• Gyan Ganga: क्या आप जानते हैं श्रीराम की वानर सेना में कितने वानर थे ?

सुखी भारती Aug 05, 2021 17:46

सज्जनों इसीलिए तो प्रभु की महिमा का कोई छा छोर नहीं। वे चाहें तो क्या नहीं कर सकते। माता सीता जी कहाँ हैं, भला यह कोई उनसे छुपा है? वे अंर्तयामी हैं तो उन्हें तो कण-कण में रमण करती हुई प्रत्येक तरंग की खबर है।

विगत अंक की कड़ी में हमने जहाँ से पल्लू छोड़ा था, वहीं से आगे फिर से नन्हां-सा किनारा पकड़ कर आगे बढ़ते हैं। हमने कहा था, कि श्रीराम जी सभी वानरों का कुशल-क्षेम पूछते हैं, उन्हें सकारात्मक, रचनात्मक व ओजस्वी विचारों से आकंठ डुबो देने का भरसक प्रयास करते हैं। परिणाम यह निकलता है, कि सभी वानरों की छाती फूल कर सौ योजन की हो जाती है। क्या आप जानते हैं, कि वानरों की सेना कितनी थी। भगवान शिव स्वयं कह रहे हैं, कि हे भवानी! उन वानरों की सेना की गिनती जो भी व्यक्ति कर रहा होगा, वह निःसंदेह संसार का सबसे मूर्ख व्यक्ति होगा। कारण कि वानर संख्या में इतने अधिक थे, कि उनको गिना ही नहीं जा सकता था-

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‘बानर कटक उमा मैं देखा

सो मूरुख जो करन चह लेखा   

आइ राम पद नावहिं माथा

निरखि बदनु सब होहिं सनाथा’ 

और सबसे बड़ी बात कि सभी वानर श्रीराम जी के श्रीचरणों में आकर प्रणाम करते हैं। प्रणाम भी ऐसा नहीं कि माथा टेका और, चलते बने। कारण कि वानरों की जितनी संख्या भगवान शिव बता रहे हैं, अगर सभी ने प्रणाम किया होगा, तो यही सोचते-सोचते दिमाग की घंटियां बज जाती हैं, कि लाखों अरबों की संख्या में जब सभी वानरों ने प्रणाम किया होगा, प्रणाम करने की इस प्रक्रिया में समय कितना लगा होगा। समय की गणना अगर की जाये तो इस हिसाब से तो कितने ही दशक बीत जाने का परिणाम निकलता है। आश्चर्य की सीमा तो अभी आनी बाकी है। क्योंकि भगवान शिव ने अब जो कहा, वह तो स्वीकार करने योग्य भी प्रतीत नहीं होता। लेकिन यह भी सत्य है, कि भगवान शिव मिथ्या भाषण भी तो कभी नहीं करते। जी हाँ आप यही सोच रहे हैं न कि भगवान शिव ने आखिर ऐसा क्या कह दिया? तो आप स्वयं ही देख लें कि भगवान शिव क्या कहते हैं-

‘अस कपि एक न सेना माहीं।

राम कुसल जेहि पूछी नाहीं।।’

अर्थात जब वानरों ने श्रीराम जी को प्रणाम किया तो उस सेना में एक भी ऐसा वानर नहीं था, जिससे श्रीराम जी ने उसकी कुशल न पूछी हो। श्रीराम जी ने किसी की कुशल पूछी हो, और उसमें समय न लगा हो, भला यह कैसे हो सकता है। कारण कि कुछ जीव ने श्रीराम जी को कहा होगा और कुछ भगवान ने भी उपदेश किया होगा। जीव को प्रभु जब कुछ सुनाते हैं, तो उसे ‘कथा` कहते हैं। और जब जीव प्रभु को सुनाने बैठता है, तो उसे ‘व्यथा’ कहते हैं। और इतना तो हम बहुत अच्छी प्रकार से जानते हैं कि न तो जीव के दुखों का कोई ओर छोर है और न प्रभु की कथा का ही कोई अंत है- ‘हरि अनंत हरि कथा अनंता।।’ ऐसे में यह तो स्पष्ट भान हो रहा है, कि केवल एक वानर की कुशल पूछने पर ही अनंत काल लग गया होगा। लेकिन तब भी ऐसा तो कुछ भी नहीं घटा। श्रीराम जी ने सबकी कुशल क्षणों में ही पूछ ली। और आश्चर्य का विषय तो यह है, कि कुशल पूछने की कोई औपचारिकता भर नहीं की। अपितु श्रीराम जी और प्रत्येक वानर में इतने विस्तार से चर्चा हुई, कि इन असंख्य वानरों में से एक भी वानर ऐसा नहीं था, जो श्रीराम जी से असंतुष्ट होकर गया हो। है न महाआश्चर्य? बुद्धि का स्तर इसे मानने से इन्कार कर रहा है न? निःसंदेह बुद्धि कभी भी यह स्वीकार करेगी ही नहीं। लेकिन कुछ भी हो प्रभु की इस मीठी लीला को घटने में कण मात्र भी विघन नहीं आया। कारण कि श्रीराम जी देह रुप में एक होते हुए भी, अनेक में विद्यमान रहते हैं। वह एक होकर भी अनेक में व्याप्त हो जाते हैं। और घट-घट की जान लेते हैं। उदाहरणतः मान लीजिए कि एक स्थान पर जल से भरे सौ घड़ी पड़े हैं। पूर्णिमा का शुभ अवसर है। चाँद अपने यौवन काल से गुजर रहा है। तभी एक बच्चा एक घड़े में चाँद की सुंदर परछाई देखता है। बच्चा घड़े में बने उस चाँद के अक्स को देख मोहित हो जाता है। व उस घड़े को अपने नन्हें प्रयासों से कबजाने का नन्हां सा प्रयास करता है। कारण कि उसे लगता है, कि एक चाँद तो आसमाँ में है, और दूसरा चाँद उस घड़े में है जो उसके पास है। वह यह सोचकर भी प्रसन्न हो रहा है, कि उसके हाथ वह घड़ा लगा है, जिसमें चाँद छुपा हुआ है। आप निश्चित ही उस बच्चे की मासूमियत पर मुस्करा रहे होंगे। क्योंकि बच्चा इस सत्य से अभी अवगत नहीं है, कि चाँद केवल उस घड़े में ही नहीं, जो उसके पास है। अपितु हर उस घड़े में है, जो वहां उपस्थित है। कहने को चाँद भले ही संख्या में एक है। लेकिन एक होते हुए भी वह सौ घड़ों में भी विद्यमान है। ठीक इसी प्रकार श्रीराम जी भी भले ही, दैहिक रुप में एक ही हों। लेकिन तब भी प्रभु समस्त जीवों में विद्यमान हैं। तभी तो ब्रह्मोपनिषद् में ऋर्षि जनों ने लिखा-

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‘एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रुपं बहुधा यः करोति।

तमात्मस्थं येनुपश्यन्ति धीरस्तेषां सुखं शाश्रतं नेतरेषाम्।।’

अर्थात वह एक ही प्रमात्मा एक होते हुए भी सभी भूत प्राणियों में समान रूप से विद्यमान है। भगवान शंकर भी श्रीराम जी के संबंध में ऐसा ही भाव प्रकट करते हैं-

‘यह कछु नहिं प्रभु कइ अधिकाई।

बिस्वरुप ब्यापक रघुराई।।’

सज्जनों इसीलिए तो प्रभु की महिमा का कोई छा छोर नहीं। वे चाहें तो क्या नहीं कर सकते। माता सीता जी कहाँ हैं, भला यह कोई उनसे छुपा है? वे अंर्तयामी हैं तो उन्हें तो कण-कण में रमण करती हुई प्रत्येक तरंग की खबर है। लेकिन भक्तों के प्रेम व कल्याण हेतु प्रभु अपनी लीलायें करते प्रतीत होते हैं। सभी वानरों की तो सुन ली, लेकिन श्रीहनुमान जी, अंगद व जामवंत जैसे वरिष्ठ वानरों से भेंट अभी बाकी थी। अंततः यह क्रम भी आगे बढ़ा। और अंत में केवल श्रीहनुमान जी शेष रह गए, जिनका श्रीराम जी के चरणों में अभी प्रणाम करना बाकी था। लो अब श्रीहनुमान जी भी प्रणाम कर रहे हैं। और यह क्या श्रीराम जी श्रीहनुमान जी से भी कोई वार्ता कर रहे हैं। क्या थी वह वार्ता, जो श्रीराम जी ने, श्रीहनुमान जी से की। जानेंगे अगले अंक में...(क्रमशः)...जय श्रीराम!

-सुखी भारती