• Gyan Ganga: सम्पूर्ण सृष्टियों में हर जीव के आदि, मध्य और अंत में विद्यमान हैं भगवान

आरएन तिवारी Apr 02, 2021 17:02

शेषनाग सम्पूर्ण नागों के राजा हैं। इनके एक हजार फण हैं। ये क्षीरसागर में सदा भगवान की शय्या बनकर भगवान को सुख पहुँचाते रहते हैं। ये अनेक बार भगवान के साथ अवतार लेकर उनकी लीला में शामिल हुए हैं। इसलिए भगवान ने इनको अपनी विभूति कहा है।

विचारों को केवल पढ़कर या सुनकर ही जीवन में परिवर्तन नहीं लाया जा सकता, बल्कि विचारों पर चलकर उस पर अमल करके ही परिवर्तन लाया जा सकता है। देखिए! भगवान श्री कृष्ण के विचार अर्जुन की जिंदगी को किस तरह परिवर्तित कर रहे हैं, कारण वह धीरे-धीरे उनके विचारों पर अमल करने की कोशिश करने लगा है।  

आइए ! गीता प्रसंग में चलते हैं- आज-कल हम गीता ज्ञान-गंगा के दसवे अध्याय में डुबकी लगा रहे हैं, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण अपनी श्रेष्ठतम विभूतियों का वर्णन कर रहे हैं।

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श्री भगवान उवाच 

उच्चैः श्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्धवम्‌ ।

एरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम्‌ ॥ (२७)

समुद्र मंथन के समय प्रकट होने वाले चौदह रत्नों में उच्चैः श्रवा घोड़ा भी एक रत्न है। यह इन्द्र का वाहन सम्पूर्ण घोड़ों का राजा है। इसलिए भगवान ने इसको अपनी विभूति बताया है। हथियों में जो सर्वश्रेष्ठ हो उसे गजेन्द्र कहते हैं।

ऐसे गजेन्द्रों में भी ऐरावत हाथी श्रेष्ठ है, इसकी उत्पत्ति भी समुद्र मंथन से ही हुई है और यह भी इन्द्र का वाहन है। इसलिए भगवान ने इसको भी अपनी विभूति बताया है। राजा सम्पूर्ण प्रजा का पालन करता है, वह नर श्रेष्ठ है, इसीलिए भगवान ने राजा को अपनी विभूति कहा है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि इन विभूतियों में जो श्रेष्ठता है, वह भगवान से ही आई है, इसलिए हमें भगवान का ही चिंतन करना चाहिए।   

आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक्‌ ।

प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः ॥ (२८)

जिनसे युद्ध किया जाता है उनको आयुध कहा जाता है। आयुधों में इंद्र का वज्र मुख्य है। यह दधीचि ऋषि की हड्डियों से बना हुआ है इसमें दधीचि ऋषि का तेज है। इसीलिए भगवान ने वज्र को अपनी विभूति कहा है। नई ब्याई हुई (बछड़ा जनी) गाय को धेनु कहते हैं। सभी धेनुओं में कामधेनु मुख्य है, जो समुद्रमन्थन से प्रकट हुई थी। यह सबकी कामना पूरी करने वाली है, इसलिए यह भगवान की विभूति है।   

अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम्‌ ।

पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्‌ ॥ (२९)

शेषनाग सम्पूर्ण नागों के राजा हैं। इनके एक हजार फण हैं। ये क्षीरसागर में सदा भगवान की शय्या बनकर भगवान को सुख पहुँचाते रहते हैं। ये अनेक बार भगवान के साथ अवतार लेकर उनकी लीला में शामिल हुए हैं। इसलिए भगवान ने इनको अपनी विभूति कहा है।

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(सर्प और नाग में यह अंतर है कि सर्प पृथ्वी पर और नाग जल में रहता है।) 

वरुण जल-जन्तुओं तथा जल देवताओं के राजा हैं और भगवान के भक्त भी हैं। 

इसलिए भगवान ने इनको अपनी विभूति कहा है। भगवान कहते हैं- मैं ही सभी पितरों में अर्यमा हूँ और मैं ही सभी नियमों को पालन और शासन करने वालों में यमराज हूँ। 

प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम्‌ ।

मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्‌ ॥ 

भक्त-प्रहलाद दैत्य कुल में दिति के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। ये दैत्यों में सर्वश्रेष्ठ हैं, भगवान के परम विश्वासी और निष्काम प्रेमी हैं। इसलिए भगवान ने इनको अपनी विभूति कहा है। ज्योतिष शास्त्र में काल अर्थात् समय से ही उम्र की गिनती की जाती है इसलिए दिन, महीना तथा वर्ष आदि गणना करने के साधनों में काल ही भगवान की विभूति है। बाग, चीता, हाथी, रीछ आदि जीतने भी पशु हैं, उन सबमें सिंह बलवान, तेजस्वी और साहसी है यह मृगराज है, इसलिए भगवान ने इसको अपनी विभूति बताया है। गरुण जी पक्षियों के राजा और भगवान के वाहन हैं, जब ये उड़ते हैं तब इनके पंखों से सामवेद की ध्वनि निकलती है ये भगवान के विभूतियों में से एक हैं।    

पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्‌ ।

झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी ॥ 

शुद्ध वायु से ही सब चीजें पवित्र होती हैं, नीरोगता आती है, अत: भगवान ने पवित्र करने वालों में वायु को अपनी विभूति बताया है। ऐसे तो राम साक्षात् ईश्वर हैं, पर जहाँ शस्त्रधारियों की गणना होती है, उन सबमें राम श्रेष्ठ हैं इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं- मैं सभी शस्त्र धारण करने वालों में राम हूँ और सभी जल-जंतुओं में मगरमच्छ हूँ। प्रवाह रूप से बहने वाले जितने नदी, नाले और झरने हैं, उन सब में गंगाजी श्रेष्ठ हैं। ये भगवान की चरणोदक हैं। गंगाजी अपने दर्शन और स्पर्श से दुनिया का उद्धार करने वाली हैं मरे हुए मनुष्यों की अस्थियाँ गंगाजी में प्रवाहित करने से उनकी सद्गति हो जाती है, इसलिए भगवान गंगाजी को अपनी विभूति कहते हैं। 

सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन ।

अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्‌ ॥ 

भगवान कहते हैं- हे अर्जुन! सम्पूर्ण सृष्टियों में जितने जीवों की उत्पत्ति होती है, उनके आदि, मध्य और अंत में मैं ही विद्यमान रहता हूँ। जिस विद्या से मनुष्य का कल्याण होता है, वह अध्यात्म विद्या है। संसार की दूसरी विद्याएँ पढ़ लेने पर भी कुछ न कुछ पढ़ना बाकी रह ही जाता है, लेकिन अध्यात्म विद्या प्राप्त हो जाने पर कुछ भी बाकी नहीं रह जाता, इसलिए प्रभु ने इसको अपनी विभूति कहा है। आपस में जो शास्त्रार्थ किया जाता है, वह तीन प्रकार का होता है। 

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1)  जल्प

2)  वितंडा 

3)  वाद 

उपर्युक्त तीनों में वाद श्रेष्ठ है। इसी वाद को भगवान ने अपनी विभूति बताया है। 

अक्षराणामकारोऽस्मि द्वंद्वः सामासिकस्य च ।

अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः ॥ 

भगवान कहते हैं— हे अर्जुन ! मैं सभी अक्षरों में अकार हूँ, मैं ही सभी समासों में द्वन्द्व हूँ, मैं कभी न समाप्त होने वाला समय हूँ, अर्थात अक्षय काल हूँ। मैं ही सभी को धारण करने वाला और सबका पालन-पोषण करने वाला हूँ। भगवान की दृष्टि सभी प्राणियों पर रहती है, इसीलिए सबका पालन-पोषण करने में भगवान बहुत सावधान रहते हैं। किस प्राणी को कौन-सी वस्तु कब मिलनी चाहिए, भगवान इसका खूब ख्याल रखते हैं और सही वक्त पर उस वस्तु को पहुंचा देते हैं। आइए, देखें ! गोस्वामी तुलसीदास जी भगवान की उदारता का गायन अपने भक्ति-पद में कैसे करते हैं।

  

ऐसो को उदार जग माहीं ।

बिनु सेवा जो द्रवै दीनपर राम सरिस कोउ नाहीं ।।

जो गति जोग बिराग जतन करि नहिं पावत मुनि ग्यानी ।

सो गति देत गीध सबरी कहँ प्रभु न बहुत जिय जानी ।।

जो सम्पति दस सीस अरप करि रावन सिव पहँ लीन्हीं ।

सो संपदा बिभीषन  कहँ अति सकुच-सहित हरि दीन्हीं ।।

तुलसीदास सब भाँति सकल सुख जो चाहसि मन मेरो ।

तौ भजु राम, काम सब पूरन करैं कृपानिधि तेरो ।।

श्री वर्चस्व आयुस्व आरोग्य कल्याणमस्तु...

जय श्री कृष्ण...

-आरएन तिवारी