भारत को आजादी दिलाने में आजाद ने निभाई थी अहम भूमिका

By अमृता गोस्वामी | Publish Date: Feb 27 2019 12:19PM
भारत को आजादी दिलाने में आजाद ने निभाई थी अहम भूमिका
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भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानायक, महान स्वतंत्रता सेनानी चन्द्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई, 1906 को मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के भाबरा ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम पंडित सीताराम तिवारी एवं माता का नाम जगदानी देवी था।

जिस स्वतंत्र भारत में आज हम श्वास ले रहे हैं उसे परतंत्रता की जंजीरों से मुक्त कराने में न जाने कितने ही क्रांतिकारियों ने अपने प्राण न्योछावर किए, सीने पर गोलियां खाईं और फांसी के फंदे को गले लगाकर अपना सर्वस्व न्योछावर करने में कभी पीछे नहीं हटे। देश के ऐसे ही क्रांतिकारियों में एक नाम है चन्द्रशेखर आजाद का, जिन्हें देश एक महान युवा क्रांतिकारी और देश की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले एक वीर सपूत के रूप में जानता है। 
 
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानायक, महान स्वतंत्रता सेनानी चन्द्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई, 1906 को मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के भाबरा ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम पंडित सीताराम तिवारी एवं माता का नाम जगदानी देवी था। झाबुआ जिले में भील बालकों के साथ खेलते हुए चन्द्रशेखर आजाद ने धर्नुविद्या सीख ली थी और निशानेबाजी में वे अच्छी तरह पारंगत थे। 14 वर्ष की आयु में चन्द्रशेखर तिवारी ने बनारस में एक संस्कृत पाठशाला में पढ़ाई की। 
1919 में हुए जलियांवाला बाग हत्याकांड ने चन्द्रशेखर को झकझोर कर दिया था। 1921 में वह अपने कुछ साथी छात्रों के साथ अंग्रेजों के खिलाफ गांधीजी के असहयोग आंदोलन से जुड़ गए, इस आंदोलन में कई गिरफ्तारियां हुईं जिसमें चंद्रशेखर की भी गिरफ्तार कर लिया गया। जज के सामने पेश होने पर जज ने जब चन्द्रशेखर से उनका परिचय पूछा तो चन्द्रशेखर ने जवाब में कहा- मेरा नाम आजाद है, मेरे पिता का नाम स्वतंत्रता है और मेरा निवास स्थान जेल है। चन्द्रशेखर को 15 कोड़ों की सजा सुनाई गई। हर कोड़े पर चन्द्रशेखर ने दर्द से कराहने के बजाए वन्दे मातरम और भारत माता की जय के नारे लगाए। इसके बाद से लोग चन्द्रशेखर तिवारी को चन्द्रशेखर तिवारी नहीं बल्कि चंद्रशेखर आजाद के नाम से पुकारने लगे थे। 
 
1922 में असहयोग आंदोलन के बंद हो जाने के बाद चन्द्रशेखर आजाद का मानस अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति रचकर देश के लिए कुछ कर गुजरने बन चुका था। इसी समय चन्द्रशेखर आजाद की मुलाकात हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन क्रांतिकारी दल के संस्थापक राम प्रसाद बिस्मिल से हुई, जिनके साथ जुड़कर चन्द्रशेखर आजाद ने अंग्रेजों के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की और अंग्रेजों से देश को मुक्त कराने की कसम खाई। 


 
1925 में चन्द्रशेखर आजाद राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व वाले उत्तर भारत के हिन्दुस्तानी प्रजातांत्रिक क्रांतिकारी दल में शामिल हुए और प्रमुख क्रांतिकारियों के साथ मिलकर ऐतिहासिक काकोरी कांड को अंजाम दिया और वहां से फरार हो गए। इस घटना ने ब्रिटिश सरकार को हिलाकर रख दिया था। इस घटना के बाद राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां और रोशन सिंह इत्यादि क्रांतिकारियों को मृत्यु दंड दिया गया। अपने साथियों की मौत से दुःखी चन्द्रशेखर आजाद ने संस्था का पुनर्गठन किया और भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू जैसे क्रांतिकारियों के साथ मिलकर अंग्रेजों की हुकूमत को हिलाकर रख दिया। 
घटना 1928 की है जिसमें साइमन कमीशन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन पर अंग्रजों द्वारा लाठी चार्ज में लाला लाजपत राय की मौत से अंग्रेजों के खिलाफ क्रांतिकारियों का गुस्सा फूट पड़ा था। चन्द्रशेखर आजाद सहित प्रमुख क्रांतिकारियों भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू ने लाजपतराय की मौत का बदला लेने का फैसला किया। बदले के लिए 17 दिसंबर 1928 का दिन तय किया गया और इस दिन क्रांतिकारियों ने शाम के समय लाहौर में पुलिस अधीक्षक जे.पी. साण्डर्स के दफ्तर को घेर लिया। बचाव में साण्डर्स ने अपने अंगरक्षक के साथ मोटर साइकिल पर भागने की कोशिश की तब राजगुरु ने उस पर गोली दाग दी। गोली साण्डर्स के माथे पर लगी और वह मोटरसाइकिल से नीचे गिर पड़ा जिसके बाद तुरंत ही भगत सिंह ने आगे बढ़कर 4-6 गोलियां दाग कर उसे मार दिया और जब साण्डर्स के अंगरक्षक ने उनका पीछा किया, तो चंद्रशेखर आजाद ने उसे गोली से मार दिया। साण्डर्स की हत्या के बाद लाहौर में जगह-जगह पर्चे चिपका दिए गए थे, जिन पर लिखा था लाला लाजपतराय की मृत्यु का बदला ले लिया गया है। 
 
लाला लाजपत की मौत के बदले के बाद ब्रिटिश राज्य की तानाशाही के विरोध में भगतसिंह के साथ मिलकर क्रांतिकारियों ने दिल्ली असेंबली में बम फेंकने की योजना बनाई। दिल्ली असेंबली पर बम फेंके जाने के आरोप में भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव को फांसी की सजा सुनाए जाने से चन्द्रशेखर आजाद बहुत आहत हुए। चंद्रशेखर आजाद ने कसम खाई थी कि चाहे कुछ भी हो, वह जिंदा अंग्रेजों के हाथ नहीं पकड़े जाएंगे। 
 
27 फरवरी 1931 को चंद्रशेखर आजाद इलाहाबाद में अपने सहयोगी सुखदेव राज के साथ अल्फ्रेड पार्क में महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा कर रहे थे तभी उन्हें खबर लगी कि अंग्रेज सिपाहियों ने पार्क को चारों तरफ से घेर लिया है। अंग्रेज सिपाहियों ने पेड़ की आड़ से चंद्रशेखर आजाद पर कई गोलियां चलाईं। चन्द्रशेखर आजाद ने भी बराबर मुकाबला किया और घायल होने के बाद भी वह बाएं हाथ से गोली चलाते रहे, उन्होंने सहयोगी सुखदेव राज को वहां से भगा दिया और लगातार पुलिस को निशाना बनाते रहे। चन्द्रशेखर आजाद के पास जब आखिरी गोली बची तो अंग्रेजों के हाथ आने से पहले उन्होंने उस गोली को स्वयं पर चलाकर  मौत को गले लगा लिया और जीते जी अंग्रेजों के हाथ न आने का वादा पूरा किया। 
 
वह पार्क जहां चन्द्रशेखर ने अंतिम सांस ली थी उसे अब देश ‘चंद्रशेखर आजाद पार्क’ के नाम से और और उनके जन्म स्थान भाबरा को ‘आजाद नगर’ के नाम से जानता है। चंद्रशेखर आजाद का देश की आजादी के लिए दिया बलिदान कभी भुलाया नहीं जा सकता। 
 
अमृता गोस्वामी

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