बंगाल में ममता सरकार के खिलाफ अमित शाह की हुंकार तो बिहार में किसकी बयार

  •  प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क
  •  नवंबर 7, 2020   13:40
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बंगाल में ममता सरकार के खिलाफ अमित शाह की हुंकार तो बिहार में किसकी बयार

केंद्रीय मंत्री अमित शाह ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से कहा कि वह राज्य में राजनीतिक हत्याओं पर श्वेत-पत्र लेकर आएं और हैरानी जताई कि प्रदेश सरकार ने क्यों राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) को अपराध के आंकड़े नहीं भेजे।

चुनावी उठा-पटक के बीच हमने प्रभासाक्षी के खास कार्यक्रम चाय पर समीक्षा में पश्चिम बंगाल और बिहार के राजनीतिक परिदृश्य पर चर्चा की। 2021 में पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा पूरी तरीके से कमर कस चुकी है। खास बात यह है कि भाजपा भावनात्मक तरीके से लोगों को आकर्षित करने में जुटी हुई है। दशहरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए वहां के कार्यकर्ताओं से बातचीत की तो वही अमित शाह दो दिवसीय दौरे पर पश्चिम बंगाल पहुंचे। शाह का यह दौरा काली पूजा के ठीक पहले का है। अपने दौरे के दौरान अमित शाह ने हर वर्ग को साधने की कोशिश की और इसी के तहत वह पार्टी के मारे गए कार्यकर्ताओं के परिजनों से मिले और गरीबों के घर खाना भी खाया। ममता सरकार पर अमित शाह जमकर बरसे और अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में 200 से ज्यादा सीटें जीतने का दावा भी कर दिया। वहीं, बिहार विधानसभा चुनाव संपन्न हो चुके है। अब नतीजों का इंतजार है। 10 तारीख को नतीजे आएंगे। लेकिन इस सप्ताह सबसे ज्यादा इस बात की चर्चा रही कि क्या वाकई नीतीश कुमार 2025 के चुनाव में नहीं लड़ेंगे?

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केंद्रीय मंत्री अमित शाह ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से कहा कि वह राज्य में राजनीतिक हत्याओं पर श्वेत-पत्र लेकर आएं और हैरानी जताई कि प्रदेश सरकार ने क्यों राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) को अपराध के आंकड़े नहीं भेजे। संशोधित नागरिकता कानून के लागू होने का जिक्र करते हुए शाह ने कहा कि कानून अपनी जगह है और यह केंद्र सरकार का संकल्प है। शाह ने यहां एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा, “विकास के नए युग में हम एक मजबूत बंगाल बनाने का लक्ष्य रखते हैं। ममता बनर्जी अपने भतीजे को अगला मुख्यमंत्री बनाने का लक्ष्य रखती हैं।” उन्होंने कहा, “पश्चिम बंगाल सरकार ने 2018 से एनसीआरबी को अपराध के आंकड़े नहीं भेजे हैं। मैं कहना चाहता हूं कि ममता बनर्जी राजनीतिक हत्याओं पर श्वेत-पत्र लेकर आएं। राजनीतिक हत्याओं के लिहाज से बंगाल शीर्ष पर है।” राज्य में सरकारी अधिकारियों का राजनीतिकरण और अपराधीकरण होने का आरोप लगाते हुए केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा, “पश्चिम बंगाल में तीन कानून हैं- एक भतीजे के लिये, एक अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण के लिये और एक आम लोगों के लिये।” राज्यपाल जगदीप धनखड़ और प्रदेश सरकार के बीच टकराव पर शाह ने कहा कि राज्यपाल अपने संवैधानिक दायरे के तहत काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा, “राज्यपाल के खिलाफ इस्तेमाल शब्द अस्वीकार्य हैं। मैं जानना चाहूंगा कि (दार्जिलिंग) के जिलाधिकारी कहां हैं जिन्हें राज्यपाल से मुलाकात के बाद हटाया गया था।

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कोलकाता में प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए कहा कि आज मेरा बंगाल का दो दिवसीय दौरा समाप्त हो रहा है। इस दौरे के दौरान भाजपा के 4 विभागों के कार्यकर्ता और समाज के अन्य कार्यकर्ताओं से मिलना हुआ। करीब 180 से ज्यादा संस्थाओं के प्रतिनिधियों से भी संवाद हुआ। इस बीच उन्होंने कहा कि 2010 में बड़े चाव के साथ 11 अप्रैल को मां, माटी और मानुष के नारे के साथ बंगाल में परिवर्तन हुआ था। बंगाल की जनता के मन मे ढेर सारी अपेक्षायें और आशाएं थी। उन्होंने कहा कि कम्यूनिस्ट शासन से त्रस्त होकर ममता बनर्जी के हाथों में बंगाल की कमान दी गई थी। मगर आज मां, माटी और मानुष का नारा तुष्टिकरण, तानाशाही और टोलबाजी में परिवर्तित हो गया है। तृणमूल सरकार जनता की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर सकी है। शाह ने कहा कि बंगाल की जनता में एक अजीब प्रकार का वातावरण दिख रहा है। मैं जहां भी गया तो सैकड़ों लोग सकड़ों पर आए थे। जब वो भारत माता की जय, वंदे मातरम, जय श्रीराम के नारे लगाते थे, वो हमारे स्वागत में कम, ममता सरकार के प्रति गुस्से को ज्यादा दिखाते थे।

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केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह कोलकाता के उत्तर में स्थित बगुईहाटी में मतुआ समुदाय के एक सदस्य के घर गए और वहां पर दोपहर का भोजन किया। समुदाय के एक सदस्य नवीन बिस्वास के घर जाने से पहले शाह मोहल्ले में स्थित मतुआ समुदाय के एक मंदिर में गए और वहां कुछ समय व्यतीत किया। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने शुक्रवार को कहा कि पश्चिम बंगाल के ‘‘खोए गौरव’’ को वापस लाने की आवश्यकता है और राज्य में ‘‘तुष्टिकरण की मौजूदा राजनीति’’ ने राष्ट्र की आध्यात्मिक चेतना को बनाए रखने की अपनी सदियों पुरानी परंपरा को चोट पहुंचाई है। शाह ने कहा कि पश्चिम बंगाल चैतन्य महाप्रभु, श्री रामकृष्ण और स्वामी विवेकानंद जैसी हस्तियों की भूमि है। उन्होंने कहा कि यह राज्य पहले पूरे देश में आध्यात्मिक जागृति का केंद्र हुआ करता था। 

अमित शाह ने पश्चिम बंगाल में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव का आश्वासन दिया है: भाजपा नेताओं ने कहा

केंद्रीय गृह मंत्री एवं भाजपा के वरिष्ठ नेता अमित शाह ने पार्टी की पश्चिम बंगाल इकाई को आश्वासन दिया कि केंद्र राज्य में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष विधानसभा चुनाव सुनिश्चित करेगा। यह जानकारी पार्टी सूत्रों ने दी। राज्य में विधानसभा चुनाव अप्रैल-मई 2021 में होने की उम्मीद है। शाह ने भाजपा की एक आंतरिक बैठक को संबोधित करते हुए राज्य इकाई को कड़ी मेहनत करने के लिए कहा ताकि पार्टी तृणमूल कांग्रेस को सत्ता से हटाकर राज्य में अगली सरकार बना सके। उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं को संगठन को मजबूत करने और यह सुनिश्चित करने के लिए कहा कि केंद्र की जन-समर्थक नीतियों के बारे में आम लोग अवगत हों। प्रदेश भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने बैठक के बाद कहा, ‘‘बैठक के दौरान अमित शाह जी ने कहा कि कुछ लोग पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के दौरान हिंसा के बारे में आशंकित हैं। 

बिहार विधानसभा चुनाव 2020 मेरा अंतिम चुनाव: नीतीश कुमार

बिहार के मुख्यमंत्री और जनता दल यूनाइटेड के नेता नीतीश कुमार ने कहा कि राज्य में हो रहा विधानसभा चुनाव उनका अंतिम चुनाव है। पूर्णिया के धमदाहा में एक चुनावी जनसभा को संबोधित कर रहे नीतीश कुमार ने कहा, ‘‘आज चुनाव प्रचार का अंतिम दिन है। परसों मतदानहै और यह मेरा अंतिम चुनाव है। अंत भला तो सब भला। ’’ गौरतलब है कि नीतीश कुमार ने साल 1977 में अपना पहला चुनाव लड़ा था। वह कई बार लोकसभा के सांसद रहे और अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मंत्री भी रहे। नीतीश कुमार साल 2005 से बिहार के मुख्यमंत्री हैं। जनता से बिहार के विकास के लिए राजग को वोट देने की अपील करते हुए नीतीश कुमार ने कहा कि राज्य की पहले की स्थिति और आज की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। उन्होंने कहा कि राज्य को अभी विकास के नए आयाम तय करने हैं और इसके लिए राजग के पक्ष में मतदान जरूरी है। मुख्यमंत्री ने कहा ‘‘जब हमें काम करने का मौका मिला, तब हमने कहा था कि न्याय के साथ विकास किया जाएगा। हमने अपना वादा पूरा किया। हमने किसी की भी उपेक्षा नहीं की, सबको साथ ले कर चले, सबका विकास किया। आगे मौका मिला तो राज्य को विकास की नयी ऊंचाइयों तक पहुंचाएंगे।

जदयू का दावा: नीतीश के दिमाग में रिटायरमेंट नहीं

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने यह कहकर राजनीतिक हलकों में उथल-पुथल मचा दी है कि यह विधानसभा चुनाव उनका अंतिम चुनाव है। उनके इस बयान से राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। सत्तारूढ़ जनता दल (यूनाइटेड) ने स्पष्ट रूप से उन चर्चाओं को खारिज कर दिया कि पार्टी प्रमुख नीतीश कुमार राजनीति से संन्यास लेने के बारे में सोच रहे हैं। 30 वर्षों से भी अधिक समय से नीतीश कुमार के साथ जुड़े रहने वाले और वर्तमान में पार्टी की राज्य इकाई के प्रमुख व दिग्गज समाजवादी नेता वशिष्ठ नारायण सिंह ने इन विवेचनाओं को खारिज कर दिया। कुमार के इस बयान पर विपक्षी दलों की ओर से प्रतिक्रियाओं की झड़ी लग गई जिनका दावा है कि कुमार के बयान से लगता है कि वह अपनी हार मान चुके हैं। राज्यसभा सांसद सिंह ने कहा, ‘‘क्या कोई राजनीतिक या सामाजिक कार्यकर्ता कभी सेवानिवृत्त होता है? क्या नीतीश कुमार खुद विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं?’’ सिंह ने कहा, ‘‘यदि पूरा बयान सुने या संदर्भ को समझे बिना विपक्ष अपनी गलतफहमी से खुश हो रहा है, तो इसमें हम कुछ नहीं कर सकते। जबकि तथ्य यह है कि तीसरे और अंतिम चरण के चुनाव के लिए प्रचार से कुछ समय पहले वह अपनी अंतिम चुनावी रैली को संबोधित कर रहे थे, जिसका वह जिक्र कर रहे थे।’’ राज्य के मंत्री संजय कुमार झा ने भी इसी तरह की बात कही। मुख्यमंत्री के करीबी झा ने बताया, 2005 के बाद से हर बार प्रचार के दौरान अपनी आखिरी जनसभा में कुमार इस तरह कहते रहे हैं। इसका यह मतलब निकालना कि यह उनका आखिरी चुनाव है, यह बिल्कुल गलत है। उन्होंने कहा, ‘‘जब तक जनता चाहती है, तब तक कुमार राज्य और यहां के लोगों की सेवा करते रहेंगे।’’ 

विपक्ष का तंज

राजद की ओर से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार तेजस्वी यादव ने इस पर कहा, हमारी बात सही साबित हुई। हम सब कह रहे थे कि नीतीश कुमार थक चुके हैं और अब बिहार पर शासन करने में वह सक्षम नहीं है। सेवानिवृत्ति उनके लिए अच्छी रहेगी।’’ इसके साथ ही लोक जनशक्ति पार्टी के प्रमुख चिराग पासवान ने भी मुख्यमंत्री की टिप्पणी पर तंज कसा है। चिराग ने ट्वीट कर कहा, ‘‘साहब ने कहा है कि यह उनका आख़िरी चुनाव है। इस बार पिछले 5 साल का हिसाब दिया नहीं और अभी से बता दिया कि अगली बार हिसाब देने आएँगे नहीं। अपना अधिकार उनको ना दें जो कल आपका आशीर्वाद फिर माँगने नहीं आएँगे। अगले चुनाव में ना साहब रहेंगे ना जे॰डी॰यू॰।फिर हिसाब किससे लेंगे हम लोग?’’ कांग्रेस के विधान पार्षद प्रेम चंद्र मिश्रा ने मुख्यमंत्री के बयान को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया।





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क्या OTT प्लेटफॉर्म्स का हो रहा दुरुपयोग? मिर्जापुर और तांडव जैसी वेब सीरीज समाज को दे रही कैसा संदेश

  •  अंकित सिंह
  •  जनवरी 23, 2021   10:12
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क्या OTT प्लेटफॉर्म्स का हो रहा दुरुपयोग? मिर्जापुर और तांडव जैसी वेब सीरीज समाज को दे रही कैसा संदेश

बॉलीवुड एक्टर सैफ अली खान की वेब सीरीज तांडव के खिलाफ पूरे देश में विरोध प्रदर्शन हो रहा है। वेब सीरीज में दिखाए गये कुछ विवादित सीन को लेकर वेब सीरीज को बैन करने की मांग हो रही है। कई राज्यों में वेब सीरीज तांडव के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जा चुकी है।

वेब सीरीज तांडव को लेकर देशभर में विवाद जारी है। कई राज्यों में तांडव के निर्माता और स्टार कास्ट पर एफआईआर दर्ज भी करा दिए गए है। हिंदू संगठनों का आरोप है कि इस वेब सीरीज के जरिए धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का काम किया गया है। दूसरी ओर यह भी आरोप लग रहे है कि ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर कुछ भी परोसा जा रहा है और सरकार कुछ कार्रवाई नहीं कर रही है। इसी विषय पर प्रभासाक्षी के सप्ताहिक कार्यक्रम चाय पर समीक्षा में चर्चा की गई। चर्चा के दौरान प्रभासाक्षी के संपादक नीरज कुमार दुबे ने कहा कि किसी भी फिल्म या वेब सीरीज के निर्माण के दौरान इस बात का ध्यान जरूर रखा जाना चाहिए कि वह किसी के भावनाओं को आहत ना कर रहा हो। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि पहले फिल्में समाज का आईना होती थीं लेकिन अब फिल्म और वेब सीरीज के जरिए बच्चों पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है जो कि आने वाले दिनों में समाज के लिए हानिकारक साबित हो सकता है। सबसे बड़ा सवाल तो यही है ना कि क्या मिर्जापुर और तांडव जैसी वेब सीरीज में जो चीजें दिखाई गई है, समाज में कुछ वैसा ही होता है? इन वेब सीरीज का समाज पर किस तरह का असर पड़ रहा है, यह भी सोचने की जरूरत है। कुछ भी दिखाना कमाई का जरिया हो सकता है पर वह हमेशा समाज के लिए सही होगा इस पर संशय है। 

शिकायत पर कानून के अनुसार कार्रवाई की जायेगी

महाराष्ट्र पुलिस को विवादास्पद वेब श्रृंखला ‘‘तांडव’’ के बारे में एक शिकायत मिली है। राज्य के गृह मंत्री अनिल देशमुख ने यह जानकारी दी। देशमुख ने यहां पत्रकारों से बातचीत में मांग की कि केन्द्र सरकार को ‘ओवर द टॉप (ओटीटी) मंचों पर सामग्री को विनियमित करने के लिए एक कानून लाना चाहिए। अमेजन प्राइम वीडियो की श्रृंखला ‘‘तांडव’’ पर धार्मिक भावनाओं को भड़काने के आरोप लगाये गये है और इसके खिलाफ कुछ राज्यों में कई प्राथमिकी दर्ज हुई है। इसके निर्माताओं ने मंगलवार को विवादास्पद वेब श्रृंखला में बदलावों को लागू करने पर सहमति जताई थी।

ओटीटी प्लेटफॉर्म पर कानूनी लगाम बेहद जरूरी

तांडव वेब सीरीज और अन्य कई ऐसी सीरीजों ने हिंदू धर्म की आस्था और धार्मिक भावनाओं को एक बार फिर जानबूझ कर चोट पहुंचायी है। इस सीरीज में भगवान शिवजी को एक अत्याधुनिक पुरूष के रूप में आड़ी तिरछी रेखाओं का चेहरा बनाये हुए दिखाया गया है जिसमें उनके मजाक उड़ाने की बात किसी से छिपी नहीं है। सभी जानते हैं कि भगवान शिवजी का स्थान हिंदू धर्म में स्वीकार किये गये एकमात्र पूर्ण, सर्वशक्तिमान, सर्वव्याप्त एवं अविनाशी ब्रह्म के तीन रूपों- अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश या शिव में से एक तथा उन्हीं के समान सर्वोच्च एवं पवित्रतम है। हिंदू धर्म के अनुसार तीनों ईश्वर एक ही ब्रह्म के तीन रूप हैं जहाँ सृष्टि के निर्माणकर्ता ब्रह्माजी, पालनकर्ता विष्णुजी तथा संहारकर्ता शिवजी अनादि काल से स्थापित हैं। अतः भारत तथा संपूर्ण विश्व में रह रहे लाखों करोड़ों हिंदुओं की कालातीत आस्था के प्रतीक ऐसे सर्वोच्च एवं सर्वशक्तिमान पूर्ण ब्रह्म को एक साधारण नाटकीय रूप में दिखाना निश्चय ही उनका मजाक उड़ाना तथा उन आस्थावान हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं पर गंभीर कुठाराघात करना नहीं है तो और क्या है। इसी प्रकार से ओटीटी प्लेटफॉर्म पर कई अन्य वेब सीरीज दिखाई जा रही हैं जिनमें अभद्रता और अश्लीलता का नंगा नाच दर्शकों को दिखाया जा रहा है जिनका लक्ष्य कहीं न कहीं हिंदुओं की सामाजिक व्यवस्था तथा धार्मिक कर्मकाण्ड आदि का उपहास करना ही होता है।

विरोध प्रदर्शन जारी

बॉलीवुड एक्टर सैफ अली खान की वेब सीरीज तांडव के खिलाफ पूरे देश में विरोध प्रदर्शन हो रहा है। वेब सीरीज में दिखाए गये कुछ विवादित सीन को लेकर वेब सीरीज को बैन करने की मांग हो रही है। कई राज्यों में वेब सीरीज तांडव के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जा चुकी है। मामले की जांच करने के लिए उत्तर प्रदेश पुलिस के 4 सदस्य मुंबई भी पहुंच चुके हैं। लगातार बढ़ते विवाद के बाद तांडव के निर्देशक अली अब्बस जफर ने पूरी टीम की तरफ से माफी भी मांगी है। उन्होंने सोशल मीडिया पर एक नोट जारी किया जिसमें उन्होंने कहा कि अगर गैर-इरादतन किसी की हमने भावनाओं को आहत किया है तो हम बिना शर्त माफी मांगते हैं। मुंबई सहित कई राज्यों में तांडव के खिलाफ विरोध प्रदर्शन जारी है। 

तांडव के निर्माताओं ने मांगी माफी

अमेजन प्राइम वीडियो पर प्रसारित तांडव वेब सीरीज के एक दृश्य को लेकर शुरू हुए विवाद के मामले में इसके निर्माताओं ने सोमवार को बिना शर्त माफी मांगी और कहा कि उनका किसी की भावनाओं को चोट पहुंचाने का कोई इरादा नहीं था। वेब सीरीज के एक एपिसोड में कथित तौर पर ‘‘धार्मिक भावनाएं’’ आहत होने की शिकायत पुलिस में दर्ज करवाई गई थी। ‘तांडव’ के कास्ट एवं क्रू की ओर से जारी आधिकारिक वक्तव्य में कहा गया, ‘‘वेब सीरीज तांडव पर दर्शकों की प्रतिक्रिया पर हम करीब से नजर रख रहे हैं और आज एक चर्चा के दौरान सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने हमें बताया कि उन्हें वेब सीरीज के विभिन्न पहलुओं को लेकर बड़ी संख्या में शिकायतें और अर्जियां मिली हैं जो इसकी सामग्री द्वारा लोगों की भावनाओं को आहत करने संबंधी गंभीर चिंताओं और आशंकाओं के बारे में हैं।’’ 

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सूचना प्रसारण मंत्रालय ले सकता है एक्शन

लॉकडाउन के दौरान ओटीटी प्लेटफॉर्म मनोरंजन के क्षेत्र में तीसरे पर्दे के तौर पर उभरा है। इस प्लेटफॉर्म पर रिलीज होने वाली फिल्मों या वेब सीरीजों का सेंसर नहीं किया जाता, यानी कि ओटीटी के लिए किसी तरह का कोई सेंसर बोर्ड नहीं है जिसके कारण ओटीटी के काफी कंटेंट विवादों में घिरे रहते हैं। पिछले साल अनुष्का शर्मा के प्रोडक्शन हाउस में बनीं वेब सीरीज पाताल लोक अमेजन प्राइम वीडियो पर रिलीज हुई थी। जिसमें पालतू कुतिया का नाम सावित्री रखा गया था जिसे लेकर काफी विवाद हो गया था। अब सैफ अली खान की हाल ही में रिलीज हुई वेब सीरीज 'तांडव' को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। कुछ हिंदू संगठनों ने सैफ अली खान की फिल्म 'ताडंव' पर पूजनीय देवी-देवताओं का अपमान करने का आरोप लगाया है। लगातार ओटीटी प्लेटफॉर्म पर विवादित कंटेंट आने के बाद आपत्तिजनक कंटेंट को लेकर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय अलर्ट हो गया है। वह जल्द ही ओटीटी के लिए नयी गाइडलाइंस जारी करेगा।

- अंकित सिंह







सरकार और किसानों के बीच 9 दौर की बातचीत के बाद भी परिस्थितियां जस की तस, अब आगे क्या होगा?

  •  अंकित सिंह
  •  जनवरी 16, 2021   14:38
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सरकार और किसानों के बीच 9 दौर की बातचीत के बाद भी परिस्थितियां जस की तस, अब आगे क्या होगा?

सरकार ने विरोध प्रदर्शन कर रहे किसान संगठनों से तीन कृषि कानून के बारे में अपनी आपत्तियां और सुझाव रखने एवं ठोस प्रस्ताव तैयार करने के लिये एक अनौपचारिक समूह गठित करने को कहा जिस पर 19 जनवरी को अगले दौर की वार्ता में चर्चा हो सकेगी।

केंद्र सरकार द्वारा लाए गए तीन कृषि कानूनों को लेकर किसान और सरकार के बीच तकरार लगातार जारी है। अब तक 9 दौर की बातचीत हो गई है लेकिन नतीजा कुछ भी नहीं निकल सका है। एक ओर जहां किसान कृषि कानूनों को वापस लिए जाने की मांग पर अड़े हुए हैं तो वहीं सरकार किसी भी कीमत पर इन कानूनों को वापस लेने को तैयार नहीं है। सरकार कानूनों में संशोधन करने को तैयार है और साथ ही साथ सरकार यह कह रही है कि वह एमएसपी को लेकर गारंटी दे सकती है। किसान आंदोलन के लगभग 50 दिन से ज्यादा हो चुके है। सुप्रीम कोर्ट में भी इस मामले को लेकर सुनवाई जारी है। कोर्ट ने इसके लिए एक कमेटी का गठन भी कर दिया है। कमेटी को लेकर भी तकरार है। इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर किसान आंदोलन किस ओर जा रहा है? क्या किसान आंदोलन राजनीति से प्रेरित है? क्या किसान संगठन के नेता किसानों को गुमराह कर रहे हैं? क्या सिर्फ कृषि कानूनों से 3 राज्यों के ही किसानों को दिक्कत है? या फिर सिर्फ सरकार पर दबाव बनाने के लिए यह एक महज कोशिश है? इन्हीं तमाम सवालों पर हमने प्रभासाक्षी के सप्ताहिक कार्यक्रम चाय पर समीक्षा में बातचीत की। प्रभासाक्षी के संपादक नीरज कुमार दुबे से हमने जाना कि किसान आंदोलन वर्तमान में किस परिस्थिति में है और आने वाले दिनों में इसका क्या होने वाला है।

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सरकार ने विरोध प्रदर्शन कर रहे किसान संगठनों से तीन कृषि कानून के बारे में अपनी आपत्तियां और सुझाव रखने एवं ठोस प्रस्ताव तैयार करने के लिये एक अनौपचारिक समूह गठित करने को कहा जिस पर 19 जनवरी को अगले दौर की वार्ता में चर्चा हो सकेगी। तीन केंद्रीय मंत्रियों के साथ शुक्रवार को हुई नौवें दौर की वार्ता में प्रदर्शनकारी किसान तीन नये विवादित कृषि कानूनों को निरस्त करने की अपनी मांग पर अड़े रहे जबकि सरकार ने किसान नेताओं से उनके रुख में लचीलापन दिखाने की अपील की एवं कानून में जरूरी संशोधन के संबंध अपनी इच्छा जतायी। विज्ञान भवन में करीब पांच घंटे तक चली बैठक में तीनों केंद्रीय मंत्री किसी निर्णायक स्थिति तक नहीं पहुंच सके।इसके बाद दोनों पक्षों ने तय किया कि अगली बैठक 19 जनवरी को होगी। कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि सरकार का रूख लचीला है और उन्होंने किसान संगठनों से भी रूख में लचीलापन लाने की अपील की। यह संयोग ही है कि अगले दौर की वार्ता उस दिन होने जा रही है जिस दिन कृषि कानूनों को लेकर गतिरोध दूर करने के संबंध में उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित समिति की पहली बैठक होने की संभावना है। इससे एक दिन पहले उच्चतम न्यायालय उस याचिका पर सुनवाई कर सकती है जो गणतंत्र दिवस पर किसानों की ट्रैक्टर रैली के आह्वान के खिलाफ दायर की गई है। बैठक के बाद कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने संवाददाताओं से कहा कि दोनों वार्ताएं साथ साथ जारी रह सकती है। किसान संगठन सरकार से वार्ता जारी रखना चाहते हैं और अदालत द्वारा भी संकट के समाधान तक पहुंचने के लिये समिति का गठन किया गया। उन्होंने कहा, ‘‘हमें इसपर कोई आपत्ति नहीं है। 

उच्चतम न्यायालय ने जो समिति बनाई है, वह समिति भी समाधान ढूंढ़ने के लिए है। अनेक स्थानों पर चर्चा होती है तो हो सकता है कि किसी चर्चा के माध्यम से रास्ता निकल सके।’’ केंद्रीय मंत्री ने कहा कि सरकार की कोशिश है कि वार्ता के माध्यम से कोई रास्ता निकले और किसान आंदोलन समाप्त हो। उन्होंने कहा, ‘‘किसान सर्दी में बैठे हुए हैं। कोरोना का भी संकट है। सरकार निश्चित रूप से चिंतित है। इसलिए सरकार खुले मन से और बड़प्पन से लगातार चर्चा कर रही है।’’ तोमर ने कहा, ‘‘हमने उनको (किसान संगठनों) यह भी सुझाव दिया कि वे चाहें तो अपने बीच में एक अनौपचारिक समूह बना लें... जो लोग ठीक प्रकार से कानून पर बात कर सकते हैं... सरकार से उनकी अपेक्षा क्या है?... कानूनों में किसानों के प्रतिकूल क्या है... इसपर आपस में चर्चा करके और कोई मसौदा बनाकर वे सरकार को दें तो सरकार उसपर खुले मन से विचार करने को तैयार है।’’ तीनों कृषि कानूनों के क्रियान्वयन पर रोक लगाने और विवाद को सुलझाने के मकसद से समिति गठित करने संबंधी उच्चतम न्यायालय के आदेश का स्वागत करते हुए तोमर ने कहा कि सरकार उच्चतम न्यायालय के आदेशों के प्रति पूरी तरह से प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा, ‘‘उच्चतम न्यायालय ने जो निर्णय दिया है, उसका भारत सरकार स्वागत करती है। जो समिति बनाई गई है, वह जब भारत सरकार को बुलाएगी तो हम अपना पक्ष प्रस्तुत करेंगे। अपनी बात निश्चित रूप से रखेंगे।’’ किसान नेता जोगिन्दर सिंह उग्रहान ने संवाददाताओं से बैठक के बाद कहा कि किसान संगठनों ने सरकार से तीनों कानून रद्द करने का आग्रह किया लेकिन केंद्र ऐसा करने को अनिच्छुक दिखी। उन्होंने कहा, ‘‘ हमने 19 जनवरी को दोपहर 12 बजे फिर से मिलने का फैसला किया है। ’’ उग्रहान ने कहा कि बैठक के दौरान किसान संगठनों के नेताओं ने पंजाब के उन ट्रांसपोर्टरों पर एनआईए के छापे का मुद्दा उठाया जो किसान विरोध प्रदर्शन का समर्थन कर रहे हैं और आवाजाही की सुविधाएं प्रदान कर रहे हैं। 

राष्ट्रीय किसान मजदूर महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवकुमार कक्का ने कहा कि किसान संगठनों ने पंजाब में अढ़ातियों पर आयकर के छापे का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि हरियाणा के 900 किसानों के खिलाफ आईपीसी की धारा 307 के तहत मामला दर्ज किया गय है जबकि ट्रांसपोर्टरों पर एनआईए के छापे मारे जा रहे हैं। यह संवैधानिक नहीं है और बदले की कार्रवाई है। किसान नेताओं ने बताया कि तोमर ने उनसे कहा कि वे इस मामले को देखेंगे कि ऐसा क्यों हुआ है। किसान संगठनों के प्रतिनिधियों ने लंगर के तहत लाया भोजन ग्रहण किया। किसान संगठनों ने कहा कि वे तीन कृषि कानूनों को लेकर जारी गतिरोध को दूर करने के लिये सीधी वार्ता जारी रखने को प्रतिबद्ध हैं। केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, रेलवे, वाणिज्य एवं खाद्य मंत्री पीयूष गोयल और वाणिज्य राज्य मंत्री तथा पंजाब से सांसद सोम प्रकाश ने करीब 40 किसान संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ विज्ञान भवन में नौवें दौर की वार्ताकी। बहरहाल, कृषि कानूनों को लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी के आरोपों के बारे में पूछे जाने पर तोमर ने कहा, ‘‘राहुल गांधी के बयान पर और राहुल गांधी के कृत्य पर पूरी कांग्रेस सिर्फ हंसती है और उनका उपहास उड़ाती है।’’ उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी ने 2019 के लोकसभा चुनाव के अपने घोषणापत्र में इन्हीं कृषि सुधारों का वादा किया था। तोमर ने कहा, ‘‘राहुल गांधी और सोनिया गांधी जी को मीडिया के समक्ष आकर स्पष्ट करना चाहिए कि वे उस वक्त झूठ बोल रहे थे या अब झूठ बोल रहे हैं।’’ बैठक में हिस्सा लेने वाली अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति की सदस्य कविता कुरूंगटी ने कहा,‘‘सरकार और किसान संगठनों ने सीधी वार्ता की प्रक्रिया जारी रखने की प्रतिबद्धता व्यक्त की। ’’ इससे पहले 11 जनवरी को उच्चतम न्यायालय ने तीन कृषि कानूनों के कार्यान्वयन पर अगले आदेश तक रोक लगा दी थी।

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शीर्ष अदालत ने इस मामले में गतिरोध को समाप्त करने के लिये चार सदस्यीय समिति का गठन किया था। हालांकि, समिति के सदस्य और भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष भूपिन्दर सिंह मान ने कल समिति से अपने को अलग कर लिया। पंजाब किसान मोर्चा के बलजीत सिंह बाली ने कहा, ‘‘अपनी प्रारंभिक टिप्पणी में तोमर जी ने कहा कि आप लगातार कह रहे हैं कि सरकार अड़ी है और इसे प्रतिष्ठा का सवाल बनाये हुए है जबकि हमने आपकी कई मांगों को मान लिया है। क्या आप नहीं समझते कि आपको लचीला होना चाहिए और केवल कानून को रद्द करने की मांग पर अड़े नहीं रहना चाहिए। ’’ इससे पहले, आठ जनवरी को हुई वार्ता बेनतीजा रही थी। पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश से हजारों की संख्या में किसान दिल्ली की सीमाओं के पास पिछले एक महीने से अधिक समय से विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। आठ जनवरी की बैठक में कोई नतीजा नहीं निकल सका था क्योंकि केंद्र सरकार ने तीनों कानूनों को रद्द करने की मांग को खारिज कर दिया और दावा किया कि इन सुधारों को देशव्यापी समर्थन प्राप्त है। वहीं किसान नेताओं ने कहा कि वह अंत तक लड़ाई के लिये तैयार है और कानूनी वापसी के बिना घर वापसी नहीं होगी। इस मामले के समाधान के बारे में राय देने के लिए उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित समिति में अन्य तीन सदस्यों में शेतकारी संगठन महाराष्ट्र के अध्यक्ष अनिल घनावत, इंटरनेशनल फूड पालिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट के प्रमोद कुमार जोशी और कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी शामिल हैं। किसान संगठनों और केंद्र के बीच 30 दिसंबर को छठे दौर की वार्ता में दो मांगों पराली जलाने को अपराध की श्रेणी से बाहर करने और बिजली पर सब्सिडी जारी रखने को लेकर सहमति बनी थी।

कृषि कानूनों के खिलाफ कांग्रेस ने किया देशव्यापी प्रदर्शन, राहुल ने साधा प्रधानमंत्री पर निशाना

कांग्रेस ने तीन नये कृषि कानूनों के खिलाफ देशव्यापी प्रदर्शन किया और इन कानूनों को वापस लेने की मांग की। पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर निशाना साधा और आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री देश के किसानों की ‘‘इज्जत’’ नहीं करते और बार-बार बातचीत करके सिर्फ किसानों को थकाना चाहते हैं। उन्होंने यह दावा भी किया कि मोदी देश के प्रधानमंत्री जरूर हैं, लेकिन ‘उनका रिमोट कंट्रोल’ कुछ पूंजीपतियों के पास है। कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने एक बयान में कहा कि केंद्रीय कृषि कानूनों के खिलाफ कांग्रेस के नेताओं एवं कार्यकर्ताओं ने प्रदेश मुख्यालयों पर धरना-प्रदर्शन किया और राज भवनों का घेराव किया। उन्होंने कहा कि पार्टी ने आंदोलनकारी किसानों के समर्थन में ‘स्पीकअप फॉर किसान अधिकार’ हैशटैग से सोशल मीडिया अभियान भी चलाया। राहुल गांधी और कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाद्रा ने शुक्रवार को जंतर-मंतर पहुंचकर, पंजाब से पार्टी के उन सांसदों के साथ एकजुटता प्रकट की जो पिछले करीब 40 दिनों से कृषि कानूनों के विरोध में धरने पर बैठे हैं। पंजाब से संबंध रखने वाले कांग्रेस के लोकसभा सदस्य जसबीर गिल, गुरजीत औजला, रवनीत सिंह बिट्टू और कुछ अन्य नेता कृषि कानूनों के खिलाफ खुले आसमान के नीचे धरना दे रहे हैं। उनकी मांग तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की है। राहुल गांधी और प्रियंका कुछ देर तक पार्टी के इन सांसदों के साथ धरना स्थल पर बैठे और उनके साथ एकजुटता प्रकट की। इस मौके पर कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष ने कहा, ‘‘देश को आजादी 1947 में मिली, लेकिन इस आजादी को किसानों ने कायम रखा। जिस दिन खाद्य सुरक्षा खत्म होगी उस दिन आजादी चली जाएगी।’’ कांग्रेस नेता ने दावा किया, ‘‘एक तरफ हिंदुस्तान है और दूसरी तरफ मोदी जी के कुछ पूंजीपति मित्र हैं। देश के बहुत सारे लोगों को यह बात समझ नहीं आ रही है कि अगर आज किसान का हक छिना तो अगला नंबर मध्य वर्ग का होगा और फिर दूसरे लोग भी होंगे।’’ 

-अंकित सिंह







अमेरिका के लोकतंत्र को शर्मसार कर गया कैपिटोल परिसर का हंगामा, ट्रंप की बढ़ेंगी मुश्किलें

  •  अंकित सिंह
  •  जनवरी 9, 2021   10:26
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अमेरिका के लोकतंत्र को शर्मसार कर गया कैपिटोल परिसर का हंगामा, ट्रंप की बढ़ेंगी मुश्किलें

अमेरिका के कैपिटोल परिसर में हुई हिंसा इस सप्ताह की सबसे बड़ी खबर रही। अमेरिका जहां एक ओर दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र है, वहीं वर्तमान में हुई घटना दुनिया में उसके साख को कम करने के लिए काफी है। प्रभासाक्षी के खास कार्यक्रम चाय पर समीक्षा में हमने इसी विषय पर चर्चा की।

अमेरिका में कैपिटोल परिसर के बाहर निवर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और पुलिस के बीच हिंसक झड़प हुई, जिसके बाद परिसर को ‘‘लॉक्ड डाउन’’ (प्रवेश एवं निकास बंद) कर दिया गया। कैपिटोल के भीतर यह घोषणा की गई कि ‘‘बाहरी सुरक्षा खतरे’’ के कारण कोई व्यक्ति कैपिटोल परिसर से बाहर या उसके भीतर नहीं जा सकता। जब नवनिर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन की जीत को प्रमाणित करने के लिए सांसद संसद के संयुक्त सत्र के लिए कैपिटोल के भीतर बैठे थे, तभी यूएस (अमेरिका) कैपिटोल पुलिस ने इसके भीतर सुरक्षा के उल्लंघन की घोषणा की। कैपिटोल के बाहर पुलिस और ट्रंप समर्थकों के बीच झड़प हुई। प्रदर्शनकारियों ने कैपिटोल की सीढ़ियों के नीचे लगे अवरोधक तोड़ दिए। कैपिटोल पुलिस ने बताया कि इलाके में एक संदिग्ध पैकेट भी मिला है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संसद का संयुक्त सत्र शुरू होने से ठीक पहले कहा कि वह चुनाव में हार को स्वीकार नहीं करेंगे। उन्होंने आरोप लगाया कि इसमें धांधली हुई है और यह धांधली उनके डेमोक्रेटिक प्रतिद्वंद्वी जो बाइडन के लिए की गई, जो नवनिर्वाचित राष्ट्रपति हैं। ट्रंप ने वाशिंगटन डीसी में अपने हजारों समर्थकों को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘जब धांधली हुई हो तब आपको अपनी हार स्वीकार नहीं करनी चाहिए।’’ ट्रंप ने एक घंटे से अधिक के अपने भाषण में दावा किया कि उन्होंने इस चुनाव में शानदार जीत हासिल की है।

कैपिटल हिल में हिंसा अमेरिका के लिए ‘बेहद अपमान और शर्मिंदगी’ का पल: ओबामा

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा नेकैपिटल बिल्डिंग में हिंसा भड़काने के लिए निवर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि यह देश के लिए ‘‘बेहद अपमान और शर्मिंदगी’’ का पल है। ओबामा ने एक बयान में कहा, ‘‘इतिहास कैपिटल में हुई आज की हिंसा की घटना को याद रखेगा जिसे वैध चुनावी नतीजे के बारे में लगातार निराधार झूठ बोलने वाले एक निवर्तमान राष्ट्रपति ने भड़काया। यह अमेरिका के लिए बेहद अपमान और शर्म की बात है।’’ पूर्व राष्ट्रपति ओबामा ने कहा, ‘‘लेकिन, अगर हम ऐसा कहेंगे कि यह एकदम अचानक हुई घटना है तो हम खुद से मजाक कर रहे होंगे।’’ 

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अमेरिकी कांग्रेस ने बाइडन की जीत सत्यापित की, ट्रंप ने सत्ता का ‘सुव्यवस्थित’ हस्तांतरण की बात कही

अमेरिकी कांग्रेस ने एक संयुक्त सत्र में राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद के लिए क्रमश: जो बाइडन तथा कमला हैरिस के निर्वाचन की औपचारिक रूप से पुष्टि कर दी। अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए तीन नवंबर को चुनाव हुआ था। पेंसिल्वेनिया और एरिजोना राज्यों में वोटों पर रिपब्लिकनों की आपत्तियों को सीनेट और प्रतिनिधि सभा दोनों द्वारा खारिज किए जाने के बाद ‘इलेक्टोरल कॉलेज’ मतों को मंजूरी दे दी गई। बाइडन और हैरिस को 306 ‘इलेक्टोरल कॉलेज’ वोट मिले, वहीं ट्रंप और पेंस के खाते में 232 ‘इलेक्टोरल कॉलेज’ वोट आए। वर्मोंट के तीन ‘इलेक्टोरल कॉलेज’ वोटों की गिनती ने इन दोनों को राष्ट्रपति पद के चुनाव में जीत के लिए आवश्यक 270 से अधिक के जादुई आंकड़े के पार पहुंचा दिया। डेमोक्रेटिक पार्टी के 78 वर्षीय नेता बाइडन और पार्टी की भारतीय मूल की नेता 56 वर्षीय हैरिस दोनों 20 जनवरी को क्रमश: राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद की कमान संभालेंगे। चुनाव नतीजों के संसद से सत्यापन पर टिप्पणी करते हुए ट्रंप ने कहा, ‘‘यह फैसला राष्ट्रपति पद के इतिहास में उनके पहले महान कार्यकाल की समाप्ति को प्रकट करता है।’’ उन्होंने कहा कि वह 20 जनवरी को ‘‘सुव्यवस्थित’’ तरीके से सत्ता का हस्तांतरण करेंगे। ट्रंप ने एक बयान मेंकहा, ‘‘चूंकि चुनाव के नतीजों से मैं पूरी तरह से असहमत हूं और इस तथ्य पर कायम हूं, इसके बावजूद 20 जनवरी को सुव्यवस्थित तरीके से सत्ता का हस्तांतरण होगा।’’ उन्होंने कहा, ‘‘अमेरिका को फिर से महान बनाने की लड़ाई की यह महज शुरुआत है।’’ 

संसद पर ट्रंप समर्थकों के कब्जे के दौरान अफरा-तफरी, हिंसा का मंजर

“वो कहां हैं?” कैपिटल बिल्डिंग (अमेरिकी संसद) के हॉल में घूमते एक ट्रंप समर्थक ने वहां मौजूद अन्य समर्थकों से जानना चाहा। हाथों में निवर्तमान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का झंडा लिये ये लोग हर दरवाजे को धक्का देते जा रहे थे। ‘वो’ – सांसद, स्टाफ के सदस्य और अन्य कर्मी- इस दौरान मेज के नीचे छिपे हुए थे, घुटनों के बल बैठे हुए खुद को छिपा रहे थे, प्रार्थना कर रहे थे और देश में वैचारिक विभाजन से उपजी तस्वीर और हिंसा को बेहद करीब से महसूस कर रहे थे। अमेरिका ने अपने लंबे लोकतांत्रिक इतिहास में इन दृश्यों का सामना कभी नहीं किया था। लोगों ने बंदूक ले रखी थी। एक महिला पुलिस की गोली से मारी गई जबकि तीन अन्य लोग भी इस दौरान आपात चिकित्सा स्थितियों में मारे गए। कैपिटल बिल्डिंग से ट्रंप का झंडा लटक रहा था। इमारत की शोभा बढ़ाने वाला गरिमापूर्ण गोल गुंबद आंसूगैस के धुएं से भरा हुआ था। जगह-जगह टूटे कांच के टुकड़े बिखरे हुए थे। ट्रंप समर्थकों की भीड़ ने सीनेट के पीठासीन अधिकारी के आसन पर कब्जा जमा लिया, सदन की स्पीकर के कार्यालय और सीनेट के मंच पर भी उत्पात मचाया। वहीं उनमें से एक ने चिल्लाकर कहा, “ट्रंप उस चुनाव में जीत गए।” उन्होंने सदन के नेताओं का मजाक उड़ाया, निचले सदन प्रतिनिधि सभा की स्पीकर नैंसी पेलोसी के दफ्तर में तस्वीरें खिंचवाईं और उनमें से एक ने तो उनकी मेज पर पैर भी रखा हुआ था। 

कैपिटल बिल्डिंग में हिंसा करने वाले घरेलू आतंकवादी: बाइडन

नव निर्वाचित अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कहा है कि कैपिटल बिल्डिंग (अमेरिकी संसद भवन) में घुसकर हिंसा करने वालों में कुछ ठगों, श्वेत लोगों को सर्वोच्च समझने वाले लोगों और घरेलू आतंकवादियों का एक झुंड था जिन पर मुकदमा चलना चाहिए। बाइडन ने कहा कि इस पूरी घटना को संभालने में नाकाम रहने वाले अधिकारियों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए और सुनिश्चित होना चाहिए कि इसकी पुनरावृत्ति नहीं हो। उन्होंने डेलवेयर के विल्मिंगटन में संवाददाताओं को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘उन्हें कुछ अपराधियों, देशद्रोहियों, श्वेत लोगों को सर्वोपरि मानने वाले लोगों और यहूदी विरोधियों का एक झुंड माना जाना चाहिए। और इतना ही काफी नहीं है। ये लोग घरेलू आतंकवादी थे।’’ बाइडन ने कहा, ‘‘और न्याय विभाग को ये आरोप दर्ज करने चाहिए।’’ एक प्रश्न के उत्तर में नव निर्वाचित अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा, ‘‘उन पर मुकदमा चलना चाहिए।’’ बाइडन ने प्रदर्शनकारियों के साथ सेल्फी लेते कैपिटल पुलिस कर्मियों की कुछ तस्वीरें आने के मामले में भी जांच की मांग की है। उन्होंने रिपब्लिकन सीनेटर टेड क्रूज और कई अन्य सांसदों की भी निंदा की। बाइडन ने कहा, ‘‘मुझे लगता है कि अमेरिकी जनता के मन में साफ है कि ये लोग कौन हैं। वे बड़े झूठ का हिस्सा हैं। इसे अमेरिका के इतिहास का ‘काला दिन’ बताते हुए नव निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन ने कहा कि ट्रंप द्वारा ‘‘लोकतंत्र की अवहेलना’’ के कारण हिंसा की घटना हुई। 

कैपिटल बिल्डिंग 220 वर्ष के इतिहास में पहले भी बना हिंसक घटनाओं बना गवाह

अमेरिकी संसद भवन ‘कैपिटल बिल्डिंग’ के 220 साल के इतिहास में बुधवार जैसी घटना पहले कभी नहीं हुई जब निर्वतमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप समर्थक हजारों दंगाई यहां घुस आए और संवैधानिक दायित्वों के निर्वाह में बाधा पहुंचाने की हर संभव कोशिश की। अमेरिका के लोकतांत्रिक इतिहास में इसे काला दिन बताया जा रहा है। बहरहाल, यह पहला मौका नहीं है जब कैपिटल हिंसा का साक्षी बना। 1814 में भी यह इसी तरह की एक हिंसा का साक्षी बना था। तब इस इमारत में काम-काज की शुरूआत के सिर्फ 14 साल ही साल हुए थे। युद्ध में ब्रितानी बलों ने इमारत को जला कर बर्बाद करने की कोशिश की थी। ब्रितानी आक्रमणकारियों ने पहले इमारत को लूटा और फिर इसके दक्षिणी और उत्तरी हिस्से में आग लगा दी। इस आग में संसद का पुस्तकालय जल गया। लेकिन कुदरत की मेहरबानी से अचानक यहां आंधी-पानी शुरू हो गया और यह इमारत तबाह होने से बच गई। तब से अब तक काफी कुछ हो चुका है और कई घटनाओं ने हाउस चैम्बर के मंच पर लिखे ‘संघ, न्याय, सहिष्णुता, आजादी, अमन’ जैसे बेहतरीन शब्दों के मायने का मजाक बना दिया है। इस इमारत पर कई बार बम से भी हमला हुआ। कई बार गोलीबारी हुई। एक बार तो एक सांसद ने दूसरे सांसद की लगभग हत्या ही कर दी थी। 1950 में पोर्तो रिको के चार राष्ट्रवादियों ने द्वीप का झंडा लहराया था और ‘पोर्तो रिको की आजादी’ के नारे लगाते हुए सदन की दर्शक दीर्घा से ताबड़-तोड़ 30 गोलियां चलाईं थी। इसमें पांच सांसद जख्मी हुए थे। उनमें से एक गंभीर रूप से घायल हुआ था। पोर्तो रिको के इन राष्ट्रवादियो को जब गिरफ्तार किया गया तो उनकी नेता लोलिता लेबरॉन ने चिल्लाकर कहा,, ‘‘ मैं यहां किसी की हत्या करने नहीं आई हूं, मैं यहां पोर्तो रिको के लिए मरने आई हूं।’’ वहीं इस घटना से पहले 1915 में जर्मनी के एक व्यक्ति ने सीनेट के स्वागत कक्ष में डायनामाइट की तीन छड़ियां लगा दी थी। मध्यरात्रि से पहले उनमें विस्फोट भी हुआ। तब कोई आसपास नहीं था। चरम वामपंथी संगठन वेदर अंडरग्राउंड ने लाओस में अमेरिका की बमबारी का विरोध करने के लिए यहां 1971 में विस्फोट किए। वहीं मई 19 कम्युनिस्ट मुवमेंट ने 1983 में ग्रेनेडा पर अमेरिकी आक्रमण के विरोध में सीनेट में विस्फोट किया था। दोनों घटनाओं में किसी व्यक्ति की मौत नहीं हुई लेकिन हजारों डॉलर का नुकसान हुआ तथा सुरक्षा मानक कड़े हुए। वहीं 1998 में यहां मानसिक रूप से बीमार एक व्यक्ति ने जांच चौकी पर गोलीबारी की जिसमें दो अधिकारियों की मौत हो गई। उनमें से एक अधिकारी बंदूकधारी को जख्मी करने में कामयाब रहा था और बाद में उसे गिरफ्तार कर लिया गया। इस घटना का निशान अब भी यहां लगी पूर्व उप राष्ट्रपति जॉन सी कालहाउन की प्रतिमा पर देखा जा सकता है। प्रतिमा पर गोली का एक निशान है। इसके अलावा 1835 में इस इमारत के बाहर राष्ट्रपति एंड्रियु जैकसन पर एक व्यक्ति ने पिस्तौल चलाने की कोशिश की थी लेकिन पिस्तौल नहीं चल पाई और जैक्सन उसे दबोचने में सफल रहे। एक अन्य घटना में 1856 में सांसद प्रेस्टन ब्रुक्स ने सीनेटर चार्ल्स समर पर डंडे से हमला कर दिया क्योंकि सीनेटर ने अपने भाषण में दास प्रथा की आलोचना की थी। समर को इतनी बुरी तरह से पीटा गया था कि वह अस्वस्थता के चलते तीन साल तक संसद नहीं आ सके। सदन से ब्रुक्स को बर्खास्त नहीं किया गया लेकिन उन्होंने खुद ही इस्तीफा दे दिया। जल्द ही वह फिर निर्वाचित हो गए।

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अमेरिका के सांसद ट्रंप को हटाने, महाभियोग लाने पर कर रहे हैं विचार

अमेरिका में डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन दोनों पार्टियों के सांसद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को हटाने की मांग कर रहे हैं। प्रतिनिधि सभा की अध्यक्ष नैंसी पेलोसी ने कहा कि अगर ट्रंप को नहीं हटाया गया तो प्रतिनिधि सभा उनके खिलाफ दूसरा महाभियोग प्रस्ताव लाने पर विचार करेगी। ट्रंप का कार्यकाल पूरा होने में दो सप्ताह से भी कम समय रह गया है, फिर भी सांसद और यहां तक कि उनके प्रशासन के कुछ लोग भी बुधवार की हिंसा को लेकर यह चर्चा कर रहे हैं क्योंकि पहले तो ट्रंप ने यूएस कैपिटल (अमेरिकी संसद भवन) में अपने समर्थकों के हिंसक हंगामे की निंदा करने से इनकार किया और बाद में इस पर सफाई देते दिखे। ट्रंप प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी 25वें संशोधन की धारा चार के तहत अपनी ही कैबिनेट से उन्हें जबरन हटाने की संभावना पर गौर कर रहे हैं। पेलोसी ने बृहस्पतिवार को एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि वह उपराष्ट्रपति माइक पेंस और कैबिनेट के अन्य अधिकारियों के फैसले का इंतजार कर रही हैं। उन्होंने विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ और वित्त मंत्री स्टीव मनुचिन को चुनौती दी। 

ट्रंप के उपद्रवी समर्थकों के खिलाफ आरोप तय करने की तैयारी, राजद्रोह का आरोप भी लग सकता है

अमेरिका के कोलंबिया जिले के एक शीर्ष संघीय अभियोजक ने कहा है कि कैपिटल बिल्डिंग (अमेरिकी संसद भवन) में हिंसा करने वाले अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समर्थकों के खिलाफ आरोप तय करने के लिए ‘‘सभी विकल्पों पर विचार किया जा रहा है’’। वाशिंगटन डीसी के कार्यवाहक अटॉर्नी माइकल शेरविन ने कहा कि अभियोजक उपद्रवियों पर अनाधिकृत प्रवेश, संपदा की चोरी समेत 15 मामले दर्ज करने की योजना बना रहे हैं तथा कई अन्य आरोप तय करने के लिए जांचकर्ता अभी और सबूत जुटा रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘‘ उन सभी आरोपों पर विचार किया जा रहा है.... हम अधिक से अधिक आरोप तय करने की कोशिश करेंगे।’’ 

अमेरिका के कैपिटल परिसर में हिंसा की विश्व नेताओं ने की निंदा

अमेरिका में कैपिटल बिल्डिंग में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समर्थकों के हंगामे और हिंसा की दुनिया भर के नेताओं ने निंदा की है और इसकी वजह से देश में उपजे हालात पर क्षोभ जताया है। विभिन्न देशों के नेताओं ने शांतिपूर्ण तरीके से सत्ता हस्तांतरण का आह्वान किया है।

- अंकित सिंह







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