आजीवन भारत की स्वाधीनता का बिगुल बजाते रहे नेताजी सुभाष चंद्र बोस

subhash chandra bose
Prabhasakshi
जनवरी 1938 को जब वे विदेश यात्रा पर थे तब उन्हें अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष निर्वाचित किया गया। उस समय वे मात्र 41 वर्ष के थे। कांग्रेस का नेतृत्व ग्रहण करने पर भारतीय इतिहास एवं सुभाष के जीवन में नया मोड़ आया।

भारत के महान सपूत महानायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को हुआ था। नेता जी आजीवन संगठन संघर्ष और युद्धकर्म में रत रहकर भारत की स्वाधीनता का बिगुल बजाते रहे। सुभाष बाबू के जीवन पर स्वामी विवेकानंद, उनके गुरू स्वामी रामकृष्ण परमहंस तथा श्री अरविंद के दर्शन का व्यापक प्रभाव पड़ा। नेता जी ऋषि अरविंद की पत्रिका आर्य को बहुत ही लगाव से पढ़ते थे। पिताजी की इच्छा का निर्वहन करते हुए उन्होने उन दिनों की सर्वाधिक महत्वपूर्ण परीक्षा आईसीएस में बैठने के लिए कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया तथा आठ माह में ही वह परीक्षा उत्तीर्ण कर ली किंतु देशहित के लिए उन्होने आईसीएस की नौकरी का परित्याग करके एक अनोखा उदाहरण प्रस्तुत किया। तब तक किसी भारतीय ने आईसीएस के इतिहास में ऐसा नहीं किया था। 

सुभाष 16 जुलाई 1921 को बम्बर्ह पहुंचकर महात्मा गांधी से उनके आवास पर मिले। युवक सुभाष राष्ट्र की स्वाधीनता के लिए सार्वजनिक जीवन में प्रवेश कर रहे थे और उस नेता से मिलना चाहते थे जिसने सम्पूर्ण देश में अंग्रेजों के खिलाफ असहयोग आंदोलन चला रखा था। गांधी जी ने सुभाष को कलकत्ता पहुंचकर देशबंधु चितरंजन दास से मिलने का सुझाव दिया। जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। उस समय देश में गांधी जी के नेतृत्व में लहर थी तथा अंग्रेजी वस्त्रों का बहिष्कार, विधानसभा, अदालतों एवं शिक्षा संस्थाओं का बहिष्कार भी किया जा रहा था। सुभाष ने इस युद्ध में कूदने का निश्चय किया और विरोध का नेतृत्व करने लगे। अंग्रेज अधिकारी आंदोलन के स्वरूप को देखकर घबरा गये। उन्होंने सुभाष को साथियों सहित 10 दिसंबर 1921 को संध्या समय गिरफ्तार कर लिया और जेल भेज दिया। एक वर्ष बाद उन्हें जेल से मुक्ति मिली। किन्तु जल्द ही क्रांतिकारी षड़यंत्र का आरोप लगाकर अंग्रेजों ने सुभाष को मांडले जेल भेज दिया। दो वर्ष पश्चात सुभाष को मांडले से कलकत्ता लाया गया जहां उन्हें स्वास्थ्य के आधार पर मुक्त कर दिया गया। सुभाष ने कांग्रेस का प्रथम नेतृत्व 30 वर्ष की आयु में किया जब वे बंगाल प्रांतीय कमेटी के अध्यक्ष निर्वाचित हुए।

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जनवरी 1938 को जब वे विदेश यात्रा पर थे तब उन्हें अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष निर्वाचित किया गया। उस समय वे मात्र 41 वर्ष के थे। कांग्रेस का नेतृत्व ग्रहण करने पर भारतीय इतिहास एवं सुभाष के जीवन में नया मोड़ आया। गांधीजी ने सीतारमैया को अपना सहयोग दिया अतः गांधीजी की इच्छा को ध्यान में रखते हुए अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के पश्चात सुभाष ने फारवर्ड ब्लाक नामक अग्रगामी दल की स्थापना की। हिंदू-मुस्लिम एकता की समस्या पर बैरिस्टर जिन्ना के साथ बातचीत करके वे वीर सावरकर के घर पहुंच गये। सुभाष का वीर सावरकर के घर पहुंचना एक ऐतिहासिक घटना थी। अभिनव भारत में इस वृत्तान्त का वर्णन किया है। इस बैठक में सावरकर ने सुभाष को सशस्त्र संघर्ष के नेतृत्व की कमान को संभालने के विचार से अवगत कराया। सावरकर के विचारों को ध्यानपूर्वक ग्रहण करने के बाद दो मास की अनिवर्चनीय कठिनाइयों एवं गोपनीयता, दुविधा, चिंता और शारीरिक कष्टों को झेलते हुए विभिन्न रास्ते पार करते हुए 1941 में अप्रैल माह में माक होते हुए सुभाष बर्लिन पहुंचे। नौ माह बाद जर्मनी रेडियो से उन्होने भारतीयों को संबोधित किया तब यह रहस्य खुला कि वे भारत से काफी दूर पहुंच चुके है। जर्मनी ने सुभाष को अंग्रेजों से लड़ने के लिये सभी प्रकार की गतिविधियों को चलाने की छूट देने एवं  उनकी सहायता करने का आश्वासन दिया । 

सुभाष बोस ने जर्मनी पहुंचते ही स्वातंत्र्य योद्धाओं की परिषद के सहयोग से रास बिहारी बोस की अध्यक्षता में आजाद हिंद सरकार गठित की जिसे जापान, जर्मनी, ब्रह्मदेश, फिलीपिंस, आइरिश रिपब्लिक मंचूरिया तथा इटली ने सहायता दी। अब भारत की मुक्ति के लिये सैनिक अभ्यास की तैयारी शुरू हो गयी। फरवरी  1944 में भारत और जापान ने संयुक्त अभियान बर्मा के जंगलों में प्रारम्भ किया अनेक दुर्गम और जोखिमपूर्ण पड़ावों को पार करते हुए आजाद हिंद फौज ने मार्च में भारतीय सीमा में प्रवेश कर लिया किंतु उन्हें वापस लौटना पड़ा। 

अभियान की असफलता के पश्चात सैनिकों का मनाबेल बढ़ाने के लिये उनका विशेष ध्यान रखना पड़ता था। 15 अगस्त 1945 को अमेरिका द्वारा हिरोशिमा एवं नागासाकी में परमाणु बम गिराये जाने के बाद जापान की पराजय का समाचार प्राप्त हुआ। अतः नेताजी एवं उनके मंत्रिमंडल में एकमत होकर यह निश्चय किया और वे सिंगापुर, बैंकाक होते हुए रूस अधिकृत क्षेत्र मंचूरिया पहुंच गये। वहां उन्होंने कर्नल स्ट्रेसी को को बुलाया और स्पष्ट निर्देश दिये कि वे सिंगापुर में समुद्र के किनारे आजाद हिंद फौज स्मारक का निर्माण शीघ्रता से प्रारम्भ करें। 16 अगस्त का प्रातःकाल होने वाला था। नेताजी उठे, अपना कुछ निजी सामान और वस्त्रों को संभाला और उस यात्रा के लिये तैयार हुए जिसे वे अज्ञात लक्ष्य की ओर अभियान कह रहे थे। 17 अगस्त 1945 को प्रातः नेताजी बैंकॉक हवाई अड्डे के लिये लोगों से विदाई लेकर चले। 22 अगस्त 1945 को टोक्यो रेडियो से हुए प्रसारण में फारमोसा द्वीप में हुई वायुयान दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु का समाचार सुनकर सम्पूर्ण विश्व स्तब्ध रह गया। लेकिन उनकी यह मृत्यु आज भी रहस्य की चादर पर लिपटी हुई है। 

आजाद हिंद फौज की अमर कहानी 

1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में मुंह की खाने के बाद अंग्रेजों ने अत्यंत कठोर दमन चक्र चलाया था। हजारें लोगों को फांसी दी गयी थी। परिणाम स्वरुप संगठित सेना के अभाव में युवकों ने छोटे छोटे दल बनाकर अंग्रेजों को दंडित करना प्रारम्भ किया। शस्त्र प्राप्त करने के लिये कई युवक विदेश गये। इन्हें क्रांतिकारी कहा जाने लगा। यह श्रृंखला चलती रही। इनके बलिदानों ने स्वाधीनता संग्राम के लिए सशस्त्र संघर्ष की ज्योति को जलाए रखा। 

1939 में यूरोप और उत्तरी अफ्रीका में यूरोपीय देशों  के बीच युद्ध छिड़ गया। जिसमें अंग्रेजों की एक के बाद एक हार होने लगी। इसमें अनेक भरतीय सेनिक भी बंदी बनाये गये। तब नेताजी सुभाषचंद्र बोस के मन में बंदी सैनिकों से सम्पर्क करके स्वाधीनता संग्राम हेतु एक सेना का गठन करने का प्रयास किया। उन दिनों वे अपने घर में ही बंदी थे। 1941 में एक दिन अंग्रेजों को चकमा देकर घर से निकल गये और कठिन मार्ग तय करते हुये बर्लिन जा पहुचे। वहां जर्मनी और इटली की सहायता से उन्होनें भारतीय युद्ध बंदियों से सम्पर्क किया। देखते ही देखते उन्होने एक सेना खड़ी कर ली। लेकिन जर्मनी और रूस के बीच युद्ध छिड़ जाने से यहां पर उनकी प्रारम्भिक योजना असफल हो गयी। कुछ समय बाद विभिन्न अवरोधों और घटनाओं के बीच जून 1943 में वे पूर्वी एशिया पहुंचे। सबसे पहले वह टोक्यो गये। वहां जापानी प्रधानमंत्री जनरल तेजा ने उनकी सभी शर्तों को मान लिया और जापानी संसद में भारत की स्वतंत्रता के लिये पूर्ण और बिना शर्त  समर्थन की घोषणा की।  

21 अक्टूबर 1943 को सिंगापुर में आजाद हिंद फौज की अस्थायी सरकार का औपचारिक शपथ ग्रहण हुआ। आजाद हिंद फौज ने युद्ध के लिये प्रयास प्रारम्भ कर दिया। नयी सेना में महिलाओं की रानी लक्ष्मीबाई रेजीमेंट तो थी ही किशोरों के लिये आजाद हिंद बाल सेना की शाखा भी खोली गयी थी। उनका नियमित प्रशिक्षण प्रारम्भ हो गया था। “तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा” के नेता जी के आह्वान से बड़ी संख्या में लोग इस सेना में भरती के लिए आ रहे थे किन्तु इस नयी सेना में लोगों का प्रवेश नेताजी की अनुमति से ही होता था। इस नयी फौज का नारा ”जय हिंद“ सबका नारा हो गया था। 

23- 24 अक्टूबर की रात्रि को आजाद हिंद सरकार ने ब्रिटेन और अमेरिका के खिलाफ युद्ध का ऐलान कर दिया। सेना को सिंगापुर से रंगून भेजा जाने लगा। रंगून में सेना का सर्वोच्च मुख्यालय स्थापित किया गया। अस्थायी सरकार का मुख्यालय भी रंगून में स्थापित किया गया।जनवरी 1944 तक प्रथम डिवीजन रंगून पहुंच गयी। रानी झांसी रेजिमेंट और बाल सेना की शाखा में गुप्तचर सेवा के सैनिक भी थे। नेताओं ने इस कार्यदल का पुनर्गठन करके इसका संचालन अपने ही अधीन रखा। इसके सैनिक शत्रु की सेना व क्षेत्रों में घुसकर काम करते थे। ब्रिटिश सरकार इन्हें शत्रु का एजेंट कहती थी। जब यह सैनिक पकड़ लिये जाते थे तब इन्हें कठोर यातना सहनी पड़ती थी। इन सैनिकों के बलिदान की पूरी कहानी का पता लगाना बेहद कठिन काम है।

ब्रिटिश सरकार और उनके सैनिकों में भय पैदा करने का काम इन्होने बखूबी किया। आजाद हिंद फौज के सैनिक गुरिल्ला युद्ध में भी निपुण हो गये थे जिसके कारण भी अंग्रेज सैनिकों में भय व्याप्त हो गया था। इन सभी दबावों का परिणम था कि बाद में अंततः अंग्रेजों को भारत को स्वतंत्र करना ही पड़ा। आजाद हिंद फौज को यदि महात्मा गांधी और तत्कालीन कांग्रेस पार्टी का  भरपूर साथ मिला होता तो भारत को आजादी बहुत समय पहले ही मिल गयी होती। कर्नल मलिक के नेतृत्व में आजाद हिंद के सैनिक पूरी वीरता और दमखम के साथ युद्ध करते हुए आगे बढ़ रहे थे। सेना ने 18 अप्रैल 1944 में मोईरंग में अपना झंडा गाड़ दिया। आजाद हिंद की फौज ने इम्फाल को चारों ओर से घेर लिया था। यहां पर ब्रिटिश सेना आत्मसमर्पण करने वाली थी लेकिन उन्हें तभी खबर मिली की कि यहां पर आजाद हिंद फौज के पास रसद समाप्त हो चुकी है और हथियारों की भी कमी हो गयी है तभी ब्रिटिश सेना के लिए नयी कुमुक भेजी गयी। अचानक बढ़े हमले के कारण आजाद हिंद फौज के अनैकों सैनिक मारे गये। बहुत से सैनिक बंदी बना लिये गये। स्वतंत्रता के लिए किए गए सशस्त्र क्रांति के इतिहास में आजाद हिंद फौज एक सुनहरा अध्याय बन गयी।

युद्ध समाप्ति होने के बाद जब आजाद हिंद फौज की पूरी कहानी देशवासियों को प्राप्त हुयी तो देश में उसके सैनिकों के प्रति श्रद्धा और सम्मान की लहर दौड़ गयी। सारा देश “जयहिंद” और “दिल्ली चलो” के नारों से गूंज उठा था। ब्रिटिश भारतीय सेना के अफसर भी इससे अछूते नहीं रहे।वे आजाद हिंद फौज के सैनिकों को दण्डित करने का विरोध करने लग गये। अंग्रेज जान गये कि अब वे ब्रिटिश भारतीय सेना के बल पर भारत पर अधिक समय तक राज नहीं कर सकेंगे। देश में उस समय नेताजी और आजाद हिंद फौज के प्रति आदर और सहानुभूति की तेज बयार बह रही  थी। दमनचक्र के बावजूद देशवासियों का जोश, उत्साह व उमंग देखते ही बन रहा था।  ब्रिटिश सरकार डर गयी थी। आजाद हिंद फौज ने जिस प्रकार से देश का वातावरण बनाया उससे अंग्रेजों  को साफ पता चल गया था कि अब यहां अधिक समय तक रहा नहीं जा सकता। 

नेता जी सुभाष तथा आजाद हिंद फौज का देश की आजादी में अप्रतिम योगदान है जिसे भुलाया नही जासकता। नेताजी सुभाषचंद्र बोस को सम्मान देन के लिए केंद्र सरकार ने एक बड़ा कदम उठाते हुए गणतंत्र दिवस समारोह का शुभारंभ 23 जनवरी से ही करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया है। यह एक क्रांतिकारी कदम है और इससे देशवासियों को नेता जी के विषय में और अधिक जानकारी प्राप्त करने का अवसर मिलेगा। 

- मृत्युंजय दीक्षित

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