के अनुसार यह समिति संसद के दोनों सदनों लोकसभा और राज्यसभा द्वारा महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकारे जाने के बाद ही गठित की जा सकती है। उन्होंने यह भी दावा किया था कि उस समय राज्यसभा के उपाध्यक्ष द्वारा यह कार्रवाई की गई थी जो कि अवैध थी क्योंकि वह आधिकारिक रूप से राज्यसभा के अध्यक्ष के पद का अधिकार नहीं रखते थे। हालांकि पीठ ने स्पष्ट कर दिया कि स्पीकर द्वारा समिति का गठन कोई गैरकानूनी कार्रवाई नहीं है और इस में किसी प्रकार की विधिक खामी नहीं पाई गई है। पीठ का कहना था कि न्यायाधीश के खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया और सांसदों के स्वतंत्र अधिकारों के बीच एक सावधानीपूर्ण संतुलन बनाना आवश्यक है। अदालत ने कहा कि जस्टिस वर्मा को कोई राहत नहीं दी जा सकती और इस मामले में अदालत का दखल आवश्यक नहीं है।

हम आपको याद दिला दें कि यह विवाद उस समय शुरू हुआ था जब मार्च 2025 में दिल्ली के अपने आधिकारिक आवास में लगी आग के दौरान बड़ी मात्रा में जली हुई नकदी मिलने के बाद उनके खिलाफ आरोप लगाए गए थे। इसके बाद एक इन-हाउस जांच समिति ने जस्टिस वर्मा की कदाचार की कथित भूमिका को स्वीकार किया और सिफारिश की कि उन्हें हटाने की प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए। इसके बाद लोकसभा में महाभियोग प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया और लोकसभा अध्यक्ष द्वारा जांच के लिए संसदीय समिति गठित की गई।

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जस्टिस वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी याचिका में यह भी कहा था कि जब वह घटनास्थल पर मौजूद नहीं थे और उस स्थान पर बरामद नकदी उनके रोजमर्रा के उपयोग के हिस्से में नहीं थी तब उन्हें इसके लिए जिम्मेदार ठहराना अनुचित है। उन्होंने अग्निशमन विभाग, पुलिस और अन्य अधिकारियों को ही जिम्मेदार बताया।

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर विचार करते हुए यह भी देखा कि न्यायाधीश की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संसदीय जांच समिति की संवैधानिक भूमिका के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है। न्यायपालिका ने यह स्पष्ट कर दिया कि संसदीय समिति द्वारा जांच का अधिकार और स्पीकर का निर्णय विधिक रूप से जाँचा जा चुका है और इसमें कोई अनुचितता नहीं है। अब जस्टिस वर्मा के खिलाफ संसदीय जांच प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाएगा और जांच समिति अपनी गहन रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी। 

देखा जाये तो सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारतीय लोकतंत्र की उन बुनियादी धारणाओं पर भी एक महत्वपूर्ण रेखांकन है जिन पर हमारा संविधान आधारित है। भारतीय न्यायपालिका को हमेशा से स्वतंत्र संस्था माना गया है। इसलिए अगर न्यायधीशों को किसी प्रकार की जवाबदेही के दायरे से बाहर समझा जाये तो यह लोकतांत्रिक संतुलन के मूलभूत सिद्धांत के विपरीत होगा। जस्टिस वर्मा के मामले में आरोप चाहे कितने भी गंभीर क्यों न हों, अदालत ने स्पष्ट किया कि जांच समिति का गठन पूर्णतः वैध है और इसमें कोई प्रक्रिया-गत अपवाद नहीं है। इससे यह संदेश मिलता है कि जब संसदीय संस्थाएँ संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों का प्रयोग करती हैं, तो उनका निर्णय यदि विधिक ढांचे के भीतर है तो उसे सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पलटा नहीं जाएगा। यही लोकतंत्र की सुंदरता है कि शक्ति को कोई भी संस्था बिना जवाबदेही के नहीं रख सकती।

कुल मिलाकर यह मामला न्यायपालिका की जवाबदेही, संसदीय जांच प्रक्रिया की वैधता और लोकतांत्रिक संस्थाओं के संतुलन के बीच एक बड़ी चुनौती है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से यह स्पष्ट होता है कि संविधान द्वारा निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन करने पर ही किसी भी संस्था की कार्रवाई को न्यायिक अनुमोदन प्राप्त होगा। बहरहाल, अब देखना होगा कि जस्टिस वर्मा के खिलाफ आगे क्या कार्रवाई होती है। वैसे इस मामले पर पूरे देश की नजरें टिकी हुई हैं।

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