Glasgow CWG में भारतीय मुक्केबाजों का Golden धमाका, अब Asian Games में होगी असली परीक्षा

Indian boxers
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Ankit Jaiswal । Aug 6 2026 9:46PM

राष्ट्रमंडल खेलों में पदक तालिका में शीर्ष पर रहने के बाद भारतीय मुक्केबाजी के सामने अब एशियाई खेलों की कठिन बाधा है, जहां उज्बेकिस्तान और कजाकिस्तान जैसे देशों के कारण प्रतिस्पर्धा का स्तर अत्यधिक कठिन होता है। हालांकि जमीनी स्तर पर प्रशिक्षण और खेल विज्ञान के समावेश ने खिलाड़ियों के स्तर को ऊंचा किया है, लेकिन सफलता की निरंतरता के लिए एशियाई खेलों में प्रदर्शन ही भारतीय मुक्केबाजी के स्वर्णिम युग की वास्तविक कसौटी बनेगा।

ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल 2026 में भारतीय मुक्केबाजी टीम ने ऐसा प्रदर्शन किया, जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। भारत ने सात स्वर्ण और तीन रजत सहित कुल 10 पदक जीतकर पहली बार राष्ट्रमंडल खेलों में मुक्केबाजी की पदक तालिका में शीर्ष स्थान हासिल किया। खास बात यह रही कि सात में से छह स्वर्ण पदक भारतीय महिला मुक्केबाजों ने जीते। इस उपलब्धि ने यह संदेश जरूर दिया है कि भारतीय मुक्केबाजी लगातार मजबूत हो रही है, लेकिन खेल विशेषज्ञों का मानना है कि टीम की असली परीक्षा अभी बाकी है।

बता दें कि भारत ने इस बार इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया और आयरलैंड जैसे पारंपरिक मजबूत देशों को पीछे छोड़ दिया। इससे पहले वर्ष 2025 में लिवरपूल में आयोजित विश्व मुक्केबाजी प्रतियोगिता में भी भारत ने दो स्वर्ण, एक रजत और एक कांस्य पदक जीतकर अपनी प्रगति के संकेत दिए थे।

पूर्व विश्व चैंपियन लैशराम सरिता देवी का कहना है कि यह भारतीय मुक्केबाजी के इतिहास का सबसे यादगार प्रदर्शन है। उनके अनुसार खिलाड़ियों ने वर्षों की मेहनत, बेहतर प्रशिक्षण, खेल विज्ञान, पोषण और विदेशी प्रशिक्षण शिविरों का पूरा लाभ उठाया है। हालांकि उनका मानना है कि केवल राष्ट्रमंडल खेलों की सफलता से संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता।

गौरतलब है कि पिछले कुछ वर्षों में एशियाई देशों का मुक्केबाजी में दबदबा काफी बढ़ा है। उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान, चीन, चीनी ताइपे, जापान, उत्तर कोरिया और फिलीपींस जैसे देश लगातार विश्व और ओलंपिक स्तर पर शानदार प्रदर्शन कर रहे हैं। ऐसे में भारतीय मुक्केबाजों को अपनी वास्तविक क्षमता साबित करने के लिए एशियाई खेलों में इन देशों को हराना होगा।

मौजूद जानकारी के अनुसार, पिछले तीन एशियाई खेलों में भारत केवल दो स्वर्ण पदक ही जीत सका है, जबकि पिछले तीन ओलंपिक में देश के खाते में सिर्फ एक कांस्य पदक आया है। यही वजह है कि विशेषज्ञ एशियाई खेलों को भारतीय मुक्केबाजी की सबसे बड़ी परीक्षा मान रहे हैं।

सरिता देवी का कहना है कि भारतीय खिलाड़ी अब एशियाई देशों के बराबर पहुंच रहे हैं और दुनिया की मजबूत टीमें भी अब भारतीय मुक्केबाजों को हल्के में नहीं लेतीं। फिर भी उनका मानना है कि ग्लासगो की सफलता तभी पूरी मानी जाएगी, जब भारत एशियाई खेलों में पहले से अधिक पदक जीतकर अपनी ताकत साबित करेगा।

उन्होंने खिलाड़ियों को सलाह दी कि पदक जीतने के बाद सबसे कठिन काम सफलता को संभालना होता है। अधिक जश्न और सम्मान के बीच खिलाड़ियों का ध्यान लक्ष्य से नहीं हटना चाहिए। उन्होंने राष्ट्रमंडल खेलों के रजत पदक विजेता जदुमणि सिंह मांडेंगबाम का उदाहरण देते हुए कहा कि एक प्रशिक्षक के रूप में उनकी जिम्मेदारी है कि खिलाड़ी जल्द ही अभ्यास की लय में लौट आए।

वहीं ओलंपियन और भारतीय टीम के चयनकर्ता वेंकटेशन देवराजन का मानना है कि पिछले 15 वर्षों में देश में खेल सुविधाओं, प्रशिक्षण व्यवस्था और घरेलू प्रतिस्पर्धा में काफी सुधार हुआ है। उनके अनुसार हरियाणा के रोहतक और भिवानी जैसे केंद्र अब दुनिया के बड़े मुक्केबाजी केंद्रों की तरह विकसित हो चुके हैं। उन्होंने कहा कि अब देश के अलग-अलग हिस्सों से प्रतिभाशाली खिलाड़ी सामने आ रहे हैं और टीम में जगह बनाने के लिए कड़ा मुकाबला है।

देवराजन ने निकहत जरीन और साक्षी चौधरी का उदाहरण देते हुए कहा कि अब चयन केवल पुराने रिकॉर्ड के आधार पर नहीं होता, बल्कि वर्तमान प्रदर्शन को सबसे अधिक महत्व दिया जाता है। उनका मानना है कि यही स्वस्थ प्रतिस्पर्धा भविष्य में भारतीय मुक्केबाजी को और मजबूत बनाएगी।

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