ग्लेशियर कार्यप्रणाली में परिवर्तन हिमनदों के परस्पर प्रभावों को समझने में मददगार

ग्लेशियर कार्यप्रणाली में परिवर्तन हिमनदों के परस्पर प्रभावों को समझने में मददगार

उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले की ऊपरी काली गंगा घाटी का एक ऐसा क्षेत्र जिसकी बेहद कम छानबीन की गई है, में एक अज्ञात ग्लेशियर का अध्ययन करने वाले भारतीय शोधकर्ताओं को इस ग्लेशियर के अचानक अपना मुख्य मार्ग बदलने के बारे में पता चला है।

भारतीय शोधकर्ताओं के एक नये अध्ययन में यह बात उभरकर आयी है कि हिमालय के ग्लेशियरों की कार्यप्रणाली में परिवर्तन, हिमनद-विवर्तनिकी (Glacial-Tectonic) संपर्क और हिमनदीय संरचनाओं के पारस्परिक प्रभाव को समझने में मददगार हो सकता है। 

उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले की ऊपरी काली गंगा घाटी का एक ऐसा क्षेत्र जिसकी बेहद कम छानबीन की गई है, में एक अज्ञात ग्लेशियर का अध्ययन करने वाले भारतीय शोधकर्ताओं को इस ग्लेशियर के अचानक अपना मुख्य मार्ग बदलने के बारे में पता चला है। यह पहली बार है जब किसी हिमालयी ग्लेशियर के मार्ग परिवर्तन की सूचना मिली है। शोधकर्ताओं ने इसके लिए जलवायु और विवर्तनिकी (Tectonics) दोनों के संचित प्रभाव को जिम्मेदार ठहराया है।

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इस अज्ञात ग्लेशियर का असामान्य व्यवहार स्पष्ट रूप से बताता है कि जलवायु के साथ-साथ पृथ्वी की ऊपरी परत संरचना को प्रभावित करने वाली बड़े पैमाने की प्रक्रियाएं भी हिमनदों या ग्लेशियरों के जलग्रहण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ऋषिगंगा नदी में हाल की आपदा इस बात का एक ताजा उदाहरण है, जिससे पता चलता है कि जिस चट्टान पर ग्लेशियर मौजूद था, वह धीरे-धीरे कमजोर हो गई थी।

भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के स्वायत्त संस्थान, वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी (WIHG), देहरादून, उत्तराखंड के वैज्ञानिकों द्वारा यह अध्ययन किया गया है। इस अध्ययन में, वैज्ञानिकों को उत्तर-पूर्व में खिसकते एक ग्लेशियर के खण्डित होकर उसके दक्षिण-पूर्व की ओर खिसकने के बारे में पता चला है।   

इस प्रकार के परिवर्तन के लिए अपक्षय, दरारों में बर्फ के पिघलने से बने पानी का रिसाव, दरारें, हिमीकरण एवं बर्फ का पिघलना, बर्फबारी, अतिरिक्त भार और धीरे-धीरे विवर्तनिक (Tectonic) बल जिम्मेदार ठहराया गया है। भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा इस संबंध में जारी वक्तव्य में कहा गया है कि इस अध्ययन में मिले तथ्य स्पष्ट रूप से बताते हैं कि हिमालय एक सक्रिय पर्वत श्रृंखला है और अत्यधिक कमजोर है, जहाँ विवर्तनिकी और जलवायु दोनों महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

रिमोट सेंसिंग और एक पुराने सर्वेक्षण मानचित्र के आधार पर, अध्ययनकर्ताओं ने आकलन किया है कि यह ग्लेशियर सक्रिय भ्रंश और जलवायु परिवर्तन से प्रभावित हुआ है। उनका कहना है कि विवर्तनिक गतिविधियों और जलवायु परिस्थितियों में बदलाव ने इस ग्लेशियर के मार्ग और संरचना को बदल दिया है। यह अध्ययन 'जियोसाइंस जर्नल' में प्रकाशित किया गया है।

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शोधकर्ताओं ने पाया है कि पाँच किलोमीटर लंबे अज्ञात ग्लेशियर, जो कुठी यांकी घाटी (काली नदी की सहायक नदी) में लगभग चार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को कवर करता है, ने अचानक अपना मुख्य मार्ग बदल दिया है। विवर्तनिक बल के परिणामस्वरूप यह स्थानांतरित हुआ, और छोटा हो गया। अंततः यह समजुर्कचांकी नामक आसन्न ग्लेशियर के साथ विलय हो गया। वक्तव्य में कहा गया है कि यह ग्लेशियर के अनूठे व्यवहारों में से एक है, और इस प्रकार के ग्लेशियर के गतिविज्ञान से संबंधित इस तरह के किसी भी अवलोकन की सूचना अब तक नहीं मिली है।

अध्ययन से संकेत मिलता है कि केवल जलवायु ही हिमालय में आपदाओं को ट्रिगर करने वाला कारक नहीं है, जो एक सक्रिय पर्वत श्रृंखला है, बल्कि विवर्तनकी भी हिमनदों के जलग्रहण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह अध्ययन ग्लेशियर संबंधी शोध में एक नये दृष्टिकोण के लिए दरवाजे खोलता है। 

(इंडिया साइंस वायर)