राजनीति में परिवारवाद चिंता का विषय क्यों? कांग्रेस मुक्त भारत में TMC भी जुटी

राजनीति में परिवारवाद चिंता का विषय क्यों? कांग्रेस मुक्त भारत में TMC भी जुटी

लोकतंत्र में परिवारवाद की राजनीति का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री हमेशा अहम मौके पर विपक्ष को आईना दिखाने का काम करते हैं। प्रधानमंत्री ने एक साथ उत्तर से लेकर दक्षिण तक और पूरब से लेकर पश्चिम तक के विपक्ष के नेताओं पर चोट किया है।

वैसे तो इस सप्ताह देश में कई सारे मुद्दे रहे। लेकिन संविधान दिवस के मौके पर संसद भवन के सेंट्रल हॉल में आयोजित एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने परिवारवाद को लेकर विपक्ष पर जबरदस्त चोट किया। हमने प्रभासाक्षी के कार्यक्रम चाय पर समीक्षा में भी प्रमुखता से इसी मुद्दे को लेकर चर्चा की। हमेशा की तरह इस कार्यक्रम में मौजूद रहे प्रभासाक्षी के संपादक नीरज कुमार दुबे।  प्रधानमंत्री द्वारा परिवारवादी पार्टियों को निशाना बनाए जाने को लेकर नीरज दुबे ने कहा कि लोकतंत्र में परिवारवाद की राजनीति का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री हमेशा अहम मौके पर विपक्ष को आईना दिखाने का काम करते हैं। प्रधानमंत्री ने एक साथ उत्तर से लेकर दक्षिण तक और पूरब से लेकर पश्चिम तक के विपक्ष के नेताओं पर चोट किया है। प्रधानमंत्री का निशाना कांग्रेस के साथ साथ तृणमूल कांग्रेस, उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव और मायावती के अलावा दक्षिण में जेडीएस और डीएमके तथा पश्चिम में शरद पवार और उद्धव ठाकरे की पार्टी पर था। साथ ही साथ प्रधानमंत्री ने अकाली दल और नेशनल कॉन्फ्रेंस तथा पीडीपी को भी निशाने पर रखा। 

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विपक्ष का बहिष्कार

संविधान दिवस समारोह को विपक्ष के बहिष्कार करने वाले मुद्दे पर नीरज दुबे ने साफ तौर पर कहा कि यह किसी पॉलिटिकल पार्टी का कार्यक्रम नहीं था। ऐसे में संविधान दिवस समारोह में सभी विपक्षी दलों को शामिल होना चाहिए था, जिस स्थान पर संविधान दिवस समारोह हो रहा था वह लोकतंत्र का मंदिर है और लोकतंत्र का मंदिर सभी के लिए होता है, किसी एक पार्टी के लिए नहीं होता है। ऐसे में विपक्ष को इस समारोह में हिस्सा लेना चाहिए था। उन्होंने कहा कि भले ही विपक्ष संविधान बचाने की बात कहता है और सरकार पर संविधान को खत्म करने का आरोप लगाता है लेकिन कहीं ना कहीं संवैधानिक प्रक्रिया को फिलहाल विपक्ष कमजोर कर रह है। उन्होंने संविधान दिवस समारोह में विपक्ष के बहिष्कार को आगामी संसद सत्र से भी जोड़ कर देखा। नीरज दुबे ने कहा कि कहीं ना कहीं संविधान दिवस समारोह को बहिष्कार कर विपक्ष सरकार को यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि वह संसद सत्र के दौरान आक्रामक तरीके से सत्तापक्ष को घेरने की कोशिश करेगा। 

विपक्ष की राजनीति 

संसद की हुई तो हमने आगामी सत्र को लेकर विपक्ष की राजनीति पर भी नीरज दुबे से सवाल कर लिया। आगामी सत्र में विपक्ष के अपने नीति के सवाल पर नीरज दुबे ने कहा कि कहीं ना कहीं सरकार ने कृषि कानूनों को वापस लेकर विपक्ष से बड़ा मुद्दा छीन लिया है। ऐसे में आगामी सत्र को विपक्ष हंगामेदार बनाने के लिए कोई नई रणनीति पर काम करने करेगा। उन्होंने कहा कि एमएसपी गारंटी कानून की मांग को लेकर विपक्ष संसद में हो-हल्ला कर सकता है। साथ ही साथ लखीमपुर हिंसा मामले को लेकर अजय मिश्रा टेनी के इस्तीफे की मांग को लेकर भी हंगामा मचा सकता है। इसके अलावा उन्होंने कहा कि विपक्ष महंगाई के साथ-साथ बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर भी सरकार को घेरने की कोशिश करेगा। 

किसान को रणनीति

किसान आंदोलन को लेकर भी हमने नीरज दुबे से सवाल किया तो उन्होंने साफ तौर पर कहा कि भले ही कृषि कानून वापस हो गया है लेकिन किसान आंदोलन अभी खत्म नहीं होने वाला है। नीरज दुबे ने एक बार फिर से इस आंदोलन को चुनावी करार देते हुए कहा कि कहीं ना कहीं यह आंदोलन उत्तर प्रदेश चुनाव के बाद ही खत्म होता दिखाई दे रहा है। किसान लगातार अपनी मांगों की फेहरिस्त बढ़ाते जा रहे हैं। पहले कृषि कानूनों को रद्द करने की बात करते थे लेकिन अब उन्हें एमएसपी गारंटी कानून चाहिए, तथाकथित आंदोलन में मरे लोगों के लिए शहीद स्मारक भी चाहिए। इसके साथ ही वह तमाम केस दर्ज जो हुए हैं उसको वापस लेने की भी मांग कर रहे हैं। नीरज दुबे ने कहा कि भले ही कृषि कानूनों को सरकार ने वापस ले लिया है लेकिन किसानों के आगे अब और सरकार नहीं  झुकेगी। किसानों को भी यह बात पता है, तभी तो किसान आंदोलन के 1 साल पूरे होने पर दिल्ली के अलग-अलग बॉर्डर पर किसान जुटने लगे हैं और उनके ट्रैक्टरों पर राशन के सामान भरे पड़े हैं जिसका मतलब है कि फिलहाल वह संसद सत्र तक तो दिल्ली में अपनी विशाल मौजूदगी को दर्ज कराना चाहते हैं।

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UP में चुनावी बयान

आगामी उत्तर प्रदेश चुनाव को लेकर भी हमने विपक्ष की रणनीति पर चर्चा की तो उन्होंने कहा कि अखिलेश छोटे-छोटे दलों को जोड़ने की भले ही कोशिश कर रहे हैं लेकिन वह सिर्फ एक फोटो फ्रेम का काम करेगा। उन्होंने उदाहरण के लिए कहा कि उत्तर प्रदेश में आम आदमी से गठबंधन करके समाजवादी पार्टी को क्या हासिल होगा? ऐसे में भले ही वह एक मंच पर सब को लाने की कोशिश कर रहे हैं और यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि वह कई दलों के साथ है लेकिन जिन दलों के साथ वह इस वक्त है उनका अस्तित्व उत्तर प्रदेश में क्या है? इस पर विचार करना होगा? दूसरी ओर मायावती की रणनीति पर नीरज दुबे ने माना कि कहीं ना कहीं बसपा आगामी चुनाव को लेकर उतनी आक्रमक नहीं दिख रही है लेकिन यह उनके रणनीति का हिस्सा है। बसपा हमेशा शांत रहकर लोगों तक पहुंचने की कोशिश करती है और अपने रणनीति का कम ही खुलासा करती है।

- अंकित सिंह