Modi Diplomacy Power देखकर दुनिया हैरान, आखिर रातोंरात कैसे बदल गये Donald Trump, Marco Rubio, JD Vance और Elon Musk के तेवर?

PM Modi
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भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर अमेरिकी दबाव के बीच सबसे महत्वपूर्ण संकेत विदेश मंत्री मार्को रुबियो के बयान से आया है। पत्रकारों से बातचीत के दौरान रुबियो ने स्वीकार किया कि रूस के तेल पर प्रतिबंधों में छूट देने के फैसले में भारत के साथ प्रस्तावित व्यापार समझौते को भी ध्यान में रखा गया है।

विपक्ष अक्सर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर अमेरिका के आगे झुकने का आरोप लगाता रहता है लेकिन जो परिदृश्य उभर कर सामने आ रहा है वह दर्शा रहा है कि भारत की ताकत और मोदी की कूटनीति के आगे अमेरिका को झुकना पड़ा है। चाहे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हों, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो हों, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस हों या फिर अमेरिकी उद्योगपति एलन मस्क हों, आप उनके ताजा बयानों को देखेंगे तो पाएंगे कि रातोंरात अचानक उनमें बड़ा परिवर्तन आ गया है। भारत पर रूस से तेल खरीदने को लेकर भारी टैरिफ लगाने की धमकी देने वाले डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन को अब अपने कदम पीछे खींचने पड़े हैं। साथ ही अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने खुद माना है कि भारत के साथ होने वाला व्यापार समझौता इस फैसले की एक बड़ी वजह है। उन्होंने यहां तक कह दिया है कि भारत की अपनी जरूरतें हैं और वह एकदम से रूस से तेल खरीदना बंद नहीं कर सकता।

रूस से तेल पर अमेरिका की अकड़ ढीली, भारत बना अहम फैक्टर

हम आपको बता दें कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर अमेरिकी दबाव के बीच सबसे महत्वपूर्ण संकेत विदेश मंत्री मार्को रुबियो के बयान से आया है। उज्बेकिस्तान में पत्रकारों से बातचीत के दौरान रुबियो ने स्वीकार किया कि रूस के तेल पर प्रतिबंधों में छूट देने के फैसले में भारत के साथ प्रस्तावित व्यापार समझौते को भी ध्यान में रखा गया है। उन्होंने कहा कि दोनों देश समझौते को अंतिम रूप देने के बेहद करीब हैं। यह बयान ऐसे समय आया है, जब ट्रंप प्रशासन ने रूस से संबंधित प्रतिबंधों के प्रभावों का आकलन करने के लिए 60 दिनों की राहत दी है। रुबियो के मुताबिक, अमेरिका को यह भी देखना होगा कि एक साथ प्रतिबंध और टैरिफ लगाने से वैश्विक अर्थव्यवस्था और खुद अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा?

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यानी जिस रूस-तेल मुद्दे को भारत पर दबाव बनाने के हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा था, उसी पर अब वॉशिंगटन को अपने कदमों के परिणामों की चिंता सता रही है। मार्को रुबियो का यह कहना, ''भारत रूस से ऊर्जा आयात को एक झटके में बंद नहीं कर सकता। नई आपूर्ति व्यवस्था विकसित करने में समय लगता है और ऊर्जा की कीमतों में उछाल का सीधा असर आम लोगों तथा उद्योगों पर पड़ता है'', दर्शा रहा है कि मोदी की कूटनीति कितनी कामयाब रही। साथ ही रुबियो ने यह भी स्वीकार किया कि भारत अमेरिका का महत्वपूर्ण साझेदार है और उसकी ऊर्जा जरूरतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

अमेरिकी महंगाई का दबाव, ट्रंप प्रशासन की बढ़ी मुश्किलें

देखा जाये तो अमेरिका की इस बदली हुई रणनीति के पीछे घरेलू आर्थिक चिंताएं भी हैं। महंगे ईंधन का असर अमेरिकी उपभोक्ताओं पर पड़ रहा है। ऐसे माहौल में भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने से वैश्विक आपूर्ति और कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। आगामी मध्यावधि चुनावों से पहले महंगाई ट्रंप प्रशासन के लिए राजनीतिक चुनौती भी बन सकती है। दूसरी तरफ, भारत भी महंगाई के दबाव से अछूता नहीं है। ऐसे में भारत के लिए सस्ती और भरोसेमंद ऊर्जा आपूर्ति केवल व्यापार का सवाल नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता का भी मुद्दा है। नई दिल्ली का रुख स्पष्ट रहा है कि ऊर्जा आपूर्ति के स्रोत बाजार की परिस्थितियों और राष्ट्रीय जरूरतों के हिसाब से तय होंगे।

जेडी वेंस की सफाई, एच-1बी विवाद पर नहीं थमा विवाद

इसके साथ ही अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के तेवरों में भी नरमी आई है। एच-1बी वीजा कर्मचारियों को ‘फॉरेन इंडेंटर्ड सर्वेंट्स’ कहने के बाद उनकी टिप्पणी पर विवाद बढ़ा था। भारत के विदेश मंत्रालय ने उनके बयान को अनुचित और गहरा अपमानजनक बताया था। सीबीएस न्यूज के टाउन हॉल कार्यक्रम में वेंस ने कहा कि उनकी आलोचना वीजा कर्मचारियों की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था और कंपनियों की थी, जिनके जरिए विदेशी कर्मचारियों को ऐसी स्थिति में रखा जा सकता है जहां नौकरी जाने का डर उनके अधिकारों को कमजोर कर देता है। उन्होंने माना कि उनकी भाषा बेहतर हो सकती थी, लेकिन उन्होंने अपनी टिप्पणी वापस नहीं ली। उन्होंने अपनी भारतीय ससुराल का जिक्र करते हुए पत्नी उषा वेंस और उनके दक्षिण भारतीय माता-पिता के प्रति सम्मान भी जताया।

एलन मस्क भी नरम पड़े, भारतीय नियमों के सामने चुनौती

इसी बीच, एलन मस्क की स्टारलिंक और रिलायंस इंडस्ट्रीज के बीच उपग्रह इंटरनेट सेवाओं को लेकर चला विवाद भी नया मोड़ लेता दिखा। हम आपको याद दिला दें कि भारत में स्टारलिंक की संभावित एंट्री के बीच मस्क ने सोशल मीडिया पर भारतीय कारोबारी मुकेश अंबानी और बाजार की प्रतिस्पर्धा से जुड़े आरोप लगाए थे। रिलायंस ने जवाब में कहा कि वह उपग्रह संचार सेवाओं में प्रतिस्पर्धा का स्वागत करती है, लेकिन हर कंपनी को भारतीय कानूनों और नीतियों का पालन करना होगा। कंपनी ने यह भी स्पष्ट किया कि जियो की अपनी उपग्रह सेवाएं भी मंजूरियों की प्रतीक्षा कर रही हैं। इसके बाद मस्क ने रिलायंस की प्रतिक्रिया पर ‘Much appreciated’ कहकर जवाब दिया। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो भारत के दौरे पर आ रहे हैं। वह मुंबई में भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाकात के अलावा गुजरात के जामनगर जाकर रिलायंस इंडस्ट्रीज की रिफाइनरी का अवलोकन भी करेंगे। खास बात यह है कि रिलायंस इंडस्ट्रीज उन्हीं मुकेश अंबानी की है जिन्हें एलन मस्क ने भारत का प्रधानमंत्री बताया था।

भारत का संदेश—रिश्ते बराबरी के, फैसले राष्ट्रीय हित में

बहरहाल, रुबियो, वेंस और मस्क के ढीले पड़ते तेवर और ट्रंप का बदला रुख दर्शा रहे हैं कि दुनिया में भारत की कूटनीति कुछ भी हासिल कर सकती है। रूस से तेल खरीदने का सवाल हो, अमेरिका के साथ व्यापार समझौता हो, एच-1बी वीजा विवाद हो या स्टारलिंक की भारत में एंट्री का मुद्दा हो, इन सभी घटनाक्रमों के केंद्र में एक चीज स्पष्ट है कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों पर बाहरी दबाव कभी स्वीकार नहीं करेगा। भारत ऐसा साझेदार नहीं है जिसके सामने केवल दबाव बनाकर मनचाहा फैसला हासिल कर लिया जाए। नई दिल्ली का संदेश स्पष्ट है कि रिश्ते मजबूत होंगे, व्यापार भी बढ़ेगा, लेकिन फैसले भारत के राष्ट्रीय हितों के आधार पर ही होंगे।

-नीरज कुमार दुबे

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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