जनता के लिए राजनीति में आईं प्रियंका पति रॉबर्ट वाड्रा के साथ खड़ी हो गईं

By राकेश सैन | Publish Date: Feb 13 2019 4:52PM
जनता के लिए राजनीति में आईं प्रियंका पति रॉबर्ट वाड्रा के साथ खड़ी हो गईं
Image Source: Google

प्रियंका गांधी ने राजनीति में आते ही दूसरी राह चुनी। पति के साथ खड़ा होना आसान रास्ता था। देश के सम्मुख वह आदर्श पत्नी श्रीमती वाड्रा के रूप में प्रस्तुत हुईं और इंदिरा-2 यानि नेता बनने से चूक गईं।

अमेरिका से लौटीं प्रियंका गांधी वाड्रा ने भारत पहुंचते ही कहा 'आओ नई राजनीति की शुरूआत करें।' खूब तालियां पिटीं और कईयों ने कहा, प्रियंका नहीं ये आंधी है-दूसरी इंदिरा गांधी हैं। अपने मार्मिक आह्वान के तीसरे ही दिन प्रियंका पहुंच गईं भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे पति परमेश्वर रॉबर्ट वाड्रा को लेकर परावर्तन निदेशालय कार्यालय के सम्मुख और 'टेढ़ा है पर मेरा है' की तर्ज पर कहा 'वह अपने के साथ खड़ी हैं।' नई राजनीति वाली प्रियंका 72 घंटे में ही 'लौह महिला' इंदिरा की बजाय एक आदर्श पत्नी अधिक नजर आने लगीं। लखनऊ की सड़कों पर रोड शो में डॉ. अंबेडकर की प्रतिमा पर मालर्यापण करने वाली प्रियंका ने बाबा साहिब की संवैधानिक व्यवस्था की बजाय अपने पति का साथ देना ज्यादा जरूरी समझा। आर्थिक अनियमितताओं के आरोप झेल रहे अपने पति रॉबर्ट वाड्रा के बारे उन्होंने कहा कि- सारा देश जानता है कि क्या हो रहा है। कांग्रेस कह रही है कि लोकसभा चुनावों के मद्देनजर वाड्रा की फाईलें खोली जा रही हैं। लेकिन सवाल है कि जब कोई फाईलें होती हैं तभी तो खुलती हैं। इस बात को यूं भी कहा या पूछा जा सकता है कि कहीं मैया, भैया और सईंया की फाईलों से डर कर तो प्रियंका के कद से बड़ी छवि बना कर मैदान में नहीं उतारा गया ? यानि प्रियंका की नई राजनीति भी कांग्रेस की वही परिवारवादी व भ्रष्टाचार पर ध्यान बंटाने वाली परिपाटी तो नहीं ?
भाजपा को जिताए



 
लगता है कि प्रियंका के रूप में कांग्रेस ने फिर अपना चिरपरिचित चेहरा देश के सम्मुख प्रस्तुत किया है। वहीं नेहरु-गांधी खानदान का सर्वसम्मत प्रभावी नेतृत्व, वैसी ही लोकलुभावन बातें और जनकल्याण की चाशनी में लिपटी कुछ खैरातें परंतु इसके साथ में ऊपरी कमाई का शिष्टाचार भी। खानदान, खैरात और खानपान यही कांग्रेस की मोटी-मोटी त्रिआयामी कार्य संस्कृति रही है। याद कीजिए नेहरु का 'समाजवाद', इंदिरा गांधी के 'गरीबी हटाओ' और सोनिया गांधी के 'कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ' के कर्णप्रिय नारे। इसके साथ मिट्टी के तेल और राशन वाली जनवितरण प्रणाली (पीडीएस), बैंकों का राष्ट्रीयकरण और खड्डे खोदने-भरने वाली मनरेगा यानि महात्मा गांधी रोजगार योजना का पैकेज। इसकी ऐवज में देश को मिली नेहरु जी के समय हुए जीप घोटाले से लेकर बोफोर्स, बाद में पनडुब्बी, हैलीकॉप्टर, राष्ट्रमंडल खेल घोटाला, 2-जी, कोयला घोटाले जैसी अनगिनत गड़बडिय़ों की लंबी चौड़ी फेहरिस्त। दादी इंदिरा गांधी से मिलते प्रियंका के ऊर्जावान चेहरे को मुखौटा बना कर कांग्रेस ने अपना वही तीन सुत्रीय कार्यक्रम एक बार फिर देश के सामने रखा दिखता है। पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा से मुख से निकली युवाओं, किसानों व मजदूरों की बातें, साथ में किसानों की कर्जमाफी व न्यूनतम आय गारंटी योजना और साथ में प्रियंका का ओजस्वी चेहरा यही तो है 2019 के लिए कांग्रेस का त्रिवेणी एजेंडा।
 
 


वैसे प्रियंका ने अपने पति के साथ खड़े हो कर एक तरह से साहस व ईमानदारी का ही परिचय दिया है। लगभग 130 करोड़ भारतीयों को संदेश है कि प्रियंका चाहिए तो रॉबर्ट वाड्रा जैसों को भी जवांईयों की तरह खिलाते पिलाते रहना होगा। भ्रष्टाचार की संस्थागत हिमाकत की हिम्मत प्रियंका को विरासत में मिली है। इससे पूर्व आजादी के बाद प्रियंका के नानाजी के नेतृत्व वाली सरकार ने लंदन की कंपनी से 80 लाख रूपये में 200 जीपों को सौदा किया। लेकिन देश को केवल 155 जीपें ही मिलीं। घोटाले में ब्रिटेन के भारतीय उच्चायुक्त वी.के. कृष्णमेनन का हाथ होने की बातें सामने आईं लेकिन 1955 में केस बंद कर दिया गया। जल्द ही मेनन नेहरु मंत्रिमंडल में शामिल हो गए। वसूली 1 रुपए की भी नहीं हो पाई। नेहरु ने यह कहते हुए भ्रष्टाचार को संस्थागत रूप देने का प्रयास किया कि देश का पैसा देश में ही है, बाहर तो नहीं गया। प्रियंका के पिता राजीव गांधी ने स्वीकार किया कि किसी काम के लिए सरकार ऊपर से 1 रुपया भेजती है तो नीचे जाते-जाते वह 15 पैसे रह जाता है। उनकी यह स्वीकारोक्ति तो थी परंतु उन्होंने व्यवस्था बदलने का कोई प्रयास किया हो वह किसी ने सुना नहीं।
 
 


यूपीए-2 की सरकार के समय अगस्टा वैस्टलैंड हैलीकॉप्टर खरीद घोटाले में तत्कालीन मंत्री कपिल सिब्बल ने सुझाव दिया कि क्यों न हथियारों में की जाने वाली दलाली के लिए लाइसेंस जारी कर दिए जाएं। अर्थात् देश के रक्षा सौदों की दलाली करने वालों को मान्यता प्राप्त एजेंटों का दर्जा दे दिया जाए। लगता है कि रॉबर्ट वाड्रा के साथ खड़े हो कर प्रियंका ने भी भ्रष्टाचार को सामाजिक स्वीकारोक्ति दिलवाने का कुछ वैसा ही प्रयास किया और बता दिया कि किसी को मंजूर हो या न हो 'पर पार्टी यूं ही चालैगी।' अपनी पार्टी व वर्करों से इंदिरा जैसा कद मिलते ही वे कमाऊ पति के पक्ष में आ गईं। वो चाहतीं तो पूरे प्रकरण से दूरी बना सकती थीं या कानून को अपना काम करने देने की बात कह सकती थीं परंतु हुआ उलटा। प्रियंका ने पूछताछ की जगह जानबूझ कर अपनी छवि को भुनाने का प्रयास किया। कैमरे के सामने क्या बोलना है और देश को क्या संदेश देना है वह उनके दिमाग में पूर्वनियोजित था। मौके पर आरोपी व उसके कारनामों के बारे में नहीं बल्कि उसकी पत्नी की छवि पर चर्चा हो रही थी। उस समय प्रियंका के समक्ष दो मार्ग थे, एक तो नया जिस पर चलते हुए संविधान के साथ प्रतिबद्धता दिखाई जाती और वाड्रा का मामला कानून पर छोड़ दिया जाता। दूसरा रास्ता था व्यवस्था व संविधान को लांछित कर पति का बचाव किया जाना, उसके कारनामों को अपनी छवि का आवरण ओढ़ाना। पहला मार्ग दुरुह परंतु श्रेयस्कर और नया था, जिसका वायदा तीन दिन पहले ही प्रियंका ने देश से किया और दूसरी राह थी पति के साथ खड़ा होना जो आसान थी। अफसोस कि प्रियंका ने आसान रास्ता चुना। देश के सम्मुख वह आदर्श पत्नी श्रीमती वाड्रा के रूप में प्रस्तुत हुईं और इंदिरा-2 यानि नेता बनने से चूक गईं।
 

 
प्रियंका जिस नई राजनीति की बात कर रही थीं उस पर वह 72 घंटे भी नहीं टिक सकीं। याद रहे कि इसी तरह की लच्छेदार बातें लगभग सवा साल पहले राहुल गांधी ने भी पार्टी के अध्यक्ष पद पर आसीन होते हुए कही थीं। युवाओं को नेतृत्व और साफ सुथरी राजनीति का वायदा किया गया परंतु राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में नेतृत्व सौंपने की बात आई तो नौजवानों की छाती पर अनुभवी मूंग दलते दिखे। अपने जीवन के 90 से अधिक फाग खेल चुके मोती लाल वोहरा जैसे कई नेता कल के छोकरों पर भारी पड़ गए। कारण ? पार्टी को खतरा था कि युवा तुर्क कभी भी नए वीपी सिंह या चंद्रशेखर बन सिंहासन को चुनौती दे सकते हैं जबकि बूढ़े सिंह न तो दहाड़ सकते और न ही शिकार कर सकते हैं। देशवासियों को नई राजनीति का एक कटु अनुभव अरविंद केजरीवाल भी हैं जो अपनी कलाबाजियों से नित नए रसातल की गहराईयां नापते हैं। अब प्रियंका भी उनकी हमशक्ल सी लगने लगी हैं। देश में जब नवीन नेतृत्व उभरता है तो उसका स्वागत होना ही चाहिए पंरतु इस नए का अर्थ ताजा-ताजा कली की हुई कड़ाही में बासी कढ़ी भी तो नहीं हो सकता। कांग्रेस के वर्तमान नेतृत्व व प्रियंका ने नई राजनीति के नाम पर फिर वही कुटुंब-कबीलावाद, मुफ्तखोरी, जनलुभावन और खाऊ-पीऊ राजनीति का पैकेज पेश किया है। भला है बुरा है जैसा भी है, मेरा पति मेरा देवता है का सिद्धांत एक आदर्श पत्नी के लिए तो वरदायी हो सकता है परंतु किसी लोकतांत्रिक प्रणाली में किसी नेता के लिए यह अभिशाप से कम नहीं। जनता को तो सही को सही और गलत को गलत कहने वाला नेतृत्व चाहिए जो कानून के सामने अपने-पराए का भेद न करता हो। अब देखना यह है कि देशवासी प्रियंका की इस नई राजनीति पर कितना एतबार करते हैं।
 
-राकेश सैन

रहना है हर खबर से अपडेट तो तुरंत डाउनलोड करें प्रभासाक्षी एंड्रॉयड ऐप   



Disclaimer: The views expressed here are solely those of the author in his/her private capacity and do not necessarily reflect the opinions, beliefs and viewpoints of Prabhasakshi and do not in any way represent the views of Prabhasakshi.

Related Story

Related Video